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  • अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल

    अमेरिकी नाकाबंदी से रुका निर्यात…. ईरान पुराने और कबाड़ टैंकों में स्टोर कर रहा तेल


    तेहरान।
    ईरान (Iran) अपने तेल (Oil) को इकट्ठा करने के लिए नए तरीके खोजने में जुटा है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी (American naval blockade) ने उसके निर्यात (Export) को लगभग रोक दिया है। ईरान पूरी तरह उत्पादन बंद करना नहीं चाहता। ऐसे में वह पुराने और कबाड़ टैंकों में बिना बिके तेल को भरने में जुटा है। ईरान के भीतर तेल का भंडार बढ़ने के साथ ही वह अब जंक स्टोरेज (कबाड़ भंडारण) के रूप में जाने जाने वाले पुराने स्थलों को फिर से चालू कर रहा है। वह कामचलाऊ कंटेनरों का उपयोग कर रहा है।

    इसके साथ ही रेल के जरिये चीन को कच्चा तेल भेजने की कोशिश भी कर रहा है। वह किसी टैंक, जहाज, कामचलाऊ जगह या फिर उसे जमीन के नीचे ही छोड़ने पर काम कर रहा है। ये असामान्य कदम बुनियादी ढांचे के संकट को टालने और हॉर्मुज को लेकर जारी गतिरोध में वाशिंगटन के दबाव को कम करने के लिए उठाए जा रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच यह युद्ध अब इस बात की होड़ बन गया कि पहले कौन झुकता है।


    रेल से भेजने की कोशिश काफी महंगी

    ईरान के तेल-निर्यातक संघ के प्रवक्ता हामिद हुसैनी के अनुसार, ईरान अब रेल के जरिये चीन को तेल भेजने की कोशिश कर रहा है। रेल मार्ग तेहरान को चीन के यीवू और शीआन शहरों से जोड़ता है। हालांकि, यह समुद्री मार्ग की तुलना में बहुत महंगा है।

    तेल न बिक पाना और उसे इकट्ठा करना देश की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालता है। इससे वह देश बातचीत की मेज पर आने या युद्ध की स्थिति में झुकने को मजबूर हो सकता है।


    तेल रखने की जगह जल्द खत्म होगी

    रिपोर्ट के अनुसार, यदि नाकाबंदी जारी रही तो मई के मध्य तक ईरान का उत्पादन मौजूदा स्तर से आधे से भी कम (12 से 13 लाख बैरल रोज) गिर सकता है। ईरान के पास तेल रखने की जगह दो हफ्ते से भी कम समय में खत्म हो सकती है। ईरान के पास जमीन पर मौजूद तेल का भंडार नाकाबंदी के दौरान 46 लाख बैरल बढ़कर अब लगभग 4.9 करोड़ बैरल हो गया।

    1. सबसे पहले तेल को बड़े-बड़े जमीनी टैंकों में भरा जाता है। जब ये टैंक भर जाते हैं, तो वे पुराने या कबाड़ टैंकों का भी इस्तेमाल करते हैं।

    2. जब जमीन पर जगह खत्म हो जाती है, तो तेल को समुद्री जहाजों में भरकर समुद्र में ही खड़ा कर दिया जाता है। इसे फ्लोटिंग स्टोरेज कहते हैं।

    3. अधिक तेल को निकालने के लिए देश भारी छूट पर तेल बेचने लगते हैं ताकि खरीदार आकर्षित हों।

    4. अगर भंडारण की जगह बिल्कुल खत्म होने वाली हो, तो तेल के कुओं को बंद करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सबसे आखिरी और जोखिम भरा रास्ता है। क्योंकि, कुओंको दोबारा शुरू करना तकनीकी रूप से कठिन और महंगा होता है।

  • एशिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा तेल संकट का असर…. हो सकता है 1970 जैसा बदलाव!

    एशिया की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा तेल संकट का असर…. हो सकता है 1970 जैसा बदलाव!


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया संकट (West Asia crisis.) और तेल की कीमतों (Oil prices) में उछाल का असर अब धीरे-धीरे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं (Economies of Asia.) और आम लोगों की जिंदगी पर दिखने लगा है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह बदलाव वैसा ही हो सकता है जैसा 1970 के दशक के तेल संकट के बाद यूरोप में देखने को मिला था, जब पूरी ऊर्जा व्यवस्था ही बदल गई थी।

    1970 का सबक: कैसे यूरोप ने तेल पर निर्भरता घटाई
    1973 और 1979 के तेल संकट के बाद शुरुआत में अनुमान था कि यूरोप पहले की तरह ही तेल पर निर्भर रहेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। महंगे कच्चे तेल ने यूरोप को गैस और परमाणु ऊर्जा की ओर धकेल दिया। नतीजा यह हुआ कि 1980 के दशक तक तेल की खपत गिर गई और गैस का इस्तेमाल दोगुना हो गया।


    अब एशिया में दिख रहे वही संकेत

    आज एशिया भी उसी मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। दुनिया का 80% से ज्यादा तेल-गैस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर एशिया जाता है, लेकिन इस रूट पर तनाव और सप्लाई बाधित होने से कीमतें बढ़ रही हैं और देशों की निर्भरता संकट बनती जा रही है।

    जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देश पहले से ही आयात पर निर्भर हैं, जबकि वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश भी अब नेट इंपोर्टर बन चुके हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश और थाईलैंड में घरेलू गैस उत्पादन घट रहा है, जिससे महंगे आयात पर निर्भरता बढ़ रही है।


    आम लोगों पर सीधा असर

    ऊर्जा महंगी होने का असर सीधे आम आदमी पर दिख रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया में खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं। कई देशों में हवाई यात्रा महंगी हो गई है, एयरलाइंस ने उड़ानें कम कर दी हैं।

    इस्लामाबाद में एक गैसोलीन स्टेशन पर ग्राहकों की कतार। पाकिस्तान सरकार ने पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतें बढ़ा दीं। पाकिस्तान, श्रीलंका और फिलीपींस में फ्यूल बचाने के लिए चार दिन का वर्क वीक लागू किया गया है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी किसानों पर असर दिख रहा है, जहां फर्टिलाइजर महंगे हो रहे हैं और लागत बढ़ रही है।


    क्लीन एनर्जी की ओर तेज रुख

    इस संकट का सबसे बड़ा असर यह है कि अब क्लीन एनर्जी की ओर तेजी से रुख बढ़ रहा है। भारत में LPG की कमी के चलते लोग इंडक्शन चूल्हों की ओर जा रहे हैं। एशिया के कई देशों में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की मांग तेजी से बढ़ी है। थाईलैंड और सिंगापुर जैसे बाजारों में EV की हिस्सेदारी 50% तक पहुंच गई है। सोलर एनर्जी में भी बूम देखने को मिल रहा है। फिलीपींस, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में सोलर इंस्टॉलेशन तेजी से बढ़ रहे हैं।

    OPEC से UAE का बाहर होना बना नया ट्रिगर: ओपेक से यूएई के बाहर होने का फैसला तेल बाजार में अस्थिरता को और बढ़ा सकता है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ेगा और आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ेगा। क्या तेल की मांग घटने की शुरुआत हो चुकी है: एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर यह संकट लंबा चलता है, तो एशिया में तेल की मांग पर बड़ा असर पड़ सकता है। जैसे यूरोप में 1970 के बाद तेल की मांग कभी पहले जैसी नहीं रही, वैसे ही एशिया में भी बड़ा बदलाव संभव है।

  • पाकिस्तान को अल कायदा की सीधी धमकी, अफगानिस्तान मुद्दे पर आर्मी चीफ आसिम मुनीर निशाने पर

    पाकिस्तान को अल कायदा की सीधी धमकी, अफगानिस्तान मुद्दे पर आर्मी चीफ आसिम मुनीर निशाने पर


    नई दिल्ली ।
    आतंकवाद को लेकर लंबे समय से आलोचना झेल रहे पाकिस्तान के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। दुनिया के कुख्यात आतंकी संगठन अल कायदा ने पाकिस्तान की नेतृत्व व्यवस्था पर सीधा हमला बोलते हुए खुली चेतावनी दी है। संगठन ने खास तौर पर अफगानिस्तान के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के रुख की कड़ी आलोचना की है और तालिबान के समर्थन का ऐलान किया है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अल कायदा की केंद्रीय नेतृत्व की ओर से जारी यह संदेश शाहदा न्यूज एजेंसी के माध्यम से उसके मीडिया विंग ‘अस-सहब’ द्वारा गुप्त प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया गया। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब इस्लामाबाद और काबुल के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है।

    अपने बयान में संगठन ने पाकिस्तान की सिविल-मिलिट्री व्यवस्था को निशाना बनाते हुए आरोप लगाया कि वह अफगानिस्तान के हितों के खिलाफ काम कर रही है और पश्चिमी देशों के साथ गठजोड़ कर रही है। साथ ही, अल कायदा ने पाकिस्तान को चेतावनी दी कि वह अफगानिस्तान से दूरी बनाए रखे, वरना परिणाम गंभीर होंगे।

    आतंकी संगठन ने पाकिस्तानी जनता और सेना को भी भड़काने की कोशिश की। उसने लोगों से सरकार के आदेशों का पालन न करने और अपने एजेंडे के समर्थन की अपील की। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संदेशों के जरिए संगठन पाकिस्तान में अस्थिरता पैदा करना चाहता है और जनता का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर लगातार अफगान तालिबान को चेतावनी देते रहे हैं। वहीं, तालिबान और पाकिस्तान के बीच हाल के महीनों में तनाव बढ़ा है।

    दरअसल, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर कई बार हवाई हमले किए हैं, जबकि तालिबान ने जवाबी कार्रवाई में डूरंड लाइन के पास पाकिस्तानी सेना के ठिकानों को निशाना बनाया है। अफगानिस्तान डूरंड लाइन को मान्यता नहीं देता, जबकि पाकिस्तान वहां बाड़बंदी कर घुसपैठ रोकने की कोशिश कर रहा है।

  • ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी नहीं चलेगी’, ईरान की अमेरिका को सख्‍त चेतावनी

    ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी नहीं चलेगी’, ईरान की अमेरिका को सख्‍त चेतावनी


    तेहरान।
    ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान ने अमेरिका पर ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी’ का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि अगर कथित समुद्री नाकेबंदी जारी रही तो जल्द ही उसे “व्यावहारिक और अभूतपूर्व सैन्य कार्रवाई” का सामना करना पड़ेगा।

    ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक, एक वरिष्ठ सुरक्षा सूत्र ने कहा कि देश की सशस्त्र सेनाएं अब और संयम बरतने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि धैर्य की सीमा होती है और यदि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में अपनी ‘गैरकानूनी’ गतिविधियां जारी रखता है, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा।

    अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी जहाजों की जब्ती को लेकर भी विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि अमीर सईद इरावानी ने इस कार्रवाई को “कानूनी व्यापार में अवैध हस्तक्षेप” करार दिया है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद को लिखे पत्र में कहा कि अमेरिकी कदम ‘समुद्री डकैती’ के समान हैं।

    दूसरी ओर, वॉशिंगटन डीसी की जिला अटॉर्नी जीनीन पिरो ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दो जहाज ‘एमटी मजेस्टिक’ और ‘एमटी टिफनी’ को जब्त करने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इन जहाजों में मौजूद लगभग 3.8 मिलियन बैरल ईरानी तेल को कब्जे में लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में यह नाकेबंदी उस समय लागू की, जब 11 और 12 अप्रैल को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान के साथ हुई वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।

    गौरतलब है कि 8 अप्रैल को ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच युद्धविराम लागू हुआ था, जो करीब 40 दिनों तक चले संघर्ष के बाद संभव हो पाया। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे, जिसमें शीर्ष नेतृत्व, सैन्य अधिकारी और नागरिकों की जान गई थी। इसके जवाब में ईरान ने इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी रणनीतिक पकड़ को और मजबूत कर लिया, जिससे क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है।

  • भारत-इक्वाडोर रिश्तों में नई ऊर्जा ,जयशंकर-सोमरफेल्ड मुलाकात से सहयोग के कई दरवाजे खुले

    भारत-इक्वाडोर रिश्तों में नई ऊर्जा ,जयशंकर-सोमरफेल्ड मुलाकात से सहयोग के कई दरवाजे खुले


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में भारत और इक्वाडोर के बीच कूटनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम तब देखने को मिला जब विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इक्वाडोर की विदेश मंत्री गैब्रिएला सोमरफेल्ड से मुलाकात की। इस मुलाकात ने दोनों देशों के बीच सहयोग के नए आयाम खोल दिए हैं और संकेत दिया है कि आने वाले समय में यह साझेदारी और अधिक व्यापक और प्रभावी रूप ले सकती है।

    बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार कृषि स्वास्थ्य डिजिटल तकनीक और कैपेसिटी बिल्डिंग जैसे कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर गहन चर्चा की। यह केवल पारंपरिक कूटनीतिक बातचीत नहीं थी बल्कि एक ऐसी रणनीतिक पहल थी जो दोनों देशों को आर्थिक और तकनीकी रूप से करीब लाने का मार्ग प्रशस्त करती है। भारत जहां तेजी से उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है वहीं इक्वाडोर जैसे दक्षिण अमेरिकी देश के साथ सहयोग उसके वैश्विक प्रभाव को और विस्तार देगा।

    इस मुलाकात की एक खास बात यह भी रही कि इक्वाडोर ने भारत की अगुवाई वाले अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में शामिल होने की इच्छा जताई है। विशेष रूप से इंटरनेशनल सोलर अलायंस और इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस में शामिल होने की प्रक्रिया शुरू करना यह दर्शाता है कि इक्वाडोर भारत के नेतृत्व और उसकी पहलों पर भरोसा जता रहा है। इसके अलावा इक्वाडोर पहले से ही कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर का सदस्य है जो दोनों देशों के बीच आपदा प्रबंधन और सतत विकास के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करता है।

    इस दौरान एक और महत्वपूर्ण घोषणा क्विक इम्पैक्ट प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग समझौते को लेकर की गई। यह समझौता विकास सहयोग को जमीनी स्तर तक ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा और छोटे लेकिन प्रभावी प्रोजेक्ट्स के जरिए आम जनता तक इसका सीधा लाभ पहुंचेगा। यह पहल दोनों देशों के रिश्तों को केवल कागजी समझौतों तक सीमित नहीं रखेगी बल्कि इसे व्यावहारिक और परिणामोन्मुख बनाएगी।

    इक्वाडोर की विदेश मंत्री ने अपने दौरे के दौरान राजघाट पहुंचकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की जो भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है। यह प्रतीकात्मक कदम दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को भी मजबूत करता है।

    पिछले कुछ समय से भारत और इक्वाडोर के बीच संबंधों में लगातार प्रगति देखने को मिल रही है। हाल ही में दोनों देशों के बीच कृषि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस साइबर सिक्योरिटी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाने पर भी चर्चा हुई थी। साथ ही क्विटो में भारत की रेजिडेंट एम्बेसी का उद्घाटन इस बात का प्रमाण है कि भारत दक्षिण अमेरिका में अपनी कूटनीतिक मौजूदगी को और सशक्त बना रहा है।

    यह पूरी पहल केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका और प्रभाव को भी दर्शाती है। जिस तरह से दोनों देश बहुपक्षीय मंचों पर मिलकर काम करने की बात कर रहे हैं उससे यह साफ है कि आने वाले समय में भारत और इक्वाडोर की साझेदारी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अहम भूमिका निभा सकती है।

  • क्या है OPEC और क्यों इससे अलग हो रहा UAE, समझें तेल की दुनिया का बड़ा खेल

    क्या है OPEC और क्यों इससे अलग हो रहा UAE, समझें तेल की दुनिया का बड़ा खेल

    नई दिल्ली । नई दिल्ली में वैश्विक तेल बाजार को लेकर एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है जब संयुक्त अरब अमीरात ने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया है 1 मई से यूएई इस संगठन का हिस्सा नहीं रहेगा इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है

    ओपेक दरअसल दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों का एक अंतर सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना 14 सितंबर 1960 को बगदाद में की गई थी इसका उद्देश्य वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखना और सदस्य देशों के बीच उत्पादन तथा कीमतों को संतुलित रखना है शुरुआत में इसमें पांच देश शामिल थे जिनमें ईरान इराक कुवैत सऊदी अरब और वेनेजुएला शामिल थे समय के साथ यह संगठन विस्तार पाकर करीब 12 देशों तक पहुंच गया

    ओपेक की खासियत यह है कि इसके सदस्य देश मिलकर तय करते हैं कि बाजार में कितना तेल उत्पादन होगा ताकि कीमतें संतुलित रहें अगर उत्पादन ज्यादा होता है तो कीमतें गिरती हैं और कम उत्पादन से कीमतें बढ़ जाती हैं ऐसे में ओपेक वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है

    यूएई के इस फैसले के पीछे कई वजहें बताई जा रही हैं पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और खासकर ईरान के साथ टकराव के बाद खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक मतभेद सामने आए हैं इसके अलावा यूएई लंबे समय से अपने तेल उत्पादन को बढ़ाना चाहता है जबकि ओपेक के अंदर खासकर सऊदी अरब उत्पादन को सीमित रखने की नीति पर जोर देता रहा है

    यूएई ओपेक का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश रहा है लेकिन कोटा सिस्टम के कारण वह अपनी पूरी क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहा था ऐसे में संगठन से बाहर होने के बाद अब उसे अपनी रणनीति के अनुसार उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की स्वतंत्रता मिल जाएगी

    इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ना तय माना जा रहा है विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूएई उत्पादन बढ़ाता है तो बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों में गिरावट आ सकती है इसका सीधा फायदा भारत जैसे देशों को मिल सकता है जो बड़ी मात्रा में तेल आयात करते हैं सस्ती कीमतों पर तेल मिलने से महंगाई पर भी नियंत्रण संभव है

    हालांकि इस कदम से ओपेक की एकजुटता और खासकर सऊदी अरब की नेतृत्व भूमिका कमजोर हो सकती है साथ ही बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है ओपेक के अलावा ओपेक प्लस नाम का एक व्यापक समूह भी है जिसमें रूस सहित कई अन्य देश शामिल हैं जो मिलकर तेल उत्पादन पर प्रभाव डालते हैं ऐसे में यूएई का यह कदम आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा संतुलन को किस दिशा में ले जाएगा यह देखना अहम होगा

  • भारत न्यूजीलैंड एफटीए से खुलेगा व्यापार .का नया दौर निर्यात निवेश और रोजगार को मिलेगा बड़ा बूस्ट

    भारत न्यूजीलैंड एफटीए से खुलेगा व्यापार .का नया दौर निर्यात निवेश और रोजगार को मिलेगा बड़ा बूस्ट


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते को एक ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा है कि यह समझौता आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगा उन्होंने स्पष्ट किया कि यह करार केवल वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि इससे कई नए क्षेत्रों में व्यापक संभावनाएं खुलेंगी

    मंत्री के अनुसार इस एफटीए के तहत भारत से न्यूजीलैंड निर्यात होने वाले अधिकांश उत्पादों पर अब शून्य शुल्क लागू होगा इससे भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी और निर्यात में तेजी आएगी खासतौर पर छोटे और मध्यम उद्यमों को इससे बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है

    पीयूष गोयल ने बताया कि इस समझौते के जरिए न्यूजीलैंड का बाजार भारत के लिए करीब 140 सेवा क्षेत्रों में खुल गया है इसमें शिक्षा खेल संस्कृति कृषि उत्पादकता और तकनीकी सहयोग जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर शामिल हैं उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बौद्धिक संपदा और पारंपरिक चिकित्सा विशेष रूप से आयुष से जुड़े क्षेत्रों में भी सहयोग को बढ़ावा मिलेगा

    फार्मास्यूटिकल सेक्टर को लेकर उन्होंने इसे बेहद अहम करार दिया मंत्री ने बताया कि यदि भारत में बनी कोई दवा पहले से अमेरिका या यूरोप जैसे विकसित देशों में स्वीकृत है तो न्यूजीलैंड में उसे तेज प्रक्रिया के जरिए मंजूरी मिल सकेगी इससे भारतीय दवा कंपनियों के लिए वैश्विक बाजार में प्रवेश आसान होगा और उनकी पहुंच मजबूत होगी

    निवेश के क्षेत्र में भी इस समझौते को गेम चेंजर माना जा रहा है मंत्री के अनुसार पिछले 25 वर्षों में न्यूजीलैंड ने भारत में करीब 70 मिलियन डॉलर का निवेश किया है लेकिन अब अगले 15 वर्षों में लगभग 20 बिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना बनाई जा रही है यह निवेश देश में उद्योगों के विस्तार और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा

    उन्होंने यह भी बताया कि इस समझौते को जल्द ही न्यूजीलैंड की संसद में पेश किया जाएगा जहां इसे सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों का समर्थन मिल रहा है ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि इसे मंजूरी मिलने के बाद इस वर्ष के अंत तक लागू कर दिया जाएगा

    पीयूष गोयल ने कहा कि यह एफटीए भारत के विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा और अमृत काल के दौरान देश की आर्थिक प्रगति को नई गति प्रदान करेगा उन्होंने भरोसा जताया कि यह समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करेगा और व्यापारिक साझेदारी को नए आयाम देगा

  • अमेरिका में बड़ा कानूनी एक्शन, पूर्व FBI निदेशक जेम्स कोमी पर ट्रंप को धमकी देने का केस

    अमेरिका में बड़ा कानूनी एक्शन, पूर्व FBI निदेशक जेम्स कोमी पर ट्रंप को धमकी देने का केस


    नई दिल्ली ।
    संयुक्त राज्य अमेरिका में एक हाई प्रोफाइल कानूनी मामले ने राजनीतिक और सुरक्षा हलकों में हलचल मचा दी है जहां पूर्व एफबीआई निदेशक जेम्स कोमी के खिलाफ संघीय स्तर पर आरोप तय किए गए हैं आरोप है कि उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी

    मामला नॉर्थ कैरोलिना के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट में फेडरल ग्रैंड जूरी के समक्ष पेश किया गया जहां अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि 15 मई 2025 को कोमी ने जानबूझकर ऐसी गतिविधि की जो राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए खतरा मानी जा सकती है आरोपों में यह भी शामिल है कि उन्होंने एक राज्य से दूसरे राज्य तक कथित तौर पर धमकी भरा संदेश भेजा

    इस पूरे विवाद की जड़ एक सोशल मीडिया पोस्ट बताई जा रही है जिसमें इंस्टाग्राम पर सीपियों को 86 47 के रूप में सजाया गया था अधिकारियों का मानना है कि इस तरह का संकेत आमतौर पर हिंसक इरादों या किसी को खत्म करने के संदर्भ में समझा जा सकता है और इसे राष्ट्रपति के खिलाफ संभावित खतरे के रूप में देखा गया

    कार्यवाहक अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने कहा कि यह मामला किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं बल्कि कई महीनों की गहन जांच के बाद सामने आया है उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति की सुरक्षा से जुड़ी किसी भी तरह की धमकी को बेहद गंभीरता से लिया जाता है और कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाती है

    एफबीआई निदेशक काश पटेल ने भी इस मामले में एजेंसी की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि जांच पूरी तरह मानक प्रक्रिया के तहत की गई और हर पहलू की बारीकी से जांच की गई उन्होंने बताया कि संबंधित पोस्ट को बाद में हटा दिया गया था और कोमी ने इसके लिए माफी भी मांगी थी

    वहीं अमेरिकी अटॉर्नी एलिस बॉयल ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है चाहे व्यक्ति कितना भी प्रभावशाली पद पर क्यों न रहा हो अगर कानून का उल्लंघन होता है तो कार्रवाई तय है उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसे मामलों में सबूतों और गवाहों के आधार पर अदालत में आरोप सिद्ध किए जाते हैं

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोमी पर लगे आरोप अदालत में साबित हो जाते हैं तो उन्हें अधिकतम 10 साल तक की सजा हो सकती है हालांकि अमेरिकी न्याय प्रणाली के तहत जब तक अदालत दोष साबित नहीं करती तब तक आरोपी को निर्दोष माना जाता है

    यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका में सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं के खिलाफ धमकियों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी है और सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित खतरे को लेकर सतर्क हैं आने वाले समय में अदालत की कार्यवाही और सबूतों के आधार पर इस मामले की दिशा तय होगी

  • US: जानें क्यों घट रही ट्रंप की लोकप्रियता…… अप्रूवल रेटिंग घटी

    US: जानें क्यों घट रही ट्रंप की लोकप्रियता…… अप्रूवल रेटिंग घटी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की लोकप्रियता (Popularity) में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। ट्रंप को लेकर जारी एक ताजा सर्वे में उनकी अप्रूवल रेटिंग (Approval rating) घटकर 34% पर पहुंच गई, जो उनके मौजूदा कार्यकाल का सबसे निचला स्तर है। यह गिरावट पिछले सर्वे के 36% से भी कम है और जनवरी 2025 में पद संभालने के समय के मुकाबले काफी नीचे आ चुकी है। सर्वे के अनुसार, महंगाई और ईरान के साथ चल रहे युद्ध ने जनता की नाराज़गी को और बढ़ा दिया है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका-ईरान युद्ध का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ा है। इस संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे पेट्रोल की कीमतों में 40% से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ती महंगाई और रोजमर्रा के खर्चों में इजाफे ने अमेरिकी नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। सर्वे में केवल 22% लोगों ने ट्रंप के महंगाई से निपटने के तरीके को सही माना, जो यह दिखाता है कि आर्थिक मुद्दों पर सरकार के प्रति भरोसा कम हो रहा है।

    किस बात से नाराज है अमेरिका की जनता
    ईरान के साथ चल रहे युद्ध को लेकर भी अमेरिकी जनता में खासा विरोध देखा जा रहा है। सर्वे के अनुसार, केवल 34% लोग इस युद्ध का समर्थन कर रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोग इसके खिलाफ हैं। हालांकि, ट्रंप को रिपब्लिकन समर्थकों का मजबूत समर्थन अभी भी मिला हुआ है, जहां 78% लोग उनके साथ खड़े हैं। इसके बावजूद, अर्थव्यवस्था संभालने को लेकर उनके अपने समर्थकों में भी असंतोष बढ़ रहा है।

    इस गिरती लोकप्रियता का असर आने वाले चुनावों पर भी पड़ सकता है। सर्वे में यह संकेत मिला है कि स्वतंत्र मतदाताओं के बीच डेमोक्रेट्स को बढ़त मिल रही है और कई मतदाताओं ने अभी भी कोई फैसला नहीं लिया है। हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप पर हुए हमले की कोशिश का भी जनता की राय पर खास असर नहीं पड़ा है। ऐसे में माना जा रहा है कि रिपब्लिकन पार्टी के लिए आगामी मध्यावधि चुनावों में चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

  • पाक में भारत विरोधी आतंकियों की हो रही रहस्यमयी मौतें, अब हाफिज सईद के करीबी अफरीदी का खात्मा

    पाक में भारत विरोधी आतंकियों की हो रही रहस्यमयी मौतें, अब हाफिज सईद के करीबी अफरीदी का खात्मा


    नई दिल्ली। पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से भारत में वांटेड आतंकियों और उनके सहयोगियों की लगातार रहस्यमयी हत्याओं का सिलसिला जारी है। इसी कड़ी में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े एक बड़े नेता शेख यूसुफ अफरीदी की हत्या ने एक बार फिर सुरक्षा और खुफिया तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मामला 26 अप्रैल 2026 का है, जब पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के लांडी कोतल क्षेत्र में अज्ञात हमलावरों ने अफरीदी पर गोलियां चला दीं। इस हमले में उसकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि हमलावर आसानी से फरार हो गए। अफरीदी को लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख चेहरे और हाफिज सईद का करीबी सहयोगी माना जाता था।

    सूत्रों के अनुसार, अफरीदी संगठन के लिए भर्ती और स्थानीय नेटवर्क संभालने में अहम भूमिका निभाता था। वह खैबर क्षेत्र में लश्कर की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सक्रिय था और प्रतिबंधित संगठन के ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। इससे पहले भी संगठन को बड़ा झटका लगा था, जब लश्कर-ए-तैयबा के सह-संस्थापक अमीर हमजा पर लाहौर में जानलेवा हमला हुआ था, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। माना जाता है कि वह कई बड़े आतंकी हमलों की रणनीति और प्रचार गतिविधियों से जुड़ा रहा है।

    पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों से भारत के मोस्ट वांटेड आतंकियों और उनके नेटवर्क से जुड़े लोगों की लगातार टारगेटेड हत्याएं हो रही हैं। इनमें कई कमांडर, फाइनेंसर और लॉजिस्टिक सपोर्ट देने वाले लोग शामिल हैं। हाल ही में सामने आए मामलों में कराची, खैबर पख्तूनख्वा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई आतंकियों की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या हुई है। इनमें लश्कर, जैश-ए-मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों से जुड़े नाम शामिल बताए जाते हैं।

    इन घटनाओं का पैटर्न लगभग एक जैसा बताया जाता है अज्ञात हमलावर, सटीक निशाना, और वारदात के बाद बिना किसी जिम्मेदारी का दावा किए हमलावरों का फरार हो जाना। इन हत्याओं को लेकर अलग-अलग थ्योरी सामने आती रही हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे आतंकी संगठनों के भीतर की आपसी रंजिश और शक्ति संघर्ष से जोड़ते हैं, जबकि कुछ इसे सुरक्षा एजेंसियों की रणनीतिक कार्रवाई मानते हैं। हालांकि किसी भी थ्योरी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल यह सिलसिला पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क के लिए बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है, क्योंकि एक के बाद एक प्रमुख नामों के निशाने पर आने से पूरे ढांचे में अस्थिरता और डर का माहौल देखा जा रहा है।