Category: International

  • भारत-नॉर्डिक समिट 2026: ओस्लो में PM मोदी की मौजूदगी से रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार, 5 देशों के साथ बढ़ेगा सहयोग

    भारत-नॉर्डिक समिट 2026: ओस्लो में PM मोदी की मौजूदगी से रणनीतिक साझेदारी को नई रफ्तार, 5 देशों के साथ बढ़ेगा सहयोग


    नई दिल्ली। भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन का तीसरा संस्करण मंगलवार 19 मई 2026 को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाग ले रहे हैं। इस उच्चस्तरीय बैठक में भारत के साथ पांच नॉर्डिक देश नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड और आइसलैंड के शीर्ष नेता शामिल हो रहे हैं। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, रक्षा सहयोग और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना है।

    प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि लगभग 43 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का नॉर्वे दौरा हुआ है। इससे पहले 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नॉर्वे का दौरा किया था। यह समिट पहले 2018 में स्टॉकहोम और 2022 में कोपेनहेगन में हो चुकी बैठकों की अगली कड़ी है, जिसमें लगातार भारत और नॉर्डिक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितताएं बढ़ी हुई हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक व्यापार में बदलावों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति पर भी असर डाला है। ऐसे हालात में नॉर्डिक देशों के साथ भारत की साझेदारी को और महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बैठक में मुख्य रूप से ग्रीन एनर्जी, रिन्यूएबल एनर्जी, डिजिटल इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लीन टेक्नोलॉजी और औद्योगिक सहयोग पर चर्चा होने की उम्मीद है। इसके साथ ही व्यापार बढ़ाने, निवेश को आसान बनाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी एजेंडे में शामिल हैं। भारत और नॉर्डिक देशों के बीच वर्तमान में लगभग 19 अरब डॉलर का व्यापार होता है, जो भविष्य में और बढ़ने की संभावना है।

    नॉर्डिक क्षेत्र की कंपनियों की भारत में मजबूत उपस्थिति है, जिनमें नोकिया, वॉल्वो और IKEA जैसी बड़ी वैश्विक कंपनियां शामिल हैं। वहीं भारत की ओर से फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, आईटी सेवाएं और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, नॉर्डिक देश अपने तकनीकी नवाचार, ग्रीन ट्रांजिशन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट मॉडल के लिए दुनिया में अग्रणी हैं, जो भारत की विकास नीतियों के साथ मेल खाता है।

    कुल मिलाकर यह समिट भारत और नॉर्डिक देशों के बीच न केवल आर्थिक साझेदारी को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक चुनौतियों के बीच एक स्थिर और टिकाऊ सहयोग मॉडल को भी मजबूत करेगा।

  • ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट

    ईरान- अमेरिका तनाव फिर चरम पर, ट्रम्प-नेतन्याहू पर इनाम वाले बिल की चर्चा; पश्चिम एशिया में बढ़ा कूटनीतिक और सैन्य संकट



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की संसद में एक ऐसे बिल पर चर्चा चल रही है, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ कार्रवाई करने वालों को भारी इनाम देने का प्रावधान हो सकता है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक प्रस्ताव स्तर पर है और इस पर अंतिम वोटिंग बाकी है। इस कदम को पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव का और बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के हवाले से सामने आई जानकारी में कहा गया है कि यह प्रस्ताव हाल के सैन्य और राजनीतिक तनावों के जवाब में तैयार किया जा रहा है। कुछ सांसदों ने यह भी संकेत दिया है कि इस पर जल्द ही संसद में मतदान हो सकता है। इसी बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व और सैन्य ढांचे में हालिया घटनाओं को लेकर भी नाराजगी बढ़ी हुई बताई जा रही है, जिससे क्षेत्रीय हालात और संवेदनशील हो गए हैं।

    दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से भी सख्त रुख देखने को मिल रहा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल टाल दिया गया है। ट्रम्प के मुताबिक कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के नेताओं ने बातचीत के लिए कुछ समय देने की अपील की थी, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिका कार्रवाई के लिए तैयार रहेगा।

    इस घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया में तनाव कई मोर्चों पर बढ़ता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बनी हुई है, जहां हजारों नाविकों के साथ बड़ी संख्या में जहाज फंसे होने की रिपोर्ट सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या टकराव से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

    इसी दौरान क्षेत्र में ड्रोन गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं की खबरों ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया है। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था और हवाई रक्षा को और मजबूत किया है। वहीं ईरान ने भी अपने भीतर सुरक्षा और खुफिया गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज स्ट्रेट में नौवहन की स्वतंत्रता किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होनी चाहिए। UN ने सभी पक्षों से संयम बरतने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की अपील की है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर ईरान-अमेरिका संबंधों को तनावपूर्ण मोड़ पर ला दिया है, जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर सैन्य और रणनीतिक तैयारी भी तेज होती दिख रही है।

  • ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार

    ईरान का सख़्त संदेश: सरेंडर नहीं करेंगे, ट्रंप की धमकी पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का पलटवार



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट कहा है कि उनका देश किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का जवाब देते हुए कहा कि बातचीत का मतलब झुकना नहीं होता, बल्कि अपने अधिकारों और गरिमा के साथ चर्चा करना होता है।

    राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ईरान अपनी संप्रभुता और कानूनी अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि देश पूरी मजबूती और सम्मान के साथ बातचीत की प्रक्रिया में शामिल है, लेकिन दबाव या धमकी के आगे नहीं झुकेगा।

    इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि खाड़ी देशों—कतर, सऊदी अरब और यूएई—के नेताओं के अनुरोध पर ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। ट्रंप के अनुसार, इस समय क्षेत्र में शांति समझौते को लेकर गंभीर बातचीत चल रही है, लेकिन अगर डील नहीं होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि किसी भी समझौते में सबसे अहम शर्त यह होगी कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिकी सेना को भी निर्देश दिया है कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार रहें।

    इस बीच ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा था कि समय तेजी से खत्म हो रहा है और अगर जल्द समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। वहीं, दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अभी भी बनी हुई है।

    फिलहाल हालात यह हैं कि एक तरफ अमेरिका दबाव और चेतावनी की रणनीति अपना रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने रुख पर अडिग रहते हुए बातचीत को “सरेंडर नहीं” मानने की बात दोहरा रहा है।

  • भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन

    भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन



    नई दिल्ली। भारत अपनी रणनीतिक समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है, और ब्रिटिश थिंक टैंक IISS की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाली S5 श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियां देश की न्यूक्लियर डिटरेंस क्षमता को एक नए स्तर पर ले जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ये पनडुब्बियां भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को और ज्यादा मजबूत बनाकर दुश्मनों के लिए जवाबी हमला लगभग अटूट बना देंगी।

    भारतीय नौसेना पहले ही INS अरिहंत (S2), INS अरिघात (S3) और हाल ही में शामिल INS अरिदमन (S4) के साथ अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी क्षमता को मजबूत कर चुकी है। इन पनडुब्बियों का काम समुद्र की गहराइयों में छिपकर परमाणु मिसाइलों के जरिए लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता रखना है।

    रिपोर्टों के अनुसार INS अरिदमन का हाल ही में विशाखापत्तनम में कमीशन होना भारत की रणनीतिक शक्ति में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह पनडुब्बी INS अरिहंत और INS अरिघात के साथ मिलकर काम करेगी, जिससे भारत की समुद्री परमाणु शक्ति और मजबूत होगी।

    पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि ये महीनों तक समुद्र में बिना सतह पर आए रह सकती हैं और इन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। इसी वजह से इन्हें किसी भी देश की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” की रीढ़ माना जाता है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला हो तो जवाबी हमला निश्चित रूप से किया जा सकता है।

    डिफेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत का लक्ष्य “Continuous At-Sea Deterrence (CASD)” हासिल करना है, जिसमें हमेशा कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी समुद्र में तैनात रहे। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।

    इसके साथ ही भारत अपनी आगामी S5 श्रेणी की पनडुब्बियों पर भी काम कर रहा है, जिन्हें मौजूदा SSBN से अधिक लंबा, एडवांस और ज्यादा मिसाइल क्षमता वाला बताया जा रहा है। साथ ही विशाखापत्तनम के पास बन रहा ‘आईएनएस वर्षा’ बेस भी इन पनडुब्बियों के संचालन में अहम भूमिका निभाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इन विकासों के बाद भारत की परमाणु त्रिस्तरीय (न्यूक्लियर ट्रायड) क्षमता पूरी तरह मजबूत हो जाएगी, जिससे समुद्र के रास्ते देश की सुरक्षा रणनीति पहले से कहीं अधिक सशक्त बन जाएगी।

  • ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग

    ट्रंप की धमकी के बीच ईरान की बड़ी तैयारी, आम नागरिकों को दी जा रही हथियार चलाने की ट्रेनिंग



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान की सैन्य तैयारियों को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (Islamic Revolutionary Guard Corps) द्वारा देशभर में आम नागरिकों को हथियार चलाने और सैन्य प्रशिक्षण दिए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

    तेहरान सहित कई शहरों में कथित तौर पर सार्वजनिक स्थानों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां महिलाओं, पुरुषों और युवाओं को हथियारों के उपयोग की जानकारी दी जा रही है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि छोटी उम्र के बच्चों को भी प्रतीकात्मक रूप से हथियार चलाने का अभ्यास कराया गया।

    इसके साथ ही ईरानी सरकारी मीडिया से जुड़े कुछ वायरल वीडियो में एंकरों को हथियारों के साथ अभ्यास करते हुए दिखाया गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह घटनाक्रम उस व्यापक भू-राजनीतिक तनाव का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर दबाव बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान अभी भी अनिश्चित स्थिति में है।

    हालांकि इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य गतिविधियों के संकेतों ने वैश्विक स्तर पर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

  • मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल

    मध्यस्थता के बीच बड़ा खुलासा: पाकिस्तान ने सऊदी अरब में तैनात किए 8000 सैनिक, जंग जैसी तैयारी पर सवाल



    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और शांति प्रयासों के बीच पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को लेकर बड़े दावे सामने आए हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत लगभग 8000 सैनिकों की तैनाती की है, जिसमें लड़ाकू विमान, ड्रोन स्क्वाड्रन और वायु रक्षा प्रणाली शामिल हैं।

    सूत्रों के अनुसार इस तैनाती में चीन के सहयोग से विकसित JF-17 Thunder लड़ाकू विमान शामिल हैं, जिनकी संख्या लगभग 16 बताई जा रही है। इसके साथ ही दो ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 Air Defense System भी तैनात की गई है, जिसे पाकिस्तानी कर्मी संचालित कर रहे हैं।

    रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि यह पूरी तैनाती सऊदी अरब के खर्च पर की जा रही है और इसे “युद्ध-सक्षम समर्थन बल” के रूप में देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर और सैनिकों की तैनाती का भी प्रावधान है, जिससे यह संख्या आगे और बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम उस समय उठाया गया है जब पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है और क्षेत्रीय शांति वार्ताओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हालांकि अब तक पाकिस्तान और सऊदी अरब की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

    रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती पश्चिम एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरणों और संभावित संघर्ष की आशंकाओं से जुड़ी हो सकती है।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

    वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित एक बड़े सैन्य हमले को फिलहाल के लिए रोक दिया है। यह हमला मंगलवार को होने वाला था, लेकिन अंतिम समय पर खाड़ी देशों के नेताओं की अपील के बाद इसे टाल दिया गया।

    ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में दोनों पक्षों के बीच गंभीर बातचीत चल रही है, इसलिए सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई ठोस समझौता नहीं होता है तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। इससे पहले ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि अगर वार्ता विफल रहती है तो युद्धविराम के कमजोर होने के बाद स्थिति गंभीर संघर्ष में बदल सकती है।

    जानकारी के मुताबिक, इस संभावित हमले को लेकर अमेरिकी सेना को पहले से तैयार रहने के निर्देश दिए गए थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य अधिकारियों से कहा था कि यदि ईरान के साथ कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तो पल भर के नोटिस पर बड़े सैन्य हमले के लिए तैयार रहें। इससे यह संकेत मिला था कि अमेरिका कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था। हालांकि यह हमला अचानक टाल दिया गया। ट्रंप ने बताया कि यह फैसला मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों—कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अपील के बाद लिया गया है।

    इससे पहले सप्ताहांत में ट्रंप ने ईरान को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के पास समय बहुत कम है और अगर समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है और युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान, अब तक 32 अवॉर्ड

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला अंतर्राष्ट्रीय सम्मान, अब तक 32 अवॉर्ड


    नई दिल्ली। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ है। नॉर्वे ने उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द रॉयल नॉर्वेजियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया है। यह सम्मान नॉर्वे का शीर्ष नागरिक अलंकरण माना जाता है, जो असाधारण सेवा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने में योगदान देने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है।

    इस सम्मान के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी को अब तक मिलने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मानों की संख्या बढ़कर 32 हो गई है। यह उपलब्धि उनके वैश्विक कूटनीतिक और राजनयिक संबंधों में बढ़ते प्रभाव को भी दर्शाती है।

    नॉर्वे के रॉयल हाउस की आधिकारिक व्यवस्था के अनुसार, यह ऑर्डर 1985 में किंग ओलाव V द्वारा स्थापित किया गया था। इसे उन विदेशी और नॉर्वेजियन नागरिकों को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने नॉर्वे या मानवता के हित में उल्लेखनीय योगदान दिया हो।

    प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि यह उनकी नॉर्वे की पहली यात्रा है और पिछले 43 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह देश का पहला दौरा भी है। ओस्लो पहुंचने पर उनका स्वागत नॉर्वे के प्रधानमंत्री और शीर्ष नेतृत्व द्वारा किया गया।

    इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी 19 मई को आयोजित होने वाले तीसरे नॉर्डिक-इंडिया समिट में भाग लेंगे। इस सम्मेलन में भारत और नॉर्डिक देशों डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, स्वीडन और नॉर्वे के बीच सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा होगी।

    यह शिखर सम्मेलन पहले स्टॉकहोम (2018) और कोपेनहेगन (2022) में हो चुके सम्मेलनों की कड़ी का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारत और नॉर्डिक देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करना है।

    विदेश मंत्रालय ने इस दौरे को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि यह भारत और नॉर्वे के बीच व्यापार, निवेश, स्वच्छ ऊर्जा, हरित तकनीक और ब्लू इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा देगा। इसके साथ ही भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच आर्थिक साझेदारी को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। कुल मिलाकर, यह दौरा न केवल भारत-नॉर्वे संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को भी और मजबूत करता है।

  • रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर

    रूसी तेल खरीद पर राहत, भारत की सप्लाई पर नहीं पड़ेगा बड़ा असर


    नई दिल्ली। वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच अमेरिका ने एक अहम कदम उठाते हुए रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंधों में 30 दिनों की अतिरिक्त छूट देने का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार यह राहत उन कच्चे तेल कार्गो पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं, ताकि उनकी सप्लाई बाधित न हो और वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम किया जा सके।

    यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में ऊर्जा संकट और कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि यह “अस्थायी जनरल लाइसेंस” उन देशों के लिए राहत की तरह है, जिनकी ऊर्जा जरूरतें तत्काल हैं और जो समुद्र में फंसे तेल कार्गो पर निर्भर हैं।

    इस बीच भारत ने अपनी स्थिति एक बार फिर स्पष्ट कर दी है कि वह किसी भी अमेरिकी छूट या प्रतिबंध ढांचे पर निर्भर नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय की ज्वाइंट सेक्रेट्री सुजाता शर्मा ने साफ कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना न तो पहले रोका था, न छूट के दौरान रोका और न ही आगे रोकेगा। उनके मुताबिक यह निर्णय पूरी तरह से व्यावसायिक और आर्थिक जरूरतों पर आधारित है।

    सरकारी पक्ष का कहना है कि भारत की प्राथमिकता देश में ईंधन आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या मूल्य वृद्धि का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर न पड़े। हाल के समय में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत में तेल कंपनियों पर दबाव बना हुआ है, जिससे प्रतिदिन करोड़ों रुपये के नुकसान की स्थिति भी बनी हुई है।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से किसी भी तरह की सप्लाई बाधा देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर सीधा असर डाल सकती है। इसी कारण रूस से कच्चे तेल की खरीद को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

    आंकड़ों के अनुसार, भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और यह निर्भरता लगातार बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन में गिरावट और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती मांग ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। ऐसे में आयातित तेल देश की ऊर्जा व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    कुल मिलाकर, जहां अमेरिका वैश्विक बाजार को स्थिर रखने के लिए अस्थायी राहत दे रहा है, वहीं भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उसकी ऊर्जा नीति पूरी तरह घरेलू जरूरतों और आर्थिक वास्तविकताओं पर आधारित रहेगी।

  • पाकिस्तान-बांग्लादेश की बढ़ती सैन्य नजदीकी से भारत सतर्क, ढाका को मिला JF-17 फाइटर सिम्युलेटर

    पाकिस्तान-बांग्लादेश की बढ़ती सैन्य नजदीकी से भारत सतर्क, ढाका को मिला JF-17 फाइटर सिम्युलेटर



    नई दिल्ली। पाकिस्तान ने बांग्लादेश को JF-17 थंडर ब्लॉक-III लड़ाकू विमान का फुल-स्केल फाइटर सिम्युलेटर सौंप दिया है। इसे दोनों देशों के बीच संभावित फाइटर जेट डील की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस घटनाक्रम से भारत की पूर्वी सीमा पर रणनीतिक चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिम्युलेटर बांग्लादेशी पायलटों को JF-17 विमान उड़ाने की एडवांस ट्रेनिंग देने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। माना जा रहा है कि पाकिस्तान भविष्य में बांग्लादेश को JF-17 ब्लॉक-III लड़ाकू विमान बेचने की तैयारी कर रहा है। दोनों देशों के बीच यह सैन्य सहयोग ऐसे समय बढ़ रहा है, जब दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन को लेकर नई हलचल देखी जा रही है।

    विश्लेषकों का कहना है कि केवल सिम्युलेटर की डिलीवरी को सामान्य तकनीकी सहयोग नहीं माना जा सकता। इसे संभावित रक्षा समझौते की शुरुआती तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। मई 2026 में ढाका में पाकिस्तान और बांग्लादेश की वायु सेनाओं के बीच पहली औपचारिक एयर स्टाफ वार्ता हुई थी। इसी बैठक के बाद सिम्युलेटर सौंपे जाने की प्रक्रिया तेज हुई।

    बैठक में पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व एयर मार्शल स्तर के वरिष्ठ अधिकारियों ने किया था। इसमें ऑपरेशनल डिप्टी चीफ ऑफ एयर स्टाफ और स्ट्रेटेजिक कमांड से जुड़े अधिकारी भी शामिल थे। रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इतने बड़े सैन्य प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान-बांग्लादेश रक्षा सहयोग अब औपचारिक कूटनीति से आगे बढ़ चुका है।

    सूत्रों के अनुसार, बांग्लादेश शुरुआत में 16 से 24 JF-17 लड़ाकू विमान खरीद सकता है। इस डील की अनुमानित कीमत 400 से 700 मिलियन डॉलर के बीच बताई जा रही है। भविष्य में यह संख्या बढ़ाकर 48 विमान तक की जा सकती है। अगर यह समझौता पूरा होता है तो बांग्लादेश की वायुसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होगा।

    JF-17 थंडर ब्लॉक-III पाकिस्तान और चीन द्वारा संयुक्त रूप से विकसित मल्टीरोल फाइटर जेट है। इसमें आधुनिक AESA रडार, लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता और एडवांस एवियोनिक्स सिस्टम लगाए गए हैं। पाकिस्तान इसे अपने सबसे आधुनिक लड़ाकू विमानों में शामिल करता है।

    सिम्युलेटर असल फाइटर जेट के कॉकपिट जैसा होता है, जिसमें कंट्रोल सिस्टम, HUD डिस्प्ले और वर्चुअल युद्ध जैसी स्थितियां बनाई जाती हैं। इससे पायलट बिना असली विमान उड़ाए युद्ध अभ्यास और आपातकालीन हालात की ट्रेनिंग ले सकते हैं। इससे समय और लागत दोनों की बचत होती है।

    भारत के रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ती सैन्य साझेदारी पर भारत की नजर बनी रहेगी। खासतौर पर पूर्वी मोर्चे पर किसी भी नई सैन्य गतिविधि को सुरक्षा एजेंसियां गंभीरता से देख रही हैं।

    पाकिस्तान ने बांग्लादेश को JF-17 फाइटर जेट का फुल-स्केल सिम्युलेटर सौंपकर दोनों देशों के रक्षा संबंधों को नई मजबूती दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि संभावित फाइटर जेट डील से भारत की पूर्वी सीमा पर रणनीतिक चुनौती बढ़ सकती है।