Category: International

  • चुनावी वादे से पीछे हटे न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी, बोले- नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार नहीं, फिर भी ट्रंप प्रशासन से की कार्रवाई की मांग

    चुनावी वादे से पीछे हटे न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी, बोले- नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार नहीं, फिर भी ट्रंप प्रशासन से की कार्रवाई की मांग

    नई दिल्ली । न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर अपने पहले के चुनावी रुख में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए कहा है कि उनके प्रशासन के पास नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कई बार दावा किया था कि यदि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब कानूनी समीक्षा के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि स्थानीय प्रशासन के अधिकार सीमित हैं और इस प्रकार की कार्रवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।

    ममदानी ने एक वीडियो संदेश जारी कर बताया कि उनके प्रशासन ने लागू कानूनों का विस्तृत अध्ययन किया और यह जांचने का प्रयास किया कि क्या न्यूयॉर्क शहर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी किसी गिरफ्तारी वारंट को स्वयं लागू कर सकता है। समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि नगर प्रशासन के पास ऐसा करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय में अंतिम अधिकार संघीय सरकार के पास है।

    हालांकि कानूनी सीमाओं को स्वीकार करने के बावजूद ममदानी ने अपने राजनीतिक रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने दोहराया कि उनकी राय में बेंजामिन नेतन्याहू पर लगे आरोप गंभीर हैं और यदि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिका की संघीय सरकार से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रियाओं के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाए और संबंधित वारंट के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए।

    ममदानी ने यह भी कहा कि जब सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए नेतन्याहू के न्यूयॉर्क आने की संभावना हो, तब संघीय प्रशासन को आवश्यक कानूनी विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के साथ सहयोग बढ़ाने की भी वकालत की। हालांकि अमेरिका वर्तमान में आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएं बनी हुई हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नेतन्याहू की अमेरिका यात्रा के दौरान किसी प्रकार की गिरफ्तारी नहीं होगी। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिकी भूमि पर रहते हुए इजरायली प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। उनके इस बयान के बाद ममदानी की नई टिप्पणी को राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ममदानी ने यह भी दोहराया कि वह नेतन्याहू की नीतियों के आलोचक बने हुए हैं और उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आईसीसी ने आरोप तय किए हैं तो न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क ऐसे किसी व्यक्ति का स्वागत नहीं करता जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ रहा हो।

    दूसरी ओर, नेतन्याहू के कार्यालय ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इजरायल की ओर से कहा गया कि आईसीसी का इजरायली नागरिकों या अमेरिकी नागरिकों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसके निर्णयों को स्वीकार नहीं किया जाता। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय न्याय, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्थानीय प्रशासन के अधिकारों को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका

    ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका (America) अगस्त 2028 से विदेश से आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं (Generic medicines) पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) (Hefty Import Duties- Tariffs) लगाएगा। उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका के भीतर कराना है। इस फैसले का असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है।

    ट्रंप ने ट्रथु सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक टैरिफ शून्य फीसदी रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए इसे 100 फीसदी कर दिया जाएगा। उसके बाद यह बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा।


    ट्रंप ने क्या कहा?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में लाई जाने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक शून्य फीसदी आयात शुल्क रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए यह 100 फीसदी होगा और उसके बाद 200 फीसदी कर दिया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है, ताकि जेनेरिक दवाओं का उत्पादन फिर से अमेरिका में शुरू हो। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में कारखाने और जरूरी उपकरण नहीं लगाएंगे, उन्हें इस नीति के तहत दंड का सामना करना पड़ेगा।


    नई नीति में क्या बदलेगा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस नीति का मकसद अमेरिका के लोगों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह भी कहा कि पेटेंट वाली, ब्रांडेड और नई दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और वह पहले की तरह जारी रहेगी।

    भारत का अमेरिका को दवाओं का कितना निर्यात है?
    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब अमेरिकी डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात 25.8 अरब अमेरिकी डॉलर का 36 प्रतिशत था।


    जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल कहां होता है?

    भारत में बनी जेनेरिक दवाएं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, संक्रामक रोगों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं।

  • ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका

    ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में आव्रजन नियमों (Immigration rules) में एक बड़े बदलाव के चलते भारतीय छात्रों (Indian students) समेत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लौटने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालयों ने सलाह दी है कि अगर वे मौजूदा आव्रजन व्यवस्था का लाभ बनाए रखना चाहते हैं तो 15 सितंबर से पहले अमेरिका लौट आएं। यह सलाह उन छात्रों के लिए है जो शैक्षणिक अवकाश के दौरान अपने देश आए हुए हैं और एफ-1 या जे-1 वीजा पर पढ़ाई कर रहे हैं।

    यह सलाह अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के नए “अंतिम नियम” के लागू होने से पहले दी गई है। यह नियम लंबे समय से लागू “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस यानी डी/एस व्यवस्था” की जगह लेगा।


    15 सितंबर से लागू होगा नया नियम

    नए नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका में अधिकतम चार वर्ष की निश्चित अवधि के लिए ही प्रवेश मिलेगा। मौजूदा व्यवस्था में एफ-1 वीजा धारक छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम की शर्तों का पालन करते रहते हैं। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपने नोटिस में कहा, “इस अंतिम नियम को लागू करने के लिए 60 दिन का समय दिया गया है। हम सभी छात्रों को सलाह देते हैं कि वे 8 सितंबर, 2026 से शुरू होने वाली कक्षाओं से पहले न्यूयॉर्क लौट आएं।”


    क्या-क्या बदलेगा?

    – डीएचएस ने एफ-1 छात्र वीजा, जे-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी पत्रकारों के लिए आई वीजा पर अधिकतम चार वर्ष की अवधि तय कर दी है।
    – नए नियम के तहत पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में रहने की छूट 60 दिन से घटाकर 30 दिन कर दी जाएगी।
    – अगर किसी छात्र को अपनी अवधि बढ़ानी होगी तो उसे अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) से फॉर्म आई-539 के माध्यम से मंजूरी लेनी होगी।


    किन छात्रों पर लागू नहीं होगा नया नियम?

    डीएचएस के अनुसार, जो छात्र 15 सितंबर को पहले से अमेरिका में “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस” के तहत मौजूद होंगे, वे अपने फॉर्म आई-20 में दर्ज कार्यक्रम पूरा होने तक या स्वीकृत ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी/एसटीईएम ओपीटी) की अवधि तक अमेरिका में रह सकेंगे। हालांकि, यह छूट भी नए नियम के लागू होने की तारीख से अधिकतम चार वर्ष तक ही मान्य होगी और किसी भी स्थिति में 14 नवंबर, 2030 के बाद लागू नहीं रहेगी। इसमें देश छोड़ने के लिए मिलने वाली अवधि भी शामिल होगी।


    भारतीय छात्रों में बढ़ी चिंता

    नए नियम के बाद भारतीय छात्रों और पेशेवरों के बीच चिंता बढ़ गई है। उन्हें आशंका है कि इसका असर उनकी पढ़ाई और करियर की योजनाओं पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है, “चार वर्ष की सीमा आधुनिक डिग्री पाठ्यक्रमों के अनुरूप नहीं है। स्नातक की डिग्री पूरी करने में औसतन 52 महीने और पीएचडी पूरी करने में लगभग 5.7 वर्ष लगते हैं। यूएससीआईएस के पास पहले से ही 1.1 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं और उनके निपटारे में करीब एक वर्ष लग रहा है।”

    विशेषज्ञों का कहना है, “छात्रों को पढ़ाई या शोध के बीच में ही अमेरिका छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे प्रयोगशालाओं को प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं का नुकसान होगा और अमेरिका अपनी नवाचार क्षमता अपने प्रतिस्पर्धी देशों के हाथों सौंप देगा।” एफआईआईडीएस के अनुसार, शोध आधारित कई पाठ्यक्रम, विशेषकर पीएचडी और चिकित्सा शिक्षा, सामान्य तौर पर चार वर्ष से अधिक समय लेते हैं। वहीं, जे-1 श्रेणी के शोधकर्ता और चिकित्सकों को अपना कार्यक्रम पूरा करने में अक्सर पांच से सात वर्ष तक लग जाते हैं।

  • नई रिपोर्ट का दावा: चेतावनियों के बावजूद जेफ्री एपस्टीन से 30 से अधिक बार मिले थे बिल गेट्स

    नई रिपोर्ट का दावा: चेतावनियों के बावजूद जेफ्री एपस्टीन से 30 से अधिक बार मिले थे बिल गेट्स


    नई दिल्ली। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और दिवंगत फाइनेंसर जेफ्री एपस्टीन के संबंधों को लेकर एक नई समीक्षा रिपोर्ट में कई अहम दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गेट्स और उनकी परोपकारी संस्था गेट्स फाउंडेशन के अधिकारियों ने वर्ष 2011 से 2014 के बीच एपस्टीन से 30 से अधिक मुलाकातें की थीं। यह भी कहा गया है कि संस्था के कुछ कर्मचारियों ने इन बैठकों से प्रतिष्ठा को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन इसके बावजूद संपर्क बना रहा।

    30 से ज्यादा बैठकों का उल्लेख
    लॉ फर्म विल्मरहेल (WilmerHale) द्वारा तैयार समीक्षा रिपोर्ट के तीन पन्नों का सारांश मंगलवार को जारी किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से 2014 के बीच हुई करीब 30 बैठकों में से कई एपस्टीन के मैनहट्टन स्थित टाउनहाउस में आयोजित हुईं, जबकि एक बैठक गेट्स फाउंडेशन के कैंपस में भी हुई थी।

    अवैध गतिविधि का कोई प्रमाण नहीं मिला
    रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि गेट्स फाउंडेशन ने एपस्टीन को कोई भुगतान किया था या किसी अवैध गतिविधि में शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच मुख्य रूप से एक संभावित ग्लोबल हेल्थ फंड बनाने पर चर्चा हुई थी, जो बाद में कभी अस्तित्व में नहीं आ सका। इसके अलावा, एपस्टीन के एक सहयोगी द्वारा संचालित इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट को दिए गए वित्तीय सहयोग पर भी बातचीत होने का उल्लेख किया गया है।

    बिल गेट्स ने माना था फैसला गलत था
    रिपोर्ट में बिल गेट्स पर एपस्टीन के यौन अपराधों में किसी तरह की संलिप्तता का आरोप नहीं लगाया गया है। गेट्स पहले भी कई बार यह कह चुके हैं कि उन्हें नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण की जानकारी नहीं थी। हाल ही में एक संसदीय समिति के समक्ष गेट्स ने स्वीकार किया था कि एपस्टीन से मुलाकात करना उनके जीवन के फैसलों में “एक बड़ी गलती” थी।

    स्टाफ की आपत्तियों के बावजूद जारी रहा संपर्क
    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फाउंडेशन के कुछ कर्मचारियों ने कानूनी जोखिम और संस्था की साख पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई थी। इसके बावजूद 2012 में एपस्टीन ने बिल गेट्स की मुलाकात इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट के प्रमुख तेर्जे रोड-लार्सन से कराई। इसके बाद फाउंडेशन ने पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के लिए इस संस्था को वित्तीय सहायता दी। बाद में विवाद बढ़ने पर 2020 में तेर्जे रोड-लार्सन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

    फाउंडेशन ने मजबूत किए निगरानी तंत्र
    यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में वॉरेन बफेट ने अपने वार्षिक दान में गेट्स फाउंडेशन को शामिल नहीं किया। इस बीच फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क सुजमैन ने कहा कि बोर्ड ने जोखिम प्रबंधन और जांच प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए नए कदमों को मंजूरी दी है। उनके अनुसार संस्था का कार्य सहयोगियों के भरोसे और पारदर्शिता पर आधारित है।

    एपस्टीन फाइल्स में भी आया था नाम
    अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक किए गए एपस्टीन फाइल्स में टेक्नोलॉजी, वित्त और राजनीति जगत की कई चर्चित हस्तियों के साथ बिल गेट्स का नाम भी दर्ज है। गौरतलब है कि जेफ्री एपस्टीन को जुलाई 2019 में नाबालिगों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले ही जेल में उसकी मौत हो गई थी, जिसे अधिकारियों ने आत्महत्या बताया था।

  • ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    नई दिल्ली । अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी और गंभीर आपराधिक मामलों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू करते हुए 10 मामलों में अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल की है। इन मामलों में पाकिस्तान में जन्मा एक व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर अलग-अलग पहचान का उपयोग कर अमेरिकी आव्रजन प्रणाली का लाभ उठाने और बाद में नागरिकता हासिल करने का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान अमेरिकी नागरिकता प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने और कथित धोखाधड़ी के मामलों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और न्याय विभाग के अनुसार पिछले एक महीने के दौरान ऐसे कई मामलों में न्यायिक कार्रवाई शुरू की गई है, जिनमें नागरिकता प्राप्त करने के दौरान गलत जानकारी देने, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने या फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों में केवल आव्रजन धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि बच्चों के यौन शोषण, स्वास्थ्य बीमा धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े आरोप भी शामिल हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सभी मामलों में अंतिम निर्णय अदालतों द्वारा ही किया जाएगा।

    कार्रवाई के केंद्र में 65 वर्षीय पाकिस्तानी मूल के मुर्तजा अली का मामला है। अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने अमेरिका में स्थायी निवास और बाद में नागरिकता प्राप्त करने के लिए अलग-अलग नामों से कई आव्रजन आवेदन दाखिल किए। आरोपों के अनुसार उन्होंने अमेरिकी नागरिकता “मोहम्मद इकबाल” नाम से हासिल की थी। बाद में फिंगरप्रिंट मिलान और जांच के दौरान विभिन्न आवेदनों को एक ही व्यक्ति से जुड़ा पाया गया।

    संघीय अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2014 में मुर्तजा अली ने अमेरिकी सरकारी एजेंसी को झूठी और भ्रामक जानकारी देने के मामले में दोष स्वीकार किया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि उन्होंने तीन अलग-अलग पहचान का उपयोग करते हुए अलग-अलग आव्रजन लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी आधार पर अब उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।

    सरकार ने टेक्सास की संघीय अदालत में दायर शिकायत में आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति ने इमिग्रेशन धोखाधड़ी, नागरिकता प्रक्रिया के दौरान झूठी गवाही देने और आवश्यक तथ्यों को छिपाने जैसे कृत्यों के माध्यम से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त की। प्रशासन का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देकर नागरिकता हासिल करता है तो वह उस नागरिकता पर अपना वैधानिक अधिकार खो देता है।

    ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि अमेरिकी नागरिकता एक विशेष कानूनी अधिकार है और इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में ईमानदारी सर्वोपरि है। प्रशासन का दावा है कि जिन मामलों में कार्रवाई की गई है, उनमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग शामिल हैं और कानून के अनुसार ऐसे मामलों में नागरिकता रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में भी इसी प्रकार के अन्य मामलों की समीक्षा जारी रहेगी।

    इन मामलों में पाकिस्तान के अलावा क्यूबा, मेक्सिको, पेरू और पोलैंड में जन्मे कुछ अन्य नागरिक भी शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतें संघीय अदालतों में दायर की गई हैं और फिलहाल ये आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अंतिम निर्णय अदालतों के आदेश के बाद ही प्रभावी होगा। प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखना और नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कथित धोखाधड़ी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

  • अमेरिका के 50 प्रतिशत नए टैरिफ से बढ़ा व्यापारिक तनाव, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बातचीत की पेशकश कर समाधान पर दिया जोर

    अमेरिका के 50 प्रतिशत नए टैरिफ से बढ़ा व्यापारिक तनाव, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बातचीत की पेशकश कर समाधान पर दिया जोर

    नई दिल्ली । अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण दौर में पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा से आयात होने वाले कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उनका देश इस विवाद का समाधान बातचीत के माध्यम से निकालना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कनाडा अपने नागरिकों और उद्योगों के हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ रचनात्मक वार्ता के लिए पूरी तरह तैयार है।

    मार्क कार्नी ने कहा कि अमेरिका की ओर से प्रस्तावित नया शुल्क हाल के वर्षों में अपनाई गई एकतरफा व्यापारिक नीतियों की श्रृंखला का हिस्सा है। उनका कहना है कि यह कदम कनाडा-अमेरिका-मेक्सिको व्यापार समझौते की भावना के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा के ऑटोमोबाइल क्षेत्र सहित कई उद्योगों पर लगाए गए शुल्क मुक्त व्यापार व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं।

    कनाडाई प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने अब तक हर कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और अपने अधिकारों के अनुरूप उठाया है। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न प्रांत, उद्योग, किसान, कारोबारी और श्रमिक इस चुनौती के समय एकजुट होकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं। सरकार का उद्देश्य घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखना और रोजगार पर किसी भी संभावित असर को कम करना है।

    कार्नी ने यह भी कहा कि कनाडा लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापारिक विवादों को सुलझाने के लिए व्यापक प्रस्ताव देता रहा है। उनका मानना है कि बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले सप्ताहों में दोनों पक्षों के बीच वार्ता तेज होगी और ऐसा समाधान निकलेगा जिससे दोनों देशों को समान लाभ मिल सके।

    उन्होंने दोहराया कि कनाडा मुक्त और निष्पक्ष व्यापार का समर्थक है। इसी सोच के तहत देश ने हाल के समय में कई नई आर्थिक और सुरक्षा साझेदारियां विकसित की हैं। कार्नी के अनुसार, व्यापारिक विवादों का सबसे अधिक असर आम उपभोक्ताओं, कारोबारियों और उद्योगों पर पड़ता है। उनका कहना है कि बढ़े हुए शुल्क से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे दोनों देशों के नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका है।

    अमेरिका ने अपने फैसले के पीछे यह तर्क दिया है कि कनाडा कुछ अमेरिकी उत्पादों, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, मादक पेय और डेयरी वस्तुओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है। इसी आधार पर अमेरिकी प्रशासन ने विशेष कानूनी प्रावधानों का उपयोग करते हुए सैकड़ों कनाडाई उत्पादों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि ऊर्जा, पोटाश, महत्वपूर्ण खनिज, मछली और पहले से अलग शुल्क व्यवस्था के तहत आने वाले कुछ उत्पादों को इस फैसले से बाहर रखा गया है।

    नई शुल्क व्यवस्था के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों, आपूर्ति श्रृंखला और विभिन्न उद्योगों पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष जल्द किसी सहमति पर नहीं पहुंचते हैं तो उत्तरी अमेरिका के व्यापारिक वातावरण में अनिश्चितता बढ़ सकती है। ऐसे समय में कनाडा की ओर से बातचीत की पेशकश इस बात का संकेत है कि वह टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तलाशने की रणनीति पर आगे बढ़ना चाहता है, जबकि अमेरिका के अगले कदम पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान

    मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिका ने लगातार 10वीं रात ईरान के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और तेज होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका उपयोग क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा सकता है। इस घटनाक्रम ने पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है।

    अमेरिकी सैन्य कमान का कहना है कि हालिया अभियान के दौरान ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइट्स, समुद्री ठिकानों तथा वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का मकसद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समुद्री मार्गों पर किसी भी संभावित खतरे को कम करना है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल माना जाता है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया कि उसकी सैन्य गतिविधियों के कारण हॉर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित नहीं हुई है। अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ समय में अमेरिकी बलों ने सैकड़ों वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित रूप से इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने में सहायता प्रदान की है। इसके साथ ही करोड़ों बैरल कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी दावा किया गया है। ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख दोहराया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका जवाब बेहद सख्त और कई गुना अधिक होगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं और किसी भी हमले का जवाब पूरी ताकत के साथ दिया जाएगा। उनके इस बयान को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने दावा किया है कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैन्य अभियान के तहत की गई, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दोनों देशों की ओर से लगातार सामने आ रहे सैन्य दावों और जवाबी कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और कच्चे तेल की कीमतों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते संघर्ष को रोकने में सफल होंगे या फिर क्षेत्र में तनाव और अधिक गंभीर रूप लेगा।

  • रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच भारतीयों की मौत से बढ़ी चिंता, विदेश मंत्रालय ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया

    रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच भारतीयों की मौत से बढ़ी चिंता, विदेश मंत्रालय ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया


    नई दिल्ली ।
    यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुए एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए मिसाइल हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत ने भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। इस घटना में जहाज पर सवार एक अन्य भारतीय गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसका अस्पताल में उपचार चल रहा है। हादसे के बाद भारत सरकार ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए वाणिज्यिक जहाजों और निर्दोष चालक दल के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, 19 जुलाई की शाम एमवी गोल्डन लियो नामक व्यापारिक जहाज ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुआ था। उस समय जहाज पर कुल 17 चालक दल के सदस्य मौजूद थे, जिनमें पांच भारतीय नागरिक भी शामिल थे। उपलब्ध जानकारी के आधार पर चार भारतीयों की मृत्यु की पुष्टि की गई है, जबकि एक भारतीय गंभीर रूप से घायल है। मंत्रालय ने मृतकों के परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है और घायल नागरिक के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है।

    घटना के बाद भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना, निर्दोष नागरिक चालक दल के सदस्यों की जान जोखिम में डालना और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता को प्रभावित करना पूरी तरह निंदनीय है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है और ऐसे हमलों से बचा जाना चाहिए। हालांकि भारत ने अपने आधिकारिक बयान में किसी देश का प्रत्यक्ष रूप से नाम नहीं लिया, लेकिन नागरिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा।

    यूक्रेन की ओर से दावा किया गया है कि गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाले इस जहाज पर क्रूज मिसाइल से हमला किया गया। जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री गलियारे से होकर आगे बढ़ रहा था और इसमें विभिन्न देशों के नागरिक चालक दल के सदस्य मौजूद थे। इस घटना में कुल मृतकों की संख्या बढ़कर 10 बताए जाने की जानकारी भी सामने आई है, जिससे इस हमले की गंभीरता और अधिक बढ़ गई है।

    विदेश मंत्रालय ने बताया कि यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास लगातार स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है। प्रभावित भारतीय नागरिकों तथा उनके परिवारों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही आवश्यक कांसुलर सहायता और अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं पर भी लगातार काम किया जा रहा है ताकि प्रभावित परिवारों को समय पर सहयोग मिल सके।

    यह घटना रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष के दौरान भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर नई चिंता लेकर आई है। समुद्री व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते खतरे का असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, खाद्यान्न परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    भारत ने एक बार फिर सभी पक्षों से संयम बरतने, अंतरराष्ट्रीय मानवीय सिद्धांतों का सम्मान करने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की है जिनसे निर्दोष नागरिकों की जान खतरे में पड़े। सरकार ने संकेत दिया है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और विदेश मंत्रालय स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। आने वाले दिनों में इस घटना से जुड़े तथ्यों और जांच के आधार पर आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर भी सभी की नजर रहेगी।

  • सह-राष्ट्रपति पत्नी के साथ मिलकर ओर्टेगा ने खत्म की चुनावी प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिंता..

    सह-राष्ट्रपति पत्नी के साथ मिलकर ओर्टेगा ने खत्म की चुनावी प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिंता..

    नई दिल्ली। मध्य अमेरिकी देश निकारागुआ के राजनीतिक घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी है। वर्ष 2007 से लगातार सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति डैनियल ओर्टेगा ने देश में भविष्य में किसी भी प्रकार के चुनाव न कराने का एकतरफा ऐलान कर दिया है। इस अप्रत्याशित घोषणा के बाद देश में अगले वर्ष कार्यकाल समाप्त होने पर होने वाली चुनावी प्रक्रिया और किसी भी तरह की राजनीतिक चुनौती की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है। इस निर्णय से ओर्टेगा और उनकी पत्नी सह-राष्ट्रपति रोसारियो मुरिलो का शासन पर एकछत्र नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों में भारी चिंता व्याप्त है।

    सैंडिनिस्टा क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक समारोह के दौरान दो महीने बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आते हुए ओर्टेगा ने अपने फैसले को स्पष्ट किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि अब देश में सरकार या सत्ता पर कब्जा करने के उद्देश्य से कोई चुनाव आयोजित नहीं किए जाएंगे। उन्होंने विदेशी ताकतों और विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि पुरानी व्यवस्था के समर्थक दलों के सत्ता में लौटने के दरवाजे अब पूरी तरह से बंद हो चुके हैं। इस ऐलान के साथ ही ओर्टेगा ने देश के विपक्षी राजनीतिक दलों के अस्तित्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लगभग समाप्त कर दिया है।

    निकारागुआ का राजनीतिक परिदृश्य पिछले कई वर्षों से लगातार विवादों और मानवाधिकार उल्लंघनों के घेरे में रहा है। वर्ष 2021 में हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी ओर्टेगा प्रशासन पर प्रमुख विपक्षी नेताओं, उद्योगपतियों और आलोचकों को हिरासत में लेने के गंभीर आरोप लगे थे। इसके बाद हाल के वर्षों में किए गए संवैधानिक संशोधनों के जरिए राष्ट्रपति का कार्यकाल बढ़ाने के साथ-साथ ओर्टेगा की पत्नी को सह-राष्ट्रपति का आधिकारिक पद प्रदान किया गया था। वर्तमान में यह दंपति देश के सशस्त्र बलों, न्यायपालिका और संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण रखता है।

    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद सहित कई अंतरराष्ट्रीय निकायों ने निकारागुआ सरकार की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया है। वैश्विक संगठनों का मानना है कि देश को पूर्णतः एक दमनकारी शासन तंत्र में बदल दिया गया है, जहां नागरिक स्वतंत्रताओं और मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा है। वर्ष 2018 के भीषण सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बाद से ही निकारागुआ में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। चुनाव रद्द करने के इस ताजा ऐलान ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है, जिसकी चौतरफा आलोचना की जा रही है।

  • दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..

    दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..


    नई दिल्ली।
    सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों पाकिस्तान के कराची शहर से जुड़ा एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। इस वीडियो में बुनियादी मेडिकल किट से लैस साइकिल एंबुलेंस व्यवस्था को दिखाया गया है, जिसे लेकर इंटरनेट पर विविध प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आधुनिक दौर में जहां विश्व स्तर पर एयर एंबुलेंस और ड्रोन आधारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है, वहीं इस तरह की पहल को लेकर कई यूजर्स पाकिस्तान की वर्तमान स्वास्थ्य प्रणाली और बुनियादी ढांचे पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, इस वायरल वीडियो के पीछे का वास्तविक संदर्भ और उद्देश्य काफी अलग है।

    यह वायरल सामग्री कोई नई नीति या हालिया लॉन्च नहीं है, बल्कि मई 2025 में पाकिस्तान की आपातकालीन सेवा ‘रेस्क्यू 1122’ द्वारा शुरू की गई एक पुरानी प्रायोगिक परियोजना का हिस्सा है। कराची जैसे घने और अत्यधिक आबादी वाले महानगर में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अत्यंत संकरी गलियां हैं और अक्सर भारी ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रहती है। ऐसे इलाकों में आपात स्थिति के दौरान पारंपरिक बड़े एंबुलेंस वाहनों का समय पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी भौगोलिक और यातायात संबंधी बाधा को दूर करने के लिए इस वैकल्पिक त्वरित प्रतिक्रिया मॉडल को तैयार किया गया था।

    तकनीकी रूप से यह साइकिल केवल एक सामान्य सवारी साधन नहीं है, बल्कि इसे आपातकालीन प्राथमिक उपचार के अनुकूल विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें ऑक्सीजन मास्क, नेबुलाइजर, ब्लड शुगर जांचने के उपकरण, प्राथमिक चिकित्सा किट और अन्य जरूरी जीवनरक्षक दवाएं रखी जाती हैं। प्रशिक्षित स्वयंसेवक, जिनमें विशेष रूप से प्रशिक्षित महिला कार्यकर्ता भी शामिल हैं, भीड़भाड़ वाले मार्गों से आसानी से निकलकर मरीज तक त्वरित पहुंच बनाते हैं। इनका मुख्य कार्य मुख्य एंबुलेंस के आगमन तक मरीज को शुरुआती महत्वपूर्ण मिनटों में प्राथमिक चिकित्सा प्रदान कर स्थिति को स्थिर बनाए रखना है।

    वैश्विक स्तर पर भी देखें तो कई विकसित और विकासशील देशों के पुराने शहरों तथा सघन शहरी क्षेत्रों में साइकिल या मोटरसाइकिल आधारित प्रथम प्रतिक्रिया टीमों का उपयोग एक स्थापित मानक प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। कराची की यह व्यवस्था सामान्य एंबुलेंस सेवा का विकल्प न होकर, केवल एक सहायक आपातकालीन प्रणाली है। सोशल मीडिया पर बिना पूरे संदर्भ के शुरू हुई इस बहस के बाद अब कई विश्लेषकों का मानना है कि शहरी यातायात की जटिलताओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर जान बचाने के लिए उठाए गए व्यावहारिक कदमों को केवल व्यंग्य के दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।