Category: Madhya Pradesh

  • 7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल

    7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल


    भोपाल । मध्य प्रदेश में किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने के लिए प्रस्तावित एआई बेस्ड ऑटोमेटिक फूड ग्रेन एनालाइजर की टेंडर प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज कॉरपोरेशन करीब 4000 मशीनें 7 साल की अवधि के लिए किराए पर लेने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए जारी 2026 के टेंडर में निविदाकर्ताओं से एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई इंस्टॉलेशन और इम्प्लीमेंटेशन का 5 साल का अनुभव मांगा गया था। दस्तावेजों की पड़ताल में यह सवाल सामने आया है कि जिन कंपनियों को तकनीकी बिड में योग्य माना गया उनमें से कुछ ने पुराने ग्रेन एनालाइजर और एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर जैसे उपकरणों की सप्लाई को अनुभव के तौर पर पेश किया है।

    सबसे बड़ा सवाल तकनीक की समयसीमा को लेकर है। चैटजीपीटी नवंबर 2022 में सार्वजनिक रूप से लॉन्च हुआ जबकि गूगल का बार्ड 2023 में भारत आया जिसे अब जेमिनी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में टेंडर में एआई आधारित ग्रेन एनालाइजर के लिए पांच साल के अनुभव की शर्त ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कुछ कंपनियों ने 2014 से 2021 के बीच सप्लाई किए गए एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर ग्रेन फिजिकल एनालाइजर ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर और ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस के रिकॉर्ड को अनुभव के तौर पर पेश किया। सवाल यह है कि क्या इन पुराने उपकरणों में वही एआई तकनीक मौजूद थी जिसकी मांग मौजूदा टेंडर में की गई है और अगर थी तो उसे साबित करने वाले तकनीकी दस्तावेज क्या हैं।

    दस्तावेजों में अमलिका मर्केन्टाइल की ओर से ओईएम नेबुला इनोवेशन का अनुभव प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक नेबुला इनोवेशन ने जनवरी और सितंबर 2023 में एफसीआई को कुल 400 एआई बेस्ड एनालाइजर सप्लाई किए थे। इसके बाद नवंबर 2024 में ओडिशा मंडी बोर्ड को 248 एआई बेस्ड एनालाइजर की सप्लाई का रिकॉर्ड बताया गया है। वहीं पुराने रिकॉर्ड में 2020 में राजस्थान मंडी बोर्ड को 136 ग्रेन फिजिकल एनालाइजर और हरियाणा मंडी बोर्ड को 54 ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई का उल्लेख है। 2021 में गुजरात के डायरेक्टोरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंस को एक ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस दिए जाने का रिकॉर्ड भी अनुभव में शामिल किया गया।

    इसी तरह फर्टिस इंडिया की ओर से भी नेबुला इनोवेशन के अनुभव प्रमाण प्रस्तुत किए गए। दूसरी कंपनी एयरपे पेमेंट सर्विसेस ने ओईएम ज्यूटैक ओप्टो इलेक्ट्रॉनिक का अनुभव लगाया। इसमें 2014 में फिक्की रिसर्च एंड एनालिसिस सेंटर को एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर सप्लाई करने के अलावा 2018 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और 2020 में मदुरा कोट्स तथा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ को उपकरण उपलब्ध कराने के दस्तावेज बताए गए हैं।

    टेंडर प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। शुरुआत में अनुभव की शर्त निविदाकर्ता के लिए रखी गई थी लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर ओईएम के अनुभव को भी शामिल कर लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में सात बार संशोधन किए जाने की बात सामने आई है। यही बदलाव अब टेंडर की पारदर्शिता और पात्रता के मानकों को लेकर चर्चा का कारण बन रहे हैं।

    मामले में असली सवाल यह नहीं है कि पुराने उपकरणों को अनुभव माना गया या नहीं बल्कि यह है कि जिस तकनीक के आधार पर आज की मशीनों की क्षमता तय की जा रही है क्या वही तकनीकी विशेषताएं पुराने उपकरणों में भी मौजूद थीं। अगर पुराने एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर या पारंपरिक ग्रेन एनालाइजर को एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर के अनुभव के बराबर माना गया है तो उसके तकनीकी आधार और प्रमाण क्या हैं यह स्पष्ट होना जरूरी है।

    क्योंकि मामला केवल टेंडर में कंपनियों के चयन तक सीमित नहीं है। हजारों मशीनों को सात साल की लंबी अवधि के लिए किराए पर लेने की योजना है और इनका इस्तेमाल किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने में किया जाना है। ऐसे में मशीनों की तकनीकी क्षमता उनकी सटीकता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सीधे तौर पर सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि टेंडर में अनुभव की शर्त पुराने उपकरणों के रिकॉर्ड और सात बार किए गए संशोधनों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

    अब निगाह इस बात पर है कि कॉरपोरेशन इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या यह साफ करता है कि जिन कंपनियों को तकनीकी रूप से योग्य माना गया उनके अनुभव में वास्तव में एआई आधारित तकनीक मौजूद थी या पुराने उपकरणों को नए एआई सिस्टम के अनुभव के रूप में स्वीकार किया गया। जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया तकनीकी जरूरत के मुताबिक हुई है या टेंडर की शर्तों में हुए बदलावों ने पात्रता का दायरा बदल दिया।

  • बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं

    बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं


    भोपाल । सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के मामले ने अब राजनीतिक तकरार का रूप ले लिया है। त्रासदी के बाद मृतकों की संख्या को लेकर सरकार और विपक्ष के दावे अलग अलग सामने आ रहे हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने जहां 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दावा किया है कि इस घटना में 50 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। दोनों पक्षों के अलग आंकड़ों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और आधिकारिक जानकारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मंत्री प्रहलाद पटेल ने सोशल मीडिया के जरिए 19 मृतकों की सूची सार्वजनिक की। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित परिवारों को सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता देने की बात कही। मंत्री के मुताबिक संबल योजना में पंजीकृत श्रमिकों के परिवारों को पात्रता के अनुसार 4 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दी जाएगी। वहीं ऐसे परिवार जो इस योजना के दायरे में नहीं आते हैं उन्हें मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान और सहायता कोष के माध्यम से आर्थिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही गई है। सरकार की ओर से यह कदम मृतकों के परिवारों को तत्काल राहत देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार और जिला प्रशासन के आंकड़ों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पटवारी का कहना है कि बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब की वजह से मरने वालों की संख्या 50 से ज्यादा है और सरकार को वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने प्रशासन की ओर से अलग अलग समय पर बताए गए आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाया। पटवारी के मुताबिक सागर जिला प्रशासन कभी 13 तो कभी 15 मौतों की जानकारी देता रहा जबकि अब सरकार के वरिष्ठ मंत्री खुद 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर वास्तविक संख्या कितनी है।

    पटवारी सोमवार को प्रभावित गांवों के दौरे पर भी पहुंचे थे। उन्होंने मृतकों के परिवारों से मुलाकात कर हालात का जायजा लिया और सरकार से पीड़ितों की मदद बढ़ाने की मांग की। पटवारी ने मृतकों में बड़ी संख्या लोधी समाज के लोगों की होने का हवाला देते हुए मंत्री प्रहलाद पटेल से भी प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर उनकी सहायता करने की अपील की थी। इसके बाद मंत्री की ओर से मृतकों के नामों की सूची जारी की गई।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मुद्दा अब मौतों की सही संख्या को लेकर बन गया है। एक तरफ सरकार की ओर से 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक किए जा चुके हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष 50 से ज्यादा मौतों का दावा कर रहा है। ऐसे में आम लोगों और प्रभावित परिवारों के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी रिकॉर्ड में कितनी मौतें दर्ज हैं और वास्तविक रूप से कितने परिवार इस त्रासदी से प्रभावित हुए हैं।

    जहरीली शराब कांड के बाद प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शराब की बिक्री और उसकी गुणवत्ता की निगरानी से लेकर समय पर कार्रवाई और पीड़ितों की पहचान तक कई स्तरों पर जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बना रहा है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और मौतों के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

    फिलहाल मंत्री प्रहलाद पटेल द्वारा जारी 19 मृतकों की सूची और जीतू पटवारी के 50 से ज्यादा मौतों के दावे ने मामले को और गंभीर बना दिया है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि मौतों की वास्तविक संख्या स्पष्ट करने की भी है। जब तक आधिकारिक आंकड़ा पूरी तरह सामने नहीं आता तब तक बंडा जहरीली शराब कांड को लेकर उठ रहे सवाल और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।

  • बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम

    बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीने से बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने पूरे प्रदेश को चिंता में डाल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के कई बैगा और गोंड बहुल गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ था जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बड़ा सवाल मौतों की संख्या को लेकर है। शुरुआत में प्रशासन की ओर से केवल 8 बच्चों की मौत की बात सामने आई लेकिन गांवों में पहुंची जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों के दावों के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया। अलग अलग रिपोर्टों में अब 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आ रही है जबकि प्रशासन की ओर से अभी तक मौतों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    सोनगुड्डा बोंदारी कुंडेकसा कोरका गठिया मछूलदा और मातला जैसे गांवों से बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरें सामने आईं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हुईं। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तो अपनी पंचायत में ही 9 बच्चों की मौत का दावा किया है। दूसरी ओर सरकार की मेडिकल स्क्रीनिंग में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई है। केंद्रीय टीम ने इलाके में 32433 लोगों की जांच की जिसमें 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए। इनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना पड़ा। वहीं 13406 बच्चे डायरिया से पीड़ित मिले जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया के लक्षण पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जिनमें से 379 बच्चों को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 52 बच्चे अब भी इलाजरत हैं।

    इन मौतों के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। कई बच्चों में मलेरिया डायरिया खसरा और चर्म रोग जैसी समस्याएं सामने आईं लेकिन लगभग सभी मामलों में कुपोषण एक बड़ी साझा समस्या बनकर उभरा। यही कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है और सामान्य दिखने वाली बीमारियों को भी गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का शरीर संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाता। जिंक विटामिन ए और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां भी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

    बालाघाट पहले से ही मलेरिया के लिहाज से संवेदनशील जिला रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में दर्ज 2126 मलेरिया मामलों में 685 मामले अकेले बालाघाट से सामने आए थे। इस वर्ष जुलाई तक प्रदेश में मिले 583 मामलों में भी 174 मामले बालाघाट के थे। इसके साथ ही बैगा समुदाय की बस्तियां जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। साफ पानी की कमी और लंबे समय तक पोषण आहार नहीं मिलने की समस्या ने हालात को और गंभीर किया है।

    सबसे चिंता की बात यह है कि इलाज के बाद घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों के पोषण और गांव के स्वास्थ्य वातावरण पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। डायरिया होने पर तत्काल ओआरएस देना जिंक की खुराक पूरी करना और बच्चे की हालत बिगड़ने पर बिना देरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी बताया गया है।

    मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। गलत आंकड़े बताए जाने के आरोपों के बाद तत्कालीन सीएमएचओ को हटाया गया। एक बच्चे की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराए जाने के ग्रामीण आरोपों ने भी विवाद बढ़ाया। अस्पतालों में फोटो और मीडिया कवरेज पर रोक लगाने का आदेश जारी होने और कुछ ही घंटों में वापस लिए जाने से भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए।

    सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रभावित बैगा गांव पहुंचे और मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता की घोषणा की। जिला अस्पताल के बच्चों के वार्ड की क्षमता बढ़ाई गई है। छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गई हैं और निगरानी का दायरा बढ़ाया गया है। गांवों में सफाई अभियान और कीटनाशक छिड़काव भी कराया गया है।

    इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर इन बच्चों की मौतों की वास्तविक संख्या कितनी है और बीमारी की जड़ क्या है। कुपोषण मलेरिया संक्रमण दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सभी एक साथ जिम्मेदार हैं या इसके पीछे कोई और कारण भी है यह स्पष्ट होना बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि मौतों के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए और हर प्रभावित गांव की स्वतंत्र जांच कराई जाए। क्योंकि बालाघाट की इन आदिवासी बस्तियों में सवाल सिर्फ बीमार बच्चों का नहीं बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जो अपने बच्चों को बचाने के लिए अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

  • 17 सितंबर से BJP की 20 यात्राओं का आगाज: वड़नगर से काशी तक बनेगा सियासी सफर MP के 55 जिलों में पहुंचेगा अभियान

    17 सितंबर से BJP की 20 यात्राओं का आगाज: वड़नगर से काशी तक बनेगा सियासी सफर MP के 55 जिलों में पहुंचेगा अभियान


    भोपाल । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर भारत में बड़े जनसंपर्क अभियान की तैयारी शुरू कर दी है। 17 सितंबर से प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन के अवसर पर वड़नगर से वाराणसी और वाराणसी से वड़नगर के बीच कुल 20 यात्राएं निकाली जाएंगी। दोनों दिशाओं में 10-10 यात्राओं के लिए अलग अलग रूट तैयार किए जा रहे हैं ताकि इनके मार्ग आपस में न टकराएं। इस पूरे अभियान में मध्यप्रदेश को भी अहम केंद्र बनाया गया है। पार्टी ने प्रदेश के सभी 55 जिलों को इन यात्राओं से जोड़ने का लक्ष्य रखा है।

    बीजेपी की योजना के मुताबिक यह अभियान केवल यात्राओं और राजनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि जनभागीदारी सेवा गतिविधियों सरकारी योजनाओं के प्रचार और विकसित भारत 2047 के संकल्प को भी इससे जोड़ा जाएगा। गुजरात राजस्थान मध्यप्रदेश उत्तर प्रदेश छत्तीसगढ़ हरियाणा और दिल्ली से होकर गुजरने वाली इन यात्राओं में स्थानीय नागरिकों युवाओं महिलाओं विद्यार्थियों किसानों व्यापारियों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को अलग अलग गतिविधियों में शामिल करने की तैयारी है। अब तक 13 रूट तय किए जा चुके हैं जबकि अन्य मार्गों को अंतिम रूप देने पर मंथन जारी है।

    मध्यप्रदेश में यात्राओं के संचालन और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी अलग अलग नेताओं को सौंपी जा रही है। पार्टी की कोशिश है कि यात्रा के हर प्रमुख पड़ाव को स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी का केंद्र बनाया जाए। यहां लोगों से उनके क्षेत्र के विकास को लेकर सुझाव लिए जाएंगे और सरकारी योजनाओं से जुड़े लोगों की वास्तविक कहानियों को सामने लाया जाएगा। 25 आइकॉन अभियान के तहत प्रत्येक पड़ाव से किसान शिक्षक महिला उद्यमी खिलाड़ी या किसी अन्य क्षेत्र में प्रेरणादायक काम करने वाले व्यक्ति का चयन किया जाएगा। इनमें से 25 श्रेष्ठ लोगों की वीडियो कहानियां तैयार कर नमो ऐप के जरिए लोगों तक पहुंचाने की योजना है।

    अभियान में चिट्ठी 2047 के नाम के जरिए नागरिकों से यह पूछा जाएगा कि वे वर्ष 2047 तक अपने क्षेत्र और देश को किस रूप में देखना चाहते हैं। इसी तरह मेरे लिए भारत की प्रगति नाम से लोगों की राय रिकॉर्ड की जाएगी। अलग अलग स्थानों से जुटाई गई इन आवाजों को वाराणसी में जोड़कर एक विशेष फिल्म तैयार करने का प्रस्ताव है। यात्रा से स्थानीय प्रभावशाली लोगों और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को भी जोड़ा जाएगा।

    यात्रा के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों और देश के लिए बलिदान देने वाले स्थानीय वीरों से जुड़े गांवों और स्मारकों से मिट्टी एकत्र करने की भी योजना है। यह मिट्टी वाराणसी के मुख्य कार्यक्रम में अर्पित की जाएगी। कई प्रमुख पड़ावों पर स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएंगे जहां सामान्य जांच ब्लड प्रेशर और शुगर जांच के साथ चिकित्सा परामर्श उपलब्ध कराने की तैयारी है। सरकारी योजनाओं की जानकारी और आवेदन में मदद के लिए योजना पंजीकरण सहायता डेस्क भी लगाए जाएंगे।

    बीजेपी इस अभियान के जरिए वर्ष 2001 से 2026 तक हुए बदलावों को भी लोगों के सामने रखने की तैयारी कर रही है। पहले और अब प्रदर्शनी के जरिए सड़क स्कूल घर बिजली और दूसरी सुविधाओं में आए बदलावों को तस्वीरों और दस्तावेजों के माध्यम से दिखाया जाएगा। विकास की यात्रा नाम से नुक्कड़ नाटक भी आयोजित होंगे जिनमें एक परिवार की कहानी के जरिए विकास और सरकारी योजनाओं के असर को स्थानीय भाषा में समझाने की कोशिश की जाएगी।

    मोदी के जन्मदिन से डिजिटल अभियान पर भी खास जोर रहेगा। भाजपा इन्फ्लुएंसर्स और रील्स के जरिए खासकर युवा पीढ़ी तक पहुंचने की रणनीति बना रही है। प्रत्येक शक्ति केंद्र को कम से कम 10 रील तैयार करने का लक्ष्य दिया गया है। इन वीडियो में सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाले वास्तविक लोगों की कहानियां दिखाई जाएंगी। वीडियो में लाभार्थी का नाम स्थान जिला और संबंधित योजना के साथ उसके जीवन में आए बदलाव को सामने लाने की योजना है।

    कहानी बदलाव की अभियान के तहत करीब 25 लाख नागरिकों की वास्तविक कहानियां जुटाने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें से लगभग 25 हजार कहानियों को शॉर्टलिस्ट कर करीब 250 प्रभावशाली कहानियों को प्रोफेशनल तरीके से तैयार किया जाएगा। इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर इनका व्यापक प्रचार किया जाएगा।

    17 सितंबर की शाम आशीर्वाद का दीया अभियान के तहत बूथ स्तर पर लोगों के घरों में दीप जलाने की अपील की जाएगी। वहीं सेवा मेरा योगदान अभियान के तहत प्रत्येक नागरिक को कम से कम 25 मिनट समाज सेवा के लिए देने के लिए प्रेरित किया जाएगा। सेवा कार्य का फोटो या वीडियो बनाकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर साझा करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    गांवों में नमो सेवा गाथा के जरिए नुक्कड़ नाटक होंगे। आंगनवाड़ी केंद्रों पर आंगन का उत्सव आयोजित कर माताओं और कार्यकर्ताओं का सम्मान किया जाएगा। सेवा ज्योति यात्रा भी अलग अलग जिलों और गांवों से निकलेगी। इसके अलावा वड़नगर से काशी तक जल जन और सेवा संकल्प यात्रा में पवित्र नदियों का जल लेकर यात्रियों के पहुंचने की योजना है।

    अभियान में सेवा सेतु के जरिए विधानसभा स्तर पर कैंप लगाने की भी तैयारी है जहां केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ एक ही स्थान पर दिलाने की कोशिश होगी। नदी घाटों की सफाई और सौंदर्यीकरण से लेकर ह्यूमन रंगोली और भारत मंडला जैसे कार्यक्रम भी प्रस्तावित हैं। युवाओं के लिए राष्ट्रीय इनोवेशन चैलेंज आयोजित किया जाएगा जिसमें विद्यार्थी स्टार्टअप और इनोवेटर्स अपने विचार और तकनीकी समाधान प्रस्तुत करेंगे।

    इस पूरे अभियान का बड़ा समापन 17 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित जनसेवक महाकुंभ पंचायत से पार्लियामेंट के रूप में होगा। इसमें करीब 1.25 लाख जनप्रतिनिधियों के शामिल होने का अनुमान है। इस तरह बीजेपी का यह अभियान एक साथ जनसंपर्क सेवा सरकारी योजनाओं की पहुंच सांस्कृतिक जुड़ाव और डिजिटल प्रचार को जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। पार्टी की रणनीति साफ है कि मोदी के जन्मदिन से शुरू होने वाला यह अभियान केवल जमीन पर होने वाले कार्यक्रमों तक सीमित न रहे बल्कि मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया के जरिए भी व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचे।

  • सागर जहरीली शराब कांड पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, पूछा- 20 साल से BJP की सत्ता, जवाबदेही कब तय होगी?

    सागर जहरीली शराब कांड पर राहुल गांधी ने सरकार को घेरा, पूछा- 20 साल से BJP की सत्ता, जवाबदेही कब तय होगी?


    सागर। मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से हुई मौतों को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रदेश की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच कराने और घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने की मांग की। राहुल गांधी ने कहा कि मध्य प्रदेश में जहरीली दवा, शराब और दूषित पानी से लोगों की जान जाने की घटनाएं सामने आती रही हैं, लेकिन 20 साल से अधिक समय से सत्ता में रहने वाली भाजपा सरकार इनसे सबक लेने और रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाने में नाकाम रही है।
    राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में शासन व्यवस्था कमजोर हो गई है। उन्होंने सागर की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जहरीली शराब ने कई परिवारों को उजाड़ दिया, लेकिन ऐसी घटनाओं के बाद एक जैसी कार्रवाई दोहराई जाती है—कुछ गिरफ्तारियां, कुछ अधिकारियों का निलंबन और जांच के आदेश। उनके मुताबिक, यह पहली बार नहीं हुआ है।

    इंदौर के दूषित पानी और जहरीली कफ सिरप का भी किया जिक्र

    राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में हाल की अन्य घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले इंदौर में दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हुई थी। इसके अलावा पिछले साल जहरीली कफ सिरप से कई छोटे बच्चों की जान जाने का भी उन्होंने जिक्र किया।

    उन्होंने सवाल उठाया कि जहरीली दवा, शराब और पानी से जुड़ी घटनाओं के बाद नए कानून और नियम बनाए जाते हैं, लेकिन उनका प्रभावी पालन नहीं होता। राहुल गांधी ने कहा कि व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है, ताकि अगली घटना होने का इंतजार न करना पड़े।

    ‘छोटे कर्मचारियों तक सीमित न रहे कार्रवाई’

    राहुल गांधी ने कहा कि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार को 20 साल से ज्यादा समय हो चुका है। उन्होंने सवाल किया कि हादसों की रोकथाम के लिए ठोस व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई और हर घटना के बाद होने वाली कार्रवाई में जवाबदेही किस स्तर तक तय की जाती है।

    उन्होंने सागर मामले में निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि मौतों की पूरी सच्चाई सामने आनी चाहिए। उनका कहना है कि कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जांच में जिस किसी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आए, उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

    अब तक 15 मौतें, 14 आरोपी गिरफ्तार

    पुलिस के मुताबिक सागर जिले में जहरीली शराब त्रासदी में मृतकों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है। इलाज के दौरान दो और पीड़ितों की मौत होने के बाद यह आंकड़ा बढ़ा। पुलिस ने बताया कि मामले में कुल 30 आरोपियों में से अब तक 14 को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।

    इससे पहले मध्य प्रदेश कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि सागर जिले के बांदा क्षेत्र में जहरीली शराब से कई परिवार तबाह हो गए हैं और वे न्याय की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस ने प्रदेश सरकार पर अपनी जिम्मेदारी से बचने का आरोप लगाया। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी प्रभावित परिवारों में से कुछ से मुलाकात की थी।

  • मास्टर प्लान के लिए भोपाल में दौड़े शहरवासी: मसूद ने सरकार को घेरा अरेरा कॉलोनी की जर्जर सड़कें भी जल्द बनाएं

    मास्टर प्लान के लिए भोपाल में दौड़े शहरवासी: मसूद ने सरकार को घेरा अरेरा कॉलोनी की जर्जर सड़कें भी जल्द बनाएं


    भोपाल । भोपाल में लंबे समय से अटके मास्टर प्लान को लागू कराने की मांग अब सड़क तक पहुंच गई है। राजधानी में बुधवार को कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद की अगुआई में रन फॉर मास्टर प्लान दौड़ आयोजित की गई जिसमें बड़ी संख्या में युवा महिलाएं छात्र व्यापारी और शहर के अलग अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हुए। 11 नंबर बस स्टॉप से शुरू हुई इस मैराथन के जरिए लोगों ने सरकार से भोपाल का मास्टर प्लान जल्द लागू करने की मांग उठाई। दौड़ के दौरान शहर के विकास और भविष्य की जरूरतों को लेकर आवाज बुलंद की गई। प्रतिभागियों का कहना था कि राजधानी जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए स्पष्ट मास्टर प्लान बेहद जरूरी है क्योंकि इसके अभाव में विकास कार्यों से लेकर जमीन के उपयोग और यातायात व्यवस्था तक कई स्तरों पर परेशानियां सामने आ रही हैं।

    विधायक आरिफ मसूद ने कहा कि भोपाल का मास्टर प्लान करीब दो दशक से अटका हुआ है और इसका खामियाजा सीधे आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उज्जैन का मास्टर प्लान सामने आ सकता है तो भोपाल का मास्टर प्लान आखिर क्यों अटका हुआ है। उनका कहना था कि एक ही प्रदेश में शहरों के लिए अलग अलग रवैया नहीं होना चाहिए। भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है और यहां भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकास की स्पष्ट दिशा तय होना जरूरी है।

    मसूद ने कहा कि इस आंदोलन के पीछे किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं बल्कि शहर के लोगों की बुनियादी जरूरतें हैं। बच्चे युवा महिलाएं व्यापारी और आम नागरिक एक ही मांग कर रहे हैं कि भोपाल का मास्टर प्लान जल्द लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं लेकिन शहर के विकास के मामले में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक मास्टर प्लान के अभाव में कई क्षेत्रों में निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

    इस दौरान मास्टर प्लान के साथ अरेरा कॉलोनी और आई टू से आई एट क्षेत्र की सड़कों का मुद्दा भी जोरशोर से उठाया गया। इन इलाकों में सीवेज लाइन और अन्य निर्माण कार्यों के लिए खोदी गई सड़कों की हालत खराब होने से लोगों को आवाजाही में परेशानी हो रही है। मसूद ने मांग की कि सड़क निर्माण का काम तत्काल शुरू कराया जाए। उन्होंने कहा कि सड़क का भूमिपूजन कौन करता है या निर्माण का श्रेय किसे मिलता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। जरूरत यह है कि लोगों को जल्द राहत मिले और पूरी अरेरा कॉलोनी की सड़कों को व्यवस्थित तरीके से बनाया जाए।

    मैराथन में स्पाइडर मैन का मास्क पहनकर पहुंचे एक युवक ने भी लोगों का ध्यान खींचा। खुद को स्पीडी बताने वाले युवक ने कहा कि वह भोपाल के भविष्य के लिए मास्टर प्लान लागू कराने की मांग को लेकर दौड़ में शामिल हुआ है। उसका कहना था कि मास्टर प्लान के अभाव में शहर में ट्रैफिक और आम लोगों की आवाजाही से जुड़ी परेशानियां बढ़ रही हैं।

    भोपाल में मास्टर प्लान के लंबे समय से लंबित रहने का असर जमीन के उपयोग नए निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत नगर निगम की ओर से की जा रही सीलिंग कार्रवाई को लेकर भी व्यापारियों और संपत्ति मालिकों में चिंता बनी हुई है। शहर में विकास के नियमों को लेकर स्पष्टता नहीं होने से कई लोगों के सामने असमंजस की स्थिति है। ऐसे में रन फॉर मास्टर प्लान के जरिए उठी आवाज ने सरकार के सामने राजधानी के भविष्य की योजना को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

  • कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में

    कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में


    भोपाल । मध्य प्रदेश में राजनीति और नौकरशाही की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिनमें कहीं आम और खास के बीच का फर्क दिखाई देता है तो कहीं जनता और जनप्रतिनिधि के बीच सीधे संवाद की एक उम्मीद नजर आती है। शिवपुरी में जनसुनवाई के दौरान भाजपा नेता के पहुंचते ही कलेक्टर का कुर्सी से उठकर उनसे मिलना और फिर उन्हें अपने केबिन में लेकर जाना चर्चा का विषय बन गया। दूसरी ओर गुना में एक बुजुर्ग महिला कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह का हाथ पकड़कर उन्हें अपने आधे अधूरे घर तक ले गई। इन दोनों घटनाओं ने लोकतंत्र और प्रशासन की प्राथमिकताओं पर अपने अपने तरीके से सवाल खड़े किए हैं।

    शिवपुरी में कलेक्टर जनसुनवाई कर रहे थे और आम लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे हुए थे। इसी दौरान भाजपा जिला अध्यक्ष वहां पहुंचे। बताया गया कि कलेक्टर ने उनसे मुलाकात की और फिर जनसुनवाई के बीच ही उन्हें अपने केबिन में लेकर चले गए। कुछ देर बाद कलेक्टर वापस लौटे और लोगों की समस्याएं सुनने का सिलसिला फिर शुरू हुआ लेकिन तब तक यह दृश्य चर्चा में आ चुका था। सवाल यह उठने लगा कि यदि कोई आम व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचता है तो उसे अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है लेकिन किसी राजनीतिक पदाधिकारी के आने पर प्राथमिकता बदल क्यों जाती है। यह घटना भले कुछ मिनटों की रही हो लेकिन आम और खास के बीच व्यवहार के अंतर को लेकर बहस जरूर छेड़ गई।

    इसके विपरीत गुना जिले में राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी परेशानी सीधे रखी। महिला विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें अपने घर तक ले गई और अपना अधूरा मकान दिखाया। उसने बताया कि घर में प्लास्टर और पुताई का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। विधायक ने महिला को मदद और घर का काम पूरा कराने का भरोसा दिया। यह दृश्य राजनीति की तस्वीर के रूप में चर्चा में रहा लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी छिपा है कि जनता को अपने प्रतिनिधियों तक बिना डर और संकोच पहुंचने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की असली खूबसूरती तभी है जब कोई आम नागरिक बेझिझक अपने जनप्रतिनिधि का हाथ पकड़कर अपनी परेशानी बता सके।

    उधर इंदौर जिले के महू में अधूरे रेलवे ओवरब्रिज को लेकर राजनीतिक विरोध का अलग तरीका देखने को मिला। ब्रिज निर्माण में हो रही देरी से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी बाउंड्री पर सरकार नेता और ठेकेदार को निशाने पर लेते हुए नारे लिखवा दिए। काम की धीमी रफ्तार और विकास के नाम पर सवाल उठाते इन स्लोगन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गईं। इसके बाद प्रशासन ने बाउंड्री पर लिखे नारों को सफेद रंग से पुतवा दिया। कांग्रेस ने इसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और कीर्तन भी किया। विपक्ष का तर्क है कि यदि निर्माण कार्य पूरा करने में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती जितनी नारों को मिटाने में दिखाई गई तो शायद विरोध की जरूरत ही नहीं पड़ती।

    राजनीति के इन खुले दृश्यों के बीच भोपाल की अंदरूनी सियासत से जुड़ी चर्चा भी सुर्खियों में रही। खबर में एक ऐसे भाजपा नेता का जिक्र है जिन्हें पंडितजी के नाम से संबोधित किया गया है और जो विधायक या मंत्री न होने के बावजूद अपना सरकारी बंगला 2028 तक बचाने में सफल रहे हैं। चर्चा है कि बंगले को लेकर बदलाव की तैयारी थी लेकिन दिल्ली स्तर पर हस्तक्षेप के बाद मामला बदल गया। बंगला समाज सेवा के नाम पर आवंटित बताया जा रहा है जबकि राजनीतिक गलियारों में इसे भविष्य की सियासत के केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कुल मिलाकर मध्य प्रदेश की इन घटनाओं ने सत्ता राजनीति और प्रशासन की कई परतें खोल दी हैं। कहीं आम आदमी इंतजार करता दिखाई देता है और खास व्यक्ति को प्राथमिकता मिलती नजर आती है तो कहीं एक बुजुर्ग महिला सीधे अपने विधायक तक पहुंचकर अपनी समस्या बताती है। अधूरे विकास कार्यों पर विपक्ष नारे लिखकर सरकार को घेरता है और दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में बंगले बचाने की सियासत चलती है। यही राजनीति और व्यवस्था की वह तस्वीर है जिसमें सवाल भी हैं और उम्मीदें भी।

  • कल्पना की मौत पर नहीं थम रहा कांग्रेस का आक्रोश: अभय मिश्रा आज मंत्रालय के सामने देंगे मौन धरना, राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग

    कल्पना की मौत पर नहीं थम रहा कांग्रेस का आक्रोश: अभय मिश्रा आज मंत्रालय के सामने देंगे मौन धरना, राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग


    भोपाल । रीवा में प्रसूता कल्पना मिश्रा और उसके नवजात बच्चे की मौत के मामले को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। सेमरिया से कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा बुधवार को राजधानी भोपाल में मंत्रालय यानी वल्लभ भवन के सामने मौन धरने पर बैठेंगे। विधायक सुबह 11 बजे से धरना देकर रीवा के संजय गांधी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध गांधी स्मारक अस्पताल में हुई इस घटना की जिम्मेदारी तय करने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की मांग उठाएंगे। कांग्रेस विधायक ने इस मामले में उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग भी की है जिससे यह मामला अब सीधे सरकार और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही से जुड़ गया है।

    कल्पना मिश्रा की मौत 26 अगस्त की रात रीवा के गांधी स्मारक अस्पताल में उपचार के दौरान हुई थी। वह प्रसव के लिए अस्पताल में भर्ती हुई थीं लेकिन इलाज के दौरान उनकी और उनके नवजात बच्चे की मौत हो गई। घटना के बाद परिवार ने अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ पर इलाज में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए। हालांकि मौत की वास्तविक वजह और किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही की अंतिम जिम्मेदारी जांच के बाद ही तय होगी लेकिन घटना के बाद सामने आए वीडियो और परिजनों के आरोपों ने मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया।

    मामला उस समय और गंभीर हो गया जब कल्पना मिश्रा का मौत से कुछ घंटे पहले का वीडियो सामने आया। वीडियो में वह महिला वार्ड से बाहर निकलकर रोते हुए मदद मांगती नजर आई और इलाज को लेकर अपनी आशंका जाहिर करते हुए परिजनों से गुहार लगाती दिखाई दी। इस वीडियो के सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन पर सवाल और तेज हो गए। परिजनों का आरोप है कि उन्होंने कल्पना की बिगड़ती हालत पर ध्यान देने और बेहतर इलाज उपलब्ध कराने की मांग की थी लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। मृतका के पिता ने जिम्मेदार डॉक्टरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की है। परिवार ने इलाज के दौरान कथित तौर पर 30 हजार रुपए की मांग किए जाने का भी आरोप लगाया है जिसकी जांच होना जरूरी है।

    मामले में सरकार और चिकित्सा प्रशासन की ओर से शुरुआती कार्रवाई भी की गई है। दो डॉक्टरों और दो नर्सिंग अधिकारियों को निलंबित किया गया है। अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा को भी पद से हटाया गया जबकि श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल को रीवा से हटाकर सतना मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया। उनकी जगह सतना मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. शशिधर प्रसाद गर्ग को रीवा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस तरह अधीक्षक सहित कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद भी पीड़ित परिवार संतुष्ट नहीं है।

    सरकार ने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित की है। समिति को इलाज से जुड़े दस्तावेजों चिकित्सकीय प्रोटोकॉल और संबंधित स्टाफ के बयान की जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के निर्देश पर मजिस्ट्रियल जांच के आदेश भी जारी किए गए हैं। इसके बावजूद मृतका के पिता रामशरण मिश्रा जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर और स्वतंत्र जांच की मांग पर अड़े हुए हैं। परिवार ने मामले की सीबीआई जांच की मांग भी उठाई है।

    इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस लगातार सरकार पर हमलावर है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी रीवा में धरने में शामिल होकर स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग कर चुके हैं। कांग्रेस का आरोप है कि स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और जच्चा बच्चा की मौत के मामले में जवाबदेही तय करने में देरी हो रही है।

    अब कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा का भोपाल में मंत्रालय के सामने मौन धरना इस आंदोलन को नई राजनीतिक धार देने वाला माना जा रहा है। इससे पहले मंगलवार को युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रीवा में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के आवास की ओर बढ़ने का प्रयास किया था। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जिसके बाद कांग्रेस ने आंदोलन और तेज करने की चेतावनी दी। अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट और सरकार के अगले कदम पर है क्योंकि पीड़ित परिवार न्याय की मांग पर अड़ा है और कांग्रेस इस मामले को लेकर सरकार पर अपना दबाव लगातार बढ़ा रही है।

  • पढ़ाई के लिए तरसते 190 दिव्यांग बच्चे, सिर्फ 3 शिक्षकों के भरोसे 12वीं तक की कक्षाएं: भोपाल में छात्रों ने खोली व्यवस्था की पोल

    पढ़ाई के लिए तरसते 190 दिव्यांग बच्चे, सिर्फ 3 शिक्षकों के भरोसे 12वीं तक की कक्षाएं: भोपाल में छात्रों ने खोली व्यवस्था की पोल


    भोपाल । भोपाल में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और भविष्य से जुड़ी एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस स्कूल की जिम्मेदारी दृष्टि बाधित और श्रवण बाधित बच्चों को बेहतर शिक्षा और सुविधाएं देकर उनका भविष्य संवारने की है वहीं बच्चे आज अपनी पढ़ाई और बुनियादी जरूरतों के लिए आवाज उठाने को मजबूर हैं। शासकीय दृष्टि बाधित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भोपाल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने शिक्षकों की भारी कमी से लेकर नियमित कक्षाएं नहीं लगने और साइन लैंग्वेज जानने वाले शिक्षकों के अभाव तक कई गंभीर शिकायतें सामने रखी हैं। बच्चों का सबसे बड़ा सवाल है कि जब उनकी भाषा समझने वाला शिक्षक ही नहीं है तो उन्हें पढ़ाएगा कौन और उनकी समस्याओं को सुनेगा कौन।

    पहली से 12वीं तक कक्षाएं संचालित करने वाले इस स्कूल में दृष्टि बाधित और श्रवण बाधित विद्यार्थियों को मिलाकर करीब 190 बच्चे पढ़ते हैं जबकि फिलहाल यहां केवल तीन शिक्षक उपलब्ध हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की पढ़ाई सिर्फ तीन शिक्षकों के भरोसे कैसे हो सकती है। खासतौर पर श्रवण बाधित विद्यार्थियों की स्थिति बेहद चिंताजनक बताई जा रही है क्योंकि बच्चों के अनुसार शिक्षकों को साइन लैंग्वेज तक नहीं आती और स्कूल में उनकी बात समझने के लिए कोई इंटरप्रेटर भी नहीं है। ऐसे में जो बच्चा सुन और बोल नहीं सकता उसकी पढ़ाई और संवाद की व्यवस्था आखिर कैसे होगी यह सवाल अब शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ा हो गया है।

    विद्यार्थियों ने सोमवार को अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया और स्कूल प्रबंधन पर पढ़ाई की उपेक्षा के गंभीर आरोप लगाए। एक विद्यार्थी अंश राजपूत ने बताया कि वह वर्ष 2018 से स्कूल में पढ़ रहा है लेकिन 2026 तक पहुंचने के बाद भी उसे गणित और अंग्रेजी की बुनियादी जानकारी नहीं हो सकी है। बच्चों का कहना है कि वे नियमित कक्षाएं लगाने की मांग करते हैं लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना जाता। विद्यार्थियों ने यह भी आरोप लगाया कि कई बार शिक्षक पढ़ाने के बजाय मोबाइल फोन चलाते रहते हैं और कक्षाओं में पढ़ाई की जगह वीडियो दिखाए जाते हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है लेकिन बच्चों की शिकायतों ने स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्नचिह्न जरूर लगा दिया है।

    समस्या केवल शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है। स्कूल प्रबंधन ने भी भवन में कमरों की कमी स्वीकार की है जिसके कारण कई बार एक ही कमरे में दो से तीन कक्षाएं संचालित करनी पड़ती हैं। विद्यार्थियों ने कंप्यूटर लैब के पर्याप्त उपयोग नहीं होने परिवहन सुविधा की कमी छात्राओं के लिए अलग हॉस्टल नहीं होने हॉस्टल में साफ सफाई की समस्या और खेल गतिविधियों के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिलने जैसी शिकायतें भी रखी हैं। बच्चों का आरोप है कि दूरदराज से आने वाले विद्यार्थियों को इन व्यवस्थाओं की कमी का सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है।

    प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों ने सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सामने 15 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें सभी शिकायतों की स्वतंत्र जांच भारतीय सांकेतिक भाषा में विद्यार्थियों से सीधे संवाद साइन लैंग्वेज प्रशिक्षित और मूक बधिर शिक्षकों की नियुक्ति इंटरप्रेटर की व्यवस्था हॉस्टल और परिवहन सुविधा कंप्यूटर लैब तक बेहतर पहुंच खेल गतिविधियां भोजन और साफ सफाई में सुधार शामिल हैं।

    स्कूल के प्रभारी अधीक्षक एवं प्राचार्य मोहम्मद इरफान का कहना है कि उन्होंने मार्च 2026 में कार्यभार संभाला है और उनके अनुसार बच्चों या अभिभावकों ने उनके पास पहले कोई लिखित या मौखिक शिकायत नहीं की। उन्होंने शिक्षकों की कमी स्वीकार करते हुए कहा कि रिक्त पदों के विरुद्ध अतिथि शिक्षकों को रखने की प्रक्रिया चल रही है और जल्द चार और शिक्षक मिलने की उम्मीद है। लेकिन बच्चों का सवाल भी उतना ही अहम है कि यदि समस्याएं लंबे समय से बनी हुई थीं और समाधान नहीं हुआ तो फिर अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन के अलावा उनके पास क्या रास्ता बचता।

    अब यह मामला सिर्फ तीन शिक्षकों और 190 विद्यार्थियों के अनुपात का नहीं बल्कि दिव्यांग बच्चों के शिक्षा के अधिकार समान अवसर और समावेशी व्यवस्था का है। जब श्रवण बाधित बच्चों को पढ़ाने के लिए उनकी भाषा समझने वाला शिक्षक नहीं हो और एक कमरे में कई कक्षाएं चलानी पड़ें तो फिर यह तय करना जरूरी हो जाता है कि इन बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा।

  • स्टाइपेंड की लड़ाई ने बढ़ाई स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंता: इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन तेज, सरकार के सामने जल्द समाधान की चुनौती

    स्टाइपेंड की लड़ाई ने बढ़ाई स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंता: इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन तेज, सरकार के सामने जल्द समाधान की चुनौती


    भोपाल ।
    मध्य प्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन ने अब स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन लगातार तीसरे दिन भी जारी है और भोपाल से लेकर इंदौर समेत प्रदेश के कई सरकारी अस्पतालों में इसका सीधा असर मरीजों पर दिखाई दे रहा है। इंटर्न डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर डटे हुए हैं जबकि जूनियर डॉक्टर और सीनियर रेजिडेंट्स के समर्थन में आने से आंदोलन और व्यापक होता जा रहा है। बुधवार को भी नियमित ओपीडी सेवाओं के बहिष्कार का ऐलान किया गया है जिससे सुबह अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि इमरजेंसी सेवाओं को आंदोलन से अलग रखा गया है ताकि गंभीर मरीजों को तत्काल उपचार मिल सके।

    भोपाल में इस आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र कमला पार्क क्षेत्र बना हुआ है जहां इंटर्न डॉक्टर सड़क पर बैठकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं लिया जाता तब तक वे आंदोलन समाप्त नहीं करेंगे। सड़क पर बैठे डॉक्टरों के कारण यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई और पुलिस तथा प्रशासन लगातार प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर चक्काजाम समाप्त कराने की कोशिश करते रहे। इसके बावजूद डॉक्टर अपनी मांगों पर अड़े रहे और उन्होंने सड़क पर ही भोजन कर विरोध जारी रखा। इस बीच मानवता की तस्वीर भी देखने को मिली जब एक दंपती ने अपनी बेटी के एक्सीडेंट की जानकारी दी तो प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों ने तुरंत उनकी गाड़ी को रास्ता दे दिया।

    आंदोलन के पीछे केवल स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग नहीं बल्कि सोमवार को प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी डॉक्टरों में गहरी नाराजगी है। इंटर्न डॉक्टरों का आरोप है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। इसी कार्रवाई के विरोध में अब आंदोलन और तेज हो गया है। डॉक्टरों का कहना है कि उनकी समस्याओं का समाधान बल प्रयोग से नहीं बल्कि संवेदनशील बातचीत और ठोस निर्णय के जरिए किया जाना चाहिए।

    इंटर्न डॉक्टरों के समर्थन में भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के सीनियर रेजिडेंट्स भी आंदोलन में शामिल हो गए हैं। जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन और मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन के बाद सीनियर रेजिडेंट्स द्वारा भी ओपीडी और अन्य गैर जरूरी सेवाओं के बहिष्कार का निर्णय लिए जाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ गया है। जूनियर डॉक्टरों ने भी साफ कर दिया है कि नियमित ओपीडी और इलेक्टिव ओटी का बहिष्कार जारी रहेगा जबकि आपातकालीन सेवाएं सामान्य रूप से संचालित की जाएंगी।

    प्रदेशभर के डॉक्टरों में पुलिस कार्रवाई को लेकर नाराजगी का दावा किया जा रहा है। मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन का कहना है कि डॉक्टरों की मांगों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए और सरकार को जल्द ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिससे आंदोलन समाप्त हो सके। दूसरी ओर अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंच रहे मरीजों की परेशानी लगातार बढ़ रही है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती डॉक्टरों की मांगों पर जल्द सहमति बनाकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह सामान्य करना है। प्रशासन और सरकार की बातचीत पर सभी की नजरें टिकी हैं क्योंकि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो आंदोलन का असर प्रदेश की चिकित्सा सेवाओं पर और अधिक गंभीर हो सकता है।