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  • फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों का बड़ा ऐलान, बोले- अपने दूसरे कार्यकाल के बाद छोड़ दूंगा राजनीति

    फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों का बड़ा ऐलान, बोले- अपने दूसरे कार्यकाल के बाद छोड़ दूंगा राजनीति


    पेरिस।
    फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों (French President Emmanuel Macron) ने घोषणा की है कि वे 2027 में अपने दूसरे और अंतिम कार्यकाल के बाद राजनीति छोड़ (Leave Politics) देंगे। साइप्रस की यात्रा के दौरान निकोसिया में छात्रों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति बनने से पहले राजनीति में शामिल नहीं था और उसके बाद भी नहीं रहूंगा।” यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ महीने पहले उन्होंने अपने भविष्य को लेकर लंबी राजनीतिक संभावनाओं का संकेत दिया था। जुलाई 2025 में पेरिस में अपनी पार्टी के युवा विंग की 10वीं वर्षगांठ पर उन्होंने कहा था कि मुझे दो साल, पांच साल और दस साल बाद भी आपकी जरूरत पड़ेगी। अब यह स्पष्ट है कि मैक्रों फ्रांस की राजनीति में कोई नई भूमिका नहीं निभाएंगे।

    मैक्रों 2017 में मात्र 39 वर्ष की आयु में फ्रांस के राष्ट्रपति बने थे, जो 1958 में पांचवीं गणराज्य की स्थापना के बाद सबसे युवा राष्ट्रपति थे। 2022 में वे दोबारा चुने गए, लेकिन फ्रांसीसी संविधान के अनुसार तीसरा लगातार कार्यकाल नहीं मिल सकता। राष्ट्रपति बनने से पहले वे 2014 से 2016 तक फ्रांसुआ ओलांद की सरकार में अर्थव्यवस्था मंत्री रह चुके थे। साइप्रस में उन्होंने अपने शेष कार्यकाल की चुनौतियों पर भी चर्चा की और कहा कि 9 वर्ष बाद अच्छे कार्यों को बनाए रखना और गलतियों को सुधारना सबसे कठिन काम है।

    कैसा रहा अब तक का राजनीतिक सफर
    इमैनुएल मैक्रों ने अपने भविष्य की कोई योजना नहीं बताई, लेकिन स्पष्ट कर दिया कि अब राजनीति से दूर रहेंगे। मैक्रों के कार्यकाल में सबसे प्रमुख सुधार पेंशन सुधार था, जिसमें रिटायरमेंट की आयु 62 से बढ़ाकर 64 वर्ष कर दी गई। इस फैसले के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और ट्रेड यूनियनों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनके दूसरे कार्यकाल में संसद भी बंटी हुई रही। 2022 के संसदीय चुनावों में उनकी पार्टी का बहुमत चला गया, जिससे बड़े सुधारों को पास करना मुश्किल हो गया।

    जून 2024 में यूरोपीय संसद चुनावों में दक्षिणपंथी नेशनल रैली की मजबूत प्रदर्शन के बाद मैक्रों ने संसद भंग कर स्नैप चुनाव कराए। इस फैसले की उनकी अपनी पार्टी में भी आलोचना हुई और इससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। 2025 के नए साल के संबोधन में उन्होंने खुद स्वीकार किया कि यह कदम फ्रांसीसी लोगों के लिए समाधान लाने के बजाय अस्थिरता का कारण बना। मैक्रों का यह फैसला फ्रांस की राजनीति में एक नई शुरुआत का संकेत देता है। 2027 के चुनाव के बाद नया राष्ट्रपति चुना जाएगा और मैक्रों सक्रिय राजनीति से दूर होकर शायद निजी जीवन या अन्य क्षेत्रों में काम करेंगे।

  • जापान में भीषण जंगल आग 1200 हेक्टेयर राख में तब्दील हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट

    जापान में भीषण जंगल आग 1200 हेक्टेयर राख में तब्दील हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट


    नई दिल्ली । जापान के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र इवाते में लगी भीषण जंगल आग लगातार भयावह रूप लेती जा रही है और इस पर काबू पाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आग ने अब तक लगभग 1200 हेक्टेयर क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है जिससे जंगल पूरी तरह से राख में तब्दील हो चुके हैं।

    यह आग बुधवार को ओत्सुची टाउन के पहाड़ी इलाके में शुरू हुई थी और देखते ही देखते तेजी से फैल गई। आग की तीव्रता इतनी अधिक थी कि आसपास के रिहायशी इलाकों तक पहुंच गई और आठ इमारतें पूरी तरह जलकर नष्ट हो गईं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए लगभग 2600 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के आदेश जारी किए हैं। यह संख्या ओत्सुची टाउन की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है।

    आग बुझाने के लिए बड़े स्तर पर राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है। इवाते प्रीफेक्चरल सरकार के साथ सेल्फ डिफेंस फोर्सेज के हेलीकॉप्टरों को भी पानी छिड़कने के काम में लगाया गया है। इसके अलावा दमकल विभाग की कई टीमें लगातार मौके पर तैनात हैं और आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रही हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए होक्काइडो यामागाटा फुकुशिमा तोचिगी और निगाटा जैसे अन्य क्षेत्रों से भी अतिरिक्त मदद मंगाई गई है।

    इस बीच जापान में हाल ही में आए भूकंप ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। सोमवार को उत्तर-पूर्वी जापान में 7.7 तीव्रता का भूकंप आया था जिसके बाद जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने इवाते समेत सात क्षेत्रों की 182 नगरपालिकाओं के लिए एक सप्ताह का विशेष भूकंप अलर्ट जारी किया है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि राहत कार्यों के दौरान भूकंप के संभावित खतरों को देखते हुए अत्यधिक सावधानी बरती जाए।

    जापान में जंगलों की आग लगने के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण माने जाते हैं। यहां सर्दियों के अंत और वसंत की शुरुआत में मौसम अत्यधिक शुष्क हो जाता है जिससे पेड़ पौधे सूख जाते हैं और आग लगने की संभावना बढ़ जाती है। नमी की कमी आग को तेजी से फैलने में मदद करती है।

    इसके अलावा जापान के घने जंगलों में मुख्य रूप से देवदार और चीड़ जैसे शंकुधारी पेड़ पाए जाते हैं जिनमें मौजूद रेजिन अत्यधिक ज्वलनशील होता है। यही कारण है कि एक बार आग लगने के बाद यह तेजी से पूरे जंगल में फैल जाती है। घनी वनस्पति भी आग के फैलाव को और तेज कर देती है।

    मानवीय लापरवाही भी ऐसी घटनाओं की एक बड़ी वजह मानी जाती है। बिना निगरानी के कैंपफायर फेंकी गई सिगरेट या कृषि कार्यों के दौरान उठी चिंगारी भी जंगलों में आग का कारण बन सकती है। जापान में आबादी का बड़ा हिस्सा जंगलों के करीब रहता है जिससे इंसानी गतिविधियों और प्राकृतिक वातावरण के बीच संपर्क बढ़ता है और जोखिम भी अधिक हो जाता है।

    फिलहाल जापानी प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमें आग पर काबू पाने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं लेकिन तेज हवाओं और सूखे मौसम के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे सुरक्षित स्थानों पर रहें और राहत कार्यों में सहयोग करें।

  • यूएन में आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी भूमिका की सराहना भारत-यूएन सहयोग पर हुई अहम चर्चा

    यूएन में आतंकवाद के खिलाफ भारत की बड़ी भूमिका की सराहना भारत-यूएन सहयोग पर हुई अहम चर्चा


    नई दिल्ली । न्यूयॉर्क में भारत की कूटनीतिक सक्रियता एक बार फिर चर्चा में रही जब विदेश सचिव पश्चिम सिबी जॉर्ज ने संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अधिकारियों के साथ महत्वपूर्ण बैठकें कीं। इन बैठकों में आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग को मजबूत करने भारत की भूमिका और संयुक्त राष्ट्र के साथ साझेदारी पर विस्तार से चर्चा की गई।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार सिबी जॉर्ज ने संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद विरोधी कार्यालय यूएनओसीटी के कार्यवाहक अवर महासचिव एलेक्जेंडर जौएव से मुलाकात की। इस दौरान दोनों पक्षों ने आतंकवाद के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने पर विचार साझा किए। बैठक का मुख्य फोकस वैश्विक स्तर पर आतंकवाद विरोधी रणनीतियों को मजबूत करना और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना रहा।

    यूएनओसीटी के अधिकारी जौएव ने इस अवसर पर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक प्रयासों में भारत के लंबे समय से चले आ रहे योगदान की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से भारत द्वारा यूएनओसीटी और विभिन्न क्षमता निर्माण पहलों को दिए जा रहे समर्थन की प्रशंसा की। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और विश्वसनीयता को दर्शाता है।

    दोनों पक्षों ने आगामी काउंटर टेररिज्म वीक की तैयारियों पर भी चर्चा की जो 26 जून से 2 जुलाई 2026 तक आयोजित किया जाएगा। इस आयोजन को लेकर सहयोग और समन्वय को और मजबूत करने पर सहमति बनी ताकि वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति को प्रभावी बनाया जा सके। यूएनओसीटी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर भी इस बैठक की जानकारी साझा करते हुए भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    इसके अलावा सिबी जॉर्ज ने उरुग्वे की स्थायी प्रतिनिधि और जी 77 की अध्यक्ष लॉरा डुपुई लासेरे से भी मुलाकात की। इस बैठक में दक्षिण दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देने और विकासशील देशों की एक साझा आवाज को संयुक्त राष्ट्र में और मजबूत बनाने पर चर्चा की गई। भारत ने इस दौरान भारत यूएन विकास साझेदारी फंड के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के विकास में अपनी भूमिका को भी रेखांकित किया।

    इस पूरे दौरे के दौरान सिबी जॉर्ज ने संयुक्त राष्ट्र के कई वरिष्ठ अधिकारियों और विभिन्न देशों के राजनयिकों से मुलाकात की। उन्होंने यूएन मुख्यालय में महात्मा गांधी की प्रतिमा को श्रद्धांजलि देकर अपने कार्यक्रम की शुरुआत की जो भारत की शांति और अहिंसा की वैश्विक छवि को दर्शाता है।भारत ऐतिहासिक रूप से संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक रहा है। इस यात्रा के दौरान भी भारत ने शांति स्थापना और वैश्विक सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

    कुल मिलाकर न्यूयॉर्क में हुई यह बैठकें न केवल आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं बल्कि यह भी दर्शाती हैं कि भारत वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा के क्षेत्र में लगातार अपनी भूमिका को और प्रभावी बना रहा है।

  • फैमिली प्लानिंग पर बड़ा झटका अमेरिका की फंडिंग कटौती से लाखों महिलाओं की सेवाएं प्रभावित

    फैमिली प्लानिंग पर बड़ा झटका अमेरिका की फंडिंग कटौती से लाखों महिलाओं की सेवाएं प्रभावित


    वाशिंगटन । वाशिंगटन से आई एक बड़ी खबर ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी है। अमेरिका ने वर्ष 2025 और 2026 के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी फंडिंग में भारी कटौती की है जिसका सीधा असर दुनिया के कई देशों में महिलाओं की स्वास्थ्य सेवाओं पर देखने को मिल रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी यानी यूएसएआईडी द्वारा 5300 से अधिक अनुदानों और अनुबंधों को समाप्त कर दिया गया है जिससे वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।

    अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस कटौती का सबसे बड़ा प्रभाव फैमिली प्लानिंग और रिप्रोडक्टिव हेल्थ सेवाओं पर पड़ा है। दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में एचआईवी संबंधित सेवाओं की फंडिंग में भी भारी कमी दर्ज की गई है जिससे वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित हुई है।

    सीएनएन की रिपोर्ट में दक्षिण अफ्रीका की एक नर्स केफिन ओजुंगा के हवाले से बताया गया है कि अमेरिकी सहायता में कटौती के बाद महिलाओं के लिए हालात काफी कठिन हो गए हैं। पहले मोबाइल क्लीनिक के जरिए मुफ्त गर्भनिरोधक सेवाएं मातृत्व जांच और अन्य स्वास्थ्य सुविधाएं आसानी से उपलब्ध थीं लेकिन अब फंडिंग बंद होने से ये सेवाएं बाधित हो गई हैं।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई देशों में हेल्थकेयर वर्कर्स की नौकरियां समाप्त हो गई हैं और बर्थ कंट्रोल से जुड़ी दवाओं की भारी कमी हो गई है। इसके साथ ही सप्लाई चेन में लगातार आ रही दिक्कतों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के पास स्वास्थ्य सेवाओं के बहुत सीमित विकल्प बचे हैं।

    इंटरनेशनल प्लांड पेरेंटहुड फेडरेशन के अनुसार इस फंडिंग कटौती के चलते दुनिया भर में लगभग 1400 मेडिकल क्लिनिक बंद हो चुके हैं। इसके कारण अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 में लगभग 9 मिलियन लोगों को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहना पड़ सकता है जो एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट की ओर संकेत करता है।

    अमेरिकी सरकार की ओर से प्रस्तावित नए बजट में भी स्वास्थ्य क्षेत्र में और कटौती की बात कही गई है जिससे आने वाले वर्षों में स्थिति और बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। प्रस्ताव के अनुसार रिप्रोडक्टिव हेल्थ प्रोग्राम्स पर और अधिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं और फंडिंग में अरबों डॉलर की कमी संभव है।

    हालांकि यह बजट कांग्रेस की मंजूरी पर निर्भर करता है लेकिन यह स्पष्ट है कि अमेरिकी प्रशासन की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है जिसका असर वैश्विक स्वास्थ्य योजनाओं पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कटौती से विकासशील देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और भी कमजोर हो सकती है और महिलाओं की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।

    कुल मिलाकर अमेरिका की इस नीति बदलाव ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था को नई चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है और आने वाले समय में इसके व्यापक सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

  • भारत-पाक तनाव पर बयान: क्या दोबारा Balakot Airstrike जैसा कदम संभव? पूर्व अमेरिकी राजदूत ने जताई चिंता

    भारत-पाक तनाव पर बयान: क्या दोबारा Balakot Airstrike जैसा कदम संभव? पूर्व अमेरिकी राजदूत ने जताई चिंता


    नई दिल्ली । भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत Kenneth Juster ने वैश्विक कूटनीति को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। Hudson Institute में आयोजित ‘द न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस’ में बोलते हुए उन्होंने कहा कि United States और Pakistan के बीच बढ़ती नजदीकियां भविष्य में भारत के रणनीतिक फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। खासतौर पर, सीमा पार आतंकवाद के मामलों में भारत की प्रतिक्रिया पहले जैसी आक्रामक नहीं रह सकती।

    पाकिस्तान-अमेरिका रिश्तों में नई गर्माहट, भारत के लिए संकेत

    जस्टर ने अपने संबोधन में कहा कि Donald Trump प्रशासन के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने में सफलता पाई है। हालात ऐसे बने हैं कि पाकिस्तान अब अमेरिका और Iran के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने की स्थिति में भी आ गया है।

    यह बदलाव केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। जस्टर के मुताबिक, यह भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है क्योंकि इससे दक्षिण एशिया की शक्ति-संतुलन की दिशा बदल सकती है।

    आतंकवाद के खिलाफ भारत की ‘कड़ी प्रतिक्रिया’ पर सवाल

    पूर्व राजदूत ने खास तौर पर भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में कोई बड़ा आतंकी हमला होता है, तो भारत को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ सकता है कि क्या उसे अमेरिका का वही समर्थन मिलेगा, जैसा पहले मिला था।

    उन्होंने Pulwama attack और उसके जवाब में हुई Balakot airstrike को उदाहरण के तौर पर याद किया। जस्टर के मुताबिक, उस समय भारत को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला था, लेकिन बदलते समीकरणों में भविष्य की स्थिति अलग हो सकती है।

    रणनीतिक संतुलन की चुनौती: भारत के सामने नई कूटनीतिक परीक्षा

    जस्टर का मानना है कि अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों की मजबूती भारत के लिए एक ‘डिप्लोमैटिक टेस्ट’ बन सकती है। भारत को अब अपने फैसले केवल सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लेने होंगे।

    हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि India और अमेरिका के संबंध अभी भी मजबूत हैं और दोनों देशों के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं।

    भारत-अमेरिका साझेदारी पर भरोसा, भविष्य को लेकर उम्मीद

    करीब 26 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए जस्टर ने कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्ते समय के साथ और मजबूत हो सकते हैं। दोनों देशों को पारस्परिक हितों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए, ताकि रणनीतिक साझेदारी और गहरी हो सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि 21वीं सदी में भारत का उदय एक बड़ी भू-राजनीतिक कहानी है। भारत की जनसंख्या, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और सैन्य शक्ति उसे वैश्विक मंच पर एक अहम खिलाड़ी बनाती है। ऐसे में अमेरिका के लिए भी यह जरूरी है कि वह इस उभरती ताकत के साथ सकारात्मक भूमिका निभाए।

  • भारत-वानुअतु रिश्तों को नई मजबूती मार्गेरिटा और वानुअतु विदेश मंत्री की अहम मुलाकात

    भारत-वानुअतु रिश्तों को नई मजबूती मार्गेरिटा और वानुअतु विदेश मंत्री की अहम मुलाकात


    नई दिल्ली ।
    प्रशांत क्षेत्र में भारत की कूटनीतिक सक्रियता को नई गति देते हुए पबित्रा मार्गेरिटा ने पोर्ट विला में जेवियर इमैनुएल हैरी से महत्वपूर्ण बैठक की जिसमें दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को और मजबूत बनाने पर विस्तृत चर्चा हुई इस दौरान भारत ने वानुअतु के विकास में एक भरोसेमंद साझेदार बने रहने की अपनी बढ़ती दोहराई

    बैठक के बाद मार्गेरिटा ने सोशल पर साझा संदेश में कहा कि भारत और वानुअतु के संबंध आपसी विश्वास और साझा मूल्यों पर आधारित हैं और दोनों देशों के बीच साझेदारी लगातार मजबूत हो रही है उन्होंने कहा कि विशेष रूप से स्वास्थ्य क्षमता निर्माण और क्लाइमेट रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर सकारात्मक बातचीत हुई

    इस बैठक में बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग को भी अहम विषय के रूप में उठाया गया जहां दोनों पक्षों ने वैश्विक मुद्दों पर मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया भारत ने स्पष्ट किया कि वह वानुअतु के विकासात्मक प्रयासों में सतत सहयोगी बना रहेगा

    अपने दौरे के दौरान मार्गेरिटा ने वानुअतु में स्थापित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का भी दौरा किया यह संस्थान भारत के सहयोग से विकसित किया गया है जिसका मकसद लोकल युवाओं में डिजिटल स्किल को बढ़ावा देना और टेक्निकल कैपेसिटी को मजबूत करना है उन्होंने इसे भारत वानुअतु मित्रता का एक मजबूत सिंबल बताया

    मार्गेरिटा का यह दौरा उनके टर्म का पहला ऑफिशियल वानुअतु दौरा है जहां उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को और गहराई करने की उम्मीद जताई उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक मित्रता और सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए यह दौरा महत्वपूर्ण साबित होगा यह यात्रा 22 से 25 अप्रैल तक वानुअतु और तुवालु के ऑफिशियल दौरे का हिस्सा है जिसमें वह दोनों देशों के टॉप लीडरशिप और सीनियर अधिकारियों के साथ मीटिंग कर रही हैं

    विदेश मंत्रालय के अनुसार यह पहल पैसिफिक आइलैंड्स देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंधों और विकास सहयोग की नीति को दिखाता है यह प्रयास फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन के तहत आगे बढ़ रहा है जो भारत और पैसिफिक आइलैंड्स देशों के बीच सहयोग को नई दिशा देने का प्रमुख मंच बन चुका है

    इस पूरी पहल से साफ है कि भारत न केवल अपने पड़ोसी क्षेत्रों बल्कि दूरस्थ द्वीपीय देशों के साथ भी संतुलित और सतत भागीदारी को प्राथमिकता दे रहा है जो ग्लोबल कॉन्टिनेंटलिज्म में उसकी एक्टिव रोल को बरकरार है

  • अफ्रीका के बिना विकास अधूरा जयशंकर का बड़ा बयान, इंडिया-अफ्रीका समिट की तैयारी तेज

    अफ्रीका के बिना विकास अधूरा जयशंकर का बड़ा बयान, इंडिया-अफ्रीका समिट की तैयारी तेज


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में भारत और अफ्रीकी देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है जहां विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने 23 अप्रैल 2026 को चौथे इंडिया अफ्रीका फोरम समिट का लोगो थीम और आधिकारिक वेबसाइट लॉन्च की यह समिट 31 मई 2026 को नई दिल्ली में आयोजित की जाएगी जिसमें पूरे अफ्रीकी महाद्वीप के नेता अफ्रीकन यूनियन कमीशन और विभिन्न क्षेत्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे

    इस आयोजन का उद्देश्य भारत और अफ्रीका के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को और गहरा करना और विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना है विदेश मंत्रालय के अनुसार यह समिट आईए स्पिरिट इंडिया अफ्रीका स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप फॉर इनोवेशन रेजिलिएंस एंड इनक्लूसिव ट्रांसफॉर्मेशन थीम पर आधारित होगी जो दोनों क्षेत्रों के बीच सहयोग के व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती है

    समिट की तैयारी के तहत कई महत्वपूर्ण बैठकें भी आयोजित की जाएंगी जिसमें 28 मई 2026 को वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक होगी जबकि 29 मई को भारत और अफ्रीकी देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक होगी इन बैठकों में आपसी सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी

    भारत अफ्रीका फोरम समिट को दोनों क्षेत्रों के बीच संवाद और साझेदारी का एक महत्वपूर्ण मंच माना जाता है जो समानता आपसी सम्मान और साझा विकास के सिद्धांतों पर आधारित है पिछले संस्करणों में इस मंच के माध्यम से अफ्रीकी देशों के लिए भारत की विकास सहायता और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है जिससे कई देशों को लाभ मिला है

    इस अवसर पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि अफ्रीका की स्वतंत्रता के बिना भारत की स्वतंत्रता अधूरी मानी जा सकती है और अफ्रीका के विकास के बिना भारत का विकास भी पूर्ण नहीं हो सकता उन्होंने कहा कि दोनों क्षेत्रों की प्रगति एक दूसरे से जुड़ी हुई है और वास्तविक विकास तभी संभव है जब अफ्रीका की तरक्की भी सुनिश्चित हो

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत की विकास साझेदारी अफ्रीकी देशों की प्राथमिकताओं और स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित है और डिजिटल फिनटेक तथा नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है जिससे अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं को नया आकार मिल रहा है

    जयशंकर ने सस्टेनेबल भविष्य के लिए भारत की वैश्विक पहलों का उल्लेख करते हुए इंटरनेशनल सोलर अलायंस ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर और बिग कैट अलायंस जैसे मंचों में सक्रिय भागीदारी को रेखांकित किया उन्होंने कहा कि जी20 में अफ्रीकन यूनियन को शामिल किए जाने का भारत का समर्थन वैश्विक शासन में अफ्रीका की उचित भूमिका सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अफ्रीका का संबंध केवल विकास तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक बेहतर और अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण की साझा जिम्मेदारी भी है जो भविष्य में दोनों क्षेत्रों को और करीब लाएगी

  • ट्रंप का नया प्लान: ‘दोस्त’ और ‘कमजोर सहयोगी’ देशों की बनेगी लिस्ट, क्या बदल जाएगी US की नीति?

    ट्रंप का नया प्लान: ‘दोस्त’ और ‘कमजोर सहयोगी’ देशों की बनेगी लिस्ट, क्या बदल जाएगी US की नीति?


    वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपनी सख्त विदेश नीति को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ऐसे देशों की सूची तैयार कर रहा है जिन्होंने हालिया तनाव के दौरान उसका साथ नहीं दिया। साथ ही, उन देशों की अलग लिस्ट भी बनाई जा रही है जो वॉशिंगटन के साथ मजबूती से खड़े रहे।

    क्या है पूरा मामला?

    रिपोर्ट के अनुसार, नाटो सदस्य देशों के योगदान का आकलन किया जा रहा है। इस आधार पर उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की योजना है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं है कि किन देशों को “अच्छे” और किन्हें “कमजोर” सहयोगी माना जाएगा।

    NATO प्रमुख की अहम यात्रा

    इस बीच NATO प्रमुख मार्क रुट्टे की वॉशिंगटन यात्रा प्रस्तावित है। बताया जा रहा है कि इस दौरे से पहले ही अमेरिकी अधिकारी एक रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिसमें हर देश की भूमिका और योगदान का पूरा ब्योरा शामिल होगा।

    पहले भी दिया गया था संकेत

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दिसंबर में ही इशारा दिया था कि:

    इज़रायल
    दक्षिण कोरिया
    पोलैंड
    जर्मनी
    बाल्टिक देश

    जैसे सहयोगियों को प्राथमिकता दी जाएगी। वहीं, जो देश अपेक्षा पर खरे नहीं उतरेंगे, उन्हें “परिणाम भुगतने” पड़ सकते हैं।

    कौन हो सकता है ‘फेवरेट’?

    सूत्रों के अनुसार:

    रोमानिया और पोलैंड अमेरिका की “अच्छी सूची” में हो सकते हैं
    पोलैंड नाटो में रक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में है और वहां 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं
    रोमानिया ने अपने मिहैल कोगलनीसिएनु एयर बेस का विस्तार कर अमेरिका को सैन्य उपयोग की अनुमति दी है
    क्या हो सकता है असर?

    इस योजना के तहत अमेरिका:

    “कमजोर सहयोगियों” से अपनी सेना या सैन्य अभ्यास कम कर सकता है
    हथियारों की सप्लाई घटा सकता है
    “मजबूत सहयोगियों” को ज्यादा सैन्य और रणनीतिक फायदे दे सकता है

    अगर यह योजना लागू होती है, तो यह वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। अमेरिका की “रिवार्ड और पनिशमेंट” नीति नाटो के भीतर संतुलन को प्रभावित कर सकती है और सहयोगी देशों के बीच नई प्रतिस्पर्धा भी पैदा कर सकती है।

  • DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

    DNA टेस्ट में पिता नहीं निकले तो नहीं देना होगा गुजारा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला


    अहमदाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि डीएनए जांच से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे बच्चे के पालन-पोषण के लिए गुजारा देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता—even अगर बच्चे का जन्म विवाह के दौरान ही क्यों न हुआ हो।

    क्या है मामला?

    यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सुनाया।

    अदालत महिला की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

    कोर्ट ने क्या कहा?

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि:

    डीएनए टेस्ट से यदि पितृत्व खारिज हो जाता है, तो गुजारा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता
    वैज्ञानिक साक्ष्य (DNA) को कानूनी अनुमान से अधिक महत्व मिलेगा
    संबंधित व्यक्ति ने खुद टेस्ट के लिए सहमति दी थी और रिपोर्ट पर कोई आपत्ति नहीं उठाई
    पुराने फैसलों का भी जिक्र

    अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण मामलों का हवाला दिया, जैसे:

    अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया
    इवान रतिनम बनाम मिलान जोसेफ
    नंदलाल बडवाइक बनाम लता बडवाइक

    इन मामलों में कोर्ट ने पहले भी कहा था कि डीएनए टेस्ट का आदेश बहुत सावधानी से दिया जाना चाहिए।

    हालांकि, मौजूदा केस में टेस्ट पहले ही हो चुका था और उसकी रिपोर्ट को चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए इसे निर्णायक माना गया।

    कानून बनाम विज्ञान

    अदालत ने माना कि जब वैज्ञानिक प्रमाण और कानूनी अनुमान (जैसे विवाह के दौरान जन्मे बच्चे का पिता पति माना जाना) के बीच टकराव हो, तो विज्ञान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    महिला को क्या राहत मिली?

    हालांकि महिला की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे की स्थिति का आकलन किया जाए और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराई जाए।

    पूरा मामला समझिए
    दंपति की शादी 2016 में हुई
    विवाद के बाद महिला ने बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांगा
    पति ने डीएनए टेस्ट की मांग की
    रिपोर्ट में वह बच्चे का जैविक पिता नहीं निकला
    ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने गुजारा देने से इनकार किया

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे साफ संदेश गया है कि पितृत्व से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

  • फारस की खाड़ी और होर्मुज में तेल रिसाव का संकट गहराया, उपग्रह तस्वीरों में मिले गंभीर संकेत

    फारस की खाड़ी और होर्मुज में तेल रिसाव का संकट गहराया, उपग्रह तस्वीरों में मिले गंभीर संकेत

    दुबई । अमेरिका और ईरान से जुड़े सैन्य तनाव के बाद फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में कई स्थानों पर तेल रिसाव के गंभीर संकेत सामने आए हैं। उपग्रह तस्वीरों में ईरान के केश्म द्वीप, लावान द्वीप और कुवैत तट के पास समुद्र में फैला हुआ तेल स्पष्ट रूप से देखा गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्थिति पर तुरंत नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र एक बड़े पर्यावरणीय संकट में बदल सकता है, जिससे समुद्री जीवन, तटीय आबादी और जल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

    उपग्रह निगरानी में सामने आया समुद्री प्रदूषण
    एक रिपोर्ट के अनुसार उपग्रह चित्रों ने न केवल तेल ढांचे और जहाजों पर हुए नुकसान को उजागर किया है, बल्कि फारस की खाड़ी के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर मंडरा रहे खतरे को भी सामने रखा है। कई तस्वीरों में समुद्र की सतह पर फैला तेल स्पष्ट दिखाई देता है, जो तटीय समुदायों की आजीविका और मछली पालन पर सीधा असर डाल सकता है। केश्म द्वीप के पास लगभग पांच मील तक फैले तेल के निशान दर्ज किए गए हैं।

    शिदवर द्वीप के पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट
    फारस की खाड़ी में स्थित शिदवर द्वीप को एक महत्वपूर्ण कोरल क्षेत्र माना जाता है, जहां कछुए, समुद्री पक्षी और अन्य जीव रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का तेल रिसाव यदि इन क्षेत्रों तक पहुंचता है तो यह समुद्री प्रजातियों के प्रजनन, भोजन श्रृंखला और पूरे पारिस्थितिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।

    कुवैत तट तक फैला असर
    छह अप्रैल को प्राप्त उपग्रह तस्वीरों में कुवैत के तटीय क्षेत्र के पास भी तेल फैलाव देखा गया। इसी दिन ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने खाड़ी क्षेत्र की ईंधन और पेट्रोकेमिकल सुविधाओं को निशाना बनाए जाने की बात कही थी, जिसके बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई।

    लाखों लोगों और समुद्री जीवन पर खतरा
    पर्यावरण विशेषज्ञ विम ज्वाइनेनबर्ग के अनुसार, इस तरह का तेल रिसाव लाखों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर सकता है, खासकर तटीय क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को। प्रदूषित समुद्र मछली पालन को नुकसान पहुंचा सकता है और खाद्य सुरक्षा पर असर डाल  है। समुद्री जीव जैसे कछुए, डॉल्फिन और व्हेल भी इससे गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि वे तेल के संपर्क में आ सकते हैं या उसे निगल सकते हैं। साथ ही, समुद्री जल को शुद्ध करने वाले संयंत्रों (डिसैलिनेशन प्लांट्स) पर भी खतरा मंडरा रहा है।