Category: Lifestyle

  • बार-बार थकान बाल झड़ना और घाव देर से भरना नहीं है सामान्य, शरीर में इन पोषक तत्वों की कमी का हो सकता है संकेत

    बार-बार थकान बाल झड़ना और घाव देर से भरना नहीं है सामान्य, शरीर में इन पोषक तत्वों की कमी का हो सकता है संकेत

    नई दिल्ली । शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन और मिनरल्स की जरूरत होती है। इन पोषक तत्वों की मात्रा भले ही कम चाहिए होती है लेकिन शरीर के कई जरूरी काम इन्हीं पर निर्भर करते हैं। खून बनाने से लेकर नसों की कार्यप्रणाली प्रतिरोधक क्षमता त्वचा बालों और ऊर्जा के स्तर को बनाए रखने में इनका महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वजह है कि जब शरीर में आयरन जिंक या विटामिन B12 जैसे पोषक तत्वों की कमी होने लगती है तो कुछ बदलाव दिखाई दे सकते हैं। कई बार लोग इन संकेतों को सामान्य कमजोरी तनाव या नींद की कमी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।

    लगातार थकान और कमजोरी पोषण की कमी से जुड़ा एक आम संकेत हो सकता है। अगर पर्याप्त नींद लेने और सामान्य दिनचर्या के बावजूद शरीर में हर समय ऊर्जा की कमी महसूस हो रही है तो इसकी वजह जानना जरूरी है। आयरन की कमी से एनीमिया हो सकता है जिसमें थकान कमजोरी और एकाग्रता में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। विटामिन B12 की कमी में भी कमजोरी और थकान महसूस हो सकती है। हालांकि केवल थकान के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि शरीर में किस पोषक तत्व की कमी है क्योंकि इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

    आयरन की कमी बढ़ने पर कुछ लोगों में त्वचा का रंग सामान्य से फीका दिखाई दे सकता है। चक्कर आना या थोड़ा काम करने पर सांस फूलना भी एनीमिया से जुड़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति में बिना सलाह के आयरन की दवा शुरू करने के बजाय डॉक्टर से जांच कराना बेहतर होता है। जरूरत पड़ने पर रक्त जांच के माध्यम से हीमोग्लोबिन और आयरन की स्थिति का पता लगाया जा सकता है।

    बालों का लगातार झड़ना भी कई कारणों से हो सकता है। तनाव हार्मोन में बदलाव भोजन की कमी और कुछ स्वास्थ्य समस्याएं बालों के झड़ने की वजह बन सकती हैं। आयरन की कमी या एनीमिया भी कुछ मामलों में बालों की सेहत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए केवल बाल झड़ने को देखकर किसी एक विटामिन या मिनरल की कमी मान लेना सही नहीं है।

    जिंक शरीर के लिए जरूरी मिनरल्स में शामिल है। यह प्रतिरोधक क्षमता और घाव भरने जैसी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। जिंक की कमी होने पर घाव सामान्य से देर से भरने की समस्या दिखाई दे सकती है। बार बार संक्रमण होना या बालों से जुड़ी परेशानियां भी कुछ मामलों में जिंक की कमी से संबंधित हो सकती हैं। हालांकि इन लक्षणों के पीछे अन्य स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं।

    विटामिन B12 शरीर की नसों और लाल रक्त कोशिकाओं के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी कमी लंबे समय तक रहने पर कमजोरी के साथ हाथ पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। कुछ लोगों में एकाग्रता और याददाश्त से जुड़ी परेशानियां भी देखी जा सकती हैं। इसलिए ऐसे लक्षण लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    पोषक तत्वों की कमी से बचने के लिए संतुलित और विविध आहार लेना महत्वपूर्ण है। भोजन में दालें हरी सब्जियां साबुत अनाज दूध और उससे बने खाद्य पदार्थ अंडे मांस या अन्य उपलब्ध पोषक स्रोतों को शामिल किया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय से कमजोरी बाल झड़ने घाव देर से भरने चक्कर या हाथ पैरों में झनझनाहट जैसी समस्या हो रही है तो खुद से सप्लीमेंट लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरी जांच कराना बेहतर है। सही कारण की पहचान के बाद ही उचित उपचार और पोषण की योजना बनाई जानी चाहिए।

  • बालों की देखभाल के लिए घर पर बनाएं चावल, मेथी और लौंग का हेयर रिंस, जानें बनाने और लगाने का आसान तरीका

    बालों की देखभाल के लिए घर पर बनाएं चावल, मेथी और लौंग का हेयर रिंस, जानें बनाने और लगाने का आसान तरीका

    नई दिल्ली । बालों की देखभाल के लिए बाजार में कई तरह के प्रोडक्ट उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ लोग घर में मौजूद सामान्य सामग्री से तैयार किए गए नुस्खों को भी अपने हेयर केयर रूटीन में शामिल करते हैं। चावल, मेथी और लौंग से तैयार किया जाने वाला हेयर रिंस भी ऐसा ही एक घरेलू विकल्प है, जिसे बनाना आसान है और इसके लिए ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती।

    इस होममेड हेयर रिंस को तैयार करने के लिए चावल, मेथी दाना, लौंग और पानी की जरूरत होती है। इसे बनाने से पहले सभी सामग्रियों को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी भी मिश्रण को बाल झड़ने या स्कैल्प की समस्या का निश्चित इलाज नहीं माना जा सकता।

    रिंस बनाने के लिए सबसे पहले एक कप पानी में करीब चार बड़े चम्मच चावल, एक से दो चम्मच मेथी दाना और कुछ लौंग डालें। इन सभी चीजों को साफ पानी से धोने के बाद एक बर्तन में डालकर करीब छह से आठ घंटे के लिए भिगोकर रखा जा सकता है। इसे रातभर भिगोकर रखने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।

    अगले चरण में इसी मिश्रण को धीमी आंच पर करीब 10 से 15 मिनट तक उबालना होता है। उबालने के बाद गैस बंद कर दें और मिश्रण को सामान्य तापमान पर पूरी तरह ठंडा होने दें। इसके बाद इसे साफ कपड़े या छन्नी की सहायता से अच्छी तरह छान लें, ताकि पानी में किसी सामग्री के टुकड़े न रह जाएं।

    तैयार किए गए रिंस को साफ स्प्रे बोतल में भरकर रखा जा सकता है। हालांकि इसे तैयार करने और स्टोर करने के दौरान साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी है। घर पर बनाए गए किसी भी मिश्रण को लंबे समय तक रखने के बजाय कम मात्रा में तैयार करके ताजा इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है।

    बाल धोने के बाद इस रिंस को स्कैल्प और बालों की लंबाई पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है। इसे कुछ समय बालों पर रहने देने के बाद साफ पानी से धो लें। पहली बार इस्तेमाल करने वाले लोगों को सीधे ज्यादा मात्रा लगाने के बजाय थोड़ी मात्रा से शुरुआत करनी चाहिए।

    मेथी, चावल और लौंग जैसे घरेलू ingredients को लेकर अलग-अलग पारंपरिक हेयर केयर तरीके प्रचलित हैं, लेकिन इनके प्रभाव व्यक्ति के बालों और स्कैल्प की स्थिति के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए इसे बालों की सामान्य देखभाल के विकल्प के तौर पर ही देखना चाहिए।

    अगर इस रिंस के इस्तेमाल के बाद स्कैल्प में खुजली, जलन, लालिमा या किसी अन्य तरह की परेशानी महसूस होती है, तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए। किसी भी घरेलू मिश्रण को लगाने से पहले संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

    बालों का लगातार या सामान्य से काफी अधिक झड़ना किसी अन्य कारण से भी जुड़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय समस्या के कारण का पता लगाना जरूरी है। स्कैल्प से जुड़ी परेशानी लंबे समय तक बनी रहे तो विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • बालों की देखभाल के लिए घर पर बनाएं चावल, मेथी और लौंग का हेयर रिंस, जानें बनाने और लगाने का आसान तरीका

    बालों की देखभाल के लिए घर पर बनाएं चावल, मेथी और लौंग का हेयर रिंस, जानें बनाने और लगाने का आसान तरीका

    नई दिल्ली । बालों की देखभाल के लिए बाजार में कई तरह के प्रोडक्ट उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ लोग घर में मौजूद सामान्य सामग्री से तैयार किए गए नुस्खों को भी अपने हेयर केयर रूटीन में शामिल करते हैं। चावल, मेथी और लौंग से तैयार किया जाने वाला हेयर रिंस भी ऐसा ही एक घरेलू विकल्प है, जिसे बनाना आसान है और इसके लिए ज्यादा सामग्री की जरूरत नहीं पड़ती।

    इस होममेड हेयर रिंस को तैयार करने के लिए चावल, मेथी दाना, लौंग और पानी की जरूरत होती है। इसे बनाने से पहले सभी सामग्रियों को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी भी मिश्रण को बाल झड़ने या स्कैल्प की समस्या का निश्चित इलाज नहीं माना जा सकता।

    रिंस बनाने के लिए सबसे पहले एक कप पानी में करीब चार बड़े चम्मच चावल, एक से दो चम्मच मेथी दाना और कुछ लौंग डालें। इन सभी चीजों को साफ पानी से धोने के बाद एक बर्तन में डालकर करीब छह से आठ घंटे के लिए भिगोकर रखा जा सकता है। इसे रातभर भिगोकर रखने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है।

    अगले चरण में इसी मिश्रण को धीमी आंच पर करीब 10 से 15 मिनट तक उबालना होता है। उबालने के बाद गैस बंद कर दें और मिश्रण को सामान्य तापमान पर पूरी तरह ठंडा होने दें। इसके बाद इसे साफ कपड़े या छन्नी की सहायता से अच्छी तरह छान लें, ताकि पानी में किसी सामग्री के टुकड़े न रह जाएं।

    तैयार किए गए रिंस को साफ स्प्रे बोतल में भरकर रखा जा सकता है। हालांकि इसे तैयार करने और स्टोर करने के दौरान साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी है। घर पर बनाए गए किसी भी मिश्रण को लंबे समय तक रखने के बजाय कम मात्रा में तैयार करके ताजा इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है।

    बाल धोने के बाद इस रिंस को स्कैल्प और बालों की लंबाई पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है। इसे कुछ समय बालों पर रहने देने के बाद साफ पानी से धो लें। पहली बार इस्तेमाल करने वाले लोगों को सीधे ज्यादा मात्रा लगाने के बजाय थोड़ी मात्रा से शुरुआत करनी चाहिए।

    मेथी, चावल और लौंग जैसे घरेलू ingredients को लेकर अलग-अलग पारंपरिक हेयर केयर तरीके प्रचलित हैं, लेकिन इनके प्रभाव व्यक्ति के बालों और स्कैल्प की स्थिति के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए इसे बालों की सामान्य देखभाल के विकल्प के तौर पर ही देखना चाहिए।

    अगर इस रिंस के इस्तेमाल के बाद स्कैल्प में खुजली, जलन, लालिमा या किसी अन्य तरह की परेशानी महसूस होती है, तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए। किसी भी घरेलू मिश्रण को लगाने से पहले संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

    बालों का लगातार या सामान्य से काफी अधिक झड़ना किसी अन्य कारण से भी जुड़ा हो सकता है। ऐसी स्थिति में केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय समस्या के कारण का पता लगाना जरूरी है। स्कैल्प से जुड़ी परेशानी लंबे समय तक बनी रहे तो विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • कैंसर पर जोंटी रोड्स का बड़ा संदेश, फिटनेस के साथ सही खानपान और जीवनशैली को बताया अहम

    कैंसर पर जोंटी रोड्स का बड़ा संदेश, फिटनेस के साथ सही खानपान और जीवनशैली को बताया अहम


    नई दिल्ली । दक्षिण अफ्रीका के पूर्व क्रिकेटर जोंटी रोड्स ने कैंसर को लेकर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है। अपने क्रिकेट करियर में शानदार फील्डिंग के लिए दुनिया भर में पहचान बनाने वाले रोड्स ने मुंबई में आयोजित एक कैंसर जागरूकता कार्यक्रम में जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े विकल्पों पर बात की। वह SSO Cancer Hospitals से ब्रांड एंबेसडर के तौर पर जुड़े हुए हैं और हाल ही में अस्पताल की ओर से शुरू किए गए Head and Neck Cancer Centre of Excellence के उद्घाटन कार्यक्रम में भी शामिल हुए।

    रोड्स ने कहा कि कैंसर जैसी बीमारी को केवल अचानक होने वाली समस्या के तौर पर नहीं देखना चाहिए। उन्होंने अपनी बात रखते हुए आदतों तनाव और जीवनशैली से जुड़े फैसलों को स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसे विकल्प चुनने चाहिए जो लंबे समय तक उसके स्वास्थ्य के लिए बेहतर साबित हों। हालांकि कैंसर के मामले में यह समझना भी जरूरी है कि बीमारी का कोई एक कारण नहीं होता और हर मरीज के कैंसर को उसकी जीवनशैली से जोड़ना सही नहीं है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैंसर कई तरह की बीमारियों का समूह है और इसके पीछे आनुवंशिक कारणों के साथ पर्यावरणीय और व्यवहार से जुड़े कई कारक हो सकते हैं। तंबाकू का सेवन शराब अस्वास्थ्यकर खानपान शारीरिक निष्क्रियता अधिक वजन वायु प्रदूषण और कुछ संक्रमण कैंसर के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं। WHO के मुताबिक 2022 में दुनिया भर में कैंसर के नए मामलों में करीब 37 प्रतिशत मामले ऐसे कारणों से जुड़े थे जिन्हें रोकथाम की रणनीतियों के जरिए कम किया जा सकता है।

    रोड्स ने अपनी फिटनेस यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि खिलाड़ी होने के कारण व्यायाम और फिटनेस उनकी जीवनशैली का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिट व्यक्ति को कैंसर नहीं हो सकता ऐसा कहना सही नहीं होगा। उनका संदेश मुख्य रूप से लोगों को अपने स्वास्थ्य को लेकर जागरूक करने और बेहतर विकल्प चुनने पर केंद्रित था। दरअसल कैंसर का जोखिम कम करने के लिए केवल व्यायाम ही पर्याप्त नहीं है बल्कि तंबाकू से दूरी स्वस्थ वजन संतुलित खानपान नियमित शारीरिक गतिविधि और शराब से बचाव जैसे कई कदम महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    जोंटी रोड्स ने भारत में अपने परिवार के साथ लंबे समय तक रहने का अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह भारत को केवल एक पर्यटक के रूप में नहीं देखते। उन्होंने यहां लोगों की जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों को करीब से देखने की बात कही। उनका उद्देश्य अपने अनुभव के जरिए लोगों को कैंसर के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने और समय रहते जागरूक होने के लिए प्रेरित करना है।

    कैंसर को लेकर जागरूकता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समय पर जांच और इलाज भी है। WHO के अनुसार कई तरह के कैंसर का शुरुआती चरण में पता चलने और उचित उपचार मिलने पर इलाज संभव है। यही वजह है कि शरीर में लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है। साथ ही नियमित स्वास्थ्य जांच और जोखिम कारकों को कम करने की कोशिश बीमारी के बोझ को घटाने में मदद कर सकती है।

    रोड्स ने कैंसर को लेकर डर के बजाय जागरूकता और सकारात्मक सोच पर जोर दिया। उनका कहना था कि भारत में कैंसर के इलाज के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर और चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं और मरीजों को बीमारी का सामना हिम्मत के साथ करना चाहिए। उनका संदेश यही है कि स्वास्थ्य को लेकर छोटे लेकिन लगातार किए जाने वाले सही फैसले लंबे समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को कैंसर होने या न होने का फैसला केवल उसकी जीवनशैली से नहीं किया जा सकता और किसी भी लक्षण या जोखिम की स्थिति में डॉक्टर की सलाह ही सबसे महत्वपूर्ण है।

  • दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    दुबलेपन को न समझें अच्छी सेहत की निशानी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया असली फिटनेस का वास्तविक पैमाना

    नई दिल्ली :आधुनिक दौर में सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण अधिकांश लोग पतले दिखने को ही अच्छी फिटनेस का पर्याय मानने लगे हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि केवल वजन कम होना या दुबला दिखना किसी व्यक्ति के पूर्ण स्वस्थ होने का प्रमाण नहीं है। वास्तविक फिटनेस का सीधा संबंध इस बात से है कि आपका शरीर दैनिक जीवन के कार्यों को कितनी सहजता और ऊर्जा के साथ पूरा करता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल बाहरी शारीरिक बनावट के आधार पर किसी के स्वास्थ्य का सही आकलन नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति दिखने में सामान्य या पतला है, लेकिन दिनभर सुस्ती महसूस करता है, सीढ़ियां चढ़ने में हांफने लगता है या उसकी नींद पूरी नहीं होती, तो उसे पूर्णतः स्वस्थ नहीं माना जा सकता। असली फिटनेस शरीर को क्रियाशील, ऊर्जावान और बीमारियों से मुक्त बनाए रखने में निहित है।

    शारीरिक क्षमता का परीक्षण दैनिक गतिविधियों से होता है। थोड़ा सा चलने, वजन उठाने या सामान्य मेहनत के काम करने पर अत्यधिक थकान या सांस फूलना खराब कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस का संकेत हो सकता है। यदि पहले की तुलना में सामान्य काम करने में भी परेशानी होने लगे, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय अपनी जीवनशैली और आहार में आवश्यक सुधार करना चाहिए।

    एक स्वस्थ शरीर के लिए लचीलापन और शारीरिक संतुलन भी बेहद महत्वपूर्ण घटक हैं। बिना किसी कठिनाई के झुकना, मुड़ना और दैनिक गतिविधियों के दौरान संतुलन बनाए रखना अच्छी शारीरिक स्थिति को दर्शाता है। बढ़ती उम्र के साथ शरीर की स्थिरता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से हल्का व्यायाम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।

    शारीरिक संकेतकों की बात करें तो रेस्टिंग हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पैमाना हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, सामान्य स्थिति में नियंत्रित ब्लड प्रेशर और स्थिर हृदय गति अंदरूनी रूप से मजबूत शरीर का संकेत देती है। बाहर से फिट दिखने वाले व्यक्ति भी उच्च रक्तचाप या अन्य आंतरिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त हो सकते हैं, इसलिए नियमित जांच आवश्यक है।

    शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का संतुलन भी उतना ही अनिवार्य है। अत्यधिक तनाव, चिड़चिड़ापन या उदासी व्यक्ति की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित शारीरिक गतिविधि न केवल मांसपेशियों को मजबूत करती है, बल्कि मानसिक तनाव को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग केवल वजन घटाने वाले भ्रामक पैमानों के पीछे न भागें। संतुलित पोषण, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम और तनावमुक्त दिनचर्या को अपनाकर ही वास्तविक फिटनेस हासिल की जा सकती है। अपने शरीर के संकेतों को समझना और आंतरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना ही लंबे समय तक स्वस्थ रहने का सबसे कारगर तरीका है।

  • शरीर में बढ़ रही है पेट की चर्बी तो न करें नजरअंदाज, ब्लड शुगर बढ़ने के साथ बढ़ सकता है बीमारियों का जोखिम

    शरीर में बढ़ रही है पेट की चर्बी तो न करें नजरअंदाज, ब्लड शुगर बढ़ने के साथ बढ़ सकता है बीमारियों का जोखिम


    नई दिल्ली । आज की बदलती जीवनशैली में वजन बढ़ना और ब्लड शुगर का असंतुलन तेजी से चिंता का विषय बनता जा रहा है। लंबे समय तक बैठकर काम करना कम शारीरिक गतिविधि करना और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाला भोजन लेना शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने का कारण बन सकता है। खासतौर पर पेट के आसपास जमा होने वाली चर्बी को मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है। शोधों में पेट की चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध भी सामने आया है। इंसुलिन रेजिस्टेंस की स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति सामान्य तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करतीं जिससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

    जब शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा खर्च नहीं हो पाती है तो उसका कुछ हिस्सा फैट के रूप में जमा होने लगता है। लगातार वजन बढ़ना और खासकर कमर के आसपास चर्बी बढ़ना टाइप 2 डायबिटीज और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं के जोखिम से जुड़ा पाया गया है। भारत में हुए अध्ययनों की समीक्षा में भी अधिक वजन और मोटापे को मेटाबॉलिक सिंड्रोम के ज्यादा जोखिम से जोड़ा गया है। इसलिए केवल वजन मशीन पर दिखने वाले आंकड़े पर ध्यान देने के बजाय कमर के आसपास बढ़ती चर्बी और पूरी जीवनशैली पर नजर रखना भी जरूरी है।

    दूसरी ओर ब्लड शुगर शरीर के लिए ऊर्जा का जरूरी स्रोत है लेकिन इसका स्तर लंबे समय तक सामान्य सीमा से अधिक रहना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। टाइप 2 डायबिटीज में इंसुलिन का प्रभाव कम हो सकता है और समय के साथ शरीर के लिए ब्लड ग्लूकोज को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। लगातार हाई ब्लड शुगर रहने पर रक्त वाहिकाओं और नसों को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटीज का लंबे समय तक खराब नियंत्रण हृदय रोग स्ट्रोक किडनी की बीमारी और आंखों से जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।

    फैट और शुगर के इस संबंध को समझने के लिए इंसुलिन रेजिस्टेंस को समझना जरूरी है। जब शरीर में अतिरिक्त फैटी एसिड का बोझ बढ़ता है तो इसका असर मांसपेशियों लिवर और शरीर के दूसरे हिस्सों में ग्लूकोज के इस्तेमाल पर पड़ सकता है। इससे इंसुलिन सिग्नलिंग प्रभावित हो सकती है और ब्लड शुगर बढ़ने की स्थिति बन सकती है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता और आनुवंशिकता उम्र नींद तनाव खानपान और शारीरिक गतिविधि जैसे कई कारक भी मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

    इस जोखिम को कम करने के लिए सबसे पहले रोजमर्रा की गतिविधियों को बेहतर बनाना जरूरी है। नियमित तेज चाल से चलना साइकिल चलाना तैराकी या अपनी क्षमता के अनुसार दूसरी शारीरिक गतिविधियां की जा सकती हैं। वयस्कों के लिए सामान्य स्वास्थ्य लाभ के लिहाज से हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि और सप्ताह में कम से कम दो दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली गतिविधि की सलाह दी जाती है।

    खानपान में भी संतुलन जरूरी है। अत्यधिक मीठे पेय पदार्थों और जरूरत से ज्यादा कैलोरी वाले भोजन को सीमित करना और भोजन में सब्जियों दालों साबुत अनाज तथा पर्याप्त प्रोटीन जैसे पौष्टिक विकल्पों को शामिल करना मददगार हो सकता है। केवल किसी एक भोजन को छोड़ देने या लंबे समय तक भूखे रहने को हर व्यक्ति के लिए जरूरी उपाय नहीं माना जाना चाहिए। खासकर डायबिटीज गर्भावस्था या किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों को डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेनी चाहिए।

    अगर वजन लगातार बढ़ रहा है कमर का घेरा बढ़ रहा है या बार बार ब्लड शुगर सामान्य से ज्यादा मिल रहा है तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर है। समय रहते वजन खानपान शारीरिक गतिविधि और ब्लड शुगर पर ध्यान देने से मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि केवल सुबह खाली पेट 20 मिनट चलने या किसी एक खास डाइट से सभी लोगों में फैट और शुगर तेजी से कम होने की गारंटी नहीं होती। स्वास्थ्य संबंधी बदलाव व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किए जाने चाहिए।

  • रक्तदान से पहले डॉक्टर की ये बातें जरूर जान लें, कौन दे सकता है ब्लड और किसे करना चाहिए परहेज

    रक्तदान से पहले डॉक्टर की ये बातें जरूर जान लें, कौन दे सकता है ब्लड और किसे करना चाहिए परहेज


    नई दिल्ली । रक्तदान को जीवन बचाने वाला सबसे बड़ा सामाजिक योगदान माना जाता है। एक यूनिट रक्त को अलग अलग घटकों में इस्तेमाल किया जाए तो इससे एक से अधिक मरीजों की मदद हो सकती है। यही वजह है कि अस्पतालों और ब्लड बैंकों की ओर से लोगों को नियमित रक्तदान के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। हालांकि रक्तदान करने से पहले यह समझना बेहद जरूरी है कि हर व्यक्ति ब्लड डोनेट करने के लिए योग्य नहीं होता। शरीर की सामान्य स्थिति उम्र वजन और स्वास्थ्य से जुड़े कई मानकों की जांच के बाद ही रक्तदान की अनुमति दी जाती है। भारत सरकार के e-RaktKosh के अनुसार सामान्य तौर पर स्वस्थ व्यक्ति की उम्र 18 से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए और उसका वजन कम से कम 45 किलोग्राम होना चाहिए।

    रक्तदान से पहले ब्लड बैंक में व्यक्ति की सामान्य स्वास्थ्य जांच की जाती है। इसमें मेडिकल हिस्ट्री के साथ ब्लड प्रेशर पल्स और शरीर का तापमान देखा जाता है। इसके अलावा उंगली से लिए गए रक्त के नमूने से हीमोग्लोबिन या आयरन की पर्याप्तता की जांच की जाती है। यदि जांच में कोई ऐसी स्थिति सामने आती है जिसमें रक्तदान करना सुरक्षित नहीं है तो व्यक्ति को उस समय रक्तदान से रोक दिया जाता है। इसलिए केवल उम्र और वजन सही होना ही पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए।

    आम तौर पर स्वस्थ वयस्क रक्तदान कर सकते हैं लेकिन यदि किसी व्यक्ति को गंभीर एनीमिया है या वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है तो उसे रक्तदान से बचना चाहिए। हाल ही में हुई सर्जरी या कुछ चिकित्सकीय प्रक्रियाओं के बाद भी कुछ समय तक रक्तदान टाला जा सकता है। इसी तरह कुछ संक्रमणों और स्वास्थ्य स्थितियों में डॉक्टर या ब्लड बैंक की मेडिकल टीम रक्तदान को अस्थायी या स्थायी रूप से रोक सकती है। इसलिए यदि आप किसी बीमारी का इलाज करा रहे हैं या नियमित दवाएं लेते हैं तो रक्तदान से पहले इसकी जानकारी ब्लड बैंक के चिकित्सकीय स्टाफ को देना जरूरी है।

    गर्भावस्था के दौरान रक्तदान नहीं किया जाता। डिलीवरी के बाद भी महिला को तुरंत रक्तदान नहीं करना चाहिए और उचित समय तथा स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार ही दोबारा रक्तदान किया जाना चाहिए। इसी तरह हाल में टीकाकरण या टैटू जैसी कुछ परिस्थितियों में भी रक्तदान कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। इन मामलों में प्रतीक्षा की अवधि हर स्थिति के लिए एक जैसी नहीं होती इसलिए अंतिम निर्णय संबंधित ब्लड सेंटर की मेडिकल स्क्रीनिंग के आधार पर लिया जाना चाहिए।

    रक्तदान से पहले कुछ सामान्य सावधानियां भी मददगार होती हैं। खाली पेट रक्तदान करने से बचना चाहिए और पर्याप्त पानी पीना चाहिए। अच्छी नींद लेना भी जरूरी है। रक्तदान से पहले हल्का और संतुलित भोजन करना बेहतर माना जाता है। शराब का सेवन करके रक्तदान करने से बचना चाहिए। रक्तदान के बाद भी शरीर को पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ देना चाहिए। e-RaktKosh के अनुसार रक्तदान के बाद अगले 24 से 48 घंटे तक तरल पदार्थ बढ़ाने और कुछ समय तक भारी शारीरिक मेहनत तथा वजन उठाने से बचने की सलाह दी जाती है।

    रक्तदान के दौरान किसी तरह की कमजोरी या चक्कर महसूस हो तो तुरंत मेडिकल स्टाफ को बताना चाहिए। रक्तदान के बाद कुछ देर आराम करना और उपलब्ध कराए गए हल्के जलपान का सेवन करना उपयोगी होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रक्तदान नेक काम जरूर है लेकिन इसे केवल उत्साह में आकर नहीं करना चाहिए। अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में सही जानकारी देकर ही रक्तदान करें। अंतिम पात्रता का निर्णय ब्लड बैंक की मेडिकल स्क्रीनिंग और लागू रक्तदान दिशानिर्देशों के अनुसार होता है।

  • डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    नई दिल्ली । मौसम में बदलाव और संक्रामक बीमारियों के प्रसार के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेंगू और स्वाइन फ्लू अर्थात एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के मामले सामने आ रहे हैं। दोनों ही बीमारियों में तेज बुखार, सिरदर्द और शारीरिक दर्द जैसे शुरुआती लक्षण एक समान प्रतीत होते हैं। इस कारण आम नागरिकों के लिए शुरुआती चरण में इनके बीच अंतर समझ पाना कठिन हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों बीमारियों के फैलने के कारण और इनके संक्रमण का माध्यम पूरी तरह से भिन्न हैं।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के बीच सबसे बड़ा बुनियादी अंतर इनके संचरण की प्रक्रिया में निहित है। डेंगू का प्रसार संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो मुख्य रूप से साफ और ठहरे हुए पानी में पनपते हैं। इसके विपरीत, स्वाइन फ्लू एक श्वसन संबंधी वायरस संक्रमण है जो किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने अथवा छींकने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से हवा में आसानी से फैलता है। इसी वजह से दोनों बीमारियों की रोकथाम के लिए अलग-अलग सावधानियां बरतनी आवश्यक होती हैं।

    स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, डेंगू के मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार आना, आंखों के पिछले हिस्से में तीव्र दर्द, मांसपेशियों तथा जोड़ों में ऐंठन, उल्टी आना और त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना शामिल हैं। इसके लक्षण आमतौर पर मच्छर के काटने के चार से दस दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं और यह स्थिति एक सप्ताह तक बनी रह सकती है। गंभीर स्थिति में पेट दर्द, मसूड़ों या नाक से रक्तस्राव और सांस लेने में तकलीफ जैसे चेतावनी संकेत भी उभर सकते हैं।

    दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू के लक्षणों में अचानक बुखार के साथ सूखी खांसी, गले में खराश, ठंड लगना, अत्यधिक थकान और नाक बहना शामिल हैं। कुछ मरीजों में पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे उल्टी या दस्त भी देखे जा सकते हैं। यदि समय पर इस स्थिति का प्रबंधन न किया जाए तो यह बढ़कर निमोनिया का रूप ले सकती है, जिससे श्वसन तंत्र पर गंभीर असर पड़ता है।

    दोनों ही बीमारियों के उपचार में सटीक चिकित्सीय परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेंगू की पुष्टि के लिए विशिष्ट रक्त जांच की आवश्यकता होती है, जिससे प्लेटलेट्स की संख्या और एंटीजन की स्थिति का पता चलता है। वहीं स्वाइन फ्लू का निदान रोगी के क्लिनिकल मूल्यांकन और स्वाब टेस्ट के आधार पर किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का लक्षण उभरने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल योग्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत और पर्यावरणीय स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। डेंगू से बचने के लिए घरों और आसपास जलभराव न होने देना और मच्छर रोधी उपायों का प्रयोग करना प्रभावी होता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्वाइन फ्लू से सुरक्षा के लिए हाथों की नियमित सफाई, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर सावधानी और चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार टीकाकरण कराने की सलाह दी जाती है।

  • बालों की चमक और मजबूती बढ़ाने के लिए घर पर बनाएं ये 8 आसान हेयर रिंस, जानें इस्तेमाल करने का सही तरीका

    बालों की चमक और मजबूती बढ़ाने के लिए घर पर बनाएं ये 8 आसान हेयर रिंस, जानें इस्तेमाल करने का सही तरीका

    नई दिल्ली । बालों की चमक, मुलायमपन और खूबसूरती बनाए रखने के लिए नियमित हेयर केयर रूटीन जरूरी है। बदलते मौसम, धूल, प्रदूषण और बालों में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग उत्पादों के कारण कई बार बाल रूखे और बेजान नजर आने लगते हैं। ऐसे में महंगे उत्पादों के अलावा कुछ आसान घरेलू रिंस भी सामान्य हेयर केयर रूटीन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। रोजमेरी, आंवला, चावल और ग्रीन टी जैसी चीजों से घर पर आसानी से रिंस तैयार किया जा सकता है।

    ग्रीन टी रिंस बालों और स्कैल्प की सामान्य देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। इसे तैयार करने के लिए ग्रीन टी बनाकर पूरी तरह ठंडा कर लें। बालों में शैंपू करने के बाद इसे अंतिम रिंस के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को पहली बार इस्तेमाल करने से पहले थोड़ी मात्रा में परीक्षण करना चाहिए।

    राइस वॉटर यानी चावल का पानी भी बालों की देखभाल में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसे बालों में लगाने से बालों में मुलायमपन और स्मूदनेस महसूस हो सकती है। चावल को पानी में भिगोकर या उबालकर तैयार किए गए पानी को ठंडा करने के बाद इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे बालों पर लगाने के बाद कुछ समय तक रखने के बजाय अच्छी तरह धोना बेहतर है।

    आंवला वॉटर भी पारंपरिक हेयर केयर का हिस्सा रहा है। आंवले में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं और इसका इस्तेमाल बालों की सामान्य देखभाल के लिए किया जाता है। आंवले को पानी में उबालकर या आंवला पाउडर को पानी में मिलाकर रिंस तैयार किया जा सकता है। इसे बालों की लंबाई और स्कैल्प पर लगाया जा सकता है।

    रोजमेरी वॉटर इन दिनों हेयर केयर रूटीन में काफी लोकप्रिय है। इसे रोजमेरी की पत्तियों को पानी में उबालकर तैयार किया जा सकता है। पानी ठंडा होने के बाद इसे छानकर बालों पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि किसी भी हर्बल मिश्रण से हर व्यक्ति को एक जैसा फायदा मिले, यह जरूरी नहीं है। जलन या लालिमा महसूस होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    मेथी वॉटर भी रूखे बालों की सामान्य देखभाल में इस्तेमाल किया जा सकता है। मेथी के दानों को कुछ घंटे पानी में भिगोकर रखने के बाद पानी छान लें। तैयार पानी को बालों पर लगाया जा सकता है। मेथी का इस्तेमाल बालों को मुलायम महसूस कराने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे लगाने के बाद बालों को अच्छी तरह साफ करना जरूरी है।

    प्याज का पानी भी घरेलू हेयर केयर में इस्तेमाल किया जाता है। कुछ लोग इसे बालों की ग्रोथ और स्कैल्प केयर के लिए आजमाते हैं। हालांकि प्याज का रस या पानी कुछ लोगों की त्वचा में जलन पैदा कर सकता है। इसलिए इसे लगाने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है और तेज जलन या खुजली होने पर इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    एलोवेरा रिंस ड्राई स्कैल्प और बेजान बालों की सामान्य देखभाल में उपयोगी हो सकता है। एलोवेरा जेल को पानी में अच्छी तरह मिलाकर हल्का मिश्रण तैयार किया जा सकता है। इसे बालों पर लगाने के बाद अच्छी तरह धोना चाहिए, ताकि कोई अवशेष न रह जाए।

    केला और तेल आधारित रिंस या हेयर पैक भी रूखे बालों में नमी और मुलायमपन देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। केले को अच्छी तरह मैश करके थोड़ी मात्रा में तेल मिलाया जा सकता है। इसे मुख्य रूप से बालों की लंबाई पर लगाया जाए और कुछ समय बाद अच्छी तरह धो लिया जाए। इस्तेमाल से पहले किसी भी घरेलू मिश्रण का पैच टेस्ट करना बेहतर है। खुजली, जलन, लालिमा या सूजन होने पर इसे तुरंत धो दें। लगातार बाल झड़ने या स्कैल्प संबंधी समस्या रहने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

  • घर पर सिर्फ 15 मिनट में बनाएं होटल जैसा खिला-खिला जीरा राइस, स्वाद और खुशबू से मेहमान भी पूछेंगे रेसिपी

    घर पर सिर्फ 15 मिनट में बनाएं होटल जैसा खिला-खिला जीरा राइस, स्वाद और खुशबू से मेहमान भी पूछेंगे रेसिपी

    नई दिल्ली । घर पर मेहमान आने वाले हों और खाने की टेबल पर कुछ स्वादिष्ट और खास परोसना हो तो जीरा राइस एक बेहतरीन विकल्प है। इसकी खुशबूदार महक, लंबे और खिले-खिले चावल के दाने और घी में भुने जीरे का स्वाद साधारण खाने को भी खास बना देता है। अच्छी बात यह है कि सही तरीका अपनाकर इसे घर पर कम समय में आसानी से तैयार किया जा सकता है।

    जीरा राइस बनाने के लिए सबसे पहले लंबे दाने वाले बासमती चावल लें। करीब दो कप चावल को दो से तीन बार साफ पानी से धो लें, ताकि अतिरिक्त स्टार्च निकल जाए। इसके बाद चावल को लगभग 15 से 20 मिनट के लिए पानी में भिगोकर रखें। इससे चावल के दाने अच्छी तरह फूलते हैं और पकने के बाद लंबे दिखाई देते हैं।

    अब चावल को पर्याप्त पानी और थोड़ा नमक डालकर पकाएं। ध्यान रखें कि चावल को पूरी तरह गलने तक न पकाएं। जीरा राइस के लिए चावल लगभग 90 प्रतिशत पकना चाहिए। जब दाने अंदर से हल्के कड़े रहें, तब अतिरिक्त पानी निकाल दें। पके हुए चावल को कुछ देर खुला रखने से उनकी भाप निकल जाएगी और वे आपस में चिपकेंगे नहीं।

    अब एक चौड़ी कड़ाही या पैन को मध्यम आंच पर गर्म करें। इसमें करीब दो बड़े चम्मच घी डालें। घी गर्म होने के बाद उसमें एक से डेढ़ चम्मच जीरा डालें। जब जीरा चटकने लगे तो इसमें तेजपत्ता, हरी इलायची, छोटी दालचीनी और लौंग डालकर कुछ सेकंड भूनें। इसके बाद लंबाई में कटी हुई हरी मिर्च डालें। साबुत मसालों का यह तड़का जीरा राइस की खुशबू को काफी बढ़ा देता है।

    तड़का तैयार होने के बाद पके हुए चावल को कड़ाही में धीरे-धीरे डालें। यहां सबसे ज्यादा सावधानी रखने की जरूरत होती है। चावल को तेज हाथ से चलाने के बजाय हल्के हाथ से पलटें। ज्यादा चलाने से बासमती के लंबे दाने टूट सकते हैं और चावल देखने में चिपचिपे लगने लगते हैं।

    अब स्वाद के अनुसार नमक डालें और थोड़ा सा नींबू का रस मिलाएं। नींबू की हल्की खटास जीरा राइस के स्वाद को संतुलित करने में मदद करती है। इसके बाद कड़ाही को ढककर धीमी आंच पर करीब दो से तीन मिनट तक पकाएं। फिर गैस बंद कर दें और चावल को कुछ मिनट के लिए ढका रहने दें।

    जीरा राइस को होटल जैसा बनाने की सबसे महत्वपूर्ण ट्रिक यही है कि चावल ज्यादा न पकाएं और उन्हें तड़के के साथ मिलाते समय ज्यादा न चलाएं। साथ ही चौड़े बर्तन का इस्तेमाल करने से चावल आसानी से फैल जाते हैं और दाने टूटने की संभावना कम रहती है। घी में जीरे और साबुत मसालों को सही समय तक भूनना भी इसके स्वाद में बड़ा अंतर पैदा करता है।

    तैयार जीरा राइस को ऊपर से बारीक कटे हरे धनिये से सजाकर गरमा-गरम परोसें। इसे दाल तड़का, राजमा, छोले, मटर पनीर या शाही पनीर के साथ सर्व किया जा सकता है। चाहें तो परोसते समय ऊपर से थोड़ा गर्म घी डाल सकते हैं। इस आसान तरीके से घर पर तैयार जीरा राइस न केवल स्वादिष्ट लगेगा, बल्कि इसके लंबे और अलग-अलग दाने इसे बिल्कुल होटल स्टाइल लुक भी देंगे।