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  • मिनिमलिज्म अपनाकर घर को बनाएं सरल और व्यवस्थित, कम सामान से मिलेगी ज्यादा शांति

    मिनिमलिज्म अपनाकर घर को बनाएं सरल और व्यवस्थित, कम सामान से मिलेगी ज्यादा शांति


    नई दिल्ली: मिनिमलिज्म एक ऐसी जीवनशैली है, जिसमें अनावश्यक उपभोग और दिखावे से दूर रहकर जरूरी और उपयोगी चीजों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। घर के संदर्भ में इसका मतलब कम लेकिन उपयोगी सामान रखना और रहने की जगह को खुला, हवादार तथा व्यवस्थित बनाए रखना है। इसका उद्देश्य सिर्फ घर में सामान की संख्या घटाना नहीं, बल्कि ऐसी जीवनशैली अपनाना है जो रोजमर्रा के जीवन को सरल बनाए। जब घर में जरूरत से ज्यादा चीजें नहीं होतीं, तो जगह अधिक खुली दिखाई देती है और आसपास का वातावरण भी व्यवस्थित महसूस होता है। इस तरह घर की व्यवस्था का असर मन की शांति और स्पष्टता पर भी पड़ सकता है।

    घर को मिनिमलिस्ट बनाने की शुरुआत डिक्लटरिंग से की जा सकती है। इसके लिए घर के हर हिस्से की जांच करके उन चीजों को अलग करना चाहिए, जिनका इस्तेमाल पिछले छह महीने या एक साल से नहीं हुआ है। इसके बाद सामान खरीदते समय मात्रा के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। बहुत सारी सस्ती और अनुपयोगी वस्तुएं जमा करने के बजाय चुनिंदा, टिकाऊ और अच्छी गुणवत्ता वाली चीजों को प्राथमिकता दी जा सकती है। इससे घर में अनावश्यक सामान जमा होने से बचता है और मौजूद वस्तुओं को व्यवस्थित रखना भी आसान होता है। मिनिमलिज्म का उद्देश्य घर को खाली करना नहीं, बल्कि केवल उन वस्तुओं को रखना है जो वास्तव में जरूरी और उपयोगी हैं।

    घर की जगह का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए मल्टी-पर्पज फर्नीचर भी उपयोगी हो सकता है। ऐसे फर्नीचर का चुनाव किया जा सकता है जो एक से अधिक काम में आए, जैसे स्टोरेज वाला बेड या फोल्डेबल डाइनिंग टेबल। इससे सीमित जगह में ज्यादा सामान फैलने से बचाया जा सकता है। इसके साथ ही घर में प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा के आने के रास्ते खुले रखना भी महत्वपूर्ण है। दीवारों पर हल्के रंगों का इस्तेमाल कमरे को अपेक्षाकृत बड़ा और शांत दिखाने में मदद कर सकता है। इस तरह कम सामान, उपयोगी फर्नीचर और खुली जगह मिलकर घर को अधिक व्यवस्थित और सहज बना सकते हैं।

    मिनिमलिज्म का असर घर की व्यवस्था के साथ मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। घर में सामान कम होने से उसकी सफाई और देखभाल में लगने वाला समय भी कम हो जाता है। साफ-सुथरा और व्यवस्थित वातावरण तनाव कम करने और ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। मिनिमलिज्म हमें यह समझने की दिशा में ले जाता है कि भौतिक वस्तुओं की संख्या को बढ़ाना ही बेहतर जीवन का आधार नहीं है। कम सामान के साथ भी जरूरतों के अनुसार सुविधाजनक जीवन जिया जा सकता है। इसलिए मिनिमलिज्म को किसी मजबूरी या दिखावे के बजाय एक सचेत जीवनशैली के रूप में अपनाया जा सकता है, जो घर को सरल, व्यवस्थित और शांत बनाने में मदद करती है।

  • बची हुई चाय को बार-बार गर्म करके पीना पड़ सकता है भारी, स्वाद के साथ सेहत पर भी पड़ सकता है असर

    बची हुई चाय को बार-बार गर्म करके पीना पड़ सकता है भारी, स्वाद के साथ सेहत पर भी पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली ।भारत में बड़ी संख्या में लोग चाय पीना पसंद करते हैं और ज्यादातर लोग इसे गर्मागर्म पीना पसंद करते हैं। कई बार सुबह बनाई गई चाय बच जाती है, जिसे लोग चाय बर्बाद होने से बचाने या समय बचाने के लिए दोपहर या शाम को दोबारा गर्म करके पी लेते हैं। हालांकि, दी गई जानकारी के मुताबिक ठंडी हो चुकी चाय को बार-बार गर्म करना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। दोबारा गर्म करने से चाय का स्वाद प्रभावित होने के साथ उसमें मौजूद कुछ लाभकारी रासायनिक तत्वों पर भी असर पड़ सकता है।

    स्टडी के अनुसार ताजी चाय में कैटेचिन और पॉलीफेनोल्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। इन्हें हृदय स्वास्थ्य और शरीर में सूजन कम करने के लिए उपयोगी माना जाता है। चाय को दोबारा गर्म करने की प्रक्रिया में इन लाभकारी तत्वों के कम होने की बात कही गई है। इसके अलावा, चाय को बार-बार उबालने से उसमें टैनिन की मात्रा बढ़ सकती है। इसकी वजह से चाय का स्वाद कसैला और कड़वा हो सकता है। यानी दोबारा गर्म करने का असर केवल चाय के स्वाद तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसके कुछ घटकों में भी बदलाव हो सकता है।

    दूध वाली चाय को लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखना भी चिंता का विषय बताया गया है। ऐसी स्थिति में बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ सकता है। दी गई जानकारी के अनुसार दूध वाली चाय को कमरे के तापमान पर दो घंटे से अधिक समय तक रखने पर उसमें तेजी से बैक्टीरिया बढ़ सकते हैं। बाद में ऐसी चाय को दोबारा गर्म करने के बावजूद फूड पॉइजनिंग या पेट खराब होने का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता। वहीं, टैनिन की मात्रा बढ़ने से कुछ लोगों को एसिडिटी, सीने में जलन और बदहजमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

    चाय में टैनिन की मात्रा बढ़ने का असर शरीर में आयरन के अवशोषण पर भी पड़ सकता है। बढ़ा हुआ टैनिन शरीर द्वारा आयरन को ठीक से अवशोषित करने की प्रक्रिया में रुकावट डाल सकता है। यह खास तौर पर ऐसे लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है जिनमें पहले से आयरन की कमी है। दी गई जानकारी में भारत में एनीमिया की समस्या को देखते हुए बासी चाय के सेवन को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। इसलिए बची हुई चाय को लंबे समय बाद दोबारा गर्म करके पीने के बजाय ताजी चाय बनाना बेहतर विकल्प बताया गया है।

    स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की सलाह है कि एक बार में उतनी ही चाय बनाई जाए, जितनी पीनी हो। यदि चाय को कुछ समय तक गर्म रखना जरूरी हो तो उसे बार-बार गैस पर उबालने के बजाय थर्मस का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे चाय को गर्म रखने में मदद मिल सकती है और बार-बार गर्म करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। खासकर दूध वाली चाय को कमरे के तापमान पर लंबे समय तक रखने से बचना चाहिए। इस तरह ताजी बनी चाय का सेवन करना और बची हुई चाय को लंबे समय बाद दोबारा गर्म करके पीने से बचना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर माना गया है।

  • उत्तराखंड घूमने का बना रहे हैं प्लान, इन शानदार जगहों की यात्रा कर बना लें सफर यादगार, पहाड़ों से लेकर तीर्थस्थलों तक सब कुछ खास

    उत्तराखंड घूमने का बना रहे हैं प्लान, इन शानदार जगहों की यात्रा कर बना लें सफर यादगार, पहाड़ों से लेकर तीर्थस्थलों तक सब कुछ खास


    नई दिल्ली। उत्तराखंड को देवभूमि के साथ साथ प्राकृतिक सुंदरता का खजाना भी कहा जाता है। यहां ऊंचे पहाड़ बर्फ से ढकी चोटियां घने जंगल शांत झीलें बहती नदियां और प्राचीन मंदिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। अगर आप भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ दिन दूर रहकर प्रकृति के करीब समय बिताना चाहते हैं तो उत्तराखंड एक शानदार विकल्प हो सकता है। गर्मियों की छुट्टियों से लेकर सर्दियों के मौसम तक यहां अलग अलग जगहों का अपना खास आकर्षण देखने को मिलता है।

    ऋषिकेश से उत्तराखंड की यात्रा शुरू करना कई यात्रियों के लिए पसंदीदा विकल्प रहता है। गंगा किनारे बसा यह शहर आध्यात्मिक माहौल के साथ एडवेंचर गतिविधियों के लिए भी जाना जाता है। यहां गंगा आरती देखने के साथ रिवर राफ्टिंग जैसी गतिविधियों का आनंद लिया जा सकता है। इसके बाद हरिद्वार की यात्रा की जा सकती है जहां गंगा घाटों का धार्मिक वातावरण पर्यटकों को आकर्षित करता है। शाम के समय गंगा आरती का दृश्य यात्रा को यादगार बना सकता है।

    पहाड़ों की खूबसूरती का अनुभव करना हो तो मसूरी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहां पहाड़ी रास्तों के साथ खूबसूरत घाटियां और ठंडी हवा पर्यटकों को काफी पसंद आती है। माल रोड पर घूमना और आसपास के प्राकृतिक स्थानों की सैर करना यात्रा का हिस्सा बनाया जा सकता है। मसूरी के आसपास कई ऐसे स्थान भी हैं जहां से पहाड़ों और घाटियों का सुंदर नजारा दिखाई देता है।

    नैनीताल भी उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल है। नैनी झील के आसपास बसा यह शहर परिवार और दोस्तों के साथ घूमने के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है। यहां नौकायन के साथ आसपास की पहाड़ियों और बाजारों का आनंद लिया जा सकता है। सुबह और शाम के समय झील के आसपास का वातावरण खास तौर पर आकर्षक नजर आता है।

    अगर आप शांत और कम भीड़ वाली जगह तलाश रहे हैं तो औली की यात्रा की योजना बना सकते हैं। सर्दियों के मौसम में बर्फ से ढकी पहाड़ियां औली की खूबसूरती को और बढ़ा देती हैं। यहां से हिमालय की ऊंची चोटियों का शानदार दृश्य दिखाई देता है। एडवेंचर पसंद करने वाले यात्रियों के लिए यह जगह खास आकर्षण रखती है।

    उत्तराखंड की यात्रा धार्मिक स्थलों के बिना भी अधूरी मानी जाती है। केदारनाथ बद्रीनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे प्रमुख तीर्थ स्थल देशभर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। इन स्थानों की यात्रा मौसम और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करनी चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम अचानक बदल सकता है इसलिए यात्रा से पहले सड़क स्थिति मौसम और स्थानीय प्रशासन की सलाह की जानकारी लेना जरूरी है।

    उत्तराखंड घूमने के दौरान पर्यावरण का ध्यान रखना भी हर यात्री की जिम्मेदारी है। पहाड़ों में प्लास्टिक और कचरा न फैलाएं प्राकृतिक जलस्रोतों को गंदा न करें और स्थानीय नियमों का पालन करें। स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प का अनुभव लेकर स्थानीय लोगों के रोजगार में भी योगदान दिया जा सकता है। इस तरह उत्तराखंड की यात्रा केवल खूबसूरत यादें ही नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति को करीब से समझने का अवसर भी देती है।

  • पैकेट वाली चीजें शरीर के लिए कितनी नुकसानदायक? ज्यादा सेवन से बढ़ सकता है मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा

    पैकेट वाली चीजें शरीर के लिए कितनी नुकसानदायक? ज्यादा सेवन से बढ़ सकता है मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग का खतरा

    नई दिल्ली: आजकल बच्चों से लेकर वयस्कों तक पैकेट में मिलने वाली चीजों का सेवन बढ़ता जा रहा है। चिप्स, इंस्टेंट नूडल्स, पैकेज्ड स्नैक्स और कुछ रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थ रोजमर्रा की डाइट का हिस्सा बन गए हैं। इन्हें तैयार करना और खाना आसान होता है, साथ ही स्वाद भी लोगों को पसंद आता है। हालांकि, इन चीजों का लगातार और अधिक सेवन सेहत के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन केवल वजन बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते खतरे से जोड़ा गया है।

    अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ऐसे औद्योगिक तरीके से तैयार खाद्य पदार्थ होते हैं, जिनमें कई तरह के एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें अक्सर कैलोरी, नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा अधिक हो सकती है, जबकि फाइबर और जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं। कम उम्र में ही ऐसी चीजें खाने की आदत पड़ने से समय से पहले वजन बढ़ने और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। नियमित रूप से अधिक मात्रा में इन खाद्य पदार्थों का सेवन शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी पहुंचा सकता है, जिससे मोटापे की समस्या बढ़ सकती है।

    इन खाद्य पदार्थों में मौजूद अधिक चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट भी चिंता का विषय हो सकते हैं। इन्हें बार-बार खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है। लंबे समय तक ऐसी डाइट लेने पर इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। इसी तरह ज्यादा नमक, संतृप्त वसा और कैलोरी का सेवन ब्लड प्रेशर, वजन और कोलेस्ट्रॉल से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकता है। इन कारणों से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।

    फाइबर की कमी भी इन खाद्य पदार्थों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या है। शरीर और आंतों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए फाइबर जरूरी माना जाता है। लंबे समय तक फाइबर वाली चीजों का सेवन कम रहने पर पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। अध्ययनों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन को मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग सहित कई क्रॉनिक बीमारियों के बढ़ते खतरे से जोड़ा गया है। कुछ अध्ययनों में इसके सेवन और कैंसर के खतरे के बीच भी संबंध पाया गया है।

    ऐसे में पैकेट वाली चीजें खरीदते समय उनके लेबल को ध्यान से देखना जरूरी है। नमक, चीनी, संतृप्त वसा और फाइबर की मात्रा की जांच करके बेहतर विकल्प चुना जा सकता है। रोजमर्रा की डाइट में फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों की मात्रा बढ़ाना भी उपयोगी हो सकता है। पैकेट वाले खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन कम करके और संतुलित आहार को प्राथमिकता देकर डाइट को अधिक पौष्टिक बनाया जा सकता है।

  • माइक्रोवेव में इन बर्तनों का इस्तेमाल पड़ सकता है भारी, खाना गर्म करने से पहले जरूर जान लें ये जरूरी बातें

    माइक्रोवेव में इन बर्तनों का इस्तेमाल पड़ सकता है भारी, खाना गर्म करने से पहले जरूर जान लें ये जरूरी बातें

    नई दिल्ली: आज के समय में कई घरों में खाना गर्म करने और पकाने के लिए माइक्रोवेव का इस्तेमाल किया जाता है। सुविधा और समय की बचत के कारण इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, लेकिन माइक्रोवेव में खाना गर्म करते समय बर्तन का सही चुनाव करना बेहद जरूरी है। कई लोग जल्दबाजी में किसी भी बर्तन में खाना रखकर उसे माइक्रोवेव में चला देते हैं। गलत बर्तनों का इस्तेमाल परेशानी का कारण बन सकता है और कुछ मामलों में आग लगने या अन्य हादसों का जोखिम भी रहता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि माइक्रोवेव में किन बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    सामान्य प्लास्टिक के डिब्बे और पॉलीथिन को माइक्रोवेव में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। तेज गर्मी के संपर्क में आने पर प्लास्टिक पिघल सकता है और उसमें मौजूद कुछ रसायन भोजन में मिल सकते हैं। खासतौर पर ऐसे प्लास्टिक कंटेनर, जो माइक्रोवेव इस्तेमाल के लिए बनाए नहीं गए हैं, उनमें खाना गर्म करना उचित नहीं माना जाता। इसलिए प्लास्टिक के किसी भी डिब्बे को माइक्रोवेव में रखने से पहले यह जरूर जांच लें कि वह माइक्रोवेव के लिए सुरक्षित है या नहीं।

    स्टील, तांबा, एल्युमिनियम फॉयल और अन्य धातु के बर्तनों का इस्तेमाल भी माइक्रोवेव में सावधानी के बिना नहीं करना चाहिए। धातु माइक्रोवेव की तरंगों को प्रतिबिंबित कर सकती है, जिससे चिंगारी निकलने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे माइक्रोवेव के अंदर आग लगने या उसके सर्किट को नुकसान पहुंचने की स्थिति बन सकती है। इसलिए माइक्रोवेव में धातु से बनी चीजें रखने से पहले उसके इस्तेमाल से जुड़ी स्पष्ट जानकारी जरूर देखनी चाहिए।

    कांच और मिट्टी के बर्तनों को लेकर भी सावधानी जरूरी है। हर तरह का कांच माइक्रोवेव के लिए सुरक्षित नहीं होता। सामान्य कांच तेज गर्मी के कारण चटक सकता है, इसलिए माइक्रोवेव सेफ चिह्न वाले बोरोसिलिकेट कांच के बर्तनों का ही इस्तेमाल करना बेहतर है। इसी तरह बिना पॉलिश वाले पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों को भी माइक्रोवेव में रखने से बचना चाहिए, क्योंकि वे नमी सोख सकते हैं और गर्म होने पर टूटने का खतरा रहता है।

    माइक्रोवेव के लिए सही बर्तन पहचानने का आसान तरीका यह है कि इस्तेमाल से पहले उसके तल पर बने माइक्रोवेव सेफ निशान या सिंबल को जरूर देखें। कांच, सिरेमिक और BPA-फ्री ग्रेड-5 प्लास्टिक को माइक्रोवेव के लिए सही माना जाता है, लेकिन इनके मामले में भी उत्पाद पर दिए गए निर्देशों को देखना जरूरी है। सही बर्तन का इस्तेमाल न केवल माइक्रोवेव को सुरक्षित रखने में मदद करता है, बल्कि खाना गर्म करते समय होने वाली संभावित परेशानी और हादसों के जोखिम को भी कम कर सकता है।

  • चेहरे की देखभाल में नींबू कितना फायदेमंद, जलन और रूखेपन से बचने के लिए जानें सही तरीका और जरूरी स्किन केयर टिप्स

    चेहरे की देखभाल में नींबू कितना फायदेमंद, जलन और रूखेपन से बचने के लिए जानें सही तरीका और जरूरी स्किन केयर टिप्स


    नई दिल्ली। चेहरे की चमक और त्वचा की देखभाल के लिए लोग अक्सर घरेलू उपायों का सहारा लेते हैं। नींबू भी ऐसा ही एक घरेलू विकल्प है जिसमें विटामिन सी और साइट्रिक एसिड पाया जाता है। इसी वजह से इसे त्वचा की सफाई और ऑयली स्किन की देखभाल से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि नींबू को सीधे चेहरे पर लगाना हर किसी की त्वचा के लिए सही नहीं होता। इसमें मौजूद अम्लीय तत्व संवेदनशील त्वचा पर जलन लालिमा और रूखापन पैदा कर सकते हैं। इसलिए नींबू का इस्तेमाल करते समय सावधानी रखना जरूरी है।

    अगर आपकी त्वचा बहुत संवेदनशील नहीं है तो नींबू का इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना बेहतर माना जाता है। इसके लिए तैयार मिश्रण की थोड़ी मात्रा हाथ या बांह के छोटे हिस्से पर लगाकर देखें। अगर जलन खुजली या लालिमा दिखाई दे तो चेहरे पर इसका इस्तेमाल न करें। चेहरे पर नींबू का रस सीधे लगाने से विशेष रूप से बचना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा की प्राकृतिक नमी प्रभावित हो सकती है।

    नींबू को त्वचा की देखभाल में इस्तेमाल करने का एक तरीका इसे किसी मॉइस्चराइजिंग सामग्री के साथ मिलाना है। उदाहरण के लिए दही या एलोवेरा जेल के साथ बहुत थोड़ी मात्रा में नींबू का इस्तेमाल करने की घरेलू परंपरा है। लेकिन संवेदनशील या पहले से irritated त्वचा पर ऐसे प्रयोग भी परेशानी बढ़ा सकते हैं। इसलिए त्वचा के प्रकार को समझना सबसे जरूरी है। किसी भी घरेलू नुस्खे को रोजाना लगाने के बजाय सीमित मात्रा में और सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए।

    नींबू के इस्तेमाल के बाद धूप से बचाव भी बेहद जरूरी है। नींबू या दूसरे citrus पदार्थ त्वचा को सूर्य की रोशनी के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकते हैं। इसलिए चेहरे पर नींबू आधारित मिश्रण लगाने के बाद धूप में निकलने से बचना चाहिए। दिन के समय बाहर जाते हुए पर्याप्त SPF वाला sunscreen इस्तेमाल करना त्वचा की सुरक्षा के लिए ज्यादा भरोसेमंद उपाय है। नींबू को धूप से झुलसी त्वचा पर लगाने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।

    अगर चेहरे पर मुंहासे दाग धब्बे या pigmentation की समस्या है तो केवल नींबू पर निर्भर रहना सही तरीका नहीं है। लगातार बनी रहने वाली त्वचा संबंधी समस्या के लिए त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है। घरेलू नुस्खों से हर व्यक्ति को एक जैसा परिणाम मिले यह जरूरी नहीं है। खासकर जिन लोगों की त्वचा पहले से संवेदनशील है उन्हें बिना सलाह के acidic ingredients चेहरे पर लगाने से बचना चाहिए।

    स्किन केयर के लिए नींबू से ज्यादा जरूरी नियमित और सरल routine है। चेहरे को हल्के cleanser से साफ करना पर्याप्त मात्रा में moisturizer लगाना और दिन में sunscreen का इस्तेमाल करना त्वचा की देखभाल का बेहतर आधार बन सकता है। पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन लेना और नींद पूरी करना भी त्वचा की सामान्य सेहत के लिए उपयोगी है। नींबू का सेवन भोजन और पेय के रूप में विटामिन सी का स्रोत हो सकता है लेकिन इसे त्वचा पर लगाने को लेकर सावधानी जरूरी है।

    इसलिए अगर आप नींबू से स्किन केयर करना चाहते हैं तो सीधे नींबू का रस चेहरे पर लगाने के बजाय पहले अपनी त्वचा की संवेदनशीलता समझें। पैच टेस्ट करें और जलन होने पर तुरंत इस्तेमाल बंद कर दें। सुंदर और स्वस्थ त्वचा के लिए किसी भी घरेलू उपाय से ज्यादा जरूरी सुरक्षित और नियमित स्किन केयर routine है।

  • सुबह का नाश्ता छोड़ना और देर रात खाना पड़ सकता है भारी, जानिए भोजन का सही समय क्यों है जरूरी

    सुबह का नाश्ता छोड़ना और देर रात खाना पड़ सकता है भारी, जानिए भोजन का सही समय क्यों है जरूरी


    नई दिल्ली। सेहतमंद रहने के लिए लोग अक्सर अपनी डाइट पर खास ध्यान देते हैं। खाने में फल सब्जियां दालें साबुत अनाज और प्रोटीन से भरपूर चीजों को शामिल करना अच्छी आदत मानी जाती है। हालांकि केवल पौष्टिक भोजन खाना ही पर्याप्त नहीं होता। भोजन किस समय किया जा रहा है इसका भी शरीर पर असर पड़ सकता है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार खाने का समय शरीर के मेटाबॉलिज्म पाचन प्रक्रिया हार्मोन और नींद जैसी कई प्रक्रियाओं से जुड़ा हो सकता है। यही वजह है कि सही खान-पान के साथ नियमित भोजन का समय बनाए रखना भी जरूरी माना जाता है।

    हमारे शरीर में एक प्राकृतिक जैविक घड़ी होती है जिसे बायोलॉजिकल क्लॉक कहा जाता है। यह शरीर की कई प्रक्रियाओं को दिन और रात के अनुसार नियंत्रित करने में भूमिका निभाती है। नींद जागने की प्रक्रिया से लेकर हार्मोन के स्तर और पाचन तक कई गतिविधियां इसी प्राकृतिक लय से जुड़ी होती हैं। भोजन का समय भी इस व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि व्यक्ति रोजाना अलग-अलग समय पर खाना खाता है या लंबे समय तक भूखा रहता है तो उसकी दिनचर्या प्रभावित हो सकती है।

    सुबह का नाश्ता छोड़ना भी कई लोगों की आदत बन चुकी है। व्यस्तता के कारण कुछ लोग सीधे दोपहर का भोजन करते हैं। वहीं कुछ लोग दिनभर कम खाने के बाद रात में एक साथ ज्यादा भोजन कर लेते हैं। ऐसी आदतें पाचन संबंधी परेशानी बढ़ा सकती हैं। लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद अचानक भारी भोजन करने से पेट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए दिनभर भोजन के बीच बहुत लंबा अंतर रखने से बचना बेहतर माना जाता है।

    रात के खाने को लेकर भी सावधानी जरूरी है। देर रात भारी भोजन करने से पेट को भोजन पचाने के लिए अधिक समय लग सकता है। इससे कुछ लोगों को गैस एसिडिटी या पेट में भारीपन जैसी समस्या महसूस हो सकती है। देर से खाना और तुरंत सो जाना नींद की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ शोधों में देर से भोजन करने और वजन ब्लड शुगर तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के बीच संबंध की ओर भी संकेत मिले हैं।

    डिनर को बहुत देर तक टालने के बजाय अपनी दिनचर्या के अनुसार समय पर भोजन करना बेहतर विकल्प हो सकता है। आम तौर पर रात का भोजन सोने से कुछ घंटे पहले कर लेना सुविधाजनक माना जाता है। भोजन के बाद थोड़ी देर हल्की वॉक भी दिनचर्या का हिस्सा बनाई जा सकती है। करीब 10 से 15 मिनट की सामान्य चाल से टहलना पाचन के लिए मददगार हो सकता है और भोजन के बाद होने वाली सुस्ती को कम करने में भी सहायता कर सकता है।

    हालांकि हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है। उम्र काम करने का समय शारीरिक गतिविधि नींद की दिनचर्या और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार भोजन का समय बदल सकता है। किसी बीमारी या विशेष स्वास्थ्य स्थिति वाले व्यक्ति को अपनी डाइट और भोजन की टाइमिंग को लेकर डॉक्टर या योग्य आहार विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि भोजन पौष्टिक होने के साथ नियमित और संतुलित समय पर लिया जाए। सही खान-पान की आदतें लंबे समय तक स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखने में मदद कर सकती हैं।

  • दिल्ली घूमने का बना रहे हैं प्लान, तो नेशनल जूलॉजिकल पार्क की सैर जरूर करें, जानिए क्या देखें और कैसे पहुंचें

    दिल्ली घूमने का बना रहे हैं प्लान, तो नेशनल जूलॉजिकल पार्क की सैर जरूर करें, जानिए क्या देखें और कैसे पहुंचें


    नई दिल्ली। दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच अगर आप कुछ समय प्रकृति और वन्यजीवों के बीच बिताना चाहते हैं तो नेशनल जूलॉजिकल पार्क की सैर आपके लिए यादगार अनुभव बन सकती है। राजधानी के मथुरा रोड पर पुराने किले के पास स्थित यह चिड़ियाघर परिवार और बच्चों के साथ घूमने के लिए लोकप्रिय जगहों में शामिल है। यहां हरियाली के बीच अलग-अलग प्रजातियों के वन्यजीवों और पक्षियों को देखने का अवसर मिलता है। यह जगह मनोरंजन के साथ वन्यजीव संरक्षण के बारे में जानने का मौका भी देती है।

    दिल्ली चिड़ियाघर में घूमने के दौरान आपको कई तरह के जानवर और पक्षी देखने को मिल सकते हैं। बाघ और तेंदुए जैसे बड़े मांसाहारी जीवों से लेकर हिरण और बंदरों तक यहां वन्यजीवों की विविधता देखने को मिलती है। रंग-बिरंगे पक्षियों को देखना भी बच्चों के लिए खास अनुभव हो सकता है। जानवरों को उनके निर्धारित बाड़ों में देखकर बच्चे किताबों में पढ़ी जानकारी को वास्तविक जीवन से जोड़ सकते हैं। यही वजह है कि स्कूल के विद्यार्थियों और प्रकृति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए भी यह जगह आकर्षण का केंद्र है।

    चिड़ियाघर घूमने की योजना बनाते समय समय का ध्यान रखना जरूरी है। आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार एक अप्रैल से 15 अक्टूबर तक यहां सुबह 8:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक घूमने की व्यवस्था है। इस दौरान टिकट बुकिंग शाम 5 बजे बंद हो जाती है। 16 अक्टूबर से 31 मार्च तक सर्दियों में समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक रहता है और टिकट बुकिंग शाम 4:30 बजे बंद होती है। चिड़ियाघर प्रत्येक शुक्रवार को बंद रहता है। इसलिए यात्रा पर निकलने से पहले आधिकारिक वेबसाइट पर समय और टिकट की ताजा जानकारी जरूर देख लें।

    भारतीय पर्यटकों के लिए सामान्य प्रवेश टिकट की दर वयस्कों के लिए 80 रुपये है। पांच साल तक के बच्चों का प्रवेश निशुल्क है जबकि पांच से 12 साल तक के बच्चों और 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के लिए टिकट 40 रुपये है। टिकट ऑनलाइन बुक करने की सुविधा भी उपलब्ध है। दिव्यांगजनों के लिए व्हीलचेयर की सुविधा निशुल्क दी जाती है। परिसर में बैटरी से चलने वाले वाहन भी उपलब्ध हैं जिनसे पैदल चलने में परेशानी महसूस करने वाले पर्यटकों को मदद मिल सकती है। टिकट की दरों और सुविधाओं में बदलाव संभव है इसलिए जाने से पहले आधिकारिक जानकारी देखना बेहतर रहेगा।

    अगर आप परिवार के साथ जा रहे हैं तो आरामदायक जूते पहनकर निकलें क्योंकि परिसर में घूमने के लिए काफी पैदल चलना पड़ सकता है। पीने के पानी की व्यवस्था रखें और मौसम के अनुसार कपड़े पहनें। चिड़ियाघर के नियमों का पालन करना भी जरूरी है। जानवरों को खाना न खिलाएं और उन्हें परेशान करने से बचें। बाड़ों की सुरक्षा सीमा पार न करें तथा कचरा केवल निर्धारित डस्टबिन में डालें। परिसर में खाने की चीजों और अन्य प्रतिबंधित सामान को लेकर नियम लागू हैं इसलिए प्रवेश से पहले आधिकारिक निर्देश पढ़ लें।

    दिल्ली चिड़ियाघर की सैर को केवल घूमने की गतिविधि न मानें बल्कि इसे प्रकृति और जीव-जंतुओं को समझने का अवसर बनाएं। बच्चों को जानवरों की आदतों और उनके प्राकृतिक आवास के बारे में बताएं। अगर आप दिल्ली में परिवार के साथ एक दिन बिताने के लिए ऐसी जगह तलाश रहे हैं जहां मनोरंजन के साथ सीखने का अनुभव भी मिले तो नेशनल जूलॉजिकल पार्क आपकी यात्रा की योजना में शामिल किया जा सकता है।

  • डायबिटीज के मरीज जरूर जान लें खाने के बाद 5 से 20 मिनट टहलने का क्या होता है असर रिसर्च में सामने आई जरूरी बातें

    डायबिटीज के मरीज जरूर जान लें खाने के बाद 5 से 20 मिनट टहलने का क्या होता है असर रिसर्च में सामने आई जरूरी बातें


    नई दिल्ली। आजकल की व्यस्त जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या तेजी से चिंता का विषय बन रही है। खासकर डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए भोजन के बाद ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी होता है। ऐसे में रोजमर्रा की दिनचर्या में एक छोटी सी आदत शामिल करके सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यह आदत है खाना खाने के बाद कुछ देर टहलना। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार भोजन के बाद हल्की शारीरिक गतिविधि करने से शरीर को ग्लूकोज का इस्तेमाल करने में मदद मिलती है। हालांकि सवाल यह है कि आखिर 5 मिनट 10 मिनट या 20 मिनट में से कितनी देर चलना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।

    भोजन करने के बाद शरीर खाने में मौजूद कार्बोहाइड्रेट को तोड़कर ग्लूकोज में बदलता है। इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ सकता है। इस दौरान जब व्यक्ति लगातार बैठा रहता है तो मांसपेशियों की गतिविधि कम होती है। वहीं टहलने से मांसपेशियां सक्रिय होती हैं और वे ऊर्जा के लिए ग्लूकोज का इस्तेमाल करने लगती हैं। इस प्रक्रिया से भोजन के बाद ब्लड शुगर में होने वाली बढ़ोतरी को सीमित करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय तक लगातार बैठे रहने के बजाय बीच बीच में उठकर चलने की सलाह देते हैं।

    अगर आपके पास समय कम है तो भोजन के बाद 5 मिनट की हल्की वॉक से शुरुआत की जा सकती है। यह उन लोगों के लिए आसान विकल्प हो सकता है जो ऑफिस में काम करते हैं या जिनकी दिनचर्या काफी व्यस्त रहती है। कुछ मिनट चलने से भी शरीर को निष्क्रिय रहने के मुकाबले गतिविधि मिलती है। हालांकि इसका असर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति भोजन की मात्रा और ग्लूकोज नियंत्रण पर निर्भर कर सकता है।

    वहीं 10 मिनट की वॉक उन लोगों के लिए उपयोगी दिनचर्या बन सकती है जो भोजन के बाद थोड़ा अधिक समय निकाल सकते हैं। सामान्य गति से टहलने से मांसपेशियां सक्रिय रहती हैं और भोजन के बाद ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जरूरी नहीं कि तेज गति से चला जाए। आरामदायक चाल से नियमित रूप से चलना भी शुरुआत के लिए अच्छा विकल्प है।

    यदि आप आराम से 20 मिनट तक टहल सकते हैं तो यह आपकी दैनिक शारीरिक गतिविधि बढ़ाने में योगदान दे सकता है। नियमित वॉक से ब्लड शुगर नियंत्रण के साथ हृदय स्वास्थ्य और फिटनेस को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि केवल 20 मिनट चलने से हर व्यक्ति का ब्लड शुगर निश्चित रूप से सामान्य हो जाएगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। वॉक की अवधि और गति का चुनाव अपनी क्षमता और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार करना चाहिए।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी एक दिन लंबी वॉक करने के बजाय नियमित रूप से चलने की आदत विकसित की जाए। भोजन के बाद हल्की वॉक करना आसान शुरुआत हो सकती है। इसके साथ संतुलित आहार पर्याप्त नींद और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाओं का सेवन भी जरूरी है। डायबिटीज के मरीज अपनी दवा या इंसुलिन की मात्रा केवल वॉक शुरू करने के आधार पर खुद से न बदलें। यदि चलने के दौरान चक्कर कमजोरी या पसीना आने जैसे लक्षण महसूस हों तो रुककर ब्लड शुगर की जांच और जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। इस तरह अपनी दिनचर्या में छोटी लेकिन नियमित गतिविधि शामिल करके ब्लड शुगर नियंत्रण की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है।

  • सिर्फ सीने में दर्द ही नहीं, हार्ट अटैक से पहले हाथ, गर्दन, जबड़े और पेट के ऊपरी हिस्से में भी हो सकता है दर्द

    सिर्फ सीने में दर्द ही नहीं, हार्ट अटैक से पहले हाथ, गर्दन, जबड़े और पेट के ऊपरी हिस्से में भी हो सकता है दर्द


    नई दिल्ली:
    हार्ट अटैक को आमतौर पर सीने में दर्द या भारीपन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके संकेत केवल सीने तक सीमित नहीं होते। हार्ट अटैक के दौरान शरीर के कुछ दूसरे हिस्सों में भी दर्द या असहजता महसूस हो सकती है। कई बार लोग इसे सामान्य बॉडी पेन, गैस या पाचन संबंधी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हार्ट अटैक का खतरा केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं माना जाता और कम उम्र के लोगों में भी यह समस्या देखी जा रही है। ऐसे में शरीर में होने वाले असामान्य दर्द और अन्य संकेतों को समय रहते पहचानना जरूरी है।

    हार्ट अटैक के दौरान सीने के बीचोंबीच दर्द या किसी तरह का दबाव महसूस हो सकता है। कुछ लोगों को सीने में भारीपन या जकड़न की शिकायत होती है। यह असहजता कुछ मिनटों से ज्यादा समय तक रह सकती है या थोड़ी देर ठीक होने के बाद दोबारा शुरू हो सकती है। इसके अलावा दर्द बाएं या दाएं हाथ में भी महसूस हो सकता है। यह कंधे से शुरू होकर हाथ और उंगलियों तक फैल सकता है। दर्द कुछ समय बाद कम होकर फिर दोबारा भी हो सकता है। ऐसे दर्द को हमेशा सामान्य मानकर छोड़ना सही नहीं माना जाता।

    गर्दन, जबड़े और पीठ में तेज दर्द भी हार्ट अटैक से जुड़े संकेतों में शामिल हो सकता है। यह दर्द अचानक शुरू होकर लगातार बना रह सकता है या सीने में होने वाली असहजता के साथ दिखाई दे सकता है। खासतौर पर महिलाओं में इस तरह के लक्षण अधिक देखने को मिल सकते हैं। इसी तरह पेट के ऊपरी हिस्से में होने वाला दर्द भी ध्यान देने योग्य है। पेट में दर्द होने पर कई लोग इसे गैस, ऐंठन, कब्ज या पाचन संबंधी समस्या समझ लेते हैं, लेकिन हर बार इसका कारण सामान्य नहीं होता। हार्ट अटैक से पहले ऊपरी पेट में दर्द महसूस हो सकता है, इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    महिलाओं और पुरुषों में हार्ट अटैक के लक्षणों में कुछ अंतर हो सकते हैं। महिलाओं में भी सीने में दर्द या असहजता सबसे आम लक्षणों में शामिल है, लेकिन इसके साथ ऐसे संकेत भी दिखाई दे सकते हैं जिन्हें आमतौर पर हार्ट अटैक से नहीं जोड़ा जाता। इनमें घबराहट या बेचैनी, सांस लेने में परेशानी या सांस फूलना, जी मिचलाना या उल्टी, पेट खराब या अपच जैसी समस्या शामिल हो सकती है। महिलाओं को बिना ज्यादा मेहनत के असामान्य थकान और कमजोरी भी महसूस हो सकती है।

    हार्ट अटैक से जुड़े संकेतों को पहचानना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दर्द या असहजता शरीर के अलग-अलग हिस्सों में महसूस हो सकती है। सीने में दबाव या भारीपन के साथ हाथ, गर्दन, जबड़े, पीठ या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द हो तो इसे सामान्य दर्द मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर जब दर्द अचानक शुरू हो, बना रहे या दोबारा हो, तब इन संकेतों को गंभीरता से लेना जरूरी है। महिलाओं में सांस फूलना, मतली, उल्टी, बेचैनी और असामान्य थकान जैसे लक्षण भी ध्यान देने योग्य हो सकते हैं।