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  • दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह

    दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह


    नई दिल्ली। छोटे बच्चों में कई बार ऐसी आदतें देखने को मिलती हैं जिन्हें देखकर माता पिता हैरान रह जाते हैं। कुछ बच्चे दीवार से चूना खुरचकर खाने लगते हैं तो कुछ मिट्टी चॉक कागज या दूसरी ऐसी चीजें मुंह में डालते हैं जो खाने योग्य नहीं होतीं। शुरुआत में माता पिता इसे बच्चे की शरारत या जिज्ञासा समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं लेकिन अगर बच्चा बार बार ऐसी चीजें खाने की कोशिश कर रहा है तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार गैर खाद्य चीजों को लगातार खाने की इच्छा Pica जैसी स्थिति से जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया जैसे पोषण संबंधी कारणों की भी जांच की जरूरत पड़ सकती है।

    बच्चे के चूना खाने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। छोटे बच्चे अक्सर आसपास की चीजों को देखकर और उन्हें छूकर समझने की कोशिश करते हैं इसलिए कभी कभी जिज्ञासा के कारण भी वे दीवार से निकला चूना मुंह में डाल सकते हैं। लेकिन अगर यह व्यवहार लगातार बना हुआ है और बच्चा चूने के अलावा मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य वस्तुएं भी खाने लगा है तो इसे सामान्य आदत मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है ताकि बच्चे की स्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों को समझा जा सके।

    चूना खाने से बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चूने के प्रकार और निगली गई मात्रा के आधार पर परेशानी अलग अलग हो सकती है। कुछ मामलों में पेट दर्द उल्टी कब्ज या पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। अगर बच्चे ने अधिक मात्रा में चूना निगल लिया है या उसके मुंह में जलन दर्द उल्टी अथवा सांस लेने जैसी परेशानी दिखाई दे रही है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

    बच्चे को इस आदत से बचाने के लिए सबसे पहले घर का वातावरण सुरक्षित बनाना जरूरी है। जहां से दीवार का चूना निकल रहा है उसे जल्द ठीक करवाएं और घर में रखा चूना पेंट पुट्टी या ऐसी दूसरी सामग्री बच्चे की पहुंच से दूर रखें। बच्चे को बार बार डांटने या डराने के बजाय प्यार से समझाएं और उसका ध्यान किसी खेल खिलौने या दूसरी गतिविधि की तरफ मोड़ें। इससे धीरे धीरे उसकी आदत को कम करने में मदद मिल सकती है।

    बच्चे के भोजन पर भी ध्यान देना जरूरी है। उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार आयरन प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार देना चाहिए। हरी सब्जियां दालें चना राजमा अंडा और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ बच्चे की डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। हालांकि केवल चूना खाने की आदत देखकर माता पिता को खुद से आयरन या कोई दूसरा सप्लीमेंट शुरू नहीं करना चाहिए। जरूरत होने पर डॉक्टर जांच के बाद उचित सलाह दे सकते हैं।

    अगर बच्चा लगातार चूना मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य चीजें खाता है तो बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे बेहतर कदम है। समय रहते कारण समझने और सही उपाय अपनाने से इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। माता पिता का धैर्य बच्चे की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत

    दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत


    नई दिल्ली। मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए लंबे समय से ध्यान और योग को फायदेमंद माना जाता रहा है। आमतौर पर मेडिटेशन को तनाव कम करने और मन को शांत रखने से जोड़कर देखा जाता है लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसके प्रभाव को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन में महज सात दिनों के गहन ध्यान और मन शरीर से जुड़े अभ्यास के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क और शरीर में कई मापने योग्य बदलाव देखे गए। शोधकर्ताओं को मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ रक्त में मौजूद जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा प्रणाली मेटाबॉलिज्म और शरीर की प्राकृतिक दर्द नियंत्रण प्रक्रिया में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अध्ययन में न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े बदलावों के संकेत भी दिखाई दिए।

    न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह प्राकृतिक क्षमता है जिसके जरिए वह नए अनुभवों और लगातार किए जाने वाले अभ्यास के आधार पर अपनी कार्यप्रणाली और तंत्रिका संबंधों में बदलाव कर सकता है। आसान भाषा में समझें तो मस्तिष्क पूरी तरह स्थिर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों और अनुभवों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ध्यान को केवल मानसिक शांति देने वाली गतिविधि के तौर पर नहीं बल्कि मस्तिष्क और शरीर के बीच होने वाली जटिल जैविक प्रक्रिया के रूप में भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।

    इस अध्ययन में 20 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों ने सात दिनों के एक आवासीय कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें रोजाना ध्यान से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया और कुल करीब 33 घंटे का निर्देशित ध्यान कराया गया। कार्यक्रम शुरू होने से पहले और समाप्त होने के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क की एफएमआरआई जांच की गई। इसके साथ ही उनके रक्त के नमूने लेकर शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया।

    शोधकर्ताओं के मुताबिक सात दिन के कार्यक्रम के बाद मस्तिष्क के उन हिस्सों की गतिविधि में कमी देखी गई जो लगातार चलने वाले आंतरिक विचारों और मानसिक बातचीत से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों ने इसे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में संभावित बेहतर दक्षता से जोड़कर देखा है। इसके अलावा रक्त में मौजूद कुछ जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा गतिविधि और मेटाबॉलिज्म से जुड़े बदलावों का भी अध्ययन किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि ध्यान का असर केवल व्यक्ति के मानसिक अनुभव तक सीमित नहीं हो सकता बल्कि शरीर की कई प्रक्रियाओं से भी इसका संबंध हो सकता है।

    हालांकि इस अध्ययन के नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं लेकिन इन्हें अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी। अध्ययन में केवल 20 स्वस्थ वयस्क शामिल थे और इसकी अवधि भी सिर्फ सात दिन रही। इसलिए यह जानने के लिए बड़े स्तर पर और लंबे समय तक शोध की जरूरत होगी कि ध्यान से होने वाले ये बदलाव कितने स्थायी हैं और अलग अलग उम्र तथा स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों पर इनका असर कितना अलग हो सकता है।

    फिलहाल यह अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है कि नियमित और गहन ध्यान मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के साथ शरीर की दूसरी जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। यानी ध्यान को सिर्फ तनाव कम करने का माध्यम मानने के बजाय मस्तिष्क और शरीर के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ी जीवनशैली की आदत के रूप में भी देखा जा सकता है।

  • गमले या आंगन में उगाएं जामुन का पेड़, पौधा लगाने से लेकर खाद-पानी और प्रूनिंग तक जानें आसान देखभाल के तरीके

    गमले या आंगन में उगाएं जामुन का पेड़, पौधा लगाने से लेकर खाद-पानी और प्रूनिंग तक जानें आसान देखभाल के तरीके

    नई दिल्ली । घर के आंगन, किचन गार्डन या बड़े गमले में फलदार पौधे लगाने का शौक रखने वालों के लिए जामुन का पौधा एक अच्छा विकल्प हो सकता है। जामुन गर्म जलवायु में अच्छी तरह विकसित होने वाला फलदार पेड़ है और उचित देखभाल मिलने पर लंबे समय तक बढ़ता रहता है। मानसून के दौरान मिट्टी में नमी रहने के कारण पौधे को नई जगह पर स्थापित होने में मदद मिल सकती है। हालांकि पौधा लगाने से पहले जगह, मिट्टी, पानी और धूप से जुड़ी कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।

    घर पर जामुन उगाने के लिए बीज के बजाय अच्छी नर्सरी से स्वस्थ पौधा लेना अधिक सुविधाजनक हो सकता है। बीज से तैयार पौधे को फल देने में ज्यादा समय लग सकता है, जबकि अच्छी किस्म का ग्राफ्टेड या नर्सरी से प्राप्त पौधा अपेक्षाकृत जल्दी फल देने की स्थिति में पहुंच सकता है। पौधा खरीदते समय उसकी किस्म, उम्र और फल आने की संभावित अवधि की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।

    जामुन का पौधा लगाने के लिए ऐसी जगह का चुनाव करें जहां रोजाना पर्याप्त मात्रा में धूप पहुंचती हो। सीधी धूप मिलने से पौधे की बढ़त बेहतर हो सकती है। अगर इसे जमीन में लगाया जा रहा है तो आसपास पर्याप्त खुली जगह होना जरूरी है, क्योंकि समय के साथ जामुन का पेड़ काफी बड़ा हो सकता है। इसे दीवार, पाइप, फर्श या दूसरी स्थायी संरचनाओं से उचित दूरी पर लगाना बेहतर रहता है।

    मिट्टी का चुनाव भी पौधे की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। जामुन के पौधे के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर रहती है जिसमें पानी आसानी से निकल सके। जिस मिट्टी में लंबे समय तक पानी जमा रहता है, वहां जड़ों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। पौधा लगाने से पहले मिट्टी में अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद या कंपोस्ट मिलाने से मिट्टी की संरचना बेहतर करने और शुरुआती पोषण देने में मदद मिल सकती है।

    जमीन में पौधा लगाने के लिए उसकी जड़ों के आकार से थोड़ा बड़ा गड्ढा तैयार करें। गड्ढे में मिट्टी और कंपोस्ट का मिश्रण डालकर पौधे को सावधानी से रखें। इस दौरान जड़ों को मोड़ने या दबाने से बचें। पौधा लगाने के बाद आसपास की मिट्टी को हल्के हाथ से दबाएं और पर्याप्त पानी दें। हालांकि शुरुआती दिनों में मिट्टी को लगातार बहुत ज्यादा गीला रखने से बचना चाहिए।

    अगर जामुन का पौधा गमले में लगाना चाहते हैं तो सामान्य छोटे गमले के बजाय बड़ा और मजबूत कंटेनर चुनना बेहतर रहेगा। गमले के नीचे पानी की निकासी के लिए पर्याप्त छेद होने चाहिए। जैसे-जैसे पौधे की जड़ें और आकार बढ़ें, जरूरत के अनुसार उसे बड़े कंटेनर में स्थानांतरित किया जा सकता है। गमले में उगाए गए पौधे के लिए धूप और पानी की मात्रा पर विशेष नजर रखना जरूरी है।

    नए लगाए गए पौधे को शुरुआत में नियमित सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन हर बार पानी देने से पहले मिट्टी की ऊपरी परत की नमी जांचना बेहतर है। यदि मिट्टी पहले से नम है तो तुरंत पानी देने की आवश्यकता नहीं होती। पौधे के स्थापित होने के बाद पानी की जरूरत मौसम, मिट्टी और पौधे की स्थिति के अनुसार बदल सकती है।

    अच्छी ग्रोथ के लिए समय-समय पर जैविक कंपोस्ट या उपयुक्त खाद दी जा सकती है। बहुत अधिक खाद देने से बचना चाहिए। सूखी, कमजोर और आपस में रगड़ खाने वाली शाखाओं को समय-समय पर हटाने से पौधे का आकार व्यवस्थित रखने में मदद मिल सकती है। फल आने का समय जामुन की किस्म, पौधे की उम्र, मौसम और देखभाल पर निर्भर करता है। इसलिए पौधा लगाते समय धैर्य रखना जरूरी है। सही पौधा, पर्याप्त धूप, अच्छी जल निकासी और संतुलित देखभाल के साथ घर में लगाया गया जामुन का पौधा आने वाले वर्षों में फलदार पेड़ का रूप ले सकता है।

  • आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    नई दिल्ली ।आंवला आकार में छोटा जरूर होता है, लेकिन पोषण के लिहाज से इसे बेहद उपयोगी फल माना जाता है। इसमें विटामिन C, फाइबर और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। भारतीय खान-पान में आंवले का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर शरीर को कई जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

    आंवले में मौजूद विटामिन C शरीर के सामान्य इम्यून फंक्शन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की भूमिका भी निभाता है। इसलिए नियमित और संतुलित डाइट में आंवले को शामिल करना पोषण की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को बीमारी से बचाव या इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    पाचन तंत्र के लिए भी आंवला उपयोगी हो सकता है। इसमें फाइबर मौजूद होता है, जो पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद करता है। पर्याप्त फाइबर का सेवन मल त्याग को नियमित रखने में सहायक हो सकता है। आंवले को सलाद, चटनी या भोजन के साथ शामिल करना डाइट में फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है।

    आंवले में मौजूद विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा के लिए भी महत्वपूर्ण पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। विटामिन C शरीर में कोलेजन बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। इसी वजह से संतुलित भोजन में आंवले को शामिल करना त्वचा की सामान्य सेहत के लिए उपयोगी हो सकता है।

    बालों की सेहत के संदर्भ में भी आंवले का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। आंवला खाने से मिलने वाले पोषक तत्व शरीर के समग्र पोषण में योगदान करते हैं। हालांकि केवल आंवला खाने से बालों से जुड़ी सभी समस्याएं दूर होने का दावा उचित नहीं है। बालों की अच्छी सेहत के लिए प्रोटीन, आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा भी जरूरी होती है।

    आंवला विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट यौगिकों का स्रोत भी है। शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का सामना करना पड़ सकता है। संतुलित आहार में शामिल फल और सब्जियां शरीर को अलग-अलग प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। आंवला इसी तरह के पौष्टिक खाद्य विकल्पों में शामिल किया जा सकता है।

    हृदय की सेहत के लिहाज से भी आंवले को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसमें फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि किसी एक फल को हृदय रोग से बचाव या उपचार का साधन मानना सही नहीं होगा। स्वस्थ हृदय के लिए संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और बेहतर जीवनशैली जरूरी है।

    आंवले को खाने का सबसे आसान तरीका इसे अच्छी तरह धोकर छोटे टुकड़ों में काटकर खाना है। स्वाद के लिए थोड़ी मात्रा में काला नमक या भुना जीरा मिलाया जा सकता है। इसे चटनी, सलाद या अन्य भोजन में भी शामिल किया जा सकता है।

    कई लोग आंवले का सेवन मुरब्बे और कैंडी के रूप में करते हैं, लेकिन ऐसे उत्पादों में अतिरिक्त चीनी हो सकती है। इसलिए रोजमर्रा की डाइट में ताजा आंवला या कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना बेहतर हो सकता है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या आहार संबंधी प्रतिबंध की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार इसका सेवन करना उचित रहेगा।

  • आईने में चेहरा गौर से देखिए, कहीं शरीर कोई खतरे का संकेत तो नहीं दे रहा? इन बदलावों पर तुरंत दें ध्यान

    आईने में चेहरा गौर से देखिए, कहीं शरीर कोई खतरे का संकेत तो नहीं दे रहा? इन बदलावों पर तुरंत दें ध्यान


    नई दिल्ली । चेहरा सिर्फ हमारी पहचान और खूबसूरती का हिस्सा नहीं है बल्कि कई बार यह शरीर के अंदर चल रही स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के संकेत भी दे सकता है। आंखों का रंग बदलना हो या त्वचा का असामान्य रूप से पीला पड़ना होंठों का नीला दिखना या आंखों के आसपास लगातार सूजन रहना इन बदलावों को हमेशा केवल कॉस्मेटिक समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में होने वाले कई बदलाव चेहरे और आंखों पर दिखाई देने लगते हैं। हालांकि केवल चेहरे के लक्षणों के आधार पर किसी बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती लेकिन ऐसे बदलाव लगातार बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।

    सबसे पहले बात आंखों और त्वचा के पीले पड़ने की करें तो यह पीलिया का संकेत हो सकता है। शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ने पर आंखों का सफेद हिस्सा और त्वचा पीली दिखाई देने लगती है। इसके पीछे हेपेटाइटिस लिवर से जुड़ी बीमारी पित्त की पथरी या पित्त की नलियों से जुड़ी समस्या समेत कई कारण हो सकते हैं। कई मामलों में इसके साथ पेशाब का रंग गहरा और मल का रंग सामान्य से हल्का भी दिखाई दे सकता है। इसलिए आंखों में अचानक पीलापन नजर आए तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है।

    इसी तरह चेहरे या त्वचा का रंग सामान्य से ज्यादा फीका या पीला नजर आना भी शरीर में आयरन की कमी से जुड़े एनीमिया का संकेत हो सकता है। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी होता है और हीमोग्लोबिन शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक ऑक्सीजन पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगर त्वचा के रंग में बदलाव के साथ लगातार थकान कमजोरी या थोड़ी मेहनत में सांस फूलने जैसी समस्या हो रही है तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

    चेहरे और होंठों का नीला पड़ना भी गंभीर संकेत हो सकता है। होंठ जीभ या चेहरे का अचानक नीला दिखना सायनोसिस कहलाता है और यह रक्त में ऑक्सीजन की कमी या रक्त संचार से जुड़ी परेशानी की ओर इशारा कर सकता है। फेफड़ों की बीमारी वायुमार्ग में रुकावट कुछ हृदय संबंधी समस्याएं या रक्त प्रवाह में बाधा इसके संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं। ऐसा बदलाव अचानक दिखाई दे तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।

    आंखों की पलकों के आसपास छोटे पीले या पीले-सफेद उभार भी ध्यान देने लायक होते हैं। इन्हें जैंथेलाज्मा कहा जाता है और ये कुछ लोगों में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर डॉक्टर की सलाह से लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराई जा सकती है।

    चेहरे पर लगातार सूजन भी शरीर में किसी गड़बड़ी का संकेत हो सकती है। आंखों के आसपास सूजन कई कारणों से हो सकती है और कुछ मामलों में यह किडनी से जुड़ी समस्याओं में भी देखी जाती है। वहीं चेहरे का फूला हुआ दिखना अंडरएक्टिव थायरॉयड जैसी स्थितियों से जुड़ा हो सकता है। दूसरी ओर एलर्जी या किसी दवा की प्रतिक्रिया के कारण भी चेहरे और आंखों के आसपास सूजन आ सकती है।

    खास बात यह है कि चेहरे में दिखने वाले हर बदलाव का मतलब किसी गंभीर बीमारी से नहीं होता। मौसम त्वचा की सामान्य स्थिति एलर्जी खानपान या दूसरी वजहों से भी बदलाव हो सकते हैं। लेकिन अगर कोई असामान्य बदलाव अचानक दिखाई दे लगातार बना रहे या उसके साथ कमजोरी सांस लेने में परेशानी दर्द अथवा अन्य लक्षण भी मौजूद हों तो खुद से बीमारी का अनुमान लगाने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना सबसे सुरक्षित तरीका है। आईना बीमारी की पुष्टि नहीं करता लेकिन शरीर के संकेतों पर समय रहते ध्यान देने में जरूर मदद कर सकता है।

  • रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा

    रात की अधूरी नींद दिनभर बिगाड़ सकती है दिमाग की चाल, बढ़ सकता है तनाव और कई बीमारियों का खतरा


    नई दिल्ली । नींद हमारे शरीर और दिमाग को आराम देने के साथ अगले दिन बेहतर तरीके से काम करने के लिए तैयार करती है। यही वजह है कि पर्याप्त नींद को स्वस्थ जीवनशैली का बेहद जरूरी हिस्सा माना जाता है। अगर रात की नींद बार-बार अधूरी रह रही है तो इसका असर सिर्फ सुबह की थकान या दिनभर की सुस्ती तक सीमित नहीं रहता बल्कि धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार याददाश्त एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई देने लगता है। गुस्सा जल्दी आना छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन महसूस होना किसी काम पर ध्यान केंद्रित न कर पाना और जरूरी बातें भूल जाना कई बार नींद पूरी न होने से भी जुड़ा हो सकता है।

    एक रात नींद कम होने पर अगले दिन थकान सिरदर्द सुस्ती और काम करने में परेशानी महसूस होना सामान्य हो सकता है। कभी-कभार ऐसा होने पर आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती लेकिन जब नींद की कमी लगातार बनी रहती है तो इसका असर रोजमर्रा की कार्यक्षमता पर पड़ सकता है। व्यक्ति को छोटे-छोटे फैसले लेने में भी परेशानी हो सकती है और पढ़ाई या काम के दौरान ध्यान भटकने की समस्या बढ़ सकती है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न मिलने की स्थिति में शरीर और दिमाग दोनों पर दबाव बढ़ता है।

    नींद की कमी का सीधा असर व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। पर्याप्त आराम न मिलने पर व्यक्ति सामान्य परिस्थितियों में भी ज्यादा चिड़चिड़ा हो सकता है और छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है। भावनाओं को नियंत्रित करना भी मुश्किल महसूस हो सकता है। यही समस्या अगर लंबे समय तक जारी रहे तो तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। नींद और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध काफी गहरा माना जाता है और लगातार नींद की समस्या रहने पर चिंता तथा अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।

    याददाश्त और एकाग्रता पर भी नींद की कमी का असर पड़ता है। रात में शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम नहीं मिलने पर अगले दिन किसी काम पर ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। चीजें याद रखने में दिक्कत हो सकती है और काम या पढ़ाई का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। बच्चों और किशोरों के लिए पर्याप्त नींद विशेष रूप से जरूरी है क्योंकि नींद उनकी सीखने की क्षमता ध्यान याददाश्त और व्यवहार से जुड़ी होती है। इसलिए बच्चों में लगातार नींद की परेशानी को केवल आदत मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    कम नींद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक पर्याप्त नींद न लेने को वजन बढ़ने मधुमेह और हृदय स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों से भी जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को रात में सोने में परेशानी होती है जबकि कुछ लोग पर्याप्त समय बिस्तर पर रहने के बाद भी सुबह तरोताजा महसूस नहीं करते। कुछ नींद संबंधी विकारों में रात के समय सांस लेने में रुकावट या सांस के अनियमित होने जैसी समस्या भी हो सकती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को पर्याप्त समय सोने के बावजूद अच्छी गुणवत्ता वाली नींद नहीं मिल पाती।

    कुछ संकेत ऐसे हैं जिन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर गाड़ी चलाते समय बार-बार झपकी आने लगे टीवी देखते या किताब पढ़ते समय थोड़ी देर में ही नींद आने लगे दिन के समय बहुत ज्यादा नींद महसूस हो काम या पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो जाए या चीजें याद रखने में पहले से ज्यादा परेशानी होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसी तरह छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ना और काम करने की क्षमता में कमी आना भी लगातार खराब नींद के संकेत हो सकते हैं।

    इसलिए नींद को केवल आराम का समय समझने के बजाय स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरत मानना जरूरी है। अगर रात में लगातार सोने में परेशानी हो रही है या पर्याप्त समय सोने के बाद भी दिनभर अत्यधिक नींद और थकान बनी रहती है तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। समय रहते नींद से जुड़ी समस्या के कारणों की पहचान करने और जरूरी सुधार करने से रोजमर्रा की कार्यक्षमता मानसिक संतुलन और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत

    कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत


    नई दिल्ली । अगर आपकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा ऑफिस की कुर्सी या घर के सोफे पर बैठकर गुजरता है और दिनभर शरीर को पर्याप्त मेहनत नहीं मिलती तो अब सावधान होने का समय है। लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना सिर्फ वजन बढ़ने की वजह नहीं बनता बल्कि धीरे-धीरे शरीर की कई जरूरी प्रणालियों पर असर डाल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर के करीब 31 प्रतिशत वयस्क पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। विशेषज्ञों के मुताबिक पर्याप्त सक्रिय न रहने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम सक्रिय लोगों की तुलना में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। ऐसे में रोजाना कुछ समय शरीर को सक्रिय रखना स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा बन जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए हर किसी के लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। रोजाना तेज कदमों से चलना, साइकिल चलाना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और घर के सामान्य कामों में सक्रिय रहना भी शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट तक मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देता है। इसका मतलब है कि दिनभर लगातार बैठे रहने के बजाय काम के बीच छोटे ब्रेक लेकर कुछ देर चलना भी आपकी दिनचर्या को बेहतर बना सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी का असर सबसे पहले हृदय और मेटाबॉलिज्म पर दिखाई दे सकता है। नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के साथ हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करता है। वहीं लगातार बैठे रहने और शरीर को पर्याप्त गतिविधि न मिलने से लंबे समय में कई गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अगर काम की वजह से घंटों कुर्सी पर बैठना मजबूरी है तो बीच बीच में उठकर कुछ कदम चलना और शरीर को स्ट्रेच करना उपयोगी आदत हो सकती है।

    निष्क्रिय जीवनशैली का एक बड़ा खतरा टाइप-2 डायबिटीज से भी जुड़ा है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को ग्लूकोज का बेहतर इस्तेमाल करने और वजन नियंत्रित रखने में मदद करती है। इसके विपरीत लंबे समय तक बैठे रहने वाली दिनचर्या वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं की संभावना को बढ़ा सकती है। इसलिए डायबिटीज से बचाव के लिए केवल खानपान पर ध्यान देना ही पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि रोजाना की शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    दिनभर कम चलने फिरने का सीधा असर वजन पर भी पड़ सकता है। जब शरीर कम ऊर्जा खर्च करता है और खानपान से मिलने वाली कैलोरी अधिक रहती है तो धीरे धीरे वजन बढ़ने लगता है। बढ़ता वजन आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर में गड़बड़ी और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में संतुलित आहार के साथ रोजमर्रा की गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि शारीरिक सक्रियता को किसी एक कठिन व्यायाम तक सीमित न समझें। छोटी दूरी के लिए पैदल जाना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लेना, काम के बीच कुछ मिनट चलना और रोजाना वॉक की आदत बनाना शुरुआत के आसान तरीके हो सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी है या व्यायाम शुरू करने में परेशानी महसूस होती है तो डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। शरीर को सक्रिय रखना केवल फिट दिखने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और बेहतर जीवन जीने के लिए भी जरूरी है।

  • खाना खाते ही सुस्ती और नींद का कारण क्या है दोपहर में ज्यादा असर क्यों होता है जानें पूरी वजह

    खाना खाते ही सुस्ती और नींद का कारण क्या है दोपहर में ज्यादा असर क्यों होता है जानें पूरी वजह


    नई दिल्ली । दोपहर में खाना खाने के बाद अचानक आंखों का भारी होना और काम के दौरान सुस्ती महसूस करना बहुत से लोगों के लिए सामान्य अनुभव है। कई बार लंच खत्म करने के कुछ ही देर बाद ऐसा लगता है कि बस थोड़ी देर आंखें बंद कर ली जाएं। इस स्थिति को Post Meal Sleepiness कहा जाता है। आमतौर पर यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती बल्कि शरीर की प्राकृतिक घड़ी खाने की मात्रा और भोजन में मौजूद पोषक तत्वों के साथ कई शारीरिक प्रक्रियाओं के कारण ऐसा हो सकता है।

    सबसे पहले शरीर की प्राकृतिक घड़ी यानी Circadian Rhythm को समझना जरूरी है। हमारा शरीर लगभग 24 घंटे के एक चक्र के अनुसार नींद और जागने से जुड़े बदलाव करता है। दोपहर के समय शरीर में जागने और सतर्क रहने का संकेत कुछ कम हो सकता है। इसी वजह से बिना खाना खाए भी कई लोगों को दोपहर के वक्त हल्की सुस्ती महसूस होती है। जब इसी समय खाना खाया जाता है तो यह असर और अधिक महसूस हो सकता है।

    खाने की मात्रा भी दोपहर की नींद को प्रभावित करती है। अगर लंच बहुत ज्यादा मात्रा में किया गया है तो खाना खाने के बाद भारीपन और सुस्ती अधिक महसूस हो सकती है। बहुत ज्यादा कैलोरी वाला भोजन तली हुई चीजें अत्यधिक मीठा भोजन या रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट से भरपूर खाना कुछ लोगों में खाने के बाद ऊर्जा और सतर्कता में बदलाव ला सकता है। वहीं संतुलित मात्रा में प्रोटीन फाइबर और अन्य पोषक तत्वों वाला भोजन लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    खाना खाने के बाद शरीर में पाचन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस दौरान हार्मोन और तंत्रिका तंत्र से जुड़े कई संकेत बदलते हैं। भोजन से मिलने वाले ग्लूकोज और अन्य पोषक तत्वों के स्तर में बदलाव होता है और शरीर पाचन से जुड़ी गतिविधियों को सक्रिय करता है। इन सभी प्रक्रियाओं का संयुक्त प्रभाव कुछ लोगों में नींद या सुस्ती जैसा एहसास पैदा कर सकता है।

    अक्सर यह कहा जाता है कि खाना खाने के बाद शरीर का पूरा खून पेट की ओर चला जाता है और इसी कारण दिमाग में खून कम पहुंचने से नींद आती है। हालांकि यह इस घटना की पूरी और सही व्याख्या नहीं मानी जाती। शरीर में रक्त का प्रवाह इस तरह अचानक दिमाग से हटकर केवल पाचन तंत्र की ओर नहीं चला जाता कि उससे सामान्य तौर पर दिमाग को पर्याप्त रक्त न मिले। खाने के बाद आने वाली नींद कई शारीरिक बदलावों के संयुक्त प्रभाव से जुड़ी होती है।

    दोपहर के भोजन के बाद नींद अधिक महसूस होने की एक बड़ी वजह रात की अधूरी नींद भी हो सकती है। अगर किसी व्यक्ति ने पिछली रात पर्याप्त नींद नहीं ली है तो दिनभर जागे रहने के साथ शरीर में नींद की जरूरत बढ़ती जाती है। ऐसे में दोपहर का प्राकृतिक सुस्ती वाला समय आते ही थकान और नींद ज्यादा महसूस हो सकती है।

    लंच के बाद सुस्ती कम करने के लिए बहुत भारी भोजन करने से बचना उपयोगी हो सकता है। भोजन की मात्रा जरूरत के अनुसार रखें और खाने में प्रोटीन फाइबर तथा पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करें। भोजन के बाद कुछ देर हल्की चाल से चलना भी शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। पर्याप्त पानी पीना और रात में नियमित रूप से अच्छी नींद लेना भी बेहद जरूरी है।

    हालांकि अगर रोजाना खाना खाने के बाद अत्यधिक नींद आती है और इसके साथ चक्कर कमजोरी या दूसरे लक्षण भी दिखाई देते हैं या दिनभर की सामान्य गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है क्योंकि लगातार अत्यधिक नींद कभी कभी नींद से जुड़ी समस्या खून की कमी थायरॉइड या ब्लड शुगर से संबंधित परेशानी के साथ भी देखी जा सकती है।

  • घुंघराले बाल बार-बार क्यों उलझते और रूखे होते हैं? जानिए रोजमर्रा की ये गलतियां और आसान देखभाल के तरीके

    घुंघराले बाल बार-बार क्यों उलझते और रूखे होते हैं? जानिए रोजमर्रा की ये गलतियां और आसान देखभाल के तरीके

    नई दिल्ली । घुंघराले बाल देखने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन इन्हें संभालना सीधे बालों की तुलना में कई बार ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कर्ली बालों में नमी की कमी होने पर रूखापन, उलझन और बालों के बेजान दिखने जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। बार-बार कंघी करना, जरूरत से ज्यादा शैम्पू करना और गीले बालों को खींचना भी बालों को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, बालों की देखभाल की कुछ आसान आदतों को अपनाकर इन समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति के बालों की बनावट और सिर की त्वचा अलग होती है। इसलिए बालों की देखभाल के लिए एक ही नियम सभी पर लागू नहीं होता। शैम्पू कितनी बार करना है, यह सिर की त्वचा में तेल, पसीना, धूल और डैंड्रफ जैसी स्थितियों पर निर्भर करता है।

    घुंघराले बालों को रोजाना शैम्पू करने की जरूरत हर व्यक्ति को नहीं होती। अगर सिर की त्वचा बहुत ज्यादा तैलीय नहीं है, तो बार-बार बाल धोने से बचा जा सकता है। जरूरत से ज्यादा सफाई करने पर बालों में मौजूद प्राकृतिक तेल कम हो सकता है, जिससे वे ज्यादा रूखे और बेजान महसूस हो सकते हैं। इसलिए अपने बालों और स्कैल्प की जरूरत के अनुसार ही शैम्पू करना बेहतर रहता है।

    शैम्पू करते समय भी सही तकनीक अपनाना जरूरी है। शैम्पू को मुख्य रूप से सिर की त्वचा पर लगाकर धीरे-धीरे साफ करना चाहिए। बालों की पूरी लंबाई को जोर से रगड़ने की आवश्यकता नहीं होती। सिर की त्वचा से निकलने वाला झाग बालों की लंबाई तक पहुंचकर उन्हें साफ करने में मदद करता है। अगर बाल धोने के बाद काफी सूखे या उलझे हुए महसूस होते हैं, तो हल्का शैम्पू और उपयुक्त कंडीशनर उपयोगी हो सकता है।

    कंडीशनर घुंघराले बालों की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसे बालों की लंबाई और सिरों पर लगाने से बालों की सतह अधिक चिकनी महसूस हो सकती है। इससे बालों के बीच घर्षण कम होता है और उन्हें सुलझाना आसान हो सकता है। शैम्पू के बाद कंडीशनर का इस्तेमाल बालों को संभालने में मदद कर सकता है।

    बाल धोने के बाद उन्हें सुखाने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गीले बालों को तौलिये से जोर-जोर से रगड़ने के बजाय हल्के हाथ से पानी सोखना बेहतर है। ज्यादा रगड़ से बालों में घर्षण बढ़ सकता है और कर्ली बालों के टूटने या उलझने की समस्या बढ़ सकती है।

    गीले बालों को जोर से खींचकर कंघी करने से भी बचना चाहिए। जरूरत होने पर बालों को धीरे-धीरे सुलझाएं और ऐसी कंघी या तकनीक का इस्तेमाल करें जिससे बालों पर कम खिंचाव पड़े। बालों को संभालते समय बार-बार खींचने और रगड़ने से होने वाला नुकसान कम करना जरूरी है।

    बालों को अतिरिक्त नमी और मुलायम एहसास देने के लिए हेयर सीरम या लीव-इन कंडीशनर का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाल धोने के बाद हल्के गीले बालों पर थोड़ी मात्रा में इन्हें लगाने से बालों की सतह चिकनी महसूस हो सकती है और उलझन कम हो सकती है। हालांकि, बहुत ज्यादा प्रोडक्ट लगाने से बाल भारी या चिपचिपे दिख सकते हैं।

    घुंघराले बालों की बेहतर देखभाल के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि बालों की जरूरत को समझकर रूटीन तैयार किया जाए। जरूरत से ज्यादा शैम्पू, तेज रगड़, बार-बार कंघी और गीले बालों पर खिंचाव जैसी आदतों से बचना फायदेमंद हो सकता है। सही सफाई, पर्याप्त कंडीशनिंग और बालों को धीरे संभालने की आदत कर्ली बालों को अधिक व्यवस्थित और मुलायम बनाए रखने में मदद कर सकती है।

  • आम के पत्ते फेंकने की गलती न करें, स्किन, बाल, गार्डन और घर के इन कामों में आ सकते हैं बेहद काम

    आम के पत्ते फेंकने की गलती न करें, स्किन, बाल, गार्डन और घर के इन कामों में आ सकते हैं बेहद काम

    नई दिल्ली । आम का फल गर्मियों में लगभग हर घर की पसंद होता है, लेकिन इसके साथ आने वाले आम के पत्तों को अक्सर लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं। भारतीय संस्कृति में आम के पत्तों का इस्तेमाल पूजा-पाठ, शुभ कार्यों, गृह प्रवेश और त्योहारों के दौरान तोरण बनाने के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। हालांकि, इनका उपयोग केवल धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। घर में सजावट से लेकर बागवानी और कुछ पारंपरिक घरेलू इस्तेमाल तक आम के पत्ते कई तरह से उपयोगी हो सकते हैं।

    आम के पत्तों में पॉलीफेनॉल्स और टेरपेनॉइड्स जैसे पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। इनमें एंटीऑक्सीडेंट और सूजन कम करने वाले गुणों की मौजूदगी का अध्ययन किया गया है। यही वजह है कि आम की पत्तियों और उनके अर्क को लेकर त्वचा, ब्लड शुगर और मेटाबॉलिज्म से जुड़े संभावित फायदों पर भी शोध हुआ है। हालांकि, इनमें से कई दावे शुरुआती या पशु-अध्ययनों पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा।

    त्वचा की देखभाल के लिए भी आम के पत्तों का पारंपरिक इस्तेमाल देखने को मिलता है। इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट यौगिक त्वचा को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में भूमिका निभा सकते हैं। आम के पत्तों से बने पाउडर या अन्य घरेलू नुस्खों को त्वचा पर लगाने की सलाह कई जगह दी जाती है, लेकिन संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को सीधे इस्तेमाल से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। जलन, खुजली या लालिमा होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    आम के पत्तों को ब्लड शुगर और पाचन के लिए भी पारंपरिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। कुछ पशु अध्ययनों में आम की कोमल पत्तियों के अर्क में मौजूद यौगिकों के संभावित प्रभावों का अध्ययन किया गया है। इसी तरह आम के पत्तों के अर्क में मौजूद मैंगीफेरिन जैसे यौगिकों को मेटाबॉलिज्म और फैट से जुड़े प्रभावों के संदर्भ में भी शोधा गया है। लेकिन वजन घटाने या डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए आम के पत्तों की चाय या काढ़े पर निर्भर रहना वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित उपचार का विकल्प नहीं है। खासकर डायबिटीज की दवा लेने वाले लोगों को किसी भी हर्बल सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

    बालों के लिए भी आम के पत्तों में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट यौगिकों को संभावित रूप से उपयोगी माना जाता है। हालांकि, बालों की ग्रोथ या झड़ना रोकने के संबंध में मजबूत मानव-आधारित प्रमाण सीमित हैं। इसलिए इसे घरेलू उपाय के तौर पर इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतना बेहतर है।

    घर के कामों में आम के पत्तों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत आसान है। ताजे पत्तों को फूलों के साथ पानी से भरे बड़े कटोरे में सजाकर प्राकृतिक डेकोरेशन तैयार की जा सकती है। त्योहारों और पारिवारिक आयोजनों में इनसे बना तोरण घर को पारंपरिक लुक देता है। वहीं, सूखे आम के पत्तों को सीधे कूड़े में फेंकने के बजाय कंपोस्ट में शामिल किया जा सकता है। इनके धीरे-धीरे सड़ने से जैविक खाद तैयार होती है, जिसका इस्तेमाल पौधों और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में किया जा सकता है।

    आम के पत्तों को लेकर यह भी पारंपरिक धारणा है कि इन्हें जलाने से निकलने वाला धुआं मच्छरों और छोटे कीट-पतंगों को दूर रख सकता है। हालांकि, घर के अंदर पत्ते जलाने से धुआं और सूक्ष्म कण पैदा होते हैं, जो सांस के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। इसलिए कीड़े भगाने के लिए धुआं करने के बजाय सुरक्षित और प्रमाणित उपायों को प्राथमिकता देना बेहतर है। इस तरह आम के पत्ते पूजा की सामग्री से आगे बढ़कर सजावट, बागवानी और कुछ पारंपरिक घरेलू उपयोगों में काम आ सकते हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी दावों को सावधानी और वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ ही देखना चाहिए।