Category: Lifestyle

  • चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास

    चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास


    नई दिल्ली ।भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना एक बड़ी जरूरत बन जाता है। ऐसे समय में लोग आमतौर पर छाछ, लस्सी और नींबू पानी का सहारा लेते हैं, लेकिन रोज एक ही स्वाद से मन ऊब जाता है। इसी वजह से फालसा छाछ एक बेहतरीन और पारंपरिक विकल्प के रूप में सामने आती है, जो न केवल शरीर को ठंडक देती है बल्कि अपने खट्टे-मीठे स्वाद से ताजगी का नया अनुभव भी कराती है। यह पेय गर्मियों में शरीर को अंदर से ठंडा रखने और लू के असर को कम करने में मददगार माना जाता है।

    फालसा एक मौसमी फल है जिसमें प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण पाए जाते हैं। जब इसे दही और मसालों के साथ मिलाकर छाछ के रूप में तैयार किया जाता है तो यह एक सुपर समर ड्रिंक बन जाता है। यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ ऊर्जा भी प्रदान करता है और पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।

    फालसा छाछ बनाने के लिए सबसे पहले ताजे फालसा को अच्छी तरह धोकर एक बर्तन में लिया जाता है। इसमें हल्की मात्रा में चीनी या मिश्री और थोड़ा पानी मिलाकर इसे हाथों से अच्छे से मसल लिया जाता है ताकि इसका गूदा अलग हो जाए और स्वाद पूरी तरह निकल आए। इसके बाद इस मिश्रण को छानकर बीज अलग कर दिए जाते हैं और एक गाढ़ा खट्टा-मीठा जूस तैयार किया जाता है।

    इसके बाद एक बड़े बर्तन में ताजा दही लिया जाता है और उसमें ठंडा पानी मिलाया जाता है। इसी में तैयार फालसा जूस डाला जाता है। स्वाद को संतुलित बनाने के लिए काला नमक और भुना जीरा पाउडर मिलाया जाता है। इन सभी चीजों को अच्छे से मथकर तब तक फेंटा जाता है जब तक मिश्रण हल्का झागदार और स्मूद न हो जाए। यह प्रक्रिया छाछ को और अधिक स्वादिष्ट और पाचक बना देती है।

    तैयार छाछ को सर्व करने के लिए गिलास में बर्फ के टुकड़े डाले जाते हैं और ऊपर से यह ठंडी फालसा छाछ डाली जाती है। इसे पुदीने की पत्तियों और भुने जीरे से सजाकर परोसा जाता है। इसका स्वाद न केवल शरीर को ठंडक देता है बल्कि मानसिक रूप से भी ताजगी का अहसास कराता है।

    गर्मी के मौसम में यह पेय शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद दही के प्रोबायोटिक्स पाचन को सुधारते हैं और पेट की जलन को कम करते हैं। वहीं फालसा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन C शरीर को लू और तेज धूप के असर से बचाने में मदद करते हैं। यह ड्रिंक शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखकर डिहाइड्रेशन से भी राहत दिलाती है।

    इस तरह फालसा छाछ सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि गर्मियों में शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का एक आसान और स्वादिष्ट उपाय है, जिसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और रोजाना सेवन किया जा सकता है।

  • चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी

    चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी


    नई दिल्ली। चंदन यानी सैंडलवुड आयुर्वेद में सदियों से त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता रहा है। इसे फेस पैक या लेप के रूप में लगाने से त्वचा को ठंडक, निखार और कई प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। खासकर गर्मी के मौसम में चंदन फेस केयर लेप को बेहद फायदेमंद माना जाता है।

    चंदन फेस पैक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह त्वचा की जलन और सनबर्न को शांत करता है। गर्मी या धूप के कारण होने वाली त्वचा की लालिमा को यह कम करने में मदद करता है। इसके नियमित उपयोग से त्वचा का रंग साफ और चमकदार दिखाई देने लगता है। साथ ही यह मुंहासों (acne) और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक माना जाता है।

    चंदन में मौजूद प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह अतिरिक्त तेल (excess oil) को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जिससे ऑयली स्किन वालों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। कई लोग इसे बेसन, हल्दी या गुलाब जल के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में उपयोग करते हैं।

    हालांकि, चंदन फेस पैक के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। संवेदनशील त्वचा (sensitive skin) वाले लोगों को इससे एलर्जी, खुजली या रैशेज की समस्या हो सकती है। यदि चंदन की गुणवत्ता शुद्ध न हो या उसमें केमिकल मिले हों, तो यह त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है।

    कुछ लोगों में इसका अधिक उपयोग त्वचा को अत्यधिक सूखा (dry) बना सकता है। इसलिए इसे हफ्ते में 2–3 बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उपयोग से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी माना जाता है ताकि किसी भी तरह की एलर्जी से बचा जा सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सैंडलवुड का सही और सीमित उपयोग त्वचा के लिए लाभकारी है, लेकिन गलत तरीके से या अधिक मात्रा में उपयोग नुकसानदेह भी हो सकता है। इसलिए हमेशा प्राकृतिक और शुद्ध चंदन पाउडर का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो चंदन फेस केयर लेप एक पारंपरिक और प्रभावी स्किन केयर उपाय है, जो सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा को प्राकृतिक निखार और ठंडक प्रदान करता है। लेकिन सावधानी और संतुलन इसके उपयोग की सबसे बड़ी जरूरत है।

  • बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन

    बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन


    नई दिल्ली। त्वचा की देखभाल में नेचुरल उपाय हमेशा से प्रभावी माने गए हैं। खासकर फल (fruits) से बने स्क्रब स्किन को बिना नुकसान पहुंचाए साफ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। बाजार के केमिकल स्क्रब की तुलना में प्राकृतिक फलों से बने स्क्रब ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी माने जाते हैं।

    त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार पपीता एक बेहतरीन प्राकृतिक स्क्रब माना जाता है। इसमें मौजूद एंजाइम (papain) त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead skin cells) को हटाने में मदद करता है और स्किन को मुलायम बनाता है। यह मुंहासों और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक होता है।

    स्ट्रॉबेरी भी स्क्रब के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसमें प्राकृतिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो त्वचा को साफ करने के साथ-साथ पोर्स को टाइट करते हैं। यह स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बनाती है।

    केला भी एक अच्छा विकल्प है, खासकर ड्राय स्किन वालों के लिए। इसमें मौजूद विटामिन और मिनरल्स त्वचा को नमी प्रदान करते हैं और स्किन को सॉफ्ट बनाते हैं। इसे शहद के साथ मिलाकर स्क्रब की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

    संतरे का छिलका या उसका पाउडर भी एक प्राकृतिक स्क्रब की तरह काम करता है। यह त्वचा से अतिरिक्त तेल हटाने और टैनिंग कम करने में मदद करता है। इसमें विटामिन C होता है जो स्किन को ब्राइट बनाने में सहायक होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फलों से बने स्क्रब का नियमित लेकिन सीमित उपयोग ही करना चाहिए। हफ्ते में 2 बार स्क्रब करना पर्याप्त होता है। अधिक स्क्रबिंग से त्वचा में जलन या सूखापन हो सकता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी नए फल से बने स्क्रब को इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। अगर त्वचा संवेदनशील है तो हल्के और सौम्य फलों का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो पपीता, स्ट्रॉबेरी, केला और संतरा जैसे फल त्वचा के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित स्क्रब के रूप में बेहतरीन विकल्प हैं। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ये स्किन को साफ, स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से चमकदार बना सकते हैं।

  • मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय

    मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच ठंडा पानी हर किसी की जरूरत बन चुका है। कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचने के कारण घरों में रखा पानी भी जल्दी गर्म हो जाता है। ऐसे में फ्रिज का पानी भले ही तुरंत राहत देता है, लेकिन सेहत की दृष्टि से लोग अब फिर से मटके के पानी की ओर लौटने लगे हैं। मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा और ताजगी देने वाला माना जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी में यह भी जल्दी सामान्य तापमान पकड़ लेता है। इसी समस्या के समाधान के लिए पुराने समय से अपनाए जा रहे देसी तरीके एक बार फिर चर्चा में हैं।

    जानकारों के अनुसार, मटके के पानी को लंबे समय तक ठंडा रखने का सबसे सरल तरीका उसे सूती कपड़े से ढंकना है। कपड़े को गीला करके मटके के चारों ओर लपेटने से उसमें मौजूद नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती रहती है, जिससे मटके की सतह ठंडी बनी रहती है और अंदर का पानी भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। कई जगहों पर लोग सूती कपड़े की जगह टाट या जूट के बोरे का उपयोग भी करते हैं, जो गर्मी में बेहतर कूलिंग प्रभाव देते हैं।

    इसके अलावा मटके को रखने का स्थान भी पानी की ठंडक पर बड़ा असर डालता है। यदि मटका सीधे धूप या गर्म सतह पर रखा जाए तो पानी तेजी से गर्म हो जाता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में एक पुराना तरीका अपनाया जाता है, जिसमें मटके को गीली रेत या मिट्टी के बीच रखा जाता है। रेत में मौजूद नमी और ठंडक मटके को बाहर से ठंडा रखती है, जिससे पानी लंबे समय तक ताजा और ठंडा बना रहता है।

    कुछ घरेलू उपायों में नया मटका इस्तेमाल करने से पहले उसमें सेंधा नमक डालकर कुछ समय तक पानी भरकर रखने की परंपरा भी शामिल है। माना जाता है कि इससे मटके की प्राकृतिक ठंडक बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है। बाद में उस पानी को निकालकर ताजा पानी भरने पर मटका अधिक प्रभावी ढंग से पानी को ठंडा रखता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मटके का पानी न केवल प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर विकल्प है। अत्यधिक ठंडा फ्रिज का पानी कई बार गले और पाचन पर असर डाल सकता है, जबकि मटके का पानी शरीर को संतुलित तरीके से ठंडक प्रदान करता है। इसी कारण अब शहरों में भी लोग पारंपरिक तरीकों की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं और इन देसी जुगाड़ों को फिर से अपनाया जा रहा है, ताकि गर्मी के मौसम में बिना बिजली के भी ठंडे पानी का आनंद लिया जा सके।

  • घर और दफ्तर में बांस का पौधा लगाने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, सही डंठल दिला सकते हैं सुख, समृद्धि और तरक्की

    घर और दफ्तर में बांस का पौधा लगाने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, सही डंठल दिला सकते हैं सुख, समृद्धि और तरक्की

    नई दिल्ली ।  वास्तु शास्त्र के अनुसार फेंगशुई में भी पेड़-पौधों को विशेष महत्व दिया गया है. फेंगशुई के मुताबिक, कुछ पौधे नकारात्मक ऊर्जा को सोखकर पॉजिटिव एनर्जी का संचार करते हैं. फेंगशुई में बांस के पौधे को बेहद प्रभावशाली माना गया है. कहा जाता है कि अगर इस पौधे को घर या दफ्तर में सही दिशा और स्थान पर लगाया जाए, तो वहां मौजूद तमाम नकारात्मक ऊर्जा अपने आप नष्ट हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप जीवन में तरक्की अपने आप होने लगती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि घर या दफ्तर में कितने डंठल वाला बांस का पौधा लगाना शुभ होता है? आइए, इसे फेंगशुई के अनुसार जानते हैं.

    एक डंठल वाला बांस का पौधा

    फेंगशुई के मुताबिक, घर में एक डंठल वाला बांस का पौधा भी लगाना शुभ है. एक डंठल वाला बांस का पौधा घर-परिवार की एकता और विकास के लिए खास होता है. ऐसा बांस का पौधा कार्यों में एकाग्रता और आत्मविश्वास को मजबूत करने में सहायक होता है. ऐसे बांस के पौधे को दफ्तर में लगाने से करियर में तरक्की के रास्ते खुलते हैं.
    दो डंठल वाला बांस का पौधा
    फेंगशुई के अनुसार, दो डंठल वाला बांस का पौधा प्रेम, दांपत्य सुख और साझेदारी का प्रतीक है. इसे बेडरूम में लगाने से शादीशुदा जिंदगी में खुशहाल रहती है. साथ ही पार्टनर के प्रति प्यार और लगाव बढ़ता है.

    तीन डंठल वाला बांस का पौधा

    तीन डंठल वाला बांस का पौधा लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली का प्रतीक है. इसे घर में रखने से नकारात्मक ऊर्जा अपने आप दूर हो जाती है और घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है.
    5 डंठल वाला बांस का पौधा
    फेंगशुई की मानें तो 5 डंठल वाला बांस का पौधा धन, शक्ति और सफलता का प्रतीक होता है. मान्यतानुसार, इसे घर की उत्तर दिशा में रखने से धन की स्थिति अच्छी होती है. इसके अलावा इसे दफ्तर में लगाने से तरक्की के रास्ते खुलते हैं.

    8 और 10 डंठल वाला बांस का पौधा

    आठ डंठल वाले बांस के पौधे को धन और समृद्धि का प्रतीक माना गया है. वहीं 10 डंठल वाला बैम्बू प्लांट सफलता का प्रतीक होता है. इसलिए इसे घर का दफ्तर में लगाने से तरक्की और खुशहाली में चार चांद लग जाते हैं.
    किस दिशा में लगाएं बांस का पौधा?
    फेंगशुई के मुताबिक, डंठल वाले बांस के पौधे को ड्राइंग या बेडरूम में लगाया जा सकता है. इसे पूरब दिशा की ओर लगाना अत्यंत शुभ माना गया है. घर की इस दिशा में बांस का पौधा लगाने से परिवार में आपसी सामंजस्य और प्यार बना रहता है. दांपत्य जीवन में खुशहाली के लिए इस पौधे को कांच के जार में लगा उस पर लाल रंग का रिबन जरूर बांधना चाहिए. ऐसा करने से शादीशुदा जिंदगी खुशहाल रहती है. जबकि, इसे दफ्तर के पूर्व या दक्षिण दिशा में लगाना चाहिए. ऐसा करने से आर्थिक उन्नति होती है.
  • गर्मी में डायबिटीज मरीज रहें सतर्क: आम, चीकू और शरीफा जैसे मीठे फल बढ़ा सकते हैं ब्लड शुगर का खतरा

    गर्मी में डायबिटीज मरीज रहें सतर्क: आम, चीकू और शरीफा जैसे मीठे फल बढ़ा सकते हैं ब्लड शुगर का खतरा


    नई दिल्ली ।
    ऐसे फल जिनका GI 55 से कम है, वो डायबिटिक पेशेंट्स खा सकते हैं, लेकिन जो 70 से ऊपर का ग्लाइसेमिक इंडेक्स रखते हैं, उन्हें खाना रिस्की साबित हो सकता है। आमतौर पर माना जाता है कि डायबिटीज के मरीजों को फलों से बिल्कुल दूर रहना चाहिए, लेकिन सच तो ये है कि सेब, संतरा, बेरीज जैसे फल समर सीजन में खाना काफी सुरक्षित विकल्प है। हालांकि, मीठे रस से भरा और सबका फेवरेट फलों का राजा आम, पावर फ्रूट माने जाने वाला केला, और मीठा चीकू, डायबिटिक लोगों को अपनी लिस्ट से बाहर ही रखना चाहिए।
    फल और उनके ग्लाइसेमिक इंडेक्स का गणित
    फलों में सेहत का राज छिपा होता है और संतुलित आहार के लिए इनका रोजाना सेवन जरूरी माना जाता है। लेकिन फाइबर, एंटीऑक्सिडेंट, माइक्रोन्यूट्रिएंट होने के साथ ही इनमें ग्लूकोज, फ्रुक्टोज, और सुक्रोस भी होता है जो डायबिटीज के मरीजों के लिए सुरक्षित नहीं है। इससे उनका ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है। लेकिन सेब, अमरूद जैसे पांच फल हैं जिनका सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को शुगर बढ़ने का खतरा नहीं होता है। बस उन्हें इस बात का ख्याल रखना होगा कि वे यह सेवन अपने संतुलित मात्रा में करें।

    फलों का ग्लाइसेमिक इंडेक्स चेक करना है जरूरी
    ग्लाइसेमिक इंडेक्स की श्रेणियां
    दरअसल फलों को ग्लाइसेमिक इंडेक्स की 3 श्रेणियों में बांटा गया है। 55 से कम वाले लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स और 59-69 वाले मॉर्डरेट ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल डायबिटीज के मरीज अपनी तबियत के आधार पर खा सकते हैं। वहीं 70 या उससे ज्यादा वाले हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फलों से इस तरह के मरीजों को बचने की जरूरत है। आसानी से समझें तो जिन फलों में फाइबर की मात्रा ज्यादा होती है उनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है। फाइबर पाचन प्रक्रिया को धीमा करता है, जिससे ग्लूकोज धीमें एब्जॉर्ब होता है और ब्लड शुगर स्पाइक नहीं होती।

    • हाई ग्लाईसेमिक इंडेक्स वाले फल, जिन्हें न खाएं डायबिटीज के मरीज – आम, केला, चीकू, अंगूर, शरीफा
    • लो और मॉर्डरेट ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल जो सीमित मात्रा व सही तरीके से खाने पर डायबिटीज के मरीजों के लिए हैं सेफ – सेब, नाशपाती, संतरा, अमरूद और बेरीज।

    डायबिटीज मरीज यूं खाएं फल
    फल खाने का सही तरीका
    कौन से फल खाने हैं यह जानने के साथ ही यह भी पता होना जरूरी है कि फल किस तरह खाए जाएं। आम तौर पर लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल डायबिटीज मरीज खा सकते हैं लेकिन यह मायने रखता है कि वे इनका सेवन कितनी बार और किस रूप में कर रहे हैं।

    जूस, स्मूदी, मिल्कशेक में फलों की शुगर कंसंट्रेट तरीके से शरीर में पहुंचती है और डायबिटीज बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। इससे बेहतर है कि इन्हें सीधे तौर पर खाया जाए ताकि इनका फाइबर भी भरपूर मात्रा में मिल सके। इसके अलावा ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाली हेवी मील के साथ इन्हें खाने से भी नुकसान संभव है। बेहतर है कि इन्हें स्नैक्स की तरह मील से हटकर खाया जाए। इसके साथ ही डायबिटीज के मरीज इन बातों का भी ध्यान रख सकते हैं :

    • फलों को खाने के साथ नहीं स्नैक्स के रूप में, मिड मील के तौर पर या वर्कआउट करने से पहले खाना बेहतर है।
    • आम तौर पर दिन में 1-2 सर्विंग ही लेनी चाहिए जिसमें 1 सर्विंग 100 ग्राम के बराबर हो।
    • इन्हें प्रोटीन से भरपूर खाद्यों के साथ लेने से ज्यादा फायदा मिलता है। इसके लिए भुने चने, नट्स, हाई प्रोटीन ग्रीक योगर्ट लिए जा सकते हैं।

    तो ड्रायफ्रूट्स का क्या?

    डायबिटीज के मरीजों के लिए ड्रायडफ्रूट्स कितने सही?सच तो ये है कि सुपर हेल्दी माने जाने वाले ड्रायफ्रूट्स से ज्यादा फ्रेश फ्रूट्स डायबिटीज वालों के लिए सेफ हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ताजे फल जब सूख जाते हैं तब वे ड्रायफ्रूट बन जाते हैं, जिससे उनमें मौजूद शुगर और भी कंसंट्रेट हो जाती है। खजूर और अंजीर इसका क्लासिक उदाहरण हैं, जिन्हें सुपरफ्रूड की तरह माना जाता है।

    ड्रायफ्रूट कम मात्रा में खाने पर भी ज्यादा कैलोरी मिलती है, लेकिन साथ ही ब्लड शुगर भी तेजी से बढ़ती है, जो डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति के लिए बिल्कुल सही नहीं। इनके मुकाबले ताजा फलों का सेवन डायबिटीज के मरीजों के लिए ज्यादा बेहतर होता है क्योंकि इस तरह उन्हें एक बार की सर्विंग में बेहतर हायड्रेशन मिलता है, पेट भरता है और ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम रहता है।

    ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ड्रायफ्रूट के सेवन से वो विटामिन नहीं मिल पाते जो फल के सूखने की प्रक्रिया में नष्ट हो चुके हों। यही वजह है कि इनसे भरपूर पोषण की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए भी फ्रेश फ्रूट्स बेहतर विकल्प बनकर सामने आते हैं।

    अगर खाने हैं ये फल

    मौसमी फल ताजगी, स्वाद और पोषण से भरपूर होते हैं। अगर आपको गर्मियों के वे फल पसंद हैं जो हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले होते हैं, तो आपको मन मारने की जरूरत नहीं है। बस कुछ बातों का ध्यान रखते हुए डायबिटीज के मरीज आम, तरबूज जैसे फल का सकते हैं:

    • कम मात्रा में स्नैक्स के रूप में इनका सेवन करें, भोजन के आगे पीछे इन्हें खाने से बचें।
    • बेहतर शुगर कंट्रोल के लिए इन्हें हाई प्रोटीन वाले खाद्यों के साथ लें।
    • एक साथ कई हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल न खाएं।

    हालांकि, सबसे सेफ यही होगा कि डाइट में इन्हें शामिल करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें और उनके निर्देशों का पूरी तरह से पालन करें। साथ ही अगर इन फलों को खाने पर असहजता या किसी अन्य तरह की परेशानी हो, या शुगर एकदम से बहुत स्पाइक हो जाए, तो तुरंत एक्सपर्ट से कनेक्ट करें।

  • अब नहीं आएगा ऑयल का असर: ऑयली स्किन के लिए बेस्ट प्राइमर टिप्स

    अब नहीं आएगा ऑयल का असर: ऑयली स्किन के लिए बेस्ट प्राइमर टिप्स


    नई दिल्ली । ऑयली स्किन वालों के लिए मेकअप को लंबे समय तक टिकाए रखना हमेशा एक बड़ी चुनौती होती है। चेहरे पर अतिरिक्त तेल (sebum) निकलने के कारण फाउंडेशन जल्दी पिघलने लगता है, मेकअप केक जैसा दिखने लगता है और लुक खराब हो जाता है। ऐसे में एक अच्छा Primer मेकअप रूटीन का सबसे अहम हिस्सा बन जाता है, जो त्वचा और मेकअप के बीच एक स्मूद लेयर बनाकर पूरे लुक को लंबे समय तक फ्रेश बनाए रखता है।

    ऑयली स्किन के लिए सबसे बेहतर प्राइमर वे माने जाते हैं जो मैटिफाइंग (Mattifying) होते हैं। ये त्वचा से निकलने वाले अतिरिक्त तेल को कंट्रोल करते हैं और चेहरे को एक सॉफ्ट, शाइन-फ्री फिनिश देते हैं। खासकर सिलिकॉन-बेस्ड प्राइमर, स्किन के पोर्स को ब्लर करके एक फ्लॉलेस बेस तैयार करते हैं, जिससे फाउंडेशन बेहतर तरीके से सेट हो जाता है।

    आजकल मार्केट में जेल-बेस्ड प्राइमर भी काफी लोकप्रिय हैं, जो हल्के होते हैं और त्वचा पर चिपचिपापन नहीं छोड़ते। ये प्राइमर गर्म और ह्यूमिड मौसम में भी मेकअप को लंबे समय तक टिकाए रखते हैं। इसके अलावा, ऑयल-फ्री फॉर्मूला वाले प्राइमर भी ऑयली स्किन के लिए बेहद उपयोगी साबित होते हैं क्योंकि ये अतिरिक्त चमक को कम करते हैं और स्किन को बैलेंस करते हैं।

    मेकअप आर्टिस्ट्स के अनुसार, प्राइमर लगाने से पहले चेहरे को अच्छे से साफ करना और टोनर या हल्का मॉइस्चराइजर लगाना जरूरी होता है। इसके बाद थोड़ी मात्रा में प्राइमर लेकर चेहरे के T-Zone यानी माथा, नाक और ठोड़ी पर अच्छी तरह ब्लेंड करना चाहिए, क्योंकि यहीं से सबसे ज्यादा ऑयल निकलता है। सही तरीके से लगाया गया प्राइमर मेकअप की लाइफ को कई घंटे तक बढ़ा सकता है।

    इसके अलावा, कुछ प्राइमर ऐसे भी होते हैं जिनमें स्किन-केयर इंग्रीडिएंट्स जैसे एलोवेरा, ग्रीन टी और विटामिन E शामिल होते हैं, जो त्वचा को शांत रखने के साथ-साथ पोषण भी देते हैं। यह ऑयली स्किन वालों के लिए डबल बेनिफिट देता है—एक तरफ मेकअप सेट रहता है और दूसरी तरफ स्किन हेल्दी भी बनी रहती है।

    आज के समय में बढ़ते प्रदूषण और गर्मी के कारण ऑयली स्किन की समस्या और भी आम हो गई है। ऐसे में सही प्राइमर का चुनाव न सिर्फ मेकअप को परफेक्ट बनाता है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ाता है। अगर आप दिनभर ऑफिस, कॉलेज या किसी फंक्शन में रहते हैं, तो एक अच्छा मैट प्राइमर आपका ब्यूटी गार्ड बन सकता है।

    निष्कर्ष यही है कि ऑयली स्किन के लिए सही प्राइमर चुनना कोई लक्जरी नहीं बल्कि जरूरत है, जो आपके पूरे मेकअप लुक को लंबे समय तक टिकाए रखने में मदद करता है और चेहरे को बिना ऑयल के फ्रेश और ग्लोइंग बनाए रखता है।

  • सुबह का सही नाश्ता क्या हो? ओट्स और पोहा में जानें कौन देगा ज्यादा एनर्जी

    सुबह का सही नाश्ता क्या हो? ओट्स और पोहा में जानें कौन देगा ज्यादा एनर्जी


    नई दिल्ली । सुबह का नाश्ता हमारे पूरे दिन की एनर्जी और हेल्थ को तय करता है। आजकल फिटनेस और वजन घटाने की चाहत के बीच सबसे बड़ा सवाल यही बन गया है कि आखिर सुबह ओट्स खाना बेहतर है या पोहा। दोनों ही विकल्प भारतीय रसोई में आसानी से उपलब्ध हैं, जल्दी बन जाते हैं और हल्के भी माने जाते हैं, लेकिन इनके शरीर पर असर अलग-अलग होते हैं।

    ओट्स को अक्सर वेट लॉस डाइट का “किंग” कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर बीटा-ग्लूकन है, जो पाचन क्रिया को धीमा करता है और लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता। यही कारण है कि ओट्स खाने के बाद व्यक्ति लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करता है और बार-बार स्नैकिंग की जरूरत कम हो जाती है। इसके अलावा ओट्स ब्लड शुगर को भी अचानक बढ़ने से रोकते हैं, जिससे शरीर को लगातार स्थिर ऊर्जा मिलती रहती है। हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि फ्लेवर्ड ओट्स की जगह प्लेन ओट्स का सेवन ज्यादा फायदेमंद होता है क्योंकि इनमें अतिरिक्त चीनी नहीं होती।

    वहीं दूसरी तरफ पोहा को अक्सर हल्का और साधारण नाश्ता माना जाता है, लेकिन इसकी अपनी अलग ताकत है। चपटे चावल से बनने वाला पोहा आसानी से पच जाता है और शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है। जब इसमें मूंगफली, हरी सब्जियां, राई और करी पत्ता मिलाया जाता है तो इसकी न्यूट्रिशन वैल्यू काफी बढ़ जाती है। मूंगफली प्रोटीन और हेल्दी फैट प्रदान करती है, जबकि नींबू आयरन के अवशोषण को बेहतर बनाता है। यही वजह है कि पोहा एक बैलेंस्ड और एनर्जी देने वाला नाश्ता माना जाता है।

    न्यूट्रिशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि असली फर्क सिर्फ ओट्स या पोहा में नहीं बल्कि आपके पूरे डाइट पैटर्न में होता है। अगर आपका नाश्ता संतुलित है और उसमें फाइबर, प्रोटीन और हेल्दी फैट शामिल हैं, तो वह शरीर को बेहतर तरीके से सपोर्ट करता है। वजन घटाने के लिए केवल एक फूड आइटम पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है, बल्कि पूरे दिन की डाइट और लाइफस्टाइल ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    कुछ लोग ओट्स को अपनी फिटनेस जर्नी का हिस्सा बनाते हैं क्योंकि यह लंबे समय तक पेट भरा रखता है, जबकि कुछ लोग पोहा को पसंद करते हैं क्योंकि यह स्वादिष्ट, हल्का और जल्दी पचने वाला होता है। दोनों ही विकल्प सही हैं, बस जरूरत है उन्हें सही मात्रा और सही सामग्री के साथ खाने की।

    निष्कर्ष यही है कि ओट्स और पोहा दोनों ही हेल्दी ब्रेकफास्ट हैं, लेकिन आपके लक्ष्य के अनुसार चुनाव करना सबसे महत्वपूर्ण है। वजन घटाना हो तो ओट्स बेहतर हो सकता है, जबकि तुरंत एनर्जी और हल्के नाश्ते के लिए पोहा एक शानदार विकल्प है।

  • फास्ट फूड से बढ़ सकते हैं गंभीर बीमारियों का खतरा: जानें किन चीज़ों से रखें दूरी

    फास्ट फूड से बढ़ सकते हैं गंभीर बीमारियों का खतरा: जानें किन चीज़ों से रखें दूरी

    नई दिल्ली। आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में फास्ट फूड लोगों की पहली पसंद बन चुका है। बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज और इंस्टेंट नूडल्स जैसी चीजें स्वाद में लाजवाब लगती हैं, लेकिन लगातार सेवन से स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। डॉक्टर और न्यूट्रिशन एक्सपर्ट लगातार चेतावनी देते हैं कि इन फूड्स का सीमित सेवन ही सेहत के लिए सुरक्षित है।

    सबसे पहले बर्गर और पिज्जा का नाम आता है। इनमें इस्तेमाल होने वाला मैदा, प्रोसेस्ड चीज़ और हाई कैलोरी सॉस शरीर में फैट बढ़ाने का काम करते हैं। नियमित रूप से इनके सेवन से मोटापा तेजी से बढ़ता है और हार्ट संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है। इसके अलावा फ्रेंच फ्राइज और डीप फ्राइड स्नैक्स भी सेहत के लिए हानिकारक माने जाते हैं। इनको तलने में इस्तेमाल किया गया बार-बार तेल ट्रांस फैट बनाता है, जो कोलेस्ट्रॉल बढ़ाकर हार्ट अटैक और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।

    इंस्टेंट नूडल्स और चाउमीन जैसे फास्ट फूड में मैदा, ज्यादा नमक और प्रिज़र्वेटिव्स की मात्रा अधिक होती है। लगातार सेवन से पेट की समस्याएं, गैस और एसिडिटी जैसी शिकायतें बढ़ सकती हैं। कोल्ड ड्रिंक्स और शुगर वाले पेय पदार्थ शरीर में अनावश्यक शुगर बढ़ाते हैं, जिससे डायबिटीज का खतरा और इम्युनिटी कमजोर हो सकती है। लिवर पर भी इसका नकारात्मक असर देखा जा सकता है।

    प्रोसेस्ड मीट जैसे सॉसेज, बेकन और पैकेज्ड फूड भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माने जाते हैं। इनमें सोडियम और प्रिज़र्वेटिव्स की मात्रा अधिक होती है, जो लंबे समय तक शरीर में रहने पर किडनी और हार्ट पर असर डाल सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि फास्ट फूड का पूरी तरह त्याग करना जरूरी नहीं है, लेकिन इसे सीमित मात्रा में और कभी-कभार ही खाना चाहिए।

    हेल्दी रहने के लिए फल, सब्जियां, साबुत अनाज और घर का बना खाना सबसे सुरक्षित विकल्प हैं। संतुलित आहार और सही लाइफस्टाइल अपनाकर फास्ट फूड के दीर्घकालिक नुकसान को कम किया जा सकता है। आज की बदलती लाइफस्टाइल में समझदारी यही है कि हम अपने भोजन के चुनाव पर ध्यान दें और हेल्दी जीवनशैली को प्राथमिकता दें।

  • बादाम का जादू: रोज़ खाने से ब्लड शुगर नियंत्रित और मानसिक क्षमता बढ़े..

    बादाम का जादू: रोज़ खाने से ब्लड शुगर नियंत्रित और मानसिक क्षमता बढ़े..

    नई दिल्ली। हाल ही में हुई एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि रोज़ाना थोड़ी मात्रा में बादाम खाने से प्रीडायबिटीज से प्रभावित लोगों के लिए कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं। इस अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों ने अपनी डाइट में रोज़ाना लगभग एक मुट्ठी बादाम शामिल किया, उनके ब्लड शुगर लेवल में सुधार हुआ और उनकी मानसिक कार्यक्षमता में भी noticeable बढ़ोतरी देखी गई।

    दुनियाभर में 60 करोड़ से अधिक लोग प्रीडायबिटीज की स्थिति में हैं। इस अवस्था में ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन डायबिटीज तक नहीं पहुंचता। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने से न केवल डायबिटीज का खतरा बढ़ता है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। इसी चिंता के समाधान के लिए नई दिल्ली में 40 से 60 साल के 60 एशियाई भारतीय वयस्कों पर 24 हफ्तों तक एक अध्ययन किया गया।

    शोध में प्रतिभागियों को दो ग्रुप्स में बांटा गया। पहले ग्रुप को सामान्य संतुलित आहार दिया गया, जबकि दूसरे ग्रुप की डाइट में कुल कैलोरी का 20 प्रतिशत हिस्सा बादाम के रूप में शामिल किया गया। यह मात्रा करीब 32 से 42 ग्राम यानी एक मुट्ठी बादाम रोज़ाना थी। छह महीने के दौरान नियमित जांच के बाद नतीजे बेहद सकारात्मक रहे।

    रोज़ बादाम खाने वाले समूह में दिमाग की कार्यक्षमता में सुधार देखा गया। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हुई और जानकारी को समझने की गति में तेज़ी आई। इसके अलावा ब्लड शुगर लेवल में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। फास्टिंग शुगर और भोजन के बाद का शुगर लेवल कम हुआ और HbA1c स्तर में भी कमी आई।

    मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी असर दिखा। प्रतिभागियों का वजन, बॉडी फैट और BMI कम हुआ, साथ ही कोलेस्ट्रॉल और LDL लेवल घटे। शरीर की सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के संकेतक भी बेहतर हुए।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और आस-पास के एशियाई देशों में मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा अधिक होता है। इस शोध से यह सिद्ध हुआ कि रोज़ाना मुट्ठी भर बादाम खाने से न केवल प्रीडायबिटीज नियंत्रित रहती है, बल्कि दिल और दिमाग भी स्वस्थ रहते हैं। इस सरल और प्राकृतिक उपाय को अपनी डाइट में शामिल करना बेहद लाभकारी साबित हो सकता है।