Category: Lifestyle

  • उम्र कम है तो कैंसर का खतरा नहीं ऐसा सोचना पड़ सकता है भारी 20 से 30 की उम्र में इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

    उम्र कम है तो कैंसर का खतरा नहीं ऐसा सोचना पड़ सकता है भारी 20 से 30 की उम्र में इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज


    नई दिल्ली। कैंसर का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में यह धारणा बनती है कि यह बीमारी अधिक उम्र के लोगों को ही होती है। हालांकि कुछ प्रकार के कैंसर कम उम्र के लोगों में भी हो सकते हैं। 20 से 30 साल की उम्र में कैंसर का खतरा आमतौर पर उम्र बढ़ने के मुकाबले कम होता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युवाओं को शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों को नजरअंदाज कर देना चाहिए। कई बार सामान्य लगने वाले लक्षण किसी दूसरी स्वास्थ्य समस्या की वजह से भी हो सकते हैं लेकिन अगर कोई बदलाव लगातार बना रहे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।

    शरीर में अचानक कोई गांठ महसूस होना ऐसा संकेत है जिस पर ध्यान देना चाहिए। खासतौर पर अगर गांठ लंबे समय तक बनी रहे या उसके आकार में बदलाव दिखाई दे तो इसकी चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। हर गांठ कैंसर नहीं होती क्योंकि शरीर में कई तरह की गैर कैंसरकारी गांठ भी बन सकती हैं। इसलिए खुद से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है।

    बिना किसी स्पष्ट वजह के लगातार वजन कम होना भी ऐसा बदलाव है जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर खानपान या व्यायाम में कोई बड़ा बदलाव किए बिना वजन तेजी से कम हो रहा है तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें तनाव संक्रमण हार्मोन संबंधी समस्या या अन्य स्वास्थ्य स्थितियां शामिल हो सकती हैं। लगातार वजन घटने पर डॉक्टर से जांच कराना सही कदम माना जाता है।

    लगातार थकान महसूस होना भी कई स्वास्थ्य समस्याओं का संकेत हो सकता है। पर्याप्त आराम और नींद के बावजूद कमजोरी बनी रहती है तो इसके कारणों की जांच जरूरी हो सकती है। इसी तरह लंबे समय तक रहने वाला बुखार रात में अत्यधिक पसीना आना या शरीर में लगातार कमजोरी जैसी समस्या होने पर भी चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

    कुछ मामलों में शरीर से असामान्य रक्तस्राव भी महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। मल या पेशाब में खून दिखाई देना या बिना सामान्य कारण के रक्तस्राव होना ऐसी स्थिति है जिसमें देरी नहीं करनी चाहिए। इसी तरह लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी आवाज में लगातार बदलाव निगलने में परेशानी या शरीर के किसी हिस्से में लगातार दर्द जैसे लक्षणों की भी जांच कराना जरूरी हो सकता है।
    कुछ मामलों में शरीर से असामान्य रक्तस्राव भी महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। मल या पेशाब में खून दिखाई देना या बिना सामान्य कारण के रक्तस्राव होना ऐसी स्थिति है जिसमें देरी नहीं करनी चाहिए। इसी तरह लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी आवाज में लगातार बदलाव निगलने में परेशानी या शरीर के किसी हिस्से में लगातार दर्द जैसे लक्षणों की भी जांच कराना जरूरी हो सकता है।

    यह समझना बेहद जरूरी है कि इन लक्षणों में से किसी एक का होना कैंसर होने का प्रमाण नहीं है। ऐसे कई लक्षण सामान्य संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी दिखाई दे सकते हैं। कैंसर की पुष्टि केवल चिकित्सकीय जांच और जरूरी टेस्ट के बाद ही हो सकती है। इसलिए इंटरनेट पर लक्षण पढ़कर खुद बीमारी का अनुमान लगाने से बचना चाहिए।

    युवाओं के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि अपने शरीर में होने वाले लगातार और असामान्य बदलावों को लेकर जागरूक रहें। संतुलित भोजन नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद तंबाकू और धूम्रपान से दूरी तथा समय पर स्वास्थ्य जांच बेहतर स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर कोई लक्षण लगातार बना रहता है या तेजी से बढ़ रहा है तो डॉक्टर से संपर्क करना समझदारी है। समय पर चिकित्सकीय सलाह लेने से बीमारी का कारण समझने और जरूरत पड़ने पर उचित उपचार शुरू करने में मदद मिल सकती है।

  • चेहरे की dullness दूर करने में काम आ सकता है चावल जानिए कैसे बनाएं आसान घरेलू स्किन केयर

    चेहरे की dullness दूर करने में काम आ सकता है चावल जानिए कैसे बनाएं आसान घरेलू स्किन केयर


    नई दिल्ली। चेहरे की खूबसूरती और निखार के लिए लोग अक्सर महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों से भी त्वचा की देखभाल की जा सकती है। चावल ऐसी ही चीज है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से त्वचा की देखभाल से जुड़े घरेलू नुस्खों में किया जाता रहा है। चावल में मौजूद स्टार्च और कुछ पोषक तत्व त्वचा को मुलायम महसूस कराने और चेहरे की सफाई में मदद कर सकते हैं। यही वजह है कि राइस वॉटर और चावल से बने फेस पैक को घरेलू स्किन केयर रूटीन में शामिल करने का चलन बढ़ रहा है।

    चावल से स्किन केयर करने का सबसे आसान तरीका राइस वॉटर है। इसके लिए चावल को अच्छी तरह धोकर पानी में कुछ समय के लिए भिगोया जा सकता है। इसके बाद उस पानी को अलग करके चेहरे की सफाई के बाद इस्तेमाल किया जा सकता है। राइस वॉटर को चेहरे पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है और कुछ समय बाद सामान्य पानी से चेहरा धोया जा सकता है। इससे त्वचा साफ और फ्रेश महसूस हो सकती है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू उपाय को पहली बार इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना बेहतर माना जाता है।

    चावल से फेस पैक भी तैयार किया जा सकता है। इसके लिए चावल को अच्छी तरह पकाकर या भिगोकर उसका मुलायम पेस्ट तैयार किया जा सकता है। इसमें जरूरत के अनुसार एलोवेरा जेल या दही जैसी चीज मिलाई जा सकती है। तैयार मिश्रण को चेहरे पर हल्की परत के रूप में लगाया जा सकता है। कुछ समय बाद चेहरे को सामान्य पानी से धो लेना चाहिए। यह उपाय त्वचा को मुलायम और हाइड्रेटेड महसूस कराने में मदद कर सकता है।

    अगर त्वचा बहुत ज्यादा रूखी रहती है तो चावल के पेस्ट में थोड़ा दही मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं तैलीय त्वचा वाले लोग बहुत भारी सामग्री मिलाने से बचें। चेहरे पर किसी भी घरेलू मिश्रण को रगड़कर लगाने के बजाय हल्के हाथों से लगाना बेहतर होता है। ज्यादा रगड़ने से त्वचा में जलन या लालिमा हो सकती है।

    चावल से स्किन केयर करते समय यह समझना जरूरी है कि घरेलू नुस्खे किसी गंभीर त्वचा समस्या का इलाज नहीं हैं। अगर चेहरे पर लगातार मुंहासे खुजली जलन लाल चकत्ते या किसी तरह की एलर्जी है तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए।

    राइस स्किन केयर का फायदा पाने के लिए नियमितता के साथ त्वचा की मूल जरूरतों का भी ध्यान रखना जरूरी है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन लेना धूप में निकलते समय सनस्क्रीन लगाना और चेहरे की साफ सफाई बनाए रखना त्वचा की देखभाल के अहम हिस्से हैं। चावल से बने घरेलू उपाय त्वचा को कुछ समय के लिए मुलायम और फ्रेश महसूस करा सकते हैं लेकिन इन्हें चमत्कारी उपचार नहीं समझना चाहिए। सही तरीके और सावधानी के साथ चावल को एक सरल घरेलू स्किन केयर विकल्प के तौर पर आजमाया जा सकता है।

  • बारिश के बाद और भी हसीन हो जाती हैं ये 7 जगहें सितंबर ट्रिप के लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन

    बारिश के बाद और भी हसीन हो जाती हैं ये 7 जगहें सितंबर ट्रिप के लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन


    नई दिल्ली। सितंबर का महीना घूमने के शौकीन लोगों के लिए बेहद खास माना जाता है। मानसून की बारिश के बाद देश के कई हिस्सों में पहाड़ हरियाली से ढक जाते हैं और झरने पूरी रफ्तार से बहने लगते हैं। कई जगहों पर मौसम भी सुहावना हो जाता है और गर्मी से राहत मिलती है। ऐसे में अगर आप सितंबर में किसी खूबसूरत जगह की यात्रा का प्लान बना रहे हैं तो भारत में कई ऐसे डेस्टिनेशन हैं जहां प्रकृति का अलग ही रूप देखने को मिलता है। कूर्ग से लेकर मुन्नार और उदयपुर से लेकर श्रीनगर तक ये जगहें बारिश के बाद और भी आकर्षक नजर आती हैं।

    कर्नाटक का कूर्ग और चिकमगलूर सितंबर की यात्रा के लिए शानदार विकल्प हैं। बारिश के बाद यहां की पहाड़ियां गहरी हरियाली से भर जाती हैं और कॉफी के बागानों का नजारा मन मोह लेता है। कूर्ग को भारत का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है। यहां झरने पहाड़ी रास्ते और धुंध से ढकी वादियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। चिकमगलूर भी कॉफी एस्टेट और पश्चिमी घाट की खूबसूरत पहाड़ियों के लिए जाना जाता है। सितंबर में यहां प्रकृति के बीच समय बिताना और फोटोग्राफी करना खास अनुभव हो सकता है।

    केरल का मुन्नार भी सितंबर में बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। यहां दूर तक फैले चाय के बागान बारिश के बाद और ज्यादा हरे नजर आते हैं। सुबह के समय पहाड़ियों पर छाई धुंध और बादलों का नजारा इस जगह की खूबसूरती को और बढ़ा देता है। अगर आपको शांत वातावरण और प्राकृतिक नजारों के बीच छुट्टियां बिताना पसंद है तो मुन्नार अच्छा विकल्प हो सकता है।

    उत्तराखंड की वैली ऑफ फ्लावर्स प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। पहाड़ों के बीच फैली हरियाली और रंग बिरंगे फूल इस जगह को बेहद खूबसूरत बनाते हैं। ट्रैकिंग पसंद करने वालों के लिए भी यह जगह खास है। हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों की यात्रा से पहले मौसम और स्थानीय परिस्थितियों की जानकारी लेना जरूरी है।

    राजस्थान का उदयपुर भी सितंबर में घूमने के लिए अच्छा विकल्प है। बारिश के बाद यहां की झीलों में पानी बढ़ जाता है और आसपास की हरियाली शहर की खूबसूरती को नया रंग देती है। झील के किनारे बैठकर सुकून के पल बिताना या शाम के समय शहर के खूबसूरत नजारों को देखना यात्रा को यादगार बना सकता है।

    कश्मीर का श्रीनगर भी सितंबर में आकर्षित करता है। डल झील में शिकारा की सवारी और चारों तरफ दिखाई देने वाली पहाड़ियों का नजारा यात्रा को खास बना सकता है। मौसम की स्थिति अनुकूल होने पर श्रीनगर में घूमने का अनुभव बेहद शानदार रहता है।

    उत्तराखंड का लैंसडाउन उन लोगों के लिए अच्छा विकल्प है जो कम समय में पहाड़ों का आनंद लेना चाहते हैं। देवदार के जंगल पहाड़ी रास्ते और शांत वातावरण यहां की खासियत हैं। बारिश के बाद इसकी हरियाली और निखर जाती है। शहर की भागदौड़ से दूर कुछ दिन शांति से बिताने के लिए लैंसडाउन का चुनाव किया जा सकता है।

    सितंबर में यात्रा करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि हर क्षेत्र में मौसम एक जैसा नहीं रहता। खासकर पहाड़ी इलाकों में बारिश भूस्खलन और सड़क की स्थिति यात्रा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए होटल और यात्रा की बुकिंग से पहले मौसम का ताजा अपडेट और स्थानीय प्रशासन की सलाह जरूर देख लें। सही तैयारी के साथ सितंबर की यह यात्रा आपके लिए प्रकृति के बेहद खूबसूरत रंगों को करीब से देखने का शानदार मौका बन सकती है।

  • लंबा मिर्गी का दौरा रोकने में काम आ सकती है क्लोबाजाम 95 मरीजों पर हुई स्टडी में सामने आए अहम नतीजे

    लंबा मिर्गी का दौरा रोकने में काम आ सकती है क्लोबाजाम 95 मरीजों पर हुई स्टडी में सामने आए अहम नतीजे


    नई दिल्ली। मिर्गी के मरीजों के लिए सामने आई एक नई रिसर्च में लंबे समय तक चलने वाले दौरे को रोकने के लिए मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम को संभावित विकल्प के तौर पर देखा गया है। AIIMS दिल्ली और जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च से जुड़े शोधकर्ताओं की स्टडी में क्लोबाजाम की तुलना नाक के जरिए दी जाने वाली मिडाजोलम से की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों दवाओं के बीच लंबे दौरे को रोकने के समय में सांख्यिकीय रूप से कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था।

    यह रिसर्च खास तौर पर उन स्थितियों को ध्यान में रखकर की गई जिसमें मिर्गी का दौरा सामान्य अवधि से ज्यादा समय तक जारी रहता है। ऐसे लंबे दौरे में जल्द उपचार जरूरी होता है क्योंकि स्थिति गंभीर हो सकती है। अध्ययन में दो मिनट से ज्यादा समय तक चलने वाले दौरे को रेस्क्यू मेडिसिन देने के लिए आधार बनाया गया। रिसर्च का उद्देश्य यह समझना था कि मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम और नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम में से कौन सा विकल्प ऐसे दौरे को जल्दी रोकने में प्रभावी है।

    स्टडी में कुल 95 मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीज ड्रग रेसिस्टेंट मिर्गी से जूझ रहे थे और उन्हें AIIMS की Epilepsy Monitoring Unit में भर्ती किया गया था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। 47 मरीजों को नाक के जरिए मिडाजोलम दी गई जबकि 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम दी गई। अध्ययन एक सिंगल सेंटर प्रोस्पेक्टिव रैंडमाइज्ड ट्रायल था और मरीजों में लंबे दौरे के दौरान क्लिनिकल और EEG दोनों स्तर पर असर को देखा गया।

    रिसर्च में क्लिनिकल दौरा रोकने का औसत समय मिडाजोलम समूह में करीब 20.5 सेकंड रहा जबकि क्लोबाजाम समूह में यह करीब 42 सेकंड था। EEG के जरिए दिमाग की इलेक्ट्रिकल गतिविधि में दौरा रुकने का औसत समय मिडाजोलम समूह में करीब 46 सेकंड और क्लोबाजाम समूह में करीब 54 सेकंड रहा। हालांकि इन अंतर को सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। इसका मतलब यह है कि इस अध्ययन के आधार पर क्लोबाजाम को मिडाजोलम से स्पष्ट रूप से बेहतर या खराब नहीं माना जा सकता।

    इस रिसर्च की एक अहम बात यह भी है कि क्लोबाजाम को मुंह में घुलने वाले रूप में दिया गया। दौरे के दौरान मरीज को सामान्य गोली निगलने में परेशानी हो सकती है। ऐसे में मुंह में घुलने वाला फॉर्म दवा देने का व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। वहीं नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम भी रेस्क्यू मेडिसिन के तौर पर इस्तेमाल की जाती है लेकिन इसकी उपलब्धता और इस्तेमाल से जुड़ी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने क्लोबाजाम को सुविधाजनक और संभावित रूप से कम लागत वाले विकल्प के तौर पर आगे अध्ययन किए जाने की जरूरत बताई है।

    अध्ययन में दोनों समूहों में गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाए गए और उपचार विफल होने या दौरे के दोबारा आने की महत्वपूर्ण समस्या भी दर्ज नहीं हुई। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक सीमित मरीजों वाली सिंगल सेंटर स्टडी थी। इसलिए इसके आधार पर हर मरीज के लिए क्लोबाजाम को मिडाजोलम की जगह इस्तेमाल करने की सलाह नहीं दी जा सकती।

    रिसर्च का महत्व इस बात में है कि लंबे दौरे के दौरान आसानी से दी जा सकने वाली रेस्क्यू मेडिसिन के विकल्पों पर काम आगे बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम को लेकर बड़े और अलग-अलग परिस्थितियों में किए गए अध्ययनों की जरूरत है। मरीजों और परिवारों को किसी भी रेस्क्यू दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और निर्धारित योजना के अनुसार ही करना चाहिए। मिर्गी के लंबे या लगातार दौरे की स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय मदद लेना जरूरी है।

  • Besan Modak Recipe: गणेश चतुर्थी पर घर में बनाएं खस्ता मावा मोदक, बेसन और मेवों से तैयार करें स्वादिष्ट भो

    Besan Modak Recipe: गणेश चतुर्थी पर घर में बनाएं खस्ता मावा मोदक, बेसन और मेवों से तैयार करें स्वादिष्ट भो


    नई दिल्ली ।
    गणेशोत्सव के दौरान भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाने की परंपरा है। आमतौर पर मोदक चावल के आटे से तैयार किए जाते हैं, लेकिन इस बार घर में मौजूद बेसन से भी स्वादिष्ट मोदक बनाए जा सकते हैं। बेसन का सोंधापन और मावा-मेवों की भरावन इस मिठाई को अलग स्वाद देती है। गणेश चतुर्थी के मौके पर घर पर तैयार किए गए इन मोदक को बप्पा को भोग के रूप में अर्पित किया जा सकता है।

    बेसन मावा मोदक बनाने के लिए सबसे पहले इसकी बाहरी परत के लिए सामग्री तैयार करनी होगी। इसके लिए डेढ़ कप बेसन, आधा कप देसी घी, दो बड़े चम्मच सूजी, आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर और तीन चौथाई कप पिसी चीनी की जरूरत होगी।

    मोदक के अंदर भरने वाली स्टफिंग के लिए आधा कप मावा या खोया लिया जाता है। इसमें दो बड़े चम्मच कद्दूकस किया हुआ नारियल, दो बड़े चम्मच बारीक कटे काजू-बादाम, एक छोटा चम्मच चिरौंजी, चुटकी भर जायफल और इलायची पाउडर तथा दो बड़े चम्मच पिसी चीनी मिलाई जाती है।

    मोदक की स्टफिंग तैयार करने के लिए सबसे पहले एक पैन में मावा डालकर धीमी आंच पर करीब दो से तीन मिनट तक भूनें। मावा हल्का गुलाबी होने लगे तो इसमें कटे हुए काजू-बादाम, चिरौंजी और कद्दूकस किया हुआ नारियल डालें। इसके बाद जायफल और इलायची पाउडर मिलाकर गैस बंद कर दें।

    मिश्रण को हल्का गुनगुना होने दें। इसके बाद इसमें दो बड़े चम्मच पिसी चीनी डालकर अच्छी तरह मिला लें। तैयार मावा-मेवे की स्टफिंग को एक तरफ रख दें।

    अब मोदक की बाहरी परत तैयार करने की बारी है। इसके लिए भारी तले की कढ़ाई में देसी घी गर्म करें। इसमें दो बड़े चम्मच सूजी और डेढ़ कप बेसन डालें। दोनों को धीमी आंच पर लगातार चलाते हुए भूनें। करीब आठ से दस मिनट तक भूनने के बाद बेसन से सोंधी खुशबू आने लगेगी और उसका रंग हल्का सुनहरा हो जाएगा।

    बेसन अच्छी तरह भुन जाने के बाद गैस बंद कर दें और मिश्रण को थोड़ा ठंडा होने दें। जब यह हाथ लगाने लायक गुनगुना रह जाए, तब इसमें पिसी चीनी और इलायची पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लें।

    अब मोदक का सांचा लें और उसमें हल्का सा घी लगा दें। सांचे में बेसन का मिश्रण दोनों तरफ दबाकर भरें और बीच में थोड़ी जगह बना लें। इसी खाली जगह में तैयार मावा और मेवों की स्टफिंग भरें। इसके बाद ऊपर से थोड़ा बेसन का मिश्रण लगाकर सांचे को नीचे की तरफ से बंद कर दें।

    सांचे को खोलने पर बेसन मावा मोदक तैयार हो जाएगा। इसी प्रक्रिया से बाकी मोदक भी बनाए जा सकते हैं। बेसन से तैयार बाहरी परत का सोंधापन और मावा, नारियल, काजू, बादाम तथा चिरौंजी से बनी स्टफिंग इसके स्वाद को खास बनाती है। गणेशोत्सव के दौरान इन मोदक को बप्पा को भोग के रूप में अर्पित किया जा सकता है।

    इस तरह घर में उपलब्ध बेसन से बिना पारंपरिक चावल के आटे के भी मोदक तैयार किए जा सकते हैं। रेसिपी में बेसन को धीमी आंच पर अच्छी तरह भूनना और स्टफिंग को सही तरीके से तैयार करना इसके स्वाद और बनावट का अहम हिस्सा है। तैयार मोदक देखने में आकर्षक और खाने में खस्ता तथा सोंधे होते हैं।

  • नींबू और शहद से चेहरे की देखभाल करते हैं तो पहले जान लें ये बातें वरना फायदे की जगह हो सकता है नुकसान

    नींबू और शहद से चेहरे की देखभाल करते हैं तो पहले जान लें ये बातें वरना फायदे की जगह हो सकता है नुकसान


    नई दिल्ली। चेहरे की खूबसूरती और ग्लो के लिए लोग महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स के साथ घरेलू नुस्खों का भी सहारा लेते हैं। नींबू और शहद ऐसा ही एक घरेलू कॉम्बिनेशन है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से त्वचा की देखभाल के लिए किया जाता रहा है। शहद को त्वचा के लिए मॉइस्चराइजिंग गुणों वाला घरेलू घटक माना जाता है जबकि नींबू में विटामिन सी और साइट्रिक एसिड पाया जाता है। यही वजह है कि कई लोग इसे चेहरे पर लगाने से त्वचा में निखार आने की उम्मीद करते हैं। हालांकि यहां सबसे जरूरी बात यह है कि नींबू का रस सीधे चेहरे पर लगाना हर व्यक्ति के लिए सही नहीं होता।

    अगर आप नींबू और शहद को स्किन केयर में शामिल करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपनी त्वचा की संवेदनशीलता को समझना जरूरी है। संवेदनशील या पहले से irritated skin पर नींबू जलन लालिमा खुजली या चुभन बढ़ा सकता है। नींबू जैसे citrus fruits का रस त्वचा पर लगने के बाद धूप के संपर्क में आने पर कुछ लोगों में phototoxic reaction भी हो सकता है। इस स्थिति में त्वचा पर लाल चकत्ते जलन सूजन या बाद में गहरे निशान दिखाई दे सकते हैं।

    इसीलिए नींबू को सीधे चेहरे पर रगड़ने या लंबे समय तक लगाकर रखने से बचना बेहतर है। अगर किसी घरेलू मिश्रण का इस्तेमाल करना ही चाहते हैं तो पहले त्वचा के छोटे हिस्से पर पैच टेस्ट करना जरूरी है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी भी नए स्किन केयर प्रोडक्ट को इस्तेमाल करने से पहले छोटे हिस्से पर टेस्ट करने की सलाह देती है ताकि संभावित irritation का पता लगाया जा सके।

    शहद को लेकर भी यह समझना जरूरी है कि प्राकृतिक होने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति की त्वचा पर यह एक जैसा काम करेगा। किसी भी घरेलू मिश्रण को चेहरे पर लगाने से पहले उसकी थोड़ी मात्रा का परीक्षण किया जा सकता है। अगर जलन खुजली लालिमा या सूजन महसूस हो तो इसे तुरंत धो देना चाहिए और दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    अगर आपका मकसद चेहरे को साफ और healthy रखना है तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय एक सरल स्किन केयर रूटीन ज्यादा उपयोगी हो सकता है। चेहरे को mild cleanser से साफ करना मॉइस्चराइजर लगाना और दिन में sunscreen का इस्तेमाल करना त्वचा की सामान्य देखभाल का हिस्सा हो सकता है। खासकर अगर नींबू या कोई citrus ingredient त्वचा के संपर्क में आ गया है तो धूप से बचना और त्वचा को अच्छी तरह धोना जरूरी है।

    नींबू और शहद से तुरंत गोरा होने या दाग धब्बे पूरी तरह खत्म होने जैसे दावों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। त्वचा की रंगत और pigmentation कई कारणों से प्रभावित होती है और हर व्यक्ति की त्वचा अलग तरह से प्रतिक्रिया करती है। अगर चेहरे पर लगातार दाग धब्बे मुंहासे जलन या pigmentation की समस्या बनी हुई है तो घरेलू प्रयोगों के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।

    इसलिए नींबू और शहद को स्किन केयर का चमत्कारी नुस्खा मानने के बजाय सावधानी के साथ देखना चाहिए। खासतौर पर नींबू को सीधे चेहरे पर लगाने से बचना बेहतर है क्योंकि फायदा पाने की कोशिश में त्वचा को irritation या धूप से होने वाली प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। स्वस्थ त्वचा के लिए gentle products नियमित moisturization और पर्याप्त sun protection को प्राथमिकता देना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।

  • दूसरों की सिगरेट का धुआं भी ले सकता है जान पैसिव स्मोकिंग को हल्के में न लें बच्चों और दिल के मरीजों के लिए क्यों है ज्यादा खतरनाक

    दूसरों की सिगरेट का धुआं भी ले सकता है जान पैसिव स्मोकिंग को हल्के में न लें बच्चों और दिल के मरीजों के लिए क्यों है ज्यादा खतरनाक

    नई दिल्ली । धूम्रपान को हमेशा से सेहत के लिए गंभीर खतरा माना जाता है लेकिन इसका नुकसान सिर्फ सिगरेट पीने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसके आसपास मौजूद लोग भी सिगरेट के धुएं की वजह से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर सकते हैं। जब कोई व्यक्ति खुद धूम्रपान नहीं करता लेकिन आसपास मौजूद व्यक्ति की सिगरेट या अन्य तंबाकू उत्पादों से निकलने वाले धुएं को सांस के जरिए अंदर लेता है तो इसे पैसिव स्मोकिंग या सेकंडहैंड स्मोकिंग कहा जाता है। यही वजह है कि घर ऑफिस या किसी बंद जगह पर होने वाला धूम्रपान आसपास मौजूद लोगों के लिए भी चिंता का कारण बन सकता है।

    हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक सेकंडहैंड स्मोकिंग से दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है। भारत में भी यह समस्या गंभीर रूप ले रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में तीन लाख से अधिक मौतों का संबंध सेकंडहैंड स्मोकिंग से बताया गया। वर्ष 1990 की तुलना में यह आंकड़ा करीब 50 प्रतिशत बढ़ा है। इस मामले में चीन के बाद भारत का स्थान बताया गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि धूम्रपान का धुआं सिर्फ धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के लिए ही नहीं बल्कि उसके आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी कितना खतरनाक हो सकता है।

    पैसिव स्मोकिंग के दौरान व्यक्ति कई तरह के हानिकारक रसायनों के संपर्क में आता है। सिगरेट पीते समय निकलने वाला धुआं आसपास की हवा में फैल जाता है और वहां मौजूद व्यक्ति उसे सांस के साथ शरीर के अंदर ले सकता है। बंद कमरे में इसका खतरा और बढ़ सकता है क्योंकि धुआं लंबे समय तक हवा में मौजूद रह सकता है। लगातार ऐसे वातावरण में रहने से शरीर पर इसका प्रभाव भी बढ़ सकता है।

    बच्चों के लिए पैसिव स्मोकिंग विशेष रूप से चिंता का विषय है। धुएं के संपर्क में आने से बच्चों में सांस से जुड़ी समस्याएं और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। वहीं गर्भवती महिलाओं और हृदय संबंधी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए भी सेकंडहैंड स्मोकिंग को गंभीर जोखिम माना जाता है। लंबे समय तक धुएं के संपर्क में रहने से हृदय और फेफड़ों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    पैसिव स्मोकिंग के तुरंत प्रभाव के तौर पर आंखों में जलन खांसी गले में परेशानी और सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक धूम्रपान करने वाले लोगों के बीच रहता है तो सांस की गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। सेकंडहैंड स्मोकिंग को हृदय रोग स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर जैसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से भी जोड़ा जाता है।

    इस खतरे से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि घर को पूरी तरह स्मोक फ्री जोन बनाया जाए। परिवार में कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो उसे घर के अंदर सिगरेट पीने से रोकना चाहिए। बच्चों को विशेष रूप से धुएं से दूर रखना जरूरी है। सार्वजनिक स्थानों पर भी धूम्रपान करने वाले व्यक्ति से दूरी बनाए रखना बेहतर है। साथ ही लोगों को यह समझना होगा कि धूम्रपान का असर केवल धूम्रपान करने वाले तक सीमित नहीं होता। दूसरों के धुएं से बचाव भी स्वस्थ जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

  • बालों का झड़ना रोकने के लिए महंगे प्रोडक्ट नहीं इन आसान आदतों पर दें ध्यान खानपान से लेकर तेल लगाने तक रखें इन बातों का ख्याल

    बालों का झड़ना रोकने के लिए महंगे प्रोडक्ट नहीं इन आसान आदतों पर दें ध्यान खानपान से लेकर तेल लगाने तक रखें इन बातों का ख्याल

    नई दिल्ली । बालों का झड़ना आजकल काफी आम समस्या बन गई है। मौसम में बदलाव तनाव नींद की कमी खराब खानपान बालों पर ज्यादा केमिकल प्रोडक्ट का इस्तेमाल और स्कैल्प की ठीक से देखभाल नहीं करना इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कुछ लोगों में रोजाना कुछ बालों का टूटना सामान्य होता है लेकिन जब बाल सामान्य से काफी ज्यादा गिरने लगें या सिर की त्वचा पर बालों का घनत्व तेजी से कम होने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बालों को स्वस्थ रखने के लिए सबसे पहले रोजमर्रा की कुछ आदतों में बदलाव करना जरूरी है।

    बालों की देखभाल में तेल लगाना एक आसान तरीका माना जाता है। नारियल तेल जैसे हल्के तेल से स्कैल्प की हल्की मालिश की जा सकती है। इससे बालों में नमी बनाए रखने और रूखेपन को कम करने में मदद मिल सकती है। तेल लगाने के दौरान स्कैल्प को जोर से रगड़ने या नाखून से खुजलाने से बचना चाहिए। हल्के हाथों से कुछ मिनट मालिश करना बेहतर रहता है। अगर किसी तेल से खुजली लालिमा या जलन होती है तो उसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    बालों की सेहत का सीधा संबंध खानपान से भी है। भोजन में पर्याप्त प्रोटीन शामिल करना जरूरी है क्योंकि बाल मुख्य रूप से केराटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं। दालें अंडे दूध दही पनीर सोया और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ संतुलित आहार का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। इसके अलावा हरी सब्जियां फल मेवे और बीज भी पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। बिना जांच के किसी सप्लीमेंट या विटामिन की गोली लेना सही नहीं है।

    बाल धोते समय भी कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। बहुत गर्म पानी से सिर धोने से बाल और स्कैल्प रूखे हो सकते हैं इसलिए सामान्य या हल्के गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना बेहतर है। शैंपू को स्कैल्प की जरूरत के अनुसार चुनें और बालों को बहुत जोर से रगड़ने से बचें। गीले बाल अपेक्षाकृत कमजोर होते हैं इसलिए उन्हें जोर से कंघी करने के बजाय पहले हल्का सूखने दें और फिर धीरे से सुलझाएं।

    हेयर स्टाइलिंग के दौरान अत्यधिक गर्मी का इस्तेमाल भी कम करना चाहिए। लगातार हेयर स्ट्रेटनर कर्लर और तेज गर्म हवा वाले ड्रायर का इस्तेमाल बालों को नुकसान पहुंचा सकता है। बहुत ज्यादा टाइट पोनीटेल या ऐसी हेयर स्टाइल जिसमें बालों की जड़ों पर लगातार खिंचाव पड़ता है उससे भी बचना चाहिए।

    अगर बाल लगातार बहुत ज्यादा झड़ रहे हैं सिर में खाली पैच दिखाई दे रहे हैं खुजली या पपड़ी की समस्या है या अचानक तेजी से हेयर फॉल शुरू हुआ है तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय समस्या की असली वजह पता करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। सही खानपान नियमित नींद तनाव को नियंत्रित करना और बालों की उचित देखभाल लंबे समय में बालों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती है।

  • खाना खाने के बाद भी पेट में होती है तेज गुड़गुड़ तो समझिए शरीर दे रहा है संकेत जानिए गैस से लेकर पाचन तक पूरी वजह

    खाना खाने के बाद भी पेट में होती है तेज गुड़गुड़ तो समझिए शरीर दे रहा है संकेत जानिए गैस से लेकर पाचन तक पूरी वजह


    नई दिल्ली ।
    पेट में गुड़गुड़ की आवाज आना एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है। खासकर जब पेट काफी देर से खाली हो तो यह आवाज ज्यादा स्पष्ट सुनाई देती है। कई बार यह आवाज इतनी तेज होती है कि आसपास बैठे लोग भी इसे सुन लेते हैं। ऐसी स्थिति में लोग अक्सर इसे सिर्फ भूख से जोड़कर देखते हैं लेकिन पेट की गुड़गुड़ाहट के पीछे केवल भूख ही जिम्मेदार नहीं होती। पाचन तंत्र की लगातार चलने वाली गतिविधियां भी इस आवाज की बड़ी वजह हो सकती हैं।

    हमारा पाचन तंत्र भोजन करने के बाद ही सक्रिय नहीं होता बल्कि पेट और आंतों में लगातार हलचल चलती रहती है। जब हम खाना खाते हैं तो पेट और आंतों की मांसपेशियां भोजन और तरल पदार्थ को आगे बढ़ाने का काम करती हैं। इस प्रक्रिया को पेरिस्टालसिस कहा जाता है। पेट खाली होने के दौरान भी इन मांसपेशियों में समय समय पर संकुचन होता रहता है। इसी दौरान गैस और तरल पदार्थ आंतों में आगे बढ़ते हैं और इनके कारण गुड़गुड़ जैसी आवाज सुनाई देती है।

    खाली पेट यह आवाज ज्यादा सुनाई देने का एक बड़ा कारण यह है कि उस समय पेट में भोजन कम या नहीं होता। भोजन मौजूद रहने पर आंतों की गतिविधियों से पैदा होने वाली आवाज कुछ हद तक दब जाती है लेकिन खाली पेट में वही आवाज अधिक स्पष्ट हो जाती है। भूख के दौरान शरीर में होने वाले कुछ हार्मोनल बदलाव भी पाचन तंत्र की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए लंबे समय तक कुछ न खाने पर पेट में हलचल और आवाज ज्यादा महसूस हो सकती है।

    पेट की गुड़गुड़ाहट में गैस की भी अहम भूमिका हो सकती है। खाना खाते समय ज्यादा हवा निगलने या बहुत तेजी से खाने पर पाचन तंत्र में हवा बढ़ सकती है। इसके अलावा कुछ खाद्य पदार्थ भी गैस बनने की समस्या को बढ़ा सकते हैं। जब गैस आंतों के अंदर आगे बढ़ती है तो उससे भी आवाज पैदा होती है। कब्ज अपच और खानपान में अचानक बदलाव के कारण भी आंतों की सामान्य गतिविधि प्रभावित हो सकती है और पेट में आवाज ज्यादा आने लगती है।

    हालांकि हर बार पेट में गुड़गुड़ होना किसी बीमारी का संकेत नहीं होता। अगर केवल आवाज आती है और इसके साथ किसी तरह की परेशानी नहीं है तो आमतौर पर घबराने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर पेट में लगातार तेज आवाज के साथ दर्द उल्टी दस्त पेट फूलना या मल त्याग में परेशानी जैसी समस्या भी हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है क्योंकि कुछ मामलों में ये लक्षण पाचन तंत्र से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं।

    पेट को स्वस्थ रखने के लिए खानपान की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है। भोजन को धीरे धीरे और अच्छी तरह चबाकर खाएं। बहुत लंबे समय तक भूखे रहने से बचें और दिनभर पर्याप्त पानी पीते रहें। संतुलित आहार लें और नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या में शामिल करें। अगर किसी व्यक्ति को पेट से जुड़ी समस्या बार बार हो रही है तो खुद से दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।

  • महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स छोड़िए मुल्तानी मिट्टी से घर पर करें चेहरे की देखभाल जानिए सही इस्तेमाल का आसान तरीका

    महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स छोड़िए मुल्तानी मिट्टी से घर पर करें चेहरे की देखभाल जानिए सही इस्तेमाल का आसान तरीका

    नई दिल्ली । चेहरे की थकान पिंपल्स और अतिरिक्त तेल से हैं परेशान तो काम आएगी मुल्तानी मिट्टी इन तरीकों से करें इस्तेमाआज के समय में चेहरे की चमक और त्वचा की सेहत बनाए रखने के लिए लोग कई तरह के महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन घर में मौजूद कुछ प्राकृतिक चीजें भी त्वचा की देखभाल में मददगार हो सकती हैं। इन्हीं में से एक है मुल्तानी मिट्टी। इसे लंबे समय से त्वचा की सफाई और अतिरिक्त तेल को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। खासतौर पर ऑयली स्किन वाले लोगों के लिए मुल्तानी मिट्टी एक आसान घरेलू विकल्प मानी जाती है। हालांकि इसका इस्तेमाल त्वचा के प्रकार को ध्यान में रखकर करना जरूरी है।

    मुल्तानी मिट्टी त्वचा से अतिरिक्त तेल और गंदगी हटाने में मदद कर सकती है। चेहरे पर दिनभर धूल प्रदूषण और पसीने की वजह से जमा होने वाली गंदगी त्वचा को बेजान दिखा सकती है। ऐसे में मुल्तानी मिट्टी का फेस पैक चेहरे की सतह को साफ करने में मदद कर सकता है। इसे लगाने के बाद त्वचा कुछ समय के लिए ज्यादा साफ और फ्रेश महसूस हो सकती है।

    मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल करने के लिए सबसे आसान तरीका है इसे गुलाब जल के साथ मिलाकर फेस पैक तैयार करना। एक कटोरी में मुल्तानी मिट्टी लेकर उसमें जरूरत के अनुसार गुलाब जल डालें और अच्छी तरह मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को चेहरे पर पतली परत में लगाएं और पूरी तरह सूखने से पहले सामान्य पानी से धो लें। इसके बाद त्वचा पर हल्का मॉइस्चराइजर लगाना बेहतर रहता है।

    अगर आपकी त्वचा बहुत ज्यादा ऑयली है तो मुल्तानी मिट्टी में थोड़ा एलोवेरा जेल मिलाया जा सकता है। इससे फेस पैक त्वचा पर लगाने में आसान हो जाता है। वहीं रूखी या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए क्योंकि यह त्वचा से तेल सोखती है और बार बार इस्तेमाल करने पर ड्राईनेस या खिंचाव बढ़ सकता है। ऐसे लोगों के लिए इसे दूध या किसी सौम्य मॉइस्चराइजिंग सामग्री के साथ मिलाने का विकल्प रखा जा सकता है लेकिन किसी भी नए मिश्रण को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है।

    मुल्तानी मिट्टी चेहरे की गंदगी और अतिरिक्त तेल को हटाने में मदद कर सकती है लेकिन इसे हर दिन इस्तेमाल करना जरूरी नहीं है। जरूरत से ज्यादा फेस पैक लगाने से त्वचा की प्राकृतिक नमी प्रभावित हो सकती है। सामान्य तौर पर सप्ताह में एक बार से शुरुआत करना बेहतर माना जा सकता है और त्वचा की प्रतिक्रिया के अनुसार इस्तेमाल की आवृत्ति तय की जा सकती है।

    यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि मुल्तानी मिट्टी किसी त्वचा रोग का इलाज नहीं है। अगर चेहरे पर लगातार मुंहासे लालिमा जलन खुजली या किसी तरह की एलर्जी की समस्या है तो घरेलू उपायों के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। किसी भी प्राकृतिक सामग्री को सुरक्षित समझकर बिना जांच के इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सही तरीके और अपनी त्वचा के प्रकार को ध्यान में रखकर मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल किया जाए तो यह सामान्य स्किन केयर रूटीन का एक सरल हिस्सा बन सकती है।