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  • अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी

    अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी


    नई दिल्ली। अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देख रहे लाखों विदेशी छात्रों, खासकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए नई चुनौती सामने आ सकती है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने F-1 छात्र वीजा नियमों में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत अमेरिका में विदेशी छात्रों के रहने की अवधि अधिकतम चार साल तक सीमित की जा सकती है।

    यदि यह नियम लागू होता है, तो दशकों से चली आ रही ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ (Duration of Status) व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। वर्तमान व्यवस्था के तहत F-1 वीजा वाले छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम में सक्रिय हैं और वीजा की सभी शर्तों का पालन कर रहे हैं।

    चार साल से ज्यादा पढ़ाई के लिए लेनी होगी मंजूरी
    रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियम के तहत F-1 वीजा पर अमेरिका जाने वाले छात्रों को सामान्य तौर पर अधिकतम चार साल तक रहने की अनुमति मिलेगी। अगर किसी छात्र का कोर्स, रिसर्च या प्रशिक्षण चार साल से अधिक समय तक चलता है, तो उसे अपनी वैध अवधि समाप्त होने से पहले DHS से एक्सटेंशन की मंजूरी लेनी होगी। समय पर अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में छात्र की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है।

    यह बदलाव सिर्फ F-1 वीजा तक सीमित नहीं रहेगा। प्रस्तावित नियम J-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी मीडिया प्रतिनिधियों को दिए जाने वाले I वीजा पर भी निश्चित अवधि लागू कर सकता है। हालांकि, लागू होने से पहले इस नियम को अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा।

    सरकार ने बताई राष्ट्रीय सुरक्षा वजह
    ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य छात्र वीजा प्रणाली की निगरानी को मजबूत करना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को प्रभावी बनाना है। वहीं, अमेरिकी विश्वविद्यालयों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है कि नए नियमों से चार साल से अधिक अवधि वाले शैक्षणिक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    भारतीय छात्रों पर सबसे ज्यादा असर की आशंका
    इस बदलाव का प्रभाव भारतीय छात्रों पर खास तौर पर पड़ सकता है। ‘ओपन डोर्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में अमेरिका के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 3.31 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन कर रहे थे। यह संख्या अमेरिका में पढ़ने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का करीब 30 प्रतिशत है।

    भारतीय छात्रों का एक बड़ा हिस्सा पीएचडी, रिसर्च आधारित मास्टर्स, मेडिकल ट्रेनिंग, इंजीनियरिंग रिसर्च और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में दाखिला लेता है, जिनकी अवधि कई बार चार साल से ज्यादा हो जाती है। ऐसे छात्रों को अब पढ़ाई जारी रखने के लिए समय रहते DHS से अतिरिक्त समय की अनुमति लेनी पड़ सकती है।

    एक्सटेंशन में देरी से बढ़ सकती हैं कानूनी मुश्किलें
    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी छात्र का एक्सटेंशन आवेदन समय पर मंजूर नहीं होता या दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक देरी अथवा अन्य कारणों से उसकी वैध अवधि खत्म हो जाती है, तो वह अमेरिका में ‘अनलॉफुल प्रेजेंस’ (अवैध रूप से रहने) की स्थिति में आ सकता है।

    इसका असर भविष्य में वीजा आवेदन, रोजगार के अवसर और अमेरिका में दोबारा प्रवेश पर पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल यह नियम तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा पूरी होने और अंतिम प्रभावी तारीख घोषित होने तक F-1 छात्रों के लिए मौजूदा ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ व्यवस्था ही जारी रहेगी।

  • रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित विधेयक पेश किया है, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर रूसी तेल का आयात जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के कानून बनने की संभावना फिलहाल सीमित है।

    संशोधित विधेयक में क्या है?

    प्रस्तावित बिल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। वहीं, 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित कार्रवाई से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे सीमित मात्रा में रूसी गैस आयात करते हैं और रूस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं।

    डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह केवल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह कानून बनता है तो पहली बार अमेरिकी कांग्रेस किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ को दंडात्मक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देगी।

    वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर

    ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल की खरीद पर इस प्रकार के सेकेंडरी टैरिफ लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    केप्लर के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग विशेषज्ञ सुमित रिटोलिया के अनुसार, वैश्विक बाजार में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि इसकी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

    पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन आपूर्ति बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है।

    उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल (2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक था। जुलाई में भी आयात का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?

    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा ही एक विधेयक लंबे समय से अमेरिकी सीनेट में लंबित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल पाया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए इस प्रस्ताव के लागू होने की राह आसान नहीं है। साथ ही यूरोपीय देशों को दी गई छूट यह भी दर्शाती है कि प्रस्ताव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। यदि भविष्य में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़त होती है, तब भी भारत के सामने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आयात रणनीति का संतुलित मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण होगा।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालात के बीच भारत सरकार ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। समुद्री प्रशासन महानिदेशालय (DGMA) ने शिपिंग कंपनियों और जहाज प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं के लिए नई एडवाइजरी जारी करते हुए निर्देश दिया है कि अगले आदेश तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर भारतीय नाविकों की तैनाती से बचा जाए।

    सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी जोखिमों को देखते हुए समुद्री मार्गों पर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है, जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का परिवहन होता है।

    जारी एडवाइजरी में शिप ओनर और शिप मैनेजमेंट कंपनियों से कहा गया है कि भारतीय नाविकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जब तक सुरक्षा स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक होर्मुज क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नागरिकों की तैनाती नहीं की जाए। साथ ही कंपनियों को क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने और सभी सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    समुद्री प्रशासन का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह एहतियाती उपाय के रूप में लिया गया है। खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना से भारतीय नाविकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पहले से सावधानी बरतना आवश्यक माना गया है।

    हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर भी असर डाला है। कई देशों ने अपने नागरिकों और व्यापारिक जहाजों के लिए अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा सलाह जारी की है। भारत ने भी इसी क्रम में अपने समुद्री कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का सुरक्षा संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समुद्री कंपनियां भी लगातार सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन के निर्देशों के अनुरूप अपनी परिचालन रणनीति में बदलाव कर रही हैं।

    सरकार ने शिपिंग कंपनियों से यह भी अपेक्षा की है कि वे अपने जहाजों की आवाजाही और चालक दल की तैनाती से जुड़े सभी निर्णय मौजूदा सुरक्षा आकलन के आधार पर लें। यदि क्षेत्र की परिस्थितियों में कोई नया बदलाव होता है तो उसके अनुसार आगे के निर्देश भी जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नाविक दुनिया के विभिन्न देशों के व्यापारिक जहाजों पर बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। वर्तमान एडवाइजरी को भी इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण एहतियाती कदम माना जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में भारतीय समुद्री कर्मियों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।

  • मैरीलैंड के बेलकैंप में उपकरण चालू होने से फैला धुआं, पड़ोसियों ने दो बेजुबानों को सुरक्षित निकाला बाहर

    मैरीलैंड के बेलकैंप में उपकरण चालू होने से फैला धुआं, पड़ोसियों ने दो बेजुबानों को सुरक्षित निकाला बाहर

    नई दिल्ली । पालतू पशुओं की अनजानी और मासूम हरकतें कभी-कभी कितने बड़े और विनाशकारी हादसों का रूप ले सकती हैं, इसका एक अत्यंत हृदयविदारक उदाहरण अमेरिका से सामने आया है। मैरीलैंड राज्य के बेलकैंप इलाके में एक घर के भीतर उस समय भारी तबाही मच गई, जब परिवार की अनुपस्थिति में एक पालतू कुत्ते ने गलती से किचन में रखा टोस्टर ऑन कर दिया। देखते ही देखते इस छोटे से उपकरण से निकली चिंगारी ने विकराल आग का रूप ले लिया और पूरा मकान धुएं के गुबार से घिर गया। इस दर्दनाक हादसे में परिवार के तीन बेहद प्रिय पालतू जानवरों की दम घुटने से मौत हो गई, जबकि पड़ोसियों की तत्परता और अदम्य साहस के कारण दो अन्य कुत्तों को सुरक्षित बचा लिया गया। यह पूरी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना घर के भीतर स्थापित सुरक्षा कैमरे में कैद हो गई है।

    स्थानीय जांच और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जारी आधिकारिक विवरण के अनुसार, यह भीषण हादसा उस समय घटित हुआ जब मकान के मालिक किसी घरेलू कार्य से बाहर गए हुए थे और घर में केवल उनके पालतू पशु ही मौजूद थे। सुरक्षा कैमरों की फुटेज का विश्लेषण करने पर अधिकारियों ने पाया कि आग लगने का कारण कोई तकनीकी शॉर्ट-सर्किट नहीं था। वीडियो साक्ष्यों में साफ दिखाई दे रहा है कि परिवार का एक पालतू कुत्ता खेलते-खेलते अचानक रसोईघर के काउंटर पर चढ़ जाता है। इसी दौरान उसका पैर या शरीर का कोई हिस्सा वहां रखे इलेक्ट्रॉनिक टोस्टर से छू जाता है, जिससे वह उपकरण चालू हो जाता है। टोस्टर के अत्यधिक गर्म होने के कारण उसके अत्यंत निकट रखा अन्य घरेलू सामान सुलगने लगा और कुछ ही मिनटों में लपटें पूरी रसोई को अपनी चपेट में लेते हुए घर के अन्य हिस्सों में फैल गईं।

    आग की विभीषणता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देखते ही देखते पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। आसपास रहने वाले नागरिकों ने जब बंद मकान की खिड़कियों और छतों से काला धुआं निकलते देखा, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया। पड़ोसियों ने अत्यंत विषम परिस्थितियों के बीच घर का दरवाजा तोड़कर भीतर प्रवेश किया और दो कुत्तों को सुरक्षित बाहर निकालने में सफलता हासिल की। हालांकि, अत्यधिक धुआं भर जाने के कारण एक अन्य कुत्ता और परिवार की दो बिल्लियां घर के भीतर ही फंसे रह गए, जिन्हें बचाया नहीं जा सका।

    घटना की आपातकालीन सूचना मिलते ही दमकल विभाग की गाड़ियां और लगभग तीस दमकलकर्मी तुरंत मौके पर पहुंचे। बचाव दल ने करीब बीस मिनट की कड़ी मशक्कत और भारी जद्दोजहद के बाद आग पर पूरी तरह काबू पाया। प्रशासनिक अधिकारियों के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, इस अग्निकांड में मकान के ढांचे और भीतर रखी मूल्यवान संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसका कुल मूल्य लगभग दो लाख डॉलर आंका गया है।

    अग्निशमन विशेषज्ञों और राष्ट्रीय सुरक्षा संघों का कहना है कि पालतू जानवरों की वजह से घरेलू उपकरणों के चालू होने और आग लगने की घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अकेले अमेरिका में ही प्रतिवर्ष लगभग एक हजार घरों में बेजुबान जानवरों की अनजानी हरकतों के कारण आग लगने के मामले दर्ज किए जाते हैं, जिससे लाखों पालतू जीव प्रभावित होते हैं। पूर्व में भी अन्य राज्यों से ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां स्मार्ट उपकरणों की समय पर चेतावनी न मिलने के कारण परिवारों को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है।

  • मैरीलैंड के बेल्ट्सविले में अनोखा अपराध, बिल्ली को हथियार की तरह इस्तेमाल कर कर्मचारी को थमाया धमकी भरा नोट

    मैरीलैंड के बेल्ट्सविले में अनोखा अपराध, बिल्ली को हथियार की तरह इस्तेमाल कर कर्मचारी को थमाया धमकी भरा नोट

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराध जगत से जुड़ी एक ऐसी अजीबोगरीब और हैरतअंगेज घटना सामने आई है, जिसने न केवल पुलिस प्रशासन बल्कि सोशल मीडिया जगत को भी पूरी तरह चकित कर दिया है। अमेरिका के मैरीलैंड राज्य में एक व्यक्ति ने बैंक डकैती की वारदात को अंजाम देने के लिए किसी पारंपरिक हथियार, पिस्तौल या बारूद का इस्तेमाल करने के बजाय एक मासूम जानवर का सहारा लिया। आमतौर पर बैंक लूट की घटनाओं में भारी सुरक्षा चूक और खौफनाक मंजर देखने को मिलता है, लेकिन इस विशिष्ट मामले में एक बेहद छोटी और मासूम बिल्ली अनजाने में इस अजीब अपराध का मुख्य हिस्सा बन गई। आरोपी ने बैंक के भीतर घुसकर जिस तरह की हरकत की, उसने सुरक्षा अधिकारियों को भी कुछ समय के लिए हैरत में डाल दिया।

    इस अनोखे और सुनियोजित घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब आरोपी शख्स मैरीलैंड के बेल्ट्सविले इलाके में स्थित एक प्रसिद्ध पेट सप्लाई स्टोर के एडॉप्शन सेंटर में दाखिल हुआ। वहां उसने पिछले काफी दिनों से रखी गई लगभग साढ़े तीन महीने की एक खास नस्ल की टक्सीडो बिल्ली पर अपनी नजरें टिका रखी थीं। सुरक्षा कैमरों की फुटेज से यह साफ हुआ है कि आरोपी पिछले दो हफ्तों से लगातार उस स्टोर के चक्कर काट रहा था और बिल्ली की गतिविधियों पर नजर रख रहा था। घटना वाले दिन उसने बेहद चालाकी से बिल्ली के पिंजरे को खोला और उसे चुपचाप उठाकर स्टोर से बाहर भाग निकला। यह पूरी घटना स्टोर के सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो गई, जिसमें आरोपी हल्के रंग की पोशाक में बिल्ली को दबाकर भागता नजर आया।

    पशु संरक्षण केंद्र से बिल्ली की चोरी करने के ठीक बाद आरोपी का अगला कदम और भी ज्यादा चौंकाने वाला रहा। वह उस नन्हीं बिल्ली को अपने साथ लेकर कुछ ही दूरी पर स्थित पीएनबी बैंक की एक स्थानीय शाखा में सीधे प्रवेश कर गया। बैंक के भीतर काउंटर पर पहुंचकर उसने सबसे पहले वहां तैनात बैंक कर्मचारी यानी टेलर के हाथों में उस छोटी बिल्ली को थमा दिया। इससे पहले कि बैंक कर्मचारी कुछ समझ पाता, आरोपी ने जेब से एक लिखित नोट निकाला और कर्मचारी के सामने बढ़ा दिया। इस नोट में बेहद सख्त लहजे में बैंक में रखे कैश को तुरंत उसके हवाले करने की मांग की गई थी। बैंक के भीतर मौजूद अन्य ग्राहकों और कर्मचारियों के लिए यह दृश्य बेहद काल्पनिक और असाधारण था।

    इस अजीबोगरीब रंगदारी और लूट के प्रयास की सूचना तुरंत स्थानीय पुलिस नियंत्रण कक्ष को दी गई। सूचना मिलते ही प्रिंस जॉर्ज काउंटी पुलिस की एक भारी टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बैंक की घेराबंदी कर दी और आरोपी को मौके पर ही धर-दबोचा। इस दौरान पुलिस अधिकारियों ने तत्परता दिखाते हुए बैंक मैनेजर के केबिन से उस मासूम बिल्ली को पूरी तरह सुरक्षित और सकुशल बरामद कर लिया। बिल्ली रेस्क्यू संस्था के अधिकारी भी शुरुआत में इतनी बड़ी पुलिसिया कार्रवाई देखकर हैरान थे, लेकिन जब उन्हें बैंक के भीतर बिल्ली के होने की पुख्ता जानकारी मिली, तो पूरा मामला साफ हो गया।

    इस अनोखी घटना की खबर जैसे ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया और इंटरनेट पर प्रसारित हुई, सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर बेहद मजेदार और दिलचस्प प्रतिक्रियाएं देना शुरू कर दिया। पशु कल्याण संस्था ने आधिकारिक बयान जारी कर मजाकिया लहजे में कहा कि इस नन्हीं बिल्ली का आपराधिक जीवन अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वह वापस अपनी सामान्य दुनिया में लौट आई है। हालांकि आरोपी को उसकी इस गंभीर करतूत के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया गया है, लेकिन मैग्नोलिया नाम की यह बिल्ली अब लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हो चुकी है और संस्था अब उसके लिए एक सुरक्षित और संवेदनशील आशियाने की तलाश कर रही है।

  • ईरान का पलटवार…बहरीन में अमेरिकी मिलेट्री बेस पर अब तक का सबसे बड़ा हमला

    ईरान का पलटवार…बहरीन में अमेरिकी मिलेट्री बेस पर अब तक का सबसे बड़ा हमला


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) द्वारा बुधवार को किए गए बैक-टू-बैक दो बड़े हवाई हमलों (Major Air Strikes) के जवाब में ईरान (Iran) ने अब तक का सबसे बड़ा पलटवार किया है. तेहरान ने दावा किया है कि गुरुवार को ईरान (Iran) ने बहरीन (Bahrain) में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों (US military bases) पर अब तक का सबसे बड़ा और भीषण हमला बोल दिया है, जिसने पूरे मध्य-पूर्व को दहला दिया है।

    ईरानी सैन्य कमांडरों और आधिकारिक मीडिया ‘प्रेस टीवी’ के जरिए जो बयान सामने आए हैं, वे साफ संकेत दे रहे हैं कि यह जंग अब किसी भी हद तक जा सकती है. ईरान के सबसे शक्तिशाली सैन्य संगठन ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल मोहेबी ने अमेरिका को खुली चेतावनी देते हुए कहा है।

    IRGC ने कहा, “दुश्मन (अमेरिका) यह समझने की भूल कतई न करे कि वह इस संघर्ष को अपनी मर्जी से खींच सकता है और इसे एक ‘वॉर ऑफ एट्रिशन’ (थका देने वाले लंबे युद्ध) में बदल सकता है. ईरान के मौजूदा सैन्य ऑपरेशन पूरी तरह से खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी आक्रामक सैन्य बुनियादी ढांचे और ठिकानों को नेस्तनाबूद करने पर केंद्रित हैं. यह काम पूरा होते ही हमारा अगला विनाशकारी चरण शुरू होगा।

    होर्मुज जलसंधि पर ईरान की ‘तालाबंदी’, रखीं कड़ी शर्तें
    दूसरी ओर, ईरान की थल सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल अकरमी निया ने वैश्विक व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण मार्ग ‘होर्मुज’ को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है. उन्होंने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका ईरान की तीन प्रमुख शर्तों को नहीं मानता, तब तक यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पूरी तरह बंद रहेगा। इन शर्तों के तहत होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए अमेरिका को ईरान के साथ हुए समझौते (MoU) की शर्तों का पालन करना होगा, शत्रुतापूर्ण गतिविधियां बंद करनी होंगी और ईरानी कानूनों को लागू करना होगा।

    MoU का पालन और शत्रुता का अंत
    ईरान का कहना है कि अमेरिका को दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के नियमों का पालन करना होगा, अपनी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई रोकनी होगी और ईरानी कानूनों को लागू करना होगा. इन शर्तों के बिना जलमार्ग से किसी भी जहाज को गुजरने नहीं दिया जाएगा. बहरीन में हुए इस बड़े हमले और ईरान की इस सख्त घेराबंदी के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में हड़कंप मच गया है, और वैश्विक तेल बाजार पूरी तरह क्रैश होने की कगार पर पहुंच गया है।

  • इजरायल को फंडिंग करने पर अमेरिका में बवाल… सांसदों ने की कटौती की मांग

    इजरायल को फंडिंग करने पर अमेरिका में बवाल… सांसदों ने की कटौती की मांग


    वाशिंगटन।
    इजरायल (Israel) की मदद करना अमेरिकी सरकार (American Government) को भारी पड़ता दिख रहा है. इस मुद्दे को लेकर अमेरिका (America) की राजनीति में हंगामा शुरू हो गया है. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (House of Representatives) के आधे से ज्यादा डेमोक्रेटिक सांसदों (Democratic lawmakers) ने इजरायल को दी जाने वाली 3.3 अरब डॉलर की सहायता राशि में कटौती करने के पक्ष में मतदान किया है।

    बुधवार को सदन में इस संशोधन प्रस्ताव पर मतदान हुआ. प्रस्ताव के पक्ष में 104 और विरोध में 314 वोट पड़े. हालांकि, ये राष्ट्रीय सुरक्षा खर्च विधेयक में इस संशोधन को जोड़ने के लिए काफी नहीं था। इस मतदान से ये साफ हो गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) की युद्ध रणनीति को लेकर अमेरिकी संसद और डेमोक्रेटिक पार्टी में गहरी दरार है।


    चुनाव से ठीक पहले पार्टी में मतभेद

    ये मतदान अमेरिक में होने वाले मिड-टर्म चुनावों से ठीक पहले हुआ है, जो ये तय करेंगे कि अमेरिकी कांग्रेस पर किसका कंट्रोल होगा. इस वोटिंग में डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व के बीच भी मतभेद खुलकर सामने आए. 100 से ज्यादा डेमोक्रेट्स ने विदेशी सैन्य सहायता राशि को पूरी तरह खत्म करने वाले इस संशोधन के पक्ष में वोट दिया, जबकि लगभग इतने ही डेमोक्रेट्स ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    वहीं, जबकि रिपब्लिकन सांसदों ने इजरायल को दी जाने वाली सहायता को बनाए रखने के पक्ष में वोट डाला. सदन में डेमोक्रेटिक नेता हकीम जेफ्रीस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया. हालांकि, उन्होंने अपने सहयोगियों को लिखे पत्र में इस बात पर जोर दिया कि इजरायल और फिलिस्तीनी लोगों की भलाई के लिए मिडिल-ईस्ट में अमेरिकी नीति को बदलना होगा। जेफ्रीस ने कहा कि नेतन्याहू सरकार के रवैये में जरूरी बदलाव लाने के लिए और भी सही तरीके मौजूद हैं।


    पार्टी में बढ़ता आंतरिक दबाव

    इजरायल को लेकर बढ़ती विरोध डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है. पार्टी को अपने ही भीतर लेफ्ट विंग के बढ़ते दबाव का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी इस फूट का फायदा उठाकर डेमोक्रेट्स को ‘कट्टर वामपंथी’ साबित करने की कोशिश कर रही है।

    इस बीच, डेमोक्रेटिक व्हिप और मैसाचुसेट्स की प्रतिनिधि कैथरीन क्लार्क ने फंड रोकने का समर्थन किया. एक हालिया AP-NORC पोल के मुताबिक, लगभग एक-तिहाई अमेरिकी एडल्ट- जिनमें करीब आधे डेमोक्रेट शामिल हैं, उनका मानना है कि इजरायल ने गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार किया है. हालांकि, इजरायल और अमेरिकी सरकार इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते रहे हैं।

  • ब्रिटेन द्वारा IRGC को 'सुरक्षा के लिए खतरा' बताने पर भड़का ईरान, राजदूत को किया तलब

    ब्रिटेन द्वारा IRGC को 'सुरक्षा के लिए खतरा' बताने पर भड़का ईरान, राजदूत को किया तलब


    लंदन।
    ईरान-अमेरिका (Iran-America) के बीच जंग नए मोड़ पर पहुंच चुकी है. दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है. इस बीच, ईरान (Iran) ने तेहरान में ब्रिटेन (Britain) के राजदूत को तलब किया. यह कदम लंदन द्वारा यूके के ‘काउंटरिंग स्टेट थ्रेट्स एक्ट’ (‘Countering State Threats Act’) के तहत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps- IRGC) को नामित करने के बाद उठाया गया. एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्रालय ने चेतावनी दी कि इस कदम का जवाब दिया जाएगा।

    यह घटनाक्रम ब्रिटेन द्वारा लंदन में ईरान के चार्ज डी’अफेयर्स अली नसीमफार को तलब किए जाने के एक दिन बाद हुआ. ब्रिटेन सरकार का आरोप था कि हाल के महीनों में पूरे यूरोप में हमले करने के लिए प्रॉक्सी समूहों को निर्देशित करने में ईरान की भूमिका रही है।

    बता दें, ब्रिटेन ने सोमवार को IRGC और उससे जुड़े एक समूह को सुरक्षा के लिए खतरा घोषित किया. यह कदम उन नए अधिकारों के तहत उठाया गया जिनका मकसद विदेशी देशों को निगरानी और तोड़फोड़ जैसी गतिविधियों के लिए प्रॉक्सी का इस्तेमाल करने से रोकना है।


    होर्मुज को लेकर बढ़ी चिंताएं

    ईरान-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंताएं फिर बढ़ गई हैं. रॉयटर्स के मुताबिक, समुद्री सुरक्षा और शिपिंग इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों ने बताया कि जहाजों पर ईरानी हमलों के सिलसिले के बाद सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसके चलते शिपिंग कंपनियां स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने के लिए अमेरिकी सेना की निगरानी वाली योजना का इस्तेमाल करने से बच रही हैं।

    28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ईरानी सेना ने इस इलाके में माइंस बिछा दी हैं, जिससे जहाजों को ईरान या ओमान के तट के करीब बने दो वैकल्पिक रास्तों में से किसी एक का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

  • रूस का यूक्रेन पर बड़ा हमला…. राजधानी कीव पर दांगी बैलिस्टिक मिसाइलें

    रूस का यूक्रेन पर बड़ा हमला…. राजधानी कीव पर दांगी बैलिस्टिक मिसाइलें


    कीव।
    रूस (Russia) ने गुरुवार तड़के एक बार फिर यूक्रेन (Ukraine) की राजधानी कीव (Kyiv) को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइलों (Ballistic Missiles) से बड़ा हमला किया. यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, हमले के दौरान कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जबकि एयर डिफेंस सिस्टम (Air Defense System) लगातार मिसाइलों को रोकने में जुटे रहे. यूक्रेनी वायुसेना ने चेतावनी दी है कि राजधानी पर और मिसाइल हमले हो सकते हैं, इसलिए लोगों से सुरक्षित बंकरों में रहने की अपील की गई है।

    कीव के मेयर विताली क्लिट्स्को ने बताया कि शहर के पश्चिमी बाहरी इलाके में एक गोदाम मिसाइल हमले की चपेट में आ गया. वहीं, इंटरसेप्ट की गई मिसाइलों का मलबा ड्नीप्रो नदी के पूर्वी किनारे स्थित इलाके में गिरा. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, कम से कम आठ बैलिस्टिक मिसाइलें कीव की ओर दागी गई थीं।

    यूक्रेन की वायुसेना ने टेलीग्राम पर जारी संदेश में कहा कि बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा रूस ने शाहेद ड्रोन भी कई शहरों की ओर भेजे हैं. उत्तर-पूर्वी शहर खारकीव में भी ड्रोन हमलों के बाद कई विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं. इसके अलावा विनित्सिया समेत कई अन्य क्षेत्रों में भी एयर रेड अलर्ट जारी किया गया.


    यूक्रेन के रक्षा मंत्री को पद से हटाने के बाद हमला

    यह हमला ऐसे समय हुआ है जब यूक्रेन में रक्षा मंत्री मायखाइलो फेदोरोव को पद से हटाए जाने को लेकर राजनीतिक हलचल बनी हुई है. उनके हटने के कुछ ही समय बाद रूस ने राजधानी पर नया हमला कर दिया।


    यूक्रेन पर रूस लगातार कर रहा घातक हमले

    जुलाई में रूस की तरफ से कीव पर यह सातवां बड़ा हमला बताया जा रहा है. इससे पहले 14 जुलाई की रात रूस ने मिसाइलों और ड्रोन के जरिए बड़े पैमाने पर हमला किया था, जिसमें कम से कम सात लोगों की मौत हुई थी और 78 लोग घायल हुए थे. उस हमले में राजधानी के 16 स्थानों को नुकसान पहुंचा था, जिनमें एक स्कूल और एक नागरिक औद्योगिक प्रतिष्ठान भी शामिल था।

    इससे पहले 2 जुलाई को हुए हमले में 30 से अधिक लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. वहीं, 6 जुलाई के हमले में कम से कम 26 लोगों की जान गई थी. लगातार हो रहे इन हमलों ने कीव में आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

  • PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी

    PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी


    इस्लामाबाद।
    बलूचिस्तान (Balochistan) की प्राकृतिक गैस, कोयला, खनिज और रेयर अर्थ पर निर्भर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था (Pakistan Economy) इस वक्त अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जिस इलाके को पाकिस्तान लंबे समय से अपना आर्थिक इंजन मानता रहा, उसी बलूचिस्तान ने अब न सिर्फ आजादी का ऐलान (Declaration of Independence) कर दिया है, बल्कि अपनी संसाधनों की आपूर्ति भी पूरी तरह रोक दी है। दरअसल, बलूचिस्तान प्रांत में मंगलवार को स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन कट गई है। क्षेत्र में लगे पूर्ण शटडाउन और ट्रांसपोर्ट ब्लॉकेड ने पंजाब की औद्योगिक इकाइयों को घुटनों पर ला दिया है। अगर यही हालात रहे तो संभव है कि पाकिस्तान कटोरा लेकर घूमने के लायक भी नहीं बचेगा।

    पंजाब के प्रमुख बिजनेस लीडर्स ने चेतावनी दी है कि अगर यह संकट लंबा खिंचा तो इसका असर किसी सक्रिय युद्ध से भी कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकता है। पंजाब चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और अन्य प्रमुख बिजनेस संगठनों के प्रतिनिधियों ने लाहौर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने बलूचिस्तान पर निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता जताई। बिजनेस लीडर्स के अनुसार, पाकिस्तान की अधिकांश भारी उद्योगों की ऊर्जा आपूर्ति, कच्चा माल और खनिज बलूचिस्तान के रास्ते ही आते हैं। शटडाउन के कारण यह पूरी सप्लाई चेन थम गई है।


    LNG और कोयला आपूर्ति पूरी तरह बंद

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्योगपतियों ने विस्तार से बताया कि लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और कोयला मुख्य रूप से बलूचिस्तान के बंदरगाहों और खदानों से पंजाब भेजा जाता है। अब दोनों क्षेत्रों के बीच सभी तरह के एक्सपोर्ट और ट्रांसपोर्ट रुक गए हैं। एक प्रमुख इंडस्ट्री लीडर ने कहा कि हमारी फैक्टरियां अब ईंधन के बिना चल नहीं सकतीं। कई प्लांट्स पहले ही बंद हो चुके हैं या उत्पादन आधा कर दिया गया है। अगर यह स्थिति 10-15 दिन और चली तो पूरे पंजाब में बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू हो जाएगी। उन्होंने शहबाज शरीफ सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि लंबे समय तक रुकावट बनी रही तो न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन ठप होगा, बल्कि बेरोजगारी बढ़ने से सामाजिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है।


    खनिज और कच्चे माल की कमी

    बिजनेस प्रतिनिधियों ने बताया कि डुकी, चागई और अन्य खनिज क्षेत्रों से कोयला, क्रोमाइट, कॉपर और अन्य जरूरी इंडस्ट्रियल इनपुट्स की आपूर्ति रोक दी गई है। ट्रांसपोटर्स हड़ताल पर हैं क्योंकि राज्य उच्च मार्गों पर उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दी जा रही। नतीजतन, फैक्टरियों तक कच्चा माल नहीं पहुंच पा रहा। टेक्सटाइल, सीमेंट, फर्टिलाइजर, स्टील और पावर सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया कि कई यूनिट्स में उत्पादन 40-60 प्रतिशत तक कम हो गया है।


    बलूचिस्तान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़

    बलूच नेता मीर यार बलूच द्वारा शेयर किए गए वीडियो और उनके बयानों में कहा गया है कि बलूचिस्तान सोना, प्राकृतिक गैस, तांबा, क्रोमाइट और रेयर अर्थ का विशाल भंडार है। अगर बलूचिस्तान इन संसाधनों पर अपना पूर्ण नियंत्रण वापस ले लेता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगेगा। मीर यार बलूच ने कहा कि हम जिसे ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ कह रहे हैं, वहां स्थिति धीरे-धीरे बलूच मुक्ति सेनाओं के नियंत्रण में आ रही है। हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का फायदा अपने लोगों को देना चाहते हैं, न कि पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार को।

    दूसरी ओर एक आर्थिक विशेषज्ञ ने कहा कि बलूचिस्तान पाकिस्तान की जीडीपी में सीधे-सीधे योगदान नहीं देता दिखता, लेकिन उसकी सप्लाई चेन पूरे देश की रीढ़ है। इन संसाधनों के बिना पाकिस्तानी सरकार दिवालिया होकर टूट जाएगी। यही कारण है कि पंजाब के बिजनेसमैनों ने सरकार से तुरंत बातचीत शुरू करने और बलूचिस्तान में शांति बहाल करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह अब सिर्फ सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का संकट बन चुका है।