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  • US बेस में सुरक्षित नहीं खाड़ी देश… खामेनेई- 'ढाल' की तरह नहीं कर पाएंगे काम

    US बेस में सुरक्षित नहीं खाड़ी देश… खामेनेई- 'ढाल' की तरह नहीं कर पाएंगे काम


    वाशिंगटन।
    पश्चिम एशिया (West Asia.) में जारी संकट बुरी तरह से उलझता नजर आ रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) हैं, जो किसी भी हाल में इस युद्ध को अमेरिका (America) के लिए जीत साबित करने में लगे हुए हैं, तो दूसरी तरफ ईरान (Iran) है, जो अपने दशकों पुराने अमेरिकी डर का सामना करके और भी ज्यादा खतरनाक हो गया है। इसी निडरता का परिचय देते हुए शांति समझौते के बीच ईरानी सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई (Iranian Supreme Leader Mojtaba Khamenei) ने साफ कर दिया है कि अब से खाड़ी देश अमेरिकी ठिकानों के लिए ‘ढाल’ की तरह काम नहीं कर पाएंगे।

    अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ईद-अल-अजहा के मौके पर खामेनेई ने ईरानी लोगों के लिए एक लिखित बयान जारी किया। इस बयान में खामेनेई ने अमेरिका के साथ चल रही शांति वार्ता को लेकर भी बात की। इतना ही नहीं युद्ध की स्थिति को लेकर उन्होंने साफ किया कि अब ईरान अमेरिकी ठिकानों पर हमला करने से नहीं चूकेगा। उन्होंने कहा, “यह निश्चित है कि समय के हाथ अब पीछे की तरफ नहीं मुड़ेंगे और क्षेत्र की जनता और जमीन अब अमेरिकी ठिकानों के लिए ढाल का काम नहीं करेगी। अमेरिका को अब इस क्षेत्र में बुराई फैलाने या सैन्य अड्डा स्थापित करने का सुरक्षित आश्रय नहीं मिलेगा।” बता दें, खामेनेई का इशारा यहां पर युद्ध के समय अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने को लेकर था। हालांकि, ईरान ने पिछले संघर्ष के समय भी इन देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया था, लेकिन उस वक्त सभी देशों ने इसको लेकर नाराजगी जाहिर की थी।

    इस बयान के साथ ही, खामेनेई ने संदेश दे दिया है कि ईरान अब खाड़ी देशों में अमेरिकी बेसों की मौजूदगी को बर्दाश्त नहीं करेगा। वैसे भी खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा समझौता करने के बदले में वहां बेस बनाकर बैठे अमेरिका की पोल ईरान युद्ध के दौरान खुल गई थी। ईरान के हल्के ड्रोन्स ने सुरक्षित माने जाने वाले इन देशों में काफी उत्पात मचाया था, जिसकी वजह से यह देश पहले ही अमेरिका के अलावा दूसरे विकल्पों की तरफ देख रहे हैं।


    अमेरिका के साथ 14 सूत्रीय प्रस्ताव पर चर्चा कर रहा ईरान

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को इस बात की जानकारी दी कि ईरान और अमेरिका के बीच में इस वक्त 14 सूत्रीय समझौते पर बातचीत जारी है। इसमें से ज्यादातर मुद्दों को हल कर लिया गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी समझौता बहुत दूर है।

    वरिष्ठ ईरानी राजनयिक होसैन नूशाबादी के अनुसार ईरान और अमेरिका के बीच में ज्यादातर मामलों में समझौता हो सकता है, लेकिन केवल परमाणु का मुद्दा फंसा हुआ है। अमेरिका इस बात को बार-बार कहता आ रहा है कि ईरान को संवर्धित यूरेनियम को अमेरिका का सौंपना होगा, इसके साथ ही उसे इस बात की भी पुष्टि करनी होगी कि वह भविष्य में कभी भी परमाणु कार्यक्रम शुरू नहीं करेगा। इसके अलावा तेहरान केवल एक परमाणु रिएक्टर बना सकता है। इसके साथ ही उसे अपने मिसाइल कार्यक्रम को भी बंद करना होगा। दरअसल, ट्रंप की मजबूरी यह है कि उन्हें ओबामा से बेहतर ईरानी डील करनी ही होगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह उनके और उनकी पार्टी के लिए एक बड़ी हार साबित होगी। इसलिए ट्रंप भी इस पर झुकने को तैयार नहीं है। उन्होंने सोमवार को ट्रुथ सोशल पर लिखे पोस्ट में साफ किया कि ईरान के साथ अगर डील होगी, तो वह बेहतर होगी। अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर कोई भी डील नहीं होगी।

    अमेरिका भले ही इन शर्तों के साथ आगे बढ़ रहा हो, लेकिन ईरान के लिए यह शर्तें स्वीकार करने योग्य नहीं है। दूसरी बात, दशकों पुराने अमेरिकी हमले के डर का सामना करने वाले ईरान के नेता अब निर्भीकता के साथ अमेरिका का सामना कर रहे हैं। उन्हें इस बात का अंदाजा है कि डोनाल्ड ट्रंप भी अब युद्ध नहीं चाहते, ऐसे में अब तेहरान भी बातचीत की टेबल पर सख्ती के साथ अपनी शर्तें रख रहा है।

  • इजरायल अब युद्ध से इतर AI और सेमीकंडक्टर तकनीक बढ़ाने पर दे रहा जोर, जानें क्या है प्लान?

    इजरायल अब युद्ध से इतर AI और सेमीकंडक्टर तकनीक बढ़ाने पर दे रहा जोर, जानें क्या है प्लान?


    तेलअवीव।
    इजरायल (Israel) अब मिडिल ईस्ट (Middle East.) के युद्ध मोर्चों पर पारंपरिक सैन्य रणनीति के बजाय बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), संचार प्रणालियों और अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक (Cutting-edge Semiconductors Technology) पर निर्भर रहने की तैयारी कर रहा है। इजरायली सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने खुलासा किया है कि आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय रणनीतिक श्रेष्ठता बंदरगाहों या रेलवे गलियारों पर नहीं, बल्कि उन्नत प्रौद्योगिकी पर आधारित होगी। अधिकारियों ने कहा है कि भविष्य के युद्ध मैदान पर सैनिकों के बजाय बड़ी टेक कंपनियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी। इजरायल मध्य पूर्व में विकसित हो रहे रणनीतिक आर्थिक गलियारों की ‘वास्तविक रीढ़’ के रूप में प्रौद्योगिकी और संचार अवसंरचना ( Communication Infrastructure ) को देख रहा है।


    IMEC और I2U2 को नया नजरिया

    वहीं, इस नई सोच के तहत इजराइल भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) और I2U2 समूह जैसी पहलों को पूरी तरह नए नजरिए से देख रहा है। इजरायली अधिकारी अमेरिकी चिप दिग्गज एनवीडिया समेत वैश्विक टेक कंपनियों के साथ बढ़ते सहयोग पर जोर दे रहे हैं। इजरायल खुद को भारत, खाड़ी देशों और पश्चिमी देशों के बीच नवाचार और प्रौद्योगिकी का प्रवेश द्वार बनाने की दिशा में काम कर रहा है, जहां ये कंपनियां अपने अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित कर रही हैं।


    ईरान पर इजरायल की स्पष्ट रणनीति

    ईरान के साथ चल रहे तनाव पर इजरायली अधिकारियों ने साफ किया कि इजरायल का लक्ष्य तेहरान में सत्ता परिवर्तन नहीं है। उनका उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को ‘पीढ़ीगत रूप से कमजोर’ करना है। अधिकारियों ने बताया कि लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के विकास के लिए विशाल औद्योगिक आधार जरूरी होता है। इजरायल इसी आधार को निशाना बना रहा है ताकि ईरान इजरायल की हवाई सुरक्षा को भेद सकने वाली मिसाइलें विकसित न कर सके।

    इसके अलावा ईरानी सैन्य नेतृत्व और प्रॉक्सी समूहों के कमांडरों को लक्ष्य बनाना भी ऑपरेशनल क्षमता को बाधित करने की रणनीति का हिस्सा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जब नेतृत्व लगातार छिपने, जगह बदलने और नई कम्युनिकेशन लाइनें बनाने में लगा रहता है, तो उसकी परिचालन क्षमता तेजी से घट जाती है।


    भारत से IRGC पर कार्रवाई की अपील

    इजरायली पक्ष ने भारत से बड़े राजनयिक प्रयास के तहत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की है। अधिकारियों ने कहा कि इजरायल इस मुद्दे को भारतीय अधिकारियों के समक्ष कई बार उठा चुका है और उम्मीद करता है कि भारत आधिकारिक तौर पर IRGC को आतंकवादी संगठन घोषित करे। उन्होंने बताया कि अब तक 44 देश IRGC के खिलाफ कार्रवाई कर चुके हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया के फैसले और यूरोपीय संघ की पहल का जिक्र किया।


    हमास पर भी भारत से उम्मीद

    7 अक्टूबर के हमले के बाद इजराइल ने भारत से हमास को भी आतंकवादी संगठन घोषित करने की अपील दोहराई है। भारत ने हमले की कड़ी निंदा की थी, लेकिन अब तक हमास को आतंकवादी संगठन के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। इसी दौरान ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची का हालिया नई दिल्ली दौरा इजरायली पक्ष की चिंता का विषय बना हुआ है, जहां उन्होंने भारत को ‘भरोसेमंद दोस्त’ बताया था।

    दूसरी ओर इजरायली अधिकारी पूरे टकराव को क्षेत्रीय रणनीतिक और ऊर्जा प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देख रहे हैं। उनके अनुसार, ईरान की मिसाइल क्षमता को कम करने और उसके क्षेत्रीय सैन्य प्रभाव को सीमित करने के इजरायली लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो चुके हैं।

  • इबोला वायरस का कहर: 900 से ज्यादा संदिग्ध केस, WHO ने घोषित किया Global Health Emergency; भारत में अलर्ट

    इबोला वायरस का कहर: 900 से ज्यादा संदिग्ध केस, WHO ने घोषित किया Global Health Emergency; भारत में अलर्ट



    नई दिल्ली। अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में इबोला वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ता जा रहा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने इसे अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। इस बार संक्रमण दुर्लभ बुंडीबुग्यो स्ट्रेन से फैल रहा है, जिसके लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है।

    WHO की रिपोर्ट के मुताबिक अब तक 900 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें 101 मामलों की पुष्टि हुई है। कांगो के इटुरी प्रांत को इसका केंद्र बताया जा रहा है, जहां लाखों लोग संघर्ष और अस्थिरता के बीच रह रहे हैं।

    यूएस CDC के अनुसार कांगो में अब तक 119 संदिग्ध मौतें और 10 पुष्ट मौतें दर्ज की गई हैं, जबकि युगांडा में भी नए मामले सामने आने के बाद स्थिति गंभीर बनी हुई है। वायरस अब स्थानीय समुदायों में फैलता जा रहा है, जिससे नियंत्रण और मुश्किल हो गया है।

    इसी बीच भारत सरकार ने भी एहतियात के तौर पर एडवाइजरी जारी की है। कांगो, युगांडा और दक्षिण सूडान से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग बढ़ा दी गई है और एयरपोर्ट्स पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। हालांकि भारत में अभी तक इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने लोगों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है।

  • QUAD Summit: मार्को रुबियो का बड़ा बयान,अब सिर्फ चर्चा नहीं, एक्शन होगा, चीन की चिंता बढ़ी

    QUAD Summit: मार्को रुबियो का बड़ा बयान,अब सिर्फ चर्चा नहीं, एक्शन होगा, चीन की चिंता बढ़ी



    नई दिल्ली। नई दिल्ली में हुई QUAD विदेश मंत्रियों की बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने साफ कहा कि QUAD अब केवल बातचीत का मंच नहीं रहा, बल्कि यह एक “एक्शन-ओरिएंटेड” (कार्रवाई करने वाला) गठबंधन बनता जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि चारों देश अब वैश्विक मुद्दों पर सिर्फ चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि ठोस कदम भी उठाएंगे।

    बैठक की शुरुआत में रुबियो ने भारत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर सहित सभी सदस्य देशों का धन्यवाद किया और कहा कि QUAD की पहली बैठक में ही शामिल होना अमेरिका की मजबूत प्रतिबद्धता को दिखाता है। उन्होंने कहा कि यह मंच अब तेजी से परिणाम देने वाली दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    रुबियो ने कहा कि QUAD का उद्देश्य अब सिर्फ समस्याओं पर विचार करना नहीं, बल्कि उन्हें मिलकर हल करना है। उन्होंने बताया कि यह समूह मानवीय सहायता, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई चेन को मजबूत करने जैसे क्षेत्रों में ठोस सहयोग कर रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि चारों देश अपनी-अपनी ताकतों को जोड़कर वैश्विक चुनौतियों से निपटने में सक्षम हैं और अब इस सहयोग को और ज्यादा व्यावहारिक बनाया जाएगा। उनके इस बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के खिलाफ एक रणनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

    QUAD में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं और इसका फोकस इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और विकास को बढ़ावा देना है।

  • ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी

    ईरान–अमेरिका तनाव फिर बढ़ा: MQ-9 ड्रोन गिराने का दावा, सीजफायर उल्लंघन पर दी कड़ी चेतावनी




    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया है कि उसने अमेरिकी सेना के एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है। ईरान का कहना है कि यह ड्रोन उसके हवाई क्षेत्र में घुस आया था।

    यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब क्षेत्र में अस्थायी संघर्ष विराम (सीजफायर) लागू बताया जा रहा है और इसी दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के पास सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    ईरान का दावा और कड़ी चेतावनी
    ईरान की मीडिया एजेंसी मेहर न्यूज के अनुसार, IRGC ने कहा कि अमेरिकी ड्रोन उसकी सीमा में प्रवेश कर रहा था, जिसके बाद उसे निशाना बनाकर मार गिराया गया। साथ ही ईरान ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि यदि सीजफायर का उल्लंघन दोबारा किया गया तो इसका “कड़ा और निर्णायक जवाब” दिया जाएगा।ईरान ने यह भी कहा कि उसकी सुरक्षा और संप्रभुता का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    अमेरिकी कार्रवाई का दावा
    दूसरी ओर, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा है कि उसने आत्मरक्षा में कार्रवाई की है। अमेरिकी प्रवक्ता के मुताबिक, क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और युद्धपोतों को खतरा पैदा करने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया।

    रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास संदिग्ध बोट्स पर भी कार्रवाई की, जिन पर कथित तौर पर बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश का आरोप था। इसके अलावा बंदर अब्बास के पास एक सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल साइट पर भी हमले की बात सामने आई है।

    चार ईरानी सैनिकों की मौत का दावा
    ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिकी हमलों में रिवोल्यूशनरी गार्ड के चार सैनिकों की मौत हुई है। हालांकि इस पर स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

    क्षेत्र में बढ़ता तनाव
    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर डाल सकती है।

    ईरान और अमेरिका के बीच पहले से ही परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनाव बना हुआ है। इस ताजा घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच हालात को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम

    फिजी में QUAD का बड़ा दांव: बंदरगाह प्रोजेक्ट से इंडो-पैसिफिक में चीन को चुनौती, भारत की भूमिका अहम




    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका (QUAD) ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। चारों देशों ने फिजी में मिलकर एक आधुनिक बंदरगाह विकसित करने पर सहमति जताई है। इसे क्वाड के इतिहास में पहली बार ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट माना जा रहा है, जो सीधे तौर पर क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन से जुड़ा है।

    फिजी, जो प्रशांत महासागर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित द्वीप राष्ट्र है, लंबे समय से इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा था। अब क्वाड देशों की यह पहल चीन के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।

    फिजी में बंदरगाह क्यों अहम?
    फिजी भौगोलिक रूप से ऑस्ट्रेलिया के पूर्व और हवाई के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। यह प्रशांत महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों के बीच आता है। इस कारण यह क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

    पिछले कुछ वर्षों में चीन ने छोटे द्वीपीय देशों में निवेश और कर्ज के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। कई जगहों पर बंदरगाह और बुनियादी ढांचे के विकास के पीछे चीन की रणनीतिक उपस्थिति को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। इसी पृष्ठभूमि में क्वाड का यह कदम देखा जा रहा है।

    भारत के लिए क्या है महत्व?
    फिजी में लगभग 37% आबादी भारतीय मूल की है, जिन्हें “गिरमिटिया” समुदाय के वंशज माना जाता है। भारत और फिजी के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बहुत मजबूत हैं।

    इस प्रोजेक्ट में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपने समुद्री अनुभव, बंदरगाह विकास विशेषज्ञता और तकनीकी सहयोग के जरिए इस परियोजना में योगदान देगा। इसके अलावा भारत के Information Fusion Centre-IOR (गुरुग्राम) के माध्यम से समुद्री गतिविधियों की निगरानी में भी सहयोग संभव है।

    QUAD की नई रणनीति
    इस प्रोजेक्ट के साथ QUAD ने “Indo-Pacific Maritime Surveillance Cooperation” की भी शुरुआत की है, जिसके तहत समुद्री क्षेत्र में रीयल टाइम डेटा साझा किया जाएगा। इसका उद्देश्य अवैध मछली पकड़ने, संदिग्ध जहाजों और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों पर नजर रखना है।

    साथ ही “Quad-at-Sea” नाम से एक संयुक्त अभ्यास योजना भी प्रस्तावित है, जिसमें चारों देशों की कोस्ट गार्ड एक साथ समुद्री अभ्यास करेंगे।

    चीन की चिंता क्यों बढ़ी?
    विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहली बार है जब QUAD ने केवल बयानबाजी से आगे बढ़कर किसी तीसरे देश में संयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट शुरू करने का फैसला किया है। इससे चीन की “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” रणनीति को सीधी चुनौती मिल सकती है।

    चीन पहले से ही सोलोमन आइलैंड्स जैसे देशों में सुरक्षा समझौतों के जरिए अपनी उपस्थिति बढ़ा चुका है। ऐसे में फिजी में क्वाड की सक्रियता को बीजिंग एक रणनीतिक दबाव के रूप में देख सकता हैफिजी में प्रस्तावित यह बंदरगाह परियोजना केवल एक विकासात्मक कदम नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बदलने की दिशा में बड़ा भू-राजनीतिक संकेत है। भारत समेत QUAD देशों की यह साझेदारी आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय कूटनीति में नई दिशा तय कर सकती है।

  • नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?

    नेपाल में अमेरिका की बढ़ती सक्रियता, चीन की बढ़ी चिंता क्या बन रहा नया भू-राजनीतिक मोर्चा?




    नई दिल्ली। नेपाल में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद United States की सक्रियता तेजी से बढ़ती दिख रही है। अमेरिका के वरिष्ठ अधिकारियों के लगातार दौरे और कूटनीतिक संपर्कों ने क्षेत्रीय राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। खासकर चीन और भारत के बीच स्थित नेपाल अब बड़ी भू-रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बनता जा रहा है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका की अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर पब्लिक डिप्लोमेसी सराह बी. रोजर्स के नेपाल दौरे की तैयारी ने इस गतिविधि को और तेज कर दिया है। इससे पहले भी कई वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी काठमांडू का दौरा कर चुके हैं। इस बढ़ती कूटनीतिक हलचल को लेकर China ने भी सतर्क रुख अपनाया है और अपनी रणनीतिक निगरानी बढ़ा दी है।

    विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल में बढ़ती अमेरिकी रुचि का एक कारण क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा रणनीति हो सकता है। वहीं चीन का फोकस तिब्बती मुद्दों और अपने क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा पर है। इसी वजह से नेपाल में दोनों देशों की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं।

    नेपाल सरकार फिलहाल सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में यह देश अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बन सकता है।

  • ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ

    ट्रंप को पाकिस्तान का बड़ा झटका, रक्षा मंत्री बोले- इजरायल से समझौता हमारी विचारधारा के खिलाफ




    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य बनाने वाले अब्राहम समझौते का हिस्सा बनने के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Asif ने कहा कि इस तरह का समझौता देश की बुनियादी विचारधारा से मेल नहीं खाता और पाकिस्तान फिलहाल इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाएगा।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब Donald Trump ने मध्य-पूर्व में चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच कई मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। अमेरिका चाहता है कि Saudi Arabia, Qatar, पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इजरायल के साथ संबंध सामान्य करें।

    सोमवार रात एक टीवी कार्यक्रम में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें नहीं लगता कि पाकिस्तान को ऐसे किसी समझौते का हिस्सा बनना चाहिए जो उसकी वैचारिक और राजनीतिक नीति के खिलाफ हो। उन्होंने दोहराया कि पाकिस्तान का पुराना रुख आज भी कायम है और जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना नहीं होती, तब तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

    पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने इजरायल पर भरोसे का सवाल भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन देशों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, उनके साथ स्थायी समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पाकिस्तान के पासपोर्ट पर आज भी साफ लिखा होता है कि यह इजरायल की यात्रा के लिए मान्य नहीं है।

    गौरतलब है कि अब्राहम अकॉर्ड 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुआ था। इसके तहत United Arab Emirates और Bahrain समेत कई अरब देशों ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य किए थे। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस समझौते का हिस्सा बने।

    ख्वाजा आसिफ पहले भी इजरायल के खिलाफ कड़े बयान दे चुके हैं। हाल ही में उन्होंने इजरायल को “इंसानियत के लिए अभिशाप” बताते हुए गाजा में कथित नरसंहार का आरोप लगाया था। पाकिस्तान सरकार का यह ताजा बयान संकेत देता है कि फिलहाल इस्लामाबाद अमेरिका के दबाव के बावजूद अपने पारंपरिक फिलिस्तीन समर्थक रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

  • भारत के खतरे को लेकर पाकिस्तान में चिंता: विशेषज्ञों ने डिफेंस मजबूत करने की दी सलाह

    भारत के खतरे को लेकर पाकिस्तान में चिंता: विशेषज्ञों ने डिफेंस मजबूत करने की दी सलाह



    नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण रिश्तों के बीच पाकिस्तान में एक बार फिर भारत की सैन्य क्षमता को लेकर चिंता बढ़ गई है। “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद से वहां के सुरक्षा विशेषज्ञ और रणनीतिक विश्लेषक भारत से संभावित भविष्य के सैन्य अभियानों को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं।

    पाकिस्तान के रक्षा और रणनीतिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बदलती सैन्य रणनीति और तकनीकी बढ़त को देखते हुए देश को अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने की जरूरत है। उनका मानना है कि आधुनिक युद्ध तकनीक और नई रणनीतियां क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर रही हैं।

    भारत की सैन्य रणनीति पर पाकिस्तान की नजर
    कायदे-आज़म विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के विशेषज्ञों ने कहा कि दक्षिण एशिया में रणनीतिक स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद जरूरी है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारत के सैन्य सिद्धांतों में बदलाव आ रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक और अन्य सीमित सैन्य कार्रवाइयों की रणनीति ने पाकिस्तान की सुरक्षा सोच को प्रभावित किया है।

    आधुनिक युद्ध तकनीक पर जोर
    पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषकों ने कहा कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक मिसाइलें और उन्नत निगरानी प्रणाली अहम भूमिका निभाएंगी। ऐसे में पाकिस्तान को भी अपनी सैन्य तकनीक को आधुनिक बनाने की जरूरत है।

    एयर कमोडोर (सेवानिवृत्त) खालिद बनूरी के अनुसार, युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और निर्णय लेने की गति अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

    निष्कर्ष
    कुल मिलाकर, पाकिस्तान में सुरक्षा विशेषज्ञ भारत की बढ़ती सैन्य क्षमता को एक रणनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं और सरकार को रक्षा सुधारों की सलाह दे रहे हैं। हालांकि, साथ ही यह भी माना जा रहा है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीति जरूरी है।

    टैग्स
    भारत पाकिस्तान, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान डिफेंस, भारत सेना, दक्षिण एशिया तनाव, सैन्य विशेषज्ञ, ड्रोन वारफेयर, AI युद्ध तकनीक, हाइपरसोनिक मिसाइल, इस्लामाबाद, रणनीतिक स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय संबंध

  • सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल

    सऊदी-इजरायल संबंध: MBS के रुख को लेकर दावे तेज, अब्राहम अकॉर्ड पर फिर बढ़ी हलचल




    नई दिल्ली। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को लेकर इजरायल को मान्यता देने के दावों ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी माइक इवांस के बयान के बाद यह मुद्दा चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि MBS निजी बातचीत में इजरायल को मान्यता देने की इच्छा जता चुके हैं।

    इवांस के अनुसार, क्राउन प्रिंस ने कहा था कि वह इजरायल को मान्यता देने के पक्ष में हैं, लेकिन उनके पिता यानी सऊदी किंग सलमान के कारण यह निर्णय आगे नहीं बढ़ पा रहा है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अब्राहम अकॉर्ड पर ट्रंप की सक्रियता
    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अब्राहम अकॉर्ड को विस्तार देने की कोशिशों में जुटे हैं। उन्होंने सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों पर इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव बढ़ाया है। ट्रंप का कहना है कि इससे मध्य-पूर्व में शांति की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है।

    अब्राहम अकॉर्ड की शुरुआत 2020 में हुई थी, जब यूएई और बहरीन ने इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने पर सहमति जताई थी। बाद में मोरक्को, सूडान और कुछ अन्य देश भी इसमें शामिल हुए।

    सऊदी अरब का आधिकारिक रुख
    हालांकि सऊदी अरब की ओर से अब तक साफ कर दिया गया है कि जब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा। रियाद का कहना है कि फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान ही किसी भी सामान्यीकरण की पहली शर्त है।

    राजनीतिक बयान और कूटनीतिक दबाव
    माइक इवांस ने दावा किया कि उन्होंने क्राउन प्रिंस के साथ लंबी बातचीत की थी, जिसमें इजरायल को लेकर सकारात्मक संकेत मिले थे। हालांकि इन दावों को लेकर कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है।दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन और उनके सहयोगी लगातार यह तर्क दे रहे हैं कि अब्राहम अकॉर्ड का विस्तार क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग के लिए जरूरी है।