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  • बरसात में सेहत का रखें पूरा ख्याल: संक्रमण और मच्छरों से बचने के लिए जानिए रोजाना की जरूरी सावधानियां

    बरसात में सेहत का रखें पूरा ख्याल: संक्रमण और मच्छरों से बचने के लिए जानिए रोजाना की जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली। बारिश का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन इस दौरान वातावरण में नमी बढ़ने और जगह जगह पानी जमा होने से कई तरह के संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है। गंदा पानी दूषित भोजन और मच्छरों की बढ़ती संख्या बरसात के दिनों में परेशानी का कारण बन सकती है। ऐसे में मौसम का आनंद लेने के साथ अपनी सेहत को लेकर थोड़ी अतिरिक्त सावधानी रखना जरूरी हो जाता है। रोजमर्रा की कुछ अच्छी आदतें अपनाकर बारिश के मौसम में बीमार पड़ने की संभावना को कम किया जा सकता है।

    बरसात में सबसे पहले साफ पानी पीने पर ध्यान देना चाहिए। बारिश के दौरान पानी के स्रोत दूषित होने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए पीने के लिए साफ और सुरक्षित पानी का इस्तेमाल करें। अगर पानी की गुणवत्ता को लेकर संदेह हो तो उसे उबालकर या उचित Water Purification Method से सुरक्षित करने के बाद इस्तेमाल करना बेहतर होता है। बाहर से मिलने वाले ऐसे पेय पदार्थों से भी सावधानी रखना जरूरी है जिनकी साफ सफाई को लेकर भरोसा न हो।

    खाने को लेकर भी बरसात में विशेष सावधानी जरूरी है। सड़क किनारे खुले में रखे खाद्य पदार्थ धूल और गंदगी के संपर्क में आ सकते हैं। नमी और गर्म वातावरण में कुछ खाद्य पदार्थ जल्दी खराब भी हो सकते हैं। इसलिए कोशिश करें कि ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन ही खाएं। फल और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर इस्तेमाल करें और लंबे समय तक बाहर रखा हुआ खाना खाने से बचें।

    बारिश के मौसम में मच्छरों की संख्या बढ़ना भी आम समस्या है। घर के आसपास गमले कूलर की ट्रे बाल्टी छत और दूसरी जगहों पर पानी जमा न होने दें। पानी जमा होने पर मच्छरों को पनपने का मौका मिल सकता है। घर के आसपास नियमित रूप से सफाई करना और जहां जरूरी हो वहां मच्छररोधी उपाय अपनाना मददगार हो सकता है। सोते समय मच्छरदानी या अन्य सुरक्षित उपायों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

    गीले कपड़े और लंबे समय तक नमी में रहने से भी बचना चाहिए। बारिश में भीगने के बाद शरीर और कपड़ों को जल्द से जल्द सुखाना बेहतर होता है। पैरों को खास तौर पर सूखा रखना जरूरी है क्योंकि लगातार गीले जूते या मोजे पहनने से त्वचा संबंधी परेशानी हो सकती है। बाहर से लौटने के बाद हाथ पैर साफ पानी से धोना और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

    बरसात में घर की सफाई पर भी ध्यान दें। सीलन और गंदगी वाली जगहों को साफ रखें तथा कमरे में पर्याप्त हवा और रोशनी आने दें। घर के आसपास नालियों में पानी रुकने या कचरा जमा होने की स्थिति हो तो उसे साफ कराने की कोशिश करें। बच्चों और बुजुर्गों को गंदे पानी या कीचड़ वाली जगहों से दूर रखना भी जरूरी है।

    अगर बारिश के मौसम में लगातार बुखार उल्टी दस्त सांस लेने में परेशानी त्वचा पर असामान्य लक्षण या कोई अन्य गंभीर समस्या दिखाई दे तो इसे सामान्य मौसम का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से संपर्क करना उचित रहता है। खासकर तेज बुखार या शरीर में पानी की कमी जैसे लक्षणों में समय पर चिकित्सकीय सलाह जरूरी हो सकती है।

    कुल मिलाकर बरसात में स्वस्थ रहने के लिए साफ पानी सुरक्षित भोजन मच्छरों से बचाव व्यक्तिगत स्वच्छता और आसपास की सफाई पर ध्यान देना जरूरी है। थोड़ी सी सावधानी बारिश के मौसम को ज्यादा सुरक्षित और आरामदायक बनाने में मदद कर सकती है।

  • नींद में बोलना सिर्फ सपना नहीं हो सकता बार बार बड़बड़ाने की आदत के पीछे छिपी हो सकती है ये वजह

    नींद में बोलना सिर्फ सपना नहीं हो सकता बार बार बड़बड़ाने की आदत के पीछे छिपी हो सकती है ये वजह


    नई दिल्ली। रात में सोते समय अचानक बोलना या बड़बड़ाना कई लोगों के साथ होता है। अक्सर परिवार के दूसरे सदस्य इस आदत को नोटिस करते हैं जबकि बोलने वाले व्यक्ति को सुबह उठने के बाद इसकी जानकारी भी नहीं होती। आमतौर पर नींद में बोलना किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता और कई मामलों में यह अपने आप होने वाली सामान्य नींद संबंधी प्रक्रिया है। फिर भी अगर यह समस्या लगातार होने लगे या इसके साथ नींद में अन्य असामान्य गतिविधियां दिखाई दें तो इसके पीछे छिपे कारण को समझना जरूरी हो जाता है।

    नींद में बोलने या बड़बड़ाने की स्थिति को सोमनीलोक्वी कहा जाता है। इसे पैरासोमनिया यानी नींद के दौरान होने वाले असामान्य व्यवहारों की श्रेणी में रखा जाता है। इस दौरान व्यक्ति नींद में शब्द बोल सकता है या कभी कभी पूरे वाक्य भी कह सकता है। कई लोगों को सुबह उठने पर यह याद नहीं रहता कि उन्होंने रात में कुछ कहा था। कुछ स्थितियों में नींद में बोलने के साथ हाथ पैर हिलाना या अचानक करवट बदलना जैसी गतिविधियां भी देखी जा सकती हैं।

    नींद में बड़बड़ाने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। सपने इसका एक सामान्य कारण माने जाते हैं। जब व्यक्ति सपने देख रहा होता है तो दिमाग अलग अलग भावनाओं और घटनाओं को संसाधित करता रहता है। इसी दौरान कभी कभी नींद में आवाज निकल सकती है। दिनभर की घटनाओं का मानसिक दबाव भी नींद के दौरान व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। खासकर तनाव और चिंता की स्थिति में नींद प्रभावित हो सकती है और नींद में बोलने की संभावना बढ़ सकती है।

    बुरे सपने भी नींद में बोलने का एक कारण हो सकते हैं। डर या तनाव से जुड़े सपने के दौरान कुछ लोग नींद में बोलते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति जो नींद में बोलता है वह किसी मानसिक या शारीरिक बीमारी से परेशान है। कई स्वस्थ लोगों में भी कभी कभी ऐसा देखा जा सकता है।

    नींद की कमी और अनियमित सोने का समय भी इस समस्या को बढ़ा सकता है। अगर व्यक्ति लगातार देर रात तक जागता है या पर्याप्त नींद नहीं लेता है तो नींद का सामान्य चक्र प्रभावित हो सकता है। इसी वजह से सोने और जागने का समय नियमित रखना जरूरी है। इसके साथ ही सोने से पहले चाय कॉफी जैसे कैफीन वाले पेय पदार्थों का अधिक सेवन करने से बचना चाहिए क्योंकि ये कुछ लोगों में नींद को प्रभावित कर सकते हैं। शराब का सेवन भी नींद की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।

    बेहतर नींद के लिए सोने से पहले मोबाइल और दूसरे स्क्रीन टाइम को कम करना भी मददगार हो सकता है। कमरे का वातावरण शांत और आरामदायक रखना चाहिए। किताब पढ़ना हल्का संगीत सुनना या कुछ देर शांत होकर बैठना दिमाग को आराम देने वाली दिनचर्या का हिस्सा बनाया जा सकता है।

    अगर नींद में बोलना कभी कभी होता है और इससे व्यक्ति की नींद या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित नहीं हो रही है तो आमतौर पर घबराने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर यह समस्या बहुत अधिक बढ़ जाए या इसके साथ नींद में हिंसक हरकतें तेज चीखना चलना बार बार बुरे सपने आना या दिन में अत्यधिक नींद जैसी परेशानी हो तो डॉक्टर या स्लीप विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित हो सकता है। सही कारण की पहचान के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि समस्या सामान्य है या किसी अन्य स्लीप डिसऑर्डर से जुड़ी हुई है।

  • रूखे और बेजान बालों के लिए दही-केला हेयर पैक: ऐसे करें इस्तेमाल बाल हो सकते हैं मुलायम और चमकदार

    रूखे और बेजान बालों के लिए दही-केला हेयर पैक: ऐसे करें इस्तेमाल बाल हो सकते हैं मुलायम और चमकदार


    नई दिल्ली। बालों की खूबसूरती बनाए रखने के लिए लोग कई तरह के हेयर केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों से भी बालों की देखभाल की जा सकती है। दही और केला ऐसा ही घरेलू संयोजन है जिसे हेयर पैक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। केले में पोषक तत्व और दही में प्रोटीन तथा लैक्टिक एसिड पाया जाता है। ये चीजें बालों और स्कैल्प को कंडीशनिंग देने में मदद कर सकती हैं। खासतौर पर रूखे और बेजान बालों को मुलायम महसूस कराने के लिए यह घरेलू पैक इस्तेमाल किया जाता है।

    दही और केले का हेयर पैक तैयार करना काफी आसान है। इसके लिए एक पका हुआ केला लें और उसे अच्छी तरह मैश कर लें। इसमें दो से तीन चम्मच ताजा दही मिलाकर दोनों को तब तक अच्छी तरह मिलाएं जब तक एक स्मूद पेस्ट तैयार न हो जाए। अगर बाल बहुत ज्यादा रूखे हैं तो इसमें थोड़ी मात्रा में एलोवेरा जेल भी मिलाया जा सकता है। तैयार मिश्रण को बालों की लंबाई और सिरों पर अच्छी तरह लगाएं। स्कैल्प पर लगाने से पहले यह ध्यान रखें कि वहां किसी तरह की जलन या संक्रमण की समस्या न हो।

    इस पैक को बालों में करीब 20 से 30 मिनट तक रखा जा सकता है। इसके बाद सामान्य पानी से बालों को अच्छी तरह धो लें। केले के छोटे टुकड़े बालों में चिपक सकते हैं इसलिए पैक को पूरी तरह साफ करना जरूरी है। जरूरत पड़ने पर हल्के शैंपू से बाल धोए जा सकते हैं। पैक को बहुत देर तक बालों में लगाकर रखने से अतिरिक्त फायदा मिलने की गारंटी नहीं है इसलिए सीमित समय तक ही इस्तेमाल करना बेहतर है।

    दही बालों को कंडीशनिंग देने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व बालों को मुलायम महसूस कराने में भूमिका निभा सकते हैं। वहीं केला बालों की नमी बनाए रखने में मदद करने वाले हेयर पैक में इस्तेमाल किया जाता है। दोनों को मिलाकर लगाने से बालों में अस्थायी तौर पर सॉफ्टनेस और चमक महसूस हो सकती है। खासकर ऐसे बाल जिनमें रूखापन और फ्रिजीनेस ज्यादा है उनके लिए यह पैक उपयोगी लग सकता है।

    इस घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल सप्ताह में एक बार किया जा सकता है। हालांकि इसका असर हर व्यक्ति के बालों के प्रकार और स्कैल्प की स्थिति पर अलग हो सकता है। अगर बाल बहुत ऑयली हैं तो दही और केले की मात्रा कम रखी जा सकती है। वहीं बहुत ड्राई बालों में पैक को केवल बालों की लंबाई और सिरों तक लगाने से बेहतर कंडीशनिंग मिल सकती है।

    दही और केले का पैक इस्तेमाल करते समय कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। अगर स्कैल्प पर खुजली लालिमा घाव या फंगल इंफेक्शन जैसी समस्या है तो इसे लगाने से बचें। पहली बार इस्तेमाल करने वाले लोग थोड़ी मात्रा लेकर पैच टेस्ट कर सकते हैं। किसी तरह की जलन या एलर्जी महसूस होने पर तुरंत धो दें। इसके अलावा बालों के झड़ने की समस्या लगातार बनी हुई है या बहुत ज्यादा बढ़ गई है तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होगा।

    बालों को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ बाहरी देखभाल पर्याप्त नहीं होती। संतुलित आहार पर्याप्त पानी अच्छी नींद और नियमित हेयर केयर भी जरूरी है। दही और केला हेयर पैक बालों को मुलायम और व्यवस्थित दिखाने में मदद कर सकता है लेकिन इसे बालों की किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जाना चाहिए। सही तरीके और सीमित मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह घरेलू हेयर केयर रूटीन का एक आसान विकल्प हो सकता है।

  • ऑरेंज से चेहरे की देखभाल का आसान तरीका: विटामिन C से त्वचा को मिल सकता है नेचुरल निखार

    ऑरेंज से चेहरे की देखभाल का आसान तरीका: विटामिन C से त्वचा को मिल सकता है नेचुरल निखार


    नई दिल्ली। संतरा केवल स्वाद और सेहत के लिए ही फायदेमंद फल नहीं माना जाता बल्कि इसमें मौजूद विटामिन C और कई एंटीऑक्सीडेंट त्वचा की देखभाल में भी उपयोगी हो सकते हैं। संतरे को डाइट में शामिल करने के साथ इसके गूदे और छिलके का इस्तेमाल कुछ घरेलू स्किन केयर तरीकों में किया जाता है। नियमित और सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा अधिक फ्रेश और स्वस्थ नजर आ सकती है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू नुस्खे को चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है।

    संतरे में विटामिन C अच्छी मात्रा में पाया जाता है। यह एक एंटीऑक्सीडेंट है जो त्वचा को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में भूमिका निभाता है। संतरे का सेवन शरीर को विटामिन C उपलब्ध कराता है और यह सामान्य कोलेजन निर्माण के लिए भी जरूरी पोषक तत्व है। कोलेजन त्वचा की संरचना को बनाए रखने में मदद करता है। इसी वजह से संतरे जैसे विटामिन C युक्त फलों को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना स्किन हेल्थ के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    अगर आप संतरे को त्वचा पर इस्तेमाल करना चाहते हैं तो सबसे आसान तरीका संतरे के गूदे को हल्के हाथों से चेहरे पर लगाना हो सकता है। संतरे के गूदे को मैश करके चेहरे पर पतली परत लगाएं और कुछ मिनट बाद सामान्य पानी से धो लें। इसके बाद हल्का मॉइस्चराइजर लगाया जा सकता है। चेहरे पर किसी भी तरह की जलन या खुजली महसूस हो तो तुरंत इसे धो दें और दोबारा इस्तेमाल न करें।

    संतरे के छिलके का पाउडर भी घरेलू फेस पैक में इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए सूखे संतरे के छिलके का बारीक पाउडर लेकर उसमें दही या एलोवेरा जेल मिलाया जा सकता है। इस मिश्रण को चेहरे पर लगाकर थोड़ी देर के लिए छोड़ें और फिर पानी से साफ कर लें। यह तरीका त्वचा को मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि खट्टे फलों से कुछ लोगों की त्वचा में जलन या लालिमा हो सकती है।

    संतरे के रस को सीधे चेहरे पर लगाना हर किसी के लिए सही नहीं माना जा सकता। खट्टे फलों में मौजूद एसिड कुछ लोगों की त्वचा में जलन पैदा कर सकता है और धूप के संपर्क में आने पर संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इसलिए संतरे के रस को बिना सोचे समझे चेहरे पर लगाने के बजाय सुरक्षित और सौम्य स्किन केयर प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना बेहतर विकल्प हो सकता है। यदि आप घरेलू नुस्खा आजमाना चाहते हैं तो पहले हाथ या कान के पीछे छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट जरूर करें।

    ऑरेंज स्किन केयर का फायदा केवल बाहर से लगाने तक सीमित नहीं है। संतरे को खाने से शरीर को विटामिन C और पानी के साथ कई अन्य पोषक तत्व मिलते हैं। संतुलित आहार में संतरा शामिल करने के साथ पर्याप्त पानी पीना नींद पूरी करना और त्वचा को धूप से बचाना भी जरूरी है। दिन में बाहर निकलते समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना स्किन केयर रूटीन का अहम हिस्सा है।

    अगर त्वचा पर लगातार दाने लालिमा खुजली या जलन की समस्या रहती है तो घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। संतरा स्किन केयर का एक सहायक हिस्सा हो सकता है लेकिन इसे किसी बीमारी या त्वचा की गंभीर समस्या का इलाज नहीं माना जाना चाहिए। सही खानपान नियमित देखभाल और त्वचा के प्रकार के अनुसार उत्पादों का चुनाव ही स्वस्थ त्वचा के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

  • रोजाना हैवी मेकअप से बचना है तो स्किन टिंट आजमाएं, जानिए लगाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    रोजाना हैवी मेकअप से बचना है तो स्किन टिंट आजमाएं, जानिए लगाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    नई दिल्ली । मेकअप का ट्रेंड लगातार बदलता रहता है और इन दिनों नेचुरल लुक को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। खासतौर पर रोजाना ऑफिस, कॉलेज या दिन के समय बाहर जाने वाली महिलाएं चेहरे पर भारी मेकअप की परत लगाने के बजाय हल्का और फ्रेश लुक पसंद कर रही हैं। इसी वजह से नो मेकअप लुक का चलन बढ़ा है और फुल-कवरेज फाउंडेशन की जगह स्किन टिंट, टिंटेड सनस्क्रीन और टिंटेड मॉयश्चराइजर जैसे विकल्प लोकप्रिय हो रहे हैं।

    स्किन टिंट ऐसा मेकअप प्रोडक्ट है, जो फाउंडेशन की तुलना में कम कवरेज देता है। इसका मुख्य उद्देश्य चेहरे पर भारी परत चढ़ाने के बजाय त्वचा के रंग को थोड़ा एकसार करना और नेचुरल लुक बनाए रखना है। यह दाग-धब्बों और पिगमेंटेशन को पूरी तरह छिपाने के बजाय उनकी दिखाई देने वाली तीव्रता को कुछ कम कर सकता है। इससे त्वचा की प्राकृतिक बनावट बनी रहती है और चेहरा ज्यादा फ्रेश नजर आता है।

    आजकल बाजार में अलग-अलग स्किन टोन के अनुसार स्किन टिंट के कई शेड उपलब्ध हैं। कुछ प्रोडक्ट में मॉयश्चराइजिंग सामग्री और हयालूरोनिक एसिड जैसे तत्व भी शामिल होते हैं। हालांकि, किसी भी प्रोडक्ट का चुनाव करते समय अपनी त्वचा के प्रकार और जरूरत को ध्यान में रखना जरूरी है।

    स्किन टिंट के बढ़ते चलन की एक वजह इसका हल्का बेस भी है। लंबे समय तक चेहरे पर फुल-कवरेज फाउंडेशन लगाए रखने से कुछ लोगों को रूखापन या पैची लुक महसूस हो सकता है। इसके मुकाबले हल्का बेस रोजाना के मेकअप के लिए ज्यादा सुविधाजनक विकल्प लग सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फाउंडेशन की जरूरत खत्म हो गई है। जब ज्यादा कवरेज चाहिए हो, तब फाउंडेशन बेहतर विकल्प हो सकता है।

    स्किन टिंट लगाने के लिए सबसे पहले चेहरे को अच्छी तरह साफ करना चाहिए। इसके बाद त्वचा के अनुसार मॉयश्चराइजर लगाएं और फिर सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें। जरूरत महसूस होने पर स्किन टाइप के मुताबिक प्राइमर भी लगाया जा सकता है। इसके बाद हाथ पर स्किन टिंट की कुछ बूंदें लें और उंगलियों की मदद से चेहरे पर हल्के हाथों से लगाएं।

    टिंट को पूरे चेहरे पर समान रूप से फैलाने के बाद इसे अच्छी तरह ब्लेंड करना जरूरी है। इसके लिए उंगलियों या गीले मेकअप स्पंज का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्लेंडिंग सही तरीके से करने पर बेस ज्यादा प्राकृतिक दिखाई देता है। इसके बाद जरूरत के अनुसार हल्का ब्लश लगाकर रोजाना का मेकअप पूरा किया जा सकता है।

    स्किन टिंट खरीदते समय केवल ट्रेंड को देखकर प्रोडक्ट नहीं चुनना चाहिए। अपनी स्किन टोन और स्किन टाइप के अनुसार सही शेड और फॉर्मूला चुनना जरूरी है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को किसी नए मेकअप प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना चाहिए। इससे किसी संभावित एलर्जी या त्वचा संबंधी प्रतिक्रिया का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

    नो मेकअप लुक का उद्देश्य चेहरे को पूरी तरह बदलने के बजाय उसकी प्राकृतिक बनावट को बनाए रखते हुए हल्का और फ्रेश लुक देना है। ऐसे में स्किन टिंट उन लोगों के लिए एक विकल्प हो सकता है, जिन्हें रोजाना भारी बेस पसंद नहीं है। वहीं ज्यादा कवरेज या दाग-धब्बों को पूरी तरह छिपाने की जरूरत होने पर फाउंडेशन अधिक उपयुक्त रह सकता है।

  • नाम या सामान भूलना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार रास्ता भूलना और फैसलों में परेशानी खतरे का संकेत

    नाम या सामान भूलना सामान्य हो सकता है, लेकिन बार-बार रास्ता भूलना और फैसलों में परेशानी खतरे का संकेत

    नई दिल्ली ।उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त में कुछ बदलाव आना सामान्य माना जा सकता है। किसी व्यक्ति का नाम तुरंत याद न आना, सामान रखने के बाद उसकी जगह भूल जाना या किसी तारीख को याद करने में थोड़ा अधिक समय लगना उम्र से जुड़ी सामान्य भूल का हिस्सा हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति आमतौर पर अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां खुद करने में सक्षम रहता है।

    हालांकि, हर तरह की भूल को उम्र का सामान्य प्रभाव मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। बढ़ती उम्र में डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी स्थितियों का खतरा भी बढ़ सकता है। डिमेंशिया में केवल याददाश्त ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि सोचने-समझने, निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भाषा से जुड़ी क्षमताओं में भी बदलाव आ सकता है। इसका असर धीरे-धीरे व्यक्ति के रोजमर्रा के जीवन पर दिखाई देने लगता है।

    सामान्य उम्र से जुड़ी भूल और डिमेंशिया के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि डिमेंशिया की स्थिति में व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। यदि कोई व्यक्ति बार-बार एक ही सवाल पूछ रहा है, परिचित जगह पर जाने के बावजूद रास्ता भूल जाता है या सामान्य बातचीत के दौरान जरूरी शब्द याद नहीं कर पाता, तो इन संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है।

    पैसों और जरूरी दस्तावेजों को संभालने में अचानक परेशानी होना भी एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। बिलों का हिसाब रखने, रोजमर्रा के कामों की योजना बनाने या पहले आसानी से किए जाने वाले फैसले लेने में लगातार कठिनाई होने लगे तो इसे केवल उम्र का असर मानना सही नहीं है।

    कुछ मामलों में व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व में भी बदलाव दिखाई दे सकता है। पहले की तुलना में बातचीत करने, ध्यान लगाने या सामान्य परिस्थितियों को समझने में परेशानी बढ़ सकती है। यदि ऐसे बदलाव लगातार दिखाई दे रहे हैं और उनकी वजह से रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं, तो चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी हो सकता है।

    दूसरी ओर, याददाश्त कमजोर होने का अर्थ हमेशा डिमेंशिया नहीं होता। इसके पीछे कई ऐसे कारण भी हो सकते हैं जिनकी पहचान और उपचार संभव है। नींद की समस्या, लंबे समय तक बना तनाव, डिप्रेशन, थायरॉइड से जुड़ी परेशानी और विटामिन बी12 जैसे जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी याददाश्त और ध्यान को प्रभावित कर सकती है।

    इसलिए बुजुर्ग व्यक्ति में अचानक या तेजी से बढ़ती याददाश्त की समस्या को खुद से डिमेंशिया का संकेत मान लेना उचित नहीं है। समस्या के पीछे वास्तविक कारण जानने के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी होता है। लक्षणों की अवधि, उनकी गंभीरता और रोजमर्रा की गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाता है।

    परिवार के सदस्यों की भूमिका भी इस दौरान महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति में बार-बार भूलने के साथ व्यवहार, भाषा, निर्णय लेने या रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में लगातार बदलाव दिखाई दे रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से समस्या के कारण को समझने और आवश्यक कदम तय करने में मदद मिल सकती है।

  • उम्र बढ़ने पर पैरों की कमजोरी से बचने के लिए कुर्सी पर बैठकर उठने की एक्सरसाइज बताई फिजियोथेरेपिस्ट ने

    उम्र बढ़ने पर पैरों की कमजोरी से बचने के लिए कुर्सी पर बैठकर उठने की एक्सरसाइज बताई फिजियोथेरेपिस्ट ने


    नई दिल्ली ।उम्र बढ़ने के साथ शरीर की मोबिलिटी कम होने लगती है। चलना, बैठना, खड़े होना और रोजमर्रा के दूसरे कामों के लिए शरीर के जोड़ों और पैरों की मजबूती जरूरी होती है। पैरों में कमजोरी आने पर सीढ़ियां चढ़ने, कुर्सी से उठने या बिना सहारे चलने जैसे सामान्य काम भी मुश्किल हो सकते हैं। ऐसे में फिटनेस के लिए नियमित वॉक करने के साथ ऐसी एक्सरसाइज पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई गई है, जिसमें पैरों और घुटनों की ज्यादा मूवमेंट हो।

    वॉकिंग को उम्र बढ़ने के साथ फिट रहने के लिए उपयोगी गतिविधि माना जाता है। हालांकि, केवल चलने से पैरों और घुटनों की वह मजबूती हासिल नहीं होती, जिसकी जरूरत रोजमर्रा की कई गतिविधियों में पड़ती है। फिजियोथेरेपिस्ट जॉन थॉमसन ने बुजुर्ग लोगों के साथ काम करने के अनुभव के आधार पर बताया कि लंबे समय से वॉक करने वाले कुछ लोगों को भी सीढ़ियां चढ़ने और कुर्सी से उठने में परेशानी होती है।

    इसके पीछे एक कारण वॉकिंग के दौरान घुटनों और जोड़ों की सीमित मूवमेंट बताई गई है। चलते समय घुटने बहुत ज्यादा नहीं मुड़ते, जबकि दैनिक जीवन में कई काम ऐसे हैं जिनमें घुटनों को अधिक मोड़ने की आवश्यकता होती है। टॉयलेट जाने, बैठने और फिर खड़े होने जैसी गतिविधियों में पैरों और घुटनों पर अलग तरह का दबाव पड़ता है। इसलिए केवल वॉकिंग के बजाय ऐसी एक्सरसाइज को भी दिनचर्या में शामिल करने की जरूरत बताई गई है, जिसमें जोड़ों को अधिक मूवमेंट मिले।

    फिजियोथेरेपिस्ट के अनुसार इसके लिए एक सरल एक्सरसाइज की जा सकती है, जिसे करने में करीब एक मिनट का समय लगता है। इस एक्सरसाइज में पैरों और घुटनों को अधिक मोड़ना पड़ता है, जिससे जोड़ों को उनकी सामान्य गतिविधियों के अनुरूप मूवमेंट मिलता है। इसे पैरों की मजबूती और मोबिलिटी से जोड़कर बताया गया है।

    यह एक्सरसाइज सिटअप के रूप में बताई गई है, जिसमें कुर्सी पर बैठकर दोबारा खड़ा होना होता है। इसे करने के लिए पहले कुर्सी पर बैठना है और फिर खड़ा होना है। इसके बाद दोबारा बैठना और खड़ा होना जारी रखना है। इस प्रक्रिया को कुल 30 बार करने की बात कही गई है।

    यह गतिविधि स्क्वाट्स की तरह काम करती है और इसमें पैरों तथा घुटनों को बार-बार मोड़ना और सीधा करना पड़ता है। बुजुर्ग लोगों के लिए इसे पैरों की मजबूती बढ़ाने वाली एक्सरसाइज के रूप में बताया गया है। नियमित वॉक के साथ ऐसी गतिविधि करने से रोजमर्रा के कामों में जरूरी पैरों की ताकत और मोबिलिटी पर काम किया जा सकता है।

    पैरों की कमजोरी उम्र बढ़ने के साथ दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। लंबे समय तक वॉक करने के बावजूद अगर कुर्सी से उठने, सीढ़ियां चढ़ने या सामान्य गतिविधियों में परेशानी होती है, तो पैरों की ताकत और जोड़ों की मूवमेंट पर भी ध्यान देना जरूरी बताया गया है। सिटअप एक्सरसाइज को इसी उद्देश्य से कम समय में की जाने वाली गतिविधि के तौर पर बताया गया है।

  • 8 घंटे की नींद के बाद भी सुबह थकान रहती है तो इन स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज न करें, जानें प्रमुख कारण

    8 घंटे की नींद के बाद भी सुबह थकान रहती है तो इन स्वास्थ्य समस्याओं को नजरअंदाज न करें, जानें प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सुबह आंख खुलने के बाद शरीर भारी महसूस होना, बिस्तर से उठने का मन न करना और रातभर सोने के बावजूद तरोताजा महसूस न होना कई लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। आमतौर पर पर्याप्त नींद के बाद शरीर को आराम और ऊर्जा महसूस होनी चाहिए, लेकिन अगर हर दिन सुबह उठने के बाद थकान बनी रहती है तो इसके कारणों पर ध्यान देना जरूरी है।

    कभी-कभार देर रात तक जागने, पर्याप्त नींद न लेने या तनाव के कारण सुबह कमजोरी और सुस्ती महसूस हो सकती है। खान-पान में गड़बड़ी और नियमित व्यायाम की कमी भी शरीर की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है। लेकिन पर्याप्त समय सोने के बाद भी लगातार थकान रहना केवल नींद की कमी का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।

    शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया सुबह की थकान का एक कारण हो सकता है। एनीमिया की स्थिति में शरीर की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसके कारण व्यक्ति को कमजोरी और लगातार थकान के साथ सांस फूलने या दिल की धड़कन तेज महसूस होने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। यदि सामान्य काम करने पर भी जल्दी थकान होने लगे तो इस समस्या पर ध्यान देना जरूरी है।

    थायरॉइड से जुड़ी समस्या भी लगातार थकान और ऊर्जा की कमी का कारण बन सकती है। हाइपोथायरॉइडिज्म में थायरॉइड हार्मोन का स्तर कम होने से शरीर की कई सामान्य प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसके साथ वजन बढ़ना, सामान्य से अधिक ठंड लगना, कब्ज और ध्यान लगाने में परेशानी जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।

    डायबिटीज में भी लंबे समय तक थकान बनी रह सकती है। इसलिए अगर सुबह की कमजोरी लगातार बनी हुई है और इसके साथ अन्य असामान्य बदलाव भी महसूस हो रहे हैं तो इसे केवल उम्र, ज्यादा काम या नींद की कमी से जोड़कर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    नींद की गुणवत्ता भी सुबह की थकान का महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। कुछ लोगों को पर्याप्त घंटे बिस्तर पर रहने के बावजूद गहरी और लगातार नींद नहीं मिल पाती। स्लीप एपनिया जैसी स्थिति में सोते समय सांस लेने में रुकावट आ सकती है। इसके कारण नींद बार-बार टूट सकती है और व्यक्ति को सुबह उठने के बाद भी ऐसा लग सकता है कि रातभर पर्याप्त आराम नहीं मिला।

    तनाव और मानसिक दबाव भी नींद और ऊर्जा के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह असंतुलित खान-पान और शारीरिक गतिविधि की कमी से भी दिनभर सुस्ती और थकान महसूस हो सकती है। इसलिए लगातार बनी रहने वाली थकान के पीछे केवल एक कारण मान लेना उचित नहीं है।

    अगर सुबह उठने के बाद नियमित रूप से थकान रहती है तो इसके साथ दिखाई देने वाले दूसरे लक्षणों पर भी ध्यान देना चाहिए। बार-बार पेशाब आना, वजन में बदलाव, अत्यधिक ठंड लगना, सांस फूलना, कमजोरी या नींद के दौरान घुटन और हांफने जैसी समस्या किसी अंतर्निहित स्वास्थ्य स्थिति की ओर संकेत कर सकती है।

    कभी-कभार होने वाली थकान सामान्य हो सकती है, लेकिन अगर यह समस्या लगातार बनी हुई है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे हैं तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। डॉक्टर लक्षणों और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर आवश्यक जांच की सलाह दे सकते हैं। एनीमिया, थायरॉइड और अन्य संभावित कारणों की पहचान होने पर समस्या के अनुसार उपचार और जीवनशैली में बदलाव किए जा सकते हैं।

    सुबह की थकान को लंबे समय तक नजरअंदाज करने के बजाय नींद की गुणवत्ता, खान-पान, तनाव और शारीरिक गतिविधि पर ध्यान देना भी जरूरी है। पर्याप्त नींद लेने के बावजूद लगातार ऊर्जा की कमी बनी रहे तो इसके पीछे छिपे स्वास्थ्य कारणों की जांच कराना समस्या को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • जयपुर की खूबसूरती सिर्फ हवामहल तक नहीं इन शानदार जगहों पर पहुंचे बिना अधूरी रहेगी आपकी राजस्थान यात्रा

    जयपुर की खूबसूरती सिर्फ हवामहल तक नहीं इन शानदार जगहों पर पहुंचे बिना अधूरी रहेगी आपकी राजस्थान यात्रा


    नई दिल्ली। राजस्थान की यात्रा की बात हो और जयपुर का नाम न आए ऐसा बहुत कम ही होता है। गुलाबी शहर के नाम से मशहूर जयपुर अपनी ऐतिहासिक इमारतों शाही महलों किलों रंगीन बाजारों और राजस्थानी संस्कृति के लिए देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहां की खासियत यह है कि शहर में घूमते हुए आपको इतिहास वास्तुकला खानपान और स्थानीय संस्कृति का ऐसा मेल देखने को मिलता है जो यात्रा को खास बना देता है। अगर आप जयपुर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो कुछ जगहों को अपनी यात्रा में जरूर शामिल करना चाहिए।

    जयपुर की पहचान बनने वाली सबसे प्रसिद्ध जगहों में हवामहल का नाम सबसे ऊपर आता है। गुलाबी रंग की इस ऐतिहासिक इमारत की खिड़कियों और झरोखों की खूबसूरत बनावट पर्यटकों को आकर्षित करती है। सुबह या शाम के समय हवामहल के आसपास का इलाका घूमने और तस्वीरें लेने के लिए भी काफी लोकप्रिय है। इसके बाद आप सिटी पैलेस का रुख कर सकते हैं। यहां राजघराने से जुड़े महल संग्रहालय और ऐतिहासिक वस्तुओं के जरिए जयपुर के शाही अतीत की झलक मिलती है।

    अगर आपको किले और पहाड़ों का नजारा पसंद है तो आमेर किला आपकी यात्रा का अहम हिस्सा हो सकता है। जयपुर शहर से कुछ दूरी पर स्थित यह विशाल किला अपनी भव्य वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। किले की ऊंचाई से आसपास का दृश्य भी बेहद आकर्षक नजर आता है। आमेर के साथ जयगढ़ किला और नाहरगढ़ किला भी घूमने के विकल्पों में शामिल किए जा सकते हैं। नाहरगढ़ से जयपुर शहर का विस्तृत दृश्य देखने का अनुभव खास हो सकता है।

    जयपुर में जंतर मंतर भी एक महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल है। यहां मौजूद प्राचीन खगोलीय यंत्र भारत की वैज्ञानिक और स्थापत्य परंपरा की जानकारी देते हैं। इतिहास और विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह जगह खास हो सकती है। इसके अलावा जलमहल भी जयपुर की खूबसूरत पहचान में शामिल है। मानसागर झील के बीच दिखाई देने वाला यह महल दूर से बेहद आकर्षक नजर आता है और इसके आसपास का वातावरण पर्यटकों को तस्वीरें लेने के लिए आकर्षित करता है।

    जयपुर की यात्रा बाजारों के बिना भी अधूरी मानी जा सकती है। जौहरी बाजार और बापू बाजार में राजस्थानी कपड़े आभूषण हस्तशिल्प और पारंपरिक सामानों की कई दुकानें मिलती हैं। यहां घूमते हुए आप स्थानीय संस्कृति को करीब से महसूस कर सकते हैं। खरीदारी के साथ जयपुर के पारंपरिक भोजन का स्वाद लेना भी यात्रा का अहम हिस्सा हो सकता है। दाल बाटी चूरमा कचौरी और दूसरे राजस्थानी व्यंजन यहां के खानपान की खास पहचान हैं।

    जयपुर घूमने के लिए मौसम का ध्यान रखना भी जरूरी है। गर्मियों में दिन के समय तापमान काफी बढ़ सकता है इसलिए आरामदायक कपड़े पानी और धूप से बचाव का सामान साथ रखना बेहतर रहता है। सर्दियों में मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है और घूमने के लिए सुबह से शाम तक समय का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर आप पहली बार जयपुर जा रहे हैं तो कम से कम दो से तीन दिन का समय रखकर प्रमुख किले महल बाजार और ऐतिहासिक स्थल आराम से देख सकते हैं।

    जयपुर की खासियत यही है कि यहां हर मोड़ पर राजस्थान के इतिहास और संस्कृति की एक नई तस्वीर दिखाई देती है। शाही इमारतों से लेकर पुराने बाजारों तक यह शहर उन यात्रियों के लिए खास अनुभव देता है जो घूमने के साथ किसी जगह की विरासत को भी समझना चाहते हैं।

  • खांसी बुखार और शरीर में दर्द को सामान्य समझने की न करें भूल स्वाइन फ्लू के इन संकेतों पर रहें सतर्क

    खांसी बुखार और शरीर में दर्द को सामान्य समझने की न करें भूल स्वाइन फ्लू के इन संकेतों पर रहें सतर्क

    नई दिल्ली। बदलते मौसम के साथ वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है और इसी दौरान स्वाइन फ्लू को लेकर भी लोगों को सतर्क रहने की जरूरत होती है। स्वाइन फ्लू को एच1एन1 इन्फ्लुएंजा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक तरह का श्वसन संक्रमण है जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से फैल सकता है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर लंबे समय तक रहने और संक्रमित व्यक्ति के बेहद करीब संपर्क में आने से संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि मौसम बदलने के दौरान स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी सी सावधानी भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।

    स्वाइन फ्लू के लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं। इसमें बुखार के साथ खांसी गले में खराश नाक बहना शरीर में दर्द सिरदर्द और थकान जैसी समस्या हो सकती है। कुछ लोगों में ठंड लगने और कमजोरी की शिकायत भी देखने को मिल सकती है। बच्चों और कुछ अन्य लोगों में उल्टी या दस्त जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में केवल शुरुआती लक्षण देखकर खुद से बीमारी तय करना सही नहीं माना जाता है। अगर लक्षण ज्यादा समय तक बने रहें या तेजी से बढ़ें तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    स्वाइन फ्लू का खतरा हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। बुजुर्ग छोटे बच्चे गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को श्वसन संक्रमण होने पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है। ऐसे लोगों में बुखार या सांस से जुड़ी परेशानी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सांस लेने में परेशानी सीने में दर्द अत्यधिक कमजोरी या हालत तेजी से बिगड़ने जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान देना बेहद महत्वपूर्ण है। खांसते और छींकते समय मुंह और नाक को ढकना चाहिए। हाथों को नियमित रूप से साबुन और पानी से धोना चाहिए और बार बार आंख नाक या मुंह को छूने से बचना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में फ्लू जैसे लक्षण हैं तो दूसरों से अनावश्यक नजदीकी संपर्क कम करना संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

    एक जरूरी बात यह भी है कि स्वाइन फ्लू जैसे संक्रमण में खुद से दवा लेना उचित नहीं है। खासतौर पर एंटीबायोटिक दवाएं वायरल संक्रमण का सीधा इलाज नहीं करतीं। डॉक्टर लक्षणों और मरीज की स्थिति के आधार पर जांच और उपचार की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में डॉक्टर एंटीवायरल दवा देने का निर्णय भी ले सकते हैं।

    स्वाइन फ्लू से बचाव का सबसे अहम तरीका जागरूकता और समय पर चिकित्सा सलाह है। हर बुखार स्वाइन फ्लू नहीं होता लेकिन लगातार बने रहने वाले या गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है। साफ सफाई का ध्यान रखना संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।