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  • इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    नई दिल्ली! ईरान जंग के बीच इटली ने अमेरिका को बड़ा झटका दिया है. मध्य पूर्व की ओर जा रहे एक विमान को इटली की सरकार ने सिसली में उतरने नहीं दिया है. यह खबर स्थानीय अखबार कोरिएरे डेला सेरा ने दी है. रिपोर्ट के मुताबिक इटली की सरकार ने ईरान जंग से खुद को दूर रखने के लिए यह कदम उठाया है. यह पहली बार है, जब जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कोई फैसला लिया है.
    रिपोर्ट के मुताबिक सिसली में अमेरिकी विमानों को लैंडिंग की अनुमति न मिलने से इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि सिसिली मध्य पूर्व में मिशनों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

    स्पेन के बाद इटली का एक्शन
    एक दिन पहले स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपने एयर स्पेस को बंद कर दिया था. अब इटली ने लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है. हालांकि, इटली का मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इटली नाटो मेंबर है. यूरोप में इटली की अहम दखलअंदाजी है. साथ ही वहां की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का काफी करीबी माना जाता है.

    मेलोनी एकमात्र यूरोप की प्रमुख नेत्री थीं, जिन्हें ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण के दौरान व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया था. कई मौकों पर मेलोनी ने ट्रंप के लिए कवच का काम किया है. ऐसे में अब ईरान जंग के दौरान इटली के इस रूख से अमेरिका को बड़ा झटका लगा है.

    इटली ने यह फैसला क्यों लिया है?
    आधिकारिक तौर पर इटली ने इस पर कोई भी बयान नहीं दिया है, लेकिन इस फैसले को हाल ही में इटली में कराए गए जनमत संग्रह से जोड़ा जा रहा है. इटली में जनमत संग्रह में मेलोनी की पार्टी को जबरदस्त हार मिली थी. इस हार की एक वजह ईरान जंग को भी बताया गया.

    जनमत संग्रह को लेकर कराए गए कई सर्वे में यह खुलासा हुआ कि ट्रंप से मेलोनी की दोस्ती की वजह से अधिकांश इटली के लोग नाराज हैं. उन्हें ईरान जंग से आर्थिक परेशानियों का डर सता रहा है. इटली में अगले साल आम चुनाव प्रस्तावित है, जिसमें मेलोनी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए मैदान में उतरेंगी.

  • तेल का ‘खेल’: उत्पादन कहीं, खपत कहीं; कीमतों पर बढ़ा दबाव

    तेल का ‘खेल’: उत्पादन कहीं, खपत कहीं; कीमतों पर बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली।
     वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच उत्पादन और खपत का भौगोलिक अंतर फिर चर्चा में है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर तेल बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है। यह इलाका दुनिया का प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्र है, जबकि खपत के मामले में एशिया सबसे आगे है। इसी असंतुलन के कारण कीमतों में अस्थिरता बढ़ती जा रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक तेल बाजार में उत्पादन और खपत अलग-अलग क्षेत्रों में केंद्रित है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बनता है। रिपोर्ट बताती है कि परिवहन क्षेत्र अकेले करीब 40 प्रतिशत तेल की खपत करता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

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  • सबसे ज्यादा तेल उत्पादन वाले क्षेत्र

    • पश्चिम एशिया – 31%
    • यूरेसिया – 30%
    • उत्तरी अमेरिका – 22%
    • अफ्रीका – 9%
    • यूरोप – 8%

    सबसे अधिक खपत करने वाले क्षेत्र

    • एशिया – 38%
    • उत्तरी अमेरिका – 22%
    • यूरोप – 14%
    • यूरेसिया – 8%
    • अफ्रीका – 6%
    • पश्चिम एशिया – 5%

    रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया में ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है, जबकि उत्पादन मुख्य रूप से पश्चिम एशिया और उत्तरी अमेरिका पर निर्भर है। इससे वैश्विक आपूर्ति संतुलन बिगड़ रहा है और कीमतों में तेजी का जोखिम बना हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान से जुड़े क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतों में और उछाल आ सकता है। इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु नीतियों पर पड़ने की आशंका है।

    इसके अलावा, परिवहन क्षेत्र की तेल पर भारी निर्भरता स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेज संक्रमण की जरूरत को भी रेखांकित करती है। जानकारों का कहना है कि उत्पादन और खपत के बीच बढ़ता यह अंतर आने वाले समय में ऊर्जा बाजार को और अस्थिर बना सकता है।

  • अमेरिका का चंद्र मिशन: 54 साल बाद चांद के करीब जाएंगे अंतरिक्ष यात्री, जानें पूरी तैयारी और उद्देश्य

    अमेरिका का चंद्र मिशन: 54 साल बाद चांद के करीब जाएंगे अंतरिक्ष यात्री, जानें पूरी तैयारी और उद्देश्य


    नई दिल्ली। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अगले कुछ वर्षों में चांद पर स्थायी बेस बनाने की योजना पर काम कर रही है। इसी कड़ी में हाल ही में एजेंसी ने अगले दशक के चांद से जुड़े मिशनों का रोडमैप जारी किया। आर्टेमिस-2 मिशन इस योजना का हिस्सा है और इसे अप्रैल 2026 में लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन के साथ लगभग 54 साल बाद अमेरिका एक बार फिर मानव को चांद के करीब भेजने जा रहा है।

    आर्टेमिस-2 मिशन क्या है?

    आर्टेमिस-2 नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम की दूसरी उड़ान है और यह लगभग 10 दिन का मानव मिशन होगा। इसके लिए स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट और ओरायन अंतरिक्ष यान का इस्तेमाल किया जाएगा। आर्टेमिस-1 मिशन 2022 में मानव रहित था, जो चांद के करीब स्थितियों का परीक्षण करने के लिए था। आर्टेमिस-2 में चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा का चक्कर लगाएंगे और यह उड़ान फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी पर होगी। इसका मतलब है कि चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण की मदद से यान स्वाभाविक रूप से पृथ्वी की ओर लौट आएगा। इस मिशन के दौरान चालक दल चंद्रमा के उस दूरस्थ हिस्से से गुजरेगा जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता और संभव है कि नए दूरी के रिकॉर्ड भी बनेंगे।

    कौन हैं अंतरिक्ष यात्री?

    नासा ने 3 अप्रैल 2023 को आर्टेमिस-2 के चार अंतरिक्ष यात्रियों का एलान किया था। इनमें कमांडर रीड वाइसमैन होंगे, जो नासा के अंतरिक्ष यात्री और अमेरिकी नौसेना के एविएटर तथा टेस्ट पायलट हैं। पायलट की भूमिका विक्टर ग्लोवर निभाएंगे, जो चंद्रमा का चक्कर लगाने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति होंगे। मिशन विशेषज्ञ के रूप में क्रिस्टीना कॉश शामिल हैं, जो सबसे लंबी महिला एकल अंतरिक्ष उड़ान का रिकॉर्ड रखती हैं और पहली महिला स्पेस वॉक में भी शामिल रही हैं। चौथे सदस्य जेरेमी हैनसेन कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी का प्रतिनिधित्व करेंगे और यह उनकी पहली अंतरिक्ष उड़ान होगी। इस मिशन में पहली बार कोई महिला, कोई अश्वेत और कोई कनाडाई नागरिक पृथ्वी की निचली कक्षा से बाहर जाएंगे।

    लॉन्चिंग में देरी और तैयारी

    मूल रूप से फरवरी 2026 में लॉन्चिंग की योजना थी, लेकिन रॉकेट परीक्षणों में समस्याओं के कारण इसे कई बार टालना पड़ा। अब नासा 1 अप्रैल 2026 को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से इसे लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है, जो भारतीय समयानुसार 2 अप्रैल की सुबह होगा। यदि मौसम या तकनीकी कारण से लॉन्च संभव नहीं होता है, तो बैकअप तारीखें 3 से 6 अप्रैल और 30 अप्रैल रखी गई हैं।

    मिशन की रूपरेखा

    आर्टेमिस-2 मिशन के दौरान यान पहले पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित होगा और यहां जीवन रक्षक प्रणालियों और अन्य तकनीकी उपकरणों की जांच की जाएगी। लगभग 26 घंटे बाद यान को बड़े इंजन बर्न के जरिए चंद्रमा की दिशा में भेजा जाएगा। इस यात्रा में चार दिन का समय लगेगा। यान चंद्रमा की सतह से लगभग 8,889 किमी ऊपर से गुजरेगा, जहां अंतरिक्ष यात्री लगभग तीन घंटे तक भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे, तस्वीरें लेंगे और अंतरिक्ष के मौसम, सौर ज्वालाओं और विकिरण की निगरानी करेंगे। यह उड़ान फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी पर आधारित होगी, जिससे यान स्वाभाविक रूप से पृथ्वी की ओर लौट आएगा। अंत में प्रशांत महासागर में ओरायन कैप्सूल सुरक्षित रूप से उतर जाएगा।

    मिशन के लक्ष्य

    आर्टेमिस-2 के प्रमुख लक्ष्य में चालक दल की सुरक्षा सुनिश्चित करना, ओरायन यान और SLS रॉकेट के प्रदर्शन का परीक्षण करना, भविष्य के चंद्र और मंगल अभियानों की तैयारी करना और चंद्रमा की भूवैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन करना शामिल है। इसके अलावा गहरे अंतरिक्ष के विकिरण और सौर ज्वालाओं के प्रभावों का भी अध्ययन किया जाएगा। इस मिशन की सफलता के बाद नासा चंद्रमा पर स्थायी मानव बेस स्थापित करने और भविष्य में इसे अंतरिक्ष स्टेशन की तरह निरंतर संचालन योग्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

    क्यों नहीं उतरेगा आर्टेमिस-2 चांद पर?

    हालांकि आर्टेमिस-2 मानव मिशन है, फिर भी यह चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरेगा। इसका कारण यह है कि ओरायन यान लूनर लैंडर नहीं है और चांद पर उतरने की क्षमता नहीं रखता। चांद पर इंसानों की लैंडिंग आर्टेमिस-3 मिशन में होगी, जिसमें स्टारशिप एचएलएस लूनर लैंडर का इस्तेमाल किया जाएगा। आर्टेमिस-2 का उद्देश्य चंद्रमा के करीब मानव उड़ान और ओरायन यान की प्रणालियों का परीक्षण करना है, ताकि भविष्य में चांद पर स्थायी मानव मिशन और मंगल अभियान के लिए तैयारियां पूरी की जा सकें।

  • सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट का रुख, पाकिस्तान के पक्ष में फैसला होने की आशंका

    सिंधु जल संधि पर हेग कोर्ट का रुख, पाकिस्तान के पक्ष में फैसला होने की आशंका

    नई दिल्ली भारत और पाकिस्तान के बीच जल संकट को लेकर दशकों पुरानी सिंधु जल संधि एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर विवाद का केंद्र बन गई है। नीदरलैंड के हेग में स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (पीसीए) में चल रही कार्यवाही को लेकर भारत की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि संकेत मिल रहे हैं कि अदालत पाकिस्तान के पक्ष में स्थायी अंतरिम निर्णय दे सकती है। भारत में पहले ही इन कार्यवाहियों को “अवैध” से निष्कासित कर दिया गया है और इसमें भाग लेने से इंकार किया जा रहा है।

    भारत का साफ रुख: पीसीए की प्रक्रिया ठीक

    भारत का कहना है कि पीसीए के तहत हो रही अयोध्या सिंधु जल संधि के उद्यमियों के लिए कोई आधार नहीं है। भारत ने बार-बार यह प्रमाणित किया है कि उसके लिए केवल वास्तुशिल्प दस्तावेजों की प्रक्रिया ही वैध है। इसके बावजूद पीसीए ने 12 मार्च और 21 मार्च को आदेश जारी करते हुए आगे की सुनवाई रद्द कर दी। भारत को 30 मार्च तक अपना रुख स्पष्ट करने का मौका मिला था, लेकिन भारत ने अपनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं किया।

    पाकिस्तान की अपील पर अस्थायी राहत संभव

    पीसीए अब पाकिस्तान की ओर से धार्मिक स्थलों पर तीर्थयात्रा राहत देने पर विचार कर सकता है। जम्मू-कश्मीर में चल रहे रैटल और किशन जैसे प्रोजेक्ट्स पर रोक की मांग शामिल है। यदि अदालत ने फैसला रद्द कर दिया है, तो इससे दोनों देशों के बीच तनाव और वृद्धि हो सकती है, खासकर तब जब भारत पहले ही संधि को निलंबित करने की बात कह चुका है।

    अप्रैल अंत में अहम् सुनवाई

    पीसीए ने संकेत दिया है कि 26 अप्रैल से 28 अप्रैल तक हेग के पीस पैलेस के बीच इस मामले की सुनवाई हो सकती है। यदि भारत इसमें शामिल नहीं है, तो पाकिस्तान अपने पिछलग्गुओं को असामान्य तरीकों से पेश करेगा, जिससे निर्णय का संतुलन प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि यह मामला भारत के लिए पत्रकारिता और पुरातत्व विभाग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है।

    सिंधु जल संधि क्या है?

    1960 में जवाहरलाल नेहरू और अयूब खान के बीच इस एक्ट में छह नदियों के जल का बंटवारा तय किया गया था।

    भारत को: रावी, व्यास और सतलुज (पूर्वी नदियाँ)
    पाकिस्तान को: सिंधु, झेलम और चिनाब (पश्चिमी नदियाँ)

    भारत में पश्चिमी नदियों के पानी का सीमित उपयोग (लगभग 20%), सीच, बिजली और घरेलू समुद्र तट के लिए किया जाता है। इस संधि के तहत एक स्थायी सिंधु आयोग भी बनाया गया था, जो देशों के बीच डेटा साझा करने और विवाद का काम करता है।

    क्या?

    यदि पीसीए पाकिस्तान के पक्ष में अंतरिम निर्णय देता है, तो भारत के लिए यह नामांकित चुनौती बन सकता है। हालाँकि, भारत पहले ही इस प्रक्रिया को मान्य नहीं करता है, इसलिए किसी भी निर्णय का वास्तविक प्रभाव सीमित भी रह सकता है। फिर भी, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह मामला भारत-पाक समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव डाल सकता है।

  • ट्रंप की धमकी के बाद एक्शन: दुबई के पास तेल टैंकर पर ड्रोन हमला

    ट्रंप की धमकी के बाद एक्शन: दुबई के पास तेल टैंकर पर ड्रोन हमला


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में वेस्ट एशिया का संकट एक बार फिर गहराता नजर आ रहा है। ईरान ने कुवैत के एक तेल टैंकर पर ड्रोन हमला कर क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। यह हमला दुबई के पास समुद्री क्षेत्र में हुआ जिसकी पुष्टि स्थानीय अधिकारियों और कुवैती सूत्रों ने की है। हालांकि राहत की बात यह रही कि इस हमले में किसी तरह की जनहानि या तेल रिसाव की सूचना नहीं मिली है।

    दुबई मीडिया ऑफिस के अनुसार आपातकालीन टीमों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए स्थिति को नियंत्रण में कर लिया। टैंकर में आग जरूर लगी थी लेकिन उसे समय रहते बुझा दिया गया। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि न तो कोई व्यक्ति घायल हुआ और न ही समुद्र में तेल का रिसाव हुआ।

    इस घटना से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी थी कि यदि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज को दोबारा नहीं खोला गया तो अमेरिका ईरान की तेल सुविधाओं को निशाना बना सकता है। ट्रंप की इस चेतावनी के बाद ही टैंकर पर हमले की खबर सामने आई जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक कुवैत का यह टैंकर दुबई से करीब 31 नॉटिकल मील उत्तर-पश्चिम में हमले का शिकार हुआ। ब्रिटेन की मैरीटाइम एजेंसी के अनुसार हमले के बाद जहाज में आग लग गई थी जिसे बाद में काबू में कर लिया गया।

    इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नागरिक बुनियादी ढांचे जैसे तेल टैंकरों पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत गंभीर अपराध माना जा सकता है।

    दूसरी ओर चीन ने इस पूरे घटनाक्रम पर चिंता जताते हुए अमेरिका और इजरायल से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सभी पक्ष संयम बरतें और क्षेत्र में शांति बनाए रखने का प्रयास करें।

    चीन ने संघर्ष के दौरान ईरान के परमाणु संयंत्रों और ऐतिहासिक स्थलों को हुए नुकसान पर भी दुख जताया है। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहर पूरी मानवता की अमूल्य संपत्ति है और इस तरह का नुकसान बेहद चिंताजनक है।

    कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में बढ़ते इस तनाव ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार को गंभीर जोखिम में डाल दिया है। होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग पर पहले से मौजूद संकट के बीच इस तरह के हमले आने वाले दिनों में हालात को और जटिल बना सकते हैं।

  • वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क

    वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा: बाब-अल-मंदेब पर संकट, भारतीय नौसेना सतर्क


    नई दिल्ली । नई दिल्ली में वेस्ट एशिया का बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी टकराव में अब हूती विद्रोही भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता और बढ़ गई है। हूतियों द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस संघर्ष को और व्यापक बना दिया है।

    पहले ही स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज के बाधित होने की आशंका से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है, और अब स्ट्रेट ऑफ बाब-अल-मंदेब पर भी संकट गहराने की संभावना जताई जा रही है। यह अहम समुद्री मार्ग रेड सी और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और दुनिया के करीब 12 प्रतिशत व्यापार का रास्ता है।

    इसी बढ़ते खतरे को देखते हुए भारतीय नौसेना पूरी तरह अलर्ट मोड में है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास उत्तरी अरब सागर में भारतीय नौसेना के कई युद्धपोत तैनात किए गए हैं। एंटी-पायरेसी मिशन के तहत पहले से मौजूद निगरानी को अब और मजबूत किया गया है।

    भारतीय नौसेना इस समय कच्चे तेल और एलपीजी ले जाने वाले भारतीय टैंकरों को एस्कॉर्ट कर रही है ताकि उन्हें किसी भी संभावित खतरे से सुरक्षित रखा जा सके। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय ध्वज वाले जहाजों को अतिरिक्त सुरक्षा देने की भी तैयारी है।

    हालांकि अभी तक हूती विद्रोहियों ने रेड सी में किसी बड़े जहाज को निशाना नहीं बनाया है, लेकिन हालात तेजी से बदल सकते हैं। रक्षा विशेषज्ञ संजय कुलकर्णी का मानना है कि ईरान पर बढ़ते दबाव के चलते हूती इस रणनीतिक मार्ग को ‘वेपोनाइज’ कर सकते हैं, यानी इसे दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।

    यदि ऐसा होता है, तो इसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। महंगाई बढ़ सकती है, उर्वरकों की कीमतों में इजाफा हो सकता है और निर्यात प्रभावित हो सकता है।

    जिबूती जैसे रणनीतिक स्थानों पर अमेरिका, चीन, जापान और फ्रांस की सैन्य मौजूदगी के कारण इस क्षेत्र को पूरी तरह बाधित करना आसान नहीं है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला भी नहीं है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा है। एक प्रमुख मार्ग फारस की खाड़ी से होकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, ओमान की खाड़ी और अरब सागर तक जाता है, जबकि दूसरा मार्ग स्वेज नहर, रेड सी और अदन की खाड़ी के जरिए अरब सागर से जुड़ता है।

    यदि ये दोनों मार्ग प्रभावित होते हैं, तो जहाजों को केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से गुजरना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों में भारी बढ़ोतरी होगी। भारत के लिए यह स्थिति और भी संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका से आता है।

    कुल मिलाकर, वेस्ट एशिया में बढ़ता यह संघर्ष अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाएगी, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • बढ़ते तनाव के बीच ईरान का कड़ा कानून: दुश्मन देशों को सूचना भेजना पड़ेगा भारी

    बढ़ते तनाव के बीच ईरान का कड़ा कानून: दुश्मन देशों को सूचना भेजना पड़ेगा भारी


    नई दिल्ली । तेहरान में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ईरान ने एक बड़ा और सख्त फैसला लेते हुए स्पष्ट चेतावनी जारी की है कि अमेरिका और इजरायल को किसी भी प्रकार की संवेदनशील जानकारी फोटो या वीडियो भेजने वालों को मौत की सजा दी जा सकती है। यह बयान ईरान की न्यायपालिका के प्रवक्ता असगर जहांगीर ने दिया है जिसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

    असगर जहांगीर ने कहा कि दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना देना सीधे तौर पर जासूसी की श्रेणी में आता है और इसके लिए कठोरतम दंड का प्रावधान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति हमले से प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीरें या वीडियो साझा करता है तो यह दुश्मन को यह संकेत देने जैसा है कि उनका हमला सही जगह पर हुआ है। इस तरह की गतिविधियां राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ मानी जाएंगी।

    यह सख्त रुख ऐसे समय में सामने आया है जब डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका द्वारा हाल ही में ईरान के तेल भंडार को निशाना बनाते हुए हमला किया गया। इस हमले के वीडियो भी सार्वजनिक किए गए जिसके बाद ईरान की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया गया है।

    ईरान के अधिकारियों के मुताबिक पिछले अक्टूबर में पारित किए गए नए जासूसी कानून के तहत अब दुश्मन देशों को किसी भी प्रकार की सूचना भेजना गंभीर अपराध माना जाएगा। इस कानून में दोषी पाए जाने पर न सिर्फ संपत्ति जब्त की जा सकती है बल्कि मौत की सजा तक दी जा सकती है।

    इसी क्रम में ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने कार्रवाई तेज कर दी है। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिन पर अमेरिका और इजरायल से जुड़ी खुफिया एजेंसियों को संवेदनशील जानकारी भेजने का आरोप है। जांच में सामने आया कि आरोपियों ने कथित तौर पर सुरक्षित स्थानों की जानकारी देने के बदले क्रिप्टोकरेंसी प्राप्त की थी।

    ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन दोनों को पूर्वी अजरबैजान प्रांत के ओस्कू इलाके से हिरासत में लिया गया और आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों को सौंप दिया गया है। इससे पहले भी इसी तरह के आरोपों में दो अन्य लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी है जिससे यह साफ है कि ईरान इस मुद्दे पर कोई नरमी बरतने के मूड में नहीं है।

    इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने क्षेत्रीय समर्थन को लेकर इराक का आभार जताया है। उन्होंने कहा कि इराकी लोग इस संघर्ष में मजबूरी से नहीं बल्कि साझा इतिहास पहचान और धार्मिक मूल्यों के आधार पर ईरान के साथ खड़े हैं।

    कुल मिलाकर अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान का यह कड़ा रुख यह संकेत देता है कि देश अपनी आंतरिक सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क है और किसी भी प्रकार की जासूसी गतिविधि को सख्ती से कुचलने के लिए तैयार है।

  • KP ओली को गिरफ्तार करके फंस गए पीएम बालेन? नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने भेजा नोटिस

    KP ओली को गिरफ्तार करके फंस गए पीएम बालेन? नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने भेजा नोटिस


    काठमांडू। नेपाल में पूर्व प्रधानमंत्री के पी ओली की गिरफ्तारी के बाद राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। उनके समर्थक अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन कर रिहाई की मांग कर रहे हैं। इसी बीच नेपाल सुपीम कोर्ट ने सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए गिरफ्तारी पर स्पष्टीकरण मांगा है और जवाब के लिए तीन दिन का समय दिया है।
    यह आदेश ओली की ओली की पत्नी राधिका शाक्य द्वारा दायर याचिका पर आया। याचिका में गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए तुरंत रिहाई की मांग की गई थी। हालांकि जस्टिस मेघराज पोखरेल की एकल पीठ ने तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। इससे पहले स्वास्थ्य कारणों से जूझ रहे ओली ने काठमांडू जिला अदालत में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी दी, जहां उनकी हिरासत पांच दिन और बढ़ा दी गई।

    दरअसल ‘जेनजी आंदोलन’ के दौरान हुई 76 लोगों की मौत की जांच के लिए गठित Gauri Bahadur Karki Commission ने अपनी रिपोर्ट में कई नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए थे। नई सरकार ने पहली ही कैबिनेट बैठक में आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं, जिसके बाद कार्रवाई तेज हुई। रिपोर्ट में कहा गया कि आंदोलन के दौरान हिंसा की जानकारी न होने का दावा “आपराधिक लापरवाही” की श्रेणी में आ सकता है।

    गौरतलब है कि सितंबर 2025 में सोशल मीडिया प्रतिबंध के बाद नेपाल में व्यापक विरोध शुरू हुआ था, जो बाद में देशव्यापी आंदोलन में बदल गया। इस दौरान सरकारी कार्यालयों में आगजनी और संसद भवन को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं। राजनीतिक संकट के बाद अंतरिम व्यवस्था बनी और चुनाव कराए गए, जिसके बाद नई सरकार का गठन हुआ।

    अब ओली की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर नेपाल की राजनीति गरमा गई है और अदालत के नोटिस से सरकार पर दबाव बढ़ गया है।

  • इजरायल के पास परमाणु हथियार, तो ईरान क्यों नहीं?

    इजरायल के पास परमाणु हथियार, तो ईरान क्यों नहीं?


    तेहरान। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल फिर चर्चा में है कि जब के पास परमाणु हथियार होने की बात कही जाती है, तो को इन्हें हासिल करने से क्यों रोका जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका कारण अंतरराष्ट्रीय कानून की संरचना और देशों की संधियों में भागीदारी से जुड़ा है।
    विशेषज्ञ बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में परमाणु हथियार रखने पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने संबंधित संधियों को स्वीकार किया है। इसी संदर्भ में Nuclear Non-Proliferation Treaty यानी एनपीटी को अहम माना जाता है, जिसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना और शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देना है

    इस संधि के तहत दुनिया को परमाणु हथियार संपन्न और गैर-परमाणु देशों में बांटा गया। 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण करने वाले देशों अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन—को परमाणु संपन्न माना गया, जबकि अन्य देशों ने ऐसे हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता जताई।

    ईरान 1970 से एनपीटी का सदस्य है, इसलिए वह गैर-परमाणु देश की श्रेणी में आता है और उसे परमाणु हथियार विकसित न करने की शर्तों का पालन करना होता है। साथ ही उसका परमाणु कार्यक्रम International Atomic Energy Agency की निगरानी में रहता है।

    इसके विपरीत, इजरायल एनपीटी का सदस्य नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, कोई भी देश उस संधि से बाध्य नहीं होता जिसका वह हिस्सा नहीं है। इसी वजह से इजरायल पर एनपीटी के नियम लागू नहीं होते।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यही कारण है कि दोनों देशों की कानूनी स्थिति अलग दिखाई देती है।

    इजरायल के अलावा India, Pakistan और North Korea जैसे देश भी एनपीटी के बाहर रहते हुए परमाणु क्षमता रखते हैं।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में परमाणु हथियारों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। केवल वे देश ही बाध्य होते हैं, जिन्होंने एनपीटी या 2017 की परमाणु हथियार निषेध संधि जैसे समझौतों को स्वीकार किया है। इस तरह ईरान और इजरायल के बीच अंतर किसी दोहरे मापदंड से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति-आधारित व्यवस्था को दर्शाता है।

  • अमेरिका के लिए स्पेन ने सैन्य विमानों के लिए बंद किया एयरस्पेस

    अमेरिका के लिए स्पेन ने सैन्य विमानों के लिए बंद किया एयरस्पेस

    वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच स्पेन ने बड़ा फैसला लेते हुए अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। इस कदम के बाद अमेरिका अब अपने सैन्य अभियानों के लिए स्पेन के आसमान या वहां के सैन्य ठिकानों का उपयोग नहीं कर पाएगा। इसे ईरान से जुड़े हालात के बीच अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका माना जा रहा है।
    स्पेन की रक्षा मंत्री ने स्पष्ट कहा कि उनका देश ईरान (Iran) के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी विमानों को न तो एयरस्पेस मिलेगा और न ही सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी। इस बयान से संकेत मिला है कि स्पेन इस पूरे संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहता है।

    इस फैसले का सीधा असर अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अब अमेरिकी विमानों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने होंगे, जिससे उड़ान का समय बढ़ेगा और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। हालांकि स्पेन ने मानवीय और आपातकालीन उड़ानों को छूट दी है, लेकिन सैन्य मिशनों पर यह प्रतिबंध अहम माना जा रहा है।

    स्पेन सरकार का कहना है कि वह ऐसे किसी भी युद्ध का समर्थन नहीं करती जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो। इसी आधार पर उसने यह निर्णय लिया है। स्पेन के नेताओं का मानना है कि इस तरह के संघर्ष से वैश्विक तनाव बढ़ता है और शांति प्रयास प्रभावित होते हैं।
    विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से अमेरिका और स्पेन के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। दोनों देशों के बीच पहले भी इस मुद्दे पर मतभेद रहे हैं, और अब एयरस्पेस बंद करने के फैसले से यह दूरी और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।