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  • तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच

    तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच


    नई दिल्ली । मानसून के साथ हर साल मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। इनमें मलेरिया सबसे गंभीर संक्रामक रोगों में शामिल है। कई लोग तेज बुखार ठंड लगना और शरीर दर्द जैसी शुरुआती परेशानियों को सामान्य वायरल संक्रमण समझकर घरेलू इलाज करते रहते हैं। यही लापरवाही बीमारी को गंभीर रूप दे सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार मलेरिया से होने वाली जटिलताओं को काफी हद तक रोक सकता है।

    मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह संक्रमण शरीर में प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं इसलिए कई बार मरीज सही समय पर जांच नहीं करा पाते। यदि किसी व्यक्ति को बार बार तेज बुखार आ रहा हो ठंड लग रही हो अत्यधिक पसीना आ रहा हो सिर और शरीर में तेज दर्द हो या लगातार कमजोरी महसूस हो रही हो तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि बुखार 24 से 48 घंटे के भीतर ठीक नहीं हो रहा है या बुखार की दवा लेने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है तो मलेरिया की जांच कराना जरूरी हो जाता है। खासकर ऐसे लोग जो मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं या हाल ही में ऐसे स्थानों की यात्रा करके लौटे हैं उन्हें किसी भी तरह की देरी नहीं करनी चाहिए।

    समय पर जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ मामलों में प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम नामक परजीवी से होने वाला मलेरिया बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इलाज में देरी होने पर संक्रमण दिमाग किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है। गंभीर एनीमिया सांस लेने में परेशानी और मल्टी ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा स्थितियां भी विकसित हो सकती हैं। इसलिए बिना जांच के स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह पर ही उपचार शुरू करना चाहिए।

    मलेरिया की पुष्टि के लिए कई तरह की जांच उपलब्ध हैं। सबसे सामान्य जांच माइक्रोस्कोपी है जिसमें रक्त की स्लाइड के माध्यम से परजीवी की पहचान की जाती है। जहां यह सुविधा उपलब्ध नहीं होती वहां रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट यानी आरडीटी का उपयोग किया जाता है जो कम समय में परिणाम दे देता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में क्वांटिटेटिव बफी कोट टेस्ट और पीसीआर जांच भी कराई जाती है जो संक्रमण की अधिक सटीक पहचान करने में मदद करती हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच होने से मरीज को सही दवा जल्दी मिल जाती है और बीमारी के गंभीर रूप लेने की संभावना काफी कम हो जाती है। साथ ही बिना जरूरत एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवा लेने से भी बचा जा सकता है जिससे दवा प्रतिरोध जैसी समस्याएं नहीं बढ़तीं।

    मलेरिया से बचाव के लिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें। कूलर गमले और टंकियों की नियमित सफाई करें। पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। यदि परिवार में किसी को लगातार बुखार आ रहा हो तो घरेलू इलाज में समय गंवाने के बजाय तुरंत जांच कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

  • स्किन को रखना है हेल्दी और ग्लोइंग तो अपनाएं ये आसान आदतें त्वचा रहेगी लंबे समय तक जवान

    स्किन को रखना है हेल्दी और ग्लोइंग तो अपनाएं ये आसान आदतें त्वचा रहेगी लंबे समय तक जवान


    नई दिल्ली । स्वस्थ और चमकदार त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन इसके लिए केवल महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट ही जरूरी नहीं होते। त्वचा की असली खूबसूरती अंदर से शुरू होती है। संतुलित खानपान पर्याप्त पानी नियमित देखभाल और स्वस्थ जीवनशैली मिलकर त्वचा को लंबे समय तक जवां और निखरी हुई बनाए रखने में मदद करते हैं। यदि रोजमर्रा की कुछ आसान आदतों को अपनाया जाए तो त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है।

    त्वचा की देखभाल का पहला नियम है उसकी नियमित सफाई। दिनभर धूल मिट्टी प्रदूषण और पसीना त्वचा पर जमा होकर रोमछिद्रों को बंद कर देते हैं। इसलिए सुबह और रात अपने स्किन टाइप के अनुसार हल्के फेस क्लेंजर से चेहरा साफ करना चाहिए। इससे त्वचा साफ रहती है और मुंहासों का खतरा भी कम होता है।

    सफाई के बाद त्वचा को मॉइस्चराइज करना भी उतना ही जरूरी है। कई लोग मानते हैं कि केवल रूखी त्वचा वालों को ही मॉइस्चराइजर की जरूरत होती है लेकिन तैलीय त्वचा को भी उचित नमी की आवश्यकता होती है। सही मॉइस्चराइजर त्वचा की प्राकृतिक नमी बनाए रखता है और उसे मुलायम तथा स्वस्थ बनाता है।

    धूप से बचाव भी स्किन केयर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तेज धूप में मौजूद अल्ट्रावायलेट किरणें त्वचा को समय से पहले बूढ़ा बना सकती हैं और झाइयों तथा सनबर्न जैसी समस्याएं पैदा कर सकती हैं। घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना और तेज धूप में लंबे समय तक रहने से बचना त्वचा की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहरी देखभाल से नहीं आती बल्कि खानपान का भी इसमें बड़ा योगदान होता है। ताजे फल हरी सब्जियां सूखे मेवे और प्रोटीन से भरपूर भोजन त्वचा को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। विटामिन सी विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट युक्त आहार त्वचा की कोशिकाओं को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। इसके साथ ही दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर और त्वचा दोनों हाइड्रेट रहते हैं जिससे प्राकृतिक निखार बना रहता है।

    अच्छी नींद और तनाव पर नियंत्रण भी त्वचा के लिए बेहद जरूरी है। पर्याप्त नींद न मिलने और लगातार तनाव रहने से त्वचा बेजान दिखने लगती है तथा मुंहासे और समय से पहले झुर्रियां आने का खतरा बढ़ सकता है। नियमित व्यायाम और योग से रक्त संचार बेहतर होता है जिससे त्वचा तक ऑक्सीजन और पोषण आसानी से पहुंचता है।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बिना जरूरत बार बार नए ब्यूटी प्रोडक्ट बदलने से बचना चाहिए। किसी भी नए उत्पाद का उपयोग करने से पहले उसकी गुणवत्ता और अपनी त्वचा के अनुसार उसकी उपयुक्तता जरूर जांच लें। यदि त्वचा पर लगातार खुजली लालिमा दाने या अन्य गंभीर समस्या दिखाई दे तो स्वयं उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

    स्वस्थ त्वचा किसी एक दिन में नहीं बनती बल्कि यह नियमित देखभाल और अच्छी आदतों का परिणाम होती है। यदि सही स्किन केयर रूटीन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए तो लंबे समय तक त्वचा को स्वस्थ चमकदार और आकर्षक बनाए रखा जा सकता है।

  • सिर्फ सिगरेट नहीं ये आदतें भी पुरुषों की फर्टिलिटी पर डालती हैं बुरा असर जानिए लो स्पर्म काउंट के बड़े कारण

    सिर्फ सिगरेट नहीं ये आदतें भी पुरुषों की फर्टिलिटी पर डालती हैं बुरा असर जानिए लो स्पर्म काउंट के बड़े कारण


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पुरुषों की प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें लो स्पर्म काउंट यानी वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम होना एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है। अधिकांश लोग मानते हैं कि केवल सिगरेट तंबाकू या शराब का सेवन ही इसका कारण है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई अन्य शारीरिक और जीवनशैली से जुड़े कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। समय रहते इन कारणों की पहचान और सही उपचार से पिता बनने की संभावना को बेहतर बनाया जा सकता है।

    चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार जब एक मिलीलीटर वीर्य में लगभग डेढ़ करोड़ से कम शुक्राणु पाए जाते हैं तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है। यदि वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं होते तो इसे एजूस्पर्मिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है लेकिन आधुनिक चिकित्सा के जरिए कई मामलों में इसका सफल उपचार संभव है।

    लो स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक नियमित प्रयास के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता। कई पुरुषों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। हालांकि कुछ मामलों में यौन इच्छा में कमी इरेक्शन की समस्या अंडकोष में दर्द सूजन या गांठ जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि धूम्रपान और तंबाकू के अलावा मोटापा लगातार मानसिक तनाव अत्यधिक शराब का सेवन नशीले पदार्थों का उपयोग हार्मोन असंतुलन और अनियमित जीवनशैली भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा वैरिकोसील थायरॉयड विकार कुछ संक्रमण और लंबे समय तक कुछ दवाओं का सेवन भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

    यदि कोई दंपती बिना गर्भनिरोधक के एक वर्ष तक नियमित संबंध बनाने के बाद भी संतान प्राप्ति में सफल नहीं हो पाता तो पुरुष और महिला दोनों की जांच कराना आवश्यक माना जाता है। जिन पुरुषों को पहले से अंडकोष प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही हो उन्हें बिना देरी चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच से समस्या का कारण पता लगाया जा सकता है और उसके अनुसार इलाज शुरू किया जा सकता है।

    अच्छी बात यह है कि हर लो स्पर्म काउंट का मामला स्थायी बांझपन नहीं होता। संतुलित आहार नियमित व्यायाम पर्याप्त नींद तनाव पर नियंत्रण और स्वस्थ वजन बनाए रखने से शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। धूम्रपान तंबाकू और शराब से दूरी बनाना भी बेहद जरूरी है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाओं हार्मोन थेरेपी या आधुनिक फर्टिलिटी तकनीकों की मदद से इलाज की सलाह दे सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों को अपनी प्रजनन क्षमता को लेकर खुलकर बात करनी चाहिए और किसी भी समस्या को छिपाने के बजाय समय पर जांच करानी चाहिए। सही जीवनशैली नियमित स्वास्थ्य जांच और विशेषज्ञ की सलाह से अधिकांश मामलों में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। जागरूकता और समय पर उपचार ही स्वस्थ पितृत्व की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

  • स्वस्थ रहना है तो आज ही बदलें ये आदतें जानिए हेल्दी लाइफस्टाइल के आसान और असरदार उपाय

    स्वस्थ रहना है तो आज ही बदलें ये आदतें जानिए हेल्दी लाइफस्टाइल के आसान और असरदार उपाय


    नई दिल्ली । स्वस्थ शरीर ही सुखी जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग काम के दबाव और अनियमित दिनचर्या के कारण अपनी सेहत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। इसका परिणाम मोटापा मधुमेह उच्च रक्तचाप हृदय रोग और मानसिक तनाव जैसी समस्याओं के रूप में सामने आता है। यदि कुछ आसान और नियमित आदतों को अपनाया जाए तो लंबे समय तक स्वस्थ और ऊर्जावान जीवन जिया जा सकता है।

    अच्छी सेहत की शुरुआत संतुलित और पौष्टिक भोजन से होती है। रोजाना के भोजन में हरी सब्जियां मौसमी फल साबुत अनाज दालें दूध दही सूखे मेवे और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करें। तला भुना भोजन अधिक चीनी नमक और पैकेज्ड फूड का सेवन सीमित रखें। भोजन हमेशा समय पर करें और अधिक खाने से बचें।

    शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमित व्यायाम भी उतना ही जरूरी है। प्रतिदिन कम से कम तीस से पैंतालीस मिनट तक तेज चलना योग दौड़ना साइकिल चलाना या कोई भी शारीरिक गतिविधि करने से शरीर फिट रहता है। व्यायाम न केवल वजन नियंत्रित रखता है बल्कि हृदय मांसपेशियों और हड्डियों को भी मजबूत बनाता है।

    पर्याप्त पानी पीना भी अच्छी सेहत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दिनभर में पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है पाचन बेहतर होता है और शरीर से विषैले तत्व बाहर निकलने में मदद मिलती है।

    अच्छी नींद स्वस्थ जीवन की बुनियाद मानी जाती है। हर व्यक्ति को प्रतिदिन सात से आठ घंटे की गहरी नींद लेनी चाहिए। पर्याप्त नींद लेने से शरीर की मरम्मत होती है रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।

    मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य। तनाव को कम करने के लिए योग ध्यान प्राणायाम संगीत पढ़ाई या अपनी पसंद के किसी शौक के लिए समय निकालें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने से भी मानसिक संतुलन बना रहता है।

    धूम्रपान शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूरी बनाना स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। ये आदतें कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।

    समय समय पर स्वास्थ्य जांच कराना भी जरूरी है। रक्तचाप शुगर कोलेस्ट्रॉल और अन्य आवश्यक जांच नियमित रूप से करवाने से बीमारियों का समय रहते पता चल जाता है और उनका उपचार आसान हो जाता है।

    स्वस्थ जीवन का मतलब केवल बीमारी से बचना नहीं बल्कि शारीरिक मानसिक और सामाजिक रूप से संतुलित जीवन जीना है। यदि नियमित दिनचर्या पौष्टिक भोजन पर्याप्त नींद व्यायाम और सकारात्मक सोच को जीवन का हिस्सा बना लिया जाए तो व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ सक्रिय और खुशहाल जीवन जी सकता है।

  • स्किन को रखें हमेशा जवान और चमकदार जानें रोजाना की सही स्किन केयर टिप्स

    स्किन को रखें हमेशा जवान और चमकदार जानें रोजाना की सही स्किन केयर टिप्स

    नई दिल्ली । स्वस्थ और चमकदार त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन इसके लिए केवल महंगे कॉस्मेटिक उत्पादों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। सही दिनचर्या संतुलित आहार और नियमित देखभाल से त्वचा लंबे समय तक स्वस्थ और खूबसूरत बनी रह सकती है। त्वचा की देखभाल का पहला नियम है कि उसे हमेशा साफ रखें। दिन में दो बार अपनी स्किन टाइप के अनुसार हल्के फेसवॉश से चेहरा साफ करें ताकि धूल मिट्टी अतिरिक्त तेल और प्रदूषण से त्वचा को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।

    चेहरा धोने के बाद मॉइस्चराइजर लगाना बेहद जरूरी है। तैलीय त्वचा हो या रूखी हर प्रकार की त्वचा को नमी की आवश्यकता होती है। सही मॉइस्चराइजर त्वचा की प्राकृतिक नमी बनाए रखने में मदद करता है और उसे मुलायम बनाता है।

    धूप से बचाव भी स्किन केयर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं। तेज धूप त्वचा पर झुर्रियां पिग्मेंटेशन और समय से पहले एजिंग की समस्या पैदा कर सकती है। हर तीन से चार घंटे में जरूरत के अनुसार सनस्क्रीन दोबारा लगाना भी लाभदायक माना जाता है।

    स्वस्थ त्वचा के लिए पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है। दिनभर में आठ से दस गिलास पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है और त्वचा में प्राकृतिक चमक बनी रहती है। इसके साथ ही मौसमी फल हरी सब्जियां सूखे मेवे और प्रोटीन युक्त भोजन त्वचा को भीतर से पोषण देते हैं। अधिक तला भुना जंक फूड और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना चाहिए।

    अच्छी नींद भी त्वचा के लिए किसी प्राकृतिक उपचार से कम नहीं है। रोजाना सात से आठ घंटे की पर्याप्त नींद लेने से त्वचा खुद को रिपेयर करती है और चेहरा अधिक ताजा तथा चमकदार दिखाई देता है। तनाव कम रखने के लिए योग ध्यान और नियमित व्यायाम भी फायदेमंद होते हैं क्योंकि मानसिक तनाव का असर सीधे त्वचा पर दिखाई देता है।

    सप्ताह में एक या दो बार हल्का एक्सफोलिएशन करने से मृत कोशिकाएं हटती हैं और नई कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया बेहतर होती है। हालांकि बहुत अधिक स्क्रब करने से त्वचा को नुकसान भी हो सकता है इसलिए संतुलित देखभाल जरूरी है।

    यदि त्वचा पर लगातार मुंहासे दाग धब्बे एलर्जी या किसी प्रकार की गंभीर समस्या बनी रहती है तो घरेलू उपायों के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प होता है। सही देखभाल नियमित दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली अपनाकर लंबे समय तक स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से चमकदार त्वचा पाई जा सकती है।

  • 5 से 12 साल की उम्र में सही पोषण है सबसे बड़ी पूंजी, संतुलित आहार से मिलेगा तेज दिमाग और मजबूत शरीर

    5 से 12 साल की उम्र में सही पोषण है सबसे बड़ी पूंजी, संतुलित आहार से मिलेगा तेज दिमाग और मजबूत शरीर

    नई दिल्ली । पांच से बारह वर्ष की आयु बच्चों के संपूर्ण विकास का सबसे महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इसी उम्र में शरीर तेजी से बढ़ता है, मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत होती हैं तथा मस्तिष्क नई चीजों को सीखने और समझने की क्षमता विकसित करता है। ऐसे में संतुलित और पोषणयुक्त आहार बच्चों के वर्तमान स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके भविष्य की सेहत की भी मजबूत नींव तैयार करता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की दैनिक डाइट में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन शामिल होना चाहिए। प्रोटीन शरीर की कोशिकाओं के निर्माण, मांसपेशियों के विकास और ऊतकों की मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दाल, दूध, दही, पनीर, अंडा, सोया, चना और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ नियमित रूप से देने से बच्चों की शारीरिक वृद्धि बेहतर होती है और उनकी ताकत भी बढ़ती है।

    हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए कैल्शियम और विटामिन डी भी बेहद आवश्यक हैं। बढ़ती उम्र में हड्डियों का विकास तेज गति से होता है, इसलिए दूध, दही, पनीर, रागी और अन्य कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों को भोजन का हिस्सा बनाना चाहिए। साथ ही नियमित रूप से कुछ समय धूप में बिताने से शरीर को प्राकृतिक रूप से विटामिन डी प्राप्त करने में मदद मिलती है, जिससे हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं।

    फल और हरी सब्जियां बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें मौजूद विटामिन, खनिज और फाइबर शरीर को आवश्यक पोषण प्रदान करते हैं। रंग-बिरंगे फल और विभिन्न प्रकार की सब्जियां खाने वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत कम रहता है और उनका मानसिक विकास भी बेहतर माना जाता है।

    ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति के लिए साबुत अनाज को भोजन में शामिल करना लाभदायक होता है। गेहूं, ओट्स, दलिया, ब्राउन राइस और मल्टीग्रेन खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे बच्चे लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं और पढ़ाई या अन्य गतिविधियों के दौरान उनकी एकाग्रता बनी रहती है। इसके विपरीत अत्यधिक रिफाइंड आटे और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना बेहतर माना जाता है।

    दिमाग के स्वस्थ विकास के लिए हेल्दी फैट भी जरूरी है। बादाम, अखरोट, मूंगफली और विभिन्न बीजों में मौजूद पोषक तत्व याददाश्त, एकाग्रता और सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने में सहायक माने जाते हैं। इन्हें सीमित मात्रा में नियमित रूप से आहार में शामिल किया जा सकता है।

    पर्याप्त पानी पीना भी बच्चों के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पानी शरीर में तरल संतुलन बनाए रखने, पाचन प्रक्रिया को बेहतर करने और शरीर को सक्रिय रखने में मदद करता है। वहीं अत्यधिक मीठे पेय और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन कम करना चाहिए, क्योंकि इनके अधिक उपयोग से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बचपन से ही बच्चों में संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ खान-पान की आदतें विकसित की जाएं तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। यही आदतें आगे चलकर उन्हें स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान जीवन की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करती हैं।

  • आलू डालने से बढ़ेगा पुदीना या सिर्फ सोशल मीडिया का दावा? जानिए वायरल ट्रिक कितनी कारगर और पौधे को हरा-भरा रखने के सही उपाय

    आलू डालने से बढ़ेगा पुदीना या सिर्फ सोशल मीडिया का दावा? जानिए वायरल ट्रिक कितनी कारगर और पौधे को हरा-भरा रखने के सही उपाय

    नई दिल्ली । घर में ताजा और हरा-भरा पुदीना उगाना आजकल गार्डनिंग के शौकीनों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है। इसी बीच सोशल मीडिया पर एक ऐसी ट्रिक तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि गमले की मिट्टी में आलू का टुकड़ा दबाने से पुदीने की ग्रोथ तेजी से होती है और पौधा अधिक घना बनता है। हालांकि बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि इस दावे के समर्थन में कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं और इसे केवल एक घरेलू प्रयोग के रूप में देखा जाना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी पौधे की अच्छी वृद्धि का आधार उसकी मिट्टी, पोषण, नमी और नियमित देखभाल होती है। पुदीना विशेष रूप से ऐसी मिट्टी में बेहतर बढ़ता है जो भुरभुरी, उपजाऊ और जैविक पदार्थों से भरपूर हो। साथ ही मिट्टी में जल निकासी की उचित व्यवस्था होना भी आवश्यक है ताकि अतिरिक्त पानी जमा न हो और जड़ों को नुकसान न पहुंचे।

    वायरल वीडियो में यह दावा किया जाता है कि मिट्टी में रखा गया आलू धीरे-धीरे गलकर स्टार्च और कुछ जैविक तत्व छोड़ता है, जिससे पौधे को अतिरिक्त पोषण मिलता है। हालांकि बागवानी विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया का पुदीने की वृद्धि पर कितना प्रभाव पड़ता है, इसे लेकर कोई प्रमाणित अध्ययन उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग मौसम, मिट्टी और वातावरण के अनुसार इसके परिणाम भी भिन्न हो सकते हैं। इसलिए केवल इस उपाय पर निर्भर रहना उचित नहीं माना जाता।

    विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि पुदीने को घना और स्वस्थ बनाना है तो नियमित सिंचाई सबसे महत्वपूर्ण है। मिट्टी में हमेशा हल्की नमी बनी रहनी चाहिए, लेकिन पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए। अत्यधिक पानी से जड़ों में सड़न की समस्या हो सकती है, जिससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। इसी प्रकार हर 20 से 25 दिनों के अंतराल पर वर्मी कम्पोस्ट या अन्य जैविक खाद देने से पौधे को आवश्यक पोषक तत्व मिलते रहते हैं।

    पुदीने की नियमित कटाई भी उसकी अच्छी बढ़त का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि समय-समय पर ऊपरी टहनियों और पत्तियों की छंटाई करने से नई शाखाएं तेजी से निकलती हैं और पौधा अधिक घना दिखाई देता है। यदि पौधा पुराना हो जाए तो उसकी स्वस्थ कटिंग लेकर नया पौधा तैयार करना भी एक प्रभावी तरीका माना जाता है।

    धूप का संतुलन भी पुदीने की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पौधे को ऐसी जगह रखना बेहतर होता है जहां सुबह की हल्की धूप मिले, जबकि दोपहर की तेज धूप से बचाव हो। इससे पत्तियां ताजा बनी रहती हैं और पौधे की वृद्धि लगातार होती रहती है। उचित प्रकाश और संतुलित नमी के साथ पुदीना लंबे समय तक स्वस्थ बना रह सकता है।

    बागवानी विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया पर साझा की जाने वाली कई गार्डनिंग ट्रिक्स रोचक जरूर होती हैं, लेकिन सभी उपाय हर परिस्थिति में प्रभावी नहीं होते। इसलिए किसी भी वायरल दावे को अपनाने से पहले उसकी विश्वसनीयता और व्यावहारिक उपयोगिता को समझना आवश्यक है। यदि उद्देश्य लंबे समय तक हरा-भरा और घना पुदीना उगाना है, तो सही मिट्टी, जैविक खाद, संतुलित सिंचाई, नियमित छंटाई और उचित धूप जैसी बुनियादी बागवानी तकनीकों पर ध्यान देना सबसे अधिक लाभकारी और भरोसेमंद तरीका माना जाता है।

  • सिर्फ गर्मी नहीं स्कैल्प का पसीना भी पहुंचा सकता है बालों को नुकसान एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव के असरदार तरीके

    सिर्फ गर्मी नहीं स्कैल्प का पसीना भी पहुंचा सकता है बालों को नुकसान एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव के असरदार तरीके


    नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम अपने साथ तेज धूप उमस और पसीने की समस्या लेकर आता है। शरीर का पसीना आना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो शरीर का तापमान नियंत्रित रखने में मदद करती है लेकिन जब यही पसीना लंबे समय तक सिर की त्वचा यानी स्कैल्प पर जमा रहता है तो यह बालों की सेहत के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यही वजह है कि गर्मियों में कई लोगों को बाल झड़ने डैंड्रफ खुजली और स्कैल्प से बदबू आने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार स्कैल्प पर लगातार नमी बनी रहने से वहां बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपने लगते हैं। पसीना तेल और धूल मिलकर रोमछिद्रों को बंद कर देते हैं जिससे बालों की जड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व नहीं पहुंच पाते। इसका सीधा असर बालों की मजबूती पर पड़ता है और धीरे धीरे बाल कमजोर होकर टूटने लगते हैं। यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए तो हेयर फॉल तेजी से बढ़ सकता है।

    वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो पसीने में पानी के साथ नमक और लैक्टिक एसिड भी मौजूद होता है। जब यह लंबे समय तक स्कैल्प पर बना रहता है तो सिर की त्वचा का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगता है। इससे बालों की बाहरी परत कमजोर हो जाती है और बाल रूखे बेजान तथा दोमुंहे दिखाई देने लगते हैं। कई बार स्कैल्प में जलन और खुजली भी शुरू हो जाती है जो आगे चलकर डैंड्रफ का रूप ले सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस मौसम में बालों की देखभाल के लिए सबसे पहले स्कैल्प की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। यदि ज्यादा पसीना आता है तो जरूरत के अनुसार हल्के और सौम्य शैंपू से बाल धोना फायदेमंद रहता है। इससे अतिरिक्त तेल धूल और पसीना साफ हो जाता है तथा रोमछिद्र खुले रहते हैं। हालांकि जरूरत से ज्यादा शैंपू करने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे स्कैल्प का प्राकृतिक तेल कम हो सकता है।

    हल्की तेल मालिश भी स्कैल्प को स्वस्थ रखने में मदद करती है। आंवला नारियल या अन्य प्राकृतिक तेलों से हल्के हाथों से मालिश करने से रक्त संचार बेहतर होता है और बालों की जड़ों तक पोषण आसानी से पहुंचता है। आंवला में मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट बालों को मजबूत बनाने में सहायक माने जाते हैं।

    पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी बालों की अच्छी सेहत के लिए बेहद जरूरी है। शरीर में पानी की कमी होने पर स्कैल्प का संतुलन बिगड़ सकता है। पर्याप्त हाइड्रेशन शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है और त्वचा के साथ साथ स्कैल्प को भी स्वस्थ बनाए रखता है।

    एलोवेरा जेल गर्मियों में स्कैल्प को ठंडक देने का एक प्राकृतिक उपाय माना जाता है। इसे सीधे सिर की त्वचा पर लगाने से खुजली और जलन में राहत मिल सकती है। वहीं गुलाब जल का हल्का स्प्रे स्कैल्प को ताजगी देता है और पसीने की बदबू कम करने में मदद करता है। कुछ विशेषज्ञ पानी में मिलाकर ऐप्पल साइडर विनेगर का सीमित उपयोग भी स्कैल्प का पीएच संतुलित रखने के लिए लाभदायक मानते हैं।

    इसके अलावा बहुत टाइट हेयर स्टाइल बनाने और बार बार हेयर ड्रायर या हीट स्टाइलिंग उपकरणों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। ढीले हेयर स्टाइल अपनाने से हवा आसानी से स्कैल्प तक पहुंचती है और पसीना जल्दी सूख जाता है।

    स्वस्थ बालों के लिए संतुलित खानपान भी उतना ही जरूरी है। हरी सब्जियां मौसमी फल मेवे बीज और पर्याप्त प्रोटीन युक्त भोजन बालों की जड़ों को मजबूत बनाते हैं जबकि अधिक मसालेदार भोजन जंक फूड और जरूरत से ज्यादा चाय कॉफी शरीर की गर्मी बढ़ाकर पसीना बढ़ा सकते हैं।

    यदि बालों का झड़ना लगातार बढ़ रहा हो डैंड्रफ लंबे समय तक बना रहे या स्कैल्प में संक्रमण के लक्षण दिखाई दें तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प है।

  • मीठा खाने का भी होता है सही समय वरना बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन का खतरा जानिए क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट्स

    मीठा खाने का भी होता है सही समय वरना बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन का खतरा जानिए क्या कहते हैं हेल्थ एक्सपर्ट्स


    नई दिल्ली । त्योहार हो जन्मदिन हो शादी का जश्न हो या फिर कोई छोटी सी खुशी भारत में हर खास मौके की शुरुआत मीठे से होती है। मिठाई हमारे खानपान और संस्कृति का अहम हिस्सा है लेकिन क्या आप जानते हैं कि मीठा सिर्फ कितनी मात्रा में खाया जाए यह ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उसे किस समय खाया जाए यह भी आपकी सेहत पर बड़ा असर डालता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गलत समय पर मीठा खाने की आदत धीरे धीरे ब्लड शुगर बढ़ने वजन बढ़ने और भविष्य में डायबिटीज जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।

    अक्सर लोग सुबह उठते ही चाय के साथ बिस्कुट मिठाई चॉकलेट या अन्य मीठी चीजें खा लेते हैं। कुछ लोग खाली पेट ही मीठे से दिन की शुरुआत करते हैं। डॉक्टरों के अनुसार यह आदत शरीर के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। खाली पेट मीठा खाने पर उसमें मौजूद शुगर तेजी से खून में पहुंचती है जिससे ब्लड ग्लूकोज का स्तर अचानक बढ़ जाता है। इसके कुछ समय बाद शुगर तेजी से नीचे भी आ जाती है जिससे कमजोरी थकान और बार बार भूख लगने जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। यही वजह है कि दिनभर मीठा खाने की इच्छा भी बढ़ जाती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि मीठा खाना ही है तो उसे मुख्य भोजन के बाद सीमित मात्रा में खाना ज्यादा बेहतर विकल्प माना जाता है। जब हम पहले दाल रोटी सब्जी चावल सलाद या अन्य पौष्टिक भोजन खाते हैं तब शरीर को फाइबर प्रोटीन और आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं। ये तत्व मीठे में मौजूद चीनी को धीरे धीरे अवशोषित होने में मदद करते हैं जिससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता और शरीर पर अतिरिक्त दबाव भी नहीं पड़ता। यही कारण है कि डॉक्टर भोजन के तुरंत बाद थोड़ी मात्रा में मिठाई खाने की सलाह देते हैं।

    दिन और रात के समय का अंतर भी इस मामले में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। रात में शरीर आराम की अवस्था में पहुंचने लगता है और ऊर्जा की जरूरत भी कम हो जाती है। ऐसे समय अधिक मात्रा में मीठा खाने से अतिरिक्त कैलोरी शरीर में जमा होने लगती है जिससे वजन बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। लगातार रात में मीठा खाने की आदत भविष्य में मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज जैसी समस्याओं की आशंका को भी बढ़ा सकती है।

    यदि मीठा खाना हो तो दोपहर के भोजन के बाद सीमित मात्रा में खाना अपेक्षाकृत बेहतर माना जाता है क्योंकि दिन के समय शरीर अधिक सक्रिय रहता है और अतिरिक्त ऊर्जा का उपयोग आसानी से कर लेता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि दिनभर मनचाहा मीठा खाया जाए। मात्रा पर नियंत्रण रखना हर स्थिति में जरूरी है।

    डॉक्टर यह भी कहते हैं कि केवल केक पेस्ट्री चॉकलेट या मीठे पेय पदार्थों के सहारे भूख मिटाना सही आदत नहीं है। इससे शरीर को आवश्यक विटामिन मिनरल्स और प्रोटीन नहीं मिल पाते। संतुलित भोजन के साथ ही मीठे का सेवन करना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।

    जिन लोगों को डायबिटीज प्री डायबिटीज मोटापा या ब्लड शुगर से जुड़ी कोई समस्या है उन्हें मीठा खाने से पहले अपने डॉक्टर या डाइट विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए। सही समय सही मात्रा और संतुलित खानपान अपनाकर मीठे का आनंद भी लिया जा सकता है और स्वास्थ्य भी बेहतर बनाए रखा जा सकता है।

  • पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव

    पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव


    नई दिल्ली । आज के प्रतिस्पर्धी दौर में लगभग हर माता पिता अपने बच्चों को जीवन के हर क्षेत्र में सफल देखना चाहते हैं। अच्छी पढ़ाई बेहतर करियर और हर गतिविधि में उत्कृष्ट प्रदर्शन की इच्छा स्वाभाविक है लेकिन जब यही अपेक्षाएं बच्चों पर दबाव बनकर थोप दी जाती हैं तब यह उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। मनोविज्ञान में इस व्यवहार को पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पालन पोषण का ऐसा तरीका है जिसमें बच्चों से हमेशा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है और उनकी व्यक्तिगत रुचियों भावनाओं तथा सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पुशी पेरेंटिंग में माता पिता अक्सर अपने अधूरे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करते हैं। बच्चे पर हमेशा बेहतर अंक लाने हर प्रतियोगिता में जीतने और हर क्षेत्र में सबसे आगे रहने का दबाव बनाया जाता है। बाहर से यह अनुशासन और सफलता की तैयारी जैसा दिखाई देता है लेकिन भीतर ही भीतर बच्चा लगातार तनाव और असुरक्षा की भावना से जूझता रहता है। वह पढ़ाई और गतिविधियों का आनंद लेने के बजाय केवल प्रदर्शन और परिणामों के बारे में सोचने लगता है।

    ऐसे माहौल में यदि बच्चा अच्छे अंक भी हासिल कर ले लेकिन प्रथम स्थान न ला पाए तो उसकी उपलब्धि की सराहना करने के बजाय उसे डांट या निराशा का सामना करना पड़ता है। धीरे धीरे उसके मन में यह भावना घर करने लगती है कि उसकी मेहनत की कोई अहमियत नहीं है और उसे तभी स्वीकार किया जाएगा जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरे। इससे बच्चों में असफलता का डर बढ़ता है और उनका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है।

    पुशी पेरेंटिंग का एक और बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों की अपनी पसंद और रुचियों को महत्व नहीं दिया जाता। कई बच्चों की रुचि खेल संगीत चित्रकला या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में होती है लेकिन माता पिता उन्हें अपनी पसंद के विषय या करियर की ओर धकेल देते हैं। लगातार ऐसा होने पर बच्चा अपनी इच्छाओं को दबा देता है और केवल दूसरों को खुश करने के लिए जीवन जीने लगता है। इससे उसकी रचनात्मकता और आत्मसंतुष्टि दोनों प्रभावित होती हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों की लगातार दूसरों से तुलना करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। जब बार बार किसी दूसरे बच्चे की उपलब्धियों का उदाहरण दिया जाता है तो बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है। उसके भीतर हीन भावना पैदा होती है और धीरे धीरे वह अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। यह स्थिति आगे चलकर चिंता अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।

    कई परिवारों में माता पिता बच्चों के हर छोटे बड़े फैसले स्वयं लेने लगते हैं। क्या पहनना है क्या खाना है किससे दोस्ती करनी है या भविष्य में कौन सा विषय चुनना है जैसे निर्णय भी बच्चों को लेने का अवसर नहीं मिलता। इससे बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वह बड़े होने के बाद भी हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगता है।

    मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को सही दिशा देना और अनुशासन सिखाना जरूरी है लेकिन उनकी भावनाओं इच्छाओं और क्षमताओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए और उनकी सफलता के साथ साथ उनके प्रयासों की भी सराहना करनी चाहिए। सकारात्मक प्रोत्साहन और भरोसे का माहौल ही बच्चों के आत्मविश्वास मानसिक संतुलन और स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास की मजबूत नींव बनता है।