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  • चेहरे की ड्राईनेस और बेजान त्वचा से परेशान हैं तो दही आएगा काम स्किन केयर में ऐसे करें इस्तेमाल

    चेहरे की ड्राईनेस और बेजान त्वचा से परेशान हैं तो दही आएगा काम स्किन केयर में ऐसे करें इस्तेमाल


    नई दिल्ली । खूबसूरत और निखरी त्वचा के लिए जरूरी नहीं कि हर बार महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स का ही सहारा लिया जाए। घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों का सही तरीके से इस्तेमाल भी त्वचा की देखभाल में मदद कर सकता है। इन्हीं चीजों में दही का नाम भी शामिल है। दही में लैक्टिक एसिड पाया जाता है जो त्वचा की ऊपरी सतह पर मौजूद मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद कर सकता है। इसके अलावा दही त्वचा को मुलायम बनाए रखने और रूखेपन को कम करने में भी सहायक हो सकता है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए चेहरे पर दही लगाने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है।

    अगर आपकी त्वचा सामान्य या रूखी है तो सादे और ताजे दही का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले चेहरे को हल्के फेस वॉश से साफ करें और फिर एक पतली परत में दही चेहरे पर लगाएं। इसे करीब दस से पंद्रह मिनट तक लगा रहने दें और इसके बाद सामान्य या हल्के गुनगुने पानी से चेहरा धो लें। चेहरे को धोने के बाद त्वचा पर हल्का मॉइस्चराइजर जरूर लगाएं। इस तरह दही को स्किन केयर रूटीन में शामिल करने से त्वचा को मुलायम महसूस कराने में मदद मिल सकती है।
    अगर आपकी त्वचा सामान्य या रूखी है तो सादे और ताजे दही का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले चेहरे को हल्के फेस वॉश से साफ करें और फिर एक पतली परत में दही चेहरे पर लगाएं। इसे करीब दस से पंद्रह मिनट तक लगा रहने दें और इसके बाद सामान्य या हल्के गुनगुने पानी से चेहरा धो लें। चेहरे को धोने के बाद त्वचा पर हल्का मॉइस्चराइजर जरूर लगाएं। इस तरह दही को स्किन केयर रूटीन में शामिल करने से त्वचा को मुलायम महसूस कराने में मदद मिल सकती है।

    दही को कई लोग बेसन के साथ मिलाकर भी चेहरे पर लगाते हैं। इसके लिए एक चम्मच सादा दही और थोड़ी मात्रा में बेसन लेकर पेस्ट बनाया जा सकता है। इसे चेहरे पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें और सूखने के बाद बिना ज्यादा रगड़े पानी से धो लें। अगर त्वचा संवेदनशील है तो स्क्रब की तरह जोर से रगड़ने से बचना चाहिए। ज्यादा रगड़ने से त्वचा में जलन या लालिमा हो सकती है।

    ऑयली स्किन वाले लोगों को दही का इस्तेमाल करते समय भी सावधानी रखनी चाहिए। चेहरे पर बहुत ज्यादा मात्रा में दही लगाने या लंबे समय तक लगाए रखने से बचें। वहीं मुंहासों वाली त्वचा पर किसी भी घरेलू नुस्खे को आजमाने से पहले पैच टेस्ट करना बेहतर होता है। अगर दही लगाने के बाद जलन खुजली लालिमा या सूजन जैसी समस्या दिखाई दे तो तुरंत चेहरा धो लें और इसका इस्तेमाल बंद कर दें।

    दही को नींबू जैसी चीजों के साथ मिलाकर लगाने से भी बचना चाहिए। नींबू का रस कुछ लोगों की त्वचा में जलन और संवेदनशीलता बढ़ा सकता है। खासकर अगर त्वचा पहले से संवेदनशील है तो ऐसे प्रयोग नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी तरह चेहरे पर कोई भी घरेलू मिश्रण रोजाना लगाने की जरूरत नहीं होती। त्वचा की जरूरत के अनुसार सीमित इस्तेमाल करना बेहतर है।

    स्किन केयर में दही को किसी जादुई उपचार की तरह नहीं देखना चाहिए। संतुलित खानपान पर्याप्त पानी अच्छी नींद चेहरे की नियमित सफाई और धूप से बचाव भी त्वचा को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर त्वचा पर लगातार मुंहासे दाने खुजली अत्यधिक रूखापन या अन्य समस्या बनी रहती है तो घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। इस तरह सही सावधानी के साथ दही को अपनी स्किन केयर दिनचर्या का एक आसान हिस्सा बनाया जा सकता है।

  • क्या माचा टी सच में घटाती है वजन? जानिए फैट बर्न और मेटाबॉलिज्म पर इसका असली असर

    क्या माचा टी सच में घटाती है वजन? जानिए फैट बर्न और मेटाबॉलिज्म पर इसका असली असर

    नई दिल्ली । माचा टी पिछले कुछ वर्षों में हेल्थ और फिटनेस से जुड़ी चर्चाओं में तेजी से लोकप्रिय हुई है। खासतौर पर वजन घटाने की कोशिश कर रहे लोगों के बीच इसे ऐसी ड्रिंक के तौर पर देखा जाता है, जो मेटाबॉलिज्म बढ़ाकर फैट बर्न करने में मदद कर सकती है। सोशल मीडिया पर इसके कई तरह के दावे भी सामने आते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार माचा को वजन घटाने का चमत्कारी उपाय मानना सही नहीं है।

    माचा और सामान्य ग्रीन टी एक ही पौधे कैमेलिया साइनेंसिस से तैयार होती हैं, लेकिन दोनों के इस्तेमाल का तरीका अलग है। ग्रीन टी में पत्तियों को गर्म पानी में भिगोकर उनका अर्क लिया जाता है और बाद में पत्तियां अलग कर दी जाती हैं। वहीं माचा में विशेष तरीके से तैयार की गई चाय की पत्तियों को बारीक पाउडर में बदलकर पानी में मिलाया जाता है। इस वजह से माचा पीने वाले व्यक्ति पूरी पत्ती का सेवन करते हैं।

    पूरी पत्ती के सेवन के कारण माचा में कैटेचिन, खासकर ईजीसीजी, कैफीन और अन्य एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड मिल सकते हैं। इन तत्वों को शरीर में ऊर्जा खर्च और फैट ऑक्सीडेशन से जोड़कर देखा गया है। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में कैटेचिन और कैफीन के संयोजन से ऊर्जा खर्च में मामूली बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं। हालांकि इसका प्रभाव इतना बड़ा नहीं माना जाता कि केवल माचा पीने से तेजी से वजन कम हो जाए।

    माचा में मौजूद कैफीन और ईजीसीजी शारीरिक गतिविधि के दौरान शरीर द्वारा ऊर्जा के इस्तेमाल और फैट के ऑक्सीडेशन को कुछ हद तक प्रभावित कर सकते हैं। कैफीन सतर्कता बढ़ाने में भी मदद कर सकता है, जिससे कुछ लोगों को व्यायाम के दौरान सक्रिय रहने में सहायता मिल सकती है। इसके अलावा माचा में एल-थियानाइन नामक अमीनो एसिड भी होता है, जो कैफीन के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करने से जुड़ा माना जाता है।

    हालांकि वजन और मेटाबॉलिज्म पर सिर्फ एक पेय का प्रभाव सीमित होता है। शरीर की कैलोरी जरूरत और ऊर्जा खर्च उम्र, आनुवंशिकता, मांसपेशियों की मात्रा, हार्मोन, खान-पान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई कारकों पर निर्भर करते हैं। इसलिए माचा को संतुलित डाइट और नियमित व्यायाम का विकल्प नहीं माना जा सकता।

    वजन कम करने के लिए लंबे समय तक कैलोरी की जरूरत से कम ऊर्जा लेना, पर्याप्त प्रोटीन और पौष्टिक भोजन करना, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और लगातार स्वस्थ आदतें बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति मीठे या अधिक कैलोरी वाले पेय की जगह बिना चीनी वाली माचा टी लेता है, तो इससे कुल कैलोरी सेवन कम करने में मदद मिल सकती है।

    माचा की मात्रा को लेकर भी सावधानी जरूरी है। सामान्य स्वस्थ वयस्कों के लिए रोजाना एक से दो सर्विंग सीमित मात्रा में लेना आमतौर पर व्यावहारिक माना जाता है, लेकिन इसमें मौजूद कैफीन को ध्यान में रखना चाहिए। अधिक सेवन से कुछ लोगों में बेचैनी, नींद में परेशानी, सिरदर्द, दिल की धड़कन तेज होने या पाचन संबंधी दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

    गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं, हाई ब्लड प्रेशर या हृदय संबंधी समस्या वाले लोगों और नियमित रूप से कुछ दवाएं लेने वालों को माचा को रोजाना की डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है। कुल मिलाकर, माचा एक पौष्टिक पेय का हिस्सा हो सकती है, लेकिन स्वस्थ वजन हासिल करने और बनाए रखने की सफलता किसी एक ड्रिंक पर नहीं, बल्कि संतुलित खान-पान और नियमित जीवनशैली पर निर्भर करती है।

  • बारिश शुरू होते ही बदल जाती है बिहार की खूबसूरती करकटगढ़ से राजगीर तक ये जगहें जरूर करें एक्सप्लोर

    बारिश शुरू होते ही बदल जाती है बिहार की खूबसूरती करकटगढ़ से राजगीर तक ये जगहें जरूर करें एक्सप्लोर


    नई दिल्ली। बारिश का मौसम आते ही प्रकृति का रंग पूरी तरह बदल जाता है। सूखे और सामान्य दिखाई देने वाले पहाड़ हरियाली की चादर ओढ़ लेते हैं और छोटे बड़े झरने पानी से लबालब होकर अपनी खूबसूरती बिखेरने लगते हैं। ऐसे मौसम में अगर आप भी परिवार दोस्तों या अपने पार्टनर के साथ किसी ऐसी जगह जाने का प्लान बना रहे हैं जहां प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताए जा सकें तो बिहार आपके लिए शानदार विकल्प हो सकता है। बिहार को अक्सर ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है लेकिन मानसून के दौरान यहां के प्राकृतिक नजारे भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। राज्य में कई ऐसी जगहें हैं जहां बारिश के मौसम में हरियाली पहाड़ झरने और बादलों से घिरे दृश्य किसी खूबसूरत तस्वीर की तरह नजर आते हैं।

    रोहतास जिले में स्थित करमचट डैम मानसून के दौरान घूमने के लिए बेहद आकर्षक जगह बन जाता है। चेनारी के पास मौजूद यह डैम सासाराम से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बारिश के बाद आसपास की हरियाली और पानी से भरा डैम पूरे इलाके की खूबसूरती बढ़ा देता है। यहां सुबह सूर्योदय और शाम के समय सूर्यास्त का नजारा देखने लायक होता है। शांत वातावरण के कारण यह जगह परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने के लिए भी अच्छी मानी जाती है।

    अगर आपको झरने और पहाड़ों के बीच घूमना पसंद है तो कैमूर का करकटगढ़ वॉटरफॉल आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर होना चाहिए। कैमूर वाइल्डलाइफ सेंचुरी के क्षेत्र में मौजूद यह झरना मानसून में अपने पूरे वेग के साथ बहता दिखाई देता है। करीब 100 फीट ऊंचा और लगभग 300 फीट चौड़ा यह जलप्रपात आसपास की हरियाली और जंगल के बीच बेहद आकर्षक नजर आता है। बारिश के दिनों में झरने की आवाज और पहाड़ी वातावरण यहां आने वाले लोगों को प्रकृति के करीब होने का अहसास कराता है।

    कैमूर की पहाड़ियां भी प्रकृति प्रेमियों के लिए शानदार जगह हैं। यहां घने जंगल गहरी घाटियां प्राकृतिक गुफाएं और कई छोटे बड़े झरने मौजूद हैं। मानसून के दौरान पहाड़ियों पर हरियाली बढ़ जाती है और मौसम भी सुहावना हो जाता है। प्रकृति के साथ इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यहां मौजूद प्राचीन शैलचित्र और ऐतिहासिक अवशेष भी आकर्षण का केंद्र हैं।

    राजगीर का विश्व शांति स्तूप भी मानसून में बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। रत्नागिरी पहाड़ी पर ऊंचाई पर स्थित यह सफेद स्तूप बादलों और हरियाली से घिरा नजर आता है। यहां पहुंचने के लिए रोपवे की सुविधा उपलब्ध है। रोपवे से सफर करते समय आसपास की पहाड़ियों और प्राकृतिक वातावरण का शानदार दृश्य देखने को मिलता है। शांत वातावरण के कारण यह स्थान पर्यटन के साथ आध्यात्मिक अनुभव भी देता है।

    गया जिले के पास स्थित गुरपा हिल भी बारिश के मौसम में घूमने के लिए खास जगह हो सकती है। बिहार और झारखंड की सीमा के आसपास मौजूद यह क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता के साथ धार्मिक महत्व भी रखता है। मानसून में यहां के जंगल पहाड़ और झरने और अधिक खूबसूरत हो जाते हैं। पहाड़ी की ऊंचाई से आसपास का दृश्य बेहद मनमोहक दिखाई देता है और यहां मौजूद धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं को भी आकर्षित करते हैं।

    मानसून में बिहार घूमने का अनुभव इन जगहों की वजह से और खास हो सकता है। हालांकि बारिश के दौरान पहाड़ी और झरने वाले क्षेत्रों में फिसलन और अचानक बढ़ते पानी का खतरा हो सकता है। इसलिए यात्रा से पहले मौसम और स्थानीय प्रशासन की स्थिति की जानकारी लेना जरूरी है। सुरक्षित तरीके से घूमते हुए इन प्राकृतिक जगहों की खूबसूरती का आनंद लिया जाए तो बिहार का मानसून ट्रिप लंबे समय तक याद रह सकता है।

  • कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्लड क्लॉट का खतरा, पानी की कमी से लेकर मोटापा-धूम्रपान तक हो सकते हैं कारण; ऐसे रखें खून को स्वस्थ

    कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्लड क्लॉट का खतरा, पानी की कमी से लेकर मोटापा-धूम्रपान तक हो सकते हैं कारण; ऐसे रखें खून को स्वस्थ


    नई दिल्ली । खून हमारे शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचाने का काम करता है लेकिन जब रक्त का प्रवाह सामान्य से प्रभावित होने लगे या खून में थक्का बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाए तो यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। आम बोलचाल में इसे खून गाढ़ा होना कहा जाता है। मेडिकल तौर पर कुछ स्थितियों में इसे हाइपरकोएगुलेबिलिटी या हाइपरविस्कॉसिटी से जोड़ा जाता है। हालांकि हर बार खून गाढ़ा होने का मतलब एक ही बीमारी नहीं होता और इसके पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर में पानी की कमी खून के तरल हिस्से को कम कर सकती है। इससे रक्त अधिक कंसंट्रेटेड दिखाई दे सकता है। इसके अलावा कुछ लोगों में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ने पर भी रक्त अधिक गाढ़ा हो सकता है। एरिथ्रोसाइटोसिस जैसी स्थितियां इसके उदाहरण हैं। लंबे समय तक एक जगह बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा और धूम्रपान भी ब्लड क्लॉट बनने के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

    कुछ परिस्थितियों में शरीर में खून के थक्के बनने की संभावना सामान्य से अधिक हो सकती है। सर्जरी के बाद लंबे समय तक आराम करना, गंभीर चोट, लंबी यात्रा या लगातार कई घंटे बैठे रहना ऐसे कारण हैं जिनमें विशेष सावधानी की जरूरत होती है। गर्भावस्था और प्रसव के आसपास का समय तथा कुछ हार्मोनल दवाएं भी कुछ लोगों में क्लॉटिंग के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा कुछ आनुवंशिक स्थितियों के कारण भी किसी व्यक्ति में ब्लड क्लॉट बनने की संभावना अधिक हो सकती है।

    खून में थक्का बनने की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह शरीर की नस या धमनी में रक्त के सामान्य प्रवाह को रोक सकता है। अगर पैर की किसी गहरी नस में थक्का बनता है तो इसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी कहा जाता है। इसमें आमतौर पर पैर में सूजन, दर्द या असहजता जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। स्थिति तब गंभीर हो सकती है जब यह थक्का टूटकर रक्त के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाए। ऐसा होने पर पल्मोनरी एम्बोलिज्म जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है।

    इसी तरह यदि कोई थक्का मस्तिष्क तक जाने वाली रक्त वाहिका में रक्त प्रवाह को बाधित करता है तो स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। इसलिए शरीर में अचानक दिखाई देने वाले कुछ लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पैर में अचानक सूजन या दर्द, सांस लेने में अचानक परेशानी, सीने में दर्द या स्ट्रोक जैसे लक्षण दिखने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।

    ब्लड क्लॉट का खतरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं माना जाता। लंबे समय तक बैठे रहने वाले लोगों, बहुत कम शारीरिक गतिविधि करने वालों, मोटापे से जूझ रहे लोगों और धूम्रपान करने वालों में इसका जोखिम बढ़ सकता है। लंबी यात्रा करने वाले लोगों को भी लगातार कई घंटे एक ही स्थिति में बैठे रहने से बचना चाहिए। जिन लोगों में पहले ब्लड क्लॉट की समस्या हो चुकी है या परिवार में ऐसी समस्या का इतिहास रहा है उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

    बचाव के लिए सबसे जरूरी बात लंबे समय तक लगातार निष्क्रिय रहने से बचना है। यदि आपका काम कई घंटे बैठकर करने वाला है तो बीच-बीच में उठकर कुछ देर चलना और पैरों को सक्रिय रखना फायदेमंद हो सकता है। लंबी यात्रा के दौरान भी समय-समय पर चलने-फिरने की कोशिश करनी चाहिए। नियमित शारीरिक गतिविधि स्वस्थ वजन बनाए रखने और शरीर में रक्त संचार को बेहतर रखने में मदद कर सकती है।

    इसके साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, धूम्रपान से दूरी बनाना और वजन को नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण है। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति का खून गाढ़ा है या नहीं। ऐसी स्थिति का कारण जानने के लिए डॉक्टर जांच की सलाह दे सकते हैं। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के ब्लड थिनर या कोई अन्य दवा लेना उचित नहीं है। अगर आपको ब्लड क्लॉट के लक्षण दिखाई दें या किसी कारण से इसका जोखिम अधिक हो तो समय पर डॉक्टर से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

  • मोटापा घटाने में GLP-1 दवाओं ने बढ़ाई उम्मीद लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सर्जरी अब भी क्यों जरूरी

    मोटापा घटाने में GLP-1 दवाओं ने बढ़ाई उम्मीद लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सर्जरी अब भी क्यों जरूरी


    नई दिल्ली। मोटापा आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है और इसके कारण डायबिटीज दिल की बीमारी फैटी लिवर नींद के दौरान सांस रुकने जैसी कई गंभीर परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में वजन कम करने के लिए पिछले कुछ समय में GLP-1 दवाओं की चर्चा तेजी से बढ़ी है। इन दवाओं ने मोटापे के इलाज में एक नया विकल्प जरूर दिया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वजन घटाने वाली सर्जरी की जरूरत पूरी तरह खत्म हो गई है। डॉक्टरों के मुताबिक हर व्यक्ति के लिए मोटापे का इलाज अलग हो सकता है और इसका फैसला उसकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर किया जाना चाहिए।

    GLP-1 दवाएं शरीर में भूख और खाने की इच्छा को नियंत्रित करने वाले तंत्र पर असर डालती हैं। इनसे कुछ लोगों को कम खाने और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करने में मदद मिल सकती है। इसके कारण वजन कम करने में सहायता मिलती है। यही वजह है कि जो लोग वजन घटाने की सर्जरी से बचना चाहते हैं उनके लिए GLP-1 दवाएं एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आई हैं। हालांकि इन दवाओं को किसी आसान या जादुई तरीके के रूप में देखना सही नहीं है।

    मोटापे के इलाज में केवल वजन कम करना ही लक्ष्य नहीं होता बल्कि व्यक्ति की पूरी सेहत में सुधार करना भी जरूरी होता है। अगर किसी व्यक्ति को गंभीर मोटापे के साथ टाइप 2 डायबिटीज दिल से जुड़ी समस्या फैटी लिवर या स्लीप एपनिया जैसी बीमारी है तो डॉक्टर इलाज के दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। कुछ गंभीर मामलों में वजन घटाने की सर्जरी अब भी प्रभावी उपचार विकल्प हो सकती है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि GLP-1 दवाओं के आने के बाद सर्जरी की जरूरत खत्म हो गई है।

    GLP-1 दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता के बीच विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दवा शुरू करने से पहले व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री वजन बढ़ने के कारण दूसरी बीमारियों और इस्तेमाल की जा रही दवाओं की जानकारी लेना जरूरी होता है। दवा की मात्रा और उपचार की अवधि भी डॉक्टर ही तय करते हैं। कुछ लोगों में दवा से पाचन संबंधी परेशानी सहित अन्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं इसलिए नियमित चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है।

    वजन कम करने के दौरान खानपान की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रहती है। GLP-1 दवाओं से भूख कम हो सकती है लेकिन शरीर को पर्याप्त प्रोटीन फाइबर विटामिन खनिज और पानी मिलना जरूरी है। केवल कम खाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि पौष्टिक भोजन लेना भी जरूरी है। इसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि अच्छी नींद और तनाव को नियंत्रित करना वजन को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा बंद करने के बाद कुछ लोगों में वजन दोबारा बढ़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक बेहतर परिणाम बनाए रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। जरूरत के अनुसार डॉक्टर के साथ डाइट एक्सपर्ट और व्यायाम विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।


    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा बंद करने के बाद कुछ लोगों में वजन दोबारा बढ़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक बेहतर परिणाम बनाए रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। जरूरत के अनुसार डॉक्टर के साथ डाइट एक्सपर्ट और व्यायाम विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।

    कुल मिलाकर GLP-1 दवाओं ने मोटापे के इलाज के क्षेत्र में नई संभावनाएं जरूर खोली हैं लेकिन हर मरीज के लिए यही सबसे अच्छा विकल्प हो ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ लोगों को दवाओं से अच्छा लाभ मिल सकता है जबकि गंभीर मोटापे और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं वाले मरीजों में सर्जरी की भूमिका बनी रह सकती है। इसलिए वजन घटाने के लिए किसी भी दवा या सर्जरी का फैसला खुद से लेने के बजाय योग्य डॉक्टर से पूरी जांच और सलाह के बाद ही करना चाहिए। सही इलाज के साथ संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनाना ही लंबे समय तक स्वस्थ वजन बनाए रखने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • चेहरे की चमक खो गई है तो बदलें अपनी डेली रूटीन, त्वचा की देखभाल के ये तरीके आएंगे काम

    चेहरे की चमक खो गई है तो बदलें अपनी डेली रूटीन, त्वचा की देखभाल के ये तरीके आएंगे काम


    नई दिल्ली। खूबसूरत और स्वस्थ त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन बदलता मौसम धूल मिट्टी प्रदूषण तनाव और अनियमित दिनचर्या त्वचा की प्राकृतिक चमक को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार लोग चेहरे पर चमक लाने के लिए तरह तरह के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन त्वचा की सही देखभाल के लिए महंगे उत्पादों से ज्यादा जरूरी एक अच्छी और नियमित स्किन केयर रूटीन है। अगर त्वचा को पर्याप्त नमी मिले और उसे धूप प्रदूषण तथा गंदगी से बचाया जाए तो लंबे समय तक त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    स्किन केयर की शुरुआत चेहरे की सफाई से करनी चाहिए। दिनभर त्वचा पर धूल मिट्टी पसीना और प्रदूषण जमा हो सकता है। इसलिए सुबह और रात चेहरे को अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार उपयुक्त क्लींजर से साफ करना जरूरी है। बहुत ज्यादा बार चेहरा धोने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा की प्राकृतिक नमी कम हो सकती है और रूखापन बढ़ सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को खासतौर पर तेज खुशबू या कठोर सामग्री वाले उत्पादों के इस्तेमाल से सावधानी बरतनी चाहिए।

    त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल भी बेहद जरूरी माना जाता है। तैलीय त्वचा वाले लोगों को हल्के और नॉन कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइजर का चुनाव करना चाहिए जबकि रूखी त्वचा के लिए थोड़ा अधिक हाइड्रेटिंग मॉइस्चराइजर उपयोगी हो सकता है। नियमित मॉइस्चराइजिंग त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद करती है और त्वचा को मुलायम महसूस करा सकती है।

    धूप से त्वचा की सुरक्षा भी स्किन केयर का अहम हिस्सा है। सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से त्वचा पर टैनिंग और समय से पहले उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई दे सकते हैं। इसलिए बाहर निकलने से पहले ब्रॉड स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। लंबे समय तक धूप में रहने की स्थिति में सनस्क्रीन को दोबारा लगाने की जरूरत पड़ सकती है। इसके साथ छाता या टोपी जैसी चीजों की मदद से भी धूप से बचाव किया जा सकता है।

    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहर से इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों पर निर्भर नहीं करती। पर्याप्त पानी पीना पौष्टिक भोजन लेना और पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के लिए महत्वपूर्ण है। डाइट में मौसमी फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें बीज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों को शामिल किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना भी बेहतर विकल्प हो सकता है।


    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहर से इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों पर निर्भर नहीं करती। पर्याप्त पानी पीना पौष्टिक भोजन लेना और पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के लिए महत्वपूर्ण है। डाइट में मौसमी फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें बीज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों को शामिल किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना भी बेहतर विकल्प हो सकता है।

    तनाव और नींद की कमी का असर भी चेहरे पर दिखाई दे सकता है। इसलिए रोजाना पर्याप्त नींद लेने और तनाव को कम करने की कोशिश करनी चाहिए। नियमित व्यायाम भी शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है। हालांकि किसी भी घरेलू नुस्खे या नए स्किन केयर प्रोडक्ट को चेहरे पर इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना समझदारी है।

    अगर त्वचा पर लगातार मुंहासे खुजली लालिमा दाने अत्यधिक रूखापन या किसी अन्य तरह की समस्या बनी रहती है तो खुद से उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। सही त्वचा प्रकार की पहचान और जरूरत के अनुसार उत्पादों का इस्तेमाल ही बेहतर स्किन केयर की कुंजी है। नियमित सफाई मॉइस्चराइजिंग धूप से बचाव पौष्टिक आहार और अच्छी नींद को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से निखरा हुआ रखने में मदद मिल सकती है।
  • VIP मोबाइल नंबर चाहिए? Jio और Vi पर ऐसे चुनें लकी नंबर, जानें कीमत और बुकिंग का तरीका

    VIP मोबाइल नंबर चाहिए? Jio और Vi पर ऐसे चुनें लकी नंबर, जानें कीमत और बुकिंग का तरीका


    नई दिल्ली । 
    अगर आप अपने मोबाइल नंबर में कोई खास पैटर्न, लकी डिजिट या याद रखने में आसान नंबर चाहते हैं, तो टेलीकॉम कंपनियों के जरिए ऐसा नंबर चुनने का विकल्प उपलब्ध है। Jio और Vi अपने यूजर्स को पसंदीदा या फैंसी मोबाइल नंबर चुनने की सुविधा देते हैं। इसमें 9999, 786 या जन्मतिथि से जुड़े अंकों जैसे खास पैटर्न वाले नंबर तलाशे जा सकते हैं।

    इस सुविधा की मदद से यूजर्स घर बैठे अपनी पसंद का नंबर खोज सकते हैं। इसके लिए Jio ग्राहकों को MyJio ऐप और Vi ग्राहकों को Vi ऐप का इस्तेमाल करना होता है। हालांकि, पसंदीदा नंबर की उपलब्धता और उसकी कीमत उसके पैटर्न तथा संबंधित कैटेगरी पर निर्भर करती है।

    Jio यूजर्स MyJio ऐप खोलकर होम स्क्रीन पर नीचे की ओर स्क्रॉल करने के बाद Quick Links सेक्शन में जा सकते हैं। यहां Matching Number का विकल्प दिखाई देता है। इस पर क्लिक करने के बाद यूजर अपने मौजूदा नंबर से मिलता-जुलता नंबर भी तलाश सकता है।

    अगर किसी ग्राहक को कोई खास VIP या फैंसी नंबर चाहिए, तो Looking for VIP number? विकल्प का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद ग्राहक अपनी पसंद के चार से आठ अंकों का पैटर्न दर्ज करके नंबर की तलाश कर सकता है। उपलब्ध विकल्पों में से पसंदीदा नंबर चुनकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

    Jio पर केवल मिलते-जुलते नंबर ही नहीं, बल्कि विशेष पैटर्न वाले नंबर भी खोजे जा सकते हैं। इससे उन ग्राहकों को सुविधा मिलती है जो अपने मौजूदा नंबर जैसा कोई नंबर रखना चाहते हैं या किसी खास संख्या को नए मोबाइल नंबर में शामिल करना चाहते हैं।

    Vi ग्राहकों के लिए भी प्रक्रिया काफी सरल है। इसके लिए Vi ऐप में जाकर VIP Number विकल्प चुनना होता है। इसके बाद जिस नंबर या अंक पैटर्न को ग्राहक अपने मोबाइल नंबर में चाहता है, उसे संबंधित बॉक्स में दर्ज करना होता है।

    सर्च करने के बाद स्क्रीन पर उपलब्ध VIP नंबरों की सूची दिखाई देती है। इनमें कुछ नंबर मुफ्त हो सकते हैं, जबकि कुछ Premium VIP नंबरों के लिए अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। ग्राहक अपनी पसंद का नंबर चुनने के बाद पिनकोड और डिलीवरी एड्रेस जैसी जरूरी जानकारी दर्ज करके ऑर्डर की प्रक्रिया पूरी कर सकता है।

    VIP नंबर की कीमत एक जैसी नहीं होती। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मौजूदा नंबर से मिलता-जुलता नंबर चुनने की शुरुआती कीमत करीब 50 रुपये हो सकती है। वहीं Jio की कुछ विशेष गोल्ड कैटेगरी के VIP नंबरों के लिए ऑफलाइन स्टोर से वाउचर लेना पड़ सकता है और इसकी कीमत 12,000 रुपये तक पहुंच सकती है।

    Vi पर भी फैंसी नंबरों की अलग-अलग कैटेगरी उपलब्ध हैं। कुछ नंबर मुफ्त मिल सकते हैं, जबकि प्रीमियम कैटेगरी के नंबरों की कीमत करीब 590 रुपये से 2,000 रुपये तक हो सकती है। अंतिम कीमत चुने गए नंबर और उसकी कैटेगरी पर निर्भर करेगी।

    नंबर चुनने और भुगतान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ग्राहक अपने ऑपरेटर के निर्देश के अनुसार सिम प्राप्त कर सकता है। ऐसे में अगर आप अपना लकी नंबर, जन्मतिथि से जुड़ा पैटर्न या आसानी से याद रहने वाला नंबर चाहते हैं, तो पहले उपलब्ध नंबरों की सूची और उसकी कीमत जरूर जांचना बेहतर रहेगा।

  • माइग्रेन का दर्द बढ़ा सकती हैं रोजमर्रा की ये पांच गलतियां, समय रहते आदतों में बदलाव से मिल सकती है राहत

    माइग्रेन का दर्द बढ़ा सकती हैं रोजमर्रा की ये पांच गलतियां, समय रहते आदतों में बदलाव से मिल सकती है राहत


    नई दिल्ली ।
    भागदौड़ भरी जीवनशैली में सिरदर्द की समस्या आम हो गई है, लेकिन बार बार होने वाला तेज सिरदर्द हमेशा सामान्य नहीं माना जा सकता। कुछ लोगों में सिरदर्द के साथ रोशनी और तेज आवाज से परेशानी, जी मिचलाना, कमजोरी या असहजता जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति को माइग्रेन से जोड़ा जाता है। यह केवल सिर में दर्द की समस्या नहीं है, बल्कि तंत्रिका तंत्र से जुड़ी एक जटिल स्थिति है।

    माइग्रेन से परेशान लोगों में दर्द की तीव्रता और इसके कारण अलग अलग हो सकते हैं। हालांकि, रोजमर्रा की कुछ आदतें कई लोगों में इसके लक्षणों को बढ़ाने का काम कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखने और व्यक्तिगत ट्रिगर को पहचानने से माइग्रेन की परेशानी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    शरीर में पानी की कमी माइग्रेन के दौरान परेशानी बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हो सकती है। पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं मिलने पर थकान, चक्कर और सिर में भारीपन जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। इसलिए पूरे दिन नियमित अंतराल पर पानी पीना जरूरी है। पानी के अलावा नारियल पानी, सूप और पानी से भरपूर फल भी शरीर में तरल पदार्थ की जरूरत पूरी करने में मदद कर सकते हैं।

    नींद की अनदेखी करना भी माइग्रेन से परेशान लोगों के लिए समस्या बढ़ा सकता है। कम सोना या रोज अलग अलग समय पर सोने की आदत शरीर की प्राकृतिक दिनचर्या को प्रभावित कर सकती है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखना बेहतर माना जाता है। वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सात से नौ घंटे की नींद पर्याप्त मानी जाती है, हालांकि जरूरत व्यक्ति के अनुसार अलग हो सकती है।

    चाय और कॉफी में मौजूद कैफीन का असर भी हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। सीमित मात्रा में कैफीन कुछ लोगों को अलग तरह से प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका अधिक सेवन कुछ लोगों में माइग्रेन को बढ़ा सकता है। इसी तरह शराब भी कई लोगों के लिए सिरदर्द का ट्रिगर बन सकती है। यदि किसी विशेष पेय के सेवन के बाद बार बार माइग्रेन शुरू होता है, तो उस व्यक्तिगत ट्रिगर से बचना उपयोगी हो सकता है।

    लंबे समय तक मोबाइल, कंप्यूटर या टीवी की स्क्रीन देखते रहना भी कुछ लोगों में सिरदर्द की परेशानी बढ़ा सकता है। खासकर माइग्रेन के दौरान तेज रोशनी और स्क्रीन की चमक असहजता बढ़ा सकती है। ऐसे में स्क्रीन की चमक कम रखना, बीच बीच में आंखों को आराम देना और जरूरत पड़ने पर शांत तथा कम रोशनी वाले वातावरण में रहना मददगार हो सकता है।

    खाने के समय में लगातार बदलाव और लंबे समय तक खाली पेट रहना भी कुछ लोगों में माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है। इसलिए भोजन को बहुत देर तक टालने के बजाय नियमित अंतराल पर संतुलित भोजन करना बेहतर है। आहार में फल, हरी सब्जियां, पर्याप्त प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्व शामिल किए जा सकते हैं।

    बहुत अधिक तला हुआ भोजन, अत्यधिक मसालेदार चीजें या कोई ऐसा खाद्य पदार्थ जिससे व्यक्ति को बार बार परेशानी होती है, उससे दूरी रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, सभी लोगों के लिए माइग्रेन के ट्रिगर समान नहीं होते। इसलिए किस भोजन या आदत के बाद समस्या बढ़ती है, इसका ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    माइग्रेन को नियंत्रित करने के लिए केवल किसी एक आदत में बदलाव पर्याप्त नहीं हो सकता। नियमित नींद, पर्याप्त पानी, समय पर भोजन, संतुलित जीवनशैली और व्यक्तिगत ट्रिगर की पहचान मिलकर बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकते हैं। यदि सिरदर्द बार बार हो रहा हो, बहुत तेज हो या उसके साथ असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

  • बारिश में आलू-प्याज के पराठे से हैं बोर, तो बनाएं क्रिस्पी चीज़ कॉर्न पराठा, स्वाद ऐसा कि बार-बार खाने का करेगा मन

    बारिश में आलू-प्याज के पराठे से हैं बोर, तो बनाएं क्रिस्पी चीज़ कॉर्न पराठा, स्वाद ऐसा कि बार-बार खाने का करेगा मन

    नई दिल्ली । बारिश के मौसम में गरमा-गरम और कुछ अलग खाने का मन अक्सर करता है। अगर रोजाना आलू, प्याज या गोभी के पराठे खाकर आप भी बोर हो चुके हैं, तो इस मॉनसून चीज़ कॉर्न पराठा जरूर ट्राई कर सकते हैं। स्वीट कॉर्न, चीज़ और मसालों से तैयार यह पराठा स्वाद में बेहद लाजवाब होता है। बाहर से कुरकुरा और अंदर से चीज़ी होने की वजह से यह बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आ सकता है। इसे सुबह के नाश्ते के अलावा शाम की चाय के साथ भी परोसा जा सकता है।

    चीज़ कॉर्न पराठा बनाने के लिए सबसे पहले इसकी फिलिंग तैयार करनी होगी। इसके लिए करीब एक कप उबले हुए स्वीट कॉर्न लें। इसमें एक कप कद्दूकस किया हुआ चीज़, बारीक कटा हरा धनिया, दो बारीक कटी या कुटी हुई लहसुन की कलियां और स्वाद के अनुसार हरी मिर्च डालें। इसके बाद इसमें चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर, थोड़ी काली मिर्च और ऑरेगैनो मिलाएं। नमक डालते समय थोड़ी सावधानी रखें, क्योंकि चीज़ में पहले से नमक मौजूद हो सकता है। सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर एक तरफ रख दें।

    अब पराठे के लिए आटा तैयार करें। गेहूं के आटे में थोड़ा नमक और एक चम्मच तेल डालकर मिलाएं। धीरे-धीरे पानी डालते हुए नरम आटा गूंथ लें। आटे को कुछ देर ढककर रखने से यह अच्छी तरह सेट हो जाएगा और पराठा बेलने में आसानी होगी। इसके बाद आटे की छोटी-छोटी लोइयां बना लें।

    एक लोई लेकर उसे थोड़ा बेलें और बीच में तैयार चीज़ कॉर्न की फिलिंग रखें। अब आटे के किनारों को चारों तरफ से उठाकर फिलिंग को अच्छी तरह बंद कर दें। भरी हुई लोई को हल्के हाथों से बेलकर पराठे का आकार दें। पराठा बेलते समय ज्यादा दबाव न डालें, वरना चीज़ और कॉर्न की फिलिंग बाहर निकल सकती है।

    अब तवे को अच्छी तरह गर्म करें और उस पर पराठा डाल दें। इसे मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सेंकें। जब पराठा हल्का सुनहरा होने लगे, तब ऊपर से थोड़ा घी या तेल लगाकर दोनों तरफ से कुरकुरा होने तक पकाएं। मध्यम आंच पर पकाने से पराठा अंदर तक अच्छी तरह सिकेगा और बाहर से भी क्रिस्पी बनेगा।

    गरमा-गरम चीज़ कॉर्न पराठे को हरी चटनी, दही या टोमैटो सॉस के साथ परोसा जा सकता है। बारिश के मौसम में एक कप गर्म चाय के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। पराठा बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि कॉर्न की फिलिंग में अतिरिक्त पानी न हो। गीली फिलिंग होने पर पराठा बेलना मुश्किल हो सकता है और वह तवे पर फट भी सकता है। इसके अलावा चीज़ की मात्रा संतुलित रखें और पराठे को तेज आंच के बजाय मध्यम आंच पर पकाएं।

    मॉनसून में खाद्य सामग्री की ताजगी पर विशेष ध्यान देना भी जरूरी है। स्वीट कॉर्न, चीज़ और अन्य सामग्री ताजा होनी चाहिए। अगर आप रोज के पारंपरिक पराठों से कुछ अलग और स्वादिष्ट बनाना चाहते हैं, तो चीज़ कॉर्न पराठा एक आसान विकल्प है। इसकी मसालेदार कॉर्न फिलिंग और पिघला हुआ चीज़ इसे खास स्वाद देते हैं।

  • Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान

    Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान


    नई दिल्ली। भारत में कैंसर का बढ़ता संकट केवल मरीजों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की देर से पहचान है। अस्पतालों तक पहुंचने वाले बड़ी संख्या में मरीजों में कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है। ऐसी स्थिति में इलाज मुश्किल होने के साथ महंगा भी हो जाता है और मरीज के ठीक होने की संभावना कम हो सकती है। यही वजह है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में आधुनिक उपचार के साथ समय पर पहचान और बचाव पर सबसे ज्यादा जोर देने की जरूरत है।

    कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के पीछे बढ़ती उम्र के साथ बदलती जीवनशैली धूम्रपान तंबाकू का सेवन असंतुलित खानपान शारीरिक गतिविधियों की कमी और पर्यावरणीय कारणों को महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर के कई जोखिम कारकों को जीवनशैली में बदलाव और समय पर जांच के जरिए कम किया जा सकता है। इसलिए कैंसर के खिलाफ जागरूकता की शुरुआत इलाज के बाद नहीं बल्कि बचपन से होनी चाहिए।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी है। खानपान शारीरिक गतिविधि मानसिक स्वास्थ्य नशे से दूरी टीकाकरण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जैसे विषयों को जीवन कौशल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बचपन से अच्छी आदतें विकसित होने पर भविष्य में कैंसर के साथ साथ हृदय रोग डायबिटीज और दूसरी गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।

    कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए एक आसान बात लोगों को हमेशा याद रखनी चाहिए। अगर शरीर में कोई असामान्य लक्षण लगातार तीन सप्ताह या उससे अधिक समय तक बना रहता है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार दर्द शरीर में असामान्य गांठ बिना वजह वजन कम होना लंबे समय तक रहने वाली खांसी निगलने में परेशानी असामान्य रक्तस्राव या लंबे समय से बनी कमजोरी जैसे लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि ऐसे लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते लेकिन लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी हो जाती है।

    स्क्रीनिंग भी कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। कुछ कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में स्क्रीनिंग के जरिए की जा सकती है। यही वह समय होता है जब उपचार के विकल्प अपेक्षाकृत बेहतर हो सकते हैं। आने वाले समय में तकनीक इस क्षेत्र को और मजबूत कर सकती है। मल्टी कैंसर अर्ली डिटेक्शन जैसे रक्त आधारित परीक्षणों पर दुनियाभर में शोध जारी है। इनका उद्देश्य एक ही रक्त नमूने से कई प्रकार के कैंसर से जुड़े संकेतों की पहचान करना है। हालांकि ऐसे परीक्षणों को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उनकी सटीकता उपयोगिता और चिकित्सकीय प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।

    भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी कैंसर की पहचान और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मेडिकल इमेजिंग और पैथोलॉजी डेटा के बड़े डेटाबेस की मदद से AI आधारित सिस्टम को प्रशिक्षित किया जा सकता है। इससे संदिग्ध मामलों की पहचान में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को सहायता मिल सकती है और जरूरत पड़ने पर मरीजों को विशेषज्ञ केंद्र तक जल्दी पहुंचाया जा सकता है।

    भारत जैसे विशाल देश में कैंसर स्क्रीनिंग का एक ही मॉडल सभी क्षेत्रों के लिए प्रभावी नहीं हो सकता। गांवों और दूरदराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स मोबाइल डायग्नोस्टिक सेवाएं डिजिटल रिस्क असेसमेंट और मजबूत रेफरल सिस्टम की जरूरत होगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर बड़े कैंसर अस्पताल तक मरीजों को समय पर जोड़ना इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।

    कैंसर के खिलाफ भारत की असली सफलता केवल आधुनिक मशीनों अस्पतालों या महंगे उपचारों की संख्या से तय नहीं होगी। असली सफलता तब मानी जाएगी जब बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में होने लगे और कम मरीज गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचें। जागरूकता समय पर जांच स्वस्थ जीवनशैली AI आधारित तकनीक और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर कैंसर के खिलाफ भारत की लड़ाई को नई दिशा दे सकते हैं।