Category: Lifestyle

  • कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्लड क्लॉट का खतरा, पानी की कमी से लेकर मोटापा-धूम्रपान तक हो सकते हैं कारण; ऐसे रखें खून को स्वस्थ

    कम उम्र में भी बढ़ रहा ब्लड क्लॉट का खतरा, पानी की कमी से लेकर मोटापा-धूम्रपान तक हो सकते हैं कारण; ऐसे रखें खून को स्वस्थ


    नई दिल्ली । खून हमारे शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचाने का काम करता है लेकिन जब रक्त का प्रवाह सामान्य से प्रभावित होने लगे या खून में थक्का बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाए तो यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। आम बोलचाल में इसे खून गाढ़ा होना कहा जाता है। मेडिकल तौर पर कुछ स्थितियों में इसे हाइपरकोएगुलेबिलिटी या हाइपरविस्कॉसिटी से जोड़ा जाता है। हालांकि हर बार खून गाढ़ा होने का मतलब एक ही बीमारी नहीं होता और इसके पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर में पानी की कमी खून के तरल हिस्से को कम कर सकती है। इससे रक्त अधिक कंसंट्रेटेड दिखाई दे सकता है। इसके अलावा कुछ लोगों में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ने पर भी रक्त अधिक गाढ़ा हो सकता है। एरिथ्रोसाइटोसिस जैसी स्थितियां इसके उदाहरण हैं। लंबे समय तक एक जगह बैठे रहना, शारीरिक गतिविधि की कमी, मोटापा और धूम्रपान भी ब्लड क्लॉट बनने के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं।

    कुछ परिस्थितियों में शरीर में खून के थक्के बनने की संभावना सामान्य से अधिक हो सकती है। सर्जरी के बाद लंबे समय तक आराम करना, गंभीर चोट, लंबी यात्रा या लगातार कई घंटे बैठे रहना ऐसे कारण हैं जिनमें विशेष सावधानी की जरूरत होती है। गर्भावस्था और प्रसव के आसपास का समय तथा कुछ हार्मोनल दवाएं भी कुछ लोगों में क्लॉटिंग के जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा कुछ आनुवंशिक स्थितियों के कारण भी किसी व्यक्ति में ब्लड क्लॉट बनने की संभावना अधिक हो सकती है।

    खून में थक्का बनने की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह शरीर की नस या धमनी में रक्त के सामान्य प्रवाह को रोक सकता है। अगर पैर की किसी गहरी नस में थक्का बनता है तो इसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी कहा जाता है। इसमें आमतौर पर पैर में सूजन, दर्द या असहजता जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। स्थिति तब गंभीर हो सकती है जब यह थक्का टूटकर रक्त के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाए। ऐसा होने पर पल्मोनरी एम्बोलिज्म जैसी जानलेवा स्थिति पैदा हो सकती है।

    इसी तरह यदि कोई थक्का मस्तिष्क तक जाने वाली रक्त वाहिका में रक्त प्रवाह को बाधित करता है तो स्ट्रोक का खतरा हो सकता है। इसलिए शरीर में अचानक दिखाई देने वाले कुछ लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पैर में अचानक सूजन या दर्द, सांस लेने में अचानक परेशानी, सीने में दर्द या स्ट्रोक जैसे लक्षण दिखने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।

    ब्लड क्लॉट का खतरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं माना जाता। लंबे समय तक बैठे रहने वाले लोगों, बहुत कम शारीरिक गतिविधि करने वालों, मोटापे से जूझ रहे लोगों और धूम्रपान करने वालों में इसका जोखिम बढ़ सकता है। लंबी यात्रा करने वाले लोगों को भी लगातार कई घंटे एक ही स्थिति में बैठे रहने से बचना चाहिए। जिन लोगों में पहले ब्लड क्लॉट की समस्या हो चुकी है या परिवार में ऐसी समस्या का इतिहास रहा है उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

    बचाव के लिए सबसे जरूरी बात लंबे समय तक लगातार निष्क्रिय रहने से बचना है। यदि आपका काम कई घंटे बैठकर करने वाला है तो बीच-बीच में उठकर कुछ देर चलना और पैरों को सक्रिय रखना फायदेमंद हो सकता है। लंबी यात्रा के दौरान भी समय-समय पर चलने-फिरने की कोशिश करनी चाहिए। नियमित शारीरिक गतिविधि स्वस्थ वजन बनाए रखने और शरीर में रक्त संचार को बेहतर रखने में मदद कर सकती है।

    इसके साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, धूम्रपान से दूरी बनाना और वजन को नियंत्रित रखना भी महत्वपूर्ण है। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति का खून गाढ़ा है या नहीं। ऐसी स्थिति का कारण जानने के लिए डॉक्टर जांच की सलाह दे सकते हैं। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के ब्लड थिनर या कोई अन्य दवा लेना उचित नहीं है। अगर आपको ब्लड क्लॉट के लक्षण दिखाई दें या किसी कारण से इसका जोखिम अधिक हो तो समय पर डॉक्टर से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

  • मोटापा घटाने में GLP-1 दवाओं ने बढ़ाई उम्मीद लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सर्जरी अब भी क्यों जरूरी

    मोटापा घटाने में GLP-1 दवाओं ने बढ़ाई उम्मीद लेकिन गंभीर मरीजों के लिए सर्जरी अब भी क्यों जरूरी


    नई दिल्ली। मोटापा आज दुनिया भर में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है और इसके कारण डायबिटीज दिल की बीमारी फैटी लिवर नींद के दौरान सांस रुकने जैसी कई गंभीर परेशानियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में वजन कम करने के लिए पिछले कुछ समय में GLP-1 दवाओं की चर्चा तेजी से बढ़ी है। इन दवाओं ने मोटापे के इलाज में एक नया विकल्प जरूर दिया है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वजन घटाने वाली सर्जरी की जरूरत पूरी तरह खत्म हो गई है। डॉक्टरों के मुताबिक हर व्यक्ति के लिए मोटापे का इलाज अलग हो सकता है और इसका फैसला उसकी पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर किया जाना चाहिए।

    GLP-1 दवाएं शरीर में भूख और खाने की इच्छा को नियंत्रित करने वाले तंत्र पर असर डालती हैं। इनसे कुछ लोगों को कम खाने और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस करने में मदद मिल सकती है। इसके कारण वजन कम करने में सहायता मिलती है। यही वजह है कि जो लोग वजन घटाने की सर्जरी से बचना चाहते हैं उनके लिए GLP-1 दवाएं एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आई हैं। हालांकि इन दवाओं को किसी आसान या जादुई तरीके के रूप में देखना सही नहीं है।

    मोटापे के इलाज में केवल वजन कम करना ही लक्ष्य नहीं होता बल्कि व्यक्ति की पूरी सेहत में सुधार करना भी जरूरी होता है। अगर किसी व्यक्ति को गंभीर मोटापे के साथ टाइप 2 डायबिटीज दिल से जुड़ी समस्या फैटी लिवर या स्लीप एपनिया जैसी बीमारी है तो डॉक्टर इलाज के दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। कुछ गंभीर मामलों में वजन घटाने की सर्जरी अब भी प्रभावी उपचार विकल्प हो सकती है। इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि GLP-1 दवाओं के आने के बाद सर्जरी की जरूरत खत्म हो गई है।

    GLP-1 दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता के बीच विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। दवा शुरू करने से पहले व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री वजन बढ़ने के कारण दूसरी बीमारियों और इस्तेमाल की जा रही दवाओं की जानकारी लेना जरूरी होता है। दवा की मात्रा और उपचार की अवधि भी डॉक्टर ही तय करते हैं। कुछ लोगों में दवा से पाचन संबंधी परेशानी सहित अन्य दुष्प्रभाव हो सकते हैं इसलिए नियमित चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है।

    वजन कम करने के दौरान खानपान की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रहती है। GLP-1 दवाओं से भूख कम हो सकती है लेकिन शरीर को पर्याप्त प्रोटीन फाइबर विटामिन खनिज और पानी मिलना जरूरी है। केवल कम खाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि पौष्टिक भोजन लेना भी जरूरी है। इसके साथ नियमित शारीरिक गतिविधि अच्छी नींद और तनाव को नियंत्रित करना वजन को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद कर सकता है।

    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा बंद करने के बाद कुछ लोगों में वजन दोबारा बढ़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक बेहतर परिणाम बनाए रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। जरूरत के अनुसार डॉक्टर के साथ डाइट एक्सपर्ट और व्यायाम विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।


    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि दवा बंद करने के बाद कुछ लोगों में वजन दोबारा बढ़ सकता है। इसलिए लंबे समय तक बेहतर परिणाम बनाए रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव जरूरी है। जरूरत के अनुसार डॉक्टर के साथ डाइट एक्सपर्ट और व्यायाम विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।

    कुल मिलाकर GLP-1 दवाओं ने मोटापे के इलाज के क्षेत्र में नई संभावनाएं जरूर खोली हैं लेकिन हर मरीज के लिए यही सबसे अच्छा विकल्प हो ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ लोगों को दवाओं से अच्छा लाभ मिल सकता है जबकि गंभीर मोटापे और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं वाले मरीजों में सर्जरी की भूमिका बनी रह सकती है। इसलिए वजन घटाने के लिए किसी भी दवा या सर्जरी का फैसला खुद से लेने के बजाय योग्य डॉक्टर से पूरी जांच और सलाह के बाद ही करना चाहिए। सही इलाज के साथ संतुलित खानपान और नियमित शारीरिक गतिविधि को अपनाना ही लंबे समय तक स्वस्थ वजन बनाए रखने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • चेहरे की चमक खो गई है तो बदलें अपनी डेली रूटीन, त्वचा की देखभाल के ये तरीके आएंगे काम

    चेहरे की चमक खो गई है तो बदलें अपनी डेली रूटीन, त्वचा की देखभाल के ये तरीके आएंगे काम


    नई दिल्ली। खूबसूरत और स्वस्थ त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन बदलता मौसम धूल मिट्टी प्रदूषण तनाव और अनियमित दिनचर्या त्वचा की प्राकृतिक चमक को प्रभावित कर सकते हैं। कई बार लोग चेहरे पर चमक लाने के लिए तरह तरह के कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन त्वचा की सही देखभाल के लिए महंगे उत्पादों से ज्यादा जरूरी एक अच्छी और नियमित स्किन केयर रूटीन है। अगर त्वचा को पर्याप्त नमी मिले और उसे धूप प्रदूषण तथा गंदगी से बचाया जाए तो लंबे समय तक त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    स्किन केयर की शुरुआत चेहरे की सफाई से करनी चाहिए। दिनभर त्वचा पर धूल मिट्टी पसीना और प्रदूषण जमा हो सकता है। इसलिए सुबह और रात चेहरे को अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार उपयुक्त क्लींजर से साफ करना जरूरी है। बहुत ज्यादा बार चेहरा धोने से भी बचना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा की प्राकृतिक नमी कम हो सकती है और रूखापन बढ़ सकता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को खासतौर पर तेज खुशबू या कठोर सामग्री वाले उत्पादों के इस्तेमाल से सावधानी बरतनी चाहिए।

    त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल भी बेहद जरूरी माना जाता है। तैलीय त्वचा वाले लोगों को हल्के और नॉन कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइजर का चुनाव करना चाहिए जबकि रूखी त्वचा के लिए थोड़ा अधिक हाइड्रेटिंग मॉइस्चराइजर उपयोगी हो सकता है। नियमित मॉइस्चराइजिंग त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद करती है और त्वचा को मुलायम महसूस करा सकती है।

    धूप से त्वचा की सुरक्षा भी स्किन केयर का अहम हिस्सा है। सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से त्वचा पर टैनिंग और समय से पहले उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई दे सकते हैं। इसलिए बाहर निकलने से पहले ब्रॉड स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। लंबे समय तक धूप में रहने की स्थिति में सनस्क्रीन को दोबारा लगाने की जरूरत पड़ सकती है। इसके साथ छाता या टोपी जैसी चीजों की मदद से भी धूप से बचाव किया जा सकता है।

    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहर से इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों पर निर्भर नहीं करती। पर्याप्त पानी पीना पौष्टिक भोजन लेना और पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के लिए महत्वपूर्ण है। डाइट में मौसमी फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें बीज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों को शामिल किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना भी बेहतर विकल्प हो सकता है।


    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहर से इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पादों पर निर्भर नहीं करती। पर्याप्त पानी पीना पौष्टिक भोजन लेना और पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के लिए महत्वपूर्ण है। डाइट में मौसमी फल हरी सब्जियां साबुत अनाज दालें बीज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों को शामिल किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तला हुआ भोजन और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना भी बेहतर विकल्प हो सकता है।

    तनाव और नींद की कमी का असर भी चेहरे पर दिखाई दे सकता है। इसलिए रोजाना पर्याप्त नींद लेने और तनाव को कम करने की कोशिश करनी चाहिए। नियमित व्यायाम भी शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है। हालांकि किसी भी घरेलू नुस्खे या नए स्किन केयर प्रोडक्ट को चेहरे पर इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना समझदारी है।

    अगर त्वचा पर लगातार मुंहासे खुजली लालिमा दाने अत्यधिक रूखापन या किसी अन्य तरह की समस्या बनी रहती है तो खुद से उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। सही त्वचा प्रकार की पहचान और जरूरत के अनुसार उत्पादों का इस्तेमाल ही बेहतर स्किन केयर की कुंजी है। नियमित सफाई मॉइस्चराइजिंग धूप से बचाव पौष्टिक आहार और अच्छी नींद को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाकर त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से निखरा हुआ रखने में मदद मिल सकती है।
  • VIP मोबाइल नंबर चाहिए? Jio और Vi पर ऐसे चुनें लकी नंबर, जानें कीमत और बुकिंग का तरीका

    VIP मोबाइल नंबर चाहिए? Jio और Vi पर ऐसे चुनें लकी नंबर, जानें कीमत और बुकिंग का तरीका


    नई दिल्ली । 
    अगर आप अपने मोबाइल नंबर में कोई खास पैटर्न, लकी डिजिट या याद रखने में आसान नंबर चाहते हैं, तो टेलीकॉम कंपनियों के जरिए ऐसा नंबर चुनने का विकल्प उपलब्ध है। Jio और Vi अपने यूजर्स को पसंदीदा या फैंसी मोबाइल नंबर चुनने की सुविधा देते हैं। इसमें 9999, 786 या जन्मतिथि से जुड़े अंकों जैसे खास पैटर्न वाले नंबर तलाशे जा सकते हैं।

    इस सुविधा की मदद से यूजर्स घर बैठे अपनी पसंद का नंबर खोज सकते हैं। इसके लिए Jio ग्राहकों को MyJio ऐप और Vi ग्राहकों को Vi ऐप का इस्तेमाल करना होता है। हालांकि, पसंदीदा नंबर की उपलब्धता और उसकी कीमत उसके पैटर्न तथा संबंधित कैटेगरी पर निर्भर करती है।

    Jio यूजर्स MyJio ऐप खोलकर होम स्क्रीन पर नीचे की ओर स्क्रॉल करने के बाद Quick Links सेक्शन में जा सकते हैं। यहां Matching Number का विकल्प दिखाई देता है। इस पर क्लिक करने के बाद यूजर अपने मौजूदा नंबर से मिलता-जुलता नंबर भी तलाश सकता है।

    अगर किसी ग्राहक को कोई खास VIP या फैंसी नंबर चाहिए, तो Looking for VIP number? विकल्प का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद ग्राहक अपनी पसंद के चार से आठ अंकों का पैटर्न दर्ज करके नंबर की तलाश कर सकता है। उपलब्ध विकल्पों में से पसंदीदा नंबर चुनकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

    Jio पर केवल मिलते-जुलते नंबर ही नहीं, बल्कि विशेष पैटर्न वाले नंबर भी खोजे जा सकते हैं। इससे उन ग्राहकों को सुविधा मिलती है जो अपने मौजूदा नंबर जैसा कोई नंबर रखना चाहते हैं या किसी खास संख्या को नए मोबाइल नंबर में शामिल करना चाहते हैं।

    Vi ग्राहकों के लिए भी प्रक्रिया काफी सरल है। इसके लिए Vi ऐप में जाकर VIP Number विकल्प चुनना होता है। इसके बाद जिस नंबर या अंक पैटर्न को ग्राहक अपने मोबाइल नंबर में चाहता है, उसे संबंधित बॉक्स में दर्ज करना होता है।

    सर्च करने के बाद स्क्रीन पर उपलब्ध VIP नंबरों की सूची दिखाई देती है। इनमें कुछ नंबर मुफ्त हो सकते हैं, जबकि कुछ Premium VIP नंबरों के लिए अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है। ग्राहक अपनी पसंद का नंबर चुनने के बाद पिनकोड और डिलीवरी एड्रेस जैसी जरूरी जानकारी दर्ज करके ऑर्डर की प्रक्रिया पूरी कर सकता है।

    VIP नंबर की कीमत एक जैसी नहीं होती। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मौजूदा नंबर से मिलता-जुलता नंबर चुनने की शुरुआती कीमत करीब 50 रुपये हो सकती है। वहीं Jio की कुछ विशेष गोल्ड कैटेगरी के VIP नंबरों के लिए ऑफलाइन स्टोर से वाउचर लेना पड़ सकता है और इसकी कीमत 12,000 रुपये तक पहुंच सकती है।

    Vi पर भी फैंसी नंबरों की अलग-अलग कैटेगरी उपलब्ध हैं। कुछ नंबर मुफ्त मिल सकते हैं, जबकि प्रीमियम कैटेगरी के नंबरों की कीमत करीब 590 रुपये से 2,000 रुपये तक हो सकती है। अंतिम कीमत चुने गए नंबर और उसकी कैटेगरी पर निर्भर करेगी।

    नंबर चुनने और भुगतान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ग्राहक अपने ऑपरेटर के निर्देश के अनुसार सिम प्राप्त कर सकता है। ऐसे में अगर आप अपना लकी नंबर, जन्मतिथि से जुड़ा पैटर्न या आसानी से याद रहने वाला नंबर चाहते हैं, तो पहले उपलब्ध नंबरों की सूची और उसकी कीमत जरूर जांचना बेहतर रहेगा।

  • माइग्रेन का दर्द बढ़ा सकती हैं रोजमर्रा की ये पांच गलतियां, समय रहते आदतों में बदलाव से मिल सकती है राहत

    माइग्रेन का दर्द बढ़ा सकती हैं रोजमर्रा की ये पांच गलतियां, समय रहते आदतों में बदलाव से मिल सकती है राहत


    नई दिल्ली ।
    भागदौड़ भरी जीवनशैली में सिरदर्द की समस्या आम हो गई है, लेकिन बार बार होने वाला तेज सिरदर्द हमेशा सामान्य नहीं माना जा सकता। कुछ लोगों में सिरदर्द के साथ रोशनी और तेज आवाज से परेशानी, जी मिचलाना, कमजोरी या असहजता जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति को माइग्रेन से जोड़ा जाता है। यह केवल सिर में दर्द की समस्या नहीं है, बल्कि तंत्रिका तंत्र से जुड़ी एक जटिल स्थिति है।

    माइग्रेन से परेशान लोगों में दर्द की तीव्रता और इसके कारण अलग अलग हो सकते हैं। हालांकि, रोजमर्रा की कुछ आदतें कई लोगों में इसके लक्षणों को बढ़ाने का काम कर सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखने और व्यक्तिगत ट्रिगर को पहचानने से माइग्रेन की परेशानी को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

    शरीर में पानी की कमी माइग्रेन के दौरान परेशानी बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हो सकती है। पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं मिलने पर थकान, चक्कर और सिर में भारीपन जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। इसलिए पूरे दिन नियमित अंतराल पर पानी पीना जरूरी है। पानी के अलावा नारियल पानी, सूप और पानी से भरपूर फल भी शरीर में तरल पदार्थ की जरूरत पूरी करने में मदद कर सकते हैं।

    नींद की अनदेखी करना भी माइग्रेन से परेशान लोगों के लिए समस्या बढ़ा सकता है। कम सोना या रोज अलग अलग समय पर सोने की आदत शरीर की प्राकृतिक दिनचर्या को प्रभावित कर सकती है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखना बेहतर माना जाता है। वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सात से नौ घंटे की नींद पर्याप्त मानी जाती है, हालांकि जरूरत व्यक्ति के अनुसार अलग हो सकती है।

    चाय और कॉफी में मौजूद कैफीन का असर भी हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। सीमित मात्रा में कैफीन कुछ लोगों को अलग तरह से प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका अधिक सेवन कुछ लोगों में माइग्रेन को बढ़ा सकता है। इसी तरह शराब भी कई लोगों के लिए सिरदर्द का ट्रिगर बन सकती है। यदि किसी विशेष पेय के सेवन के बाद बार बार माइग्रेन शुरू होता है, तो उस व्यक्तिगत ट्रिगर से बचना उपयोगी हो सकता है।

    लंबे समय तक मोबाइल, कंप्यूटर या टीवी की स्क्रीन देखते रहना भी कुछ लोगों में सिरदर्द की परेशानी बढ़ा सकता है। खासकर माइग्रेन के दौरान तेज रोशनी और स्क्रीन की चमक असहजता बढ़ा सकती है। ऐसे में स्क्रीन की चमक कम रखना, बीच बीच में आंखों को आराम देना और जरूरत पड़ने पर शांत तथा कम रोशनी वाले वातावरण में रहना मददगार हो सकता है।

    खाने के समय में लगातार बदलाव और लंबे समय तक खाली पेट रहना भी कुछ लोगों में माइग्रेन को ट्रिगर कर सकता है। इसलिए भोजन को बहुत देर तक टालने के बजाय नियमित अंतराल पर संतुलित भोजन करना बेहतर है। आहार में फल, हरी सब्जियां, पर्याप्त प्रोटीन और जरूरी पोषक तत्व शामिल किए जा सकते हैं।

    बहुत अधिक तला हुआ भोजन, अत्यधिक मसालेदार चीजें या कोई ऐसा खाद्य पदार्थ जिससे व्यक्ति को बार बार परेशानी होती है, उससे दूरी रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, सभी लोगों के लिए माइग्रेन के ट्रिगर समान नहीं होते। इसलिए किस भोजन या आदत के बाद समस्या बढ़ती है, इसका ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।

    माइग्रेन को नियंत्रित करने के लिए केवल किसी एक आदत में बदलाव पर्याप्त नहीं हो सकता। नियमित नींद, पर्याप्त पानी, समय पर भोजन, संतुलित जीवनशैली और व्यक्तिगत ट्रिगर की पहचान मिलकर बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकते हैं। यदि सिरदर्द बार बार हो रहा हो, बहुत तेज हो या उसके साथ असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

  • बारिश में आलू-प्याज के पराठे से हैं बोर, तो बनाएं क्रिस्पी चीज़ कॉर्न पराठा, स्वाद ऐसा कि बार-बार खाने का करेगा मन

    बारिश में आलू-प्याज के पराठे से हैं बोर, तो बनाएं क्रिस्पी चीज़ कॉर्न पराठा, स्वाद ऐसा कि बार-बार खाने का करेगा मन

    नई दिल्ली । बारिश के मौसम में गरमा-गरम और कुछ अलग खाने का मन अक्सर करता है। अगर रोजाना आलू, प्याज या गोभी के पराठे खाकर आप भी बोर हो चुके हैं, तो इस मॉनसून चीज़ कॉर्न पराठा जरूर ट्राई कर सकते हैं। स्वीट कॉर्न, चीज़ और मसालों से तैयार यह पराठा स्वाद में बेहद लाजवाब होता है। बाहर से कुरकुरा और अंदर से चीज़ी होने की वजह से यह बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आ सकता है। इसे सुबह के नाश्ते के अलावा शाम की चाय के साथ भी परोसा जा सकता है।

    चीज़ कॉर्न पराठा बनाने के लिए सबसे पहले इसकी फिलिंग तैयार करनी होगी। इसके लिए करीब एक कप उबले हुए स्वीट कॉर्न लें। इसमें एक कप कद्दूकस किया हुआ चीज़, बारीक कटा हरा धनिया, दो बारीक कटी या कुटी हुई लहसुन की कलियां और स्वाद के अनुसार हरी मिर्च डालें। इसके बाद इसमें चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर, थोड़ी काली मिर्च और ऑरेगैनो मिलाएं। नमक डालते समय थोड़ी सावधानी रखें, क्योंकि चीज़ में पहले से नमक मौजूद हो सकता है। सभी सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर एक तरफ रख दें।

    अब पराठे के लिए आटा तैयार करें। गेहूं के आटे में थोड़ा नमक और एक चम्मच तेल डालकर मिलाएं। धीरे-धीरे पानी डालते हुए नरम आटा गूंथ लें। आटे को कुछ देर ढककर रखने से यह अच्छी तरह सेट हो जाएगा और पराठा बेलने में आसानी होगी। इसके बाद आटे की छोटी-छोटी लोइयां बना लें।

    एक लोई लेकर उसे थोड़ा बेलें और बीच में तैयार चीज़ कॉर्न की फिलिंग रखें। अब आटे के किनारों को चारों तरफ से उठाकर फिलिंग को अच्छी तरह बंद कर दें। भरी हुई लोई को हल्के हाथों से बेलकर पराठे का आकार दें। पराठा बेलते समय ज्यादा दबाव न डालें, वरना चीज़ और कॉर्न की फिलिंग बाहर निकल सकती है।

    अब तवे को अच्छी तरह गर्म करें और उस पर पराठा डाल दें। इसे मध्यम आंच पर दोनों तरफ से सेंकें। जब पराठा हल्का सुनहरा होने लगे, तब ऊपर से थोड़ा घी या तेल लगाकर दोनों तरफ से कुरकुरा होने तक पकाएं। मध्यम आंच पर पकाने से पराठा अंदर तक अच्छी तरह सिकेगा और बाहर से भी क्रिस्पी बनेगा।

    गरमा-गरम चीज़ कॉर्न पराठे को हरी चटनी, दही या टोमैटो सॉस के साथ परोसा जा सकता है। बारिश के मौसम में एक कप गर्म चाय के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। पराठा बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि कॉर्न की फिलिंग में अतिरिक्त पानी न हो। गीली फिलिंग होने पर पराठा बेलना मुश्किल हो सकता है और वह तवे पर फट भी सकता है। इसके अलावा चीज़ की मात्रा संतुलित रखें और पराठे को तेज आंच के बजाय मध्यम आंच पर पकाएं।

    मॉनसून में खाद्य सामग्री की ताजगी पर विशेष ध्यान देना भी जरूरी है। स्वीट कॉर्न, चीज़ और अन्य सामग्री ताजा होनी चाहिए। अगर आप रोज के पारंपरिक पराठों से कुछ अलग और स्वादिष्ट बनाना चाहते हैं, तो चीज़ कॉर्न पराठा एक आसान विकल्प है। इसकी मसालेदार कॉर्न फिलिंग और पिघला हुआ चीज़ इसे खास स्वाद देते हैं।

  • Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान

    Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान


    नई दिल्ली। भारत में कैंसर का बढ़ता संकट केवल मरीजों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की देर से पहचान है। अस्पतालों तक पहुंचने वाले बड़ी संख्या में मरीजों में कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है। ऐसी स्थिति में इलाज मुश्किल होने के साथ महंगा भी हो जाता है और मरीज के ठीक होने की संभावना कम हो सकती है। यही वजह है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में आधुनिक उपचार के साथ समय पर पहचान और बचाव पर सबसे ज्यादा जोर देने की जरूरत है।

    कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के पीछे बढ़ती उम्र के साथ बदलती जीवनशैली धूम्रपान तंबाकू का सेवन असंतुलित खानपान शारीरिक गतिविधियों की कमी और पर्यावरणीय कारणों को महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर के कई जोखिम कारकों को जीवनशैली में बदलाव और समय पर जांच के जरिए कम किया जा सकता है। इसलिए कैंसर के खिलाफ जागरूकता की शुरुआत इलाज के बाद नहीं बल्कि बचपन से होनी चाहिए।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी है। खानपान शारीरिक गतिविधि मानसिक स्वास्थ्य नशे से दूरी टीकाकरण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जैसे विषयों को जीवन कौशल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बचपन से अच्छी आदतें विकसित होने पर भविष्य में कैंसर के साथ साथ हृदय रोग डायबिटीज और दूसरी गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।

    कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए एक आसान बात लोगों को हमेशा याद रखनी चाहिए। अगर शरीर में कोई असामान्य लक्षण लगातार तीन सप्ताह या उससे अधिक समय तक बना रहता है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार दर्द शरीर में असामान्य गांठ बिना वजह वजन कम होना लंबे समय तक रहने वाली खांसी निगलने में परेशानी असामान्य रक्तस्राव या लंबे समय से बनी कमजोरी जैसे लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि ऐसे लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते लेकिन लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी हो जाती है।

    स्क्रीनिंग भी कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। कुछ कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में स्क्रीनिंग के जरिए की जा सकती है। यही वह समय होता है जब उपचार के विकल्प अपेक्षाकृत बेहतर हो सकते हैं। आने वाले समय में तकनीक इस क्षेत्र को और मजबूत कर सकती है। मल्टी कैंसर अर्ली डिटेक्शन जैसे रक्त आधारित परीक्षणों पर दुनियाभर में शोध जारी है। इनका उद्देश्य एक ही रक्त नमूने से कई प्रकार के कैंसर से जुड़े संकेतों की पहचान करना है। हालांकि ऐसे परीक्षणों को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उनकी सटीकता उपयोगिता और चिकित्सकीय प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।

    भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी कैंसर की पहचान और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मेडिकल इमेजिंग और पैथोलॉजी डेटा के बड़े डेटाबेस की मदद से AI आधारित सिस्टम को प्रशिक्षित किया जा सकता है। इससे संदिग्ध मामलों की पहचान में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को सहायता मिल सकती है और जरूरत पड़ने पर मरीजों को विशेषज्ञ केंद्र तक जल्दी पहुंचाया जा सकता है।

    भारत जैसे विशाल देश में कैंसर स्क्रीनिंग का एक ही मॉडल सभी क्षेत्रों के लिए प्रभावी नहीं हो सकता। गांवों और दूरदराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स मोबाइल डायग्नोस्टिक सेवाएं डिजिटल रिस्क असेसमेंट और मजबूत रेफरल सिस्टम की जरूरत होगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर बड़े कैंसर अस्पताल तक मरीजों को समय पर जोड़ना इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।

    कैंसर के खिलाफ भारत की असली सफलता केवल आधुनिक मशीनों अस्पतालों या महंगे उपचारों की संख्या से तय नहीं होगी। असली सफलता तब मानी जाएगी जब बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में होने लगे और कम मरीज गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचें। जागरूकता समय पर जांच स्वस्थ जीवनशैली AI आधारित तकनीक और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर कैंसर के खिलाफ भारत की लड़ाई को नई दिशा दे सकते हैं।

  • दक्षिण अफ्रीका के खास पौधे रूइबोस की दुनिया भर में बढ़ी मांग, कैफीन-फ्री चाय बनी पहली पसंद।

    दक्षिण अफ्रीका के खास पौधे रूइबोस की दुनिया भर में बढ़ी मांग, कैफीन-फ्री चाय बनी पहली पसंद।

    नई दिल्ली ।दक्षिण अफ्रीका की सेडरबर्ग पहाड़ियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला विशेष पौधा रूइबोस इन दिनों अपनी विशिष्टताओं के कारण वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। ‘लाल झाड़ी’ के नाम से मशहूर यह पौधा केवल दक्षिण अफ्रीका के लगभग साठ हजार हेक्टेयर के सीमित भौगोलिक क्षेत्र में ही पैदा होता है। इसकी पत्तियों से तैयार की जाने वाली लाल चाय की मांग दुनिया के पचास से अधिक देशों में तेजी से बढ़ रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, इसके अंतरराष्ट्रीय निर्यात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह हर्बल पेय पदार्थों के बाजार में एक प्रमुख स्थान हासिल कर रहा है।

    इस पौधे की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह से कैफीन-मुक्त होना है। इसके अलावा इसमें एंटीऑक्सीडेंट और पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। जो लोग सामान्य चाय या कॉफी में मौजूद कैफीन के सेवन से बचना चाहते हैं, उनके लिए यह एक बेहतरीन और स्वास्थ्यवर्धक विकल्प बनकर उभरा है। अब इस पौधे का उपयोग केवल पारंपरिक चाय बनाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के हर्बल पेय पदार्थों और स्किन केयर उत्पादों में भी बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है।

    भौगोलिक दृष्टि से यह पौधा अत्यंत संवेदनशील है और इसे पनपने के लिए विशिष्ट प्रकार की मिट्टी, कम बारिश और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। इन्हीं कठोर प्राकृतिक शर्तों के कारण दुनिया के अन्य हिस्सों में इसकी व्यावसायिक खेती कर पाना लगभग असंभव रहा है। एशियाई और यूरोपीय बाजारों में इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले जापान इसके कुल वैश्विक निर्यात का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसके अतिरिक्त अमरीका और यूरोपीय देशों में भी इसकी खपत में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है।

    हालांकि, वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग के बावजूद जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित मौसम इस अनोखे पौधे की खेती के लिए गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान क्षेत्र में हुई कम बारिश और बढ़ते तापमान के कारण इसके कुल वार्षिक उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसम का यही रुख बना रहा, तो आने वाले समय में इस सीमित प्राकृतिक संसाधन की आपूर्ति को बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

  • महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स छोड़िए एवोकाडो से पाएं निखरी और मुलायम त्वचा जानें इस्तेमाल का सही तरीका

    महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स छोड़िए एवोकाडो से पाएं निखरी और मुलायम त्वचा जानें इस्तेमाल का सही तरीका


    नई दिल्ली। आजकल त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने के लिए लोग तरह तरह के ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं लेकिन कई बार साधारण और प्राकृतिक चीजें भी स्किन केयर रूटीन में उपयोगी साबित हो सकती हैं। एवोकाडो ऐसा ही एक फल है जो अपने पोषक तत्वों के कारण डाइट के साथ साथ त्वचा की देखभाल के लिए भी लोकप्रिय है। इसमें हेल्दी फैट्स विटामिन ई विटामिन सी और कई एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो त्वचा को मॉइस्चराइज रखने और रूखेपन को कम करने में मदद कर सकते हैं।

    अगर आपकी त्वचा रूखी और बेजान नजर आती है तो एवोकाडो से बना फेस मास्क एक आसान घरेलू विकल्प हो सकता है। इसके लिए पके हुए एवोकाडो को अच्छी तरह मैश करके उसका मुलायम पेस्ट तैयार करें। इसे साफ चेहरे पर हल्के हाथों से लगाएं और करीब 10 से 15 मिनट के बाद सामान्य पानी से चेहरा धो लें। इसके बाद त्वचा पर हल्का मॉइस्चराइजर लगाया जा सकता है। एवोकाडो में मौजूद फैट्स त्वचा को नमी देने में मदद कर सकते हैं जिससे चेहरा अधिक मुलायम महसूस हो सकता है।

    एवोकाडो में मौजूद विटामिन ई को त्वचा के लिए उपयोगी एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है। यह त्वचा को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकता है। वहीं विटामिन सी त्वचा की सामान्य कोलेजन निर्माण प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। यही वजह है कि संतुलित डाइट में एवोकाडो को शामिल करना त्वचा की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो सकता है।

    एवोकाडो का इस्तेमाल केवल फेस मास्क के तौर पर ही नहीं बल्कि स्किन केयर रूटीन में मॉइस्चराइजिंग सामग्री के रूप में भी किया जाता है। कुछ लोग एवोकाडो पल्प को एलोवेरा जेल के साथ मिलाकर फेस पैक बनाते हैं। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू नुस्खे को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले पैच टेस्ट करना बेहतर रहता है। अगर त्वचा पर जलन खुजली या लालिमा दिखाई दे तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए।

    अगर आपकी त्वचा बहुत ऑयली या मुहांसों वाली है तो एवोकाडो आधारित हेवी मास्क का इस्तेमाल सावधानी से करें। किसी भी प्राकृतिक सामग्री का मतलब यह नहीं है कि वह हर व्यक्ति की त्वचा के लिए सुरक्षित या उपयुक्त होगी। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को नए उत्पाद या घरेलू नुस्खे को अपनाने से पहले त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर हो सकता है।

    स्किन केयर के साथ खानपान का भी त्वचा की सेहत पर असर पड़ता है। एवोकाडो को डाइट में शामिल करने से शरीर को हेल्दी फैट्स फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं। इसे सलाद स्मूदी या टोस्ट के साथ लिया जा सकता है। हालांकि किसी एक फल को त्वचा की सभी समस्याओं का समाधान नहीं माना जा सकता। पर्याप्त पानी संतुलित आहार अच्छी नींद और नियमित स्किन केयर भी उतने ही जरूरी हैं।

    इस तरह एवोकाडो को अपनी स्किन केयर और डाइट का हिस्सा बनाकर त्वचा को नमी और पोषण देने में मदद मिल सकती है। लेकिन बेहतर परिणाम के लिए अपनी त्वचा के प्रकार को समझना और किसी भी नए घरेलू प्रयोग को सावधानी से शुरू करना जरूरी है।

  • एंटी एजिंग के लिए महंगे प्रोडक्ट्स नहीं, ये हेल्दी फूड्स बनाए रखेंगे त्वचा की चमक और खूबसूरती

    एंटी एजिंग के लिए महंगे प्रोडक्ट्स नहीं, ये हेल्दी फूड्स बनाए रखेंगे त्वचा की चमक और खूबसूरती

    नई दिल्ली । बढ़ती उम्र के साथ त्वचा पर झुर्रियां, रूखापन और चमक कम होने जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। हालांकि सही खान-पान और संतुलित डाइट के जरिए उम्र बढ़ने के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एंटी-एजिंग डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन, मिनरल्स और जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। ये तत्व शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।

    फ्री रेडिकल्स शरीर में बनने वाले ऐसे हानिकारक तत्व होते हैं, जो प्रदूषण, तनाव और खराब जीवनशैली के कारण बढ़ सकते हैं। इनकी वजह से कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है और चेहरे पर उम्र के निशान दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में डाइट में कुछ खास सुपरफूड्स को शामिल करके त्वचा की प्राकृतिक चमक और सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    टमाटर एंटी-एजिंग डाइट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें लाइकोपीन नामक तत्व पाया जाता है, जो त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकता है। इसके अलावा गाजर और कद्दू में मौजूद बीटा-कैरोटीन शरीर में जाकर विटामिन ए में बदलता है, जो त्वचा की मरम्मत प्रक्रिया के लिए जरूरी माना जाता है।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी त्वचा की सेहत के लिए फायदेमंद होती हैं। पालक, मेथी, ब्रोकली और अन्य हरी सब्जियों में विटामिन सी और विटामिन ई जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। वहीं संतरा, नींबू, आंवला और कीवी जैसे खट्टे फल विटामिन सी के अच्छे स्रोत होते हैं। विटामिन सी शरीर में कोलेजन बनाने में मदद करता है, जिससे त्वचा की लचक बनी रह सकती है।

    ड्राई फ्रूट्स और सीड्स जैसे बादाम, अखरोट, अलसी और चिया सीड्स भी एंटी-एजिंग डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन ई, जिंक और अन्य पोषक तत्व होते हैं, जो त्वचा की नमी बनाए रखने और उसे स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं। नियमित रूप से सीमित मात्रा में इनका सेवन त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता है।

    ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट तत्व कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद कर सकते हैं। इसमें मौजूद पॉलीफेनॉल त्वचा पर प्रदूषण और पर्यावरणीय प्रभावों के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी त्वचा के लिए बेहद जरूरी है। शरीर में पानी की कमी होने पर त्वचा बेजान और रूखी दिखाई दे सकती है।

    एवोकाडो में मौजूद हेल्दी फैट्स, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को पोषण देने में मदद करते हैं। ब्लूबेरी में पाए जाने वाले एंथोसायनिन और विटामिन सी त्वचा को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायक हो सकते हैं। वहीं हल्दी में मौजूद करक्यूमिन अपने एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जानी जाती है, जो त्वचा की सूजन और दाग-धब्बों को कम करने में मदद कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल किसी एक फूड को खाने से उम्र का असर पूरी तरह नहीं रुकता, बल्कि संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और स्वस्थ जीवनशैली के साथ इन सुपरफूड्स को डाइट में शामिल करने से त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने में मदद मिल सकती है।