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  • ताइवान में तूफान चांपी से जनजीवन ठप…. 931 उड़ानें रद्द, स्कूलों से लेकर शेयर बाजार तक बंद

    ताइवान में तूफान चांपी से जनजीवन ठप…. 931 उड़ानें रद्द, स्कूलों से लेकर शेयर बाजार तक बंद


    ताइपे।
    ताइवान (Taiwan) में तूफान चांपी (Cyclone Champi) के खतरे को देखते हुए शुक्रवार को लगभग पूरे द्वीप पर जनजीवन ठप हो गया। तूफान कमजोर जरूर पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद ताइवान पर सीधे टकराने का खतरा बना हुआ है। तेज हवाओं (Strong Winds) और मूसलाधार बारिश (Torrential Rain) की आशंका के बीच अधिकारियों ने एहतियाती कदम उठाए हैं। अब तक तूफान के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई है, जबकि 94 लोग घायल हुए हैं। सरकार के मुताबिक, पहाड़ी इलाकों से करीब 1,300 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।

    तूफान के चलते हवाई यातायात पर व्यापक असर पड़ा है। ताइवान के परिवहन मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को सभी 262 घरेलू उड़ानें रद्द कर दी गईं। इसके अलावा 669 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी रद्द करनी पड़ीं। हालांकि, उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाली हाई-स्पीड रेल सेवा सामान्य रूप से चल रही थी। राजधानी ताइपे में बारिश के बीच मेट्रो समेत सार्वजनिक परिवहन सेवाएं भी जारी रहीं, लेकिन उनमें कटौती की गई।

    तूफान के खतरे को देखते हुए ताइवान के वित्तीय बाजार भी शुक्रवार को बंद रहे। चीन के तट के पास स्थित ताइवान के नियंत्रण वाले किनमेन द्वीप समूह में ही स्कूल और कार्यालय सामान्य रूप से खुले रहने थे।


    191 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहीं हवाएं

    ताइवान के केंद्रीय मौसम प्रशासन के मुताबिक, तूफान चांपी के केंद्र के आसपास हवा के झोंकों की रफ्तार करीब 191 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच रही थी। यह तूफान एक समय सुपर टाइफून की श्रेणी में था और इस साल प्रशांत महासागर में आए सबसे शक्तिशाली तूफानों में शामिल रहा है।

    मौसम विभाग के अनुसार, तूफान ताइवान के दक्षिणी छोर से करीब 320 किलोमीटर पूर्व में था। अनुमान है कि यह ताइवान के पूर्वोत्तर तट के पास से गुजरने के बाद उत्तर की ओर मुड़ेगा और चीन के तट की दिशा में बढ़ते हुए अंततः दक्षिणी जापान की ओर चला जाएगा।

    हालांकि, ताइवान के मौसम विभाग के पूर्वानुमानकर्ता लियू पेई-तेंग ने कहा कि तूफान के सीधे ताइवान से टकराने की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। अगर यह आगे बढ़ने के बजाय एक जगह ठहरता है, चक्कर लगाता है या अपना रास्ता बदलता है, तो इसके ताइवान में दस्तक देने की संभावना बनी रहेगी।


    तूफान का दायरा बड़ा, दो दिन तक रह सकता है असर

    मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, चांपी का दायरा करीब 320 किलोमीटर है। इसका विस्तार इतना बड़ा है कि यह ताइवान के ज्यादातर हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि तूफान का असर करीब दो दिनों तक रह सकता है।

    लियू पेई-तेंग ने कहा कि हाल के वर्षों के बड़े तूफानों की तुलना में चांपी का हवा का दायरा काफी व्यापक है। अगर इसकी गति धीमी पड़ती है, तो ताइवान में तेज हवाओं का असर लंबे समय तक बना रह सकता है।


    तटीय इलाकों में अलर्ट, पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश का अनुमान

    ताइवान के तटीय कस्बों में मोबाइल फोन के जरिए अलर्ट भेजे गए। लोगों को 150 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक रफ्तार वाले हवा के झोंकों के प्रति आगाह करते हुए तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई। ताइपे के आसपास समेत उत्तरी पहाड़ी इलाकों में करीब एक मीटर तक बारिश होने का अनुमान जताया गया है।

    पूर्वोत्तर ताइवान के यिलान काउंटी में तेज हवाओं और भारी बारिश का असर बढ़ने लगा था। यहां अधिकारियों ने लोगों को सुरक्षित रखने के लिए रेत से भरी बोरियां बांटीं। साथ ही, उभयचर वाहनों और हवा भरकर इस्तेमाल की जाने वाली बचाव नौकाओं को तैयार रखा गया।

    सुआओ बंदरगाह कस्बे के प्रमुख ली मिंग-चेन ने कहा कि जरूरत पड़ने पर सेना की मदद ली जाएगी। लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और आपदा राहत कार्यों के लिए उभयचर वाहनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।


    जापान के ओकिनावा की ओर भी बढ़ सकता है तूफान

    पूर्वानुमान के मुताबिक, चांपी सबसे पहले जापान के ओकिनावा प्रांत के सबसे पश्चिमी आबादी वाले द्वीप योनागुनी के ऊपर से गुजर सकता है। इसके बाद तूफान के आगे बढ़ने की दिशा पर नजर रखी जा रही है।

    ताइवान में आमतौर पर तूफानों से निपटने की अच्छी तैयारी रहती है, जिससे जनहानि सीमित रखने में मदद मिलती है। हालांकि, ऐसे तूफान गर्मियों में ज्यादा आम हैं, लेकिन शरद ऋतु में भी इनका असर देखने को मिल सकता है।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत की दोटूक, सुरक्षा परिषद में सुधार क्यों अटका, पाकिस्तान समेत कुछ देशों पर उठाए सवाल

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की दोटूक, सुरक्षा परिषद में सुधार क्यों अटका, पाकिस्तान समेत कुछ देशों पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर भारत ने एक बार फिर मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि करीब 80 साल पहले हुए द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के आधार पर आज की दुनिया का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सुरक्षा परिषद की संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और देशों का उचित प्रतिनिधित्व हो। भारत ने इस मुद्दे पर सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट मसौदा तैयार करने समयसीमा तय करने और बातचीत की दिशा निर्धारित करने की मांग की है।

    पी. हरीश ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीयों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय करीब 25 लाख भारतीयों ने युद्ध में हिस्सा लिया था और लगभग 90 हजार भारतीय सैन्य सेवा के दौरान मारे गए थे। उन्होंने बंगाल के भीषण अकाल का भी जिक्र किया और कहा कि औपनिवेशिक युद्ध नीतियों से जुड़ी परिस्थितियों के बीच 40 लाख से अधिक लोगों की जान गई थी। उनके मुताबिक इतिहास के इन पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। भारत का तर्क है कि वैश्विक संस्थाओं की मौजूदा व्यवस्था में उन देशों और लोगों के योगदान को भी महत्व मिलना चाहिए जिन्होंने युद्ध के दौरान भारी कीमत चुकाई थी।

    भारत की आपत्ति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों को मिले विशेष अधिकारों और मौजूदा प्रतिनिधित्व व्यवस्था को लेकर है। वर्ष 1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार दिया गया था। इस अधिकार के तहत कोई स्थायी सदस्य सुरक्षा परिषद के कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों को रोक सकता है। भारत का मानना है कि दशकों पुरानी व्यवस्था को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप बदलने की जरूरत है। हरीश ने कहा कि पुराने युद्ध में जीत के आधार पर बने विशेषाधिकार ऐसी सुरक्षा परिषद की वैधता से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे सकते जिसमें दुनिया का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

    सुरक्षा परिषद में सुधार की बातचीत को लेकर भारत ने कुछ देशों के समूह पर भी आपत्ति जताई है। पी. हरीश के अनुसार इटली के नेतृत्व वाला यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस समूह सुधार प्रक्रिया में आगे बढ़ने के लिए जरूरी मसौदा तैयार करने की दिशा में बाधा डाल रहा है। पाकिस्तान भी इस समूह का सदस्य है। इस समूह का रुख सुरक्षा परिषद के विस्तार और स्थायी सदस्यता के विभिन्न प्रस्तावों को लेकर भारत की मांग से अलग है। भारत चाहता है कि सुधार पर चर्चा को अनिश्चितकाल तक खींचने के बजाय उसे ठोस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाए।

    भारत की मुख्य आपत्ति इस बात पर है कि मसौदा तैयार करने से पहले ही आम सहमति की शर्त पर जोर दिया जा रहा है। हरीश का कहना है कि बहुपक्षीय वार्ताओं में सामान्य तौर पर पहले एक लिखित मसौदा तैयार किया जाता है और फिर उस पर बातचीत के जरिए मतभेदों को दूर करने की कोशिश होती है। भारत सवाल उठा रहा है कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए होने वाली अंतर सरकारी वार्ता की प्रक्रिया दूसरी बहुपक्षीय वार्ताओं से अलग क्यों होनी चाहिए।

    भारत ने मांग की है कि सुधार प्रक्रिया के लिए लिखित मसौदा सामने लाया जाए और बातचीत की समयसीमा तथा दिशा स्पष्ट की जाए। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार और अपने लिए स्थायी सीट की मांग करता रहा है। उसका कहना है कि आज की वैश्विक व्यवस्था में एशिया अफ्रीका और लैटिन अमेरिका सहित विभिन्न क्षेत्रों को बेहतर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में आगे की बातचीत और देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिशें इस मुद्दे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगी।

  • बेटी के लिए पिता ने लिया कर्ज, विदेश में मिली मौत, स्वीटी अख्तर की फांसी से सदमे में परिवार

    बेटी के लिए पिता ने लिया कर्ज, विदेश में मिली मौत, स्वीटी अख्तर की फांसी से सदमे में परिवार


    नई दिल्ली। बांग्लादेश की रहने वाली स्वीटी अख्तर की कहानी संघर्ष और दर्द से भरी है। अपनी नौ साल की बेटी का भविष्य बेहतर बनाने और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए वह सऊदी अरब गई थी। उसे उम्मीद थी कि विदेश में नौकरी करके वह अपनी बेटी को अच्छी जिंदगी दे सकेगी और परिवार को गरीबी से बाहर निकाल पाएगी। लेकिन जिस सपने को पूरा करने के लिए उसने अपना घर छोड़ा था वही सपना उसकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक अध्याय बन गया। सऊदी अरब में काम करने वाली स्वीटी को व्यभिचार के आरोपों में मौत की सजा दे दी गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि फांसी से ठीक एक दिन पहले उसकी अपने पिता से बातचीत हुई थी लेकिन उस दौरान उसने परिवार को अपनी सजा के बारे में कुछ नहीं बताया था।

    स्वीटी अख्तर मध्य बांग्लादेश के तंगाइल जिले के मिर्जापुर उपजिला के नगर छावली गांव की रहने वाली थी। उसके पिता फजल मिया दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और मां का नाम जोहोरा बेगम है। पांच बहनों में सबसे छोटी स्वीटी की जिंदगी बचपन से ही मुश्किलों से घिरी रही। जब वह आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी तभी उसकी शादी कर दी गई थी। पहली शादी टूटने के बाद वह अपनी बेटी को लेकर मायके लौट आई। परिवार के दबाव में उसने दूसरी शादी की लेकिन दूसरा पति भी उसे छोड़कर चला गया। लगातार टूटते रिश्तों और आर्थिक परेशानियों ने उसे विदेश में नौकरी तलाशने के लिए मजबूर कर दिया।

    परिवार ने स्वीटी को सऊदी अरब भेजने के लिए करीब डेढ़ लाख टका का कर्ज लिया था। मार्च 2023 में वह एक पंजीकृत भर्ती एजेंसी के माध्यम से सऊदी अरब पहुंची और मक्का की ग्रैंड मस्जिद में सफाईकर्मी के तौर पर काम करने लगी। शुरुआती पांच से छह महीनों तक वह घर पैसे भेजती रही। इससे परिवार को उम्मीद जगी कि अब उनकी परेशानियां कम होंगी और बेटी का भविष्य सुरक्षित हो सकेगा। लेकिन कुछ समय बाद पैसे आने बंद हो गए। परिवार को बाद में पता चला कि स्वीटी को जेल में बंद कर दिया गया है।

    मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक स्वीटी को 2 अगस्त 2023 को व्यभिचार के आरोपों में हिरासत में लिया गया था। उसके साथ काम करने वाले बांग्लादेशी नागरिक नाजरुल इस्लाम अब्दुल बासिर को भी गिरफ्तार किया गया था। स्वीटी को जेद्दा की महिला जेल में रखा गया। हालांकि उसने अपने पिता को गिरफ्तारी की अलग वजह बताई थी। उसके परिवार को आशंका थी कि उसे गलत तरीके से मामले में फंसाया गया है। इन आरोपों और मामले की परिस्थितियों को लेकर परिवार के पास पूरी जानकारी नहीं थी।

    जेल में रहने के दौरान स्वीटी कभी हर सप्ताह तो कभी एक महीने के अंतराल पर अपने घर फोन करती थी। परिवार को मालूम था कि वह जेल में है लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि मामला इतना गंभीर हो चुका है। उसके पिता के मुताबिक 13 अक्टूबर को मगरिब की नमाज के बाद उनकी बेटी से आखिरी बार बात हुई थी। बातचीत के दौरान स्वीटी ने न तो मुकदमे का जिक्र किया और न ही मौत की सजा की आशंका जताई। परिवार को उम्मीद थी कि वह जल्द जेल से बाहर आ जाएगी।

    14 अक्टूबर को सऊदी अरब में स्वीटी अख्तर और नाजरुल इस्लाम को फांसी दिए जाने की घोषणा हुई। परिवार को इसकी जानकारी सीधे अधिकारियों से नहीं मिली बल्कि एक फेसबुक वीडियो के जरिए मौत की खबर सामने आई। बांग्लादेश के राजनयिक मिशन ने भी कहा था कि उसे फांसी से पहले इसकी सूचना नहीं दी गई। बाद में बांग्लादेश ने न्यायिक फैसलों की प्रतियां और मामले से जुड़ी जानकारी मांगी।

    स्वीटी की मां अपनी बेटी का शव बांग्लादेश वापस लाने की गुहार लगा रही हैं ताकि वह आखिरी बार उसका चेहरा देख सकें। जिस परिवार ने कर्ज लेकर उसे बेहतर जिंदगी की उम्मीद में विदेश भेजा था वह अब गहरे सदमे में है। पीछे छूट गई उसकी छोटी बेटी और परिवार के लिए यह घटना ऐसा दर्द बन गई है जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।

  • लाल सागर में 14 भारतीयों को ले जा रही नाव पर सऊदी हवाई हमले का दावा, हूतियों ने शुरू किया बचाव अभियान

    लाल सागर में 14 भारतीयों को ले जा रही नाव पर सऊदी हवाई हमले का दावा, हूतियों ने शुरू किया बचाव अभियान

    नई दिल्ली । लाल सागर में 14 भारतीय नागरिकों को ले जा रही एक नाव पर सऊदी अरब की ओर से हवाई हमला किए जाने का दावा सामने आया है। यमन के हूती विद्रोहियों के सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सरी ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि जुकर द्वीप के पास एक भारतीय नौका को निशाना बनाया गया। हूती पक्ष के अनुसार, घटना की जानकारी मिलने के बाद नाव पर सवार लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया है। हालांकि, हमले की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और नाव पर मौजूद भारतीयों की मौजूदा स्थिति को लेकर भी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने दावा किया कि सऊदी अरब ने लाल सागर में जुकर द्वीप के नजदीक इस नाव पर हवाई हमला किया। उनके मुताबिक, नौका पर 14 भारतीय नागरिक सवार थे। उन्होंने कहा कि घटना की सूचना मिलने के बाद हूती बलों की बचाव टीमों को सक्रिय किया गया, जो कथित तौर पर नाव में मौजूद लोगों को सुरक्षित निकालने की कोशिश कर रही हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सभी भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं या हमले में किसी को चोट पहुंची है।

    इस घटना को लेकर सऊदी अरब प्रशासन या सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन की ओर से हमले की पुष्टि अथवा खंडन किए जाने की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए फिलहाल इसे हूती विद्रोहियों की ओर से किया गया दावा माना जा रहा है। भारतीय नागरिकों की संख्या और उनकी स्थिति की पुष्टि के लिए आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

    जिस इलाके में कथित हमले की बात कही गई है, वह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के करीब स्थित है। लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से बेहद अहम है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में वैश्विक माल और ऊर्जा संसाधनों का परिवहन होता है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी सैन्य कार्रवाई की खबर से समुद्री सुरक्षा और जहाजों की आवाजाही को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

    हूती प्रवक्ता ने कथित हमले की निंदा करते हुए सऊदी अरब पर गैर-जिम्मेदाराना सैन्य कार्रवाई करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि इस तरह की घटनाएं लाल सागर में सामान्य नौकाओं और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं। हूती पक्ष ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों से मामले पर ध्यान देने तथा ऐसी सैन्य कार्रवाइयों को रोकने के लिए दबाव बनाने की अपील भी की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

    लाल सागर और यमन के आसपास का समुद्री क्षेत्र लंबे समय से क्षेत्रीय संघर्ष और सैन्य गतिविधियों के कारण संवेदनशील बना हुआ है। यहां किसी भी संभावित हमले का असर केवल स्थानीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन और व्यापार पर भी पड़ सकता है। जुकर द्वीप के पास भारतीय नागरिकों को ले जा रही नाव पर हमले का दावा इसी कारण चिंता का विषय बन गया है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल नाव पर सवार बताए जा रहे 14 भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बचाव अभियान चलाए जाने का दावा किया गया है, लेकिन उसके नतीजों का विवरण सामने नहीं आया है। भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से मामले की पुष्टि, नागरिकों की पहचान और उनकी स्थिति को लेकर कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी उपलब्ध होने तक घटना से जुड़े दावों को सावधानी से देखना जरूरी है।

  • फ्रांस में हिंसक प्रदर्शनों और कर्फ्यू के बीच भारतीय दूतावास की एडवाइजरी, नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह

    फ्रांस में हिंसक प्रदर्शनों और कर्फ्यू के बीच भारतीय दूतावास की एडवाइजरी, नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह


    नई दिल्ली ।
    फ्रांस में जारी हिंसक प्रदर्शनों और कई शहरों में लगाए गए कर्फ्यू के बीच पेरिस स्थित भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है। इसमें फ्रांस में रह रहे भारतीयों और वहां यात्रा की योजना बना रहे लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। दूतावास ने नागरिकों से प्रदर्शन स्थलों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों से दूर रहने तथा स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की अपील की है। साथ ही, बदलते हालात पर नजर रखने के लिए स्थानीय समाचारों और फ्रांस सरकार की आधिकारिक वेबसाइट से जानकारी लेते रहने को कहा गया है।

    दूतावास की सलाह के अनुसार, भारतीय नागरिकों को ऐसे स्थानों पर जाने से बचना चाहिए, जहां प्रदर्शन हो रहे हैं या बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हैं। विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और पुलिस के साथ झड़पों की घटनाओं को देखते हुए सावधानी बरतने पर जोर दिया गया है। नागरिकों से अपील की गई है कि वे स्थानीय अधिकारियों की ओर से जारी निर्देशों का पालन करें और परिस्थितियों के अनुसार अपनी आवाजाही तय करें।

    फ्रांस में स्थिति से संबंधित आधिकारिक जानकारी के लिए नागरिक gouvernement.fr वेबसाइट देख सकते हैं। किसी आपात स्थिति में भारतीय नागरिक पेरिस स्थित भारतीय दूतावास या मार्सिले स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास से संपर्क कर सकते हैं। एडवाइजरी में बदलते हालात के बीच सूचनाओं की नियमित निगरानी और सतर्कता को महत्वपूर्ण बताया गया है।

    फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों का दायरा बढ़ने के बीच विभिन्न संगठनों ने आगे भी आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है। प्रमुख छात्र संघों और येलो वेस्ट आंदोलन ने शनिवार को रैलियां निकालने का आह्वान किया है। येलो वेस्ट आंदोलन इससे पहले वर्ष 2018 और 2019 में ईंधन की बढ़ती कीमतों के विरोध में बड़े प्रदर्शन कर चुका है। उस समय आंदोलन का प्रभाव फ्रांस के कई हिस्सों में देखने को मिला था।

    इसके अलावा, ट्रेड यूनियनों ने महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती के विरोध में 5 नवंबर को हड़ताल का ऐलान किया है। इससे आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों और जन आंदोलनों की गतिविधियां जारी रहने की संभावना बनी हुई है। हालांकि, इन कार्यक्रमों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की ओर से उठाए जाने वाले कदमों की स्थिति स्थानीय निर्देशों पर निर्भर करेगी।

    प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा के बाद अधिकारियों ने कई शहरों में प्रतिबंधात्मक कदम उठाए हैं। 17 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़कने के बाद पेरिस के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लगाया गया। लिली, लियोन और नीस में भी स्थानीय स्तर पर कर्फ्यू लागू किए जाने की जानकारी सामने आई, जबकि मार्सिले में सभाओं और प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई गईं। इन कदमों का उद्देश्य प्रभावित इलाकों में व्यवस्था बनाए रखना बताया गया है।

    हिंसा के दौरान गिरफ्तारियों और पुलिसकर्मियों के घायल होने की भी खबरें सामने आई हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, सप्ताहांत में हुई घटनाओं के दौरान हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया और सैकड़ों पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना मिली। हालांकि, इन आंकड़ों की विस्तृत आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।

    फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत सितंबर के अंतिम दिनों में छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी बताई गई है। छात्रों ने स्कूलों की खराब स्थिति, संसाधनों की कमी और कक्षाओं में बढ़ती भीड़भाड़ के खिलाफ विरोध शुरू किया था। बाद में आंदोलन का दायरा बढ़ा और महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत तथा सार्वजनिक सेवाओं से संबंधित चिंताएं भी इसमें शामिल हो गईं। विभिन्न स्थानों पर लूटपाट, आगजनी और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की घटनाएं सामने आने के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई।

    ऐसे हालात में भारतीय नागरिकों के लिए दूतावास की एडवाइजरी महत्वपूर्ण है। फ्रांस में मौजूद भारतीयों और वहां जाने की तैयारी कर रहे यात्रियों को स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी लेते रहने, संवेदनशील स्थानों से बचने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है।

  • पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नोबेल पुरस्कार के बाद अब पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर भी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने दावा किया कि लेखन के क्षेत्र में उनके काम के लिए उन्हें पुलित्जर सम्मान मिलना चाहिए था। बुधवार को दक्षिण कैरोलिना में आयोजित एक रैली के दौरान उन्होंने यह बात कही। इस मौके पर ट्रंप ने रूस से जुड़े मामलों की जांच पर रिपोर्टिंग करने वाले उन पत्रकारों की भी आलोचना की, जिन्हें पुलित्जर पुरस्कार दिया गया था। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर इस दावे को लेकर चर्चा शुरू हो गई और कई यूजर्स ने उनकी लेखन क्षमता पर सवाल उठाए।

    ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके साथ ही उन्होंने लेखन के लिए पुलित्जर पुरस्कार पर भी अपना दावा जताया। उनका आरोप था कि रूस से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाले जिन पत्रकारों को यह सम्मान दिया गया, उनकी रिपोर्टिंग गलत थी। ट्रंप के मुताबिक, ऐसे पत्रकारों को पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए था।

    रूस से संबंधित जांच और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग पहले भी अमेरिकी राजनीति में विवाद का विषय रही है। इस बार ट्रंप ने पुरस्कार विजेता पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए सम्मान के फैसले की आलोचना की। हालांकि, उनके बयान में रिपोर्टिंग की किन विशिष्ट खबरों या तथ्यों को गलत बताया गया, इसका विस्तृत विवरण नहीं दिया गया।

    ट्रंप अब तक 19 किताबें लिख चुके हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘द आर्ट ऑफ द डील’ शामिल है। इस पुस्तक के जरिए वह कारोबारी दुनिया में अपनी पहचान और व्यावसायिक अनुभवों को सामने रख चुके हैं। पुलित्जर पुरस्कार के लिए अपना दावा पेश करते समय उन्होंने अपने लेखन का उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस पुस्तक या रचना के आधार पर इस सम्मान के हकदार होने की बात कर रहे थे।

    उनके बयान पर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूजर्स ने ट्रंप की लेखन क्षमता को लेकर व्यंग्य किया। एक यूजर ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति बच्चों की किताब तक नहीं लिख सकता, वह पुलित्जर पुरस्कार पाने की उम्मीद कैसे कर सकता है। एक अन्य यूजर ने उनके अंग्रेजी लिखने और बोलने के तरीके पर तंज कसते हुए कहा कि उनके वाक्यों को समझने के लिए खोजी दल की जरूरत पड़ सकती है। ये प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर उनके दावे को लेकर होने वाली आलोचना का हिस्सा रहीं।

    पुलित्जर पुरस्कार को दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है। यह मुख्य रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए दिया जाता है, लेकिन इसका दायरा केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। साहित्य, नाटक और संगीत के क्षेत्र में भी इस पुरस्कार के तहत सम्मान प्रदान किए जाते हैं। इसकी प्रतिष्ठा के कारण इसे कई बार पत्रकारिता के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जैसी अहमियत वाला सम्मान भी कहा जाता है।

    ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब वह पहले भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध रुकवाने का श्रेय लेते हुए नोबेल पुरस्कार के लिए अपनी दावेदारी का उल्लेख किया है। अब पुलित्जर पुरस्कार को लेकर दिए गए बयान में भी उन्होंने अपने काम को सम्मान के योग्य बताया और पूर्व में सम्मानित पत्रकारों की आलोचना की।

    हालांकि, किसी पुरस्कार के लिए पात्रता और चयन का फैसला संबंधित पुरस्कार संस्था के नियमों तथा निर्णायक प्रक्रिया के आधार पर होता है। ट्रंप के बयान से उनकी व्यक्तिगत अपेक्षा सामने आती है, जबकि रूस से जुड़ी रिपोर्टिंग और पुरस्कार विजेताओं के काम को लेकर उठाए गए उनके सवालों का आकलन संबंधित खबरों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

  • भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं, व्यापार समझौते पर भी नजरें

    नई दिल्ली । भारत और एस्टोनिया के बीच डिजिटल सेवाओं, तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। भारत में एस्टोनिया की राजदूत क्रिस्टी कारेलसोहन ने 21 अक्टूबर 2026 को कहा कि दोनों देशों के बीच खासकर सेवा क्षेत्र में व्यावसायिक संबंधों को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौता इस साल के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इस समझौते से कारोबार में आने वाली कई बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।

    कारेलसोहन ने कहा कि एस्टोनिया की कंपनियां भारतीय कंपनियों की तुलना में आकार में अपेक्षाकृत छोटी हैं। देश में बड़े पैमाने पर विनिर्माण भी सीमित है। ऐसे में भारत जैसे विशाल बाजार में बड़े स्तर पर वस्तुओं का व्यापार और निर्यात करना एस्टोनियाई कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एस्टोनिया का घरेलू बाजार भी छोटा है, इसलिए वहां की कंपनियों के लिए भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने के लिए उपयुक्त क्षेत्रों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

    राजदूत के मुताबिक, एस्टोनिया की कंपनियों की प्रमुख ताकत सेवाओं के क्षेत्र में है। डिजिटल सेवाओं, तकनीकी समाधान और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच साझेदारी की अच्छी संभावनाएं हैं। इन क्षेत्रों में भारतीय बाजार की जरूरतों के अनुरूप सेवाएं और समाधान उपलब्ध कराकर व्यावसायिक संबंधों को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि एस्टोनिया की कंपनियां इन क्षेत्रों में आगे विकास और सहयोग की संभावनाएं तलाश रही हैं।

    वस्तुओं के व्यापार के संबंध में उन्होंने बताया कि एस्टोनिया की कुछ कंपनियां भारत में लकड़ी से बने उत्पाद, खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति करती हैं। देश में कुछ उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमतें प्रतिस्पर्धी स्तर पर नहीं होतीं। इसके बावजूद गुणवत्ता को प्राथमिकता देने वाले ग्राहकों के बीच ऐसे उत्पादों की मांग हो सकती है। इस वजह से भारत में एस्टोनिया के उत्पादों के लिए सीमित लेकिन संभावित बाजार मौजूद है।

    भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को भी उन्होंने महत्वपूर्ण बताया। एस्टोनिया यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों में शामिल है। कारेलसोहन ने उम्मीद जताई कि समझौता वर्ष 2026 के अंत तक लागू हो सकता है। उनके अनुसार, इससे मौजूदा सीमा शुल्क में कमी लाने के साथ-साथ गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करने में भी मदद मिल सकती है। ऐसी बाधाएं विशेष रूप से छोटी कंपनियों के लिए दूसरे देशों के बाजारों में कारोबार करना कठिन बनाती हैं।

    राजदूत ने कहा कि भारत एस्टोनिया के लिए व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण बाजार है। कई देशों की तरह एस्टोनिया की भी प्राथमिकता भारत के साथ व्यावसायिक संबंधों को मजबूत करना है। वह दोनों देशों के बीच व्यापारिक संपर्कों को और विकसित करना चाहती हैं। भारत का बड़ा बाजार एस्टोनियाई कंपनियों के लिए अपनी सेवाओं और उत्पादों की पहुंच बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

    कुल मिलाकर, भारत और एस्टोनिया के बीच सहयोग की संभावनाएं केवल पारंपरिक वस्तु व्यापार तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल सेवाएं, तकनीक और साइबर सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दोनों देशों के व्यावसायिक संबंध आगे बढ़ सकते हैं। प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से भी कारोबार की परिस्थितियों में बदलाव आने की उम्मीद है। हालांकि, समझौते के लागू होने और उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन आगे होने वाले निर्णयों तथा व्यापारिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।

  • मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?

    मैक्रों का ट्रंप-नेतन्याहू पर हमला, बोले- फ्रांस की कीमत पर चला रहे सियासी अभियान; क्या है पूरा विवाद?


    दोहा।
    फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बयानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। मैक्रों ने आरोप लगाया कि विदेशी नेता फ्रांस के हालात का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से तैयार फर्जी तस्वीरों के जरिए गलत सूचनाएं फैलाए जाने पर भी सवाल उठाए। दूसरी ओर, ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया, जबकि नेतन्याहू ने इसे ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताते हुए फ्रांसीसी सरकार की आलोचना की। घटनाओं के बाद फ्रांस के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है और कुछ स्थानों पर कर्फ्यू भी लगाया गया है।

    मैक्रों ने विदेशी नेताओं को क्या कहा?

    फ्रांस में हालिया हिंसा को लेकर ट्रंप और नेतन्याहू की टिप्पणियों के बीच मैक्रों ने विदेशी नेताओं की आलोचना की। बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि कुछ नेता फ्रांस की कीमत पर अपना राजनीतिक अभियान चला रहे हैं।

    मैक्रों ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि अटलांटिक के इस पार और उस पार, दोनों तरफ के नेता चुनावी अभियान की मुद्रा में हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग फ्रांस की कीमत पर अपना अभियान चलाते हैं। इनमें ऐसे नेता भी हैं, जो यहां इस क्षेत्र में या अटलांटिक की दूसरी तरफ अपने राजनीतिक अभियान में जुटे हैं।”

    मैक्रों तीन दिवसीय कतर और खाड़ी क्षेत्र की यात्रा पर हैं। उनकी इस यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य फ्रांस में जीवनयापन की बढ़ती लागत के संकट के बीच देश की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करना भी है।

    ट्रंप ने फ्रांस के हालात के लिए किसे ठहराया जिम्मेदार?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को फ्रांस में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा के लिए आव्रजन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दावा किया कि पेरिस जल्द ही एक मुस्लिम शहर बन जाएगा। ट्रंप ने फ्रांस की सीमाएं बंद नहीं करने को लेकर मैक्रों की आलोचना भी की।

    व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि फ्रांस में जो कुछ हो रहा है, उसका संबंध स्कूलों या किसी दूसरी समस्या से नहीं, बल्कि आव्रजन से है। उन्होंने मैक्रों को अपना दोस्त बताते हुए कहा कि दुनिया भर से लोगों को फ्रांस में आने देने का फैसला गलत था।

    ट्रंप ने अमेरिकी मतदाताओं को चेतावनी देते हुए फ्रांस के हालात की तुलना अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की संभावित जीत के परिणामों से भी की। उनके इन बयानों ने फ्रांस में आव्रजन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया।

    एआई से बनी फर्जी तस्वीरों पर मैक्रों ने जताई नाराजगी

    मैक्रों ने कहा कि फ्रांस में हुई घटनाओं के पीछे विदेशी हस्तक्षेप के स्पष्ट संकेत नहीं हैं, लेकिन घटनाओं के बाद गलत सूचनाएं फैलाने के लिए विदेशी स्तर पर हेरफेर किया गया। उनके मुताबिक, इसके चलते कई विदेशी नेताओं की ओर से गलत और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां सामने आईं।

    उन्होंने एआई की मदद से तैयार की गई उन तस्वीरों पर भी आपत्ति जताई, जिनमें फ्रांस में ऐसी घटनाएं दिखाई गईं, जो वास्तव में हुई ही नहीं थीं। मैक्रों ने कहा कि कुछ लोगों ने फ्रांस में प्रवासियों और इस्लामवादियों की भारी भीड़ के घुस आने के दावे किए।

    जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या उनकी टिप्पणी सीधे ट्रंप के लिए थी, तो मैक्रों ने जवाब दिया, “हां।” उन्होंने आगे कहा कि मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि फ्रांस से कौन प्यार करता है और कौन नहीं। उनके अनुसार, जो लोग इस समय उनके देश के बारे में बुरा बोल रहे हैं, वे फ्रांस से प्यार नहीं करते।

    नेतन्याहू ने फ्रांस पर क्या आरोप लगाए?

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मंगलवार को फ्रांस के हालात को ‘चरमपंथी इस्लाम का आक्रमण’ बताया। टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, फ्रेंच भाषा के समाचार चैनल आई24न्यूज को दिए साक्षात्कार में नेतन्याहू ने फ्रांसीसी अधिकारियों पर स्थिति का पहले से आकलन करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया।

    नेतन्याहू ने कहा, “उन्होंने समय रहते तैयारी नहीं की। उन्होंने बस हार मान ली। वे चरमपंथी इस्लाम के आक्रमण के आगे झुक गए।”

    फ्रांस को सलाह देने के सवाल पर नेतन्याहू ने कहा कि उसे चरमपंथियों के खिलाफ लड़ना चाहिए और तुष्टीकरण की नीति नहीं अपनानी चाहिए। उनके इस बयान ने फ्रांस में सुरक्षा, आव्रजन और धार्मिक चरमपंथ को लेकर चल रही बहस को अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विवाद का रूप दे दिया।

    फ्रांस में कैसे हैं हालात?

    सप्ताहांत में फ्रांस के कई इलाकों में प्रदर्शन हुए। अधिकांश मार्च शांतिपूर्ण रहे, लेकिन शनिवार को लूटपाट और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों के बाद स्थिति बिगड़ गई। इसके बाद अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी और कुछ क्षेत्रों में कर्फ्यू लागू किया।

    बोर्दो शहर में अकेले बाहर निकलने वाले नाबालिगों के लिए एक सप्ताह का रात्रिकालीन कर्फ्यू लगाया गया है। गिरोंद और नोवेल-अकितेन की प्रीफेक्ट सोफी ब्रोका ने सोमवार को इस संबंध में आदेश घोषित किया था। यह आदेश मंगलवार से 26 अक्टूबर की सुबह तक प्रभावी रहेगा।

    आदेश के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग रात 10 बजे से सुबह सात बजे तक माता-पिता या कानूनी अभिभावक के बिना सार्वजनिक स्थानों पर नहीं रह सकेंगे।

    फ्रांस की घटनाओं को लेकर अब केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि आव्रजन, धार्मिक चरमपंथ, सोशल मीडिया पर गलत सूचना और विदेशी नेताओं की राजनीतिक बयानबाजी भी विवाद के केंद्र में है। मैक्रों ने जहां फ्रांस के आंतरिक मामलों पर विदेशी नेताओं की टिप्पणियों को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया है, वहीं ट्रंप और नेतन्याहू ने फ्रांसीसी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं।

  • सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हमला, 1 की मौत और 8 घायल, कई फ्लाइट्स के रूट बदले

    सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हमला, 1 की मौत और 8 घायल, कई फ्लाइट्स के रूट बदले


    नई दिल्ली। सऊदी अरब के पूर्वी हिस्से में स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बुधवार देर रात हुए हमले में एक सऊदी नागरिक की मौत हो गई, जबकि आठ लोग घायल हो गए। सऊदी सिविल एविएशन अथॉरिटी ने गुरुवार सुबह इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि हमले में एयरपोर्ट को भी नुकसान पहुंचा है। वैश्विक फ्लाइट ट्रैकिंग सेवा Flightradar24 के मुताबिक, घटना के बाद रात में कई उड़ानों के रूट डायवर्ट किए गए।

    किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट फारस की खाड़ी के पास दम्माम में स्थित है। यह बहरीन और कतर के नजदीक है। इससे पहले भी सऊदी अरब के प्रमुख एयरपोर्ट्स पर मिसाइल और प्रोजेक्टाइल हमलों के दौरान इस एयरपोर्ट को निशाना बनाया जा चुका है। ताजा हमले पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की ओर से कोई टिप्पणी नहीं आई है। वहीं, सऊदी गठबंधन ने बताया कि उसने देश के पूर्वी क्षेत्र में ड्रोन से किए गए चार हमलों को नाकाम कर दिया।

    तेल क्षेत्र में ड्रोन का मलबा गिरने से 2 की मौत
    एयरपोर्ट पर हमले से पहले दक्षिण-पूर्वी सऊदी अरब में अरामको के संचालन वाले शायबह तेल क्षेत्र में एक इंटरसेप्ट किए गए ड्रोन का मलबा गिरने से दो लोगों की मौत हो गई थी, जबकि दो अन्य घायल हुए थे।

    सऊदी ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, मृतकों में नेपाल और फिलीपींस के नागरिक शामिल थे। घायलों में पाकिस्तान और भारत के नागरिक थे। मंत्रालय ने बताया कि ड्रोन का मलबा गिरने से तेल क्षेत्र में एक ठेकेदार के वाहन में आग भी लग गई।

    सऊदी तेल ठिकानों पर लगातार हमले
    सऊदी अरब में हाल के दिनों में तेल प्रतिष्ठानों और अन्य अहम ठिकानों के आसपास ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। पिछले महीने इंटरसेप्ट किए गए हूती ड्रोन का मलबा गिरने से सऊदी अरब में रह रहे एक यमनी नागरिक की मौत हो गई थी। हूतियों की ओर से सऊदी शिपिंग और तेल ठिकानों को निशाना बनाकर हमले बढ़ाए जाने के बीच इसे नागरिक की पहली मौत बताया गया था।

    इस महीने की शुरुआत में भी सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत में हुए हमले के बाद दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनियों में शामिल अरामको की एक प्रशासनिक इमारत में मामूली आग लग गई थी।

    ताजा घटनाओं ने सऊदी अरब के हवाई और ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। किंग फहद एयरपोर्ट पर हुई मौत और घायलों के अलावा तेल क्षेत्र में हुए नुकसान से क्षेत्र में जारी सुरक्षा चुनौतियां एक बार फिर सामने आई हैं।

  • मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर

    मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का खतरा मंडराने लगा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ नई सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित हमलों के निशाने पर ईरान के परमाणु केंद्र, मिसाइल और ड्रोन भंडार के साथ ऊर्जा ढांचा भी हो सकता है। हालांकि, अब तक किसी भी हमले की योजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सैन्य अभियान छोटा, लेकिन बेहद तीव्र हो सकता है। अमेरिका और इजरायल की योजना कथित तौर पर तीन दिनों तक हमले कर ईरान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और उसे परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए मजबूर करने की है। संभावित लक्ष्यों में परमाणु ठिकानों के अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के कमांड सेंटर भी शामिल हैं।

    पिकैक्स माउंटेन पर हमले की भी चर्चा
    ईरान के पहाड़ों के नीचे स्थित परमाणु केंद्र ‘पिकैक्स माउंटेन’ भी संभावित निशाने पर हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह इस ठिकाने के खिलाफ 22,000 पाउंड वजनी GBU-43/B बम के इस्तेमाल पर विचार करने की बात कही थी। इसे MOAB यानी ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ भी कहा जाता है।

    हालांकि, ऊर्जा ढांचे पर हमले को लेकर अमेरिकी अधिकारियों के बीच मतभेद की स्थिति बताई जा रही है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार प्रभावित हो सकता है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसी वजह से ऊर्जा प्रतिष्ठानों को संभावित लक्ष्यों में शामिल करने को लेकर असमंजस बना हुआ है।

    ईरान की चेतावनी- जवाब सीमित नहीं रहेगा
    दूसरी ओर, ईरान ने चेतावनी दी है कि उस पर नया हमला हुआ तो उसकी जवाबी कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी। तेहरान ने संकेत दिया है कि संभावित जवाबी हमलों में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, डेटा सेंटरों और समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    ईरानी अधिकारियों के रुख से संकेत मिलता है कि किसी नए संघर्ष की स्थिति में युद्ध को सीमित रखना आसान नहीं होगा। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ने और संघर्ष के दूसरे देशों तक फैलने की आशंका भी गहरा सकती है।

    ईरान की सीमा के पास इजरायल का बड़ा हवाई अभ्यास
    इस बीच, इजरायल ने सोमवार को ईरान की सीमा के नजदीक एक बड़ा वायुसेना अभ्यास किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली वायुसेना के दर्जनों लड़ाकू और हवा में ईंधन भरने वाले विमान इजरायल से 800 मील से अधिक दूर तक गए। विमानों ने सीरिया और इराक के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए ईरान की सीमा के पास उड़ान भरी और फिर लौट आए।

    अधिकारियों के अनुसार, विमानों का यह मार्ग ईरान पर संभावित हमले के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले रास्ते जैसा था। हालांकि, इजरायल ने इसे प्रशिक्षण अभ्यास बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को कड़ा संदेश देना था। इजरायल ने इस अभियान की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरान ने अभ्यास में शामिल इजरायली विमानों पर हमला किया तो इजरायल को बड़े सैन्य अभियान का बहाना मिल सकता है। इससे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।

    ट्रंप के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
    पिछले अनुभवों को देखते हुए ट्रंप फिलहाल ईरान पर नए हमले का आदेश देने से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि, जब तक ईरान परमाणु वार्ता की मेज पर लौटकर समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तब तक सैन्य कार्रवाई की आशंका बनी रह सकती है।

    अमेरिका के सामने नई जंग शुरू करने के रास्ते में तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, हमले की स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा। दूसरी, संघर्ष का पूरे मिडिल ईस्ट में फैल जाना। तीसरी, अमेरिकी सेना के पास मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की संभावित कमी।

    ऐसे में सैन्य योजनाएं तैयार होने की खबरों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन हमले को मंजूरी देगा या कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देगा। फिलहाल, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच पूरे क्षेत्र की निगाहें वॉशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हैं।