Category: Madhya Pradesh

  • दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    दतिया विधायक घनश्याम सिंह की सदस्यता को चुनौती, चुनावी हलफनामे में पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप

    मध्य प्रदेश। की दतिया विधानसभा सीट एक बार फिर कानूनी विवाद के कारण चर्चा में है। कांग्रेस विधायक घनश्याम सिंह के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जुलाई 2026 में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान दाखिल चुनावी हलफनामे में उन्होंने वर्ष 1991 के एक पुराने आपराधिक मामले की जानकारी नहीं दी थी। इस मामले के सामने आने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता दीपक बेलपत्री ने दायर की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि घनश्याम सिंह ने उपचुनाव के दौरान अपने शपथ पत्र में कुछ आपराधिक मामलों की जानकारी दी, लेकिन 1991 में दर्ज एक अन्य मामले का उल्लेख नहीं किया। याचिका में इस कथित चूक को उनके निर्वाचन को चुनौती देने का आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से उनके चुनाव को निरस्त करने की मांग की है।

    याचिका में वर्ष 1991 की एक घटना का उल्लेख किया गया है। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद दतिया में विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम हुआ था। आरोप के मुताबिक, इस घटना के दौरान पुलिस ने 22 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी, जिनमें घनश्याम सिंह का नाम भी शामिल था। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस मामले की जानकारी जुलाई 2026 के उपचुनाव के दौरान दाखिल किए गए हलफनामे में नहीं दी गई।

    मामले में वर्ष 2020 के एक अन्य आपराधिक प्रकरण का भी जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि घनश्याम सिंह ने 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल अपने शपथ पत्र में भी इस मामले से संबंधित जानकारी का उल्लेख नहीं किया था। इस तरह याचिका में अलग-अलग चुनावों के दौरान दिए गए हलफनामों में कथित रूप से जानकारी छिपाने का मुद्दा उठाया गया है।

    शुक्रवार को सुनवाई के दौरान ग्वालियर खंडपीठ ने विधायक को नोटिस जारी कर उनका पक्ष जानना चाहा। अदालत की इस कार्रवाई के बाद अब मामले में उनके जवाब और आगे होने वाली सुनवाई पर नजर रहेगी। हालांकि, केवल नोटिस जारी होने से यह साबित नहीं होता कि विधायक ने जानबूझकर जानकारी छिपाई है या उनका निर्वाचन अवैध है। इन सवालों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होगा।

    दतिया विधानसभा सीट पर यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वर्ष पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद यहां उपचुनाव कराया गया था। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में दोषसिद्धि और सजा के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हुई थी। इसके बाद खाली हुई सीट पर जुलाई 2026 में मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की।

    उपचुनाव में घनश्याम सिंह का मुकाबला भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी से हुआ था। अब उनके निर्वाचन को अदालत में चुनौती दिए जाने से दतिया की राजनीति में एक नया कानूनी मुद्दा सामने आया है। हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में उनकी सदस्यता समाप्त होगी या सीट पर दोबारा उपचुनाव कराना पड़ेगा।

    आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालत में याचिकाकर्ता के आरोपों और चुनावी हलफनामे से जुड़े तथ्यों की जांच के बाद क्या निष्कर्ष निकलता है। यदि आरोप न्यायिक प्रक्रिया में साबित होते हैं और अदालत निर्वाचन को प्रभावित करने वाली कानूनी अनियमितता पाती है, तो उसके अनुसार फैसला लिया जा सकता है। फिलहाल हाईकोर्ट ने नोटिस जारी कर विधायक से जवाब मांगा है और मामले का अंतिम परिणाम आना बाकी है।

  • पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले

    पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले


    मध्य प्रदेश। में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य देशभर में पराली जलाने के मामलों में पहले स्थान पर रहा। पूरे देश में इस साल कुल 33,028 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 17,067 मामलों की रही। यह राष्ट्रीय आंकड़े का आधे से भी अधिक है। उपग्रह आधारित आंकड़ों से सामने आई इस स्थिति ने खेतों में फसल अवशेष जलाने और उससे होने वाले प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में वर्ष 2021 से पहले पराली जलाने की घटनाएं सालाना पांच हजार से कम रहती थीं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने के साथ बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में प्रदेश में पराली जलाने के 16,074 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,067 हो गई। इस तरह एक साल में 993 घटनाओं की वृद्धि दर्ज की गई।

    वर्तमान सीजन में भी पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 350 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों के निपटान से जुड़ी चुनौती को दर्शाता है। यदि खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उनके प्रबंधन के प्रभावी उपाय उपलब्ध नहीं होते, तो ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।

    राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी पराली जलाने के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में 5,769 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में बढ़कर 7,290 हो गईं। राजस्थान में भी इनकी संख्या 2024 के 2,762 मामलों से बढ़कर 2025 में 2,890 हो गई।

    इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। पंजाब में वर्ष 2021 में 71,304 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। हरियाणा में भी 2021 के 6,984 मामलों की तुलना में 2025 में 662 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से अलग-अलग राज्यों में पराली प्रबंधन की स्थिति में आए बदलाव का पता चलता है।

    देशभर में पराली जलाने की कुल घटनाओं में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। वर्ष 2021 में कुल 92,407 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या घटकर 56,157 और 2023 में 57,242 रही। वर्ष 2024 में कुल 36,893 मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 33,028 हो गई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में बढ़ते मामले राज्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।

    पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। सर्दियों में जब धुआं और कोहरा एक साथ मौजूद रहते हैं, तो स्मॉग की स्थिति बन सकती है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर खराब या बहुत खराब श्रेणी तक पहुंचने की आशंका रहती है, हालांकि इसका वास्तविक स्तर स्थान और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है। सांस की एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए धुएं के संपर्क में आना विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, फेफड़ों की कार्यक्षमता में किसी निश्चित प्रतिशत की कमी या अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने का आकलन करने के लिए संबंधित अध्ययन और स्वास्थ्य आंकड़ों की पुष्टि आवश्यक है।

    पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई, जुर्माने और जागरूकता संबंधी प्रयास किए जाते हैं। लेकिन किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग और उनका उचित प्रबंधन पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है। मध्य प्रदेश में बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभावी रोकथाम और किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

  • एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा

    एमपी में 27% ओबीसी आरक्षण पर घमासान, विवेक तन्खा ने सरकार से मांगे ठोस आंकड़े, राकेश सिंह ने कांग्रेस को घेरा


    मध्य प्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हालिया रुख के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार से आरक्षण के समर्थन में ठोस आंकड़े जुटाकर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने की मांग की है। वहीं, प्रदेश सरकार के मंत्री राकेश सिंह ने इस विवाद के लिए कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

    जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया था। इसके बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया, लेकिन कानून का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनी रही। तन्खा के मुताबिक, वर्तमान सरकार को अदालत में इस व्यवस्था के समर्थन में पर्याप्त तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करने चाहिए थे।

    तन्खा ने हाईकोर्ट की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त और ठोस आंकड़े पेश नहीं किए जाने के कारण आरक्षण के पक्ष को मजबूती से रखने में कठिनाई हुई। उनका मानना है कि यदि अदालत के सामने समय रहते जरूरी आंकड़े रखे जाते, तो मामले की स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, यह उनका आकलन है और अदालत के निर्णय का अंतिम आधार संबंधित कानूनी तथ्यों तथा न्यायिक निष्कर्षों पर निर्भर करता है।

    आरक्षण की सीमा को लेकर विवेक तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निर्धारित की थी। इस सीमा से आगे जाने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक है। इसके लिए राज्य सरकार को पिछड़ेपन और संबंधित परिस्थितियों के समर्थन में प्रामाणिक मात्रात्मक आंकड़े अदालत के सामने रखने होते हैं।

    तन्खा ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के तहत अभी भी राज्य सरकार के पास अपना पक्ष रखने का रास्ता है। यदि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की है, तो उसे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, आरक्षण से जुड़े मामले में आंकड़ों और कानूनी आधार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सरकार को उपलब्ध प्रशासनिक जानकारी और संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी अध्यादेश या कानून का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप या सहयोग कर सकते हैं, लेकिन सरकार के पास उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और प्रशासनिक रिकॉर्ड को अदालत में पेश करने का दायित्व सरकार का ही है।

    दूसरी ओर, मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पर्याप्त तैयारी के बिना ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का कदम उठाया था। उनके अनुसार, संबंधित विधेयक में तकनीकी और कानूनी कमियां थीं, जिनके कारण मामला विवादों में उलझा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ओबीसी वर्ग के हितों के नाम पर ऐसा निर्णय लिया, जिसका कानूनी आधार पर्याप्त मजबूत नहीं था।

    राकेश सिंह ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार ओबीसी सहित सभी वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा जताया कि सरकार कानूनी मंचों पर अपना पक्ष रखेगी और ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास करेगी, जिससे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।इस पूरे विवाद में अब राज्य सरकार की कानूनी रणनीति और सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने वाले तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। एक ओर विवेक तन्खा ने आंकड़ों के आधार पर मजबूत पैरवी की जरूरत बताई है, वहीं भाजपा ने आरक्षण से जुड़ी मौजूदा कानूनी स्थिति के लिए कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

  • मध्य प्रदेश के सिंगरौली में 3.5 तीव्रता का भूकंप, दोपहर 2:12 बजे आए झटकों का केंद्र 10 किलोमीटर गहराई में

    मध्य प्रदेश के सिंगरौली में 3.5 तीव्रता का भूकंप, दोपहर 2:12 बजे आए झटकों का केंद्र 10 किलोमीटर गहराई में

    मध्य प्रदेश। के सिंगरौली जिले में शनिवार, 17 अक्टूबर 2026 को भूकंप के झटके दर्ज किए गए। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 3.5 मापी गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भूकंप दोपहर 2 बजकर 12 मिनट 35 सेकंड पर आया। इसका केंद्र जमीन से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में स्थित था। सिंगरौली में भूकंप दर्ज होने की जानकारी सामने आने के बाद इस घटना का समय, तीव्रता और केंद्र की गहराई प्रमुख विवरण रहे।

    भूकंप की तीव्रता 3.5 होने के कारण इसे हल्की श्रेणी का भूकंप माना जाता है। इस स्तर के भूकंप के झटके कुछ लोगों को महसूस हो सकते हैं, जबकि कई बार लोग इन्हें महसूस नहीं कर पाते। झटकों का अनुभव आसपास के क्षेत्र, इमारत की स्थिति और व्यक्ति के स्थान जैसे कारकों पर निर्भर कर सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि सिंगरौली में कितने लोगों ने झटके महसूस किए।भूकंप का केंद्र जमीन से 10 किलोमीटर नीचे बताया गया है। भूकंप विज्ञान में केंद्र की गहराई महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इससे सतह पर झटकों के प्रभाव को समझने में मदद मिलती है। हालांकि, केवल तीव्रता और गहराई के आधार पर किसी क्षेत्र में हुए नुकसान का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए स्थानीय स्थिति और नुकसान से जुड़ी अलग जानकारी की जरूरत होती है।

    सिंगरौली मध्य प्रदेश का एक प्रमुख ऊर्जा क्षेत्र है। यहां भूकंप के झटके दर्ज होने की खबर शनिवार दोपहर सामने आई। उपलब्ध विवरण में भूकंप की तीव्रता, समय और केंद्र की गहराई की जानकारी दी गई है। हालांकि, घटना के बाद किसी तरह के जान-माल के नुकसान, भवनों में दरार या अन्य प्रभावों के बारे में कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।भूकंप की तीव्रता को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि रिक्टर स्केल पर दर्ज संख्या भूकंप के परिमाण को दर्शाती है। 3.5 तीव्रता का भूकंप सामान्य तौर पर हल्के स्तर का होता है, लेकिन अलग-अलग स्थानों पर इसका अनुभव अलग हो सकता है। कम तीव्रता के झटके भी कुछ परिस्थितियों में महसूस किए जा सकते हैं, जबकि कुछ जगहों पर उनका पता नहीं चलता।

    भूकंप की घटना के संबंध में उपलब्ध जानकारी में किसी बड़े नुकसान या आपात स्थिति का उल्लेख नहीं है। ऐसे में नुकसान होने या नहीं होने के बारे में अतिरिक्त पुष्टि के बिना कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। घटना से जुड़े विवरणों में फिलहाल सबसे प्रमुख तथ्य यह है कि भूकंप शनिवार दोपहर दर्ज किया गया और इसकी तीव्रता 3.5 रही।भूकंप जैसी घटनाओं के दौरान लोगों को घबराने के बजाय सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करना चाहिए। यदि झटके महसूस हों, तो मजबूत मेज के नीचे सुरक्षित स्थान लेना, खिड़कियों और भारी वस्तुओं से दूरी बनाए रखना तथा लिफ्ट का उपयोग नहीं करना उपयोगी सावधानियां हैं। झटके रुकने के बाद आसपास की स्थिति देखकर ही बाहर निकलना चाहिए और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों पर ध्यान देना चाहिए।

    सिंगरौली में 17 अक्टूबर को दर्ज इस भूकंप का केंद्र 10 किलोमीटर की गहराई में था और इसकी तीव्रता 3.5 मापी गई। घटना से संबंधित उपलब्ध जानकारी में किसी नुकसान की पुष्टि नहीं की गई है। आगे की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन या संबंधित विभागों की ओर से जारी होने वाली पुष्ट जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • भोपाल में 12 साल की बच्ची की हत्या के बाद हंगामा, आरोपी को सौंपने की मांग पर तीन घंटे प्रदर्शन

    भोपाल में 12 साल की बच्ची की हत्या के बाद हंगामा, आरोपी को सौंपने की मांग पर तीन घंटे प्रदर्शन

    मध्य प्रदेश । की राजधानी भोपाल के बैरागढ़ इलाके में 12 वर्षीय बच्ची की हत्या के मामले में शनिवार, 17 अक्टूबर को लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। घटना से नाराज लोगों ने बैरागढ़ थाने के बाहर करीब तीन घंटे तक प्रदर्शन किया और आरोपी को कड़ी सजा देने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने थाने के गेट पर धक्का देकर अंदर घुसने की कोशिश भी की, लेकिन पुलिस बल ने उन्हें रोक दिया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया।

    मामले में 23 वर्षीय आरोपी मोबिन को पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज और परिजनों से मिली जानकारी के आधार पर हिरासत में लिया। पुलिस के अनुसार, शुरुआती पूछताछ में उसके अपराध स्वीकार करने की बात सामने आई है। हालांकि, मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जांच और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर की जा रही है।

    घटना 15 अक्टूबर की रात की है, जब बैरागढ़ इलाके में रहने वाली 12 वर्षीय बच्ची घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। परिजनों ने उसकी तलाश की। अगले दिन, 16 अक्टूबर को बच्ची का शव कृष्णा कॉम्प्लेक्स के पीछे स्थित एक खंडहर में मिला। शव मिलने के बाद इलाके में आक्रोश फैल गया और लोगों ने आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग शुरू कर दी।

    प्रारंभिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बच्ची के साथ यौन हिंसा और गला घोंटकर हत्या किए जाने की पुष्टि होने की बात सामने आई है। घटनास्थल से जुड़े विवरण के अनुसार, बच्ची के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था और उसके शरीर के निचले हिस्से पर कपड़े नहीं थे। उसके सामने के दो दांत भी टूटे हुए बताए गए हैं। पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।

    शनिवार को विरोध प्रदर्शन के दौरान बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने आरोपी को फांसी देने, उसके मकान पर बुलडोजर चलाने और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालत में कराने की मांग की। कुछ लोगों ने आरोपी को पुलिस के हवाले करने के बजाय उन्हें सौंपने की मांग भी की। पुलिस ने भीड़ को थाने में प्रवेश करने से रोकने के लिए मुख्य गेट बंद कर दिए।

    प्रदर्शन का असर भोपाल-सीहोर रोड पर भी पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर जाम लगा दिया, जिससे लगभग दो किलोमीटर तक वाहनों की कतार लग गई। इस दौरान यात्रियों और वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ा। थाने के सामने महिलाएं भी धरने पर बैठीं। पुलिस अधिकारियों ने लगातार लोगों को समझाने की कोशिश की और अतिरिक्त बल की मदद से स्थिति संभालने का प्रयास किया।

    मामले में सहायक पुलिस आयुक्त रत्नेश तोमर ने बताया कि पुलिस ने हत्या और बहला-फुसलाकर ले जाने सहित गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर मुख्य आरोपी को गिरफ्तार किया है। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है। विस्तृत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिलने के बाद मामले में जरूरत के अनुसार अतिरिक्त कानूनी धाराएं जोड़ी जाएंगी।

    पुलिस के अनुसार, घटना के बाद से अधिकारी पीड़ित परिवार के संपर्क में हैं। प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया गया कि मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी और आरोपी के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

    करीब तीन घंटे तक चले विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम के बाद प्रदर्शनकारी शांत हुए। इसके बाद परिजन बच्ची का शव अंतिम संस्कार के लिए घर ले गए। एहतियात के तौर पर इलाके में पुलिस बल तैनात रखा गया। घटना की जांच जारी है और विस्तृत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई स्पष्ट होगी।

  • अवैध खनन के आरोपों से जुड़े मामले में संजय पाठक की फर्म की याचिका खारिज, अब कलेक्टर के सामने रखना होगा पक्ष

    अवैध खनन के आरोपों से जुड़े मामले में संजय पाठक की फर्म की याचिका खारिज, अब कलेक्टर के सामने रखना होगा पक्ष


    जबलपुर। मध्यप्रदेश में कथित अवैध लौह अयस्क खनन से जुड़े मामले में भाजपा विधायक संजय पाठक से संबंधित एक और फर्म को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। जबलपुर हाईकोर्ट ने शुक्रवार को पैसिफिक एक्सपोर्ट की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी। इस याचिका के जरिए फर्म ने जबलपुर कलेक्टर की ओर से जारी 81.73 करोड़ रुपये के रिकवरी नोटिस को चुनौती दी थी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस मामले में कार्रवाई करने का अधिकार कलेक्टर के पास है। साथ ही फर्म को अपना पक्ष कलेक्टर के समक्ष रखने की छूट दी गई है। कोर्ट ने कलेक्टर को निर्देश दिया है कि वह चार महीने के भीतर मामले का निराकरण करें।
    यह मामला संजय पाठक से संबंधित फर्मों के खिलाफ की जा रही करीब 443 करोड़ रुपये की रिकवरी कार्रवाई से जुड़ा है। इसके अतिरिक्त देय जीएसटी की वसूली का मामला भी इसमें शामिल बताया गया है। अधिवक्ता पंकज कुमार दुबे के मुताबिक अदालत ने इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मामला वर्ष 2004 से 2017 के बीच का है। आरोप है कि इस अवधि में संबंधित फर्मों ने निर्धारित सीमा से अधिक लौह अयस्क का खनन किया था। इसी कथित अतिरिक्त खनन को लेकर प्रशासन की ओर से रिकवरी की कार्रवाई की जा रही है। फिलहाल यह मामला जबलपुर कलेक्टर के समक्ष विचाराधीन है।
    पैसिफिक एक्सपोर्ट के खिलाफ करीब 81.73 करोड़ रुपये की रिकवरी का मामला है। फर्म के डायरेक्टर सुमित अग्रवाल बताए गए हैं। रिकवरी नोटिस को चुनौती देते हुए फर्म ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि अदालत ने याचिका खारिज करते हुए फर्म को संबंधित प्रशासनिक प्राधिकारी के सामने अपना पक्ष रखने का विकल्प दिया है। इसका अर्थ है कि अब फर्म को कलेक्टर के समक्ष अपने दस्तावेज और दलीलें प्रस्तुत करनी होंगी। इसके बाद कलेक्टर को निर्धारित समय सीमा के भीतर मामले पर निर्णय लेना होगा।
    इस प्रकरण में इससे पहले भी संजय पाठक से संबंधित एक अन्य फर्म आनंद माइनिंग कॉर्पोरेशन को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली थी। 8 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आनंद माइनिंग कॉर्पोरेशन की याचिका खारिज कर दी थी। उस बेंच में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा शामिल थे। अब पैसिफिक एक्सपोर्ट की याचिका खारिज होने के बाद इसी मामले से संबंधित एक और फर्म को प्रशासनिक स्तर पर अपना पक्ष रखना होगा। मामले से जुड़े पांच प्रकरणों में अलग-अलग याचिकाओं पर कार्रवाई की जा रही है।
    सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात भी रखी गई कि पैसिफिक एक्सपोर्ट को वर्ष 2025 से नोटिस जारी किए जा रहे थे और जवाब देने के लिए कई बार समय दिया गया था। इसके बावजूद फर्म की ओर से अब तक जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया और न ही कलेक्टर के समक्ष उपस्थिति दर्ज कराई गई। अदालत ने इसी संदर्भ में फर्म को कलेक्टर के सामने अपना पक्ष रखने का अवसर दिया और चार महीने में निर्णय लेने के निर्देश जारी किए।
    अधिवक्ता पंकज कुमार दुबे के अनुसार मामला पिछले छह से आठ महीने से लंबित है। उन्होंने कहा कि हस्तक्षेप आवेदन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शासकीय राजस्व से जुड़े बड़े मामले में अनावश्यक देरी न हो और कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई की जाए। अब इस पूरे प्रकरण में कलेक्टर की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। चार महीने के भीतर होने वाले निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि रिकवरी संबंधी दावों और फर्म के पक्ष पर प्रशासन क्या निष्कर्ष निकालता है।

  • 27% OBC आरक्षण पर फिर गरमाई राजनीति, कांग्रेस ने उठाए कानूनी पैरवी पर सवाल, भाजपा ने पुराने फैसले को ठहराया जिम्मेदार

    27% OBC आरक्षण पर फिर गरमाई राजनीति, कांग्रेस ने उठाए कानूनी पैरवी पर सवाल, भाजपा ने पुराने फैसले को ठहराया जिम्मेदार


    जबलपुर। मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया है। आरक्षण को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य सरकार की कानूनी पैरवी पर सवाल उठाते हुए कहा कि हाईकोर्ट में आरक्षण के समर्थन में जरूरी आंकड़े और तथ्य मजबूती से पेश नहीं किए गए। वहीं प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने ओबीसी आरक्षण के मामले में लोगों के साथ धोखा किया। दोनों नेताओं के बयानों के बाद प्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।
    शनिवार को एक दिवसीय दौरे पर जबलपुर पहुंचे विवेक तन्खा ने कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया था। हालांकि बाद में सरकार बदल गई और भाजपा सत्ता में आ गई। ऐसे में अध्यादेश और आरक्षण से जुड़े कानूनी प्रावधानों का बचाव करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी। तन्खा के मुताबिक किसी भी आरक्षण व्यवस्था को अदालत में मजबूती से साबित करने के लिए केवल राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं होते बल्कि उसके समर्थन में ठोस तथ्य और आंकड़े प्रस्तुत करना भी जरूरी है।
    तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि नौ न्यायाधीशों की पीठ ने सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत रखने का सिद्धांत स्थापित किया था। इससे अधिक आरक्षण देने के लिए असाधारण परिस्थितियों को प्रमाणित करना आवश्यक होता है। इसके लिए सरकार को मात्रात्मक आंकड़े यानी क्वांटिफायबल डेटा प्रस्तुत करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार जरूरी आंकड़े प्रभावी ढंग से पेश नहीं कर पाई। यदि पर्याप्त तथ्य और आंकड़े अदालत के सामने रखे जाते तो संभव है कि मामले में अलग परिणाम सामने आता।
    वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अब राज्य सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने का विकल्प मौजूद है। यदि सरकार ने विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी दायर की है तो यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। उनके अनुसार आरक्षण के पक्ष में कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को ठोस तथ्यों के साथ अदालत में पैरवी करनी चाहिए। तन्खा ने यह भी कहा कि अध्यादेश का बचाव करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होती है क्योंकि संबंधित विभागों के पास ही जरूरी आंकड़े और प्रशासनिक जानकारी उपलब्ध रहती है। राजनीतिक दल इस कानूनी प्रक्रिया में अपना पक्ष रख सकते हैं और सहयोग कर सकते हैं लेकिन सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
    दूसरी ओर लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने आरक्षण के मामले में जल्दबाजी की और पर्याप्त तैयारी के बिना विधेयक लाया। मंत्री के मुताबिक हाईकोर्ट के आदेश में विधेयक से जुड़ी कमियों का उल्लेख किया गया है और इसी वजह से मौजूदा स्थिति पैदा हुई। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि सभी वर्गों के साथ न्याय हो और आरक्षण से जुड़े मामले का कानूनी समाधान निकाला जाए।
    ओबीसी आरक्षण को लेकर दोनों पक्षों के बयानों से साफ है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी प्रदेश की राजनीति में अहम बना रहेगा। एक तरफ कांग्रेस सरकार की कानूनी पैरवी और आंकड़ों को लेकर सवाल उठा रही है तो दूसरी तरफ भाजपा आरक्षण से जुड़े पुराने फैसलों और विधायी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगे की कानूनी कार्रवाई पर रहेगी। अदालत में पेश किए जाने वाले तथ्य और आंकड़े ही इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • स्कूल में छात्र बनकर पहुंचे कमिश्नर धनंजय सिंह, पढ़ाई में मिली लापरवाही, कई अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश

    स्कूल में छात्र बनकर पहुंचे कमिश्नर धनंजय सिंह, पढ़ाई में मिली लापरवाही, कई अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश


    जबलपुर । मध्यप्रदेश के जबलपुर में प्रशासनिक व्यवस्था की हकीकत जानने के लिए संभागायुक्त धनंजय सिंह ने शुक्रवार को अचानक मझौली तहसील का दौरा किया। मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत किए गए इस निरीक्षण में उन्होंने स्कूल से लेकर स्वास्थ्य केंद्र और आंगनवाड़ी तक विभिन्न सरकारी संस्थाओं की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। सबसे ज्यादा चर्चा पौंडा गांव के शासकीय स्कूल के निरीक्षण की रही जहां कमिश्नर खुद छात्र बनकर बेंच पर बैठ गए और शिक्षकों से पढ़ाई की स्थिति जानी। जब उन्हें अध्यापन का स्तर अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिला तो उन्होंने शिक्षकों को फटकार लगाई और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान कई अन्य व्यवस्थाओं में भी सुधार की जरूरत सामने आई।
    पौंडा गांव के शासकीय स्कूल में संभागायुक्त ने विद्यार्थियों से बातचीत कर उनकी पढ़ाई और रोजाना होने वाली शैक्षणिक गतिविधियों के बारे में जानकारी ली। उन्होंने यह भी पूछा कि बच्चों को कक्षा में किस तरह पढ़ाया जाता है और उनके भविष्य को लेकर करियर काउंसलिंग की क्या व्यवस्था है। निरीक्षण के दौरान अध्यापन कार्य संतोषजनक नहीं मिलने पर उन्होंने शिक्षकों को अपनी कार्यशैली सुधारने के निर्देश दिए। साथ ही संबंधित विकासखंड शिक्षा अधिकारी यानी बीईओ और विकासखंड स्रोत समन्वयक यानी बीआरसी के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए कहा। इस निरीक्षण का उद्देश्य स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था को परखना था।
    इसके बाद संभागायुक्त ने पौंडा स्थित सहकारी संस्था का निरीक्षण किया और खाद वितरण की व्यवस्था के बारे में जानकारी ली। उन्होंने किसानों को खाद की उपलब्धता और वितरण प्रक्रिया की स्थिति जानने के साथ संयुक्त आयुक्त सहकारिता को वितरण का सत्यापन करने के निर्देश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों से जुड़ी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। खाद वितरण में किसी भी तरह की अनियमितता सामने आने पर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई करने को कहा गया।
    स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति जानने के लिए धनंजय सिंह ने आयुष्मान आरोग्य मंदिर का भी निरीक्षण किया। यहां उन्होंने चिकित्सकीय स्टाफ और मरीजों से बातचीत कर उपचार की गुणवत्ता और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी ली। उन्होंने आवश्यक दवाओं की उपलब्धता एएनसी पंजीयन और मरीजों के स्वास्थ्य परीक्षण की स्थिति की समीक्षा की। इसके अलावा ओपीडी पंजी का निरीक्षण कर टीकाकरण जननी सुरक्षा योजना और प्रसूति सहायता योजना से जुड़े मामलों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाओं को निर्देश दिए कि मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार मिले और जरूरी दवाओं की उपलब्धता लगातार बनी रहे। गर्भवती महिलाओं के पंजीयन और स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित निगरानी पर भी जोर दिया गया।
    संभागायुक्त ने आंगनवाड़ी केंद्र पहुंचकर बच्चों के पोषण वजन खेलकूद और शैक्षणिक गतिविधियों का जायजा लिया। केंद्र के संचालन की पर्याप्त निगरानी नहीं होने पर उन्होंने संबंधित बाल विकास परियोजना अधिकारी यानी सीडीपीओ के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने गौशाला का निरीक्षण कर संचालकों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए। जल जीवन मिशन के तहत गांव में चल रही एकल नलजल योजना की भी समीक्षा की गई। काम समयसीमा में पूरा नहीं होने और उचित मॉनिटरिंग की कमी के मामले में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के सहायक यंत्री के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
    दौरे के दौरान संभागायुक्त ने ग्रामीणों से सीधे संवाद कर पेयजल खाद और राशन की उपलब्धता के बारे में भी जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों को जनहित से जुड़ी योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाने और सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के निर्देश दिए। इस निरीक्षण के जरिए प्रशासन ने स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी संस्थाओं में लापरवाही और निगरानी की कमी को गंभीरता से लिया जाएगा। अब संबंधित विभागों की जिम्मेदारी होगी कि वे कमियों को दूर करें और शिक्षा स्वास्थ्य पोषण तथा पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाएं।
  • ग्वालियर में सड़क सुधार पर 108 करोड़ खर्च करने की तैयारी, पुरानी योजनाओं पर सवाल, अब गुणवत्ता की होगी असली परीक्षा

    ग्वालियर में सड़क सुधार पर 108 करोड़ खर्च करने की तैयारी, पुरानी योजनाओं पर सवाल, अब गुणवत्ता की होगी असली परीक्षा


    ग्वालियर। ग्वालियर में बदहाल सड़कों से परेशान लोगों को राहत देने के लिए नगर निगम ने बड़ी कार्ययोजना तैयार की है। शहर के प्रमुख मार्गों का निर्माण और चौड़ीकरण करने के लिए 108 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस योजना के तहत कुल 28 सड़कों को विकसित करने की तैयारी है। हालांकि शहर में सड़क सुधार की नई योजना के बीच निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। कई इलाकों में सड़कें गहरे गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं तो कुछ स्थानों पर निर्माण के बाद सड़कें दोबारा धंसने की शिकायतें सामने आई हैं। सड़क सुधार का मामला हाईकोर्ट तक पहुंचने के बाद अब नगर निगम की कार्ययोजना और उसके क्रियान्वयन पर लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।
    नगर निगम की प्रस्तावित योजना में शहर के कई महत्वपूर्ण मार्गों को शामिल किया गया है। इनमें एजी ऑफिस से सिल्वर एस्टेट तक का मार्ग होटल सनबीम से मानसिंह चौराहे तक की सड़क टाइगर चौक से दाने बाबा चौराहा भिंड रोड से सेंट्रल एकेडमी हजीरा चौराहे से बिरला नगर पुल और चार शहर का नाका लधेड़ी से जलालपुर तथा कम्पू थाना से गुड़ी-गुड़ी का नाका तक के मार्ग शामिल हैं। इसके अलावा माधोगंज थाना से हेमसिंह की परेड और महाराज बाड़ा से गश्त का ताजिया तक की सड़क का भी विकास किया जाना है। सहायक नगर निवेशक अमित गुप्ता के अनुसार नगर निगम आयुक्त अभिषेक चौधरी के प्रयासों से प्रदेश सरकार की द्वारका योजना के तहत इन मार्गों के विकास की कार्ययोजना तैयार की गई है। योजना का उद्देश्य शहर में आवागमन को बेहतर बनाना और लोगों को खराब सड़कों से राहत दिलाना है।
    शहर में सड़क निर्माण की जरूरत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गोले का मंदिर चेतकपुरी शताब्दीपुरम और दीनदयाल नगर जैसे इलाकों में लोग लंबे समय से सड़क संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कई स्थानों पर गड्ढों के कारण वाहन चालकों को परेशानी होती है वहीं वाहनों के गुजरने से उड़ने वाली धूल राहगीरों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ाती है। सिटी सेंटर जैसे प्रमुख क्षेत्र की सड़कें भी इन समस्याओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। सड़क बनने के कुछ समय बाद ही उसके धंसने की शिकायतें निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती हैं। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग और नगर निगम के बीच सड़कों की जिम्मेदारी को लेकर भी खींचतान की स्थिति सामने आती रही है।
    ग्वालियर में इससे पहले भी धूल से राहत दिलाने के लिए डस्ट फ्री रोड योजना घोषित की गई थी। इस योजना के तहत करीब 40 किलोमीटर लंबाई की 18 सड़कों को धूल मुक्त बनाने के साथ पानी का छिड़काव करने और एक लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि इस योजना के परिणामों को लेकर अब भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में नई सड़क विकास योजना को लेकर लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। वहीं फूलबाग से गिरवाई तक प्रस्तावित 926 करोड़ रुपये की एलिवेटेड रोड परियोजना के निर्माण से भी शहर में धूल बढ़ने की शिकायतें सामने आई हैं।
    अब नगर निगम के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल नई सड़कें बनाना नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी है। सड़क निर्माण में मानकों का पालन समय पर मरम्मत और काम की नियमित निगरानी जरूरी होगी। यदि नई सड़कें कुछ ही समय में खराब होने लगती हैं तो करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद लोगों को स्थायी राहत नहीं मिल पाएगी। शहरवासियों को उम्मीद है कि 108 करोड़ रुपये की इस कार्ययोजना से आवागमन सुगम होगा और गड्ढों तथा धूल की समस्या कम होगी। अब देखना होगा कि योजना जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है और ग्वालियर की सड़कों की स्थिति में वास्तव में कितना सुधार आता है।

  • ग्वालियर में बादलों का डेरा, सुबह हुई बूंदाबांदी, अगले दो दिन बारिश और तेज हवाओं से बदलेगा मौसम

    ग्वालियर में बादलों का डेरा, सुबह हुई बूंदाबांदी, अगले दो दिन बारिश और तेज हवाओं से बदलेगा मौसम


    ग्वालियर। ग्वालियर में शनिवार सुबह मौसम का मिजाज अचानक बदल गया। आसमान में बादलों की आवाजाही के बीच हुई हल्की बूंदाबांदी ने वातावरण में ठंडक घोल दी। पिछले कुछ दिनों से तेज धूप और गर्मी का सामना कर रहे लोगों को सुबह के समय राहत महसूस हुई। ठंडी हवाओं और बढ़ी हुई नमी के कारण मौसम सुहावना बना रहा। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले 48 घंटों के दौरान ग्वालियर और आसपास के इलाकों में कहीं-कहीं बारिश होने की संभावना है। इस दौरान हवा की रफ्तार 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है। ऐसे में अगले दो दिन शहर के मौसम में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
    शनिवार सुबह दर्ज किए गए मौसम के आंकड़ों के मुताबिक ग्वालियर का न्यूनतम तापमान 21.9 डिग्री सेल्सियस रहा जो सामान्य से 2.3 डिग्री अधिक था। सुबह 5:30 बजे तापमान 22.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जबकि सुबह 8:30 बजे यह बढ़कर 23.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। सुबह के समय सापेक्ष आर्द्रता 93 प्रतिशत रही जो सामान्य से 24 प्रतिशत अधिक थी। वातावरण में नमी बढ़ने और बादल छाए रहने के कारण सुबह मौसम में ठंडक महसूस हुई। इस दौरान शहर में 0.3 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
    पिछले कुछ दिनों के तापमान पर नजर डालें तो ग्वालियर में मौसम लगातार बदलाव के दौर से गुजर रहा है। मानसून की विदाई के बाद शहर में तेज धूप के कारण अधिकतम तापमान 34 से 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच रहा था। इससे लोगों को दिन के समय गर्मी का सामना करना पड़ रहा था। हालांकि पिछले दो दिनों में तापमान में गिरावट दर्ज की गई है। गुरुवार को शहर का अधिकतम तापमान 34.7 डिग्री सेल्सियस था जबकि शुक्रवार को यह घटकर 30.3 डिग्री सेल्सियस रह गया। यानी एक ही दिन में अधिकतम तापमान में 4.4 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आई। इस बदलाव के बाद शनिवार सुबह हुई बूंदाबांदी ने मौसम में ठंडक बढ़ने के संकेत दिए।
    मौसम में आए इस बदलाव के पीछे बादलों की सक्रियता और हवाओं की दिशा में परिवर्तन को प्रमुख वजह माना जा रहा है। पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से उत्तर भारत के कई हिस्सों में मौसमी गतिविधियां बनी हुई हैं। इसका असर ग्वालियर चंबल संभाग के मौसम पर भी दिखाई दे रहा है। बादलों की आवाजाही के कारण धूप का असर कम हो रहा है और कुछ स्थानों पर हल्की बारिश की स्थिति बन रही है। हालांकि दिन के समय बादल छंटने और धूप निकलने पर तापमान में बढ़ोतरी भी हो सकती है। इसलिए पूरे दिन मौसम एक जैसा रहने की संभावना नहीं है।
    मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अगले 48 घंटों में ग्वालियर सहित आसपास के क्षेत्रों में कहीं-कहीं बारिश हो सकती है। इस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है। बारिश और हवाओं के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। लोगों को बदलते मौसम के बीच स्थानीय मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखने की सलाह दी जाती है। फिलहाल शनिवार सुबह हुई बूंदाबांदी ने गर्मी से कुछ राहत जरूर दी है। अब आने वाले दो दिनों में बादलों की सक्रियता और बारिश की स्थिति तय करेगी कि ग्वालियर में ठंडक कितनी बढ़ती है और दिन के तापमान पर इसका कितना असर पड़ता है।