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  • सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त संदेश, आतंकवाद बंद होने तक पाकिस्तान को नहीं मिलेगी कोई राहत

    सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त संदेश, आतंकवाद बंद होने तक पाकिस्तान को नहीं मिलेगी कोई राहत

    नई दिल्ली । सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर कूटनीतिक तनाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। भारत ने पाकिस्तान के हालिया आरोपों और बयानों का कड़ा जवाब देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक सिंधु जल संधि स्थगित ही रहेगी। भारत ने दोहराया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर उसका रुख पूरी तरह स्पष्ट और अडिग है।

    विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग के दौरान भारत ने पाकिस्तान के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि भारत चिनाब नदी के जल प्रवाह से जुड़े ऐसे कदम उठा रहा है जो सिंधु जल संधि के प्रावधानों के खिलाफ हैं। भारत ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि पाकिस्तान तथ्यों से परे जाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहा है।

    हाल के दिनों में पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि भारत चिनाब नदी के जल को दूसरी दिशा में मोड़ने की संभावित योजनाओं पर काम कर रहा है, जिससे सिंधु जल संधि प्रभावित हो सकती है। पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों और द्विपक्षीय समझौतों के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया। हालांकि भारत ने इन दावों को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि संधि के भविष्य को लेकर उसका निर्णय सुरक्षा परिस्थितियों और आतंकवाद से जुड़े व्यवहार पर निर्भर करेगा।

    भारत का कहना है कि सीमा पार से लगातार आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन मिलने के कारण दोनों देशों के बीच विश्वास का माहौल कमजोर हुआ है। ऐसे में सामान्य द्विपक्षीय व्यवस्थाओं को पहले की तरह जारी रखना संभव नहीं है। सरकार का मानना है कि जब तक आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई नहीं दिखाई देती, तब तक किसी भी संवेदनशील समझौते पर आगे बढ़ना कठिन होगा।

    सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच जल संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण समझौता है। यह समझौता दशकों से दोनों देशों के बीच जल बंटवारे की व्यवस्था का आधार रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में सुरक्षा संबंधी तनाव और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे ने इस समझौते को भी राजनीतिक और कूटनीतिक बहस का विषय बना दिया है।

    भारत ने यह भी संकेत दिया है कि राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा से जुड़े मामलों में वह किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। सरकार का मानना है कि आतंकवाद और सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। इसी वजह से संधि को लेकर उठाए गए कदमों को सुरक्षा परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    इस बीच भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर भी सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। दोनों देशों के बीच हालिया वार्ताओं में आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने और व्यापारिक संबंधों को नई दिशा देने पर चर्चा हुई है। अधिकारियों का कहना है कि वार्ता रचनात्मक रही है और आने वाले समय में इस दिशा में और प्रगति देखने को मिल सकती है।

    फिलहाल सिंधु जल संधि को लेकर भारत का संदेश स्पष्ट है। सरकार ने संकेत दिया है कि जब तक आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस बदलाव नहीं दिखता, तब तक इस समझौते की बहाली की संभावना सीमित रहेगी। ऐसे में आने वाले समय में भारत-पाकिस्तान संबंधों और क्षेत्रीय कूटनीति पर इस मुद्दे का प्रभाव बना रह सकता है।

  • युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल सामने आई है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को खुला पत्र लिखकर आमने-सामने मुलाकात और सीधी वार्ता का प्रस्ताव दिया है। इस पहल को युद्ध समाप्ति की दिशा में एक नए प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

    अपने विस्तृत पत्र में जेलेंस्की ने कहा कि युद्ध का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई या मध्यस्थों के जरिए नहीं निकल सकता। उनका मानना है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच सीधा संवाद ही स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा हालात में नेतृत्व स्तर पर बातचीत की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात किसी तटस्थ देश में आयोजित की जा सकती है। उनका तर्क है कि निष्पक्ष वातावरण में होने वाली बातचीत से विश्वास बहाली की प्रक्रिया को मजबूती मिल सकती है और लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को तोड़ने का अवसर मिल सकता है।

    पत्र में जेलेंस्की ने यह भी उल्लेख किया कि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकटों के कारण यूक्रेन युद्ध वैश्विक प्राथमिकताओं की सूची में पीछे जा सकता है। ऐसे में उन्होंने दोनों पक्षों से समय रहते शांति की दिशा में ठोस पहल करने की अपील की है। उनका कहना है कि संघर्ष जितना लंबा चलेगा, मानवीय और आर्थिक नुकसान उतना ही बढ़ता जाएगा।

    जेलेंस्की ने अपने पत्र में रूस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का भी संकेत दिया। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध का कोई भी पक्ष इस भ्रम में नहीं रह सकता कि केवल सैन्य ताकत के आधार पर स्थायी समाधान हासिल किया जा सकता है। उनके अनुसार संवाद और समझौता ही अंततः संघर्ष का रास्ता रोक सकते हैं।

    दूसरी ओर रूस ने इस पहल पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है। मॉस्को ने संकेत दिया है कि बातचीत के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हैं, लेकिन किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को अपने-अपने रुख में लचीलापन दिखाना होगा। रूस अब भी उन प्रमुख शर्तों पर कायम है जिन्हें वह अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा मानता है।

    युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद क्षेत्रीय नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बना हुआ है। रूस जिन क्षेत्रों को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है, उन्हें लेकर यूक्रेन कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखता। वहीं यूक्रेन का कहना है कि क्षेत्रीय रियायतें भविष्य में उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संभावित मुलाकात को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कई देशों और वैश्विक नेताओं का मानना है कि यदि दोनों राष्ट्रपति आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं तो इससे शांति प्रक्रिया को नई गति मिल सकती है। हालांकि पिछले वर्षों में कई दौर की वार्ताएं बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हुई हैं, इसलिए इस पहल की सफलता को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।

    फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास वास्तव में दोनों नेताओं को एक ही मेज पर ला पाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह रूस-यूक्रेन युद्ध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है और लंबे समय से जारी संघर्ष के समाधान की दिशा में नई उम्मीद जगा सकता है।

  • पुतिन के बाद ट्रंप का भी मोदी पर विश्वास, बोले- अच्छे दोस्त हैं पीएम, जल्द होगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील

    पुतिन के बाद ट्रंप का भी मोदी पर विश्वास, बोले- अच्छे दोस्त हैं पीएम, जल्द होगी भारत-अमेरिका ट्रेड डील

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार वार्ताओं को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर सराहना करते हुए कहा है कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता जल्द ही अंतिम रूप ले सकता है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है और समझौते को लेकर उम्मीदें मजबूत हुई हैं।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा मित्र बताया और कहा कि उनके साथ उनके व्यक्तिगत तथा कूटनीतिक संबंध बेहद अच्छे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर प्रगति हो रही है और दोनों देश जल्द ही इस दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम हासिल कर सकते हैं। ट्रंप ने यह भी कहा कि अतीत में भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे शुल्क को लेकर अमेरिका की चिंताएं रही हैं, लेकिन वर्तमान दौर में दोनों देश व्यापारिक संबंधों को नए स्तर पर ले जाने के लिए प्रयासरत हैं।

    भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से इस सप्ताह एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत पहुंचा था। दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दिनों तक विस्तृत चर्चा हुई, जिसमें बाजार पहुंच, शुल्क व्यवस्था, निवेश और विभिन्न व्यापारिक बाधाओं से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया। वार्ता के समापन के बाद दोनों पक्षों की ओर से सकारात्मक संकेत दिए गए हैं।

    इससे पहले केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि व्यापार समझौते को लेकर लगभग 99 प्रतिशत बातचीत पूरी हो चुकी है। इसी क्रम में भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने भी संकेत दिया कि अब केवल कुछ सीमित मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के अधिकारी शेष बाधाओं को दूर करने के लिए लगातार संपर्क में हैं और अगले कुछ सप्ताह के भीतर समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा दे सकता है। इससे वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में वृद्धि होने के साथ-साथ निवेश और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत और अमेरिका के बीच मजबूत व्यापारिक साझेदारी दोनों देशों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    उल्लेखनीय है कि ट्रंप का यह बयान रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin की टिप्पणी के तुरंत बाद सामने आया है। पुतिन ने भी प्रधानमंत्री Narendra Modi और भारत की प्रशंसा करते हुए कहा था कि भारत एक महान लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जो अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम है। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत जैसे बड़े और प्रभावशाली देश पर बाहरी दबाव बनाना आसान नहीं है तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।

    लगातार आ रहे इन बयानों को वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती कूटनीतिक और आर्थिक अहमियत के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। भारत जहां एक ओर प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से नई साझेदारियां विकसित कर रहा है। ऐसे में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का संभावित निष्कर्ष दोनों देशों के संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है।

  • लेबनान सैन्य अभियान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को लगाई थी कड़ी फटकार, इजरायली पीएम ने बताया आपसी पारिवारिक विवाद

    लेबनान सैन्य अभियान को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को लगाई थी कड़ी फटकार, इजरायली पीएम ने बताया आपसी पारिवारिक विवाद

    नई दिल्ली । वैश्विक कूटनीति के पटल पर अमेरिका और इजरायल के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुआ हालिया विवाद अब पूरी दुनिया के सामने आ चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एक फोन कॉल के दौरान इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को कड़ी फटकार लगाए जाने की खबरों के बाद अब इस पर यरूशलम की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस तनाव को पूरी तरह से सामान्य बताते हुए कूटनीतिक संबंधों में किसी भी तरह की दरार आने की खबरों को सिरे से खारिज कर दिया है।

    इस पूरे घटनाक्रम पर एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट को दिए साक्षात्कार में बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ अपने मतभेदों की तुलना एक पारंपरिक परिवार से की है। उन्होंने कहा कि एक परिवार के भीतर वैचारिक और रणनीतिक स्तर पर इस तरह के उतार-चढ़ाव होना बेहद स्वाभाविक है। इजरायली प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि कूटनीति में इस प्रकार के तनावों के बावजूद वाशिंगटन और यरूशलम के द्विपक्षीय संबंध हमेशा की तरह दृढ़ और अपरिवर्तित बने हुए हैं।

    शीर्ष नेताओं के बीच उपजे इस कड़े कूटनीतिक विवाद के पीछे मुख्य कारण इजरायल द्वारा लेबनान में शुरू किया गया नया सैन्य अभियान बताया जा रहा है। इजरायली रक्षा बलों द्वारा हाल ही में घोषित युद्धविराम की शर्तों को दरकिनार करते हुए बेरुत पर व्यापक हवाई हमले शुरू कर दिए गए थे। इजरायल के इस सैन्य कदम से नाराज होकर ईरान ने अमेरिका के साथ चल रही द्विपक्षीय वार्ता को बीच में ही स्थगित करने का फैसला कर लिया, जिससे कूटनीतिक समझौता पूरा होने से पहले ही खटाई में पड़ गया।

    ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता विफल होने का सीधा असर अमेरिकी राष्ट्रपति की नाराजगी के रूप में सामने आया, जिसका सामना बेंजामिन नेतन्याहू को करना पड़ा। अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारियों और कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को फोन कॉल पर इजरायली प्रधानमंत्री के प्रति बेहद आक्रामक रुख अपनाया था। दोनों नेताओं के बीच हुई यह बातचीत कूटनीतिक शिष्टाचार के स्तर पर अत्यंत तनावपूर्ण और अप्रत्याशित रही।

    वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस फोन वार्ता के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल के सैन्य फैसलों को पूरी तरह अतार्किक बताया और कहा कि इस तरह के कदमों के कारण वैश्विक स्तर पर इजरायल की छवि को भारी नुकसान पहुंच रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिया कि उनके प्रशासनिक सहयोग के बिना इजरायली नेतृत्व के लिए आंतरिक और बाहरी सुरक्षा चुनौतियां संभालना बेहद कठिन हो जाता। हालांकि बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस तीखे रुख पर थोड़ी नरमी दिखाते हुए कहा कि वह गुस्से में नहीं थे, बल्कि मध्य पूर्व की बिगड़ती परिस्थितियों को लेकर चिंतित थे।

    इस कड़े प्रहार के बाद भी इजरायली कूटनीति ने अमेरिकी प्रशासन के प्रति अपने नरम और सहयोगात्मक रवैये को बनाए रखने का प्रयास किया है। बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि दोनों देशों के नेतृत्व के बीच सुबह रणनीतिक असहमति हो सकती है, लेकिन दोपहर तक आपसी बातचीत से समाधान खोज लिया जाता है। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को इजरायल का सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ मित्र बताते हुए दावा किया कि दोनों नेता निरंतर कूटनीतिक संपर्क में हैं।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान पर उठे सवाल, इशाक डार और मार्को रुबियो की मुलाकात को लेकर नई बहस

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान पर उठे सवाल, इशाक डार और मार्को रुबियो की मुलाकात को लेकर नई बहस

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गया है। हाल के दिनों में ऐसी रिपोर्टें सामने आईं जिनमें दावा किया गया कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने अमेरिका के साथ उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी संवेदनशील जानकारियों पर चर्चा की थी। इन रिपोर्टों ने क्षेत्रीय कूटनीति और पाकिस्तान की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए स्पष्ट खंडन किया है।

    यह विवाद उस समय सामने आया जब इशाक डार ने हाल ही में वाशिंगटन का दौरा किया और अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio के साथ मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों, क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई थी। इसके बाद कुछ मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषणों में दावा किया गया कि बातचीत के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर विशेष चर्चा हुई थी।

    विवाद को और बल तब मिला जब अमेरिका की खुफिया एजेंसी के एक पूर्व विश्लेषक द्वारा यह दावा किया गया कि बैठक में ईरान की रणनीतिक तैयारियों और उसकी संभावित प्रतिक्रिया को लेकर बातचीत हुई थी। इन दावों के बाद अमेरिकी राजनीतिक हलकों में भी इस विषय को लेकर सवाल उठे। अमेरिकी संसद में भी इस मुद्दे का उल्लेख किया गया, जहां कुछ सांसदों ने अमेरिकी प्रशासन से इस संबंध में जानकारी मांगी।

    हालांकि अमेरिकी पक्ष से भी इन दावों की स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई। अमेरिकी विदेश मंत्री से जब इस विषय पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी रिपोर्ट या संदेश की जानकारी नहीं है। उनके इस बयान के बाद भी चर्चाओं का दौर जारी रहा, क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच किसी भी प्रकार की संवेदनशील जानकारी के आदान-प्रदान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इन आरोपों के बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक प्रतिक्रिया जारी करते हुए कहा कि विदेश मंत्री इशाक डार ने अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की गोपनीय या संवेदनशील परमाणु जानकारी साझा नहीं की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बैठक का उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता, द्विपक्षीय सहयोग और तनाव कम करने के प्रयासों पर विचार-विमर्श करना था। उन्होंने कहा कि मीडिया में प्रसारित दावों का वास्तविक तथ्यों से कोई संबंध नहीं है।

    इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पाकिस्तान हाल के वर्षों में स्वयं को क्षेत्रीय संवाद और मध्यस्थता की भूमिका में प्रस्तुत करने का प्रयास करता रहा है। विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के दौरान पाकिस्तान ने कई बार बातचीत और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसी संदर्भ में पाकिस्तान और ईरान के बीच भी लगातार राजनयिक संपर्क बने हुए हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान समय में पश्चिम एशिया की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में किसी भी देश के नेताओं की उच्चस्तरीय बैठकों और उनके बयानों को लेकर विभिन्न प्रकार की अटकलें लगना स्वाभाविक है। हालांकि जब तक किसी दावे की आधिकारिक पुष्टि न हो, तब तक उसे तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं माना जाता।

    फिलहाल पाकिस्तान सरकार ने अपना पक्ष स्पष्ट कर दिया है और इन आरोपों को खारिज कर दिया है। इसके बावजूद अमेरिका, ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच चल रहे कूटनीतिक प्रयासों पर दुनिया की नजर बनी हुई है। आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की परिस्थितियां और उससे जुड़े राजनयिक घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • UN सुरक्षा परिषद चुनाव में बड़ा बदलाव: पाकिस्तान की विदाई तय, पहली बार किर्गिस्तान को मिली UNSC में जगह

    UN सुरक्षा परिषद चुनाव में बड़ा बदलाव: पाकिस्तान की विदाई तय, पहली बार किर्गिस्तान को मिली UNSC में जगह

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्यों के लिए हुए चुनाव में इस बार महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े सबसे प्रभावशाली मंचों में से एक माने जाने वाले सुरक्षा परिषद में कई नए देशों की एंट्री हुई है, जबकि कुछ मौजूदा सदस्य अपने कार्यकाल की समाप्ति के साथ परिषद से बाहर हो जाएंगे। इस चुनाव का सबसे चर्चित परिणाम किर्गिस्तान की ऐतिहासिक जीत रही, जिसने पहली बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गैर-स्थायी सदस्य के रूप में जगह बनाई है।

    संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए मतदान के बाद किर्गिस्तान को दो वर्षीय कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद का सदस्य चुना गया। इसके साथ ही देश ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। सुरक्षा परिषद में उसकी मौजूदगी को मध्य एशियाई क्षेत्र के बढ़ते महत्व और वैश्विक मंच पर उसकी सक्रिय भूमिका के रूप में देखा जा रहा है।

    इस चुनाव के परिणामों के बाद पाकिस्तान का कार्यकाल समाप्त होने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। पाकिस्तान वर्तमान में सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्यों में शामिल है, लेकिन उसका कार्यकाल वर्ष 2026 के अंत में समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही परिषद में उसकी जगह नए सदस्य देश अपनी जिम्मेदारी संभालेंगे। पाकिस्तान के अलावा पनामा, डेनमार्क, ग्रीस और सोमालिया भी अपना कार्यकाल पूरा कर परिषद से बाहर हो जाएंगे।

    चुनाव प्रक्रिया के दौरान पांच सीटों के लिए सात देशों के बीच मुकाबला हुआ। संयुक्त राष्ट्र के नियमों के अनुसार किसी भी उम्मीदवार देश को जीत के लिए महासभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्य देशों के कम से कम दो-तिहाई मत प्राप्त करना आवश्यक होता है। मतदान के पहले दौर में ऑस्ट्रिया, पुर्तगाल, त्रिनिदाद एवं टोबैगो तथा जिम्बाब्वे को पर्याप्त समर्थन मिल गया और वे सीधे निर्वाचित हो गए। शेष सीट के लिए कई दौर की वोटिंग हुई, जिसके बाद किर्गिस्तान ने फिलीपींस को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की।

    नवनिर्वाचित देशों का कार्यकाल 1 जनवरी 2027 से शुरू होगा और 31 दिसंबर 2028 तक जारी रहेगा। इस दौरान ये देश वैश्विक सुरक्षा, संघर्ष समाधान, शांति स्थापना अभियानों और अंतरराष्ट्रीय संकटों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे। सुरक्षा परिषद में उनकी भूमिका न केवल क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति और स्थिरता बनाए रखने में भी योगदान देगी।

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कुल 15 सदस्य देशों से मिलकर बनी है। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन स्थायी सदस्य हैं, जिन्हें वीटो शक्ति प्राप्त है। इनके अलावा दस गैर-स्थायी सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाता है। हर वर्ष पांच सीटों पर नए सदस्यों का चयन होता है, जिससे परिषद में विभिन्न क्षेत्रों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

    सुरक्षा परिषद को संयुक्त राष्ट्र की सबसे प्रभावशाली संस्था माना जाता है। यह अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मामलों में बाध्यकारी निर्णय लेने, आर्थिक प्रतिबंध लगाने और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने की शक्ति रखती है। ऐसे में परिषद की सदस्यता किसी भी देश के लिए वैश्विक स्तर पर अपनी कूटनीतिक उपस्थिति मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर मानी जाती है। किर्गिस्तान की ऐतिहासिक जीत और नए सदस्य देशों की एंट्री को इसी संदर्भ में वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

  • बांग्लादेश की राजनीति में बढ़ा तनाव, उस्मान हादी की हत्या पर भाई का सनसनीखेज आरोप, पीएम तारिक रहमान को भी दी चेतावनी

    बांग्लादेश की राजनीति में बढ़ा तनाव, उस्मान हादी की हत्या पर भाई का सनसनीखेज आरोप, पीएम तारिक रहमान को भी दी चेतावनी

    नई दिल्ली । बांग्लादेश के चर्चित युवा राजनीतिक नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस मामले में उनके बड़े भाई उमर हादी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। उमर हादी ने दावा किया है कि उनके भाई की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कई प्रभावशाली राजनीतिक और प्रशासनिक चेहरों की भूमिका रही है।

    शरीफ उस्मान हादी वर्ष 2024 में हुए छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। उस आंदोलन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ व्यापक जनसमर्थन हासिल किया था और देश की राजनीति को नई दिशा दी थी। हादी को सरकार विरोधी राजनीति के एक मुखर युवा नेता के रूप में देखा जाता था। उन्होंने बाद में इंकलाब मंच नामक राजनीतिक संगठन का गठन किया और संसदीय चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में सक्रिय प्रचार अभियान चला रहे थे।

    दिसंबर 2025 में चुनाव प्रचार के दौरान उन पर घातक हमला हुआ था। ढाका में आयोजित एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान नकाबपोश हमलावरों ने उनके सिर में गोली मार दी थी। गंभीर रूप से घायल हादी को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन छह दिन तक जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करने के बाद उनकी मौत हो गई थी। इस घटना ने उस समय पूरे बांग्लादेश में राजनीतिक सुरक्षा और चुनावी हिंसा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

    अब इस मामले में उनके बड़े भाई उमर हादी ने सोशल मीडिया के माध्यम से कई महत्वपूर्ण दावे किए हैं। ब्रिटेन में बांग्लादेश के राजनयिक के रूप में कार्यरत उमर हादी ने फेसबुक पर साझा किए गए अपने संदेशों में कहा कि उनके भाई की हत्या एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े एक व्यक्ति ने इस हमले की योजना तैयार की थी।

    उमर हादी ने यह भी दावा किया कि पूर्व अंतरिम सरकार के कुछ प्रभावशाली सलाहकारों तथा मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े कुछ सांसद और मंत्री भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे। हालांकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत साक्ष्य साझा नहीं किया है, लेकिन उनके बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

    अपने संदेश में उन्होंने प्रधानमंत्री तारिक रहमान से निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और दोषियों को कानून के दायरे में लाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि इस हत्या में शामिल लोगों के खिलाफ समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो यह केवल एक व्यक्ति की हत्या तक सीमित मामला नहीं रहेगा, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है।

    उमर हादी ने प्रधानमंत्री को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अपराधियों को संरक्षण मिलता रहा तो भविष्य में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भी ऐसे खतरों से सुरक्षित नहीं रह पाएगा। उनके इस बयान के बाद बांग्लादेश की राजनीति में हत्या की निष्पक्ष जांच और राजनीतिक हिंसा के मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।

    फिलहाल संबंधित पक्षों की ओर से इन आरोपों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामले की निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई ही इस संवेदनशील प्रकरण से जुड़े सवालों का समाधान कर सकती है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों और सरकार की प्रतिक्रिया पर पूरे मामले की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • डेवॉन में बड़ा सैन्य हादसा: रॉयल नेवी का अत्याधुनिक हेलिकॉप्टर खेत में गिरा, तीन जवानों की जान गई; पीएम स्टार्मर ने जताया शोक

    डेवॉन में बड़ा सैन्य हादसा: रॉयल नेवी का अत्याधुनिक हेलिकॉप्टर खेत में गिरा, तीन जवानों की जान गई; पीएम स्टार्मर ने जताया शोक

    नई दिल्ली । ब्रिटेन की रॉयल नेवी को एक गंभीर सैन्य दुर्घटना का सामना करना पड़ा है। इंग्लैंड के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में स्थित डेवॉन काउंटी में सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास के दौरान रॉयल नेवी का एक Merlin Mk4 हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सवार तीन क्रू मेंबरों की मौत हो गई। घटना के बाद ब्रिटिश रक्षा प्रतिष्ठान में शोक का माहौल है और हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है।

    रॉयल नेवी की ओर से जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह दुर्घटना बुधवार तड़के उस समय हुई, जब हेलिकॉप्टर नियमित सैन्य प्रशिक्षण मिशन पर था। उड़ान के दौरान अचानक हेलिकॉप्टर नियंत्रण खो बैठा और डेवॉन क्षेत्र के एक खेत में जा गिरा। दुर्घटना के तुरंत बाद स्थानीय आपातकालीन सेवाओं, सैन्य अधिकारियों और बचाव दलों को घटनास्थल पर भेजा गया, लेकिन हेलिकॉप्टर में सवार तीनों क्रू मेंबरों को बचाया नहीं जा सका।

    रॉयल नेवी के प्रमुख जनरल ग्विन जेनकिंस ने हादसे की पुष्टि करते हुए कहा कि यह नौसेना और सशस्त्र बलों के लिए बेहद दुखद क्षण है। उन्होंने मृतक सैन्यकर्मियों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और कहा कि इस कठिन समय में पूरा रक्षा समुदाय उनके साथ खड़ा है। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए निष्पक्ष और व्यापक जांच की जाएगी।

    इस घटना पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भी दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि देश ने अपने तीन समर्पित सैन्यकर्मियों को खो दिया है, जिन्होंने राष्ट्र की सुरक्षा और सेवा के लिए अपना योगदान दिया। प्रधानमंत्री ने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार इस दुखद घड़ी में उनके साथ है।

    हालांकि दुर्घटना के पीछे की वास्तविक वजह अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है। प्रारंभिक स्तर पर तकनीकी खराबी, मौसम संबंधी परिस्थितियों अथवा अन्य परिचालन कारणों की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। रक्षा अधिकारियों ने कहा है कि जांच पूरी होने तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। विशेषज्ञों की टीम दुर्घटनास्थल से मिले मलबे, उड़ान रिकॉर्ड और तकनीकी आंकड़ों का परीक्षण कर रही है।

    Merlin Mk4 हेलिकॉप्टर को रॉयल नेवी के सबसे महत्वपूर्ण और भरोसेमंद सैन्य हेलिकॉप्टरों में गिना जाता है। यह आधुनिक तकनीक से लैस बहुउद्देशीय विमान है, जिसका उपयोग समुद्री अभियानों, सैनिकों की तैनाती, खोज एवं बचाव कार्यों तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण मिशनों में किया जाता है। हेलिकॉप्टर में चार सदस्यीय क्रू की आवश्यकता होती है और यह एक समय में 24 सैनिकों को ले जाने की क्षमता रखता है।

    विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा अभियानों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यह दुश्मन की पनडुब्बियों की निगरानी, समुद्री गश्त और रणनीतिक सैन्य अभियानों में प्रभावी रूप से इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में इस हेलिकॉप्टर का दुर्घटनाग्रस्त होना रॉयल नेवी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

    दुर्घटना के बाद पूरे क्षेत्र को सुरक्षा घेरे में ले लिया गया है और सैन्य विशेषज्ञ घटनास्थल पर जांच में जुटे हुए हैं। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने भी कहा है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद ही दुर्घटना के वास्तविक कारणों को सार्वजनिक किया जाएगा। फिलहाल पूरे देश में मृत सैन्यकर्मियों को श्रद्धांजलि दी जा रही है और उनकी सेवाओं को याद किया जा रहा है।

  • भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते

    भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते


    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बाद तुर्की एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखने वाले तुर्की ने साफ कहा है कि वह अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तुर्की का मानना है कि भारत को इस मुद्दे को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है और दोनों देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई सीमा विवाद या ऐतिहासिक दुश्मनी नहीं है, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेहतर होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

    फिदान ने कहा कि तुर्की के पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक और मित्रतापूर्ण संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के खिलाफ है। उनके अनुसार दुनिया के कई अन्य देशों के भी पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते हैं और किसी एक संबंध को लेकर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि कई देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे सहयोग के रास्ते तलाशते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तुर्की के रूस, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद संवाद और सहयोग जारी रहता है। उनका मानना है कि भारत और तुर्की को भी इसी तरह सकारात्मक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भारत में चिंता जताई जाती रही है। मीडिया रिपोर्टों में पहले यह दावा भी किया गया था कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को तकनीकी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। हालांकि इन दावों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुए सैन्य अभियान और उसके बाद दोनों देशों के बीच बढ़ी तनातनी को भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में तुर्की के बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर समय-समय पर रिश्तों में तनाव का कारण बनता रहा है।

  • भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव

    भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल (India and US Delegation) द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (Bilateral Trade talks) को अंतिम रूप देने की कोशिशों में जुटा है। इसी बीच अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (US Trade Representative- USTR) ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लागू न करने के आरोप में भारत सहित 54 देशों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उन जांच के बाद सामने आया है, जो अमेरिका ने 60 देशों के खिलाफ इस आधार पर शुरू की थीं कि वे बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रहे हैं। इस प्रस्ताव की टाइमिंग काफी अहम है क्योंकि इस वक्त नई दिल्ली में दोनों देशों के बीच व्यापार सौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस लिहाज से इसे एक झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTS) जैमीसन ग्रीर ने एक बयान में कहा, ”हमारे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों द्वारा बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने में विफल रहना अस्वीकार्य है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिसमें अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक स्तर पर असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।” उन्होंने कहा, ”हम अब इस असमानता को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसका उल्लंघन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे” यह प्रस्ताव 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों में से एक के बाद आया है।


    क्या है USTR की धारा 301?

    USTR (यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) की धारा 301 अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 का एक प्रमुख प्रावधान है। यह अमेरिका को व्यापारिक साझेदार देशों की अनुचित व्यापार नीतियों या वबां प्रचलित परंपराओं की जांच करने और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आयात शुल्क या व्यापार प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या वे उपाय अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं, या क्या वे US के व्यापार और वाणिज्यिक हितों पर कोई बेवजह बोझ तो नहीं डालते हैं।


    सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति

    अगर जाँच में यह पाया जाता है कि किसी देश ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए ऐसे तौर-तरीके अपनाए हैं, जिन्हें अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक मानता है, तो धारा-301 के प्रावधान US प्रशासन को उस मामले में सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति देता है। इन उपायों में ऊँचे टैरिफ लगाना, व्यापार पर प्रतिबंध लगाना या अन्य ऐसे उपाय शामिल हो सकते हैं जिनका उद्देश्य जाँच के दौरान सामने आई चिंताओं को दूर करना होता है।

    बंधुआ मजदूरी वाले आरोप पर भारत का क्या जवाब?
    भारत ने बंधुआ मजदूरी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए अमेरिका से इन जांचों को समाप्त करने की मांग की है। भारत का कहना है कि ऐसे मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”भारत धारा-301 कार्यवाही के मामले में अमेरिका के साथ संपर्क में है। साथ ही भारत दो फरवरी 2026 को घोषित समझौते के ढांचे और सात फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप अमेरिका के साथ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत कर रहा है।”


    सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को

    इसमें कहा गया कि धारा-232 (क्षेत्रीय) शुल्क के तहत आने वाले उत्पादों और कुछ अन्य वस्तुओं को इन प्रस्तावित शुल्कों से बाहर रखा गया है। कपड़ा एवं परिधान उत्पादों के लिए एक विशेष प्रणाली प्रस्तावित की गई है, जिसके तहत चयनित देशों से एक निश्चित मात्रा में आयात को अमेरिका में कम शुल्क दरों पर प्रवेश की अनुमति मिल सकती है। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित शुल्क अभी अंतिम नहीं हैं और हितधारक 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियां छह जुलाई 2026 तक प्रस्तुत की जा सकती हैं।” सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को होगी।

    उधऱ, ग्रीर ने कहा कि कुछ व्यापारिक साझेदारों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए शुरुआती कदम उठाए हैं। इनमें अमेरिका, मेक्सिको-कनाडा के बीच समझौते (यूएसएमसीए) और पारस्परिक व्यापार समझौतों के तहत जतायी गयी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।हालांकि, उन्होंने कहा कि ”प्रत्येक व्यापारिक साझेदार को यह सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे कि वैश्विक व्यापार बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा न दे और उसे स्थायी न बनाए।” अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने एक बयान में कहा कि भारत, चीन, जापान, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सऊदी अरब सहित 54 देशों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता दिखाई है।