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  • कोलकाता में भव्य शपथ ग्रहण, 35 नए मंत्रियों के शामिल होने से पश्चिम बंगाल सरकार का विस्तार

    कोलकाता में भव्य शपथ ग्रहण, 35 नए मंत्रियों के शामिल होने से पश्चिम बंगाल सरकार का विस्तार

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े प्रशासनिक बदलाव के तहत मुख्यमंत्री Shubhendu Adhikari के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने मंत्रिमंडल का व्यापक विस्तार किया है। कोलकाता में आयोजित एक औपचारिक शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय जनता पार्टी के 35 विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली, जिससे राज्य सरकार का मंत्रिमंडल 41 सदस्यों तक पहुंच गया है। इस विस्तार को प्रशासनिक मजबूती और क्षेत्रीय संतुलन साधने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों और अनुभवों को ध्यान में रखते हुए नई जिम्मेदारियां तय की गई हैं। कार्यक्रम में शपथ ग्रहण का आयोजन राजभवन में किया गया, जहां सभी नए मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली।

    इस विस्तार के बाद राज्य सरकार ने मंत्रियों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया है, ताकि प्रशासनिक कार्यों को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। पहले वर्ग में 13 विधायकों को कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल किया गया है, जिनमें Deepak Burman, Tapas Roy, Dr. Shankar Ghosh, Manoj Kumar Oraon, Arjun Singh, Gauri Shankar Ghosh, Swapan Dasgupta, Jagannath Chattopadhyay, Kalyan Chakraborty, Ajay Poddar, Sarbadwata Mukherjee, Dudh Kumar Mondal और Anup Kumar Das शामिल हैं।

    दूसरी श्रेणी में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में तीन विधायकों को शामिल किया गया है, जिनमें Dr. Indranil Khan, Malati Rava Roy और Rajesh Mahato को जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं तीसरी श्रेणी में 19 राज्य मंत्रियों को शामिल किया गया है, जिनमें Joel Murmu, Hare Krishna Bera, Anandamay Barman, Ashok Dinda, Nadear Chand Bauri, Vishal Lama, Shantanu Pramanik, Moumita Biswas Mishra, Umesh Roy, Purnima Chakraborty, Kaushik Chowdhury, Bhaskar Bhattacharya, Debakar Gharami, Amia Kisku, Kalita Majhi, Gargi Das Ghosh, Biraj Biswas, Dipankar Jana और Sumana Sarkar के नाम शामिल हैं।

    राज्य सरकार के अनुसार इस बड़े विस्तार का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों को गति देना, विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को मजबूत करना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर मंत्रिमंडल विस्तार से राज्य में नीतिगत निर्णय प्रक्रिया तेज हो सकती है और जमीनी स्तर पर सरकार की पहुंच बढ़ सकती है।

    कोलकाता में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह को राज्य की राजनीतिक दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसमें नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे दोनों को मजबूत करने की कोशिश दिखाई देती है। आने वाले समय में इस नए मंत्रिमंडल के कामकाज और नीतिगत फैसलों पर पूरे राज्य की नजर बनी रहेगी।

  • 210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?

    210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?


    नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे को लेकर चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। बालेन शाह ने ब्रिटेन की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे सीमा विवादों को वह यूनाइटेड किंगडम के सामने भी उठाएंगे। इसके बाद 210 साल पुराने इस विवाद पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    लिपुलेख दर्रा हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक रणनीतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्ग है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले को तिब्बत के पुरांग क्षेत्र से जोड़ता है। यही दर्रा कैलास मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्गों में से एक माना जाता है। भारत और चीन के बीच हुए समझौतों के तहत वर्षों से इस मार्ग का उपयोग तीर्थयात्रियों और सीमित व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।

    इस विवाद की जड़ वर्ष 1816 में हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि में छिपी है। यह संधि तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। संधि के अनुसार काली नदी को भारत और नेपाल की सीमा माना गया था। हालांकि विवाद इस बात को लेकर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है।

    भारत का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिपुलेख क्षेत्र के निकट स्थित कालापानी इलाके से होता है। इस आधार पर भारत लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र को अपने भूभाग का हिस्सा मानता है। दूसरी ओर नेपाल का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है। यदि नेपाल के दावे को सही माना जाए तो कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा का इलाका नेपाल के क्षेत्र में आता है।

    विवाद को और जटिल बनाने वाला एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1865 के आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने सीमा निर्धारण में कुछ बदलाव किए थे। भारत का पक्ष है कि बाद के आधिकारिक नक्शों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर यह क्षेत्र भारत का हिस्सा रहा है। वहीं नेपाल का आरोप है कि ब्रिटिश शासन के दौरान सीमा निर्धारण में उसके हितों की अनदेखी की गई थी।

    यह विवाद वर्ष 2020 में तब और तेज हो गया जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किया। नेपाल ने इसका विरोध करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया था।

    भारत का लगातार यही रुख रहा है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और आपसी बातचीत के माध्यम से होना चाहिए। नई दिल्ली किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रही है। वहीं नेपाल में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दल और नेता इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की वकालत करते रहे हैं।

    लिपुलेख विवाद केवल सीमा रेखा का सवाल नहीं है बल्कि इसमें ऐतिहासिक दस्तावेज, सामरिक महत्व, धार्मिक आस्था और दोनों देशों के राष्ट्रीय हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि दो सदियों बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं सका है और समय-समय पर दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों में चर्चा का विषय बन जाता है।

  • बिहार में बंगले पर सियासत तेज, तेज प्रताप ने नीतीश कुमार को भी नोटिस देने की उठाई मांग

    बिहार में बंगले पर सियासत तेज, तेज प्रताप ने नीतीश कुमार को भी नोटिस देने की उठाई मांग


    नई दिल्ली। बिहार की राजनीति में इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के सरकारी आवास को लेकर घमासान मचा हुआ है। राज्य सरकार द्वारा 10 सर्कुलर रोड स्थित बंगला खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद राष्ट्रीय जनता दल और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इसी विवाद के बीच राबड़ी देवी के बड़े बेटे और जन जन पार्टी के प्रमुख तेज प्रताप यादव ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी निशाने पर लिया है।

    तेज प्रताप यादव ने साफ कहा कि यदि सरकार पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से सरकारी आवास खाली करवाना चाहती है तो यही नियम पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भी लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार भी पूर्व मुख्यमंत्री हैं और उन्हें भी सरकारी आवास खाली करने का नोटिस मिलना चाहिए। तेज प्रताप ने तंज कसते हुए कहा कि सबसे पहले नीतीश कुमार अपना आवास छोड़ दें, उसके बाद राबड़ी देवी भी बंगला खाली कर देंगी।

    जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि सरकार ने राबड़ी देवी को 15 दिनों के भीतर बंगला खाली करने का निर्देश दिया है तो उन्होंने जवाब दिया कि सरकार को समान नियम अपनाने चाहिए और इसी तरह का नोटिस नीतीश कुमार को भी जारी करना चाहिए। तेज प्रताप का यह बयान ऐसे समय आया है जब बंगला विवाद बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

    इससे पहले राबड़ी देवी की बेटी और राजद नेता रोहिणी आचार्या भी इस मामले में सरकार के खिलाफ खुलकर सामने आ चुकी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर सरकार पर प्रतिशोध की राजनीति करने का आरोप लगाया। रोहिणी ने कहा कि यदि सरकार में हिम्मत है तो वह जबरन बंगला खाली करवाकर दिखाए। उनके अनुसार विपक्षी नेताओं को निशाना बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और सरकार अपनी प्रशासनिक विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए ऐसे कदम उठा रही है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने 27 मई को एक आदेश जारी कर 10 सर्कुलर रोड स्थित सरकारी आवास डेयरी एवं मत्स्य पालन मंत्री नंद किशोर राम को आवंटित कर दिया। इसके साथ ही राबड़ी देवी को आवास खाली करने के निर्देश दिए गए। यह वही बंगला है जिसमें राबड़ी देवी पिछले करीब दो दशकों से रह रही हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम पर राबड़ी देवी ने भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह बंगला खाली नहीं करेंगी। उनका कहना है कि सरकार चाहे जितना दबाव बनाए लेकिन उन्हें जबरन हटाना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार यदि चाहती है तो बलपूर्वक कार्रवाई करके दिखाए।

    बंगला विवाद अब केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है बल्कि यह बिहार की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सरकार नियमों का हवाला दे रही है तो दूसरी ओर राजद इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद और अधिक तूल पकड़ सकता है तथा विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है।

  • ‘करुप्पू’ बनी ब्लॉकबस्टर मशीन, सूर्या की फिल्म ने 16 दिनों में रचा इतिहास, तीन बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ाg

    ‘करुप्पू’ बनी ब्लॉकबस्टर मशीन, सूर्या की फिल्म ने 16 दिनों में रचा इतिहास, तीन बड़ी फिल्मों को पीछे छोड़ाg

    नई दिल्ली । तमिल सिनेमा के चर्चित अभिनेता सूर्या की फिल्म ‘करुप्पू’ बॉक्स ऑफिस पर लगातार शानदार प्रदर्शन कर रही है और रिलीज के 16 दिनों के भीतर ही इसने कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं। फिल्म ने न केवल घरेलू बाजार में बल्कि तमिलनाडु में भी जबरदस्त कमाई करते हुए 150 करोड़ रुपये के क्लब में एंट्री कर ली है, जिससे यह इस साल की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में से एक बन गई है। लगातार बढ़ती कमाई के साथ यह फिल्म दर्शकों के बीच मजबूत पकड़ बनाए हुए है और हर गुजरते दिन के साथ नए आंकड़े दर्ज कर रही है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार फिल्म ने पहले सप्ताह में लगभग 113.85 करोड़ रुपये का शानदार कलेक्शन किया था, जिसके बाद दूसरे सप्ताह में भी इसकी रफ्तार बरकरार रही और 54.30 करोड़ रुपये की कमाई दर्ज की गई। तीसरे सप्ताह की शुरुआत में भी फिल्म ने स्थिर प्रदर्शन जारी रखा और 15वें दिन शुक्रवार को 3.25 करोड़ रुपये का कारोबार किया। वहीं 16वें दिन शनिवार को इसकी कमाई में फिर उछाल देखने को मिला और 5.15 करोड़ रुपये का कलेक्शन दर्ज किया गया, जिससे इसका कुल इंडिया नेट कलेक्शन 176.55 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

    तमिलनाडु में फिल्म का प्रदर्शन और भी प्रभावशाली रहा है, जहां इसने 150 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर इंडस्ट्री के कई बड़े रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस उपलब्धि के साथ ‘करुप्पू’ ने रजनीकांत और अक्षय कुमार की फिल्म 2.0 के तमिल नेट कलेक्शन रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है, जिसने लगभग 135 करोड़ रुपये का आंकड़ा दर्ज किया था। इसके अलावा फिल्म ने ‘पोन्नियन सेल्वन 2’ और ‘वरिसु’ जैसी बड़ी फिल्मों के आंकड़ों को भी पार कर अपनी मजबूत स्थिति स्थापित की है।

    फिल्म की कहानी एक ऐसे पुलिस अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमती है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करता है और सिस्टम में फैली गड़बड़ियों को उजागर करने की कोशिश करता है। इस सामाजिक और एक्शन से भरपूर कहानी को दर्शकों ने काफी पसंद किया है, जिससे फिल्म को लगातार सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। सूर्या के साथ फिल्म में अभिनेत्री तृषा कृष्णन भी मुख्य भूमिका में नजर आती हैं, जिनकी परफॉर्मेंस को भी सराहा जा रहा है।

    लगातार बढ़ते कलेक्शन और रिकॉर्ड ब्रेकिंग प्रदर्शन के साथ ‘करुप्पू’ ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत कहानी और प्रभावी प्रस्तुति के दम पर कोई भी फिल्म लंबे समय तक बॉक्स ऑफिस पर टिक सकती है और बड़े स्तर पर सफलता हासिल कर सकती है।

  • कर्नाटक में नेतृत्व बदलाव के बीच सिद्धारमैया को बड़ी जिम्मेदारी देने के संकेत, केसी वेणुगोपाल का बयान बना चर्चा का केंद्र

    कर्नाटक में नेतृत्व बदलाव के बीच सिद्धारमैया को बड़ी जिम्मेदारी देने के संकेत, केसी वेणुगोपाल का बयान बना चर्चा का केंद्र

    नई दिल्ली । कर्नाटक में सत्ता और संगठन के स्तर पर हुए हालिया नेतृत्व परिवर्तन के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से मुख्यमंत्री पद संभाल रहे सिद्धारमैया ने अब औपचारिक रूप से कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी है, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर उनकी आगे की भूमिका को लेकर चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल का बयान सुर्खियों में आ गया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सिद्धारमैया को पार्टी ‘आराम नहीं करने देगी’ और उन्हें राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह बयान कांग्रेस की उस रणनीति की ओर संकेत करता है, जिसमें अनुभवी नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति दोनों में लगातार सक्रिय रखने की योजना दिखाई देती है।

    कांग्रेस विधायक दल की बैठक में जब डीके शिवकुमार को औपचारिक रूप से नेता चुना गया, उसी समय पार्टी के भीतर यह संदेश भी देने की कोशिश हुई कि यह बदलाव किसी एक नेता के पीछे हटने का संकेत नहीं है, बल्कि संगठनात्मक पुनर्संरचना का हिस्सा है। केसी वेणुगोपाल ने इस मौके पर सिद्धारमैया की राजनीतिक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है और उनके अनुभव का उपयोग आगे भी किया जाएगा। उनके अनुसार, सिद्धारमैया की राजनीतिक समझ और ओबीसी समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी साबित हो सकती है।

    सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजने और दिल्ली में एक बड़ी जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव भी दिया था। यह प्रस्ताव इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं को अग्रिम पंक्ति में बनाए रखना चाहती है। हालांकि 78 वर्षीय सिद्धारमैया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और उन्होंने कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय रहने की इच्छा जताई।

    विधायक दल की बैठक में खुद सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखकर नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को सहज बनाने में अहम भूमिका निभाई। वरिष्ठ नेता जी परमेश्वर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसके बाद विधायकों ने सर्वसम्मति से शिवकुमार को नेता चुन लिया। इस फैसले के बाद पार्टी के भीतर एकता का संदेश देने की कोशिश भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

    बाद में सिद्धारमैया ने शिवकुमार को शुभकामनाएं देते हुए भावुक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन भले ही औपचारिक रूप से पूरा हो गया हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर सिद्धारमैया की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है और पार्टी उन्हें विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

  • एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने संभाला नौसेना प्रमुख का पद, आत्मनिर्भर और आधुनिक नौसेना पर जोर

    एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने संभाला नौसेना प्रमुख का पद, आत्मनिर्भर और आधुनिक नौसेना पर जोर

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना के नेतृत्व में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने 31 मई को नौसेना प्रमुख का पदभार ग्रहण कर लिया। साउथ ब्लॉक परिसर में उन्हें औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया, जिसके साथ ही वे भारतीय नौसेना के 27वें नौसेना प्रमुख बन गए। इस अवसर पर निवर्तमान नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी ने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की और औपचारिक रूप से सेवा से सेवानिवृत्त हुए।

    एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन का नौसैनिक करियर लंबा और विविध अनुभवों से भरपूर रहा है। उन्हें वर्ष 1987 में भारतीय नौसेना में कमीशन प्राप्त हुआ था और वे संचार एवं इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली के विशेषज्ञ माने जाते हैं। अपने सेवा काल में उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, संयुक्त सेवा कमान एवं स्टाफ कॉलेज और कई अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जिससे उनकी रणनीतिक और तकनीकी समझ को और मजबूती मिली है।

    नौसेना प्रमुख का कार्यभार संभालने के बाद अपने पहले संबोधन में एडमिरल स्वामीनाथन ने कहा कि वे इस जिम्मेदारी को विनम्रता, गर्व और कर्तव्य की भावना के साथ स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य लगातार बदल रहा है और अधिक जटिल होता जा रहा है, ऐसे में भारतीय नौसेना की परिचालन तत्परता को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखना उनकी प्राथमिकता होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए नौसेना को हर समय तैयार रहना होगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना पहले से ही आधुनिकीकरण और क्षमता विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है और इस प्रक्रिया को और तेज किया जाएगा। चल रही परियोजनाओं को समय पर पूरा करने, नई तकनीकों को तेजी से अपनाने और स्वदेशी रक्षा उपकरणों के विकास को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उनके अनुसार आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में नौसेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है और आने वाले समय में स्वदेशीकरण को और अधिक प्राथमिकता दी जाएगी।

    एडमिरल स्वामीनाथन ने संयुक्त सैन्य संचालन को मजबूत करने पर भी जोर दिया और कहा कि तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय आज की रणनीतिक जरूरत है। उन्होंने नौसेना कर्मियों की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय नौसेना के अधिकारी, नाविक और महिला कर्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पेशेवरों में शामिल हैं और उनके कल्याण, प्रशिक्षण तथा कार्य वातावरण में सुधार उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी रहेगी।

    अपने संबोधन में उन्होंने निवर्तमान नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश कुमार त्रिपाठी के योगदान को भी याद किया और कहा कि उनके नेतृत्व में नौसेना ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं और एक मजबूत दिशा प्राप्त की। उन्होंने विश्वास जताया कि उनकी विरासत नौसेना को आगे भी प्रेरित करती रहेगी।

    नए नौसेना प्रमुख ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण युद्धपोतों और विमानवाहक पोत की कमान संभाली है, जिससे उन्हें समुद्री संचालन का व्यापक अनुभव प्राप्त हुआ है। उनके नेतृत्व में भारतीय नौसेना से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह न केवल तकनीकी रूप से अधिक उन्नत बनेगी, बल्कि रणनीतिक रूप से भी वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति को और मजबूत करेगी।

  • तंबाकू सेवन में वैश्विक गिरावट के बावजूद किशोरों में वेपिंग बना गंभीर स्वास्थ्य संकट, WHO की रिपोर्ट में चेतावनी

    तंबाकू सेवन में वैश्विक गिरावट के बावजूद किशोरों में वेपिंग बना गंभीर स्वास्थ्य संकट, WHO की रिपोर्ट में चेतावनी

    नई दिल्ली । दुनिया भर में तंबाकू सेवन को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और वैश्विक स्तर पर इसके उपयोग में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इसके साथ ही एक नई और गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। यह चुनौती किशोरों में तेजी से बढ़ती वेपिंग यानी ई-सिगरेट के उपयोग की है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक नया खतरा माना जा रहा है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में तंबाकू उपयोग में उल्लेखनीय कमी आई है और कई देशों में सख्त नीतियों के कारण इसके सेवन पर नियंत्रण पाया गया है। वर्ष 2000 में जहां दुनिया भर में लगभग 1.379 अरब लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते थे, वहीं 2024 तक यह संख्या घटकर लगभग 1.202 अरब रह गई है। यह गिरावट सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है।

    हालांकि इस सकारात्मक तस्वीर के बीच किशोरों में वेपिंग का बढ़ता चलन एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ किशोर, जिनकी उम्र 13 से 15 वर्ष के बीच है, ई-सिगरेट या वेपिंग का उपयोग कर रहे हैं। कई देशों में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया है कि किशोरों में वेपिंग की दर वयस्कों की तुलना में कई गुना अधिक है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ई-सिगरेट और फ्लेवरयुक्त निकोटीन उत्पादों की आसान उपलब्धता ने युवाओं को तेजी से इसकी ओर आकर्षित किया है। इन उत्पादों को अक्सर सुरक्षित विकल्प के रूप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन इनमें मौजूद निकोटीन अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है, जो किशोरों के विकसित हो रहे मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि तंबाकू उद्योग लगातार अपने उत्पादों और विपणन रणनीतियों में बदलाव कर रहा है ताकि नई पीढ़ी को आकर्षित किया जा सके। फ्लेवरयुक्त ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच और अन्य नए उत्पादों के माध्यम से युवाओं को लक्ष्य बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ गंभीर चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

    लिंग और क्षेत्रीय स्तर पर भी तंबाकू उपयोग में विविध रुझान देखे जा रहे हैं। पुरुषों में तंबाकू सेवन अभी भी अधिक है, जबकि महिलाओं में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है, जबकि अफ्रीका और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में तंबाकू उपयोग बढ़ने की आशंका जताई गई है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट किया है कि तंबाकू से हर वर्ष लाखों लोगों की मौत होती है और यह हृदय रोग, कैंसर तथा श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण बना हुआ है। ऐसे में भले ही पारंपरिक तंबाकू उपयोग में गिरावट एक सकारात्मक संकेत हो, लेकिन वेपिंग का बढ़ता चलन इस प्रगति को चुनौती दे रहा है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते किशोरों में वेपिंग की आदत को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। इसी कारण कई देशों में इसके नियमन और जागरूकता अभियानों को और तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

  • सैदुलाजब बिल्डिंग हादसे में एक की मौत, दिल्ली सीएम ने मौके पर पहुंचकर लापरवाही पर सख्त रुख अपनाया

    सैदुलाजब बिल्डिंग हादसे में एक की मौत, दिल्ली सीएम ने मौके पर पहुंचकर लापरवाही पर सख्त रुख अपनाया

    नई दिल्ली । दक्षिण दिल्ली के सैदुलाजब इलाके में हुए दर्दनाक निर्माणाधीन इमारत हादसे के बाद राजधानी में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। घटना के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और राहत एवं बचाव कार्यों की विस्तृत समीक्षा की। इस हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हैं और उनका इलाज अस्पताल में जारी है। घटना के बाद प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई शुरू करते हुए जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी है।

    जानकारी के अनुसार यह हादसा शनिवार शाम उस समय हुआ जब चार मंजिला निर्माणाधीन व्यावसायिक इमारत अचानक भरभराकर गिर गई। इमारत के गिरने से आसपास का इलाका भी प्रभावित हुआ, क्योंकि मलबा पास स्थित एक टीन शेड कैंटीन पर आ गिरा, जहां उस समय लोग मौजूद थे। घटना के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और तत्काल राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल, दिल्ली पुलिस, दमकल विभाग, सिविल डिफेंस और अन्य एजेंसियों ने मिलकर मलबे में फंसे लोगों को निकालने का कार्य शुरू किया।

    मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटनास्थल का दौरा कर अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि राहत कार्यों में किसी भी तरह की देरी या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित विभागों से विस्तृत रिपोर्ट तलब करने और जिम्मेदारी तय करने के आदेश दिए। इसके साथ ही उन्होंने आसपास की जर्जर और खतरनाक इमारतों की तत्काल जांच कराने और आवश्यकता पड़ने पर कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया।

    प्रशासनिक स्तर पर जानकारी दी गई है कि घटना के बाद महरौली पुलिस थाने में मामला दर्ज कर लिया गया है और जिला मजिस्ट्रेट के नेतृत्व में मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए जा रहे हैं। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि निर्माण कार्य में सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था या नहीं और किन परिस्थितियों में इमारत अचानक गिर गई।

    अधिकारियों के अनुसार अब तक मलबे से कुल नौ लोगों को निकाला गया है, जिनमें से कुछ को स्थानीय लोगों की मदद से बाहर निकाला गया, जबकि अन्य को बचाव दलों ने सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। इस हादसे में घायल हुए लोगों का इलाज दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर में चल रहा है, जहां उनकी हालत पर डॉक्टरों की टीम लगातार नजर रख रही है।

    घटना के बाद मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिए कि अनधिकृत निर्माण और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली इमारतों पर सख्त कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा और जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। फिलहाल पूरे इलाके में सुरक्षा और बचाव टीमें तैनात हैं और मलबा हटाने का काम लगातार जारी है।

  • कृषि क्षेत्र में बदलाव की दिशा में बड़ा कदम, 22 राज्यों ने प्राकृतिक खेती को नीतिगत समर्थन दिया

    कृषि क्षेत्र में बदलाव की दिशा में बड़ा कदम, 22 राज्यों ने प्राकृतिक खेती को नीतिगत समर्थन दिया

    नई दिल्ली । देश में कृषि विकास के अगले चरण को नई दिशा देने के उद्देश्य से प्राकृतिक खेती को लेकर व्यापक सहमति बनती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार के अनुसार 22 राज्यों के कृषि मंत्रियों ने न केवल इस पद्धति को नीतिगत स्तर पर समर्थन दिया है, बल्कि किसानों का विश्वास बढ़ाने के लिए इसे अपने-अपने खेतों में अपनाकर व्यावहारिक उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। यह जानकारी राष्ट्रीय राजधानी स्थित पूसा परिसर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन के दौरान सामने आई, जहां देशभर के कृषि मंत्री एक मंच पर एकत्र हुए और कृषि क्षेत्र के भविष्य को लेकर विस्तृत चर्चा की गई।

    सम्मेलन में कृषि सुधार, खरीफ फसलों की तैयारी, दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, उर्वरकों के संतुलित उपयोग तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि कृषि भूमि की रक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की सेहत और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कृषि नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसे टिकाऊ और संतुलित बनाना होना चाहिए।

    केंद्र सरकार ने इस दौरान स्पष्ट किया कि रासायनिक उर्वरकों का पूरी तरह से निषेध सरकार का लक्ष्य नहीं है, बल्कि उनका वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना प्राथमिकता है। इसके लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाने और संस्थागत स्तर पर मजबूत निगरानी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि इस दिशा में एक समन्वित तंत्र विकसित किया जाए, जिससे किसानों तक सही जानकारी और तकनीकी सहायता समय पर पहुंच सके।

    सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्यों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। कई राज्यों ने अपने स्तर पर प्रयोगात्मक रूप से प्राकृतिक खेती को अपनाकर इसके सकारात्मक परिणामों को सामने रखा है, जिससे अन्य राज्यों में भी इस दिशा में रुचि बढ़ी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है तो इससे न केवल उत्पादन लागत कम हो सकती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन भी बेहतर हो सकता है।

    राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन को एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया, जहां केंद्र और राज्यों के बीच कृषि नीतियों को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित हुआ। यहां यह भी तय किया गया कि खरीफ फसलों की योजना अब केवल मौसमी तैयारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे दीर्घकालिक कृषि रणनीति से जोड़ा जाएगा। इसमें दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, कृषि लागत में कमी, उत्पादन क्षमता में वृद्धि और मिट्टी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी।

    कृषि क्षेत्र में इस तरह के समन्वित प्रयासों को विशेषज्ञ एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं, जो भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को एक साथ साधने में मदद कर सकते हैं। सरकार का मानना है कि कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है।

  • कर्नाटक सीएम पद परिवर्तन के बाद सिद्धारमैया की भूमिका पर बड़ा संकेत, कांग्रेस ने सक्रिय राजनीति में बनाए रखने का दिया संदेश

    कर्नाटक सीएम पद परिवर्तन के बाद सिद्धारमैया की भूमिका पर बड़ा संकेत, कांग्रेस ने सक्रिय राजनीति में बनाए रखने का दिया संदेश

    नई दिल्ली । कर्नाटक में सत्ता और संगठन के स्तर पर हुए हालिया नेतृत्व परिवर्तन के बाद राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। लंबे समय से मुख्यमंत्री पद संभाल रहे सिद्धारमैया ने अब औपचारिक रूप से कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी है, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर उनकी आगे की भूमिका को लेकर चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल का बयान सुर्खियों में आ गया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि सिद्धारमैया को पार्टी ‘आराम नहीं करने देगी’ और उन्हें राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यह बयान कांग्रेस की उस रणनीति की ओर संकेत करता है, जिसमें अनुभवी नेताओं को संगठन और चुनावी राजनीति दोनों में लगातार सक्रिय रखने की योजना दिखाई देती है।

    कांग्रेस विधायक दल की बैठक में जब डीके शिवकुमार को औपचारिक रूप से नेता चुना गया, उसी समय पार्टी के भीतर यह संदेश भी देने की कोशिश हुई कि यह बदलाव किसी एक नेता के पीछे हटने का संकेत नहीं है, बल्कि संगठनात्मक पुनर्संरचना का हिस्सा है। केसी वेणुगोपाल ने इस मौके पर सिद्धारमैया की राजनीतिक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है और उनके अनुभव का उपयोग आगे भी किया जाएगा। उनके अनुसार, सिद्धारमैया की राजनीतिक समझ और ओबीसी समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भी उपयोगी साबित हो सकती है।

    सूत्रों के अनुसार, नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के दौरान कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजने और दिल्ली में एक बड़ी जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव भी दिया था। यह प्रस्ताव इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी अपने सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने के लिए अनुभवी नेताओं को अग्रिम पंक्ति में बनाए रखना चाहती है। हालांकि 78 वर्षीय सिद्धारमैया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और उन्होंने कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय रहने की इच्छा जताई।

    विधायक दल की बैठक में खुद सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव रखकर नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया को सहज बनाने में अहम भूमिका निभाई। वरिष्ठ नेता जी परमेश्वर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसके बाद विधायकों ने सर्वसम्मति से शिवकुमार को नेता चुन लिया। इस फैसले के बाद पार्टी के भीतर एकता का संदेश देने की कोशिश भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

    बाद में सिद्धारमैया ने शिवकुमार को शुभकामनाएं देते हुए भावुक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष की बात कही। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन भले ही औपचारिक रूप से पूरा हो गया हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर सिद्धारमैया की भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है और पार्टी उन्हें विभिन्न स्तरों पर सक्रिय रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।