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  • पासपोर्ट नहीं है नागरिकता का प्रमाण, विदेश मंत्रालय ने दूर की बड़ी गलतफहमी; ई-पासपोर्ट और वैश्विक यात्रा सुविधाओं पर दिया अहम अपडेट

    पासपोर्ट नहीं है नागरिकता का प्रमाण, विदेश मंत्रालय ने दूर की बड़ी गलतफहमी; ई-पासपोर्ट और वैश्विक यात्रा सुविधाओं पर दिया अहम अपडेट

    नई दिल्ली । भारत में पासपोर्ट सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़ी व्यवस्थाओं में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। विदेश मंत्रालय ने हाल ही में पासपोर्ट, ई-पासपोर्ट, वैश्विक यात्रा सुविधाओं और भारतीय नागरिकों की विदेशों में बढ़ती आवाजाही को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट को नागरिकता के अंतिम प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह मुख्य रूप से एक आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जिसका उपयोग विदेश यात्रा और पहचान सत्यापन के लिए किया जाता है।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार देश में अब पासपोर्ट व्यवस्था तकनीकी रूप से अधिक उन्नत और सुरक्षित बन रही है। इसी दिशा में चिप-युक्त ई-पासपोर्ट प्रणाली को लागू किया गया है। पिछले वर्ष से जारी किए जा रहे नए पासपोर्टों में आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक चिप शामिल की जा रही है, जिसमें धारक की महत्वपूर्ण बायोमेट्रिक जानकारी सुरक्षित रूप से संग्रहीत रहती है। यह तकनीक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुरूप विकसित की गई है और इसका उद्देश्य पासपोर्ट से जुड़ी धोखाधड़ी, जालसाजी तथा पहचान संबंधी अपराधों को कम करना है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ई-पासपोर्ट प्रणाली भारतीय यात्रियों के लिए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को अधिक तेज और सुरक्षित बनाएगी। आधुनिक चिप आधारित तकनीक के कारण दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच तेजी से हो सकेगी, जिससे यात्रा अनुभव भी बेहतर होगा। इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर डिजिटल सुरक्षा मानकों के अनुरूप भारत की पासपोर्ट प्रणाली को मजबूत आधार मिलेगा।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि पिछले एक दशक में देश का पासपोर्ट सेवा नेटवर्क उल्लेखनीय रूप से विस्तारित हुआ है। वर्तमान में देशभर में सैकड़ों पासपोर्ट सेवा केंद्र संचालित हो रहे हैं और आने वाले समय में इनकी संख्या और बढ़ाई जाएगी। सरकार का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना है, जिससे नागरिकों को पासपोर्ट बनवाने के लिए लंबी दूरी तय न करनी पड़े और अधिकतम सेवाएं उनके निकट उपलब्ध हो सकें।

    दूरदराज और पिछड़े क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने के लिए विशेष अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इन अभियानों के माध्यम से लाखों लोगों को पासपोर्ट सेवाओं का लाभ मिला है। मंत्रालय का मानना है कि शिक्षा, रोजगार, व्यापार और पर्यटन के बढ़ते अवसरों के कारण आने वाले वर्षों में पासपोर्ट की मांग लगातार बढ़ेगी। इसके बावजूद वर्तमान समय में देश की कुल आबादी का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही पासपोर्ट धारक है, जो इस क्षेत्र में विस्तार की बड़ी संभावनाओं को दर्शाता है।

    विदेश यात्रा को आसान बनाने के लिए भारत ने कई देशों के साथ मोबिलिटी समझौते भी किए हैं। इन समझौतों का उद्देश्य छात्रों, शोधकर्ताओं, प्रशिक्षुओं, पेशेवरों और कारोबारियों के लिए अंतरराष्ट्रीय अवसरों को बढ़ाना है। ऐसे समझौतों के माध्यम से भारतीय नागरिकों को विदेशों में शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं। इससे वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रतिभा की पहुंच भी मजबूत हो रही है।

    सरकार के अनुसार भारतीय पासपोर्ट की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता में भी लगातार सुधार हो रहा है। कई देशों द्वारा भारतीय नागरिकों को वीजा-फ्री, वीजा ऑन अराइवल और ई-वीजा जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। इससे भारतीय यात्रियों के लिए विदेश यात्रा पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक और सरल बनती जा रही है।

    इसके साथ ही विदेशों में रोजगार के लिए जाने वाले भारतीय कामगारों की सुरक्षा और सुविधा को भी प्राथमिकता दी जा रही है। डिजिटल प्रवासन प्रणालियों को मजबूत करने, विदेश रवाना होने से पहले प्रशिक्षण देने और संकटग्रस्त भारतीयों के लिए सहायता तंत्र विकसित करने जैसे कदम उठाए गए हैं। विशेष रूप से महिला कामगारों और संवेदनशील परिस्थितियों में फंसे भारतीय नागरिकों के लिए सहायता सेवाओं का विस्तार किया गया है।

    विदेश मंत्रालय का कहना है कि आने वाले वर्षों में ई-पासपोर्ट, विस्तारित पासपोर्ट नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय मोबिलिटी सहयोग भारतीय नागरिकों के लिए वैश्विक अवसरों के नए द्वार खोलेंगे। सरकार का लक्ष्य पासपोर्ट सेवाओं को अधिक सुलभ, सुरक्षित और पारदर्शी बनाते हुए विदेश यात्रा, शिक्षा और रोजगार की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाना है।

  • इमरजेंसी की 51वीं बरसी पर प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा संदेश, बोले- संविधान पर हमला था वह दौर, नहीं भूल सकता देश लोकतंत्र का दर्द

    इमरजेंसी की 51वीं बरसी पर प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा संदेश, बोले- संविधान पर हमला था वह दौर, नहीं भूल सकता देश लोकतंत्र का दर्द

    नई दिल्ली । देश में लागू किए गए आपातकाल की 51वीं बरसी के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 1975 के उस दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया है। उन्होंने कहा कि आपातकाल केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार था। प्रधानमंत्री ने नागरिकों को उस कालखंड की याद दिलाते हुए लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि भारत का संविधान देश के प्रत्येक नागरिक की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और संस्थागत मजबूती में भी निहित होती है। उनके अनुसार आपातकाल के दौरान इन मूलभूत सिद्धांतों को गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ा था।

    प्रधानमंत्री ने उस दौर को याद करते हुए कहा कि देश के नागरिकों से उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई थी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि आपातकाल भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी नागरिक आसानी से नहीं भूल सकता। इस अवसर पर उन्होंने उन लोगों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में उन अनगिनत नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं के साहस का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद लोकतंत्र की आवाज को जीवित रखा। उन्होंने कहा कि उस समय अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। यही संघर्ष भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा का स्रोत बना।

    भारत के राजनीतिक इतिहास में 25 जून 1975 की तारीख को विशेष महत्व प्राप्त है। इसी दिन तत्कालीन सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल लागू किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत घोषित इस आपातकाल का आधार आंतरिक अशांति को बताया गया था। उस समय देश में व्यापक राजनीतिक गतिविधियां चल रही थीं और विभिन्न विपक्षी दल सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।

    आपातकाल लागू होने के बाद लगभग 21 महीनों तक देश ने असाधारण परिस्थितियों का सामना किया। इस अवधि में नागरिकों के कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए और मीडिया पर कड़ी सेंसरशिप लागू की गई। समाचार पत्रों और प्रकाशनों को सामग्री प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इसके अलावा अनेक विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को हिरासत में लिया गया था।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती संविधान के सम्मान और संस्थाओं की स्वतंत्रता में निहित होती है। उन्होंने भरोसा जताया कि देश आज पहले से अधिक जागरूक और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। उन्होंने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को भारत की प्रगति का आधार बताते हुए इन्हीं मूल्यों के अनुरूप विकसित राष्ट्र के निर्माण का संकल्प दोहराया।

    आपातकाल की 51वीं बरसी के अवसर पर दिया गया यह संदेश केवल इतिहास की एक घटना का स्मरण नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्ता को रेखांकित करने का प्रयास भी माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र संस्थाओं और संवैधानिक मर्यादाओं का संरक्षण हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता बना रहना चाहिए।

  • आपातकाल के 51 साल: भारत के लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर, जानें कैसे बदला था देश का राजनीतिक परिदृश्य

    आपातकाल के 51 साल: भारत के लोकतंत्र का सबसे विवादित दौर, जानें कैसे बदला था देश का राजनीतिक परिदृश्य

    नई दिल्ली। भारत में 25 जून 1975 की आधी रात से 21 मार्च 1977 तक लगभग 21 महीनों तक लागू रहा आपातकाल आज 51 साल पूरे कर चुका है। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी।

    यह दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित समय माना जाता है, जिसे लेकर आज भी राजनीतिक बहस जारी रहती है। आपातकाल के मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लगातार उठाया है, खासकर तब जब विपक्ष ने वर्तमान सरकार पर संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए।

    किन परिस्थितियों में लगा आपातकाल

    आपातकाल की पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाई कोर्ट का 1975 का फैसला माना जाता है। इस फैसले में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया गया था। 1971 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि चुनाव में अनियमित तरीके अपनाए गए थे।

    मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया, जिसके बाद देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन गई और अंततः आपातकाल की घोषणा की गई।

    आपातकाल के दौरान देश पर असर

    आपातकाल लागू होने के बाद देश में कई बड़े बदलाव देखने को मिले—
    – पूरे देश में चुनाव स्थगित कर दिए गए।
    – नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य अधिकार प्रभावित हुए।
    – 25 जून की रात से ही विपक्षी नेताओं की массов गिरफ्तारियां शुरू हो गईं, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जयप्रकाश नारायण जैसे नेता शामिल थे।
    – जेलों में कैदियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि स्थान की कमी हो गई।
    – प्रेस पर सख्त सेंसरशिप लागू की गई, जिसके तहत किसी भी खबर के प्रकाशन से पहले अनुमति अनिवार्य थी।
    – सरकार विरोधी खबरें प्रकाशित करने पर कार्रवाई और गिरफ्तारियों के मामले भी सामने आए।

    इस दौर में प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई तरह के आरोप और अनुभव भी सामने आए, जिन्हें बाद में व्यापक बहस का विषय बनाया गया।

    आपातकाल से जुड़े दावे और चर्चाएं

    पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे आरके धवन के एक साक्षात्कार में आपातकाल से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा की गई। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.एस. राय ने जनवरी 1975 में ही आपातकाल लागू करने की सलाह दी थी।

    यह भी दावा किया गया कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की सिफारिश को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी और तुरंत सहमति दे दी थी।

    कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि उस समय इंदिरा गांधी को अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी, जबकि बाद में 1977 के चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

    आपातकाल का राजनीतिक प्रभाव

    आपातकाल भारतीय राजनीति में एक ऐसा अध्याय बन गया, जिसे कई दल लोकतंत्र पर बड़ा संकट मानते हैं। यह दौर आज भी राजनीतिक चर्चाओं और बहसों में एक प्रमुख संदर्भ के रूप में देखा जाता है, खासकर लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक स्वतंत्रता के मुद्दों पर।
  • शादी बरकरार लेकिन साथ रहना जरूरी नहीं ,पति पत्नी के अधिकारों पर क्या कहता है कानून

    शादी बरकरार लेकिन साथ रहना जरूरी नहीं ,पति पत्नी के अधिकारों पर क्या कहता है कानून


    नई दिल्ली। भारतीय समाज में विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं बल्कि एक पवित्र और आजीवन संबंध माना जाता है। हालांकि बदलते समय के साथ वैवाहिक रिश्तों में तनाव और विवाद के मामले भी बढ़े हैं। कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं जब पति और पत्नी एक साथ रहना नहीं चाहते लेकिन तलाक भी नहीं लेते। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कोई पत्नी बिना तलाक लिए अपने पति से अलग रह सकती है और इस स्थिति में उसके अधिकार क्या होते हैं।

    भारतीय कानून के अनुसार विवाह और साथ रहना दो अलग विषय हैं। किसी पति या पत्नी का अलग रहना अपने आप में विवाह समाप्त होने का प्रमाण नहीं माना जाता। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत विवाह तब तक वैध माना जाता है जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा तलाक की डिक्री जारी नहीं की जाती। इसका अर्थ यह है कि पत्नी बिना तलाक लिए भी कुछ परिस्थितियों में पति से अलग रह सकती है और उसका वैवाहिक दर्जा बना रहता है।

    कानून उन महिलाओं को विशेष संरक्षण देता है जो घरेलू हिंसा शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना आर्थिक शोषण या किसी प्रकार के असुरक्षित माहौल का सामना कर रही हों। यदि पत्नी की सुरक्षा सम्मान या स्वास्थ्य को खतरा हो तो वह पति से अलग रहने का फैसला कर सकती है। अदालतें ऐसे मामलों को गंभीरता से देखती हैं और महिलाओं को आवश्यक कानूनी सहायता उपलब्ध कराती हैं।

    कई बार पति द्वारा परित्याग या लगातार उत्पीड़न की स्थिति भी अलग रहने का आधार बनती है। यदि पति दूसरी शादी करने की कोशिश करता है या वैवाहिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता तब भी पत्नी कानूनी राहत मांग सकती है। हालांकि प्रत्येक मामले में अदालत तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेती है।

    अलग रहने के बावजूद पत्नी के कई महत्वपूर्ण अधिकार बने रहते हैं। सबसे प्रमुख अधिकार भरण पोषण का है। यदि पत्नी स्वयं अपना गुजारा करने में सक्षम नहीं है तो वह पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार हो सकती है। इसके अलावा पति की संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े अधिकार भी सामान्य रूप से बने रहते हैं क्योंकि विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं हुआ होता।

    ऐसी स्थिति में न्यायिक पृथक्करण का विकल्प भी उपलब्ध है। इसमें पति पत्नी अदालत की अनुमति से अलग रह सकते हैं लेकिन विवाह कायम रहता है। यदि भविष्य में सुलह की संभावना समाप्त हो जाए तो यही स्थिति बाद में तलाक का आधार भी बन सकती है। दूसरी ओर कानून पति के अधिकारों की भी रक्षा करता है।

    यदि पत्नी बिना किसी उचित कारण के पति से अलग रह रही है तो पति अदालत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दाखिल कर सकता है। अदालत तथ्यों की जांच के बाद उचित आदेश दे सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना तलाक के पति या पत्नी में से कोई भी दूसरी शादी नहीं कर सकता। ऐसा करना कानूनन अपराध माना जाता है और इसके लिए सजा का प्रावधान है।

    स्पष्ट है कि भारतीय कानून विवाह संस्था को महत्व देने के साथ साथ पति और पत्नी दोनों के अधिकारों की रक्षा भी करता है। इसलिए बिना तलाक लिए अलग रहना कई परिस्थितियों में पूरी तरह वैध हो सकता है लेकिन इसके लिए कानूनी आधार और उचित कारण होना आवश्यक है।

  • ममता बनर्जी के नेतृत्व को खुली चुनौती, सांसदों-विधायकों के समर्थन के दावे के बीच TMC पर नियंत्रण की जंग पहुंची निर्णायक मोड़ पर

    ममता बनर्जी के नेतृत्व को खुली चुनौती, सांसदों-विधायकों के समर्थन के दावे के बीच TMC पर नियंत्रण की जंग पहुंची निर्णायक मोड़ पर

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सियासत में लंबे समय से प्रभावशाली रही तृणमूल कांग्रेस इस समय गंभीर संगठनात्मक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के भीतर नेतृत्व और नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां संगठन, राजनीतिक वैधता और चुनाव चिन्ह पर अधिकार की लड़ाई चुनाव आयोग के समक्ष पहुंच चुकी है। इस टकराव ने राज्य की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

    पार्टी के भीतर उभरे इस विवाद के चलते तृणमूल कांग्रेस दो स्पष्ट खेमों में बंटती दिखाई दे रही है। एक ओर पार्टी की संस्थापक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गुट है, जबकि दूसरी ओर बागी नेताओं का समूह संगठन पर पूर्ण नियंत्रण का दावा कर रहा है। स्थिति ऐसी बन गई है कि दोनों पक्षों ने अलग-अलग राष्ट्रीय कार्यसमितियां गठित कर स्वयं को पार्टी का वैध नेतृत्व साबित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने हाल ही में अपनी नई संगठनात्मक संरचना के दस्तावेज चुनाव आयोग को सौंपे हैं। इसमें ममता बनर्जी को पुनः राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने के साथ अन्य प्रमुख पदाधिकारियों की नियुक्ति का भी उल्लेख किया गया है। इस कदम का उद्देश्य संगठनात्मक निरंतरता और वैधता को स्थापित करना माना जा रहा है।

    इसके समानांतर बागी गुट ने भी अपनी अलग बैठक आयोजित कर नई कार्यसमिति का गठन किया और चुनाव आयोग के समक्ष अपना दावा पेश किया। इस गुट ने वरिष्ठ नेता अरूप रॉय को राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करते हुए यह संकेत दिया है कि वह केवल विरोध तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि पूरी पार्टी की कमान अपने हाथ में लेने की रणनीति पर काम कर रहा है।

    राजनीतिक समीकरण उस समय और अधिक बदल गए जब लोकसभा में पार्टी के कई सांसदों के समर्थन को लेकर बड़े दावे सामने आए। बागी खेमे का कहना है कि उसे संसद में पर्याप्त समर्थन प्राप्त है, जिससे उसके दावे को मजबूती मिलती है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन का दावा किया जा रहा है। यदि यह समर्थन औपचारिक रूप से साबित हो जाता है तो संगठनात्मक और विधायी दोनों स्तरों पर बागी गुट की स्थिति मजबूत हो सकती है।

    इस पूरे विवाद में अब सबसे महत्वपूर्ण भूमिका चुनाव आयोग की मानी जा रही है। किसी भी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में विभाजन की स्थिति में आयोग ‘इलेक्शन सिंबल्स ऑर्डर, 1968’ के तहत मामले की सुनवाई करता है। आयोग आमतौर पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के समर्थन, संगठनात्मक ढांचे में बहुमत और जमीनी स्तर पर पार्टी संरचना के समर्थन जैसे पहलुओं का परीक्षण करता है। इन्हीं आधारों पर यह तय किया जाता है कि मूल पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला महाराष्ट्र में हुए शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन से काफी हद तक मिलता-जुलता दिखाई देता है। वहां भी संगठन और विधायी समर्थन के आधार पर चुनाव आयोग ने महत्वपूर्ण निर्णय दिए थे। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस का यह विवाद भी भविष्य में एक अहम राजनीतिक और कानूनी मिसाल बन सकता है।

    फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति की नजरें चुनाव आयोग की आगामी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आयोग का फैसला न केवल पार्टी के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की पहचान, नेतृत्व और राजनीतिक दिशा किसके हाथों में रहेगी। इससे राज्य की सत्ता और विपक्ष की रणनीतियों पर भी दूरगामी असर पड़ने की संभावना है।

  • कोलकाता में निर्माणाधीन गोदाम की छत भरभराकर गिरी, 5 मजदूरों की मौत; 50 से अधिक लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका

    कोलकाता में निर्माणाधीन गोदाम की छत भरभराकर गिरी, 5 मजदूरों की मौत; 50 से अधिक लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के तारातला क्षेत्र में बुधवार को एक बड़ा औद्योगिक हादसा सामने आया, जब निर्माणाधीन गोदाम की छत अचानक ढह गई। इस दुर्घटना में कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि बड़ी संख्या में मजदूरों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हादसे के समय निर्माण कार्य जारी था और कई श्रमिक गोदाम के भीतर काम कर रहे थे। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

    हादसा तारातला स्थित ट्रांसपोर्ट डिपो रोड पर ब्रेस ब्रिज के समीप हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दोपहर के समय अचानक तेज आवाज के साथ निर्माणाधीन ढांचे का एक बड़ा हिस्सा धराशायी हो गया। छत गिरते ही वहां मौजूद मजदूरों को संभलने का मौका नहीं मिला और कई लोग मलबे के नीचे दब गए। हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और आपातकालीन सेवाओं की टीमें तत्काल मौके पर पहुंच गईं।

    पुलिस अधिकारियों ने बताया कि दुर्घटना के बाद राहत और बचाव अभियान युद्धस्तर पर शुरू किया गया। शुरुआती चरण में कई लोगों को मलबे से बाहर निकालने में सफलता मिली, जबकि बड़ी संख्या में श्रमिकों के अभी भी फंसे होने की आशंका बनी हुई है। प्रशासन का कहना है कि मलबे के नीचे दबे लोगों की सही संख्या का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सेना को भी राहत कार्य में शामिल किया गया है। सेना के जवानों ने स्थानीय प्रशासन और अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर बचाव अभियान की कमान संभाली है। इसके अलावा राष्ट्रीय आपदा मोचन बल, अग्निशमन विभाग, नागरिक सुरक्षा इकाइयों और पुलिस की विशेष टीमें लगातार मलबा हटाने के काम में जुटी हुई हैं। भारी लोहे के ढांचे और बीम हटाने के लिए क्रेन तथा अन्य मशीनों का उपयोग किया जा रहा है।

    अधिकारियों का कहना है कि राहत कार्य चुनौतीपूर्ण बना हुआ है क्योंकि ढहे हुए हिस्से में बड़ी मात्रा में लोहे और निर्माण सामग्री का मलबा फैला हुआ है। ऐसे में फंसे हुए लोगों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचने के लिए सावधानी बरती जा रही है। कई घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहां उनका उपचार जारी है।

    स्थानीय लोगों ने भी शुरुआती घंटों में बचाव कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हादसे के तुरंत बाद आसपास मौजूद लोगों ने मलबे में दबे श्रमिकों को निकालने का प्रयास किया और राहत एजेंसियों के पहुंचने तक प्राथमिक सहायता उपलब्ध कराई। घटना के बाद इलाके में लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई, जिसे नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया।

    प्रशासन ने दुर्घटना के कारणों की जांच के आदेश दे दिए हैं। प्रारंभिक स्तर पर यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि निर्माणाधीन संरचना की छत अचानक क्यों गिरी और क्या निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जा रहा था। तकनीकी विशेषज्ञों की टीम भी घटनास्थल का निरीक्षण कर रही है।

    फिलहाल बचाव अभियान सबसे बड़ी प्राथमिकता बना हुआ है। अधिकारियों का मानना है कि मलबे के नीचे अब भी कई लोग फंसे हो सकते हैं, इसलिए राहत कार्य देर रात तक जारी रह सकता है। इस हादसे ने निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों और निगरानी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि दुर्घटना के सभी पहलुओं की विस्तृत जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

  • भारतीय नौसेना में अफसर बनने का सुनहरा अवसर, पायलट समेत 275 पदों पर भर्ती, 25 जून से शुरू होंगे आवेदन

    भारतीय नौसेना में अफसर बनने का सुनहरा अवसर, पायलट समेत 275 पदों पर भर्ती, 25 जून से शुरू होंगे आवेदन


    नई दिल्ली ।
    भारतीय नौसेना में अधिकारी बनने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर सामने आया है। नौसेना ने शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के तहत विभिन्न शाखाओं में कुल 275 पदों पर भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की है। यह भर्ती इंडियन नेवल एकेडमी, एझिमाला में जून 2027 से शुरू होने वाले कोर्स के लिए की जा रही है। इसके तहत योग्य अविवाहित पुरुष और महिला उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। भर्ती अभियान का उद्देश्य नौसेना की विभिन्न तकनीकी और गैर-तकनीकी शाखाओं में योग्य अधिकारियों की नियुक्ति करना है।

    नौसेना द्वारा जारी रिक्तियों में एक्जीक्यूटिव ब्रांच, पायलट, नेवल एयर ऑपरेशन्स ऑफिसर, एयर ट्रैफिक कंट्रोलर, लॉजिस्टिक्स, नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टोरेट कैडर, एजुकेशन, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल और नेवल कंस्ट्रक्टर जैसी महत्वपूर्ण शाखाएं शामिल हैं। सबसे अधिक पद एक्जीक्यूटिव ब्रांच के लिए निर्धारित किए गए हैं, जबकि पायलट, एयर ऑपरेशन्स और तकनीकी शाखाओं में भी बड़ी संख्या में रिक्तियां उपलब्ध हैं। इससे इंजीनियरिंग, विज्ञान, प्रबंधन और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं को नौसेना में शामिल होने का अवसर मिलेगा।

    भर्ती प्रक्रिया के लिए ऑनलाइन आवेदन 25 जून से शुरू होंगे। इच्छुक अभ्यर्थी निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा करने के बाद ऑनलाइन माध्यम से आवेदन कर सकेंगे। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि 27 जुलाई निर्धारित की गई है। उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे अंतिम तिथि का इंतजार किए बिना समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें ताकि तकनीकी समस्याओं से बचा जा सके।

    शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो विभिन्न पदों के लिए अलग-अलग योग्यता निर्धारित की गई है। अभ्यर्थियों के पास संबंधित विषयों में प्रथम श्रेणी के साथ बीई, बीटेक, एमई, एमटेक, एमएससी, एमए, एमबीए, बीकॉम, बीएससी, एमसीए या अन्य निर्धारित डिग्रियां होना आवश्यक है। कुछ पदों के लिए फाइनेंस, लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन मैनेजमेंट और मटीरियल मैनेजमेंट जैसे विषयों में विशेषज्ञता या स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी अनिवार्य रखा गया है। पात्रता से संबंधित विस्तृत जानकारी उम्मीदवारों को आधिकारिक अधिसूचना में उपलब्ध कराई गई है।

    चयन प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होगी। सबसे पहले उम्मीदवारों के आवेदन और शैक्षणिक योग्यता के आधार पर शॉर्टलिस्टिंग की जाएगी। इसके बाद चयनित अभ्यर्थियों को सर्विस सेलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। एसएसबी प्रक्रिया में सफल होने वाले उम्मीदवारों को मेडिकल परीक्षण से गुजरना होगा। अंतिम मेरिट सूची प्रदर्शन और पात्रता के आधार पर तैयार की जाएगी। चयनित उम्मीदवारों को प्रशिक्षण के लिए इंडियन नेवल एकेडमी भेजा जाएगा।

    नौसेना में चयनित अधिकारियों को आकर्षक वेतन और भत्तों का लाभ मिलेगा। प्रशिक्षण और नियुक्ति के बाद सब-लेफ्टिनेंट के पद पर शुरुआती ग्रॉस सैलरी लगभग 1.20 लाख रुपये प्रतिमाह तक हो सकती है। इसके अलावा पायलट, नेवल एयर ऑपरेशन्स ऑफिसर और सबमरीन से जुड़े पदों पर नियुक्त अधिकारियों को विशेष भत्ते भी प्रदान किए जाएंगे। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद पात्र अधिकारियों को अतिरिक्त अलाउंस के रूप में 31,250 रुपये तक का लाभ मिल सकेगा।

    रक्षा क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए यह भर्ती अभियान एक बड़ा अवसर माना जा रहा है। नौसेना में सेवा न केवल प्रतिष्ठा और सम्मान प्रदान करती है, बल्कि आधुनिक तकनीक, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियों के साथ एक मजबूत करियर भी उपलब्ध कराती है। ऐसे में पात्र अभ्यर्थियों के लिए यह भर्ती अभियान भविष्य को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।

  • एयरफोर्स जॉइन करने का मौका: MTS पदों के लिए आवेदन 27 जून से, जानें योग्यता और प्रक्रिया

    एयरफोर्स जॉइन करने का मौका: MTS पदों के लिए आवेदन 27 जून से, जानें योग्यता और प्रक्रिया


    नई दिल्ली ।भारतीय वायुसेना में सेवा देने का सपना देख रहे युवाओं के लिए शानदार अवसर सामने आया है। भारतीय वायु सेना ने मल्टी टास्किंग स्टाफ (एमटीएस) के पदों पर भर्ती के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इस भर्ती अभियान के तहत कुल 6 रिक्त पदों को भरा जाएगा। इनमें 3 पद अनारक्षित वर्ग के लिए, 2 पद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और 1 पद आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के उम्मीदवारों के लिए निर्धारित किया गया है।

    इस भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया 27 जून 2026 से शुरू होगी। इच्छुक और पात्र उम्मीदवारों को ऑफलाइन माध्यम से आवेदन करना होगा। आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि विज्ञापन प्रकाशित होने की तारीख से 30 दिन निर्धारित की गई है। ऐसे में अभ्यर्थियों को सलाह दी गई है कि वे समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूरी कर लें ताकि अंतिम समय की किसी परेशानी से बचा जा सके।

    शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उम्मीदवार का किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय से मैट्रिक यानी 10वीं पास होना अनिवार्य है। इसके अलावा जिन उम्मीदवारों के पास वॉचमैन, लस्कर, गेस्टेटनर ऑपरेटर या माली के रूप में किसी संस्था में कम से कम एक वर्ष का कार्य अनुभव होगा, उन्हें चयन प्रक्रिया में प्राथमिकता दी जा सकती है।

    आयु सीमा के अनुसार आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और अधिकतम उम्र 25 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना आवेदन की अंतिम तिथि के आधार पर की जाएगी। आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को केंद्र सरकार के नियमों के अनुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा।

    चयन प्रक्रिया कई चरणों में पूरी की जाएगी। सबसे पहले प्राप्त आवेदन पत्रों की जांच की जाएगी। इसके बाद पात्र उम्मीदवारों को लिखित परीक्षा के लिए बुलाया जाएगा। लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन किया जाएगा और अंत में अंतिम मेरिट सूची जारी की जाएगी। चयनित उम्मीदवारों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार पे मैट्रिक्स लेवल-1 का वेतनमान प्रदान किया जाएगा, साथ ही अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ भी मिलेगा।

    आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को भारतीय वायुसेना की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संबंधित भर्ती का नोटिफिकेशन डाउनलोड करना होगा। नोटिफिकेशन में दिए गए आवेदन पत्र का प्रिंट निकालकर उसमें मांगी गई सभी जानकारी सावधानीपूर्वक भरनी होगी। इसके बाद आवश्यक दस्तावेजों की प्रतियां आवेदन पत्र के साथ संलग्न करनी होंगी।

    पूरी तरह भरे हुए आवेदन पत्र को एक लिफाफे में रखकर निर्धारित पते पर डाक के माध्यम से भेजना होगा। आवेदन भेजने का पता है – कमांडेंट, आईएएम, आईएएफ विमानपुरा पीओ, बैंगलोर-560017।

    सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे 10वीं पास युवाओं के लिए यह भर्ती एक बेहतरीन अवसर है। कम शैक्षणिक योग्यता के साथ प्रतिष्ठित भारतीय वायुसेना में नौकरी पाने का यह सुनहरा मौका है, इसलिए योग्य उम्मीदवार समय सीमा के भीतर आवेदन करना न भूलें।

  • युवा के पत्र का पीएम मोदी ने दिया जवाब, राष्ट्रहित और ऊर्जा संरक्षण पर विचारों की सराहना; आशुतोष यादव ने जताया गौरव और आभार

    युवा के पत्र का पीएम मोदी ने दिया जवाब, राष्ट्रहित और ऊर्जा संरक्षण पर विचारों की सराहना; आशुतोष यादव ने जताया गौरव और आभार

    नई दिल्ली । लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक और देश के सर्वोच्च नेतृत्व के बीच संवाद का एक प्रेरक उदाहरण उस समय सामने आया जब कानपुर के प्रतियोगी छात्र आशुतोष यादव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से व्यक्तिगत पत्र प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में आशुतोष द्वारा व्यक्त किए गए विचारों और राष्ट्रहित से जुड़े उनके दृष्टिकोण की सराहना करते हुए उन्हें देश के जागरूक युवाओं का प्रतिनिधि बताया। पत्र मिलने के बाद आशुतोष ने इसे अपने जीवन का गौरवपूर्ण क्षण बताते हुए प्रधानमंत्री के प्रति आभार व्यक्त किया है।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि देशवासियों से मिलने वाले आत्मीय और सकारात्मक विचार उन्हें राष्ट्रहित में लगातार कार्य करने की नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। उन्होंने आशुतोष और उनके परिवार द्वारा व्यक्त भावनाओं की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे संदेश लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाते हैं। प्रधानमंत्री ने ऊर्जा संरक्षण के विषय को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में ऊर्जा सुरक्षा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

    पत्र में प्रधानमंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि देशभर में ऊर्जा संरक्षण को लेकर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ रही है और विभिन्न स्तरों पर सकारात्मक प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने और ऊर्जा बचत को जनभागीदारी से जुड़े अभियान का रूप देने के लिए निरंतर काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने आशुतोष और उनके परिवार द्वारा आवश्यक संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग के संकल्प को सराहनीय बताया।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में युवाओं की भूमिका को भी विशेष महत्व दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और वैश्विक विषयों के प्रति जागरूकता, सकारात्मक सोच और समस्याओं के समाधान के प्रति सक्रिय दृष्टिकोण देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उनके अनुसार आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के निर्माण में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है और यही वर्ग भविष्य की दिशा तय करेगा।

    प्रधानमंत्री का पत्र मिलने के बाद आशुतोष यादव ने खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनके लिए बेहद सम्मानजनक और प्रेरणादायक क्षण है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि एक सामान्य नागरिक भी अपनी बात देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचा सकता है और उसे गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने प्रधानमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि उनके पत्र का उत्तर मिलना स्वयं में एक बड़ी उपलब्धि है।

    आशुतोष ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी चिंता और सुझाव साझा किए थे। उनका मानना है कि देश के नागरिकों को राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखने और रचनात्मक सुझाव देने चाहिए, क्योंकि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और अधिक मजबूत होती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा उनके विचारों को महत्व दिया जाना युवाओं के लिए भी एक सकारात्मक संदेश है।

    आशुतोष ने पिछले कुछ वर्षों में देश में हुए विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल तकनीक के विस्तार ने आम नागरिकों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया है। उन्होंने डिजिटल भुगतान व्यवस्था, सड़क और एक्सप्रेसवे नेटवर्क के विस्तार तथा आधारभूत ढांचे के विकास को महत्वपूर्ण उपलब्धियां बताया। उनके अनुसार तकनीक और आधुनिक सुविधाओं के विस्तार ने देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति को नई गति प्रदान की है।

    उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्रीय अभियान या सरकारी योजना की सफलता में जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब नागरिक स्वयं किसी उद्देश्य से जुड़ते हैं, तब उसके परिणाम अधिक प्रभावी होते हैं। आशुतोष का मानना है कि युवाओं में नई सोच, ऊर्जा और नेतृत्व क्षमता होती है, जो देश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। प्रधानमंत्री द्वारा युवाओं पर व्यक्त किया गया विश्वास देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

  • म्यूल हंट 1.0 बना साइबर ठगों का काल, गुजरात पुलिस ने करोड़ों की ठगी का नेटवर्क तोड़ा

    म्यूल हंट 1.0 बना साइबर ठगों का काल, गुजरात पुलिस ने करोड़ों की ठगी का नेटवर्क तोड़ा


    नई दिल्ली । साइबर अपराध के बढ़ते खतरे के बीच गुजरात पुलिस ने एक ऐसा अभियान चलाया है जिसने ऑनलाइन ठगी के बड़े नेटवर्क की जड़ें हिला दी हैं। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में संचालित ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 ने साइबर अपराधियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए हजारों करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया है। इस अभियान को राज्य में साइबर अपराध के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी और प्रभावी कार्रवाई माना जा रहा है।

    डिजिटल युग में साइबर ठग नए-नए तरीकों से लोगों की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे हैं। फर्जी कॉल्स, ऑनलाइन निवेश के झांसे, बैंकिंग फ्रॉड और डिजिटल अरेस्ट जैसे हथकंडों के जरिए अपराधी लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में गुजरात पुलिस ने तकनीक और डेटा इंटेलिजेंस का सहारा लेते हुए साइबर अपराधियों के पूरे नेटवर्क को निशाने पर लिया।

    ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 के तहत गुजरात पुलिस ने इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर, नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल, समन्वय पोर्टल और 1930 हेल्पलाइन से प्राप्त आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया। इस डेटा के आधार पर ऐसे म्यूल अकाउंट्स और उनसे जुड़े लोगों की पहचान की गई जो साइबर अपराध से अर्जित धन को निकालने और आगे पहुंचाने का काम कर रहे थे।

    अभियान के दौरान राज्यभर में 565 एफआईआर दर्ज की गईं और 638 साइबर अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा 913 म्यूल अकाउंट्स पर कार्रवाई की गई तथा कुल 4,052 साइबर अपराधों की पहचान की गई जिनमें 491 मामले गुजरात से जुड़े पाए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस अभियान में 2,289 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड का खुलासा हुआ।

    गुजरात पुलिस ने इस अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक और इंडियन डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रिस्क स्कोरिंग सिस्टम का भी उपयोग किया। इस तकनीक की मदद से संदिग्ध खातों की पहचान पहले से अधिक सटीक तरीके से की जा रही है ताकि साइबर अपराधियों तक तेजी से पहुंचा जा सके।

    साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस गांधीनगर के एसपी राजदीप सिंह झाला ने बताया कि पुलिस ने ऐसे खातों को चिह्नित किया जो सीधे साइबर ठगी की रकम प्राप्त करते थे और बाद में एटीएम या चेक के माध्यम से पैसे निकालते थे। विस्तृत डेटाबेस तैयार कर इन खातों और उनसे जुड़े नेटवर्क पर एक साथ कार्रवाई की गई जिससे साइबर अपराध के बड़े गिरोहों का खुलासा हुआ।

    साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि आम लोगों की सतर्कता भी इस लड़ाई में बेहद महत्वपूर्ण है। किसी भी संदिग्ध कॉल, मैसेज या ऑनलाइन ऑफर पर भरोसा करने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। यदि कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई दे तो तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती और ऐसे नाम पर आने वाले कॉल पूरी तरह फर्जी होते हैं।

    ऑपरेशन म्यूल हंट 1.0 की सफलता के बाद गुजरात सरकार ने साइबर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को और तेज करते हुए 2 जून 2026 से ऑपरेशन म्यूल हंट 2.0 भी शुरू कर दिया है। इसका उद्देश्य साइबर ठगी के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त करना और डिजिटल दुनिया को आम नागरिकों के लिए अधिक सुरक्षित बनाना है।