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  • साबरमती रिवरफ्रंट सफाई अभियान: स्वच्छता अभियान में उतरी जनता, मंत्री ऋषिकेश पटेल ने की अपील

    साबरमती रिवरफ्रंट सफाई अभियान: स्वच्छता अभियान में उतरी जनता, मंत्री ऋषिकेश पटेल ने की अपील

    नई दिल्ली । अहमदाबाद में मंगलवार को साबरमती नदी किनारे गांधी आश्रम के पास ‘स्वच्छ साबरमती महाअभियान’ के तहत बड़े स्तर पर सफाई अभियान चलाया गया। इस अभियान की शुरुआत राज्य सरकार की ओर से की गई, जिसमें गुजरात सरकार के कैबिनेट मंत्री ऋषिकेश पटेल के साथ-साथ कई जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल नदी किनारे की सफाई करना था, बल्कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश देना भी था।

    इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि स्वच्छता केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है, इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि सफाई को आदत में शामिल करें और अपने आसपास के क्षेत्रों को साफ-सुथरा रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सरकार कूड़ा प्रबंधन और शहरी सफाई व्यवस्था को मजबूत करने पर लगातार काम कर रही है, लेकिन जब तक नागरिक स्वयं आगे नहीं आएंगे, तब तक स्वच्छता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता।

    कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और साबरमती रिवरफ्रंट के आसपास के क्षेत्र में सामूहिक सफाई की गई। इस दौरान अधिकारियों और स्वयंसेवकों ने मिलकर कचरा हटाया और नदी किनारे के हिस्सों को साफ किया। अभियान के दौरान उपस्थित लोगों को स्वच्छता की शपथ भी दिलाई गई, जिसमें उन्होंने अपने आसपास साफ-सफाई बनाए रखने और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया।

    मंत्री ऋषिकेश पटेल ने कहा कि यह अभियान केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि इसे निरंतर जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान ने देशभर में स्वच्छता को लेकर एक नई सोच विकसित की है, और अब इसे और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी नागरिकों की भी है। उन्होंने यह भी कहा कि जब समाज का हर वर्ग इस अभियान से जुड़ेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।

    इस कार्यक्रम में मंत्री दर्शना वाघेला, स्थानीय विधायक, नगर निगम के अधिकारी, पुलिसकर्मी और कई सामाजिक संगठन भी शामिल हुए। सभी ने मिलकर इस पहल को सफल बनाने में योगदान दिया और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया। कार्यक्रम के दौरान रिवरफ्रंट पर विशेष सफाई व्यवस्था की गई और आसपास के इलाकों में भी स्वच्छता अभियान चलाया गया।

    इस पूरे आयोजन को सरकार की ओर से एक बड़े जन आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता को स्थायी रूप से मजबूत करना है। अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अभियानों से न केवल वातावरण साफ रहता है, बल्कि लोगों में जिम्मेदारी और अनुशासन की भावना भी विकसित होती है।

    अंत में यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया कि स्वच्छता केवल प्रशासन का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। ऐसे अभियानों से समाज में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद बढ़ती है और आने वाले समय में अहमदाबाद जैसे शहरों को और अधिक स्वच्छ, सुंदर और व्यवस्थित बनाने में मदद मिलेगी।

  • अयोध्या साधु-संत बोले—गाय माता है, राष्ट्रीय पशु बहस पर सीएम योगी के बयान का किया समर्थन

    अयोध्या साधु-संत बोले—गाय माता है, राष्ट्रीय पशु बहस पर सीएम योगी के बयान का किया समर्थन

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर दिए गए बयान के बाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर अयोध्या के कई प्रमुख साधु-संतों ने मुख्यमंत्री के रुख का समर्थन किया है और गाय को केवल पशु नहीं बल्कि ‘गौमाता’ बताते हुए इसे भारतीय संस्कृति और आस्था का अभिन्न हिस्सा बताया है। संतों का कहना है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग परंपरागत धार्मिक भावनाओं के विपरीत है और इससे समाज में अनावश्यक विवाद पैदा होता है।

    सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा था कि गाय हिंदू समाज के लिए केवल एक पशु नहीं बल्कि माता के समान है और माता-पुत्र के संबंध को किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती। उनके इस बयान के बाद अयोध्या में धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आई, जिसमें कई संतों ने इसे सनातन परंपरा के अनुरूप बताया। साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास महाराज ने कहा कि गाय को विश्व माता का दर्जा प्राप्त है और उसमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को गलत मानसिकता से प्रेरित बताया।

    तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंसाचार्य ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गाय को लेकर सनातन परंपरा में स्पष्ट सम्मान का भाव है और इसे किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है और इसे समझने के लिए सनातन परंपराओं का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में इस तरह के विषयों पर अनावश्यक विवाद पैदा करना उचित नहीं है और इससे सांस्कृतिक असंतुलन उत्पन्न होता है।

    हनुमानगढ़ी के महंत डॉ. देवेशाचार्य महाराज ने कहा कि गाय को पशु कहने का विचार ही भारतीय आस्था के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि गाय को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाना चाहिए और इसके संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाए जाने चाहिए। उनके अनुसार यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

    इसी क्रम में हनुमानगढ़ी के ही महंत हरीश दास ने कहा कि सीएम योगी का बयान समाज में संतुलन और परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि गाय भारतीय जीवन मूल्यों का केंद्र है और इसे किसी विवाद में नहीं खींचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शासन द्वारा कानून-व्यवस्था और सामाजिक अनुशासन पर की जा रही कार्रवाई सराहनीय है और इससे समाज में स्थिरता बनी रहती है।

    इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर गाय को लेकर देश में चल रही वैचारिक बहस को सामने ला दिया है। एक ओर जहां धार्मिक संत इसे आस्था और परंपरा का विषय मानते हैं, वहीं दूसरी ओर यह विषय सामाजिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अयोध्या के संतों के समर्थन ने इस बहस को और अधिक व्यापक बना दिया है।

    अंततः यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय समाज में परंपरा, आस्था और आधुनिक संवैधानिक सोच के बीच संतुलन की बड़ी बहस को दर्शाता है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और भी प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे यह चर्चा और गहराती दिखाई दे सकती है।

  • जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर क्रांति: मक्का-धान छोड़ किसानों की बदलती आर्थिक तस्वीर..

    जम्मू-कश्मीर में लैवेंडर क्रांति: मक्का-धान छोड़ किसानों की बदलती आर्थिक तस्वीर..

    नई दिल्ली । जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र इन दिनों कृषि परिवर्तन की एक अनोखी कहानी लिख रहा है, जहां पारंपरिक मक्का और धान जैसी फसलों को छोड़कर किसान लैवेंडर की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यह क्षेत्र अब देशभर में “भारत की लैवेंडर राजधानी” के रूप में पहचान बना चुका है, जहां बैंगनी रंग के विशाल खेत न केवल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे रहे हैं। कम पानी की आवश्यकता और अधिक लाभ देने वाली इस फसल ने किसानों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है और कृषि को एक नई पहचान दी है।

    भदेरवाह के लेलरोट और टिपरी क्षेत्रों में इन दिनों लैवेंडर की कटाई का काम जोरों पर है। खेतों में फैले बैंगनी फूल वातावरण को सुगंधित और आकर्षक बना रहे हैं। किसान सावधानीपूर्वक फूलों की कटाई कर रहे हैं, जिन्हें आगे आवश्यक तेल, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया ने स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं, जिससे न केवल किसान बल्कि ग्रामीण मजदूर भी लाभान्वित हो रहे हैं।

    इस क्षेत्र में लैवेंडर खेती की शुरुआत लगभग 2010 के आसपास एक वैज्ञानिक संस्थान की पहल से हुई थी, जब चुनिंदा किसानों को शुरुआती पौधे उपलब्ध कराए गए थे। बाद में सरकारी योजना के तहत इस पहल को व्यापक समर्थन मिला, जिसमें किसानों को प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और आवश्यक तेल निकालने के लिए आसवन इकाइयों की सुविधा दी गई। इसी निरंतर सहयोग के परिणामस्वरूप आज भदेरवाह और आसपास के क्षेत्रों में हजारों किसान परिवार इस खेती से जुड़े हुए हैं और इसे अपनी आय का मुख्य स्रोत बना चुके हैं।

    स्थानीय किसान रोशन ने बताया कि पहले पारंपरिक खेती से परिवार का गुजारा मुश्किल से होता था, लेकिन लैवेंडर ने उनकी आर्थिक स्थिति बदल दी है। उन्होंने बताया कि उन्होंने शुरुआत में छोटी जमीन से खेती शुरू की थी, जो अब कई गुना बढ़ चुकी है और उनके साथ सैकड़ों किसान भी जुड़ चुके हैं। इसी तरह कुलदीप कुमार जैसे किसानों का कहना है कि जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान और कम मुनाफे के कारण पारंपरिक खेती कठिन हो गई थी, लेकिन लैवेंडर ने स्थायी आय का रास्ता खोल दिया है और साल में दो बार कटाई होने से नियमित आमदनी सुनिश्चित हो रही है।

    भदेरवाह में लैवेंडर खेती केवल एक कृषि बदलाव नहीं बल्कि ग्रामीण विकास का मॉडल बनकर उभरी है, जहां बंजर पड़ी जमीन भी अब उत्पादन का केंद्र बन रही है। सरकारी सहयोग और योजनाओं के चलते यह मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। लगातार बढ़ती मांग और मूल्यवर्धित उत्पादों के बाजार ने इस फसल को और अधिक लाभकारी बना दिया है, जिससे किसानों का विश्वास इस दिशा में और मजबूत हुआ है।

    लैवेंडर खेती का यह विस्तार आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह तकनीकी सहयोग और बाजार उपलब्धता बनी रही तो यह क्षेत्र देश में अरोमा आधारित कृषि का प्रमुख केंद्र बन सकता है और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है।

  • तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था पर सवाल, हत्या मामले ने बढ़ाया राजनीतिक तनाव..

    तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था पर सवाल, हत्या मामले ने बढ़ाया राजनीतिक तनाव..

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई एक बार फिर गंभीर अपराध की घटना को लेकर सुर्खियों में है, जहां टोंडियारपेट इलाके में 24 वर्षीय युवक विष्णु की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जानकारी के अनुसार, विष्णु ने अपने आसपास के इलाके में कथित तौर पर चल रही गांजे की अवैध बिक्री का विरोध किया था, जिसके बाद वह अपराधियों के निशाने पर आ गया। यह घटना पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का कारण बन गई है।

    स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, सोमवार को विष्णु का सामना एक ऐसे समूह से हुआ जो इलाके में नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री से जुड़ा बताया जा रहा है। बहस के दौरान स्थिति अचानक हिंसक हो गई और आरोप है कि गिरोह के सदस्यों ने मिलकर उस पर हमला कर दिया। हमलावरों ने बीयर की बोतलों, हथौड़े और अन्य भारी वस्तुओं का इस्तेमाल करते हुए उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    इस वारदात के बाद इलाके में डर और तनाव का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अवैध नशे का कारोबार लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय है और इसके खिलाफ आवाज उठाना आम लोगों के लिए खतरे से खाली नहीं रह गया है। घटना के बाद लोग प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और इलाके में पुलिस की मौजूदगी बढ़ा दी गई है। जांच एजेंसियां हमलावरों की पहचान करने और पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हुई हैं।

    इस हत्या ने राज्य की राजनीति को भी गर्म कर दिया है। विपक्षी दलों के नेताओं ने सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि अगर नशे के कारोबार पर नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ती रहेगी। इस घटना को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ गया है और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में फैलते अवैध नशे के कारोबार पर कड़ी निगरानी और त्वरित कार्रवाई की जरूरत है, ताकि इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके। उनका यह भी कहना है कि केवल पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है ताकि युवा नशे के नेटवर्क से दूर रह सकें।

    फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच कर रही है और आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आम नागरिक सुरक्षित माहौल में नशे और अपराध के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं या नहीं। आने वाले दिनों में जांच के नतीजे इस मामले की गंभीरता और इसके पीछे छिपे नेटवर्क को सामने ला सकते हैं।

    यह घटना केवल एक हत्या नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की तरह सामने आई है, जो दिखाती है कि अवैध नशे का कारोबार किस तरह आम जीवन और कानून-व्यवस्था दोनों को प्रभावित कर रहा है। आगे की कार्रवाई ही तय करेगी कि पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाता है या नहीं और ऐसे अपराधों पर कितना अंकुश लगाया जा सकेगा।

  • इमिग्रेशन सिस्टम में बड़ा सुधार: विदेशियों की निगरानी और डिजिटल रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य

    इमिग्रेशन सिस्टम में बड़ा सुधार: विदेशियों की निगरानी और डिजिटल रजिस्ट्रेशन होगा अनिवार्य

    नई दिल्ली । केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारत में विदेशी नागरिकों के प्रवेश, ठहराव और उनसे जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक सख्त और व्यवस्थित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स रूल्स, 2025 में किए गए नए संशोधन के तहत कम अवधि के वीजा पर भारत आने वाले विदेशियों के लिए रजिस्ट्रेशन और वीजा अवधि बढ़ाने से जुड़े नियमों को पहले की तुलना में अधिक कड़ा कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह बदलाव देश की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और विदेशी नागरिकों की गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है।

    नए प्रावधानों के अनुसार, 180 दिन या उससे कम अवधि के वीजा पर भारत आने वाले विदेशी नागरिक यदि अपने ठहराव को बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी निर्धारित वीजा अवधि समाप्त होने से पहले ही अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। पहले के नियमों में वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी सीमित समय के भीतर रजिस्ट्रेशन की अनुमति दी जाती थी, लेकिन अब इस सुविधा को काफी हद तक समाप्त कर दिया गया है। केवल विशेष और आपातकालीन परिस्थितियों में ही देर से रजिस्ट्रेशन की अनुमति दी जाएगी।

    सरकार ने इमिग्रेशन प्रक्रिया को और अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने पर भी जोर दिया है। नए बदलावों के तहत सभी प्रकार की अपील प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया गया है, जिससे आवेदकों को कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और प्रक्रिया तेज व सरल हो जाएगी। इसके साथ ही डिजिटल सिस्टम के माध्यम से विदेशी नागरिकों की निगरानी और रिकॉर्ड मैनेजमेंट को अधिक प्रभावी बनाने की योजना भी शामिल है, जिससे प्रशासनिक दक्षता में सुधार होगा।

    संशोधित नियमों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान भारतीय माता-पिता से जुड़े मामलों के लिए भी जोड़ा गया है। यदि कोई बच्चा भारत में रहते हुए बाद में किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करता है, तो ऐसे मामलों में माता-पिता को इसकी जानकारी 30 दिनों के भीतर संबंधित पंजीकरण अधिकारी को देना अनिवार्य होगा। इस कदम का उद्देश्य नागरिकता से जुड़े रिकॉर्ड को अधिक स्पष्ट और अद्यतन रखना है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की प्रशासनिक अस्पष्टता न रहे।

    पहले लागू व्यवस्था की तुलना में यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पुराने नियमों में विदेशी नागरिकों को वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी 14 दिनों के भीतर रजिस्ट्रेशन करने की छूट दी जाती थी। नई व्यवस्था में इस प्रकार की ढील को समाप्त कर दिया गया है, जिससे समय पर अनुपालन को अनिवार्य बना दिया गया है। इससे विदेशी नागरिकों की निगरानी प्रणाली अधिक मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है।

    अंतिम प्रभाव के तौर पर यह संशोधन भारत की इमिग्रेशन नीति को अधिक आधुनिक, डिजिटल और सुरक्षा केंद्रित बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं अधिक अनुशासित होंगी और देश में विदेशी नागरिकों की मौजूदगी पर बेहतर नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। आने वाले समय में इस बदलाव का असर इमिग्रेशन सिस्टम की कार्यप्रणाली और राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे दोनों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने की उम्मीद है।

  • सूरत नवजात केस: तीसरी बार प्रेग्नेंट होने पर महिला ने नवजात को फेंका, CCTV से पहुंची पुलिस तक सच्चाई

    सूरत नवजात केस: तीसरी बार प्रेग्नेंट होने पर महिला ने नवजात को फेंका, CCTV से पहुंची पुलिस तक सच्चाई

    नई दिल्ली । गुजरात के सूरत शहर में एक नवजात शिशु के शव मिलने की घटना ने गंभीर चिंता और आक्रोश का माहौल पैदा कर दिया है। यह मामला तब सामने आया जब स्थानीय क्षेत्र में कचरे के ढेर से एक नवजात का शव बरामद हुआ। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की गई। शुरुआती जांच में मामला संदिग्ध पाया गया, जिसके बाद आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खंगाला गया और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान की कोशिश की गई।

    जांच के दौरान पुलिस को एक महिला की गतिविधि संदिग्ध लगी, जो काले रंग की प्लास्टिक थैली लेकर इलाके में जाती दिखाई दी थी। इसी सुराग के आधार पर पुलिस ने अपनी जांच को आगे बढ़ाया और तकनीकी विश्लेषण तथा स्थानीय पूछताछ के जरिए महिला की पहचान की। कई दिनों की जांच के बाद पुलिस ने महिला को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की।

    पूछताछ में जो तथ्य सामने आए, उन्होंने सभी को चौंका दिया। महिला पहले से दो बच्चों की मां है और उसके दोनों बच्चे वयस्क हो चुके हैं। उसने स्वीकार किया कि वह तीसरी बार गर्भवती हो गई थी और इस स्थिति को लेकर वह मानसिक तनाव में थी। उसे डर था कि समाज में उसकी बदनामी होगी और लोग इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे। इसी डर और सामाजिक दबाव के कारण उसने नवजात को जन्म देने के बाद उसे काले प्लास्टिक बैग में डालकर कचरे में फेंक दिया।

    इस घटना के बाद पूरे इलाके में दुख और गुस्से का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं समाज में बढ़ते मानसिक दबाव और जागरूकता की कमी को भी दर्शाती हैं। कई सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में महिलाओं को उचित परामर्श और सहायता मिलनी चाहिए, ताकि वे किसी भी प्रकार के चरम कदम उठाने से बच सकें।

    पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की सभी पहलुओं से जांच की जा रही है और नवजात की मृत्यु के वास्तविक कारणों का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। इसके साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि घटना के समय परिस्थितियां क्या थीं और इसमें अन्य कोई पहलू तो शामिल नहीं है।

    यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं बल्कि सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव की गंभीर स्थिति को भी उजागर करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और सहायता तंत्र को मजबूत करना जरूरी है।

    इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या समाज में ऐसे हालातों से जूझ रहे लोगों के लिए पर्याप्त समर्थन मौजूद है या नहीं। जांच आगे बढ़ने के साथ इस घटना से जुड़े अन्य तथ्य भी सामने आ सकते हैं।

  • राहुल गांधी के सामने बड़ी चुनौती, कर्नाटक और केरल कांग्रेस अध्यक्ष पद पर मंथन तेज

    राहुल गांधी के सामने बड़ी चुनौती, कर्नाटक और केरल कांग्रेस अध्यक्ष पद पर मंथन तेज

    नई दिल्ली । कांग्रेस शासित राज्यों कर्नाटक और केरल में संगठनात्मक नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चल रही चर्चा अब केवल औपचारिकता नहीं रही, बल्कि यह सत्ता संतुलन और क्षेत्रीय समीकरणों का अहम राजनीतिक प्रश्न बन चुकी है। पार्टी के भीतर अलग-अलग गुट अपने-अपने नेताओं के लिए समर्थन जुटाने में सक्रिय हैं, जिससे संगठनात्मक फैसले और भी जटिल होते जा रहे हैं।

    कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री और संगठन के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती लगातार बनी हुई है। अब प्रदेश अध्यक्ष के चयन को लेकर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी एक मजबूत संगठनात्मक चेहरे को आगे लाएगी या फिर सत्ता और संगठन के बीच सामंजस्य बनाए रखने वाला कोई समझौता फार्मूला अपनाया जाएगा। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि अगला प्रदेश अध्यक्ष किस दिशा में संगठन को आगे ले जाएगा और आने वाले चुनावों के लिए किस तरह की रणनीति तैयार की जाएगी।

    दूसरी ओर केरल में कांग्रेस की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, जहां पार्टी लंबे समय से सत्ता से बाहर है। यहां संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी प्रदेश नेतृत्व पर सबसे अधिक है। प्रदेश अध्यक्ष के चयन को लेकर यहां भी कई नामों की चर्चा चल रही है और हर गुट अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश में है। केरल में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाता आधार को पुनः संगठित करने और वामपंथी दलों से मुकाबला करने की रणनीति तैयार करना है।

    सूत्रों के अनुसार पार्टी नेतृत्व इस पूरे मामले को संतुलित तरीके से सुलझाने की कोशिश कर रहा है, ताकि किसी भी राज्य में असंतोष की स्थिति न बने। राहुल गांधी की भूमिका इस पूरे संगठनात्मक पुनर्गठन में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि वे लगातार राज्यों में संगठन को मजबूत करने पर जोर देते रहे हैं। कर्नाटक और केरल दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के लिए आने वाला समय राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है, इसलिए नेतृत्व चयन में हर कदम सावधानी से उठाया जा रहा है।

    पार्टी के अंदर यह भी चर्चा है कि संगठन में युवा नेतृत्व को आगे लाने की जरूरत है, ताकि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हो सके। हालांकि वरिष्ठ नेताओं की राय है कि अनुभव और स्थिरता भी उतनी ही जरूरी है, खासकर उन राज्यों में जहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ी है। यही वजह है कि प्रदेश अध्यक्ष के चयन को लेकर अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं हो पा रहा है।

    आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व को यह तय करना होगा कि वह संगठनात्मक मजबूती को प्राथमिकता देगा या फिर सत्ता संतुलन के समीकरणों को ध्यान में रखकर फैसला करेगा। यह निर्णय न केवल कर्नाटक और केरल की राजनीति को प्रभावित करेगा, बल्कि आने वाले राष्ट्रीय चुनावों में भी पार्टी की रणनीति पर इसका असर देखा जा सकता है।

  • विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन

    विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) को घेरने और विपक्षी एकता (Opposition unity) दिखाने के लिए ‘INDI’ गठबंधन दिल्ली में महाबैठक (General Meeting) करने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक 8 जून को यह बैठक हो सकती है। इसमें केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए संयुक्त रणनीति पर चर्चा होनी है। बैठक में करीब 15 विपक्षी दलों के प्रतिनिधि भाग ले सकते हैं।


    ममता बनर्जी भी हो सकती हैं शामिल

    जानकारी के मुताबिक हाल के चुनाव में बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके की हार की समीक्षा और आगे की रणनीति पर चर्चा करने के लिए यह बैठक बुलाई गई है। सूत्रों ने बताया कि बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, शिवसेना (UBT) नेता उद्धव ठाकरे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आदि के भाग लेने की उम्मीद है।

    बता दें कि पश्चिम बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी भी बड़े संकट का सामना कर रही है। सूत्रों का कहना है कि टीएमसी के अंदर विरोध काफी तेज हो गया है और टीएमसी के कई बड़े नेता बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। उधर पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी पर हमला हो गया जिसको लेकर ममता बनर्जी केंद्र पर आक्रामक हैं। वहीं खबरें यहां तक आ रही हैं कि पार्टी में ममता बनर्जी के कद पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।


    राहुल गांधी बोले- रीति और नीति को प्रसारित करें

    राहुल गांधी ने एक दिन पहले ही पार्टी संगठन को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि कार्यकर्ताओं को पार्टी की रीति और नीति को जन-जन तक पहुंचाना है। गांधी सोमवार को कांग्रेस की ओर से अजमेर के पुष्कर स्थित तिलोरा में आयोजित 10 दिवसीय सृजन संगठन चिंतन शिविर के समापन पर कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने शिविर में जिला अध्यक्षों को संगठन के प्रति निष्ठा और एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने जिला अध्यक्षों को स्पष्ट कहा कि संगठन से सर्वोपरि कुछ भी नहीं है। पार्टी की रीति-नीति आम जनता के बीच प्रसारित कर कांग्रेस को और मजबूत किया जाए।

    शिविर को सफल बताते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि संगठन सृजन अभियान के साथ चिंतन शिविर से कांग्रेस के कार्यकर्ता में एक नया जोश पैदा होगा और नयी जिम्मेदारी के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता जब पार्टी की रीति के साथ जब सड़कों पर उतरकर जनता के बीच जाएगा तो जनता का मत और समर्थन कांग्रेस को प्राप्त होगा। यही इस शिविर का मूल उद्देश्य भी है।

  • हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर

    हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर


    नई दिल्ली।
    कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Congress MP Shashi Tharoor) ने वंदे मातरम् (VANDAM MATARAM) के गायन को लेकर चल रही बहस के बीच बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रीय गीत के सभी पांच पदों का गायन करवाना उचित नहीं लगता। संवाददाताओं से बात करते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है।

    कांग्रेस सांसद ने कहा, “वंदे मातरम राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे, ज्यादातर लोगों को मुंह जुबानी याद होते हैं।” थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में बजाया जाता है।

    उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और अंत में पांचों अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।” थारूर ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी इसे आपके लिए गा सकता हूं।”

    राज्य सरकार और राज्यपाल के रुख में अंतर का संकेत
    कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थरूर ने कहा कि केरल सरकार का रुख यह रहा है कि वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाना वैकल्पिक है। वहीं, उन्होंने संकेत दिया कि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की राय इससे अलग दिखाई देती है। थरूर के मुताबिक, इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय की आवश्यकता पड़ सकती है क्योंकि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो हर कार्यक्रम में पूरे गीत के गायन को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने इसे मुख्य रूप से परंपरा और प्रचलन से जुड़ा विषय बताया।

    ‘राष्ट्रीय गीत से कोई आपत्ति नहीं’
    थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें वंदे मातरम् से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय इस राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं और वह स्वयं भी इसे खुशी से गा सकते हैं। उन्होंने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि नई दिल्ली में आयोजित उस कार्यक्रम में, जिसमें उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मौजूद थे, वंदे मातरम् का पूरा संस्करण कार्यक्रम की शुरुआत और अंत दोनों समय बजाया गया था।

    ‘दर्शकों के लिए यह व्यावहारिक चुनौती बन जाती है’
    थरूर का कहना था कि अपेक्षाकृत लंबा और कम परिचित गीत जब एक ही कार्यक्रम में दो बार सुनाया जाता है तो दर्शकों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना एक मुद्दा बन सकता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में परंपरागत रूप से वंदे मातरम् का वही हिस्सा गाया जाता रहा है जिसकी अवधि लगभग राष्ट्रीय गान के बराबर होती है। यह स्वरूप लंबे समय से व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता रहा है और लोगों द्वारा सम्मानित भी है।

    विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकलने की उम्मीद
    इस पूरे विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए थरूर ने उम्मीद जताई कि इसका समाधान आपसी समझ और सौहार्द के साथ निकलेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले विशेष औपचारिक कार्यक्रमों में एक बार पूरा गीत गाए जाने को समझा जा सकता है। हालांकि, किसी छोटे कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम् का दो बार गायन करवाने के पीछे उन्हें कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता। उनके अनुसार यह व्यवस्था न तो विशेष रूप से व्यावहारिक है और न ही बहुत प्रभावी।

  • नीट विवाद: PM मोदी के जवाबदेही मॉडल की दिग्विजय सिंह ने की सराहना….

    नीट विवाद: PM मोदी के जवाबदेही मॉडल की दिग्विजय सिंह ने की सराहना….


    नई दिल्ली।
    नीट विवाद (NEET Controversy) को लेकर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) जहां प्रधानमंत्री (Prime Minister) के साथ आर-पार के मूड में है, वहीं पार्टी के सबसे मुखर चेहरों में से एक दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) ने प्रधानमंत्री की नीयत और देश की संस्थागत व्यवस्था पर खुलकर भरोसा जताया है। शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह सोमवार को हुए बैठक में साफ कहा कि जब देश का शीर्ष नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के समक्ष परीक्षा प्रणाली को सुधारने की जवाबदेही ले रहा है, तो इस सकारात्मक रुख की सराहना की जानी चाहिए।

    सूत्रों ने बताया, बैठक में परीक्षा सुधार, एनटीए की कार्यप्रणाली और नीट से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान दिग्विजय ने कहा कि जब सरकार जवाबदेही स्वीकार रही है तो इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए। हालांकि, उनकी टिप्पणी का आधिकारिक ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से मोदी की किसी विशेषता का उल्लेख किया हो। पिछले वर्ष उन्होंने भाजपा-आरएसएस की संगठनात्मक क्षमता की सराहना करते हुए कहा था कि एक साधारण कार्यकर्ता का प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना संगठन की ताकत को दर्शाता है।


    पीएम छात्रों के नाम खुला पत्र लिखें

    अध्यक्ष ने कहा, 21 जून की दोबारा परीक्षा के लिए छात्रों और अभिभावकों में विश्वास जगाना बेहद जरूरी है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान छात्रों के नाम खुला पत्र या फिर संदेश लिखें जिसमें छात्रों को लगे कि वो अकेले नहीं हैं।


    राजनीतिकरण पर सवाल तो सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं दी

    सूत्रों के मुताबिक, भाजपा से जुड़े सदस्यों ने समिति में शामिल विपक्ष के सदस्यों से पूछा कि नीट यूजी की दोबारा परीक्षा पर राजनीति क्यों हो रही है। परीक्षा के बीच जांच के नाम पर ऐसी बैठकें क्योंकि की जा रही हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, राजनीति का तो कोई सवाल ही नहीं है। अध्यक्ष ने मंत्रालय और अधिकारियों को 21 जून को होने वाली दोबारा नीट के सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।


    पुनर्मूल्यांकन फीस पर राहुल बोले- सीबीएसई के जेबकतरों से सावधान

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को सीबीएसई की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और उसकी फीस को लेकर मोदी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि जब शिक्षा को एक सेवा के बजाय एक व्यापार के तौर पर देखा जाता है, तो गलतियां सुधारी नहीं जातीं, बल्कि और बढ़ जाती हैं और इसकी सबसे बड़ी कीमत हमारे बच्चे अपने वक्त,अपने आत्मविश्वास खोने और अपने भविष्य के रूप में चुका रहे हैं। इसके साथ उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली की वजह से दिक्कतों का सामना कर रहे सीबीएसई छात्रों संग अपनी बातचीत का वीडियो क्लिप भी साझा किया।

    इसके साथ उन्होंने लिखा, जेबकतरों से सावधान रहें। आज वे सीधे सीबीएसई के अंदर ही बैठे हैं। सीबीएसई की वजह से गलत नंबर आने पर आपको डिजिटल स्कैन कॉपी पाने के लिए 100 रुपये प्रति विषय, नंबरों की दोबारा गिनती के लिए 100 रुपये प्रति पेपर और पुनर्मूल्यांकन के लिए 25 प्रति सवाल शुल्क देना पड़ता है। अपनी ही आंसर सीट की सही जांच के लिए एक छात्र को 2000 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, जरा सोचिए कि जब करीब 4 लाख चार लाख छात्रों ने ऐसे आवेदन दिए हैं, तो सीबीएसई कितनी कमाई कर रहा होगा।