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  • वॉशिंग मशीन में ज्यादा डिटर्जेंट डालना कपड़ों की सफाई नहीं बढ़ाता, मशीन के ड्रम और ड्रेनेज सिस्टम को पहुंचा सकता है नुकसान

    वॉशिंग मशीन में ज्यादा डिटर्जेंट डालना कपड़ों की सफाई नहीं बढ़ाता, मशीन के ड्रम और ड्रेनेज सिस्टम को पहुंचा सकता है नुकसान

    नई दिल्ली । वॉशिंग मशीन ने कपड़े धोने का काम काफी आसान कर दिया है, लेकिन मशीन का सही इस्तेमाल न किया जाए तो सुविधा देने वाला यह उपकरण धीरे-धीरे खराब भी हो सकता है। ऐसी ही एक आम गलती जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट डालना है। कई लोगों को लगता है कि अधिक डिटर्जेंट से कपड़े ज्यादा साफ और चमकदार होंगे, जबकि वास्तविकता में ज्यादा डिटर्जेंट सफाई बढ़ाने के बजाय कपड़ों और मशीन दोनों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।

    वॉशिंग मशीन में आवश्यकता से अधिक डिटर्जेंट डालने पर सामान्य से ज्यादा झाग बन सकता है। यह झाग कपड़ों के रेशों के बीच फंस सकता है और कई बार पूरी तरह पानी के साथ बाहर नहीं निकल पाता। इसका असर कपड़ों पर सफेद अवशेष, कड़ापन या अजीब गंध के रूप में दिखाई दे सकता है। खासकर गहरे रंग के कपड़ों पर डिटर्जेंट के निशान आसानी से नजर आ सकते हैं।

    अतिरिक्त डिटर्जेंट का असर केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक ज्यादा डिटर्जेंट इस्तेमाल करने पर इसके अवशेष मशीन के ड्रम, पाइप, फिल्टर और ड्रेनेज सिस्टम के कुछ हिस्सों में जमा हो सकते हैं। इससे पानी की निकासी प्रभावित हो सकती है और मशीन को अपना सामान्य चक्र पूरा करने में परेशानी हो सकती है।

    मशीन के अंदर लगातार नमी और डिटर्जेंट के अवशेष जमा होने से रबर गैसकेट और दूसरे हिस्सों के आसपास गंदगी तथा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण भी बन सकता है। इसका एक संकेत मशीन के अंदर से आने वाली बदबू हो सकता है। खासकर फ्रंट लोड मशीन में दरवाजे के आसपास मौजूद रबर सील की नियमित सफाई नहीं करने पर यह समस्या अधिक महसूस हो सकती है।

    डिटर्जेंट की सही मात्रा हर स्थिति में एक जैसी नहीं होती। यह मशीन के प्रकार, कपड़ों की संख्या, पानी की गुणवत्ता और कपड़ों पर मौजूद गंदगी की मात्रा पर निर्भर करती है। इसलिए डिटर्जेंट के पैकेट पर दिए गए निर्देश और वॉशिंग मशीन के निर्माता की सलाह को प्राथमिकता देना बेहतर होता है।

    फ्रंट लोड मशीनें सामान्यतः कम पानी का इस्तेमाल करती हैं। इसलिए इनमें अत्यधिक डिटर्जेंट डालने से झाग बनने की समस्या ज्यादा हो सकती है। दूसरी ओर टॉप लोड मशीनों में पानी की मात्रा अलग होती है, इसलिए डिटर्जेंट की जरूरत भी मशीन और उसके वॉश प्रोग्राम के अनुसार बदल सकती है।

    अगर कपड़े बहुत ज्यादा गंदे हैं तो केवल डिटर्जेंट की मात्रा बढ़ाना सही तरीका नहीं है। कपड़ों को उपयुक्त तरीके से पहले भिगोना या मशीन में सही वॉश प्रोग्राम चुनना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे कम डिटर्जेंट में भी प्रभावी सफाई मिल सकती है।

    मशीन की बेहतर कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए डिटर्जेंट डालने वाले ड्रॉअर, फिल्टर और रबर सील की समय-समय पर सफाई करना भी जरूरी है। वॉशिंग साइकल पूरा होने के बाद मशीन का दरवाजा कुछ समय खुला रखने से अंदर की नमी कम होने में मदद मिल सकती है।

    इसलिए अगली बार कपड़े ज्यादा साफ करने के इरादे से डिटर्जेंट की मात्रा बढ़ाने से पहले मशीन और डिटर्जेंट के निर्देश जरूर देखें। सही मात्रा में डिटर्जेंट का इस्तेमाल न केवल कपड़ों पर अवशेष और बदबू की समस्या कम कर सकता है, बल्कि मशीन की सफाई व्यवस्था और लंबे समय तक उसकी कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद कर सकता है।

  • मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    नई दिल्ली ।देश के कुछ हिस्सों में मानसून और बदलते मौसम के बीच इन्फ्लूएंजा ए H1N1, जिसे आमतौर पर स्वाइन फ्लू कहा जाता है, के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। दिल्ली में भी इस साल संक्रमण के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 6 अगस्त 2026 तक राजधानी में H1N1 के 1,349 पुष्ट मामले सामने आ चुके थे। इसके बाद कुछ अस्पतालों में भी ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी सामने आई है।

    स्वाइन फ्लू एक वायरल श्वसन संक्रमण है, जिसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे दिखाई दे सकते हैं। मानसून के दौरान मौसम में बदलाव, तापमान में उतार-चढ़ाव और लोगों के बीच संपर्क बढ़ने जैसी परिस्थितियां श्वसन संक्रमण के फैलाव के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती हैं। हालांकि, ज्यादातर मामलों में बीमारी हल्की रहती है और उचित आराम, निगरानी तथा चिकित्सकीय सलाह से मरीज ठीक हो जाते हैं।

    स्वाइन फ्लू का खतरा सभी लोगों को हो सकता है, लेकिन कुछ समूहों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग विशेष सावधानी की श्रेणी में आते हैं। इनके अलावा पहले से फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, डायबिटीज या किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या वाले मरीजों में भी जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है।

    H1N1 संक्रमण होने पर अचानक बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द, थकान और नाक से संबंधित परेशानी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों में लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं, जबकि जोखिम वाले लोगों में बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों को सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    विशेष रूप से सांस लेने में परेशानी, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, सीने में बेचैनी, अत्यधिक कमजोरी, असामान्य रूप से ज्यादा नींद आना या तेजी से बिगड़ती तबीयत गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को जल्द चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से गंभीर बीमारी वाले मरीजों में लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    स्वाइन फ्लू के उपचार में मरीज की स्थिति और लक्षणों के आधार पर चिकित्सा प्रबंधन किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर शुरुआती चरण में ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवा की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, दवा की जरूरत, उसकी मात्रा और उपचार की अवधि मरीज की स्थिति देखकर चिकित्सक तय करते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर खुद से एंटीवायरल या अन्य दवाएं लेना उचित नहीं है।

    संक्रमण से बचाव के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा बीमार व्यक्ति के संपर्क में अनावश्यक रूप से आने से बचना महत्वपूर्ण है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। संक्रमित व्यक्ति को भी दूसरों से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि संक्रमण फैलने का खतरा कम किया जा सके।

    फ्लू से बचाव के लिए टीकाकरण भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे लेकर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बदलते मौसम के दौरान सावधानी, शुरुआती लक्षणों पर निगरानी और जोखिम वाले लोगों की समय पर चिकित्सकीय जांच संक्रमण को गंभीर होने से रोकने में मदद कर सकती है।

  • पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    नई दिल्ली ।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पेट की गहराई में जमा होने वाली आंतरिक चर्बी यानी विसरल फैट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाले सामान्य फैट से पूरी तरह भिन्न होती है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, आंत और अग्न्याशय के आसपास जमा होती है।

    चिकित्सकों के मुताबिक देखने में सामान्य या पतले नजर आने वाले व्यक्तियों में भी विसरल फैट की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को थिन आउटसाइड-फैट इनसाइड कहा जाता है। कमर का घेरा बढ़ना और पेट का बाहर निकलना इस समस्या का प्रमुख प्राथमिक संकेत हो सकता है।

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि शरीर में विसरल फैट की अत्यधिक मात्रा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। इससे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो सकता है।

    इसके अतिरिक्त यह आंतरिक चर्बी शरीर में पुरानी सूजन और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बनती है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों में बदल सकता है।

    असंतुलित खानपान, बहुत ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधि की कमी को विसरल फैट बढ़ने का मुख्य कारण माना गया है। घंटों बैठकर काम करने की आधुनिक जीवनशैली के कारण दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित देश भर के शहरी इलाकों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम जैसे वॉक, साइकिलिंग और एरोबिक्स बेहद जरूरी हैं। साथ ही आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों, हरी सब्जियों और साबुत अनाज को शामिल कर तथा मीठे पेय पदार्थों से परहेज रखकर इस जोखिम से बचा जा सकता है।

  • पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    पेट साफ न होने से त्वचा पर पड़ता है बुरा असर कब्ज के कारण मुंहासे और दाग-धब्बे संभव

    नई दिल्ली । मानव स्वास्थ्य में पाचन तंत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालिया चिकित्सीय अध्ययनों और मेडिकल रिपोर्टों से यह स्पष्ट हुआ है कि क्रोनिक कब्ज यानी लंबे समय से चली आ रही पेट की समस्या केवल पाचन तंत्र को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि त्वचा के स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा असर पड़ता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पाचन तंत्र में गड़बड़ी होने पर शरीर में विषाक्त पदार्थ जमा होने लगते हैं। जब आंतें इन अपशिष्ट पदार्थों को प्रभावी ढंग से बाहर नहीं निकाल पातीं, तो शरीर अन्य माध्यमों से इन्हें बाहर करने का प्रयास करता है, जिससे त्वचा पर मुंहासे, दाग-धब्बे, काले घेरे और चकत्ते जैसी समस्याएं उभरने लगती हैं।

    ताइवान में किए गए एक व्यापक अध्ययन के आंकड़ों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि कब्ज से पीड़ित व्यक्तियों में सामान्य लोगों की तुलना में एक्जिमा जैसी त्वचा संबंधी बीमारी विकसित होने का जोखिम दो गुना तक अधिक देखा गया है। हालांकि इसके सटीक कारणों पर शोध अभी जारी है।

    चिकित्सकों के मुताबिक आंत और त्वचा दोनों ही शरीर में बाह्य तत्त्वों और एलर्जी के खिलाफ सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं। जब आंतों के सामान्य कामकाज में रुकावट आती है, तो इसका प्रतिकूल असर चेहरे की चमक और त्वचा की रंगत पर साफ दिखाई देने लगता है।

    दिल्ली, मुंबई और मध्य प्रदेश के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों के चिकित्सकों का मानना है कि असंतुलित खानपान और आधुनिक जीवनशैली के कारण कब्ज की समस्या आम होती जा रही है। महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही यह समस्या त्वचा की नई जटिलताओं को जन्म दे रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस प्रकार की समस्याओं से बचने के लिए आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों और प्रोबायोटिक्स की मात्रा बढ़ानी चाहिए। भरपूर पानी का सेवन करने और नियमित दिनचर्या अपनाने से पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है जिससे त्वचा स्वस्थ बनी रहती है।

  • अमेरिका में साइक्लोस्पोरा संक्रमण से दो मौतें दूषित लेट्यूस और पत्तेदार सब्जियों के सेवन से बढ़ा खतरा

    अमेरिका में साइक्लोस्पोरा संक्रमण से दो मौतें दूषित लेट्यूस और पत्तेदार सब्जियों के सेवन से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । हरी पत्तेदार सब्जियों और सलाद के सेवन को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। अमेरिका के मिशिगन में साइक्लोस्पोरा नामक सूक्ष्म परजीवी के प्रकोप से दो लोगों की मौत की खबर के बाद आंतों के इस संक्रमण को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है।

    स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार साइक्लोस्पोरियासिस एक आंतों का संक्रमण है जो साइक्लोस्पोरा नामक सूक्ष्म परजीवी के कारण होता है। यह परजीवी मुख्य रूप से दूषित पानी, फलों और कच्ची पत्तेदार सब्जियों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है।

    प्रारंभिक जांच में मैक्सिको से आपूर्ति किए गए आइसबर्ग लेट्यूस यानी सलाद के पत्ते को इस संक्रमण का मुख्य जरिया माना गया था। यद्यपि बाद की प्रयोगशाला जांच में कुछ विरोधाभासी परिणाम सामने आए, लेकिन महामारी विज्ञान के साक्ष्य इसी आपूर्ति श्रृंखला की ओर संकेत कर रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह संक्रमण सामान्यतः जानलेवा नहीं होता, लेकिन इसके कारण मरीज को गंभीर दस्त, पेट दर्द, मतली, थकान और अत्यधिक निर्जलीकरण की समस्या हो सकती है। पहले से गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए यह स्थिति अधिक जोखिम भरी साबित हो सकती है।

    भारत में भी विशेषकर मानसून के मौसम में दूषित पानी और सब्जियों के जरिए इस प्रकार के परजीवी संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। दिल्ली, मुंबई और मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरी इलाकों के बाजारों में लेट्यूस और कच्ची सब्जियों की भारी मांग के चलते सावधानी बरतने की आवश्यकता जताई जा रही है।

    चिकित्सकों ने स्पष्ट किया है कि ताजी सब्जियों का सेवन पूरी तरह बंद करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि स्वच्छता मानकों का कड़ाई से पालन करना जरूरी है। कच्चे सलाद और सब्जियों को पकाने या खाने से पहले स्वच्छ पानी से अच्छी तरह धोना बेहद आवश्यक है।

    खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार होटलों, रेस्तरां और घरों में उपयोग किए जाने वाले सलाद पत्ता, बर्गर और रैप्स में इस्तेमाल होने वाली सब्जियों की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संक्रमण के लक्षण दिखने पर तत्काल चिकित्सीय परामर्श लेने की सलाह दी गई है।

  • दूध से ज्यादा कैल्शियम देने वाली 6 भारतीय चीजें, हड्डियों की मजबूती के लिए डाइट में शामिल करना हो सकता है फायदेमंद

    दूध से ज्यादा कैल्शियम देने वाली 6 भारतीय चीजें, हड्डियों की मजबूती के लिए डाइट में शामिल करना हो सकता है फायदेमंद

    नई दिल्ली । हड्डियों को मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने के लिए कैल्शियम बेहद जरूरी पोषक तत्व है। आमतौर पर कैल्शियम की जरूरत पूरी करने के लिए दूध को सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है, लेकिन भारतीय खानपान में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद हैं जो कैल्शियम से भरपूर होते हैं। इनमें से कुछ खाद्य पदार्थों में प्रति 100 ग्राम कैल्शियम की मात्रा दूध की तुलना में काफी अधिक हो सकती है। हालांकि किसी भोजन में मौजूद कैल्शियम और शरीर द्वारा अवशोषित होने वाले कैल्शियम की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।

    रागी यानी नाचनी कैल्शियम का एक प्रमुख गैर-डेयरी स्रोत है। इसमें कैल्शियम की मात्रा काफी अधिक होती है और इसे भारतीय भोजन में आसानी से शामिल किया जा सकता है। रागी से रोटी, डोसा, चीला, दलिया और लड्डू तैयार किए जा सकते हैं। इसके अलावा इसमें फाइबर और कई अन्य पोषक तत्व भी पाए जाते हैं, इसलिए संतुलित आहार में इसका इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है।

    तिल यानी सफेद या काले तिल भी कैल्शियम से भरपूर माने जाते हैं। इन्हें चटनी, लड्डू, सब्जी, सलाद या रोटी में मिलाकर खाया जा सकता है। तिल में कैल्शियम के साथ प्रोटीन, स्वस्थ वसा और कई खनिज भी पाए जाते हैं। हालांकि तिल ऊर्जा और वसा से भरपूर होते हैं, इसलिए इन्हें जरूरत के अनुसार सीमित मात्रा में खाना बेहतर है।

    बादाम भी कैल्शियम उपलब्ध कराने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल हैं। इनमें कैल्शियम के साथ प्रोटीन, फाइबर, विटामिन ई और स्वस्थ वसा पाए जाते हैं। रोजाना कुछ बादाम स्नैक के तौर पर खाए जा सकते हैं। इन्हें दूध, दही, दलिया या अन्य व्यंजनों में मिलाकर भी आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    पनीर कैल्शियम और प्रोटीन दोनों का अच्छा स्रोत है। दूध से बने इस खाद्य पदार्थ को भारतीय भोजन में कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। सब्जी, पराठे, सलाद या हल्के स्नैक के रूप में पनीर लिया जा सकता है। हालांकि अलग-अलग प्रकार के पनीर में वसा और कैलोरी की मात्रा अलग हो सकती है, इसलिए संतुलित मात्रा में इसका सेवन करना बेहतर माना जाता है।

    राजगीरा यानी अमरनाथ भी कैल्शियम देने वाले पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों में शामिल है। इसके दानों का इस्तेमाल आटा, दलिया और लड्डू बनाने में किया जाता है। राजगीरा को भोजन में शामिल करने से कैल्शियम के साथ प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व भी मिल सकते हैं। इसी तरह चना और राजमा जैसी फलियां भी कैल्शियम के साथ प्रोटीन और फाइबर प्रदान करती हैं।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी कैल्शियम वाली डाइट का हिस्सा बनाई जा सकती हैं। मेथी और चौलाई जैसी सब्जियों में कैल्शियम के साथ कई विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। हालांकि पालक में कैल्शियम मौजूद होने के बावजूद उसमें पाए जाने वाले ऑक्सालेट के कारण शरीर इसका कैल्शियम पूरी तरह अवशोषित नहीं कर पाता। इसलिए कैल्शियम के लिए अलग-अलग खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करना बेहतर है।

    कैल्शियम का इस्तेमाल शरीर में सही तरीके से होने के लिए विटामिन डी भी महत्वपूर्ण है। पर्याप्त विटामिन डी न होने पर भोजन से मिलने वाले कैल्शियम का अवशोषण प्रभावित हो सकता है। इसलिए हड्डियों की मजबूती के लिए केवल कैल्शियम वाली चीजें खाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि संतुलित आहार, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि और विटामिन डी पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    दूध निश्चित रूप से कैल्शियम का सुविधाजनक स्रोत है, लेकिन इसे कैल्शियम का एकमात्र जरिया मानना जरूरी नहीं है। रागी, तिल, बादाम, पनीर, राजगीरा और फलियों जैसे भारतीय खाद्य पदार्थों को अलग-अलग रूप में भोजन में शामिल करके कैल्शियम की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है। किसी व्यक्ति को कैल्शियम की कमी की आशंका हो या सप्लीमेंट लेने की जरूरत महसूस हो, तो व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • चेहरे की खूबसूरती के लिए नीम का ऐसे करें इस्तेमाल: दाग-धब्बे और पिंपल्स से राहत पाने में मिल सकती है मदद

    चेहरे की खूबसूरती के लिए नीम का ऐसे करें इस्तेमाल: दाग-धब्बे और पिंपल्स से राहत पाने में मिल सकती है मदद


    नई दिल्ली । नीम को भारतीय घरों में लंबे समय से त्वचा और बालों की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। नीम की पत्तियों में प्राकृतिक रूप से कई ऐसे गुण पाए जाते हैं जिन्हें त्वचा के लिए फायदेमंद माना जाता है। खासतौर पर ऑयली स्किन और मुंहासों की समस्या से परेशान लोगों के बीच नीम का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय है। हालांकि त्वचा पर किसी भी प्राकृतिक चीज का इस्तेमाल करने से पहले यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है और किसी भी घरेलू उपाय का असर सभी पर एक जैसा नहीं होता।

    अगर आपकी त्वचा बहुत ऑयली है और चेहरे पर बार बार पिंपल्स निकलते हैं तो नीम का इस्तेमाल त्वचा की सफाई के लिए किया जा सकता है। नीम की कुछ साफ पत्तियों को पानी में उबालकर उस पानी को ठंडा करने के बाद चेहरे को धोने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे त्वचा की सफाई में मदद मिल सकती है। नीम में पाए जाने वाले कुछ प्राकृतिक यौगिकों में एंटीमाइक्रोबियल गुण बताए जाते हैं जो त्वचा पर मौजूद कुछ सूक्ष्मजीवों के खिलाफ काम कर सकते हैं। यही वजह है कि पारंपरिक रूप से नीम को मुंहासे और त्वचा संबंधी परेशानियों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

    नीम की पत्तियों का पेस्ट भी त्वचा की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए ताजी और साफ नीम की पत्तियों को पीसकर हल्का पेस्ट बनाया जा सकता है। इसे चेहरे पर लगाने से पहले हाथ की त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना बेहतर होता है। अगर जलन लालिमा खुजली या किसी तरह की एलर्जी दिखाई दे तो इसे चेहरे पर नहीं लगाना चाहिए। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि प्राकृतिक चीजें भी कुछ लोगों की त्वचा पर प्रतिक्रिया पैदा कर सकती हैं।

    मुंहासों के अलावा नीम को अत्यधिक तैलीय त्वचा के लिए भी उपयोगी माना जाता है। कई बार त्वचा में अतिरिक्त तेल जमा होने के कारण चेहरे पर चिपचिपाहट और बंद रोमछिद्रों की समस्या बढ़ सकती है। ऐसे में त्वचा की नियमित सफाई के साथ हल्के और त्वचा के अनुकूल उत्पादों का इस्तेमाल ज्यादा जरूरी है। नीम को इसका विकल्प नहीं माना जाना चाहिए बल्कि जरूरत के अनुसार अतिरिक्त देखभाल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    अगर चेहरे पर दाग धब्बे या पुराने मुंहासों के निशान हैं तो केवल नीम लगाने से इनके पूरी तरह खत्म होने की गारंटी नहीं है। ऐसे मामलों में सनस्क्रीन का इस्तेमाल त्वचा की देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और त्वचा को बार बार छूने से बचना भी जरूरी है। पिंपल्स को दबाने या फोड़ने से बचना चाहिए क्योंकि इससे सूजन और दाग बढ़ सकते हैं।

    नीम का इस्तेमाल करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नीम का गाढ़ा पेस्ट या तेल हर किसी की त्वचा के लिए उपयुक्त नहीं होता। चेहरे पर नीम का तेल सीधे लगाने से कुछ लोगों को जलन या एलर्जी हो सकती है। अगर मुंहासे बहुत ज्यादा हैं दर्दनाक हैं बार बार हो रहे हैं या त्वचा पर लगातार लालिमा और खुजली बनी हुई है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

    कुल मिलाकर नीम त्वचा की देखभाल में एक पारंपरिक और उपयोगी प्राकृतिक विकल्प हो सकता है। खासकर त्वचा की सफाई और ऑयली स्किन से जुड़ी समस्याओं में इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बेहतर परिणाम के लिए इसे सावधानी से इस्तेमाल करना जरूरी है। साफ सफाई मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन के साथ संतुलित स्किन केयर रूटीन अपनाना त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ रखने में ज्यादा मददगार हो सकता है।

  • मानसून में बुखार खांसी और कमजोरी से परेशान न हों, संक्रमण से बचने के लिए आज से अपनाएं ये जरूरी सावधानियां

    मानसून में बुखार खांसी और कमजोरी से परेशान न हों, संक्रमण से बचने के लिए आज से अपनाएं ये जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां गर्मी से राहत देता है वहीं बदलता मौसम अपने साथ कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी लेकर आता है। बारिश के दौरान तापमान में उतार चढ़ाव नमी बढ़ने और जगह जगह पानी जमा होने के कारण संक्रमण फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं। यही वजह है कि इन दिनों वायरल बुखार सर्दी जुकाम खांसी गले में खराश सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। खासतौर पर बच्चे बुजुर्ग और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को इस मौसम में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है। मौसम में बदलाव के कारण शरीर को तापमान के साथ तालमेल बैठाने में परेशानी हो सकती है और संक्रमण होने का खतरा बढ़ सकता है।

    वायरल बुखार होने पर आमतौर पर शरीर का तापमान बढ़ना थकान कमजोरी सिरदर्द बदन दर्द ठंड लगना भूख कम लगना और गले में खराश जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ लोगों में खांसी और नाक बहने की समस्या भी हो सकती है। हालांकि हर बुखार वायरल ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। डेंगू मलेरिया टाइफाइड और अन्य संक्रमणों में भी बुखार हो सकता है इसलिए लगातार तेज बुखार रहने पर इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    बारिश के मौसम में वायरल संक्रमण से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखा जाए। बाहर से घर लौटने के बाद हाथों को साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। बिना हाथ धोए आंख नाक और मुंह को छूने से बचना चाहिए क्योंकि संक्रमण फैलाने वाले वायरस शरीर में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने के बाद हाथों की सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है। घर में किसी व्यक्ति को सर्दी खांसी या बुखार हो तो उसके साथ बहुत नजदीकी संपर्क से बचना और जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल करना भी संक्रमण के प्रसार को कम कर सकता है।

    बारिश में भीगने के बाद लंबे समय तक गीले कपड़ों में रहने से बचना चाहिए। गीले कपड़े तुरंत बदलकर शरीर को अच्छी तरह सुखाना बेहतर होता है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें क्योंकि ठहरा हुआ पानी मच्छरों के पनपने का कारण बन सकता है। कूलर गमले छत और आसपास की खाली जगहों में जमा पानी को नियमित रूप से साफ करना जरूरी है। इससे मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है।

    अगर बुखार हो जाए तो पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ लेना जरूरी है। डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक या अन्य दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि हर बुखार का कारण बैक्टीरियल संक्रमण नहीं होता। यदि बुखार कई दिनों तक बना रहे बहुत तेज हो जाए या उसके साथ सांस लेने में परेशानी लगातार उल्टी अत्यधिक कमजोरी बेहोशी त्वचा पर दाने या खून आने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    कुल मिलाकर बारिश और बदलते मौसम में वायरल बुखार से बचाव के लिए साफ सफाई पौष्टिक भोजन पर्याप्त नींद सुरक्षित पानी और आसपास की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। थोड़ी सी सावधानी अपनाकर संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है और मानसून का मौसम स्वस्थ रहते हुए बिताया जा सकता है।

  • चश्मे का नंबर बदलने पर बार-बार सिरदर्द और धुंधला दिखना नजरअंदाज न करें, रात में दिखने वाली परेशानी भी हो सकती है संकेत

    चश्मे का नंबर बदलने पर बार-बार सिरदर्द और धुंधला दिखना नजरअंदाज न करें, रात में दिखने वाली परेशानी भी हो सकती है संकेत


    नई दिल्ली ।
    कई लोग वर्षों तक एक ही चश्मे का इस्तेमाल करते रहते हैं और जब तक सामान्य रूप से दिखाई देता है, तब तक आंखों की दोबारा जांच कराने की जरूरत महसूस नहीं करते। हालांकि, समय के साथ आंखों की दृष्टि और चश्मे का नंबर बदल सकता है। ऐसी स्थिति में पुराने नंबर का चश्मा पहनने पर सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, आंखों में थकान और पढ़ने या स्क्रीन देखने के दौरान असहजता जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।

    चश्मे का नंबर बदलने का एक आम संकेत यह हो सकता है कि पहले की तुलना में दूर या पास की चीजें साफ दिखाई न दें। किताब के अक्षर पढ़ने, मोबाइल देखने, कंप्यूटर पर काम करने या दूर लगे बोर्ड को देखने में अतिरिक्त प्रयास करना पड़े तो आंखों की जांच कराना उचित रहता है। हालांकि धुंधली नजर का कारण केवल चश्मे का नंबर बदलना नहीं होता। ड्राई आई, मोतियाबिंद और रेटिना से जुड़ी समस्याएं भी दृष्टि को प्रभावित कर सकती हैं।

    लगातार सिरदर्द भी नजर से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है, खासकर तब जब यह पढ़ने या लंबे समय तक पास की चीजों पर ध्यान केंद्रित करने के बाद बढ़ता हो। आंखों पर लगातार जोर पड़ने से थकान और असहजता महसूस हो सकती है। लेकिन सिरदर्द के कई दूसरे कारण भी होते हैं, इसलिए इसे केवल चश्मे के नंबर से जोड़कर देखना सही नहीं है।

    कुछ लोगों को साफ देखने के लिए आंखें सिकोड़ने की आदत हो जाती है। टीवी देखते समय, सड़क के संकेत पढ़ते हुए या मोबाइल स्क्रीन पर ध्यान केंद्रित करते समय बार-बार आंखें सिकोड़ना दृष्टि में बदलाव का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में आंखों की जांच से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि समस्या अपवर्तन संबंधी है या किसी अन्य कारण से।

    स्क्रीन पर लंबे समय तक काम करने के बाद आंखों में दर्द, भारीपन, जलन, सूखापन या थकान भी हो सकती है। डिजिटल स्क्रीन का लगातार इस्तेमाल आंखों पर दबाव बढ़ा सकता है और इससे सिरदर्द या अस्थायी धुंधलापन जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गलत या अधूरा चश्मा नंबर भी ऐसे लक्षणों को बढ़ा सकता है। इसलिए लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए बीच-बीच में आंखों को आराम देना महत्वपूर्ण है।

    रात में वाहन चलाते समय सामने से आने वाली रोशनी बहुत तेज लगना, सड़क के संकेत स्पष्ट न दिखना या सामान्य परिस्थितियों की तुलना में नजर कमजोर महसूस होना भी जांच कराने का कारण हो सकता है। हालांकि रात में देखने में परेशानी के पीछे सिर्फ चश्मे का नंबर जिम्मेदार नहीं होता। आंखों की दूसरी स्थितियां भी इसका कारण बन सकती हैं।

    आंखों की जांच केवल चश्मे का सही नंबर पता करने तक सीमित नहीं है। नियमित परीक्षण के दौरान आंखों से जुड़ी कई समस्याओं का शुरुआती स्तर पर पता लगाने में मदद मिल सकती है। उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और पहले से मौजूद आंखों की बीमारी के आधार पर जांच की जरूरत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए जांच का अंतराल व्यक्ति की स्थिति के अनुसार नेत्र विशेषज्ञ से तय करना बेहतर है।

    यदि चश्मा पहनने के बावजूद लगातार धुंधला दिखाई दे रहा है, सिरदर्द बना रहता है, आंखों में दर्द या असामान्य थकान महसूस होती है या नजर में अचानक बदलाव आता है, तो खुद से नया नंबर अनुमान लगाने के बजाय नेत्र विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। अचानक नजर कम होना, तेज आंख दर्द या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। सही समय पर आंखों की जांच से समस्या का वास्तविक कारण समझने और उचित उपचार या चश्मे का नंबर निर्धारित करने में मदद मिल सकती है।

  • पेट फूलने को सिर्फ गैस समझना पड़ सकता है भारी, जानिए कब ब्लोटिंग बन सकती है गंभीर बीमारी का संकेत

    पेट फूलने को सिर्फ गैस समझना पड़ सकता है भारी, जानिए कब ब्लोटिंग बन सकती है गंभीर बीमारी का संकेत


    नई दिल्ली। अगर खाना खाने के बाद आपका पेट अचानक गुब्बारे की तरह फूल जाता है और यह समस्या बार बार परेशान करती है तो इसे हर बार सामान्य गैस मानकर नजरअंदाज करना सही नहीं है। कभी कभार पेट फूलना ज्यादा खाना खाने कब्ज गैस या भोजन के दौरान ज्यादा हवा निगलने की वजह से हो सकता है लेकिन अगर ब्लोटिंग लगातार बनी रहती है और इसके साथ पेट दर्द कब्ज दस्त वजन कम होना या भूख में बदलाव जैसे लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं तो इसके पीछे कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक पेट फूलना अपने आप में कोई बीमारी नहीं बल्कि शरीर में चल रही किसी प्रक्रिया का संकेत हो सकता है। इसलिए लंबे समय तक बनी रहने वाली इस परेशानी के वास्तविक कारण को समझना जरूरी है।

    पेट फूलने की सबसे आम वजह पाचन तंत्र में गैस का बढ़ना मानी जाती है। कुछ खाद्य पदार्थ आंतों में ज्यादा गैस पैदा कर सकते हैं जबकि खाना खाते समय बहुत तेजी से खाने या बातचीत करते हुए ज्यादा हवा निगलने से भी पेट में फुलाव महसूस हो सकता है। इसके अलावा कब्ज की समस्या में आंतों में मल जमा रहने के कारण पेट भारी और फूला हुआ लग सकता है। कुछ लोगों को दूध या अन्य खाद्य पदार्थों को पचाने में परेशानी होती है जिसकी वजह से भी ब्लोटिंग बढ़ सकती है।

    गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के मुताबिक इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी IBS भी बार बार पेट फूलने की एक महत्वपूर्ण वजह हो सकती है। इस स्थिति में पेट फूलने के साथ पेट दर्द और शौच की आदतों में बदलाव देखने को मिल सकता है। कुछ लोगों को लगातार कब्ज की परेशानी रहती है जबकि कुछ लोगों को बार बार दस्त हो सकते हैं। तनाव खानपान में गड़बड़ी और पाचन तंत्र से जुड़ी दूसरी परेशानियां भी इसके लक्षणों को बढ़ा सकती हैं। अगर लंबे समय से पेट दर्द के साथ शौच के तरीके में बदलाव हो रहा है तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

    पेट फूलने की समस्या सीलिएक डिजीज से भी जुड़ी हो सकती है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें ग्लूटेन के सेवन के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली छोटी आंत को नुकसान पहुंचाने लगती है। ग्लूटेन गेहूं जौ और राई जैसे अनाजों में पाया जाने वाला प्रोटीन है। इस स्थिति में पेट फूलने के साथ दस्त पेट की परेशानी और वजन कम होने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और आहार में जरूरी बदलाव किए जाते हैं।

    कुछ मामलों में लगातार बढ़ता हुआ पेट लिवर से जुड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकता है। लिवर की गंभीर समस्या में पेट के भीतर तरल पदार्थ जमा हो सकता है जिसे जलोदर कहा जाता है। इसकी वजह से पेट धीरे धीरे बढ़ा हुआ दिखाई दे सकता है और पेट भारी या तना हुआ महसूस हो सकता है। इसके साथ पैरों में सूजन त्वचा या आंखों में पीलापन कमजोरी और भूख कम लगने जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं।

    इसलिए अगर पेट फूलने की समस्या कभी कभार होती है और सामान्य खानपान में बदलाव से ठीक हो जाती है तो बहुत ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर ब्लोटिंग लगातार बनी हुई है या इसके साथ तेजी से वजन कम होना मल में खून आना बार बार उल्टी होना तेज पेट दर्द या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दे रहे हैं तो डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। केवल घरेलू नुस्खों के सहारे समस्या को दबाने के बजाय उसके वास्तविक कारण की जांच कराना ज्यादा जरूरी है। सही समय पर कारण की पहचान और उपचार से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है।