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  • मानसून में त्वचा क्यों हो जाती है चिपचिपी और बेजान, इन जरूरी टिप्स से रखें स्किन को हेल्दी और ग्लोइंग

    मानसून में त्वचा क्यों हो जाती है चिपचिपी और बेजान, इन जरूरी टिप्स से रखें स्किन को हेल्दी और ग्लोइंग


    नई दिल्ली। मानसून का मौसम गर्मी से राहत जरूर देता है लेकिन इस दौरान वातावरण में नमी बढ़ जाने के कारण त्वचा से जुड़ी कई परेशानियां भी बढ़ सकती हैं। बारिश के मौसम में ज्यादा नमी और पसीने की वजह से त्वचा चिपचिपी महसूस हो सकती है। इसके साथ ही धूल मिट्टी और प्रदूषण त्वचा पर आसानी से जमा हो जाते हैं जिससे रोमछिद्र बंद होने का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में अगर त्वचा की सही तरीके से देखभाल न की जाए तो मुंहासे ब्लैकहेड्स खुजली और फंगल इंफेक्शन जैसी समस्याएं परेशान कर सकती हैं। इसलिए मानसून में स्किन केयर रूटीन को थोड़ा बदलना जरूरी माना जाता है।

    बारिश के मौसम में चेहरे को साफ रखना सबसे जरूरी है। दिन में दो बार किसी हल्के फेस क्लींजर से चेहरा साफ किया जा सकता है। बहुत ज्यादा तेज साबुन या कठोर स्क्रब का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे त्वचा की प्राकृतिक नमी प्रभावित हो सकती है। अगर त्वचा बहुत तैलीय है तो ऑयली स्किन के लिए उपयुक्त हल्का क्लींजर इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं रूखी या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को ऐसा उत्पाद चुनना चाहिए जो त्वचा को जरूरत से ज्यादा ड्राई न करे।

    मानसून में लोग अक्सर यह सोचकर मॉइस्चराइजर लगाना छोड़ देते हैं कि वातावरण में पहले से ही नमी है। लेकिन त्वचा को मॉइस्चराइज रखना फिर भी जरूरी है। इस मौसम में हल्का और नॉन कॉमेडोजेनिक मॉइस्चराइजर इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे त्वचा में नमी बनी रहने में मदद मिलती है और भारीपन या अत्यधिक चिपचिपाहट भी महसूस नहीं होती।

    बारिश के मौसम में धूप कम नजर आने के बावजूद सनस्क्रीन को स्किन केयर रूटीन से बाहर नहीं करना चाहिए। बादलों के बीच भी पराबैंगनी किरणों का संपर्क त्वचा तक हो सकता है। इसलिए बाहर निकलते समय अपनी त्वचा के अनुसार ब्रॉड स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। लंबे समय तक बाहर रहने पर इसे दोबारा लगाने की जरूरत पड़ सकती है।

    मानसून में पसीना और नमी अधिक होने के कारण चेहरे को बार बार छूने की आदत से भी बचना चाहिए। हाथों पर मौजूद गंदगी और बैक्टीरिया चेहरे तक पहुंच सकते हैं और मुंहासों की समस्या बढ़ा सकते हैं। मेकअप करने वाले लोगों को भी रात में सोने से पहले मेकअप अच्छी तरह साफ करना चाहिए। गीले कपड़े पहनने या लंबे समय तक नम जूते मोजे इस्तेमाल करने से त्वचा पर फंगल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है इसलिए शरीर को साफ और सूखा रखना जरूरी है।

    स्किन की सेहत केवल बाहरी देखभाल से तय नहीं होती। मानसून में पर्याप्त पानी पीना संतुलित आहार लेना और पर्याप्त नींद लेना भी जरूरी है। मौसमी फल सब्जियां और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन त्वचा के लिए फायदेमंद हो सकता है। बहुत ज्यादा तला भुना या अत्यधिक मीठा भोजन करने के बजाय संतुलित डाइट पर ध्यान देना बेहतर है।

    अगर त्वचा पर लगातार खुजली लाल चकत्ते सूजन दर्दनाक मुंहासे या किसी तरह का संक्रमण दिखाई दे तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है। हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति के स्किन केयर प्रोडक्ट को बिना सोचे समझे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मानसून में थोड़ी सी सावधानी और नियमित देखभाल से त्वचा को स्वस्थ साफ और तरोताजा बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • झुर्रियों के लिए घरेलू नुस्खा अपनाने से पहले जानें अलसी और एलोवेरा मिश्रण बनाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    झुर्रियों के लिए घरेलू नुस्खा अपनाने से पहले जानें अलसी और एलोवेरा मिश्रण बनाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली । उम्र बढ़ने के साथ त्वचा में प्राकृतिक बदलाव दिखाई देना सामान्य है। समय के साथ त्वचा की लोच कम हो सकती है और चेहरे पर फाइन लाइन्स तथा झुर्रियां नजर आने लगती हैं। इन्हें कम करने के लिए लोग अलग-अलग एंटी-एजिंग उत्पादों और घरेलू नुस्खों का सहारा लेते हैं। अलसी, एलोवेरा जेल और बादाम तेल से तैयार किया जाने वाला मिश्रण भी इसी तरह के घरेलू स्किन केयर उपायों में शामिल है।

    इस मिश्रण को तैयार करने के लिए सबसे पहले अलसी के बीजों से जेल बनाया जाता है। इसके लिए दो बड़े चम्मच अलसी के बीज लेकर उन्हें एक कप पानी में डालें और मध्यम आंच पर करीब पांच से सात मिनट तक पकाएं। जब पानी गाढ़ा और कुछ चिपचिपा दिखाई देने लगे, तब गैस बंद कर दें।

    अलसी और पानी के इस मिश्रण को गर्म रहते हुए बारीक छलनी या साफ सूती कपड़े से छान लें। इससे बीज अलग हो जाएंगे और जेल जैसा पदार्थ बच जाएगा। इसके बाद इस जेल को पूरी तरह ठंडा करना जरूरी है, ताकि आगे इसमें मिलाए जाने वाले दूसरे पदार्थों का टेक्सचर प्रभावित न हो।

    ठंडे अलसी जेल में दो बड़े चम्मच एलोवेरा जेल मिलाया जा सकता है। इसके बाद इसमें एक छोटा चम्मच बादाम तेल डालकर सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाएं। चम्मच या छोटे व्हिस्कर की सहायता से मिश्रण को कुछ मिनट तक फेंटने पर इसका टेक्सचर अपेक्षाकृत चिकना और क्रीमी हो सकता है।

    तैयार मिश्रण को साफ और सूखे कांच के छोटे कंटेनर में रखना चाहिए। इसमें पानी और पौधों से प्राप्त ताजा सामग्री होती है तथा इसमें सामान्य कॉस्मेटिक प्रिजर्वेटिव मौजूद नहीं होते। इसलिए इसे लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखना उचित नहीं है। फ्रिज में रखने के बावजूद खराब होने के संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    रंग, गंध या टेक्सचर में बदलाव नजर आए तो मिश्रण का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। घरेलू मिश्रण के लिए एक निश्चित अवधि तक सुरक्षित रहने की गारंटी नहीं दी जा सकती, क्योंकि इसकी स्वच्छता, सामग्री और भंडारण की स्थिति के आधार पर इसकी गुणवत्ता बदल सकती है।

    अगर त्वचा इस मिश्रण को सहन करती है तो रात में चेहरा साफ करने के बाद थोड़ी मात्रा लगाई जा सकती है। हल्के हाथों से चेहरे और गर्दन पर इसे लगाया जा सकता है। हालांकि इसे लगाने से झुर्रियां खत्म होने या त्वचा में कोलेजन उत्पादन बढ़ने की गारंटी नहीं है।

    दरअसल, अलसी, एलोवेरा और बादाम तेल से बने इस घरेलू मिश्रण को सीधे तौर पर कोलेजन बढ़ाने वाली प्रमाणित क्रीम कहना सही नहीं होगा। इनके त्वचा को मॉइश्चराइज करने या मुलायम बनाए रखने से जुड़े संभावित फायदे हो सकते हैं, लेकिन एंटी-एजिंग और कोलेजन उत्पादन पर मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं।

    इस मिश्रण का इस्तेमाल शुरू करने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। थोड़ी मात्रा हाथ या कान के पीछे की त्वचा पर लगाकर देखें। लालिमा, खुजली, जलन या किसी अन्य प्रतिक्रिया की स्थिति में इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। संवेदनशील त्वचा, एलर्जी या पहले से त्वचा संबंधी समस्या होने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।

    त्वचा की देखभाल में पर्याप्त मॉइश्चराइजिंग के साथ धूप से बचाव और नियमित स्किन केयर अधिक महत्वपूर्ण हैं। झुर्रियों या उम्र से जुड़े त्वचा परिवर्तन को लेकर किसी खास उपचार की जरूरत हो तो घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना अधिक सुरक्षित विकल्प है।

  • चींटियों की गंध पहचानने की क्षमता पर असर डालते हैं ये घरेलू उपाय, जानिए रसोई में कैसे करें इस्तेमाल

    चींटियों की गंध पहचानने की क्षमता पर असर डालते हैं ये घरेलू उपाय, जानिए रसोई में कैसे करें इस्तेमाल


    नई दिल्ली ।
    रसोई और घर में चींटियों का दिखाई देना आम समस्या है। खासकर गर्मी और बारिश के मौसम में खाने-पीने की चीजों के आसपास इनकी संख्या बढ़ सकती है। चीनी, मिठाई और अन्य मीठी चीजें चींटियों को जल्दी आकर्षित करती हैं। कई बार खाने के छोटे कण या चिपचिपे अवशेष अच्छी तरह सफाई करने के बाद भी रह जाते हैं, जिनकी गंध चींटियों को उस स्थान तक पहुंचा देती है।

    एक बार चींटियां किसी जगह पर लगातार आने लगें तो उन्हें रोकना आसान नहीं होता। ऐसे में केवल उन्हें हटाने के बजाय उस जगह की नियमित सफाई करना और उनके आने के रास्ते को बाधित करना ज्यादा प्रभावी तरीका हो सकता है। कुछ घरेलू चीजों की तेज गंध भी चींटियों की गतिविधि को कम करने में मदद कर सकती है।

    लौंग को चींटियों को दूर रखने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी तेज खुशबू उन स्थानों पर रखी जा सकती है जहां चींटियां बार-बार दिखाई देती हैं। खासतौर पर चीनी या अन्य मीठी चीजों के डिब्बों के आसपास लौंग रखने से चींटियों की आवाजाही को रोकने में मदद मिल सकती है।

    तेजपत्ता भी रसोई में आसानी से उपलब्ध होने वाला विकल्प है। तेजपत्ते को हल्का तोड़कर उन जगहों पर रखा जा सकता है जहां से चींटियां आती हैं। इसकी गंध चींटियों के लिए अप्रिय मानी जाती है और यह उनके आने वाले रास्ते को बदलने में मदद कर सकती है।

    दालचीनी का इस्तेमाल भी इसी तरह किया जा सकता है। इसे पाउडर के रूप में रसोई के दरवाजे, खिड़की या उन दरारों के पास रखा जा सकता है जहां से चींटियां अंदर आती हैं। इसकी तेज खुशबू चींटियों को उस रास्ते से दूर रखने में मदद कर सकती है।

    हल्दी भी एक घरेलू उपाय है। इसे उन जगहों पर हल्की रेखा के रूप में रखा जा सकता है जहां से चींटियों के घर के अंदर आने की संभावना होती है। हालांकि, इसका इस्तेमाल साफ और सूखी सतह पर करना बेहतर रहता है, ताकि रसोई में गंदगी न फैले।

    नींबू का रस भी चींटियों की गंध आधारित राह को प्रभावित करने में मदद कर सकता है। इसके लिए नींबू के रस को पानी में मिलाकर उन स्थानों पर छिड़का जा सकता है जहां चींटियां दिखाई देती हैं। रसोई के फर्श, खिड़की और दरवाजे के आसपास सफाई के बाद इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

    सफेद सिरके और पानी का घोल भी चींटियों की आवाजाही वाले स्थानों की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे फर्श, खिड़की, दरवाजे और डस्टबिन के आसपास छिड़कने से चींटियों के छोड़े हुए गंध संकेत कम करने में मदद मिल सकती है।

    पुदीने या पेपरमिंट की तेज खुशबू भी चींटियों को दूर रखने के लिए इस्तेमाल की जाती है। पानी में थोड़ी मात्रा में पेपरमिंट एसेंशियल ऑयल मिलाकर चींटियों के आने वाले रास्तों पर हल्का स्प्रे किया जा सकता है। हालांकि, इसे खाने की चीजों, बर्तनों और बच्चों की पहुंच से दूर रखना चाहिए।

    इन उपायों के साथ रसोई में मीठी और खाने की वस्तुओं को अच्छी तरह बंद डिब्बों में रखना, गिरे हुए खाद्य पदार्थों को तुरंत साफ करना और पानी या नमी जमा न होने देना जरूरी है। अगर चींटियों का प्रकोप लगातार बना रहे या बड़ी संख्या में चींटियां घर में फैल जाएं, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय उचित कीट नियंत्रण उपाय अपनाना अधिक प्रभावी हो सकता है।

  • मलेरिया से बचना है तो आज से बदलें ये आदतें, मच्छरों की रोकथाम से लेकर बचाव तक जानें जरूरी बातें

    मलेरिया से बचना है तो आज से बदलें ये आदतें, मच्छरों की रोकथाम से लेकर बचाव तक जानें जरूरी बातें


    नई दिल्ली। बारिश का मौसम आते ही मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इनमें मलेरिया भी एक प्रमुख बीमारी है जो संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलती है। मलेरिया से बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि मच्छरों की संख्या को नियंत्रित किया जाए और उनके काटने से खुद को सुरक्षित रखा जाए। खासकर बरसात में घर के आसपास जमा पानी पर नजर रखना जरूरी है क्योंकि ठहरा हुआ पानी मच्छरों के पनपने की जगह बन सकता है। थोड़ी सी सावधानी अपनाकर मलेरिया के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    मलेरिया से बचने का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों के काटने से बचाव करना है। शाम और रात के समय जब मच्छरों की गतिविधि बढ़ सकती है तब पूरी बांह के कपड़े पहनना बेहतर रहता है। घर में खिड़कियों और दरवाजों पर मच्छररोधी जाली लगाई जा सकती है। सोते समय मच्छरदानी का इस्तेमाल भी उपयोगी है। जरूरत के अनुसार मच्छर भगाने वाली क्रीम या अन्य मच्छररोधी साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। बच्चों को मच्छरों से बचाने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

    घर और आसपास पानी जमा न होने देना मलेरिया की रोकथाम का दूसरा महत्वपूर्ण तरीका है। गमलों की प्लेटों कूलर की टंकियों बाल्टियों पुराने टायरों छतों और अन्य स्थानों पर जमा पानी को नियमित रूप से खाली करें। पानी की टंकियों और ऐसे सभी बर्तनों को ढककर रखें जिनमें पानी जमा रहता है। कूलर का पानी भी नियमित रूप से बदलें और उसकी सफाई करें। अगर आसपास किसी जगह लंबे समय से पानी जमा है तो उसे हटाने या संबंधित स्थानीय निकाय को इसकी सूचना देने की कोशिश करें।

    मलेरिया के शुरुआती लक्षणों को पहचानना भी जरूरी है। बुखार ठंड लगना सिरदर्द शरीर में कमजोरी पसीना आना और बदन दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ मामलों में मतली या उल्टी जैसी परेशानी भी हो सकती है। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर मलेरिया की पुष्टि नहीं की जा सकती। ऐसे लक्षण होने पर स्वास्थ्य केंद्र या डॉक्टर से संपर्क करके आवश्यक जांच करानी चाहिए।

    मलेरिया के इलाज में देरी करना नुकसानदायक हो सकता है। खासकर तेज बुखार लगातार कमजोरी बेहोशी सांस लेने में परेशानी दौरे या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है। बच्चों गर्भवती महिलाओं बुजुर्गों और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में बीमारी गंभीर रूप ले सकती है इसलिए इनके मामले में लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    मलेरिया से बचाव केवल व्यक्तिगत सावधानी तक सीमित नहीं है। पूरे समुदाय को मिलकर मच्छरों के प्रजनन स्थल कम करने होंगे। घर के आसपास सफाई रखना नालियों में पानी जमा न होने देना और लंबे समय तक खुले में पानी न छोड़ना सामूहिक रूप से बीमारी के खतरे को कम कर सकता है। बारिश के मौसम में साफ सफाई और मच्छर नियंत्रण को लेकर जागरूकता सबसे जरूरी हथियार है।

    ध्यान रखें कि मलेरिया से बचने का सबसे अच्छा तरीका मच्छरों के काटने से सुरक्षा और मच्छरों के प्रजनन को रोकना है। यदि बुखार या मलेरिया से जुड़े लक्षण दिखाई दें तो खुद से दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय सलाह और जांच कराना बेहतर है। सही समय पर पहचान और इलाज से गंभीर जटिलताओं के खतरे को कम किया जा सकता है।

  • केला कब खाएं और किस तरह? नाश्ते से लेकर रात तक जानिए सही समय, फायदे और जरूरी सावधानियां

    केला कब खाएं और किस तरह? नाश्ते से लेकर रात तक जानिए सही समय, फायदे और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली। केला ऐसा फल है जो स्वादिष्ट होने के साथ आसानी से उपलब्ध भी होता है। यही वजह है कि इसे लोग नाश्ते से लेकर वर्कआउट के पहले और बाद तक अलग अलग समय पर खाते हैं। लेकिन केला खाने के सही समय को लेकर लोगों के मन में कई सवाल रहते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि सुबह खाली पेट केला खाना सबसे ज्यादा फायदेमंद है जबकि कुछ लोग रात में केला खाने से बचने की सलाह देते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो केले को खाने का कोई एक तय समय नहीं है। इसे व्यक्ति अपनी दिनचर्या और शरीर की जरूरत के अनुसार खा सकता है।

    केला कार्बोहाइड्रेट फाइबर पोटैशियम और विटामिन बी6 जैसे जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है। इसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट शरीर को ऊर्जा देने में मदद करता है और यही कारण है कि इसे वर्कआउट से पहले या बाद में भी स्नैक के तौर पर खाया जाता है। पोटैशियम मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज के साथ शरीर में तरल पदार्थों के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं विटामिन बी6 शरीर की कई जरूरी जैविक प्रक्रियाओं में मदद करता है। हालांकि केवल केला खाने से शरीर की सभी पोषण संबंधी जरूरतें पूरी नहीं होतीं इसलिए इसे संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना बेहतर माना जाता है।

    सुबह खाली पेट केला खाने की बात करें तो अगर किसी व्यक्ति को इससे पेट में परेशानी नहीं होती है तो वह इसे नाश्ते में शामिल कर सकता है। लेकिन कुछ लोगों को खाली पेट फल खाने के बाद पेट फूलने भारीपन या असहजता महसूस हो सकती है। ऐसे लोगों के लिए केले को अकेले खाने के बजाय ओट्स दही या किसी अन्य संतुलित नाश्ते के साथ लेना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे भोजन में दूसरे जरूरी पोषक तत्व भी शामिल हो जाते हैं।

    केला और दूध का शेक या स्मूदी भी काफी लोकप्रिय है। केला शरीर को कार्बोहाइड्रेट देता है जबकि दूध से प्रोटीन और दूसरे पोषक तत्व मिल सकते हैं। अगर किसी व्यक्ति को दूध और केला दोनों आसानी से पचते हैं तो यह संयोजन सामान्य डाइट का हिस्सा हो सकता है। हालांकि जिन लोगों को दूध में मौजूद लैक्टोज से परेशानी होती है उन्हें गैस या पेट फूलने जैसी समस्या हो सकती है। ऐसी स्थिति में परेशानी का कारण केवल केला मानना सही नहीं होगा।

    अब सवाल आता है कि क्या रात में केला खाना नुकसानदायक है। सामान्य तौर पर रात में केला खाने पर कोई सार्वभौमिक रोक नहीं है। अगर किसी व्यक्ति को रात में केला खाने से पेट भारी या असहज महसूस नहीं होता तो वह इसे खा सकता है। लेकिन अगर सोने से पहले केला खाने के बाद पाचन संबंधी परेशानी महसूस होती है तो इसे दिन के समय लेना बेहतर रहेगा।

    कुछ लोगों को केला खाते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए। डायबिटीज वाले लोगों को केले की मात्रा और अपनी पूरी डाइट का ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि इसमें प्राकृतिक शर्करा और कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं। वहीं किडनी की बीमारी वाले लोगों को पोटैशियम की मात्रा को लेकर डॉक्टर या डाइटीशियन की सलाह लेनी चाहिए। कुल मिलाकर केला किसी एक खास समय का फल नहीं है। अपनी पाचन क्षमता और जरूरत के अनुसार इसे नाश्ते वर्कआउट के आसपास या दिन के किसी अन्य समय लिया जा सकता है। बेहतर स्वास्थ्य के लिए केले के साथ दूसरे फलों सब्जियों साबुत अनाज दाल और प्रोटीन स्रोतों को भी डाइट में शामिल करना जरूरी है।

  • एचआईवी से बचाव के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन को भारत में मंजूरी, ज्यादा जोखिम वाले वयस्कों और किशोरों को मिलेगा लाभ

    एचआईवी से बचाव के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन को भारत में मंजूरी, ज्यादा जोखिम वाले वयस्कों और किशोरों को मिलेगा लाभ

    नई दिल्ली ।एचआईवी संक्रमण से बचाव की दिशा में भारत में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। देश में पहली बार एचआईवी संक्रमण के ज्यादा जोखिम वाले लोगों के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन के इस्तेमाल को मंजूरी मिली है। यह इंजेक्शन एचआईवी-1 संक्रमण से बचाव के लिए प्री-एक्सपोजर प्रोफाइलेक्सिस यानी PrEP के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की विशेषज्ञ समितियों ने इसके निर्माण और बिक्री से जुड़े प्रस्ताव पर अहम सिफारिशें की हैं।

    लेनाकैपाविर का विकल्प खास तौर पर उन वयस्कों और किशोरों के लिए प्रस्तावित है जिनका वजन कम से कम 35 किलोग्राम है और जिनमें एचआईवी-1 संक्रमण का खतरा अधिक है। इसका उद्देश्य संक्रमण होने से पहले शरीर में दवा की मौजूदगी के जरिए एचआईवी के जोखिम को कम करना है। ऐसे लोगों के लिए यह रोकथाम के उपलब्ध विकल्पों में एक नया विकल्प जोड़ सकता है।

    हालांकि, लेनाकैपाविर शुरू करने से पहले एचआईवी जांच का निगेटिव होना जरूरी होगा। इसका कारण यह है कि PrEP का इस्तेमाल संक्रमण से पहले बचाव के लिए किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति में पहले से एचआईवी संक्रमण मौजूद है, तो उसके लिए केवल रोकथाम वाली दवा का इस्तेमाल उचित उपचार का विकल्प नहीं माना जाता।

    एचआईवी से बचाव के लिए PrEP उन लोगों को दिया जाता है जिनमें संक्रमण का जोखिम अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। जोखिम की स्थिति व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वास्थ्य संबंधी कारकों पर निर्भर करती है। ऐसे लोगों में चिकित्सकीय मूल्यांकन और एचआईवी जांच के बाद ही यह तय किया जाता है कि PrEP उनके लिए उपयुक्त है या नहीं।

    लेनाकैपाविर एक लंबे समय तक असर करने वाली एंटीरेट्रोवायरल दवा है। इसकी खासियत यह है कि इसे नियमित रूप से रोजाना गोली लेने के बजाय लंबे अंतराल पर दिए जाने वाले इंजेक्शन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि एचआईवी रोकथाम के क्षेत्र में इस दवा को महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

    विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें भारत में एचआईवी रोकथाम की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। लंबे समय तक असर करने वाले विकल्प उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें रोजाना दवा लेने में परेशानी होती है या नियमित रूप से दवा लेना व्यावहारिक रूप से कठिन लगता है।

    हालांकि लेनाकैपाविर को एचआईवी का इलाज या वैक्सीन नहीं माना जाना चाहिए। इसका इस्तेमाल संक्रमण से पहले बचाव के लिए किया जाता है। इंजेक्शन लेने वाले व्यक्ति को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार एचआईवी जांच और आवश्यक स्वास्थ्य निगरानी करानी होगी। इसके साथ सुरक्षित व्यवहार और अन्य उपलब्ध रोकथाम उपायों की भूमिका भी बनी रहेगी।

    इसी प्रक्रिया के दौरान अन्य दवाओं से जुड़े प्रस्तावों पर भी विशेषज्ञ समिति ने विचार किया है। एटॉपिक डर्मेटाइटिस के हल्के से मध्यम मामलों में गैर-प्रतिरक्षा-कमजोर वयस्कों के लिए रक्सोलिटिनिब 1.5 प्रतिशत क्रीम के निर्माण और बिक्री की अनुमति की सिफारिश की गई है। इसके अलावा पेट और आंत से जुड़ी बीमारी में इस्तेमाल होने वाली रिफैक्सिमिन को 400 और 550 मिलीग्राम के सैशे में उपलब्ध कराने की दिशा में भी सिफारिश की गई है।

    लेनाकैपाविर की मंजूरी से एचआईवी रोकथाम के क्षेत्र में एक नया चिकित्सकीय विकल्प जुड़ा है। अब इसके प्रभावी और सुरक्षित इस्तेमाल के लिए निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया, एचआईवी जांच और पात्र लोगों की पहचान महत्वपूर्ण होगी। ज्यादा जोखिम वाले लोगों तक रोकथाम के प्रभावी विकल्प पहुंचाना एचआईवी संक्रमण को नियंत्रित करने की व्यापक रणनीति का अहम हिस्सा रहेगा।

  • होटलों में सफेद तौलिया रखने के पीछे सफाई, लॉन्ड्री और मेहमानों के भरोसे से जुड़े ये व्यावहारिक कारण होते हैं

    होटलों में सफेद तौलिया रखने के पीछे सफाई, लॉन्ड्री और मेहमानों के भरोसे से जुड़े ये व्यावहारिक कारण होते हैं


    नई दिल्ली ।होटल में ठहरने के दौरान सफेद तौलिया एक सामान्य दृश्य होता है। बाथरूम में हाथ पोंछने से लेकर नहाने के लिए इस्तेमाल होने वाले तौलियों का रंग अक्सर सफेद रखा जाता है। इसके पीछे केवल पसंद या सजावट की वजह नहीं होती, बल्कि सफाई, लॉन्ड्री व्यवस्था, रखरखाव और मेहमानों के अनुभव से जुड़े व्यावहारिक कारण भी होते हैं।

    होटल में रोज बड़ी संख्या में तौलिए इस्तेमाल होते हैं और हर मेहमान के बाद उन्हें साफ करके दोबारा तैयार करना पड़ता है। सफेद रंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उस पर गंदगी, दाग या किसी तरह का निशान आसानी से दिखाई देता है। यदि तौलिया ठीक से साफ नहीं हुआ हो या उस पर दाग रह गया हो तो होटल का कर्मचारी उसे जल्दी पहचान सकता है और दोबारा धुलाई के लिए भेज सकता है।

    रंगीन तौलियों में कुछ दाग या हल्की गंदगी कम दिखाई दे सकती है। ऐसे में सफेद तौलिया होटल की सफाई व्यवस्था में एक तरह के दृश्य निरीक्षण का काम करता है। इससे हाउसकीपिंग टीम को इस्तेमाल किए गए लिनेन की स्थिति समझने और साफ तौलिया उपलब्ध कराने में सुविधा होती है।

    सफेद रंग चुनने का एक महत्वपूर्ण कारण लॉन्ड्री प्रक्रिया भी है। होटल में तौलियों की संख्या काफी अधिक होती है और उन्हें नियमित रूप से उच्च तापमान वाली धुलाई तथा जरूरत के अनुसार उपयुक्त सफाई उत्पादों से धोया जाता है। सफेद कपड़े पर दाग हटाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान होती है और रंग फीका पड़ने की चिंता रंगीन कपड़ों की तुलना में कम रहती है।

    होटल में सफेद तौलिए का इस्तेमाल इसलिए भी सुविधाजनक माना जाता है क्योंकि सभी तौलिए एक ही रंग के होने पर उन्हें एक साथ धोना आसान होता है। अलग-अलग रंगों के लिनेन को रंग छोड़ने या रंग मिल जाने की आशंका के कारण अलग-अलग संभालना पड़ सकता है। एक समान सफेद लिनेन बड़े होटल की लॉन्ड्री व्यवस्था को व्यवस्थित रखने में मदद करता है।

    इसके अलावा सफेद रंग मेहमानों के मन में स्वच्छता और ताजगी की भावना पैदा करता है। सफेद चादर, तकिया और तौलिया कमरे को साफ, सादा और व्यवस्थित दिखाने में मदद करते हैं। होटल में प्रवेश करने वाले मेहमान के लिए यह दृश्य अनुभव महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि कमरे की साफ-सफाई का आकलन अक्सर दिखाई देने वाली चीजों से ही किया जाता है।

    सफेद तौलिया होटल की पेशेवर छवि से भी जुड़ा हुआ है। अलग-अलग कमरों में एक जैसा लिनेन इस्तेमाल करने से होटल की व्यवस्था एकरूप दिखाई देती है। इससे हाउसकीपिंग, स्टॉक प्रबंधन और तौलियों की गुणवत्ता की निगरानी भी आसान हो सकती है। साथ ही, एक ही रंग के लिनेन से कर्मचारियों को इस्तेमाल, धुलाई और दोबारा कमरे में रखने की प्रक्रिया में पहचान संबंधी सुविधा मिलती है।

    हालांकि हर होटल में सफेद तौलिया होना अनिवार्य नियम नहीं है। कुछ होटल अपनी सजावट, ब्रांड पहचान या डिजाइन के अनुसार दूसरे रंगों के तौलिए भी इस्तेमाल करते हैं। फिर भी सफेद रंग अपनी साफ-सफाई दिखाने, लॉन्ड्री प्रक्रिया को सरल रखने और मेहमानों को ताजगी का एहसास कराने जैसे कारणों से होटल उद्योग में लंबे समय से लोकप्रिय बना हुआ है।

  • पल्स ऑक्सीमीटर से जानें ऑक्सीजन स्तर, लगातार कमजोरी और बेचैनी दिखे तो इन संकेतों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं

    पल्स ऑक्सीमीटर से जानें ऑक्सीजन स्तर, लगातार कमजोरी और बेचैनी दिखे तो इन संकेतों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं

    नई दिल्ली । शरीर के प्रत्येक अंग को सामान्य रूप से काम करने के लिए लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन रक्त में मिलती है और फिर रक्त के जरिए दिमाग, हृदय, मांसपेशियों तथा अन्य अंगों तक पहुंचती है। जब रक्त में ऑक्सीजन का स्तर सामान्य से कम होने लगता है, तो इस स्थिति को हाइपोक्सीमिया कहा जाता है। इसकी गंभीरता कारण और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर कर सकती है।

    ऑक्सीजन का स्तर कम होने पर शरीर शुरुआत में इसकी भरपाई करने का प्रयास करता है। इस दौरान सांस लेने की गति बढ़ सकती है और दिल तेजी से धड़क सकता है। व्यक्ति को बेचैनी, घबराहट या सांस लेने में कठिनाई महसूस हो सकती है। कुछ मामलों में थोड़ी शारीरिक गतिविधि के बाद ही सांस फूलने लगती है, जबकि गंभीर स्थिति में आराम के समय भी सांस लेने में परेशानी हो सकती है।

    हालांकि सांस फूलना केवल कम ऑक्सीजन का संकेत नहीं है। एनीमिया, चिंता, मोटापा, हृदय संबंधी समस्याओं और कई अन्य स्वास्थ्य स्थितियों में भी सांस लेने में दिक्कत हो सकती है। इसलिए अचानक शुरू हुई या लगातार बढ़ रही सांस की परेशानी को केवल थकान मानकर छोड़ना उचित नहीं है।

    ऑक्सीजन की गंभीर कमी होने पर होंठ, नाखून या त्वचा का रंग नीला या नीला-सा दिखाई दे सकता है। इस स्थिति को सायनोसिस कहा जाता है। यदि किसी व्यक्ति के होंठ या चेहरा नीला पड़ने लगे और साथ में सांस लेने में परेशानी हो, तो यह गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है और तत्काल चिकित्सकीय सहायता की जरूरत पड़ सकती है।

    ऑक्सीजन कम होने का असर मस्तिष्क पर भी पड़ सकता है। पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने पर चक्कर आना, सिरदर्द, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी, भ्रम, असामान्य व्यवहार और अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। कुछ गंभीर मामलों में व्यक्ति को अत्यधिक नींद आने या बेहोशी जैसी स्थिति का भी सामना करना पड़ सकता है।

    शरीर में ऑक्सीजन की स्थिति का आकलन करने के लिए पल्स ऑक्सीमीटर का इस्तेमाल किया जाता है। स्वस्थ लोगों में SpO₂ आमतौर पर 95 से 100 प्रतिशत के बीच रहता है। हालांकि फेफड़ों या हृदय की कुछ बीमारियों वाले लोगों में सामान्य स्तर अलग हो सकता है। इसलिए ऑक्सीमीटर की रीडिंग को व्यक्ति की चिकित्सकीय स्थिति के संदर्भ में समझना जरूरी है।

    यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ लोगों में ऑक्सीजन कम होने के बावजूद शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। इसलिए केवल यह देखकर कि सांस सामान्य चल रही है, ऑक्सीजन स्तर को सामान्य मान लेना सही नहीं है। जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह और उचित जांच से वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाता है।

    ऑक्सीजन कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। निमोनिया, अस्थमा, सीओपीडी और फेफड़ों के संक्रमण जैसी स्थितियां सांस के जरिए शरीर में ऑक्सीजन पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। हृदय की कुछ बीमारियां, सांस लेने में रुकावट, फेफड़ों में रक्त का थक्का और अधिक ऊंचाई वाले स्थानों पर जाना भी ऑक्सीजन स्तर को प्रभावित कर सकता है।

    यदि सांस लेने में अचानक गंभीर परेशानी हो, होंठ या त्वचा नीली पड़ने लगे, भ्रम या बेहोशी जैसी स्थिति बने या व्यक्ति की हालत तेजी से बिगड़ रही हो, तो इसे गंभीर संकेत मानकर तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। लगातार कमजोरी, चक्कर, बेचैनी या सांस से जुड़ी समस्या होने पर भी डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। समय पर कारण की पहचान और उपचार से गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    नई दिल्ली ।त्योहारों का मौसम शुरू होते ही मिठाइयों और उनसे जुड़े खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने लगती है। इस दौरान मावे का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में किया जाता है, क्योंकि कई पारंपरिक मिठाइयों में यह प्रमुख सामग्री होती है। मांग बढ़ने के साथ बाजार में घटिया या मिलावटी मावे की बिक्री की आशंका भी बढ़ सकती है। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए मावा खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है।

    मावा खरीदते समय सबसे पहले उसके रंग और बनावट पर ध्यान दिया जा सकता है। सामान्य तौर पर अच्छी गुणवत्ता वाला मावा हल्के क्रीम या सफेद रंग का दिखाई देता है और उसकी बनावट अपेक्षाकृत नरम होती है। यदि मावा जरूरत से ज्यादा चमकदार, असामान्य रूप से सफेद या बहुत अलग रंग का नजर आए तो सावधानी बरतनी चाहिए।

    मावे को हल्के हाथ से दबाकर उसकी बनावट का शुरुआती अंदाजा भी लगाया जा सकता है। यदि वह बहुत ज्यादा रबड़ जैसा, असामान्य रूप से सख्त या बनावट में अलग महसूस हो तो उसे खरीदने से पहले अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। हालांकि केवल रंग और बनावट देखकर मावे को पूरी तरह असली या नकली घोषित नहीं किया जा सकता।

    मावे की खुशबू भी शुरुआती जांच में मदद कर सकती है। सामान्य मावे में दूध जैसी हल्की और प्राकृतिक गंध होती है। यदि उसमें तेज रासायनिक, साबुन जैसी या दूसरी असामान्य गंध महसूस हो तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। हालांकि खुशबू भी गुणवत्ता की अंतिम पुष्टि का आधार नहीं है।

    यदि किसी विश्वसनीय दुकान पर मावा चखने की अनुमति हो तो बहुत थोड़ी मात्रा से स्वाद का अंदाजा लगाया जा सकता है। सामान्य मावे में दूध जैसा स्वाद और हल्की प्राकृतिक मिठास रहती है। कड़वा, साबुन जैसा या किसी अन्य तरह का असामान्य स्वाद मिलने पर उसे नहीं खरीदना चाहिए। बहुत अधिक मीठा स्वाद भी सावधानी का संकेत हो सकता है।

    मावे में स्टार्च जैसी मिलावट की शुरुआती जांच के लिए आयोडीन आधारित घरेलू परीक्षण का इस्तेमाल किया जाता है। थोड़े से मावे को पानी के साथ गर्म करने के बाद ठंडा किया जा सकता है और फिर आयोडीन की कुछ बूंदें डाली जाती हैं। मिश्रण का रंग नीला या नीला-काला होने पर उसमें स्टार्च मौजूद होने की संभावना हो सकती है। यह केवल प्रारंभिक संकेत है, इसे मिलावट का पक्का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

    मावा खरीदते समय उसकी कीमत पर भी ध्यान देना जरूरी है। यदि कोई उत्पाद बाजार की सामान्य कीमत की तुलना में असामान्य रूप से सस्ता मिल रहा है तो उसकी गुणवत्ता को लेकर सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि मावा भरोसेमंद दुकान या डेयरी से ही खरीदा जाए।

    पैक्ड मावा खरीदते समय पैकेट की पैकिंग, तारीख और उत्पाद से जुड़ी जरूरी जानकारी अवश्य देखनी चाहिए। पैकेट फटा हुआ हो या उत्पाद की स्थिति संदिग्ध लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। किसी भी तरह का संदेह होने पर मावे का सेवन न करना ही सुरक्षित विकल्प है।

    त्योहारों के दौरान मिठाइयों और मावे की बढ़ती मांग के बीच उपभोक्ताओं की सावधानी सबसे महत्वपूर्ण है। घरेलू तरीकों से केवल शुरुआती संकेत मिल सकते हैं, जबकि किसी खाद्य पदार्थ की वास्तविक मिलावट की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच अधिक विश्वसनीय मानी जाती है। इसलिए खरीदारी में गुणवत्ता, स्रोत और पैकेजिंग को प्राथमिकता देना जरूरी है।

  • अरंडी का तेल बालों और त्वचा की देखभाल में कैसे मदद करता है, जानिए इसके संभावित फायदे और जरूरी सावधानियां

    अरंडी का तेल बालों और त्वचा की देखभाल में कैसे मदद करता है, जानिए इसके संभावित फायदे और जरूरी सावधानियां

    नई दिल्ली ।अरंडी का तेल लंबे समय से घरेलू और पारंपरिक देखभाल में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह अरंडी के बीजों से निकाला जाता है और सामान्य तौर पर गाढ़ा तथा हल्के पीले रंग का होता है। इसमें मौजूद फैटी एसिड और अन्य घटक इसे त्वचा और बालों की देखभाल के लिए उपयोग किए जाने वाले तेलों में शामिल करते हैं। हालांकि, प्राकृतिक उत्पाद होने का मतलब यह नहीं है कि यह हर व्यक्ति की त्वचा या बालों के लिए समान रूप से उपयुक्त होगा।

    बालों की देखभाल में अरंडी के तेल का इस्तेमाल खासतौर पर सूखे और बेजान बालों के लिए किया जाता है। इसकी गाढ़ी बनावट बालों और स्कैल्प पर नमी बनाए रखने में मदद कर सकती है। इससे बालों को मुलायम महसूस कराने और उनमें चमक लाने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, इसे बालों की तेज ग्रोथ कराने वाले निश्चित उपचार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    अरंडी का तेल सीधे लगाने पर कुछ लोगों को काफी गाढ़ा लग सकता है। इसलिए इसे नारियल या बादाम जैसे हल्के तेल के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना सुविधाजनक रहता है। तेल को बालों और स्कैल्प पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है। मसाज करते समय बहुत अधिक दबाव डालने से बचना चाहिए। इस्तेमाल की मात्रा बालों की लंबाई और जरूरत के अनुसार रखी जा सकती है।

    त्वचा की देखभाल में भी अरंडी के तेल का उपयोग किया जाता है। इसमें मौजूद रिसिनोलिक एसिड त्वचा को नमी प्रदान करने में मदद कर सकता है। खासतौर पर शरीर के ऐसे हिस्सों पर इसे लगाया जाता है जहां रूखापन अधिक महसूस होता है। हाथ, पैर और अन्य सूखे हिस्सों पर थोड़ी मात्रा में तेल लगाने से त्वचा को मुलायम बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

    सर्दियों या कम नमी वाले मौसम में त्वचा का रूखापन बढ़ सकता है। ऐसे समय में कुछ लोग अरंडी के तेल को मॉइस्चराइजिंग देखभाल के हिस्से के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, तैलीय या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को इसे चेहरे पर लगाने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग तरह से प्रतिक्रिया कर सकती है।

    फटी एड़ियों की घरेलू देखभाल में भी अरंडी का तेल इस्तेमाल किया जाता है। रात में पैरों को साफ करके एड़ियों पर थोड़ी मात्रा में तेल लगाया जा सकता है। इसके बाद मोजे पहनने से तेल त्वचा के संपर्क में अधिक समय तक रह सकता है। इससे सूखी त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन गहरी दरार, रक्तस्राव या संक्रमण होने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    अरंडी का तेल इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना एक जरूरी सावधानी है। त्वचा के छोटे हिस्से पर थोड़ी मात्रा लगाकर प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। लालिमा, खुजली, जलन या सूजन जैसी परेशानी होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। आंखों और शरीर के संवेदनशील हिस्सों के संपर्क से भी इसे बचाना जरूरी है।

    अरंडी के तेल को त्वचा या बालों की देखभाल में सीमित और उचित तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके संभावित लाभ मुख्य रूप से नमी बनाए रखने और त्वचा तथा बालों को मुलायम महसूस कराने से जुड़े हैं। किसी गंभीर त्वचा समस्या, संक्रमण या लगातार बालों से जुड़ी परेशानी में घरेलू तेलों को उपचार का विकल्प मानने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक उचित रहता है।