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  • राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल, छात्रों के आंदोलन का समर्थन कर सरकारों से सुधार की मांग की

    राहुल गांधी ने शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल, छात्रों के आंदोलन का समर्थन कर सरकारों से सुधार की मांग की

    नई दिल्ली । कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत का शिक्षा तंत्र पूरी तरह से कमजोर हो चुका है और छात्रों को कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि देशभर में छात्रों के बीच उठ रही आवाज मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ है और सरकारों को उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुनना चाहिए।

    राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से Gen-Z और छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए शिक्षा व्यवस्था की स्थिति पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि शिक्षा अब काफी महंगी हो गई है, जिसके कारण बड़ी संख्या में छात्रों के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। उनके अनुसार, शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और प्रभावी कदमों की जरूरत है।

    उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों की समस्याओं को समझे और उनकी मांगों पर ध्यान दे। राहुल गांधी ने कहा कि चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, छात्रों की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया।

    राहुल गांधी ने यह भी कहा कि उन्होंने पहले देहरादून और कोटा जैसे स्थानों पर छात्रों से जुड़े मुद्दे उठाए हैं और अब प्रयागराज में भी इसी विषय को लेकर बात करेंगे। उनके मुताबिक, देश के युवा भविष्य की दिशा तय करते हैं, इसलिए उनकी समस्याओं को समझना और समाधान निकालना जरूरी है।

    राहुल गांधी के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उन पर निशाना साधा है। भाजपा ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी युवाओं और छात्रों के मुद्दों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रहे हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्ष के नेता युवाओं के बीच भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं और एक अलग राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना चाहते हैं।

    भाजपा की ओर से कहा गया कि छात्रों से जुड़े मामलों पर सरकार लगातार काम कर रही है और शिक्षा क्षेत्र में कई सुधार किए जा रहे हैं। पार्टी ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि युवाओं के मुद्दों को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है।

    यह विवाद उस समय सामने आया है जब देश के कई हिस्सों में छात्र परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर कर रहे हैं। छात्रों की ओर से परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, रोजगार के अवसर और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है।

    राहुल गांधी ने इससे पहले भी छात्र आंदोलनों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामलों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने छात्रों के साथ संवाद को जरूरी बताते हुए कहा है कि युवाओं की समस्याओं को समझे बिना शिक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता।

    वहीं, भाजपा और कांग्रेस के बीच इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां कांग्रेस शिक्षा व्यवस्था की कमियों और छात्रों की परेशानियों को प्रमुख मुद्दा बता रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। आने वाले दिनों में शिक्षा और छात्र मुद्दे उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने दिया इस्तीफा, बोले- कांग्रेस ने क्यों हटाया इसकी जानकारी नहीं

    कर्नाटक विधान परिषद अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने दिया इस्तीफा, बोले- कांग्रेस ने क्यों हटाया इसकी जानकारी नहीं


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। कर्नाटक विधान परिषद के अध्यक्ष बसवराज होरत्ती ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। होरत्ती ने कहा कि उन्होंने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि उनसे पद छोड़ने के लिए कहा गया था। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कांग्रेस सरकार ने उनसे इस्तीफा क्यों मांगा। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में इस फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    बसवराज होरत्ती ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं पता कि कांग्रेस सरकार ने उनसे इस्तीफा देने के लिए क्यों कहा। उन्होंने बताया कि उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। होरत्ती ने कहा कि वह सम्मानपूर्वक अपने पद से हटना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बिना किसी विवाद के इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पूरे घटनाक्रम से उन्हें काफी दुख पहुंचा है।

    इससे पहले होरत्ती ने संकेत दिया था कि अगर उन्होंने पद छोड़ने से इनकार किया तो डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। उन्होंने कहा था कि सत्ताधारी दल चाहता है कि वह पद से हट जाएं। मुख्यमंत्री की ओर से उन्हें इस संबंध में जानकारी दी गई थी। होरत्ती के मुताबिक मुख्यमंत्री ने उनसे फोन पर दो बार बातचीत की और व्यक्तिगत मुलाकात के दौरान बताया कि पार्टी आलाकमान ने उनसे इस्तीफा मांगने का निर्देश दिया है।

    होरत्ती ने कहा कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने उन्हें बताया कि उन्हें हटाने का फैसला पार्टी हाईकमान का है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और अन्य नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं और वे उनका सम्मान करते हैं। लेकिन जब यह राय बन गई कि उन्हें अब इस पद पर नहीं रहना चाहिए तो उन्होंने पद पर बने रहना उचित नहीं समझा।

    बसवराज होरत्ती ने कहा कि वह सदन में इस मुद्दे को उठाने के बाद इस्तीफा देना चाहते थे, लेकिन उन्होंने सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब किसी पद को लेकर सहमति नहीं रहती तो जिम्मेदारी के साथ फैसला लेना जरूरी होता है।

    वहीं, इस घटनाक्रम के पीछे कांग्रेस संगठन की नई रणनीति को भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक में विधान परिषद के चेयरमैन पद के लिए सलीम अहमद और डिप्टी चेयरमैन पद के लिए उमाश्री के नाम को मंजूरी दी है। इसके अलावा विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए जीएस पाटिल और डिप्टी स्पीकर पद के लिए एएस पोन्नाना के नामों पर भी सहमति दी गई है।

    बसवराज होरत्ती लंबे समय से कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और विधान परिषद में उनका लंबा अनुभव रहा है। उनके इस्तीफे के बाद अब परिषद के नए अध्यक्ष को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से इस बदलाव को लेकर अभी विस्तृत कारण सामने नहीं रखा गया है। दूसरी ओर, होरत्ती के बयान ने इस पूरे मामले को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति में इस बदलाव का असर देखने को मिल सकता है।

  • सरकारी नौकरी के नाम पर हाईटेक ठगी का खुलासा, ChatGPT और स्पाई डिवाइस से कराते थे परीक्षा में नकल

    सरकारी नौकरी के नाम पर हाईटेक ठगी का खुलासा, ChatGPT और स्पाई डिवाइस से कराते थे परीक्षा में नकल


    नई दिल्ली ।
    सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर अभ्यर्थियों से लाखों रुपये की ठगी करने वाले एक हाईटेक नकल गिरोह का दिल्ली पुलिस ने पर्दाफाश किया है। पुलिस ने इस मामले में सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि यह गिरोह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर सरकारी भर्ती परीक्षाओं में उम्मीदवारों को नकल कराने का काम करता था।

    पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य ChatGPT, स्पाई कैमरा, GSM डिवाइस और नैनो ईयरबड जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करते थे। परीक्षा केंद्र में बैठे उम्मीदवारों को ऐसे उपकरण दिए जाते थे, जिनकी मदद से प्रश्न बाहर बैठे लोगों तक पहुंचाए जाते थे और फिर उनके जवाब उम्मीदवारों तक पहुंचाए जाते थे।

    मामले का खुलासा उस समय हुआ जब 26 जुलाई को सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित एलडीसी भर्ती परीक्षा के दौरान दो उम्मीदवारों को संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर पकड़ा गया। परीक्षा में नकल की शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और धीरे-धीरे पूरे नेटवर्क तक पहुंच बनाई।

    जांच के दौरान पुलिस ने हेमंत शर्मा, आरती, सनी, दीपक, वेद प्रकाश, वीरेंद्र और सोनू कुमार को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, सोनू कुमार इस गिरोह का मुख्य संचालक था। वह चंडीगढ़ में सरकारी विभाग में फायरमैन के पद पर कार्यरत बताया जा रहा है। आरोप है कि नौकरी के दौरान ही उसने परीक्षा में नकल कराने का नेटवर्क तैयार किया।

    पुलिस जांच में पता चला कि गिरोह पहले सरकारी नौकरियों की भर्तियों पर नजर रखता था। इसके बाद नौकरी पाने के इच्छुक युवाओं से संपर्क कर उन्हें परीक्षा पास कराने का भरोसा दिया जाता था। इसके लिए उम्मीदवारों से 8 से 12 लाख रुपये तक की रकम तय की जाती थी।

    गिरोह की कार्यप्रणाली काफी आधुनिक थी। उम्मीदवारों को विशेष GSM डिवाइस, मॉडिफाइड मोबाइल फोन, शर्ट के बटन में छिपा कैमरा और छोटे आकार के ईयरबड उपलब्ध कराए जाते थे। परीक्षा के दौरान कैमरे की मदद से प्रश्नों की तस्वीरें बाहर बैठे मास्टरमाइंड तक पहुंचाई जाती थीं।

    पुलिस के मुताबिक, सोनू कुमार इन सवालों के जवाब तैयार करने के लिए ChatGPT की मदद लेता था। इसके बाद तैयार जवाबों को नैनो ईयरबड के जरिए परीक्षा दे रहे उम्मीदवारों तक पहुंचाया जाता था। पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करने के लिए एक कार में विशेष तकनीकी व्यवस्था भी बनाई गई थी।

    जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी डिजिटल एप्लीकेशन की मदद से मोबाइल स्क्रीन और कैमरे से भेजी गई तस्वीरों को नियंत्रित करते थे। पुलिस ने आरोपियों के पास से मोबाइल फोन, GSM डिवाइस, नैनो ईयरबड, टैबलेट, कार और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं।

    पूछताछ के दौरान आरोपियों ने स्वीकार किया है कि वे कई उम्मीदवारों को इस तरीके से परीक्षा पास कराने में मदद कर चुके हैं। पुलिस को आशंका है कि इस गिरोह से जुड़े मामलों की संख्या अभी और बढ़ सकती है। जांच एजेंसियां बरामद डिजिटल उपकरणों की जांच कर रही हैं, जिससे गिरोह के अन्य सदस्यों और इसके पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सके।

    पुलिस के अनुसार, यह गिरोह केवल दिल्ली तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके संपर्क अन्य राज्यों तक फैले होने की जानकारी मिली है। मामले में आगे की जांच जारी है और पुलिस अन्य संभावित आरोपियों की तलाश कर रही है।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR मांग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और सस्ती लोकप्रियता


    नई दिल्ली ।
    पूर्व हाई कोर्ट जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और कहा कि इस तरह की याचिकाएं सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए मामले को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई की। याचिका में मांग की गई थी कि पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश रहते हुए उनके आवास से कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी और इस मामले में पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने पुलिस को शिकायत दी थी, लेकिन इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। उन्होंने कहा कि पूर्व न्यायाधीश अब पद पर नहीं हैं और उन्हें किसी तरह की कानूनी छूट प्राप्त नहीं है। याचिकाकर्ता का कहना था कि मामले की जांच जरूरी है और कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि इससे पहले भी इसी तरह की एक याचिका अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी है। जब वकील ने कहा कि पिछली याचिका तकनीकी आधार पर खारिज हुई थी क्योंकि उस समय शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, तो अदालत ने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को बार-बार दोहराना उचित नहीं है।

    जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक अधिवक्ता हैं और उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को समझना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं और केवल प्रचार हासिल करने के उद्देश्य से दाखिल की जा रही हैं। इसके बाद पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

    यशवंत वर्मा इससे पहले भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में आए थे। उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया के तहत महाभियोग की कार्रवाई शुरू की गई थी। हालांकि, उन्होंने बाद में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद महाभियोग की प्रक्रिया प्रभावी नहीं रही। नियमों के अनुसार, संसद द्वारा हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए संबंधित न्यायाधीश के पास इस्तीफा देने का विकल्प उपलब्ध होता है।

    मामला उस घटना से जुड़ा है, जब दिल्ली स्थित यशवंत वर्मा के आवास पर आग लगने के बाद कथित रूप से जली हुई नकदी मिलने की बात सामने आई थी। घटना के बाद इस मामले ने काफी चर्चा बटोरी थी और जांच की मांग उठी थी। हालांकि, एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि अदालत किसी भी मामले में केवल आरोपों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया के इस्तेमाल को मंजूरी नहीं देगी। शीर्ष अदालत ने अपने रुख से यह संदेश दिया है कि न्यायिक व्यवस्था में दाखिल होने वाली याचिकाएं ठोस आधार और वास्तविक कानूनी जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए।

  • NEET-UG पेपर लीक मामले में बड़ा खुलासा, NTA एक्सपर्ट्स पेपर तैयार करते समय याद कर लेते थे सवाल

    NEET-UG पेपर लीक मामले में बड़ा खुलासा, NTA एक्सपर्ट्स पेपर तैयार करते समय याद कर लेते थे सवाल


    नई दिल्ली। NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने बड़ा खुलासा किया है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में दाखिल 94 पेज की चार्जशीट के मुताबिक, पेपर लीक की साजिश परीक्षा से कई महीने पहले ही शुरू हो गई थी। आरोप है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के पेपर तैयार करने वाले कुछ एक्सपर्ट्स ने सवालों को याद कर लिया और बाद में उन्हें पर्चियों के जरिए बाहर पहुंचाया।

    CBI ने 28 जुलाई को इस मामले में 13 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें NTA के तीन एक्सपर्ट्स समेत कोचिंग संचालकों, बिचौलियों और अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है।

    होटल लौटकर पर्चियों पर लिखते थे सवाल
    चार्जशीट के अनुसार, NTA कार्यालय में पेपर तैयार करने और मॉडरेशन के दौरान एक्सपर्ट्स सवाल याद कर लेते थे। इसके बाद होटल लौटने पर याद किए गए प्रश्नों और उनके विकल्पों को पर्चियों पर लिखा जाता था। संबंधित प्रश्नों को व्यवस्थित करने के लिए NCERT की किताबों में अध्याय और पैराग्राफ तक चिन्हित किए जाते थे। CBI का दावा है कि NTA कार्यालय में आने-जाने के दौरान एक्सपर्ट्स की तलाशी नहीं होती थी। उन्हें रफ वर्क के लिए सादे कागज भी दिए जाते थे। आरोप है कि एक्सपर्ट पीवी कुलकर्णी ने इन कागजों पर केमिस्ट्री के 135 प्रश्न और उनके विकल्प नोट किए। उन्होंने केमिस्ट्री पेपर का मराठी से अंग्रेजी में बैक-ट्रांसलेशन भी किया।

    कोचिंग संचालकों और बिचौलियों ने बनाया नेटवर्क
    जांच एजेंसी के मुताबिक, यह किसी एक व्यक्ति की साजिश नहीं थी। परीक्षा से कई महीने पहले ही कोचिंग संचालकों और बिचौलियों ने NTA के तीनों एक्सपर्ट्स से संपर्क किया था। बातचीत, मुलाकात और कथित पैसों के लेन-देन के जरिए पेपर लीक का नेटवर्क तैयार किया गया। इसके बाद लीक हुए सवालों को वॉट्सऐप, टेलीग्राम, PDF और तस्वीरों के माध्यम से छात्रों तक पहुंचाया गया। कुछ कोचिंग संस्थानों में छात्रों को हाथ से लिखे प्रश्नों के जरिए परीक्षा की तैयारी भी कराई गई। CBI के मुताबिक, डिजिटल सबूतों से बचने के लिए यह तरीका अपनाया गया था।

    इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और चैट से मिले सबूत
    CBI ने कहा है कि फोरेंसिक जांच, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, चैट रिकॉर्ड, बरामद दस्तावेजों और गवाहों के बयानों से पेपर लीक नेटवर्क की पुष्टि हुई। चार्जशीट में मनीषा संजय वाघमारे, धनंजय लोखंडे, शुभम मधुकर खैरनार और यश यादव को नेटवर्क की अहम कड़ी बताया गया है। जांच के दौरान एक आरोपी द्वारा कथित तौर पर लीक पेपर के बदले अपने 10वीं-12वीं के प्रमाणपत्र और ब्लैंक चेक सुरक्षा के तौर पर दिए जाने की बात भी सामने आई है।

    डॉक्टर और कोचिंग संचालक भी आरोपी
    CBI ने डॉ. अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी, पुणे के COO तेजस हर्षदकुमार शाह, रेणुकाई करियर सेंटर के मैनेजिंग पार्टनर शिवराज मोटेगांवकर और सिद्धिविनायक हॉस्पिटल के मालिक डॉ. मनोज भगवानराव शिरुरे को भी आरोपी बनाया है। जांच एजेंसी के अनुसार, NTA के बाहर से नेटवर्क संचालित करने और लीक पेपर छात्रों तक पहुंचाने में इनकी भूमिका थी। CBI ने पेपर लीक के पीछे अवैध कमाई और कुछ कोचिंग संस्थानों के परिणाम बेहतर दिखाने का उद्देश्य बताया है।

    13 आरोपियों के खाते और लॉकर फ्रीज
    CBI ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 समेत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है। एजेंसी ने 13 आरोपियों के बैंक खाते, बैंक लॉकर और एक डीमैट अकाउंट फ्रीज किया है। तीनों NTA एक्सपर्ट्स पर पेपर लीक, भ्रष्टाचार और लोक सेवक के तौर पर विश्वासघात समेत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। चार्जशीट में संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत दोष सिद्ध होने पर कड़ी सजा और जुर्माने का उल्लेख किया गया है।

    पेपर लीक के बाद दोबारा हुई थी परीक्षा
    NEET-UG 2026 परीक्षा 3 मई 2026 को आयोजित हुई थी। पेपर लीक के आरोपों के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई और 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई गई। इस पूरे विवाद ने परीक्षा व्यवस्था और पेपर सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

  • UP : अतीक के दोनों बेटे अबान के जनाजे में होंगे शामिल, हाईकोर्ट ने दी पैरोल, सड़क हादसे में हुई थी मौत

    UP : अतीक के दोनों बेटे अबान के जनाजे में होंगे शामिल, हाईकोर्ट ने दी पैरोल, सड़क हादसे में हुई थी मौत

    प्रयागराज। माफिया अतीक अहमद के छोटे बेटे अबान अहमद (21) को शुक्रवार को प्रयागराज के कसारी-मसारी स्थित खानदानी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। अबान की कब्र उसके पिता अतीक अहमद की कब्र के बगल में तैयार की गई है। कब्रिस्तान में करीब 7 फीट गहरी कब्र खोदी गई है और सुरक्षा के मद्देनजर 70 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।

    अबान के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जेल में बंद उसके दोनों बड़े भाइयों उमर और अली को इलाहाबाद हाईकोर्ट से पैरोल मिल गई है। शुक्रवार दोपहर करीब साढ़े तीन बजे अदालत ने दोनों को पैरोल देने का आदेश दिया। उमर लखनऊ जेल और अली झांसी जेल में बंद है। दोनों के प्रयागराज पहुंचने में करीब 6 से 7 घंटे लगने की संभावना है।

    अतीक के परिवार की कब्रों के पास दफन होगा अबान
    अबान का शव शुक्रवार तड़के करीब 4 बजे झांसी से प्रयागराज के हटवा गांव पहुंचा। उसे कसारी-मसारी स्थित परिवार के कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा। इसी कब्रिस्तान में अतीक अहमद, उसके पिता फिरोज अहमद, भाई अशरफ और बेटे असद की कब्रें भी मौजूद हैं।

    मां शाइस्ता के पहुंचने पर निगाहें
    अबान की मां शाइस्ता परवीन वर्ष 2023 से फरार है। वह अतीक अहमद और बेटे असद के जनाजे में भी शामिल नहीं हुई थीं। ऐसे में अबान के अंतिम संस्कार में शाइस्ता के पहुंचने को लेकर भी लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।

    अबान की मौत पर सवाल पूछे जाने पर नाराज हुए डिप्टी सीएम
    अबान की सड़क हादसे में मौत को लेकर जब पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से सवाल किया तो वह नाराज हो गए। उन्होंने कहा, “एक्सीडेंट रोज होते रहते हैं… ये कौन-सी बात है।”

    अली से मिलने जा रहा था अबान
    अबान गुरुवार सुबह अपने चार दोस्तों के साथ प्रयागराज से झांसी जा रहा था। उसका मकसद झांसी जेल में बंद अपने बड़े भाई अली अहमद से मुलाकात करना था। झांसी-कानपुर हाईवे पर अचानक एक जानवर सड़क पर आ गया। उसे बचाने के प्रयास में तेज रफ्तार कार अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकरा गई।

    हादसे में अबान और उसके दोस्त सोनू की मौत हो गई। हादसे के बाद अबान का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया था। पोस्टमार्टम के बाद शुक्रवार तड़के उसका शव परिजनों को सौंप दिया गया, जिसके बाद उसे प्रयागराज लाया गया।

  • जयंत चौधरी के करीबी रामाशीष राय ने छोड़ा आरएलडी प्रदेश अध्यक्ष पद, राजनीति में मूल्यों की कमी पर उठाए सवाल

    जयंत चौधरी के करीबी रामाशीष राय ने छोड़ा आरएलडी प्रदेश अध्यक्ष पद, राजनीति में मूल्यों की कमी पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राष्ट्रीय लोकदल यानी आरएलडी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी को भेजा है। राय के इस्तीफे के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरएलडी के संगठन और आगामी चुनावी रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

    रामाशीष राय को जयंत चौधरी के करीबी नेताओं में गिना जाता रहा है। प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने संगठन को मजबूत करने के लिए कई जिलों का दौरा किया और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश की। इस्तीफा देते हुए उन्होंने पार्टी के प्रति आभार जताया, लेकिन अपने पत्र में देश की राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों को लेकर कई गंभीर चिंताएं भी जाहिर कीं।

    राय ने कहा कि उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरी प्रतिबद्धता के साथ निभाने का प्रयास किया। उन्होंने संगठन के विस्तार और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए लगातार काम किया। हालांकि, अब उन्होंने अपने विचारों और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए पद छोड़ने का निर्णय लिया है। उनके इस फैसले को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आरएलडी के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    अपने इस्तीफे के दौरान रामाशीष राय ने राजनीति में मूल्यों के कमजोर होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि राजनीतिक व्यवस्था में विचारधारा और सिद्धांतों की जगह धीरे-धीरे दूसरी चीजों का प्रभाव बढ़ रहा है। उनके मुताबिक राजनीति में धन और परिवार का प्रभाव बढ़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है।

    राय ने सामाजिक परिस्थितियों को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जाति और समाज के नाम पर लोगों के बीच दूरी बढ़ रही है। उनका मानना है कि सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए राजनीतिक दलों को गंभीर प्रयास करने की जरूरत है। उनके बयान से साफ है कि इस्तीफे के पीछे केवल संगठनात्मक कारण ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर उनकी अपनी चिंताएं भी हैं।

    उन्होंने किसानों और युवाओं से जुड़े मुद्दों का भी जिक्र किया। राय के अनुसार किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलने की समस्या बनी हुई है, जबकि बड़ी संख्या में युवा रोजगार को लेकर परेशान हैं। उन्होंने इन मुद्दों को देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए लोकतंत्र को मजबूत करने और लोगों के बीच एकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और सभी राजनीतिक दल अभी से अपने संगठन को मजबूत करने की तैयारी में जुटे हैं। ऐसे समय में किसी प्रमुख क्षेत्रीय दल के प्रदेश अध्यक्ष का इस्तीफा संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। आरएलडी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रही है और किसान तथा ग्रामीण मुद्दे पार्टी की राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं।

    रामाशीष राय के इस्तीफे के बाद अब पार्टी के सामने प्रदेश संगठन के नेतृत्व को लेकर अगला फैसला करने की चुनौती होगी। यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके स्थान पर किस नेता को जिम्मेदारी दी जाती है और आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए आरएलडी अपनी संगठनात्मक रणनीति में क्या बदलाव करती है।

    जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली आरएलडी के लिए यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर समीकरण तेजी से आकार ले रहे हैं। राय के इस्तीफे के बाद पार्टी के भीतर और प्रदेश की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनी रहेगी। फिलहाल उनके फैसले ने चुनाव से पहले आरएलडी के संगठन और नेतृत्व को लेकर चर्चा जरूर तेज कर दी है।

  • पंजाब चुनाव 2027 से पहले क्या फिर साथ आएंगे बीजेपी और अकाली दल, सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात अहम

    पंजाब चुनाव 2027 से पहले क्या फिर साथ आएंगे बीजेपी और अकाली दल, सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात अहम

    नई दिल्ली । पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। संसद भवन में हुई इस बैठक के बाद पंजाब की राजनीति में बीजेपी और अकाली दल के बीच दोबारा गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, दोनों दलों ने अभी तक किसी नए गठबंधन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    सुखबीर बादल ने मुलाकात के बाद बताया कि प्रधानमंत्री के साथ पंजाब की कानून व्यवस्था और राज्य की सरकारी योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। बैठक का विस्तृत एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे में इस मुलाकात को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों और राज्य में बन रहे नए राजनीतिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    बीजेपी और अकाली दल का पंजाब में करीब ढाई दशक पुराना चुनावी गठबंधन रहा है। दोनों दल लंबे समय तक साथ चुनाव लड़ते रहे और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर एक-दूसरे को लाभ पहुंचाते रहे। अकाली दल का प्रभाव मुख्य रूप से ग्रामीण और किसान वर्ग में रहा, जबकि बीजेपी ने शहरी क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की।

    हालांकि, वर्ष 2020 में कृषि कानूनों के खिलाफ शुरू हुए किसान आंदोलन ने दोनों दलों के रिश्तों को बदल दिया। पंजाब में किसानों के व्यापक विरोध के बीच शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने का फैसला किया। इसके साथ ही बीजेपी और अकाली दल की करीब 25 वर्ष पुरानी राजनीतिक साझेदारी टूट गई।

    बाद में केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए, लेकिन दोनों दलों के बीच पुराना गठबंधन तुरंत बहाल नहीं हुआ। 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। दोनों दलों को इसके बाद राज्य में अपने राजनीतिक आधार को लेकर नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत महसूस हुई।

    अकाली दल फिलहाल अपने पारंपरिक जनाधार को वापस मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। बीजेपी भी पंजाब में अपने संगठन को विस्तार देने और स्वतंत्र राजनीतिक आधार तैयार करने में जुटी है। इसके बावजूद राज्य की जटिल सामाजिक और क्षेत्रीय राजनीति में दोनों दलों के पुराने तालमेल को पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

    पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। पुराने गठबंधन में बीजेपी सीमित सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जबकि अकाली दल अधिक सीटों पर मैदान में उतरता था। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन के तहत बीजेपी ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा और तीन सीटें जीती थीं। 2022 में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे और बीजेपी को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

    दोनों दलों के लिए गठबंधन की अपनी-अपनी राजनीतिक जरूरतें भी हैं। अकाली दल को ग्रामीण और पारंपरिक वोट आधार को मजबूत करने के साथ व्यापक राजनीतिक विकल्प खड़ा करना है। वहीं बीजेपी के सामने पंजाब में संगठनात्मक विस्तार के बावजूद अकेले दम पर सत्ता की दौड़ में मजबूत स्थिति बनाने की चुनौती है।

    पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ बीजेपी, कांग्रेस और अकाली दल अपने-अपने स्तर पर राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। ऐसे में यदि बीजेपी और अकाली दल के बीच किसी तरह का समझौता होता है तो इसका सीधा असर चुनावी मुकाबले और सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।

    फिलहाल सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात को गठबंधन की औपचारिक शुरुआत नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन चुनावी तैयारियों के बीच हुई इस बैठक ने इतना जरूर संकेत दिया है कि पंजाब में 2027 के चुनाव से पहले पुराने राजनीतिक रिश्तों और नए समीकरणों को लेकर संभावनाएं खुली हुई हैं।

  • लखनऊ में कार के अंदर मिला फाइनेंस कर्मी का शव, दुर्गंध आने पर लोगों को हुई जानकारी

    लखनऊ में कार के अंदर मिला फाइनेंस कर्मी का शव, दुर्गंध आने पर लोगों को हुई जानकारी


    लखनऊ।
    आशियाना थाना क्षेत्र में शुक्रवार को सड़क किनारे खड़ी एक कार से युवक का शव मिलने से हड़कंप मच गया। कार से दुर्गंध आने पर आसपास के लोगों को इसकी जानकारी हुई, जिसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

    मृतक की पहचान रायबरेली जिले के बरहा, थाना कोतवाली निवासी ज्ञानेंद्र सिंह (36) के रूप में हुई है। वह पिछले कुछ दिनों से लखनऊ के आशियाना स्थित बंगला बाजार इलाके में पत्नी प्रियंका और साढ़े तीन साल की बेटी के साथ रह रहे थे।

    निजी कंपनी में करते थे लोन फाइनेंस का काम
    परिजनों के मुताबिक, ज्ञानेंद्र सिंह निजी क्षेत्र में लोन फाइनेंस का काम करते थे। शुक्रवार को उनका शव सड़क किनारे खड़ी कार के अंदर मिला। कार से दुर्गंध आने के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी। जानकारी मिलते ही पुलिस टीम के साथ फोरेंसिक टीम भी मौके पर पहुंची और घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य जुटाए। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

    मौत की वजह जानने के लिए पोस्टमार्टम
    पुलिस के अनुसार, फिलहाल मौत के कारणों की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। प्रारंभिक जांच में पुलिस सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखकर मामले की पड़ताल कर रही है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और घटनास्थल से मिले साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

  • महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, वर्चुअल पेशी की मांग खारिज, सांसद होने पर अलग सुविधा देने से कोर्ट का इनकार

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़े आपराधिक मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने पुलिस के सामने वर्चुअल तरीके से पेश होने की उनकी मांग वाली याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सांसद होने के आधार पर किसी आरोपी को जांच एजेंसी के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ के सामने महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि एक फेसबुक पोस्ट के संबंध में महुआ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और पुलिस ने उन्हें उनके संसदीय क्षेत्र के संबंधित थाने में जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होने को कहा है। उनकी ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी गई थी।

    महुआ की ओर से अदालत में सुरक्षा संबंधी चिंता भी रखी गई। उनके वकील ने कहा कि पिछली बार जब वह पुलिस के सामने पेश हुई थीं, तब उनके खिलाफ प्रदर्शन और विरोध की स्थिति बनी थी। उनका दावा था कि अंडे फेंके जाने की आशंका के कारण उन्हें व्यक्तिगत रूप से थाने पहुंचने में खतरा महसूस हो रहा है। इसी आधार पर पुलिस के सामने वर्चुअल उपस्थिति की मांग की गई थी।

    इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। अदालत ने सवाल किया कि वर्चुअल पेशी की मांग क्या इसलिए की जा रही है क्योंकि महुआ मोइत्रा संसद सदस्य हैं। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि राजनीति में आने के बाद सार्वजनिक विरोध जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं केवल राजनीतिक पद के आधार पर स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि कलकत्ता हाई कोर्ट पहले ही महुआ मोइत्रा को जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने का निर्देश दे चुका है। अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्से का पालन करने की बात कही और स्पष्ट किया कि यदि वह जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं होती हैं, तो इसके परिणाम उन्हें हाई कोर्ट में भुगतने पड़ सकते हैं।

    आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज कर दी। इसका मतलब है कि उन्हें जांच प्रक्रिया में व्यक्तिगत रूप से शामिल होकर पुलिस के निर्देशों का पालन करना होगा। अदालत ने फिलहाल उनके लिए वर्चुअल पेशी की विशेष व्यवस्था को मंजूरी नहीं दी है।

    महुआ मोइत्रा के खिलाफ यह मामला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर किए गए दो वीडियो पोस्ट से जुड़ा है। एक बीजेपी नेता की शिकायत के बाद पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। यह विवाद उस समय और बढ़ा जब उनके संसदीय क्षेत्र कृष्णानगर में एक अदालत के बाहर उनके खिलाफ प्रदर्शन की स्थिति बनी और प्रदर्शनकारियों के पास अंडे और टमाटर होने की बात सामने आई।

    इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने पिछले महीने महुआ मोइत्रा की एफआईआर रद्द करने की मांग पर उन्हें अंतरिम सुरक्षा दी थी, लेकिन साथ ही जांच में सहयोग करने का निर्देश भी दिया था। हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक उन्हें 14 अगस्त को जांच अधिकारी के सामने पेश होना है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब जांच में उनकी व्यक्तिगत पेशी का रास्ता साफ हो गया है।