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  • डिजिटल डिस्ट्रैक्शन का साइलेंट अटैक: नोटिफिकेशन और मल्टीटास्किंग ने छीना फोकस, छात्र और कर्मचारी मानसिक थकान के शिकार

    डिजिटल डिस्ट्रैक्शन का साइलेंट अटैक: नोटिफिकेशन और मल्टीटास्किंग ने छीना फोकस, छात्र और कर्मचारी मानसिक थकान के शिकार


    नई दिल्ली/भोपाल। वर्तमान दौर में तकनीक ने जहाँ जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसने मानवीय क्षमताओं, विशेषकर ‘एकाग्रता पर एक गहरा प्रहार किया है। देशभर के शिक्षण संस्थानों और कॉर्पोरेट जगत से आ रही रिपोर्टों के अनुसार, छात्र और कामकाजी पेशेवर एक नई तरह की चुनौती का सामना कर रहे हैंफोकस की कमी’। मोबाइल नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया की लत और एक साथ कई काम करनेकी होड़ ने उत्पादकता को निचले स्तर पर पहुँचा दिया है, जिससे अब मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।

    20 मिनट भी नहीं टिक रहा छात्रों का ध्यान विभिन्न शिक्षण संस्थानों द्वारा किए गए आंतरिक सर्वेक्षणों में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह पाया गया है कि आज का औसत छात्र किसी एक विषय पर लगातार 20 से 25 मिनट से अधिक समय तक ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा है। पढ़ाई के दौरान हर कुछ मिनटों में मोबाइल स्क्रीन चेक करने की आदत ने उनकी सीखने की क्षमता को बाधित किया है। शिक्षाविदों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक परिणामों में बड़ी गिरावट देखी जा सकती है।

    मल्टीटास्किंग का बोझ और घटती कार्यक्षमता यही स्थिति कॉर्पोरेट कार्यालयों की भी है। दफ्तरों में कर्मचारियों पर एक साथ कई प्रोजेक्ट्स संभालने का दबाव होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ‘मल्टीटास्किंग’ दरअसल एक भ्रम है। जब मस्तिष्क बार-बार एक काम से दूसरे काम पर स्विच करता है, तो वह कॉग्निटिव लोड मानसिक भार बढ़ा देता है, जिससे काम की गुणवत्ता गिर जाती है और कर्मचारी जल्दी मानसिक थकान महसूस करने लगते हैं।

    क्या हैं इस समस्या के मुख्य कारण? मनोवैज्ञानिकों ने फोकस खोने के पीछे तीन प्रमुख कारणों को रेखांकित किया है अनियंत्रित स्क्रीन टाइम: सोशल मीडिया और ऐप्स के नोटिफिकेशन डोपामाइन रिलिज़ करते हैं, जो हमें बार-बार फोन देखने को मजबूर करते हैं। अनियमित दिनचर्या नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि का अभाव मानसिक स्पष्टता को खत्म कर देता है। डिजिटल शोर: हर वक्त सूचनाओं के अंबार के बीच मस्तिष्क को ‘विश्राम’ नहीं मिल पा रहा है।

    समाधान की ओर बढ़ते कदम डिजिटल डिटॉक्स और वर्कशॉप इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए अब संस्थानों ने सक्रिय कदम उठाना शुरू कर दिया है। कई स्कूल और कॉलेज अब ‘डिजिटल डिटॉक्स’ सत्र आयोजित कर रहे हैं, जहाँ छात्रों को बिना गैजेट्स के समय बिताने और एकाग्रता बढ़ाने के गुर सिखाए जा रहे हैं। वहीं, सरकारी स्तर पर भी छात्रों के लिए काउंसलिंग और मानसिक सहायता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों की सलाह कैसे बढ़ाएं अपना फोकस करियर काउंसलरों ने इस समस्या से निपटने के लिए कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए हैं मोनोटास्किंग’ अपनाएं: एक समय में केवल एक ही काम पर पूरा ध्यान दें।

    फोन को रखें दूर काम या पढ़ाई के समय मोबाइल को न केवल साइलेंट करें, बल्कि उसे अपनी नजरों से दूर रखें। ब्रेक का नियम काम को छोटे हिस्सों में बांटें और हर एक घंटे बाद 5-10 मिनट का ‘स्क्रीन-फ्री’ ब्रेक लें। समय रहते यदि इस ‘डिजिटल डिस्ट्रैक्शन’ पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह न केवल व्यक्तिगत करियर बल्कि देश की समग्र कार्यक्षमता के लिए भी बड़ी चुनौती बन जाएगा।

  • हाई बीपी का नया विलेन: ऑकलैंड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में खुलासा, नमक ही नहीं दिमाग के खास सिग्नल भी हैं जिम्मेदार

    हाई बीपी का नया विलेन: ऑकलैंड यूनिवर्सिटी की रिसर्च में खुलासा, नमक ही नहीं दिमाग के खास सिग्नल भी हैं जिम्मेदार


    नई दिल्ली । हाई ब्लड प्रेशर को अब तक हम केवल ज्यादा नमक खाने, तला-भुना भोजन मोटापा और मानसिक तनाव के साथ जोड़कर देखते आए हैं। लेकिन ऑकलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की एक ताज़ा स्टडी ने चिकित्सा जगत में खलबली मचा दी है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि हाई बीपी के पीछे केवल हमारा खानपान ही नहीं, बल्कि हमारे दिमाग की वायरिंग और उससे निकलने वाले सिग्नल भी एक बड़ी भूमिका निभाते हैं।

    क्या है दिमाग का वह हिस्सा जो बढ़ाता है बीपी

    वैज्ञानिकों के अनुसार दिमाग के निचले हिस्से में एक विशेष क्षेत्र होता है जिसे लैटरल पैराफेशियल रीजन कहा जाता है। आमतौर पर यह हिस्सा शरीर की उन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है जो अपने आप होती हैं, जैसे सांस लेना, दिल का धड़कना और पाचन क्रिया। स्टडी में खुलासा हुआ है कि इसी क्षेत्र में मौजूद कुछ विशेष नसें ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होती हैं। जब ये नसें जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं, तो वे रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ने के संकेत भेजती हैं। वाहिकाओं के सिकुड़ने से रक्त का प्रवाह बाधित होता है और दबाव बढ़ जाता है, जिसे हम मेडिकल भाषा में हाई ब्लड प्रेशर कहते हैं।

    अब तक की थ्योरी से कैसे अलग है यह रिसर्च

    अब तक डॉक्टरों का मानना था कि बीपी बढ़ने का मुख्य कारण किडनी की कार्यक्षमता में कमी या आर्टरीज में फैट का जमना है। लेकिन यह नई रिसर्च बताती है कि दिमागी नियंत्रण यदि दिमाग का लैटरल पैराफेशियल रीजन गलत सिग्नल भेज रहा है, तो स्वस्थ खानपान के बावजूद व्यक्ति का बीपी बढ़ सकता है। ऑटोमैटिक रिस्पॉन्स: कई बार शरीर बिना किसी बाहरी कारण जैसे नमक या गुस्सा के भी आंतरिक दिमागी संकेतों की वजह से हाइपरटेंशन का शिकार हो जाता है।

    एक्सपर्ट की सलाह: खुद को कैसे रखें सुरक्षित

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस नई रिसर्च के बाद अब बीपी के इलाज के तरीकों में बदलाव आ सकता है। केवल दवाएं ही नहीं बल्कि ‘न्यूरोलॉजिकल कंट्रोल पर भी ध्यान देना होगा। वर्तमान में खुद को सुरक्षित रखने के लिए आप ये कदम उठा सकते हैं ब्रीदिंग एक्सरसाइज: चूंकि यह हिस्सा सांस लेने को भी नियंत्रित करता है, इसलिए गहरी सांस लेने वाले व्यायाम दिमाग को शांत कर बीपी कम करने में मदद कर सकते हैं। माइंडफुलनेस योग और ध्यान के जरिए दिमाग के निचले हिस्से को रिलैक्स रखा जा सकता है। नियमित चेकअप: यदि खानपान सही होने के बाद भी बीपी बढ़ा हुआ है, तो डॉक्टर से न्यूरोलॉजिकल कारणों पर चर्चा करें।

  • रोज़ खाएं सिर्फ एक कटोरी ओट्स, दिल को रखें मजबूत और हार्ट अटैक-स्ट्रोक के खतरों से दूर!

    रोज़ खाएं सिर्फ एक कटोरी ओट्स, दिल को रखें मजबूत और हार्ट अटैक-स्ट्रोक के खतरों से दूर!

    नई दिल्ली।  दिल की सेहत आज के समय में सबसे बड़ी चिंता बन चुकी है। बदलती जीवनशैली, गलत खानपान, लगातार तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने लोगों के दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ा दिया है। हाई कोलेस्ट्रॉल, जिसे कभी केवल बुजुर्गों की समस्या माना जाता था, अब हर उम्र में देखने को मिल रहा है। यही हाई कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे दिल की नसों में जमता है और हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का रास्ता साफ करता है।

    आजकल लोग अक्सर दवाइयों पर निर्भर हो जाते हैं, लेकिन आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही यह मानते हैं कि सही भोजन से कई बीमारियों को जड़ से रोका जा सकता है। इनमें से एक सुपरफूड है ओट्स। यह आसानी से पचता है, शरीर में संतुलन बनाए रखता है और दिल की सेहत के लिए वरदान साबित होता है।

    रोजाना सिर्फ एक कटोरी ओट्स खाने से शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी और हानिकारक तत्व बाहर निकलते हैं। यह पाचन तंत्र को मजबूत करता है और शरीर में दोषों का संतुलन बनाए रखता है। आयुर्वेद के अनुसार जब पाचन ठीक रहता है, तो खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) अपने आप नियंत्रित होने लगता है।

    विज्ञान भी ओट्स के फायदे मानता है। इसमें मौजूद बीटा-ग्लूकान फाइबर पेट में जाकर एक जेल जैसी परत बना देता है, जो आंतों में कोलेस्ट्रॉल के अवशोषण को कम कर देता है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि बैड कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे कम होता है और दिल की धमनियां बेहतर तरीके से काम करती हैं। यही कारण है कि नियमित ओट्स खाने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम हो जाता है।

    ओट्स सिर्फ कोलेस्ट्रॉल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर के लिए फायदेमंद है। इसमें प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, जो मांसपेशियों को मजबूत बनाता है और शरीर को ऊर्जा देता है। इसके साथ ही इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे लंबे समय तक पेट भरा रहता है और बार-बार भूख नहीं लगती। यही वजह है कि वजन घटाने वाले लोगों के लिए भी ओट्स बहुत अच्छा विकल्प माना जाता है।

    ओट्स में कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स भी होते हैं। इसमें आयरन खून की कमी को दूर करता है, मैग्नीशियम और पोटेशियम दिल की धड़कन को संतुलित रखते हैं, और जिंक व एंटीऑक्सीडेंट्स रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। यही नहीं, ओट्स ब्लड शुगर को भी संतुलित रखता है। यह धीरे पचता है, जिससे खून में शुगर अचानक नहीं बढ़ती। इसलिए यह डायबिटीज के मरीजों के लिए भी सुरक्षित है।

    आयुर्वेद कहता है कि ओट्स शरीर को अंदर से साफ करता है। यह आंतों में जमा गंदगी और टॉक्सिन को बाहर निकालता है और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है। जब शरीर का मेटाबॉलिज्म सही रहता है, तो फैट जमा नहीं होता और कोलेस्ट्रॉल का स्तर संतुलित बना रहता है। नियमित रूप से ओट्स खाने वाले लोगों में दिल की समस्याएं काफी कम देखी जाती हैं।

    ओट्स को रोज़ाना अपनी डाइट में शामिल करना न सिर्फ दिल की बीमारियों से बचाने में मदद करता है, बल्कि शरीर को ऊर्जा, ताकत और संतुलन भी देता है। यह सुपरफूड हर उम्र के लिए फायदेमंद है और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए सबसे आसान उपायों में से एक है।

  • ठंड में स्किन ड्राई हो रही है? ये फेस पैक हटाएंगे कालापन और देंगे जवां लुक

    ठंड में स्किन ड्राई हो रही है? ये फेस पैक हटाएंगे कालापन और देंगे जवां लुक


    नई दिल्ली। सर्दियों में ठंडी हवा और ड्राई स्किन की वजह से चेहरे पर रूखापन, कालापन और उम्र के असर जल्दी दिखने लगते हैं। साथ ही लोग धूप में बैठकर गर्माहट लेते हैं, जिससे त्वचा पर टैनिंग और काला पन बढ़ जाता है। अगर इस मौसम में स्किन केयर छोड़ दिया जाए तो निखार भी गायब होने लगता है। ऐसे में घर पर बने नेचुरल फेस पैक से आप अपनी त्वचा को ग्लो, नमी और जवांपन दे सकते हैं।
    1) ओट्स-दूध फेस पैक (डेड स्किन हटाए, स्किन को हाइड्रेट करे)
    सर्दियों में ग्लो और नरमी बनाए रखने के लिए ओट्स और दूध का फेस पैक बहुत फायदेमंद है।
    बनाने का तरीका:2 बड़े चम्मच ओट्स लें और उसमें 3 बड़े चम्मच दूध मिलाकर पेस्ट बना लें।
    चेहरे पर 15-20 मिनट लगाकर फिर धो लें।

    फायदा:ओट्स स्किन की डेड सेल्स हटाकर एक्सफोलिएट करता है, वहीं दूध स्किन को हाइड्रेट करके नरम बनाता है।

    2) शहद-नींबू फेस पैक (ग्लो और ब्राइटनिंग)
    शहद में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं और यह स्किन को नर्म बनाता है। नींबू त्वचा की रंगत को हल्का कर ब्राइटनेस देता है।
    बनाने का तरीका:1 चम्मच शहद में 2-3 बूंद नींबू का रस मिलाएं, जरूरत अनुसार गुलाबजल डालकर पेस्ट तैयार करें।
    चेहरे को हल्का गीला करके 10-15 मिनट लगाएं और फिर धो लें।
    सावधानियां:अगर आपकी स्किन संवेदनशील है, तो नींबू की मात्रा कम रखें और धूप में बाहर जाने से पहले यह पैक न लगाएं।

    3) कॉफी फेस पैक (टैनिंग हटाने के लिए बेस्ट)
    धूप से हुए कालेपन और टैनिंग को हटाने के लिए कॉफी फेस पैक असरदार है।
    बनाने का तरीका:2 चम्मच कॉफी पाउडर + 1 चम्मच शहद + जरूरत अनुसार दूध मिलाकर पेस्ट बनाएं।
    15-20 मिनट बाद धो लें।
    फायदा:कॉफी स्किन को एक्सफोलिएट कर टैनिंग कम करती है, शहद से त्वचा नरम होती है और दूध से हाइड्रेशन मिलता है।
    4) पपीते का फेस पैक (स्किन में ग्लो और ब्राइटनेस)
    पपीता विटामिन-सी और एंजाइम से भरपूर होता है, जो स्किन को ग्लो देता है।
    बनाने का तरीका:
    एक पका पपीता मैश करके उसमें थोड़ा कच्चा दूध मिलाएं।
    पेस्ट को चेहरे पर 10-15 मिनट लगाकर धो लें।
    फायदा:पपीता त्वचा की डेड सेल्स हटाकर ग्लो बढ़ाता है और दूध त्वचा को नरम बनाए रखता है।
  • पानी में ज्यादा देर रहते ही क्यों सिकुड़ने लगती हैं उंगलियां? जानें इसके पीछे का साइंस

    पानी में ज्यादा देर रहते ही क्यों सिकुड़ने लगती हैं उंगलियां? जानें इसके पीछे का साइंस

    नई दिल्ली।  पानी में उंगलियों का सिकुड़ना स्किन नहीं, दिमाग का कमाल है. यह शरीर की एक स्मार्ट ट्रिक है, जो गीली चीजें पकड़ने में हमारी मदद करती है. आइए जान लेते हैं कि ऐसा क्यों होता है?
    पानी में उंगलियां सिकुड़ना
    आपने भी गौर किया होगा कि नहाते समय या ज्यादा देर तक पानी में रहने के बाद अचानक आपकी उंगलियां सिकुड़ जाती हैं और उन पर झुर्रियां सी बन जाती हैं. पहली नजर में लगता है जैसे त्वचा ने पानी सोख लिया हो, लेकिन असली कहानी इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है. यह बदलाव सिर्फ त्वचा का नहीं, बल्कि हमारे दिमाग और नसों का कमाल है. यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे शरीर की एक स्मार्ट ट्रिक मानते हैं.

    पानी में जाते ही उंगलियां क्यों बदल जाती हैं?

    जब हम लंबे समय तक पानी में रहते हैं, तो हाथों और पैरों की उंगलियों की त्वचा धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है. आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि स्किन ने पानी सोख लिया है, लेकिन वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि इसका कारण पानी नहीं, बल्कि हमारा नर्वस सिस्टम है. यह पूरी प्रक्रिया दिमाग के कंट्रोल में होती है और इसे एक न्यूरोलॉजिकल रिएक्शन माना जाता है.

    दिमाग कैसे देता है सिकुड़ने का सिग्नल?

    जैसे ही उंगलियां पानी में ज्यादा देर तक रहती हैं, वहां मौजूद नसें एक्टिव हो जाती हैं. ये नसें दिमाग को संकेत भेजती हैं, जिसके बाद ब्लड वेसल्स यानी खून की नलिकाएं सिकुड़ने लगती हैं. जब उंगलियों में खून की मात्रा कम हो जाती है, तो ऊपर की त्वचा अंदर की ओर खिंच जाती है. इसी खिंचाव की वजह से स्किन पर झुर्रियां दिखाई देने लगती हैं.

    क्या यह कोई बीमारी है?

    नहीं, बिल्कुल नहीं. पानी में उंगलियों का सिकुड़ना पूरी तरह से सामान्य प्रक्रिया है. बल्कि डॉक्टर इसे इस बात का संकेत मानते हैं कि आपकी नसें सही तरीके से काम कर रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों की नसों में गंभीर नुकसान होता है, उनकी उंगलियां पानी में भी नहीं सिकुड़तीं हैं. यानी यह झुर्रियां दिखना शरीर के हेल्दी होने का एक इशारा भी है.

    सिकुड़ने से हमें क्या फायदा मिलता है?

    यह बदलाव सिर्फ देखने के लिए नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक फायदा भी छिपा है. सिकुड़ी हुई उंगलियों से गीली चीजों को पकड़ना आसान हो जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि झुर्रियों की वजह से स्किन पर ग्रूव्स बन जाते हैं, जिससे पानी बाहर निकल जाता है और पकड़ मजबूत हो जाती है. ठीक वैसे ही जैसे गाड़ी के टायरों में बनी ग्रिप गीली सड़क पर मदद करती है.

    शरीर की स्मार्ट डिजाइन

    इंसान का शरीर हालात के हिसाब से खुद को ढालने में माहिर है. पानी में उंगलियों का सिकुड़ना उसी का एक उदाहरण है. यह प्रक्रिया अपने आप शुरू होती है और पानी से बाहर आते ही धीरे-धीरे खत्म भी हो जाती है. इसमें किसी तरह की दवा या इलाज की जरूरत नहीं होती.

    कब हो सकता है चिंता का विषय?

    अगर लंबे समय तक पानी में रहने के बाद भी उंगलियां बिल्कुल नहीं सिकुड़तीं, तो डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है. यह नसों से जुड़ी किसी समस्या का संकेत हो सकता है. हालांकि ज्यादातर मामलों में यह पूरी तरह नॉर्मल होता है और चिंता की कोई बात नहीं होती है.

  • 2026 की सबसे प्रतीक्षित फिल्म में 60 साल के ‘किंग’ का एक्शन धमाका, बेटी सुहाना संग पहली बार बड़े पर्दे पर दिखेगा जादू

    2026 की सबसे प्रतीक्षित फिल्म में 60 साल के ‘किंग’ का एक्शन धमाका, बेटी सुहाना संग पहली बार बड़े पर्दे पर दिखेगा जादू

    नई दिल्ली।  साल 2026 सिनेमा प्रेमियों के लिए बेहद खास होने वाला है। एक तरफ जहां कई बड़ी फिल्मों की रिलीज का इंतजार किया जा रहा है, वहीं IMDb ने मोस्ट एंटीसिपेटेड इंडियन फिल्मों की लिस्ट जारी कर दी है। इस लिस्ट में पांच अलग-अलग भाषाओं की 20 फिल्में शामिल हैं, लेकिन जो फिल्म सबसे ऊपर रही, उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह फिल्म है बॉलीवुड के असली ‘किंग’ शाहरुख खान की अपकमिंग मूवी ‘किंग’।

    60 साल की उम्र में भी शाहरुख खान एक बार फिर धमाकेदार एक्शन अवतार में बड़े पर्दे पर लौटने जा रहे हैं। खास बात यह है कि इस फिल्म में वे पहली बार अपनी बेटी सुहाना खान के साथ स्क्रीन शेयर करते नजर आएंगे, जिसने फैंस की एक्साइटमेंट को कई गुना बढ़ा दिया है।

    सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनेगी मेगा एक्शन फिल्म

    फिल्म ‘किंग’ का निर्देशन कर रहे हैं सिद्धार्थ आनंद, जो इससे पहले ‘पठान’ और ‘वॉर’ जैसी ब्लॉकबस्टर एक्शन फिल्में दे चुके हैं। ऐसे में दर्शकों को शाहरुख के स्टाइलिश एक्शन और हाई-ऑक्टेन ड्रामा की पूरी उम्मीद है। फिल्म में दीपिका पादुकोण, रानी मुखर्जी, अभिषेक बच्चन, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और जयदीप अहलावत जैसे बड़े सितारे भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे।

    ‘रामायण पार्ट 1’ को पछाड़कर टॉप पर पहुंची ‘किंग’

    IMDb की इस लिस्ट में शाहरुख खान की ‘किंग’ ने नितेश तिवारी की ‘रामायण: पार्ट 1’ को पीछे छोड़ते हुए पहला स्थान हासिल किया है। ‘रामायण पार्ट 1’ इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर है, जबकि थलपति विजय की ‘जन नायकन’ ने टॉप-3 में जगह बनाई है। भले ही ‘जन नायकन’ इस वक्त CBFC सर्टिफिकेट विवाद में फंसी हो, लेकिन दर्शकों की उत्सुकता कम नहीं हुई है।

    साउथ फिल्मों का दबदबा

    IMDb की मोस्ट एंटीसिपेटेड लिस्ट में इस बार साउथ फिल्मों का जबरदस्त दबदबा देखने को मिला है। प्रभास की फिल्म ‘स्पिरिट’ चौथे नंबर पर है, जबकि यश की ‘टॉक्सिक’ पांचवें स्थान पर रही। सलमान खान की वॉर ड्रामा फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ छठे नंबर पर है, वहीं सनी देओल की ‘बॉर्डर 2’ ने टॉप-10 में जगह बना ली है। आलिया भट्ट की फिल्म ‘अल्फा’ भी इस लिस्ट में शामिल है।

    25 करोड़ दर्शकों की पसंद से बनी लिस्ट

    IMDb इंडिया के मुताबिक, यह लिस्ट किसी सर्वे पर आधारित नहीं है, बल्कि दुनियाभर के 25 करोड़ से ज्यादा मासिक विजिटर्स द्वारा देखे गए पेज व्यूज के आधार पर तैयार की गई है। इस लिस्ट में 10 हिंदी, 5 तेलुगु, 3 तमिल, 1 मलयालम और 1 कन्नड़ फिल्म शामिल हैं।

    स्टार्स का डबल धमाका

    इस लिस्ट में कई सितारों की दो-दो फिल्में शामिल हैं। यश, प्रभास, सनी देओल, रणबीर कपूर, आलिया भट्ट और नयनतारा जैसे सितारों का डबल धमाका साफ दिखता है, जो बताता है कि दर्शकों का भरोसा इन स्टार्स और उनकी फिल्मों पर कितना मजबूत है।

  • Honeymoon Place in Winter: सर्दियों में हनीमून के लिए भारत की सबसे रोमांटिक जगहें

    Honeymoon Place in Winter: सर्दियों में हनीमून के लिए भारत की सबसे रोमांटिक जगहें

    नई दिल्ली।  शादी के बाद हर कपल के लिए हनीमून जिंदगी का सबसे खूबसूरत दौर होता है। यही वह समय होता है जब दो लोग एक-दूसरे को बेहतर समझते हैं और साथ में यादगार पल बिताते हैं। अक्सर लोग हनीमून के लिए यूरोप का सपना देखते हैं, जहां बर्फीली वादियां, झीलें और पहाड़ हों। लेकिन अगर आप सर्दियों में भारत में ही हनीमून प्लान कर रहे हैं, तो यहां ऐसी कई जगहें हैं जो किसी विदेशी डेस्टिनेशन से कम नहीं हैं।

    गुलमर्ग, जम्मू और कश्मीर

    गुलमर्ग को भारत का विंटर वंडरलैंड कहा जाता है। सर्दियों में यहां बर्फ की चादर बिछ जाती है और पूरा इलाका किसी रोमांटिक फिल्म के सीन जैसा लगने लगता है। यहां आप दुनिया की सबसे ऊंची गोंडोला केबल कार की सवारी कर सकते हैं, बर्फबारी का आनंद ले सकते हैं और बर्फीली वादियों में अपने पार्टनर के साथ हाथ थामकर घूम सकते हैं। रोमांस और एडवेंचर का परफेक्ट कॉम्बिनेशन गुलमर्ग में मिलता है।

    औली, उत्तराखंड

    औली को मिनी स्विट्जरलैंड ऑफ इंडिया कहा जाता है। बर्फ से ढकी पहाड़ियां, शांत माहौल और स्कीइंग का रोमांच—ये सब औली को हनीमून कपल्स के लिए खास बनाते हैं। दिसंबर से मार्च के बीच औली का नजारा बेहद रोमांटिक होता है। अगर आप शांति, प्रकृति और रोमांस चाहते हैं, तो औली एक बेहतरीन विकल्प है।

    मनाली, हिमाचल प्रदेश

    मनाली नए शादीशुदा जोड़ों के बीच सबसे लोकप्रिय हनीमून डेस्टिनेशन में से एक है। यहां सोलांग वैली में पैराग्लाइडिंग, रोहतांग पास में बर्फ, और कैफे कल्चर कपल्स को खूब आकर्षित करता है। सर्दियों में मनाली की ठंड, बर्फ और पहाड़ों के बीच बिताया गया समय हनीमून को यादगार बना देता है।

    सिक्किम

    सिक्किम उन कपल्स के लिए है जो भीड़ से दूर शांति और प्राकृतिक सुंदरता चाहते हैं। गंगटोक से कंचनजंगा के नजारे किसी सिनेमाई दृश्य से कम नहीं लगते। वहीं लाचुंग और युमथांग घाटी किसी स्विस पोस्टकार्ड जैसी दिखाई देती हैं। यहां का शांत वातावरण और ठंडी हवा हनीमून के लिए परफेक्ट है।

    अंडमान और निकोबार

    अगर आप बर्फ नहीं, बल्कि समुद्र और बीच के दीवाने हैं, तो अंडमान और निकोबार आपके लिए बेस्ट है। यहां के साफ-सुथरे समुद्र तट, स्कूबा डाइविंग, स्नॉर्कलिंग और रोमांटिक सनसेट हनीमून को खास बना देते हैं। यह जगह सर्दियों में कपल्स के बीच बेहद लोकप्रिय रहती है।

  • गले की खराश और दर्द को कहें अलविदा! सर्दियों में अपनाएं ये असरदार घरेलू उपाय

    गले की खराश और दर्द को कहें अलविदा! सर्दियों में अपनाएं ये असरदार घरेलू उपाय


    नई दिल्ली। सर्दियों के मौसम में ठंडी हवा, प्रदूषण और कमजोर इम्युनिटी की वजह से गले में दर्द, खराश, खांसी और जुकाम की समस्या आम हो जाती है। कई बार सही समय पर ध्यान न देने से यह परेशानी बढ़कर इंफेक्शन का रूप भी ले सकती है। ऐसे में दवाइयों के साथ-साथ कुछ घरेलू और आयुर्वेदिक उपाय बेहद कारगर साबित हो सकते हैं।

    लहसुन से बढ़ाएं रोग प्रतिरोधक क्षमता
    लहसुन में मौजूद एलिसिन तत्व में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। यह गले में सूजन और संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करता है। रोज़ 1–2 कली लहसुन का सेवन सर्दी-जुकाम और गले की खराश से बचाव करता है।

    अदरक, काली मिर्च और तुलसी वाली चाय
    अगर गले में दर्द या बैठापन महसूस हो रहा है तो अदरक, काली मिर्च और तुलसी डालकर बनाई गई गर्म चाय बेहद फायदेमंद होती है।
    अदरक सूजन कम करता है
    काली मिर्च बलगम निकालने में मदद करती है
    तुलसी इम्युनिटी को मजबूत बनाती है
    यह चाय शरीर को गर्म रखती है और गले को राहत देती है।

    मुलेठी: आयुर्वेदिक रामबाण
    आयुर्वेद में मुलेठी को गले की बीमारियों के लिए कारगर माना गया है। मुलेठी का छोटा टुकड़ा धीरे-धीरे चूसने से इसका रस गले की खराश को शांत करता है और खांसी में आराम देता है।

    शहद से मिले प्राकृतिक आराम
    शहद में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं।

    यह गले की जलन को कम करता है और खांसी को शांत करता है। गुनगुने पानी या हर्बल चाय में शहद मिलाकर पीना बेहद लाभकारी होता है।

    ओटमील और पोषक आहार का सेवन
    ओटमील में जिंक, मैग्नीशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो इम्युन सिस्टम को मजबूत करते हैं। इसमें केला, शहद, दालचीनी और थोड़ा अदरक मिलाकर खाने से गले को आराम मिलता है और शरीर को जरूरी पोषण भी मिलता है।
    कब जाएं डॉक्टर के पास?
    अगर गले का दर्द 3–4 दिन से ज्यादा बना रहे, बुखार हो, निगलने में परेशानी हो या आवाज लगातार बैठी रहे, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

  • शंख भस्म: हड्डियों और पेट की सेहत के लिए आयुर्वेद का चमत्कारी खजाना

    शंख भस्म: हड्डियों और पेट की सेहत के लिए आयुर्वेद का चमत्कारी खजाना


    नई दिल्ली। आयुर्वेद सदियों से जड़ी-बूटियों और भस्मों के माध्यम से स्वास्थ्य को सुधारने का अनमोल ज्ञान देता आया है। इस कड़ी में शंख भस्म एक ऐसा खजाना है जिसे आयुर्वेद में चमत्कारी भस्म के रूप में जाना जाता है। इसे मुख्यतः पेट और हड्डियों की बीमारियों में लाभकारी माना गया है।शंख भस्म मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट से बनती है। इसका उपयोग एसिड रिफ्लक्स, पेट की जलन और पाचन से जुड़ी समस्याओं में किया जाता है। आयुर्वेदिक विशेषज्ञ बताते हैं कि शंख भस्म पेट की पाचन अग्नि को रीसेट करती है, जिससे भोजन बेहतर ढंग से पचता है और गैस, पेट दर्द, उल्टी जैसी परेशानियों में राहत मिलती है।

    हड्डियों और जोड़ों के लिए वरदान:
    शंख भस्म कैल्शियम से भरपूर होने के कारण हड्डियों को मजबूत बनाने ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने और दांतों की मजबूती बनाए रखने में सहायक होती है। शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर भी शंख भस्म लाभकारी है। खास बात यह है कि यह वात और कफ दोषों को संतुलित करने में भी मदद करती है, जिससे शरीर में असंतुलन की वजह से होने वाली बीमारियों को रोका जा सकता है।

    त्वचा और सौंदर्य में भी उपयोगी:
    शंख भस्म का लेपन या सेवन चेहरे पर मुहांसों, दाग-धब्बों और त्वचा की समस्याओं में भी लाभकारी माना गया है। आयुर्वेद में इसे न केवल आंतरिक स्वास्थ्य बल्कि बाहरी सुंदरता और त्वचा की चमक बनाए रखने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

    सुरक्षित उपयोग:
    ध्यान रखें कि शंख भस्म को सीधा नहीं खाना चाहिए। इसे किसी आयुर्वेदिक मिश्रण या चिकित्सा के अनुसार लिया जाता है। सेवन की मात्रा और तरीका रोग और शरीर की स्थिति के अनुसार अलग-अलग होता है। गर्भवती महिलाएं और बच्चों के लिए चिकित्सक की सलाह आवश्यक है। संक्षेप में शंख भस्म आयुर्वेद का एक ऐसा खनिज है, जो पाचन, हड्डियों, जोड़ों और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है। इसके नियमित और सही उपयोग से शरीर में ऊर्जा, संतुलन और मजबूती आती है।

  • नहाते समय कान में चला गया पानी? घरेलू उपायों से मिल सकती है राहत, लापरवाही बढ़ा सकती है संक्रमण का खतरा

    नहाते समय कान में चला गया पानी? घरेलू उपायों से मिल सकती है राहत, लापरवाही बढ़ा सकती है संक्रमण का खतरा

    नई दिल्ली । नहाते समय या बाल धोते वक्त कान में पानी चला जाना एक आम समस्या हैजिसे अधिकतर लोग हल्के में ले लेते हैं। हालांकि डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह छोटी-सी परेशानी समय पर ध्यान न देने पर गंभीर रूप ले सकती है। कान में फंसा पानी न सिर्फ असहजता पैदा करता हैबल्कि संक्रमणदर्द और सुनने की क्षमता पर असर जैसी समस्याओं का कारण भी बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि सही और सुरक्षित तरीकों से ही इस समस्या से राहत पाई जाए। विशेषज्ञों के अनुसारजब नहाते समय तेज दबाव के साथ पानी कान में प्रवेश करता हैतो वह ईयर कैनाल में फंस सकता है। कान की बनावट और अंदर मौजूद ईयर वैक्स कान का मैल कई बार पानी को बाहर निकलने से रोक देता है।
    इससे कान भारी लगने लगता हैआवाजें साफ सुनाई नहीं देतीं और एक अजीब-सी झनझनाहट महसूस होती है। लंबे समय तक नमी बनी रहने से कान के अंदर गर्म और नम वातावरण बन जाता हैजो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल होता है। यही कारण है कि लापरवाही करने पर इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि सबसे आसान और सुरक्षित घरेलू उपाय गुरुत्वाकर्षण (ग्रैविटी) का इस्तेमाल करना है। जिस कान में पानी गया होउस तरफ सिर झुकाकर कुछ मिनट तक लेटना कई बार पानी को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त होता है। इसी दौरान कान की लोब को हल्के से नीचे और बाहर की ओर खींचने से ईयर कैनाल सीधी होती है और फंसा हुआ पानी बाहर निकल सकता है।

    कुछ मामलों में हेयर ड्रायर का उपयोग भी मददगार हो सकता है। ड्रायर को कम गर्मी या ठंडी हवा के मोड पर रखकर कान से सुरक्षित दूरी पर इस्तेमाल किया जाए तो अंदर की नमी सूख सकती है। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ड्रायर को बहुत पास लाना या ज्यादा देर तक गर्म हवा देना नुकसानदेह हो सकता है। डॉक्टर साफ तौर पर बताते हैं कि कान में कॉटन बडपिनमाचिस की तीली या किसी भी नुकीली वस्तु का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इससे कान की अंदरूनी त्वचा को चोट लग सकती है और ईयर ड्रम के फटने का भी खतरा रहता है। इसी तरह जबरदस्ती फूंक मारना या किसी तरल पदार्थ को कान में डालना स्थिति को और बिगाड़ सकता है।

    यदि 24 घंटे से अधिक समय तक कान में पानी भरा हुआ महसूस होदर्दखुजली या जलन शुरू हो जाएया कान से पीले रंग का स्राव निकलने लगेतो तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। जिन लोगों का पहले कान का ऑपरेशन हो चुका हो या जिनके कान के पर्दे में छेद की समस्या रही होउन्हें घरेलू उपाय करने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञों की सलाह है कि नहाते समय या तैराकी के दौरान ईयर प्लग का इस्तेमाल किया जाए। जरूरत पड़ने पर कॉटन पर हल्की वैसलीन लगाकर कान में रखा जा सकता हैताकि पानी अंदर न जाए। साथ ही बार-बार कान साफ करने की आदत से भी बचना चाहिएक्योंकि इससे ईयर वैक्स का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है।