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  • Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग

    Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की केंद्रीय खुफिया एजेंसियों (Intelligence agencies) के ताजा आकलन में पाकिस्तान (Pakistan) स्थित आतंकी संगठनों (Terrorist organizations) की रणनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। खुफिया इनपुट के अनुसार, आतंकी संगठन अब महिलाओं की सुनियोजित तरीके से भर्ती के लिए गुप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। इन प्रशिक्षण मॉड्यूल का उद्देश्य महिलाओं को आतंकवादी नेटवर्क में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार करना है।

    ये प्रशिक्षण कार्यक्रम 2 से 4 सप्ताह तक चलते हैं और इन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा जीवन कौशल सिखाने के नाम पर आयोजित किया जाता है। हालांकि, वास्तविक मकसद महिलाओं को आतंकी संगठनों के लिए तैयार करना है। एजेंसियों के अनुसार, इन कार्यक्रमों के लिए बैच बनाए जाते हैं। कुछ चुनिंदा मदरसों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया जाता है।

    इन स्थानों पर आने वाली महिला परिजनों के जरिए भर्ती और प्रशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रचार ऐसे किया जाता है कि यह मजबूत आस्था और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए है। इसके जरिए धार्मिक प्रतिबद्धता व व्यक्तिगत विकास को प्रमुख उद्देश्य बताकर महिलाओं को आकर्षित किया जाता है।


    ड्रोन संचालन की ट्रेनिंग

    प्रशिक्षण में महिलाओं को विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा रहा है। इनमें शामिल हैं बैक-एंड लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल सपोर्ट, तकनीकी सहायता, ड्रोन संचालन, खुफिया जानकारी जुटाना, हनी-ट्रैप के जरिए लक्ष्यों को फंसाना और समझौता कराने जैसी गतिविधियां। यह व्यवस्था आतंकियों को जमीनी स्तर पर मजबूत बैक-एंड सपोर्ट उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की जा रही है।


    कई ठिकाने चिन्हित

    खुफिया एजेंसियों ने बहावलपुर, फैसलाबाद सहित आधा दर्जन से अधिक ऐसे स्थानों की पहचान की है, जहां महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये इलाके पिछले दो दशकों से विभिन्न आतंकी संगठनों के प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक केंद्र माने जाते रहे हैं।


    ऑपरेशन सिंदूर के बाद रणनीति में बदलाव

    खुफिया अधिकारियों का कहना है ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों की भर्ती रणनीति में यह बड़ा बदलाव देखा गया है। महिलाओं की पहचान उनकी क्षमता और भूमिका के आधार पर की जा रही है और उन्हें विशेष कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

  • कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कुवैत ने ईरान पर अपने महत्वपूर्ण डिसैलिनेशन और बिजली संयंत्र पर हमला करने का आरोप लगाया है। कुवैती प्रशासन का कहना है कि इस हमले से संयंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है और कुछ हिस्सों में आग भी लग गई थी। घटना के बाद राहत और मरम्मत कार्य तत्काल शुरू कर दिया गया है, जबकि सुरक्षा एजेंसियां पूरे मामले की निगरानी कर रही हैं।

    कुवैत के बिजली, पानी और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार हमले के कारण बिजली उत्पादन से जुड़ी कई इकाइयों को क्षति पहुंची है। अधिकारियों ने बताया कि आग पर समय रहते काबू पा लिया गया, जिससे बड़े स्तर पर नुकसान को रोका जा सका। फिलहाल तकनीकी विशेषज्ञ प्रभावित इकाइयों का निरीक्षण कर रहे हैं और संयंत्र को दोबारा पूरी क्षमता से संचालित करने की दिशा में कार्य जारी है।

    कुवैत के लिए डिसैलिनेशन संयंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह देश प्राकृतिक मीठे जल स्रोतों की कमी के कारण अपनी अधिकांश पेयजल जरूरतों के लिए समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर है। ऐसे में यदि इस तरह के संयंत्र लंबे समय तक प्रभावित रहते हैं तो जल आपूर्ति के साथ-साथ बिजली व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। सरकार ने कहा है कि आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी काम किया जा रहा है।

    कुवैती प्रशासन ने कहा कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आम नागरिकों के दैनिक जीवन और आवश्यक सेवाओं पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण संबंधित एजेंसियों को नुकसान का त्वरित आकलन करने और संयंत्र को जल्द से जल्द सामान्य संचालन में लाने के निर्देश दिए गए हैं।

    इस घटना के बीच पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां भी तेज बनी हुई हैं। क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई रणनीतिक ठिकानों और बुनियादी ढांचों को लेकर सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया है, जिसका असर पड़ोसी देशों पर भी दिखाई देने लगा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा और जल आपूर्ति से जुड़े प्रतिष्ठानों पर किसी भी प्रकार का हमला केवल संबंधित देश ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में कुवैत द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियों पर भी नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल इस घटना के संबंध में आधिकारिक स्तर पर आगे की जांच और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है, जबकि कुवैत सरकार ने आवश्यक सेवाओं को निर्बाध बनाए रखने के लिए सभी संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं।

  • अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    नई दिल्ली । अमेरिका और चीन के बीच एक बार फिर चुनावी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर जुबानी टकराव तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर अमेरिकी चुनावों में दखल देने और करोड़ों मतदाताओं का डेटा हासिल करने के आरोप लगाए जाने के बाद बीजिंग ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। चीन ने कहा है कि उसने कभी अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया और न ही उसकी ऐसी कोई मंशा है।

    चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अमेरिका की ओर से लगाए गए आरोप तथ्यहीन और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि चीन को बदनाम करने के उद्देश्य से इस प्रकार के बयान दिए जा रहे हैं। उनके अनुसार चीन हमेशा दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करता है और अमेरिकी चुनाव उसके लिए किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का विषय नहीं हैं।

    चीन ने अमेरिका से अपील की कि वह चुनावी राजनीति में चीन का नाम घसीटना बंद करे और दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करे। प्रवक्ता ने संकेत दिया कि यदि दोनों देश स्थिर और रचनात्मक संबंध चाहते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप की बजाय संवाद और सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बनाए रखने की कोशिशें भी जारी हैं। इसी वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का दौरा कर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए संवाद तंत्र पर सहमति जताई थी। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे की भी तैयारी चल रही है, जिसे दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन ने अमेरिकी चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने के उद्देश्य से करोड़ों मतदाताओं का डेटा अवैध रूप से हासिल किया। उनके अनुसार इस कथित डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक संबद्धता और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप ने दावा किया कि इन सूचनाओं का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और अन्य गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

    ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास चीन की कथित गतिविधियों से संबंधित जानकारी थी, लेकिन वह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि कुछ रिपोर्टों में चीन द्वारा अमेरिकी कारोबारी नेताओं और मीडिया से जुड़े लोगों को प्रभावित करने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं शीर्ष स्तर तक समय पर नहीं पहुंचाई गईं।

    हालांकि चीन ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि ऐसे दावों का कोई आधार नहीं है। बीजिंग का कहना है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और आपसी सम्मान के माध्यम से होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर पहले से ही तनाव बना हुआ है। ऐसे में चुनावी हस्तक्षेप जैसे आरोप दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

    फिलहाल दोनों देशों की ओर से अपने-अपने दावों पर कायम रहने के कारण यह विवाद कूटनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में उच्चस्तरीय बैठकों और आधिकारिक संवाद के दौरान इस मुद्दे पर दोनों पक्षों का रुख अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जाएगा।

  • तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    नई दिल्ली । बांग्लादेश द्वारा तीस्ता नदी परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ समझौता किए जाने की खबरों ने दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यह परियोजना लंबे समय से बांग्लादेश की प्राथमिक जल संसाधन योजनाओं में शामिल रही है और भारत भी पूर्व में इसमें सहयोग की इच्छा जता चुका था। अब चीन के साथ आगे बढ़ती इस साझेदारी को दोनों देशों के बदलते रणनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना के साथ सरकार-से-सरकार समझौता किया है। इसके तहत परियोजना के लिए दीर्घकालिक रियायती ऋण व्यवस्था की गई है, जिसकी पुनर्भुगतान अवधि लगभग 50 वर्ष बताई जा रही है। समझौते के बाद चीन के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक दल परियोजना क्षेत्र में प्रारंभिक सर्वेक्षण के लिए पहुंचा है।

    बताया जा रहा है कि मानसून के दौरान तीस्ता नदी के प्रवाह, तलछट और कैचमेंट क्षेत्र का अध्ययन किया जाएगा ताकि बांध, तट संरक्षण, जल प्रबंधन और अन्य बुनियादी ढांचे की विस्तृत योजना तैयार की जा सके। बांग्लादेश की प्राथमिकता नदी के अतिरिक्त बहाव के बेहतर उपयोग और कृषि के लिए जल उपलब्धता बढ़ाने पर केंद्रित बताई जा रही है।

    तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण जल संसाधन है। नदी का उद्गम भारत के सिक्किम में है और यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इसी कारण इससे जुड़ी किसी भी बड़ी परियोजना का प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे द्विपक्षीय जल सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाता है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से परियोजना क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को लेकर है। यह इलाका भारतीय सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के अपेक्षाकृत निकट माना जाता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है, इसलिए वहां किसी बाहरी देश की दीर्घकालिक तकनीकी और अवसंरचनात्मक मौजूदगी पर स्वाभाविक रूप से रणनीतिक चर्चा होती है।

    पावर चाइना चीन की प्रमुख सरकारी अवसंरचना कंपनियों में से एक है और एशिया तथा अफ्रीका में कई बड़े ऊर्जा और जल प्रबंधन परियोजनाओं में सक्रिय रही है। हालांकि कंपनी को लेकर लगाए जा रहे सैन्य संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। फिर भी भारत में कुछ रणनीतिक विश्लेषक चीन की बढ़ती आर्थिक और तकनीकी मौजूदगी को व्यापक भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं।

    इसी बीच बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने की अटकलों ने भी चर्चा को और तेज कर दिया है। हालांकि संभावित लड़ाकू विमानों की आपूर्ति या अन्य सैन्य समझौतों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले दोनों देशों के आधिकारिक बयानों और औपचारिक समझौतों का इंतजार करना जरूरी होगा।

    कुल मिलाकर तीस्ता परियोजना केवल एक जल संसाधन योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में बदलते आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों का संकेतक बनती दिखाई दे रही है। आने वाले महीनों में परियोजना के सर्वेक्षण, वित्तीय शर्तों और निर्माण प्रक्रिया से जुड़े आधिकारिक विवरण सामने आने के बाद इसके वास्तविक प्रभाव का अधिक स्पष्ट आकलन संभव हो सकेगा।

  • भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उसके बेड़े में एक और अत्याधुनिक MH-60R सीहॉक नौसैनिक हेलीकॉप्टर शामिल किया गया है। इस नई डिलीवरी के साथ भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को नई गति मिली है। आधुनिक तकनीक से लैस यह हेलीकॉप्टर समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी अभियानों और निगरानी क्षमताओं को पहले से अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

    भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इसी उद्देश्य से अमेरिका से 24 MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया गया था। इन हेलीकॉप्टरों की चरणबद्ध तरीके से आपूर्ति की जा रही है और नई खेप के शामिल होने से भारतीय नौसेना की युद्धक तैयारियों को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी।

    यह हेलीकॉप्टर अत्याधुनिक मल्टी-रोल नौसैनिक प्लेटफॉर्म के रूप में जाना जाता है। इसे विशेष रूप से पनडुब्बियों का पता लगाने, समुद्री निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान, विशेष नौसैनिक ऑपरेशन और युद्धकालीन मिशनों के लिए विकसित किया गया है। आधुनिक रडार, सोनार, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस होने के कारण यह समुद्र में लंबी दूरी तक प्रभावी निगरानी और त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम है।

    भारतीय नौसेना इन हेलीकॉप्टरों को अपने युद्धपोतों पर तैनात करेगी, जिससे समुद्र में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक मजबूत होगी। विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चुनौतियों और समुद्री गतिविधियों के बीच यह क्षमता भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आधुनिक तकनीक से लैस यह प्लेटफॉर्म समुद्री सीमाओं की निगरानी के साथ-साथ संभावित खतरों की समय रहते पहचान करने में भी सहायक होगा।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। दोनों देश रक्षा तकनीक, संयुक्त अभ्यास, सैन्य उपकरणों की आपूर्ति और रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। नवीनतम हेलीकॉप्टर की डिलीवरी को इसी व्यापक रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यह साझेदारी केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्य को भी दर्शाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, पनडुब्बियों की निगरानी और बहुआयामी नौसैनिक अभियानों के दौरान ऐसे प्लेटफॉर्म निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इससे भारतीय नौसेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता और दूरदराज समुद्री क्षेत्रों में संचालन की दक्षता भी बढ़ेगी।

    आने वाले समय में शेष हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति पूरी होने के बाद भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता में और व्यापक विस्तार होने की उम्मीद है। अत्याधुनिक तकनीक से लैस इन प्लेटफॉर्मों के शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को भी नई मजबूती मिलेगी। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की दीर्घकालिक समुद्री सुरक्षा रणनीति और आधुनिक सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।

  • सुंदरबन के दलदली इलाकों में पहली बार फेंसिंग की तैयारी, घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बीएसएफ ने बनाया 90 किलोमीटर का मास्टर प्लान

    सुंदरबन के दलदली इलाकों में पहली बार फेंसिंग की तैयारी, घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बीएसएफ ने बनाया 90 किलोमीटर का मास्टर प्लान

    नई दिल्ली । भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ, अवैध घुसपैठ और सीमा पार तस्करी की गतिविधियों पर पूरी तरह से लगाम लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कदम उठाया है। राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में पहली बार लगभग 90 किलोमीटर लंबी फेंसिंग (बाड़बंदी) करने की विस्तृत रूपरेखा तैयार कर ली गई है। घने जंगलों, ज्वारीय दलदलों, मिट्टी के तटबंधों और दर्जनों नदी-नालों के नेटवर्क से घिरा यह इलाका भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहां अब तक कोई स्थायी बाड़ नहीं थी।

    केंद्रीय गृह मंत्रालय के सीधे निर्देशों और प्राथमिकताओं के बाद बीएसएफ ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए प्रारंभिक व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) रिपोर्ट तैयार करने और तकनीकी व्यवहार्यता का गहराई से अध्ययन करने का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों में सुंदरबन के इस विस्तृत और दुर्गम नदी क्षेत्र में फेंसिंग न होने के कारण सुरक्षा बल मुख्य रूप से फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट (एफबीओपी) यानी तैरती हुई सीमा चौकियों और विशेष नौकाओं के माध्यम से गश्त करते हैं। नए मास्टर प्लान के तहत अब समुद्री गश्त को और अधिक आक्रामक बनाने के साथ-साथ पूरे इलाके को आधुनिक तकनीकी निगरानी व्यवस्था से लैस किया जाएगा।

    इस वृहद सुरक्षा योजना को गति देने के उद्देश्य से बीएसएफ के महानिदेशक प्रवीण कुमार ने स्वयं सुंदरबन के संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों का चार दिवसीय दौरा कर सुरक्षा तैयारियों की जमीनी समीक्षा की है। इस उच्च स्तरीय दौरे में सीमा सुरक्षा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के साथ-साथ प्रस्तावित फेंसिंग कार्य को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा करने पर रणनीतिक चर्चा की गई। बैठक में नदी क्षेत्रों में रात्रि गश्त बढ़ाने, अतिरिक्त सर्चलाइटें लगाने और अत्याधुनिक नाइट-विज़न सीसीटीवी कैमरे स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। इस सीमा रेखा का लगभग 71 किलोमीटर लंबा हिस्सा सुंदरबन वन्यजीव अभयारण्य के संरक्षित क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसके कारण निर्माण कार्य के दौरान पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आए बदलावों के बाद इस लंबित परियोजना की गति में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। पहले संयुक्त भूमि सर्वेक्षण के लिए आवश्यक अनुमतियां न मिलने के कारण यह परियोजना काफी समय तक अधर में लटकी हुई थी। हालांकि सुंदरबन को घुसपैठ का पारंपरिक या मुख्य मार्ग नहीं माना जाता है, लेकिन इसकी भौगोलिक बनावट का फायदा उठाकर तस्कर और अंतरराष्ट्रीय अपराधी अक्सर इसका उपयोग प्रतिबंधित सामानों की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियों के लिए करते रहे हैं, जिसे रोकना बेहद अनिवार्य हो गया था।

    इस बीच, फेंसिंग योजना को लेकर स्थानीय आबादी और व्यापारिक संगठनों के बीच भूमि अधिग्रहण को लेकर कुछ चिंताएं और आशंकाएं भी उभर कर सामने आई हैं। सीमा से सटे क्षेत्रों में रह रहे कई स्थानीय परिवारों और वहां पर्यटन व्यवसाय से जुड़े मध्यम आकार के होटल एवं लॉज संचालकों ने संभावित विस्थापन को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों ने जनसंवाद के माध्यम से उन्हें आश्वस्त किया है कि सभी प्रभावित लोगों को नियमों के अनुसार उचित मुआवजा और बेहतर पुनर्वास की व्यवस्था प्रदान की जाएगी। सीमा सुरक्षा बल और राज्य के सिंचाई विभाग की एक संयुक्त टीम जल्द ही इस पूरी भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कार्य शुरू करने जा रही है।

  • UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    नई दिल्‍ली। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं। अब भारत की इस दावेदारी पर चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। खास बात है कि चीन वीटो अधिकार प्राप्त सदस्य है।

    UNSC यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के दावे पर अब चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। पड़ोसी मुल्क ने कहा है कि वह इस तरह की खबरों पर गौर कर रहा है। खास बात है कि पहले ही कई बड़े देश भारत का साथ दे रहे हैं।

    चीन की तरफ से यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं।
    क्या बोला चीन

    चीन ने गुरुवार को कहा कि उसने 2028-29 की अवधि के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता हासिल करने की भारत की दावेदारी से जुड़ी खबरों पर गौर किया है। सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने की भारत की घोषणा पर चीन के रुख के बारे में पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘चीन ने इससे जुड़ी खबरों पर गौर किया है।’
    क्या बोले जयशंकर

    विदेश मंत्री जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के आधिकारिक प्रचार अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘शांति अर्थात मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के जरिये समग्र प्रगति सुनिश्चित करने’ पर आधारित है।

    उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत के संभावित कार्यकाल की प्राथमिकताओं का भी विस्तार से उल्लेख किया था।
    चीन नहीं करता भारत का समर्थन

    चीन सुरक्षा परिषद के वीटो अधिकार प्राप्त पांच स्थायी सदस्यों में शामिल है लेकिन उसने अभी तक भारत की दावेदारी का समर्थन नहीं किया है। इसके विपरीत, पांच स्थायी सदस्यों में शामिल अन्य चार देश-अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस-सुधार के बाद गठित होने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का स्पष्ट रूप से समर्थन कर चुके हैं।
    किस देश से है मुकाबला

    सुरक्षा परिषद में 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होंगे। इसमें एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।

    भारत पिछली बार 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना था।

    यह संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय में भारत का आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है।
    सुरक्षा परिषद में नहीं हुआ खास सुधार

    भारत का कहना है कि UNSC का 80 साल पुराना ढांचा मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। और इसी वजह से यह वैश्विक संस्था दुनिया भर में जारी संघर्षों से हो रही मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी साबित नहीं हुई।

    भारत ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचे में भी बदलाव होना चाहिए।

    स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने मंगलवार को कहा, ‘हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों में सुरक्षा परिषद प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाई है।’

  • SpaceX: लॉन्चिंग से 1 सेकंड पहले थमा मस्क की कंपनी का मिशन… पैड पर रुकी स्टारशिप की उड़ान

    SpaceX: लॉन्चिंग से 1 सेकंड पहले थमा मस्क की कंपनी का मिशन… पैड पर रुकी स्टारशिप की उड़ान


    वाशिंगटन।
    एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) की मेगा रॉकेट स्टारशिप (Mega Rocket Starship) गुरुवार को अपने 13वें परीक्षण मिशन के लिए उड़ान भरने से महज एक सेकंड पहले ही रुक गई। लॉन्च से ठीक पहले कुछ इंजनों के सही तरीके से चालू न होने के कारण सिस्टम ने स्वतः लॉन्च को निरस्त कर दिया। इसके बाद रॉकेट को लॉन्च पैड पर ही सुरक्षित रखा गया और ईंधन निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।


    आखिर लॉन्च से ठीक पहले क्या गड़बड़ी हुई?

    स्पेसएक्स ने बताया कि अब यह पता लगाया जाएगा कि आखिर तकनीकी खराबी कहां हुई, उसके बाद ही अगली लॉन्च की तारीख तय की जाएगी। 407 फीट (124 मीटर) ऊंची स्टारशिप 33 मुख्य इंजनों से लैस दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह इसका 13वां परीक्षण मिशन था।


    इंजन स्टार्ट होने के बाद अचानक क्यों रुक गया मिशन?

    स्पेसएक्स के लाइव वेबकास्ट में देखा गया कि निर्धारित उड़ान से तीन सेकंड पहले इंजनों के प्रज्वलन (इग्निशन) की प्रक्रिया शुरू हुई। लॉन्च पैड के ऊपर उड़ रहे ड्रोन कैमरे में यह दृश्य साफ दिखाई दिया। हालांकि, जिन इंजनों ने काम करना शुरू किया था, वे अचानक बंद हो गए और रॉकेट लॉन्च पैड से बंधा ही रह गया। इसके तुरंत बाद लॉन्च टीम ने रॉकेट से ईंधन निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी।


    एलन मस्क ने अगली लॉन्च कोशिश को लेकर क्या कहा?

    एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि उम्मीद है कि अगली लॉन्च कोशिश कुछ ही दिनों में की जाएगी।


    मिशन में क्या-क्या भेजा जाना था?

    लॉन्च से पहले तक सब कुछ स्पेसएक्स के पक्ष में दिखाई दे रहा था। मौसम भी पूरी तरह अनुकूल था, लेकिन आंशिक इंजन इग्निशन के बाद मिशन रोकना पड़ा। इस उड़ान के दौरान स्पेसएक्स के 20 नए और सबसे उन्नत स्टारलिंक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़े जाने थे। लगभग एक घंटे की इस उड़ान में इन उपग्रहों को पहले से कक्षा में मौजूद स्टारलिंक उपग्रहों से संपर्क स्थापित करने के साथ-साथ स्टारशिप की हीट शील्ड की तस्वीरें भी लेनी थीं। इस मिशन में न तो पहले चरण के बूस्टर और न ही अंतरिक्ष यान को वापस लाने की योजना थी। दोनों को अंततः समुद्र में गिरना था।


    नासा के लिए स्टारशिप क्यों है बेहद अहम?

    नासा आने वाले वर्षों में अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारने के लिए स्टारशिप पर भरोसा कर रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने स्पेसएक्स और जेफ बेजोस की कंपनी ब्लू ओरिजिन को ऐसे लूनर लैंडर विकसित करने और उड़ाने का जिम्मा दिया है, जिनकी मदद से आधी सदी से अधिक समय बाद इंसानों की चंद्रमा पर वापसी कराई जाएगी।


    आर्टेमिस मिशन की तैयारी पर क्या पड़ेगा असर?

    दोनों कंपनियों को अगले वर्ष तक अपने-अपने लूनर लैंडर, स्टारशिप और ब्लू मून उड़ान के लिए तैयार रखने होंगे, ताकि हाल ही में घोषित आर्टेमिस-III मिशन के अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की कक्षा में अपने कैप्सूल की इन लैंडरों के साथ डॉकिंग का अभ्यास कर सकें। इसके बाद आर्टेमिस-IV मिशन, जिसकी योजना 2028 से पहले नहीं है, में इन्हीं लैंडरों में से किसी एक की मदद से दो अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतारा जाएगा।

  • भूकंप के तेज झटकों से हिली न्यूजीलैंड की धरती, 5.9 रही तीव्रता….. सुनामी का अलर्ट

    भूकंप के तेज झटकों से हिली न्यूजीलैंड की धरती, 5.9 रही तीव्रता….. सुनामी का अलर्ट


    आकलैंड।
    दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत महासागर (Southwestern Pacific Ocean) में स्थित न्यूजीलैंड (New Zealand) में गुरुवार, 16 जुलाई को) भूकंप (Earthquake) के तेज झटके महसूस किए गए हैं। अधिकारियों ने बताया है कि रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.9 (Earthquake magnitude 5.9) थी। अधिकारियों के मुताबिक, गुरुवार को साउथ आइलैंड के पश्चिमी तट पर 5.9 तीव्रता के भूकंप के बाद सुनामी की चेतावनी जारी की गई है और लोगों से तुरंत ऊंचे इलाकों में जाने को कहा गया है। जानकारी के मुताबिक भूकंप का केंद्र ते अनाउ शहर से करीब 40 किलोमीटर उत्तर में था। यह इलाका फियोर्डलैंड जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल का प्रवेश द्वार माना जाता है।

    न्यूजीलैंड के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (NEMA) ने लोगों से समुद्री तट और तटीय इलाकों से दूर जाने की सलाह दी है और कहै है कि जितना जल्दी संभव हो सके सबसे नजदीकी ऊंचे स्थान पर जाकर शरण ले लें। फिलहाल, इस भूकंप से किसी तरह का जनहानि की खबर नहीं है। इस बीच, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और जर्मनी के जियोसाइंस रिसर्च सेंटर (GFZ) ने इस भूकंप की तीव्रता 5.9 दर्ज की है। दोनों एजेंसियों के अनुसार भूकंप का केंद्र 50 किलोमीटर से अधिक गहराई में था। सुनामी के इस अलर्ट का भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि वह भारतीय तट से करीब 12000 किलोमीटर की दूरी है।


    अब सुनामी अलर्ट भी कैंसिल

    रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि एजेंसी ने शुरू में भूकंप की तीव्रता 6.3 आंकी थी, जो लोकल टाइम के हिसाब से रात 9.14 बजे (0914 GMT) आया था, फिर इसे घटाकर 5.9 कर दिया गया। अब एजेंसी ने सुनामी अलर्ट भी कैंसिल कर दिया है, NEMA ने कहा कि उसे उम्मीद है कि तटीय इलाकों में “तेज़ और अजीब लहरें और किनारे पर अचानक लहरें” आएंगी। उसने कहा कि लोगों को पानी से, बीच से दूर चले जाना चाहिए, और बंदरगाहों, मरीना और नदियों से दूर रहना चाहिए।


    झटका लंबा और तेज था

    लोकल रहने वाली मेलिन पुयात, जो ते आनु के फियोर्डलैंड होटल की ड्यूटी मैनेजर हैं ने बताया कि भूकंप “थोड़ा तेज़” था और उन्हें एक मिनट तक कंपन महसूस हुआ। उन्होंने कहा, “होटल में कंपन हो रहा है, लेकिन होटल में कुछ भी हिला नहीं।” एक और स्थानीय निवासी ने लोकल आउटलेट ओटागो डेली टाइम्स को बताया कि भूकंप का झटका लंबा और तेज़ था और ट्रेन जैसा लग रहा था। उन्होंने कहा, “दीवारें ज़रूर हिल रही थीं।”

  • यूक्रेन में जेलेंस्की सरकार में बड़ा फेरबदल…. सेरगी कोरेट्स्की बने नए प्रधानमंत्री

    यूक्रेन में जेलेंस्की सरकार में बड़ा फेरबदल…. सेरगी कोरेट्स्की बने नए प्रधानमंत्री


    कीव।
    रूस (Russia) संग जारी युद्ध (War) के बीच यूक्रेन (Ukraine) में एक बार फिर बड़ा सियासी बदलाव हुआ है। राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (President Volodymyr Zelenskyy) के भरोसेमंद और ऊर्जा क्षेत्र के दिग्गज सेरगी कोरेत्स्की (48) (Sergi Koretsky) को देश का नया प्रधानमंत्री (Prime Minister) बना दिया गया है। यूक्रेन की संसद ने गुरुवार को व्यापक मतदान के बाद कोरेत्स्की को 289 वोटों से मंजूरी दे दी। यह नियुक्ति जेलेंस्की सरकार के उस बड़े फेरबदल का हिस्सा है, जिसका मकसद युद्ध के बीच ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और यूरोपीय संघ की राह को मजबूत करना है।

    बता दें कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने पिछले कुछ महीनों से सरकार में बड़े स्तर पर फेरबदल शुरू किया है। कोरेत्स्की को नामित करते हुए जेलेंस्की ने कहा था कि ऊर्जा क्षेत्र में उनके प्रदर्शन को देखते हुए वे आगामी सर्दियों में युद्ध प्रभावित देश की मदद के लिए सबसे सही विकल्प हैं। संसद में मतदान से पहले कोरेत्स्की ने सांसदों को संबोधित करते हुए अपनी प्राथमिकताओं का खुलासा किया।


    कोरेत्स्की की तीन बड़ी प्राथमिकताएं

    – यूक्रेन की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना
    – आर्थिक स्थिरता को पक्का करना
    – यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया को तेज करना


    कौन हैं कोरेत्स्की?

    ट्रेनिंग से इंजीनियर और अर्थशास्त्री सेरगी कोरेत्स्की राजनीतिक दलों से पूरी तरह दूर रहे हैं और उनके पास कोई पूर्व सरकारी अनुभव नहीं है। लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में दो दशक से ज्यादा का उनका अनुभव उन्हें इस पद के लिए खास बनाता है।


    करियर

    मई 2025 से नैफ्तोगाज कंपनी के सीईओ के रूप में कार्यरत, जहां वे देश के गैस उत्पादन, आयात और वितरण की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे पहले यूक्रेन की सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी उक्रनाफ्टा के प्रमुख रहे। शुरुआती दौर में वेस्टर्न ऑयल ग्रुप का नेतृत्व, कॉन्टिनम ग्रुप के सीईओ और देश की प्रमुख ईंधन स्टेशन चेन WOG का प्रबंधन किया। पश्चिमी शहर लुत्स्क में जन्मे कोरेत्स्की ने निजी क्षेत्र में एक सफल कॉफी चेन व्यवसाय भी शुरू किया था।


    सबसे बड़ी चुनौती

    नए प्रधानमंत्री के सामने सबसे कठिन चुनौती देश के ऊर्जा ढांचे को आगामी सर्दियों के लिए तैयार करना है। पिछले कई महीनों से रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने यूक्रेन के बिजली उत्पादन केंद्रों, सबस्टेशनों और गैस पाइपलाइनों को भारी नुकसान पहुंचाया है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सर्दियों की तैयारी को सरकार की सबसे ऊंची प्राथमिकता बताया है। कोरेत्स्की को उम्मीद है कि उनके ऊर्जा क्षेत्र के गहरे अनुभव से बिजली और गैस आपूर्ति को स्थिर रखा जा सकेगा, ताकि आम लोगों को सर्दी के मौसम में और कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।