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  • लालकृष्ण आडवाणी की सेहत में हुआ सुधार…. अस्पताल से हुए डिस्चार्ज

    लालकृष्ण आडवाणी की सेहत में हुआ सुधार…. अस्पताल से हुए डिस्चार्ज


    नई दिल्ली।
    भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) को इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल ( Hospital) से डिस्चार्ज (Discharge) कर दिया गया है. अस्पताल प्रशासन की ओर से जारी बयान के अनुसार, 98 वर्षीय वरिष्ठ नेता की सेहत में सुधार हुआ है, इसलिए उन्हें सोमवार को अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है. अस्पताल प्रशासन ने अपने बयान में कहा कि आडवाणी को छाती में संक्रमण के कारण 16 अक्टूबर को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था और राहत मिलने के बाद उन्हें छुट्टी दी जा रही है. आडवाणी न्यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. विनीत सूरी की देखरेख में थे और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।

    पूर्व उपप्रधानमंत्री को 16 अक्टूबर की शाम 7:30 बजे छाती में संक्रमण के चलते इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के पल्मोनरी (फेफड़ों से संबंधित) विभाग में भर्ती कराया गया था।


    दिग्गजों ने जाना हाल

    इससे पहले शनिवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी अस्पताल में आडवाणी से मुलाकात की और उनका हालचाल जाना. ऐसा पहली बार नहीं है जब हाल के महीनों में इस वरिष्ठ नेता को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा है. इससे पहले, इस साल मई में भी उन्हें उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था. तब वे कुछ दिनों तक डॉक्टरों की देखरेख में रहे और फिर उन्हें छुट्टी दे दी गई थी।

    इसके अलावा, दिसंबर 2024 में भी आडवाणी को इलाज और जांच के लिए इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में भर्ती कराया गया था. उनका इलाज एक न्यूरोलॉजिस्ट की देखरेख में हुआ था।


    शानदार सफर

    8 नवंबर 1927 को कराची में जन्मे आडवाणी भाजपा के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक हैं. उन्होंने भाजपा को एक छोटी राजनीतिक ताकत से बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित करने में अहम भूमिका निभाई।

    आडवाणी कई बार भाजपा के अध्यक्ष रहे और उन्होंने पूरे देश में पार्टी के संगठनात्मक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. 1990 में उनकी देशव्यापी ‘राम रथ यात्रा’ भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुई, जिससे भाजपा की राजनीतिक पहुंच का विस्तार हुआ।

    उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में 2002 से 2004 तक भारत के उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया. अपने राजनीतिक करियर के दौरान, उन्होंने गृह मंत्रालय सहित कई महत्वपूर्ण विभागों (पोर्टफोलियो) की जिम्मेदारी भी संभाली. सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को देखते हुए, आडवाणी को 2024 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया।

    इससे पहले, 2015 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया था. आडवाणी भाजपा के एक वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी के राजनीतिक इतिहास का एक अहम हिस्सा रहे हैं।

  • सौरव दास-आशुतोष रांका पर लगी कई धाराएं, जंतर-मंतर प्रदर्शन केस की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी

    सौरव दास-आशुतोष रांका पर लगी कई धाराएं, जंतर-मंतर प्रदर्शन केस की जांच क्राइम ब्रांच को सौंपी


    नई दिल्ली। जंतर-मंतर पर 13 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के मामले में दिल्ली पुलिस ने जांच क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल को सौंप दी है। इस मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के खिलाफ कनॉट प्लेस और संसद मार्ग थानों में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान सरकारी काम में बाधा डाली गई और पुलिसकर्मियों को ड्यूटी करने से रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया।

    जांच ट्रांसफर करने का फैसला दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत दो दिन बढ़ाए जाने के कुछ समय बाद लिया गया। अब मामले से जुड़े आरोपों और घटनाक्रम की आगे की जांच क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल करेगी।

    दोनों एफआईआर में अलग-अलग धाराएं
    कनॉट प्लेस थाने में दर्ज एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223A, 332 और 61(2) लगाई गई हैं। ये धाराएं सरकारी आदेश की अवहेलना, अपराध के इरादे से घर या परिसर में प्रवेश और आपराधिक साजिश से संबंधित हैं।

    वहीं, संसद मार्ग थाने में दर्ज दूसरी एफआईआर में BNS की धारा 221, 115(2), 132, 121(1) और 3(5) शामिल हैं। ये धाराएं सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने, चोट पहुंचाने, ड्यूटी से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल प्रयोग करने और साझा मंशा से जुड़े आरोपों के तहत लगाई गई हैं।

    पुलिस ने प्रदर्शन को लेकर क्या आरोप लगाए?
    दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर इलाके में प्रदर्शन के दौरान CJP के सदस्यों को हिरासत में लिया गया था। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए और राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।

    पुलिस का आरोप है कि प्रदर्शनकारी एक निजी परिसर से होकर जंतर-मंतर में प्रवेश कर रहे थे। बताया गया कि इस परिसर को प्रदर्शन स्थल की अधिसूचित सूची से एक दिन पहले हटा दिया गया था। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को सरकारी काम करने से रोका गया। इन आरोपों की जांच अब क्राइम ब्रांच करेगी।

    दो दिन बढ़ी न्यायिक हिरासत
    सौरव दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर को एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने न्यायिक हिरासत में भेजा था। सोमवार को दोनों को मंदिर मार्ग थाने में नवनियुक्त विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई।

    इस मामले में CJP के एक अन्य सदस्य अजिंक्य शिंदे को पीस बॉन्ड पर रिहा किया गया है। उन्हें छह महीने तक शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखने की शर्त के साथ निजी मुचलके और 5,000 रुपये की जमानत राशि पर छोड़ा गया। फिलहाल, सौरव दास और आशुतोष रांका से जुड़े मामलों की आगे की जांच क्राइम ब्रांच की इंटर स्टेट सेल करेगी।

  • दाऊद की ‘D-कंपनी’ से लॉरेंस की ‘L-कंपनी’ तक: मुंबई अंडरवर्ल्ड का बदला चेहरा, बॉलीवुड फिर निशाने पर

    दाऊद की ‘D-कंपनी’ से लॉरेंस की ‘L-कंपनी’ तक: मुंबई अंडरवर्ल्ड का बदला चेहरा, बॉलीवुड फिर निशाने पर


    नई दिल्ली। एक दौर था, जब मुंबई की फिल्मी दुनिया में किसी बड़े प्रोजेक्ट की चर्चा के साथ अंडरवर्ल्ड का नाम भी जुड़ जाता था। निर्माता हों, बिल्डर हों, कारोबारी हों या बड़े फिल्मी सितारे—गैंगस्टरों की धमकियों और रंगदारी की खबरें लोगों को दहशत में डाल देती थीं। 1980 और 1990 के दशक में करीम लाला, हाजी मस्तान और वरदराजन मुदलियार जैसे नामों के बाद दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी का दबदबा चर्चा में आया। वक्त बदला, शहर का नाम बॉम्बे से मुंबई हो गया, लेकिन संगठित अपराध की चुनौती खत्म नहीं हुई।

    1990 के दशक में दाऊद का नेटवर्क तस्करी और अवैध कारोबार से आगे बढ़कर रंगदारी, सुपारी लेकर हत्या, जमीनों पर कब्जे और फिल्म इंडस्ट्री में कथित दखल तक पहुंच गया था। 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के बाद पुलिस ने अंडरवर्ल्ड के खिलाफ कार्रवाई तेज की। कई गैंगस्टर देश छोड़कर चले गए, कुछ गिरफ्तार हुए और पुराने नेटवर्क कमजोर पड़ने लगे। इसके बावजूद संगठित अपराध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसके तरीके और नेटवर्क बदलते रहे।

    अब मुंबई में फिल्मी हस्तियों को धमकियां देने, कथित रंगदारी मांगने और गोलीबारी की घटनाओं में लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम सामने आने से एक बार फिर अंडरवर्ल्ड की चर्चा तेज है। सलमान खान के घर के बाहर फायरिंग, बाबा सिद्दीकी की हत्या और फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के घर के बाहर गोलीबारी जैसी घटनाओं ने बॉलीवुड की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दाऊद की डी-कंपनी के बाद मुंबई में लॉरेंस बिश्नोई की ‘एल-कंपनी’ का दौर शुरू हो रहा है?

    जब डी-कंपनी के नाम से कांपती थी फिल्म इंडस्ट्री
    1990 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड के रिश्ते लगातार सुर्खियों में रहते थे। दाऊद इब्राहिम और उसके गिरोह पर फिल्म निर्माताओं तथा कारोबारियों को धमकाने, रंगदारी मांगने और फिल्म व्यवसाय में दखल देने के आरोप लगते रहे। उस दौर में छोटा राजन, छोटा शकील और अबू सलेम जैसे नाम भी अंडरवर्ल्ड की चर्चाओं में प्रमुखता से सामने आते थे।

    फिल्म उद्योग में बढ़ते कारोबार और विदेशों में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता के बीच फिल्म फाइनेंस तथा वितरण अधिकार भी गैंगस्टरों की दिलचस्पी का विषय बने। आरोप लगते रहे कि डी-कंपनी से जुड़े लोग फिल्मों में पैसा लगाने के साथ-साथ निर्माताओं पर दबाव बनाते थे। कुछ मामलों में कलाकारों के चयन और फिल्मों के कारोबार को प्रभावित करने की कोशिशों की भी चर्चा हुई।

    हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि उस दौर में हर फिल्म की कास्टिंग, निर्माण या रिलीज पर डी-कंपनी का नियंत्रण था। लेकिन कई चर्चित घटनाओं ने यह जरूर दिखाया कि आपराधिक गिरोह फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को निशाना बनाने और उनके कारोबार पर दबाव डालने की कोशिश कर रहे थे।

    1993 के बम धमाकों के बाद दाऊद भारत छोड़ चुका था, लेकिन उसके नेटवर्क और सहयोगियों को लेकर पुलिस की जांच जारी रही। उसके गिरोह पर रंगदारी, धमकियों और फिल्म कारोबार में कथित हस्तक्षेप के आरोप लगते रहे।

    गुलशन कुमार की हत्या से राकेश रोशन पर हमले तक
    बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड के खौफ की चर्चा के बीच कई ऐसी वारदातें हुईं, जिन्होंने फिल्मी दुनिया की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा की।

    12 अगस्त 1997 को टी-सीरीज के संस्थापक और संगीत कारोबारी गुलशन कुमार की मुंबई के अंधेरी इलाके में गोली मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले मार्च 1997 में फिल्म निर्माता मुकेश दुग्गल की हत्या हुई थी और जुलाई में निर्देशक राजीव राय पर हमला किया गया था। जनवरी 2000 में फिल्म निर्माता-निर्देशक राकेश रोशन को उनके कार्यालय के बाहर गोली मारी गई, हालांकि वह बच गए।

    इन घटनाओं में अलग-अलग आपराधिक गिरोहों के नाम और उनकी कथित भूमिका चर्चा में आई। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि फिल्म इंडस्ट्री के सामने खतरा केवल एक गिरोह तक सीमित नहीं था। कई आपराधिक नेटवर्क अपने प्रभाव और वसूली के लिए फिल्मी हस्तियों तथा कारोबारियों को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे थे।

    1990 के दशक के अंत और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई, गिरफ्तारियों तथा कई प्रमुख अपराधियों के देश से बाहर चले जाने या जेल में बंद होने के कारण पुराने गिरोहों के लिए पहले की तरह खुले तौर पर काम करना कठिन हुआ। फिल्म निर्माण और फाइनेंस के औपचारिक ढांचे में भी बदलाव आया। इसके बावजूद संगठित अपराध की गतिविधियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं।

    छात्र राजनीति से अपराध की दुनिया तक पहुंचा लॉरेंस बिश्नोई
    पुराने अंडरवर्ल्ड नेटवर्क कमजोर पड़ने के बाद उत्तर भारत में सक्रिय नए गैंगस्टरों के नाम सामने आने लगे। इनमें लॉरेंस बिश्नोई और उसके सहयोगी गोल्डी बराड़ का नेटवर्क प्रमुखता से चर्चा में आया।

    लॉरेंस बिश्नोई ने पंजाब में छात्र राजनीति के दौरान अपनी पहचान बनाई। वह पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्र संगठन एसओपीयू से जुड़ा था। छात्र चुनावों और स्थानीय रंजिशों के बीच उसके खिलाफ मारपीट, धमकी और अन्य आपराधिक मामलों में कार्रवाई हुई। समय के साथ उसके संपर्क दूसरे अपराधियों से बढ़े और उसका नेटवर्क जेलों के भीतर तथा बाहर सक्रिय सहयोगियों तक फैलता गया।

    संपत नेहरा भी उसके नेटवर्क से जुड़ा प्रमुख नाम बना। नेहरा का नाम 2018 में सलमान खान को निशाना बनाने की कथित योजना के सिलसिले में सामने आया था। इससे पहले पंजाब और हरियाणा में स्थानीय चुनावों तथा आपसी रंजिशों से जुड़े हिंसक मामलों में भी उसका नाम चर्चा में रहा।

    लॉरेंस लंबे समय से जेल में बंद रहने के बावजूद अपने सहयोगियों के जरिए नेटवर्क संचालित करने के आरोपों के कारण सुर्खियों में रहा है। गोल्डी बराड़, काला जठेड़ी, रोहित गोदारा और अनमोल बिश्नोई जैसे नाम उसके नेटवर्क से जुड़े मामलों में सामने आते रहे हैं। जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस नेटवर्क का विस्तार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली समेत कई राज्यों तक रहा है।

    इस गिरोह पर कारोबारियों और अन्य लोगों से रंगदारी मांगने, धमकियां देने, हथियारों से जुड़े अपराधों तथा हत्या की साजिशों में शामिल होने के आरोप हैं। हालांकि, अलग-अलग मामलों में आरोपों और उनकी कानूनी स्थिति का आकलन संबंधित जांच और अदालत की कार्यवाही के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

    साबरमती जेल में बंद, फिर भी नेटवर्क पर सवाल
    लॉरेंस बिश्नोई अगस्त 2023 से गुजरात की अहमदाबाद स्थित साबरमती सेंट्रल जेल में बंद है। उसकी जेल से आवाजाही पर प्रतिबंधों और सुरक्षा व्यवस्था के कारण उसे लेकर कई मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी की खबरें सामने आती रही हैं।

    जेल में बंद होने के बावजूद उसके नाम से जुड़ी धमकियों और हिंसक वारदातों के मामलों ने जांच एजेंसियों के सामने यह सवाल खड़ा किया है कि उसके सहयोगियों का नेटवर्क किस तरह काम करता है और कथित अपराधों में निर्देश या जिम्मेदारी तय करने के लिए क्या सबूत उपलब्ध हैं। किसी घटना में गिरोह का नाम सामने आना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जेल में बंद सरगना ने ही उसका निर्देश दिया था; इसके लिए जांच और न्यायिक प्रक्रिया अहम है।

    सलमान खान के घर पर फायरिंग से बाबा सिद्दीकी की हत्या तक
    लॉरेंस बिश्नोई गैंग का नाम बॉलीवुड में खास तौर पर सलमान खान को निशाना बनाए जाने के मामलों के बाद चर्चा में आया। 14 अप्रैल 2024 को मुंबई के बांद्रा इलाके में सलमान खान के घर के बाहर बाइक सवार हमलावरों ने गोलियां चलाई थीं। मुंबई पुलिस ने मामले में गिरोह से कथित संबंध रखने वाले कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की और आरोपपत्र दाखिल किया।

    इसके बाद अक्टूबर 2024 में पूर्व मंत्री और एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या कर दी गई। इस मामले की जांच में सलमान खान से उनकी करीबी को संभावित कारण के तौर पर सामने रखा गया। पुलिस की जांच और आरोपपत्र में इस पहलू का उल्लेख किए जाने की खबरें आईं। हालांकि, किसी भी आरोपी की भूमिका का अंतिम निर्धारण अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर होगा।

    इन घटनाओं ने फिल्मी हस्तियों के साथ-साथ उनसे जुड़े लोगों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ाई। इसके बाद सलमान खान और उनके आसपास के लोगों को धमकियों से जुड़े मामलों में सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया।

    रोहित शेट्टी से टाइगर श्रॉफ तक, गोलीबारी की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
    फरवरी 2026 में फिल्म निर्देशक रोहित शेट्टी के जुहू स्थित घर के बाहर गोलीबारी की घटना सामने आई। इस मामले में पुलिस ने लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े होने के आरोप में कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई की और आरोपपत्र दाखिल किए जाने की खबरें आईं।

    इसके बाद 18 अक्टूबर 2026 को अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार को मुंबई के जुहू इलाके में निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक, कार पर गोलियां चलाई गईं और अभिनेता इस घटना में सुरक्षित रहे। इस वारदात के बाद एक बार फिर सवाल उठा कि क्या फिल्मी हस्तियों को निशाना बनाकर कोई गिरोह मुंबई में अपनी मौजूदगी और दबदबा स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

    इन घटनाओं की जांच में आरोपियों के संबंध, हमले के पीछे संभावित मकसद और कथित जिम्मेदारी जैसे पहलू महत्वपूर्ण हैं। किसी गिरोह के नाम का इस्तेमाल करके डर पैदा करना और वास्तव में पूरे शहर या फिल्म इंडस्ट्री पर नियंत्रण स्थापित करना दो अलग-अलग बातें हैं।

    डी-कंपनी और एल-कंपनी: क्या हैं दोनों के बीच अंतर?
    डी-कंपनी के दौर में अंडरवर्ल्ड के प्रभाव की चर्चा तस्करी, रंगदारी, फिल्म फाइनेंस, विदेशों में वितरण अधिकार और फिल्मी हस्तियों पर दबाव बनाने के संदर्भ में होती थी। दाऊद के नेटवर्क को लेकर कई मामलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जांच हुई।

    इसके मुकाबले लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े हालिया मामलों में धमकी भरे संदेश, कथित वसूली की मांग, गोलीबारी और सोशल मीडिया पर हमलों की जिम्मेदारी लेने जैसे तरीके चर्चा में आए हैं। डिजिटल माध्यमों और अलग-अलग राज्यों में फैले सहयोगियों के कारण ऐसे नेटवर्क की जांच में पुलिस को नए तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

    दोनों दौर में रंगदारी, धमकी और हिंसा जैसे कुछ समान तत्व जरूर दिखाई देते हैं। लेकिन उनके नेटवर्क, वित्तीय ढांचे, काम करने के तरीके और वास्तविक प्रभाव की तुलना करने के लिए ठोस जांच संबंधी आंकड़ों तथा मामलों के दस्तावेजों की जरूरत है। केवल चर्चित घटनाओं के आधार पर दोनों गिरोहों की ताकत या नियंत्रण को एक समान नहीं माना जा सकता।

    क्या मुंबई में सचमुच ‘एल-कंपनी’ का दौर है?
    मुंबई में लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े मामलों ने संगठित अपराध और बॉलीवुड की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। फिर भी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इस गिरोह ने पूरे मुंबई शहर या फिल्म इंडस्ट्री पर डी-कंपनी जैसी पकड़ बना ली है।

    मुंबई पुलिस के आंकड़ों पर आधारित फरवरी 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शहर में 2025 के दौरान रंगदारी के 314 मामले दर्ज हुए, जबकि 2024 में यह संख्या 199 थी। रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से यह भी कहा गया कि रंगदारी के सभी मामलों को बड़े आपराधिक गिरोहों से जोड़ना सही नहीं होगा; इनमें स्थानीय बदमाशों और अन्य प्रकार की वसूली से जुड़े मामले भी हो सकते हैं।

    इसलिए ‘एल-कंपनी का दौर’ फिलहाल मुंबई में लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़े मामलों की बढ़ती चर्चा और फिल्मी हस्तियों को मिल रही धमकियों को समझाने वाला एक रूपक है, न कि पूरे शहर पर उसके नियंत्रण का प्रमाण।

    मुंबई के अंडरवर्ल्ड की कहानी में नाम बदले हैं, नेटवर्क बदले हैं और अपराध के तरीके भी बदले हैं। लेकिन किसी गिरोह की वास्तविक ताकत का आकलन सुर्खियों या दावों से नहीं, बल्कि उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों, पुलिस की जांच और अदालत में साबित तथ्यों से किया जाना चाहिए।

  • दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय

    दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय


    नई दिल्ली ।
    दशहरा यानी विजयादशमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में दशहरे की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस बना हुआ है। कुछ लोग 20 अक्टूबर को त्योहार मनाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इसकी वजह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का दो दिनों तक रहना है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जबकि पश्चिम बंगाल में स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को विजयादशमी का उत्सव होगा।

    हिंदू पंचांग के अनुसार, नई दिल्ली में दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। इसी वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में त्योहार मनाने की तारीख में अंतर देखने को मिल रहा है। दिल्ली और उत्तर भारत के कई हिस्सों में 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। इस अवसर पर सिंदूर खेला जैसी पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं।

    विजयादशमी 2026 का शुभ मुहूर्त
    दशहरे के दिन विजय मुहूर्त में पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दौरान लोग अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवान श्रीराम, मां दुर्गा और शस्त्रों की पूजा करते हैं। नई दिल्ली में 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में पूजा और अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

    वहीं, अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 3 बजकर 37 मिनट तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग के आधार पर मुहूर्त में अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करने से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

    दशहरे पर रावण दहन कब होगा?
    उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर 20 अक्टूबर की शाम को रामलीला के समापन के बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। इस परंपरा को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आमतौर पर रावण दहन सूर्यास्त के बाद किया जाता है, लेकिन इसके लिए पूरे देश में एक समान समय निर्धारित नहीं है।

    अलग-अलग शहरों में रामलीला समितियां और स्थानीय आयोजक अपने कार्यक्रम के अनुसार रावण दहन का समय तय करते हैं। ऐसे में आयोजन में शामिल होने वाले लोगों को अपने शहर की रामलीला या संबंधित समिति से समय की जानकारी लेनी चाहिए।

    क्यों मनाया जाता है दशहरा?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इसी विजय की स्मृति में दशहरे पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। यह पर्व लोगों को सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

    दशहरे का संबंध मां दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से भी है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर उसके अत्याचारों से संसार को मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण विजयादशमी को शक्ति, साहस और अन्याय पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को स्थानीय रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।

    शस्त्र पूजन और शमी पूजा का महत्व

    दशहरे पर शस्त्र पूजन और शमी वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई जगहों पर लोग अपने वाहनों, औजारों, मशीनों और कामकाज में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन बही-खातों और कारोबार से जुड़ी वस्तुओं का पूजन करता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, विजयादशमी पर शुभ कार्यों की शुरुआत करना सफलता और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। हालांकि, पूजा की विधि, मुहूर्त और त्योहार मनाने के तरीके अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए दशहरे की तैयारी करते समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों का ध्यान रखना चाहिए।

  • अहमदाबाद में नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं गरबा, 200 साल पुरानी परंपरा के पीछे है साडू माता के बलिदान की कहानी

    अहमदाबाद में नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं गरबा, 200 साल पुरानी परंपरा के पीछे है साडू माता के बलिदान की कहानी

    नई दिल्ली । गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा और देवी की आराधना का विशेष महत्व है। इस उत्सव के बीच अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो अपनी अनूठी पहचान के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। यहां नवरात्रि की आठवीं रात बारोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाकर होने वाला यह आयोजन करीब 200 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस रस्म का संबंध साडू माता के बलिदान और उनकी रक्षा नहीं कर पाने के बाद समुदाय द्वारा किए गए प्रायश्चित से है।

    शाहपुर की साडू माता नी पोल में हर साल नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष एकत्र होते हैं और पारंपरिक तरीके से गरबा करते हैं। इस आयोजन में बारोट समुदाय के लोगों के साथ दूसरे समुदायों के लोग भी भाग लेते हैं। इस वर्ष भी कम से कम 40 पुरुष इस परंपरा में शामिल हुए। इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी मौजूद थे। यह आयोजन अलग-अलग समुदायों की भागीदारी के साथ परंपरा के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाता है।

    60 वर्षीय सतीश बारोट ने बताया कि वह 40 साल से अधिक समय से इस रस्म का हिस्सा बनते आ रहे हैं। वहीं, सुरेंद्रनगर से पिंटू बारोट अपने परिवार के साथ इस आयोजन में शामिल होने पहुंचे। उनके 10 वर्षीय बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस परंपरा में भाग लिया। इस तरह परिवार की नई पीढ़ी भी इस पुरानी रस्म से जुड़ रही है।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत लगभग 200 साल पहले हुई एक घटना से जुड़ी है। मान्यता है कि बारोट समुदाय की साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। उस समय के शासक ने उन्हें दरबार में पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश को पूरा कराने के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी गई थी।

    स्थानीय मान्यता के अनुसार, समुदाय के लोगों ने साडू माता को उनकी इच्छा के विरुद्ध दरबार ले जाने का विरोध किया। इस दौरान सैनिकों और समुदाय के लोगों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। बताया जाता है कि खतरा बढ़ने पर साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली। इसके बाद उन्होंने अपने पति हाथीसिंह बारोट से कहा कि उन्हें शाही दरबार में ले जाने देने के बजाय तलवार के एक वार से उनकी जान ले लें। मान्यता के अनुसार, इसके बाद साडू माता की मृत्यु हो गई।

    इस घटना के बाद समुदाय के लोगों को गहरा पछतावा हुआ कि वे साडू माता की रक्षा नहीं कर सके। स्थानीय विश्वास के मुताबिक, उनकी मृत्यु के बाद समुदाय के परिवारों पर श्राप लगने की आशंका जताई जाने लगी। लोगों का दावा था कि परिवारों में पुरुषों की मौतें होने लगीं और वंश को आगे बढ़ाने में कठिनाइयां आने लगीं।

    इसके बाद समुदाय के लोग साडू माता के स्मारक पर एकत्र हुए। उन्होंने अपनी गलती के लिए प्रायश्चित किया और परिवारों की खुशहाली तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रार्थना की। इसी दौरान पुरुषों ने साडू माता से जुड़े वस्त्र पहनने का संकल्प लिया। समुदाय का विश्वास है कि प्रार्थनाओं के बाद परिवारों की वंश-परंपरा फिर आगे बढ़ने लगी। समय के साथ साड़ी पहनकर गरबा करने की यह रस्म नवरात्रि की आठवीं रात की स्थायी परंपरा बन गई।

    आज इस आयोजन में शामिल होने वाले पुरुष इसे केवल नृत्य या धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति, कृतज्ञता और सामूहिक प्रायश्चित के प्रतीक के रूप में देखते हैं। अहमदाबाद के शाहपुर में निभाई जाने वाली यह परंपरा गुजरात के नवरात्रि उत्सव की विविधता और स्थानीय लोकविश्वासों से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को सामने लाती है।

  • महाराष्ट्र के लातूर में युवक को निर्वस्त्र कर बेल्ट से पीटा, निजी अंगों पर पेट्रोल डालने के आरोप से मचा हड़कंप

    महाराष्ट्र के लातूर में युवक को निर्वस्त्र कर बेल्ट से पीटा, निजी अंगों पर पेट्रोल डालने के आरोप से मचा हड़कंप

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र के लातूर में एक युवक के साथ बर्बरता से मारपीट करने का मामला सामने आया है। युवक को निर्वस्त्र कर बेल्ट से पीटा गया और उसके निजी अंगों पर पेट्रोल डालकर हमला किया गया। घटना का वीडियो हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, यह घटना करीब दो महीने पुरानी है।

    सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में कुछ लोग एक युवक को घेरकर उसके साथ मारपीट करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में युवक के कपड़े उतारकर उसे बेल्ट से पीटते हुए देखा जा सकता है। हमलावर उस पर लात-घूंसे भी बरसाते नजर आ रहे हैं। आरोप है कि मारपीट के दौरान युवक के निजी अंगों पर पेट्रोल भी डाला गया। घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने वीडियो सामने आने के बाद मामले की पड़ताल शुरू कर दी है।

    बताया जा रहा है कि हमलावरों ने मारपीट की पूरी घटना को मोबाइल फोन से रिकॉर्ड किया था। इसके बाद वीडियो को सोशल मीडिया समूहों में साझा कर दिया गया, जहां से यह फैलता हुआ लोगों तक पहुंचा। वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस का ध्यान इस घटना की ओर गया और जांच की प्रक्रिया शुरू की गई।

    प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि युवक के साथ हुई यह घटना लगभग दो महीने पहले की है। मारपीट और हमले के बाद पीड़ित युवक कथित तौर पर उस जगह को छोड़कर चला गया था। घटना के बाद उसने पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। अब वीडियो सामने आने के बाद पुलिस उसकी पहचान कर उससे संपर्क करने की कोशिश कर रही है, ताकि मामले से जुड़ी जानकारी जुटाई जा सके।

    एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार, वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। अधिकारी ने बताया कि पीड़ित युवक की पहचान कर ली गई है और उसे अपना बयान दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन आने को कहा गया है। पुलिस का मानना है कि पीड़ित का बयान दर्ज होने के बाद घटना से जुड़ी परिस्थितियों और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने में मदद मिलेगी।

    फिलहाल पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि युवक पर हमला किस वजह से किया गया था। इसके साथ ही उन लोगों की पहचान करने का प्रयास किया जा रहा है, जो कथित तौर पर मारपीट में शामिल थे। पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि घटना का वीडियो रिकॉर्ड करने और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने में किन लोगों की भूमिका रही।

    इस मामले में अभी तक पीड़ित की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। ऐसे में पुलिस की जांच में उसका बयान अहम माना जा रहा है। बयान दर्ज होने के बाद ही हमले की वजह, घटनाक्रम और इसमें शामिल लोगों के संबंध में अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी। फिलहाल पुलिस वायरल वीडियो और उपलब्ध शुरुआती जानकारी के आधार पर मामले की जांच कर रही है।

  • गुजरात के राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव की भव्यता, सोने के आभूषण पहनकर हजारों महिलाओं ने किया पारंपरिक रास-गरबा

    गुजरात के राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव की भव्यता, सोने के आभूषण पहनकर हजारों महिलाओं ने किया पारंपरिक रास-गरबा


    नई दिल्ली ।
    गुजरात में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्ति, शक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं के विविध रंग देखने को मिल रहे हैं। कहीं पारंपरिक गरबा लोगों को आकर्षित कर रहा है, तो कहीं समाज की पुरानी परंपराएं विशेष आयोजनों के माध्यम से जीवंत नजर आ रही हैं। इसी बीच राजकोट में आयोजित अहीर गरबा महोत्सव ने अपने भव्य आयोजन और पारंपरिक अंदाज के कारण लोगों का ध्यान खींचा। यहां 15 हजार से ज्यादा महिलाओं ने करीब 900 किलो सोने के आभूषण पहनकर पारंपरिक रास-गरबा में हिस्सा लिया। इन आभूषणों की अनुमानित कीमत 1300 करोड़ रुपये से भी अधिक बताई गई है।

    सोने के आभूषणों से सजी महिलाओं की बड़ी संख्या और पारंपरिक नृत्य ने गरबा मैदान को विशेष रूप दे दिया। इस आयोजन में महिलाओं ने अपने पारंपरिक परिधानों के साथ सोने के हार, कंगन और अन्य आभूषण पहने। एक साथ बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने अहीर समाज की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक उत्सव की भव्यता को प्रदर्शित किया।

    राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव का आयोजन
    राजकोट में अहीर सेना की ओर से अहीर गरबा महोत्सव आयोजित किया गया है। इस महोत्सव में अहीर समाज के भाई-बहन लगातार नौ दिनों तक पारंपरिक अंदाज में गरबा कर रहे हैं। नवरात्र के दौरान अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को उत्सव के माध्यम से प्रदर्शित करना इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है। इसी वजह से महोत्सव में समाज के लोगों का खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

    आयोजन में पारंपरिक रास-गरबा के साथ अहीर समाज की सांस्कृतिक विरासत को भी प्रमुखता दी गई। नवरात्र के सातवें दिन बड़ी संख्या में महिलाएं अपने पारंपरिक परिधानों और सोने के आभूषणों से सजकर गरबा मैदान में पहुंचीं। इसके बाद सामूहिक रूप से पारंपरिक रास-गरबा किया गया। हजारों महिलाओं की एक साथ भागीदारी इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही।

    900 किलो सोने के आभूषणों ने खींचा ध्यान
    इस महोत्सव की सबसे खास बात महिलाओं द्वारा पहने गए सोने के आभूषण रहे। करीब 900 किलो सोने के गहनों की अनुमानित कीमत 1300 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों के साथ सोने के हार, कंगन और अन्य आभूषण पहने, जिससे आयोजन की भव्यता और बढ़ गई।

    करीब 15 हजार अहीराणियों की एक साथ मौजूदगी ने इस सांस्कृतिक आयोजन को विशेष पहचान दी। आभूषणों की चमक के साथ पारंपरिक वेशभूषा ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस आयोजन में सोने के गहने केवल सजावट का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि अहीर समाज की पारंपरिक संस्कृति और उत्सव की विशिष्टता को प्रदर्शित करने का माध्यम भी बने।

    सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना गरबा
    अहीर गरबा महोत्सव में पारंपरिक रास खेलने की शैली भी आकर्षण का केंद्र रही। यहां गरबा केवल नृत्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज की एकता, सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से जुड़े रहने का प्रतीक बनकर सामने आया। नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में समाज के भाई-बहन पारंपरिक तरीके से भाग ले रहे हैं।

    शारदीय नवरात्र के दौरान आयोजित यह महोत्सव गुजरात की सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक उत्सवों की विशेषता को सामने लाता है। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी, पारंपरिक परिधान, सोने के आभूषण और सामूहिक रास-गरबा ने राजकोट के इस आयोजन को खास बना दिया।

  • मुनीर की नई साजिश! PoK में फिर सक्रिय हुए आतंकी कैंप, सफेद वर्दी पहनकर घुसे दो पाकिस्तानी आतंकी ढेर

    मुनीर की नई साजिश! PoK में फिर सक्रिय हुए आतंकी कैंप, सफेद वर्दी पहनकर घुसे दो पाकिस्तानी आतंकी ढेर

    नई दिल्ली । उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में नियंत्रण रेखा (LoC) के पास घुसपैठ की कोशिश को भारतीय सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया। केरन सेक्टर के जुमगुंड इलाके में चार संदिग्ध आतंकियों की गतिविधि सामने आने के बाद सुरक्षाबलों ने कार्रवाई की, जिसमें दो पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिराया गया। बाकी दो संदिग्धों की तलाश के लिए इलाके में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। यह घटना शनिवार, 17 अक्टूबर को हुई। सुरक्षाबलों की सतर्कता के चलते घुसपैठ की कोशिश कर रहे संदिग्ध सीमा पार कर भारतीय क्षेत्र में दाखिल होने में सफल नहीं हो सके।

    जुमगुंड इलाके में तड़के करीब तीन बजे तीन से चार संदिग्धों की हलचल देखी गई थी। इसके बाद सुरक्षाबलों ने तत्काल कार्रवाई की। मुठभेड़ के दौरान दो आतंकियों को मार गिराया गया, जबकि अन्य दो की तलाश जारी है। पूरे क्षेत्र में तलाशी अभियान चलाया जा रहा है, ताकि छिपे हुए संदिग्धों का पता लगाया जा सके और घुसपैठ की किसी भी अन्य कोशिश को रोका जा सके।

    इस घटना के बाद नियंत्रण रेखा से सटे संवेदनशील इलाकों में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पहाड़ी क्षेत्र में बर्फबारी शुरू होने के साथ ही घुसपैठ की आशंका को देखते हुए सुरक्षाबलों ने अपनी चौकसी बढ़ा दी है। ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां सुरक्षा बलों के सामने चुनौती पेश करती हैं। ऐसे में संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना और सीमा पर निगरानी बनाए रखना महत्वपूर्ण हो जाता है।

    जुमगुंड में घुसपैठ की कोशिश के दौरान आतंकियों ने बर्फ में छिपने के लिए सफेद रंग की वर्दी पहन रखी थी। इसे स्नो कैमफ्लेज कहा जाता है। इस तरह की वर्दी का इस्तेमाल बर्फ से ढके क्षेत्रों में तैनात सैनिक करते हैं। सफेद रंग होने के कारण यह बर्फीले वातावरण में आसानी से घुलमिल जाती है और दूर से व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल बना सकती है। इसके साथ ही यह वर्दी अत्यधिक ठंड से बचाव में भी मदद करती है।

    बर्फबारी के बाद जुमगुंड का ऊंचाई वाला इलाका बर्फ से ढक गया था। माना जा रहा है कि संदिग्धों ने इसी परिस्थिति का फायदा उठाकर घुसपैठ की कोशिश की। हालांकि, सुरक्षाबलों की सतर्कता के कारण उनकी योजना सफल नहीं हो सकी। मुठभेड़ के बाद शेष संदिग्धों की तलाश जारी है। तलाशी अभियान के दौरान इलाके की निगरानी की जा रही है, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि को नजरअंदाज न किया जाए।

    इस बीच, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों और प्रशिक्षण शिविरों को दोबारा सक्रिय किए जाने की आशंका भी सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत की सर्जिकल स्ट्राइक और हवाई हमलों में नष्ट किए गए कुछ आतंकवादी शिविरों को फिर से सक्रिय किया गया है। इन शिविरों में 100 से अधिक आतंकियों को प्रशिक्षण दिए जाने की बात कही गई है। प्रशिक्षण पूरा कर चुके आतंकियों को भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कराने की कोशिश किए जाने की आशंका जताई गई है।

    घुसपैठ और संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए पुंछ, राजौरी, कुपवाड़ा, उरी, गुरेज, केरन, माछेल और तंगधार जैसे क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई गई है। नियंत्रण रेखा के साथ-साथ भीतरी इलाकों, कस्बों और शहरों में भी निगरानी तथा जांच तेज की गई है। सुरक्षाबलों का उद्देश्य आतंकियों और उनके मददगारों की पहचान कर उनकी गतिविधियों पर रोक लगाना है। जुमगुंड में मारे गए दो आतंकियों के बाद शेष संदिग्धों की तलाश जारी रहने के कारण सुरक्षा बल पूरे इलाके में सतर्क हैं।

  • इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !

    इथेनॉल पर सरकार का अहम फैसला… पेट्रोल में मिश्रण पर फिलहाल रोक !


    नई दिल्ली।
    सरकार (Government) ने घरेलू स्तर पर चीनी (Sugar) की उपलब्धता बनाए रखने के लिए गन्ने के उत्पादों से बने इथेनॉल के पेट्रोल में मिश्रण (Petrol Sugarcane-Ethanol Blending) पर फिलहाल रोक लगाने का फैसला किया है। इसके तहत, सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम विपणन कंपनियों ने पेट्रोल में इथेनॉल (Ethanol Blending) मिलाने के लिए 2026-27 आपूर्ति वर्ष की ताजा खरीद निविदा में गन्ने के रस, चीनी की चाशनी और बी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल को शामिल नहीं किया है।


    कितना इथेनॉल खरीदने की तैयारी, क्या पेट्रोल में भी मिश्रण?

    भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने 16 अक्तूबर को पेट्रोलियम विपणन कंपनियों की ओर से जारी निविदा में नवंबर से शुरू होने वाले आपूर्ति वर्ष के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के लिए बोलियां मांगी हैं। इसका उद्देश्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने की जरूरत को पूरा करना है।


    मक्के से बने इथेनॉल पर क्या फैसला हुआ?

    निविदा के अनुसार, मक्का, टूटे चावल, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा खरीदे गए अधिशेष चावल और सी-हेवी शीरे से बने इथेनॉल की आपूर्ति के लिए बोलियां लगाई जा सकती हैं। निविदा में मक्के से बने इथेनॉल पर प्रोत्साहन राशि भी घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है, जो पहले 71.86 रुपये प्रति लीटर थी।


    कच्चे माल की खरीद की रणनीति में क्या बदलाव?

    गन्ने उत्पादों से बने इथेनॉल की खरीद पर पाबंदी से पेट्रोल मिश्रण कार्यक्रम के लिए कच्चे माल की खरीद की रणनीति में बदलाव होगा। इस कार्यक्रम में कच्चे तेल के आयात को कम करने व वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में कटौती के लिए अनाज व गन्ने दोनों से बने इथेनॉल का इस्तेमाल किया जाता रहा है।


    क्या गन्ने का उत्पादन हो सकता है प्रभावित?

    सरकार की तरफ से यह कदम घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच उठाया गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक सहित प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में कम बारिश के कारण उत्पादन घटने और कीमतें बढ़ने का जोखिम पैदा हुआ है।

  • सौरभ दास और आशुतोष रांका की जमानत में देरी पर विवाद, पुलिस ने आरोप नकारे, गलत बॉन्ड जमा करने की बात कही

    सौरभ दास और आशुतोष रांका की जमानत में देरी पर विवाद, पुलिस ने आरोप नकारे, गलत बॉन्ड जमा करने की बात कही


    नई दिल्ली ।
    सौरभ दास और आशुतोष रांका की जमानत प्रक्रिया में देरी को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और दिल्ली पुलिस के बीच विवाद सामने आया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि उसके दोनों नेताओं की रिहाई की प्रक्रिया जानबूझकर धीमी की गई और चार जमानतदारों की गारंटी बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज कर दी गई। पार्टी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट पर भी निर्धारित समय पर नहीं पहुंचने और सुनवाई नहीं करने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जमानत के लिए गलत बॉन्ड जमा किए जा रहे थे, जिन्हें स्वीकार करना संभव नहीं था। पुलिस के मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।

    सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह के अनुसार, वह सुबह 11 बजे से मंदिर मार्ग थाने में मौजूद थीं। उन्हें बताया गया था कि जमानत से संबंधित सुनवाई दोपहर 12 बजे होगी। उनका दावा है कि जमानत की लगभग सभी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं, लेकिन विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट शाम 4 बजकर 42 मिनट तक थाने नहीं पहुंचे थे। उन्होंने यह भी कहा कि शाम 5 बजे तक मजिस्ट्रेट अदालत कक्ष में नहीं आए और वहां पहुंचने के बाद भी जमानत के मामले पर सुनवाई नहीं की गई।

    रत्ना सिंह ने प्रक्रिया में देरी को लेकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सरकारी वकील पिछले चार दिनों से उपस्थित नहीं हो रहे थे, लेकिन संबंधित दिन वह मौजूद थे। उनके मुताबिक, कार्यवाही शुरू होने के करीब पांच मिनट के भीतर ही विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने अदालत को बताया कि उन्हें धमकी भरा संदेश मिला है। इसके बाद पूरी चर्चा धमकी के मुद्दे पर केंद्रित हो गई।

    सीजेपी की लीगल हेड का आरोप है कि इस घटनाक्रम से ऐसा प्रतीत हुआ कि जमानत की आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद दोनों नेताओं की रिहाई के सवाल पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि पूरी प्रक्रिया में हुई देरी से वह निराश हैं। हालांकि, जमानत प्रक्रिया में जानबूझकर बाधा डालने के पार्टी के आरोपों को पुलिस ने स्वीकार नहीं किया है।

    पार्टी ने यह भी कहा कि यदि आशुतोष रांका और सौरभ दास को अगले दिन तक रिहा नहीं किया गया, तो वह उन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेगी, जिन पर दोनों नेताओं को अवैध हिरासत में रखवाने का आरोप है। सीजेपी के अनुसार, इस मामले में उसने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से भी कानूनी सलाह ली है। पार्टी का कहना है कि जमानत प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर वह कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है।

    दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पार्टी के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि जमानत के लिए ऐसे बॉन्ड जमा किए जा रहे थे, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता था। अधिकारी के मुताबिक, पुलिस के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है और गलत जमानत बॉन्ड के आधार पर रिहाई की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकती।

    पुलिस अधिकारी ने यह भी बताया कि रविवार को जमानत प्रक्रिया की सुनवाई के दौरान विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने धमकी भरे संदेश मिलने की जानकारी दी थी। अधिकारी के अनुसार, मजिस्ट्रेट ने कहा कि ऐसी धमकियों और जोखिम के बीच काम करना मुश्किल है। पुलिस ने इसी परिस्थिति को सुनवाई में देरी की वजह बताया है। अधिकारी ने यह भी कहा कि धमकी से संबंधित मामला दर्ज कर लिया गया है और उसकी जांच की जा रही है।

    इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। सीजेपी जमानत प्रक्रिया में जानबूझकर देरी और अपने नेताओं को हिरासत में रखे जाने का आरोप लगा रही है, जबकि पुलिस का कहना है कि गलत बॉन्ड जमा होने और मजिस्ट्रेट को धमकी मिलने के कारण प्रक्रिया प्रभावित हुई। फिलहाल विवाद जमानत संबंधी औपचारिकताओं, सुनवाई में देरी और धमकी के आरोपों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।