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  • नक्सलवाद के बाद अब घुसपैठ पर फोकस अमित शाह तय कर सकते हैं नई डेडलाइन

    नक्सलवाद के बाद अब घुसपैठ पर फोकस अमित शाह तय कर सकते हैं नई डेडलाइन


    नई दिल्ली । देश में आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार लगातार सक्रिय नजर आ रही है। नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय तक चले अभियान को निर्णायक सफलता मिलने के बाद अब सरकार का ध्यान अवैध घुसपैठ की चुनौती पर केंद्रित हो गया है। सूत्रों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मुद्दे पर व्यापक रणनीति तैयार कर रहे हैं और इसके लिए समयबद्ध लक्ष्य तय किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

    गृह मंत्रालय का मानना है कि किसी भी बड़े अभियान को प्रभावी बनाने के लिए स्पष्ट समय सीमा और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है। इसी सोच के तहत अवैध घुसपैठ की पहचान, निगरानी और कार्रवाई के लिए मिशन मोड में काम करने की तैयारी की जा रही है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में इस दिशा में एक स्पष्ट डेडलाइन निर्धारित की जा सकती है, जिससे सभी राज्यों और सुरक्षा एजेंसियों के प्रयासों को एकीकृत किया जा सके।

    गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पहले नक्सलवाद के खिलाफ भी समयबद्ध रणनीति अपनाई थी। इसके तहत सुरक्षा बलों और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वित कार्रवाई की गई थी। अब उसी मॉडल को सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के मुद्दे पर लागू करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

    सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के आसपास होने वाले अवैध निर्माण और अतिक्रमणों की पहचान के निर्देश दिए गए हैं। सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में जमीन उपयोग और जनसंख्या संरचना में होने वाले बदलावों पर भी विशेष निगरानी रखी जा रही है। इसके लिए संबंधित एजेंसियां विस्तृत सर्वेक्षण और समीक्षा कार्य कर रही हैं।

    सुरक्षा एजेंसियां आधुनिक तकनीकों का भी व्यापक उपयोग कर रही हैं। सीमा क्षेत्रों में थर्मल कैमरे, सेंसर, रडार और ड्रोन जैसी तकनीकों की मदद से निगरानी बढ़ाई गई है। विशेष रूप से संवेदनशील सीमाई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने के प्रयास जारी हैं। सीमा बाड़बंदी और अन्य बुनियादी सुरक्षा परियोजनाओं को भी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

    अवैध रूप से देश में प्रवेश करने वाले लोगों की पहचान और कार्रवाई के लिए सरकार कथित रूप से तीन स्तरीय रणनीति पर काम कर रही है। इसमें पहचान, हिरासत और कानूनी प्रक्रिया के तहत निष्कासन जैसे चरण शामिल हैं। इस पूरी प्रक्रिया की नियमित निगरानी और समीक्षा भी की जा रही है ताकि अभियान प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सके।

    हाल के महीनों में गृह मंत्री अमित शाह विभिन्न राज्यों के दौरे कर सुरक्षा व्यवस्था और सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों की समीक्षा कर चुके हैं। राज्य सरकारों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि अवैध घुसपैठ की चुनौती से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों के साझा प्रयास बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

    आने वाले समय में यदि इस अभियान के लिए औपचारिक समय सीमा तय की जाती है तो यह देश की सीमा सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा। फिलहाल सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इस दिशा में रणनीतिक स्तर पर तैयारियों को आगे बढ़ा रही हैं।

  • मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर

    मानसून पर मंडराया संकट मजबूत हो रहा ,अल नीनो भारत में बारिश और खेती पर पड़ सकता है असर


    नई दिल्ली ।देश के कई हिस्सों में मानसून की दस्तक के बावजूद अपेक्षित बारिश नहीं होने से चिंता बढ़ रही है। इसी बीच प्रशांत महासागर से सामने आए नए वैज्ञानिक संकेतों ने मौसम विशेषज्ञों और किसानों की बेचैनी और बढ़ा दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े ताजा आंकड़ों के अनुसार प्रशांत महासागर में एक शक्तिशाली अल नीनो प्रणाली विकसित होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। यदि यह और मजबूत होती है तो इसका असर दुनिया भर के मौसम पैटर्न के साथ भारत के मानसून पर भी पड़ सकता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कई हिस्सों में समुद्र की सतह सामान्य से अधिक ऊंची दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का संकेत मानी जाती है कि समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है। जब समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है तो वह फैलता है और समुद्र की सतह का स्तर बढ़ जाता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर अल नीनो की स्थिति को जन्म देती है।

    अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण उत्पन्न होती है। इसके प्रभाव केवल समुद्री क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहते बल्कि यह दुनिया के कई देशों में मौसम के स्वरूप को बदल सकती है। कई क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी पड़ सकती है तो कुछ स्थानों पर सामान्य से कम या अधिक वर्षा देखने को मिल सकती है।

    मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियां वर्ष 1997 में बने अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो से कुछ हद तक मेल खाती हैं। उस समय विकसित हुई प्रणाली को गॉडजिला अल नीनो कहा गया था क्योंकि उसके प्रभाव व्यापक और बेहद गंभीर थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं तो आने वाले महीनों में इसका असर और अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

    विशेषज्ञों ने समुद्र में बनने वाली गर्म पानी की विशाल लहरों पर भी ध्यान दिलाया है। इन्हें केल्विन वेव कहा जाता है जो हजारों किलोमीटर तक फैल सकती हैं और समुद्री तापमान में तेजी से बदलाव लाती हैं। ऐसी गतिविधियां आमतौर पर अल नीनो के मजबूत होने का संकेत मानी जाती हैं।

    भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। यदि अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है या वर्षा का वितरण असंतुलित होता है तो खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्यान्न उत्पादन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

    हालांकि मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि केवल प्रारंभिक संकेतों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। आने वाले हफ्तों में समुद्री तापमान और मौसमीय गतिविधियों की लगातार निगरानी की जाएगी। इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अल नीनो कितना मजबूत होगा और उसका वास्तविक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा।

    फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय की नजर प्रशांत महासागर की बदलती परिस्थितियों पर टिकी हुई है, क्योंकि इनके परिणाम आने वाले महीनों में वैश्विक मौसम और भारत के मानसून की दिशा तय कर सकते हैं।

  • TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा

    TMC में दो फाड़ के संकेत ममता ने दिखाई ताकत चुनाव आयोग को सौंपा नया संगठनात्मक ढांचा


    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और बगावत खुलकर सामने आने लगी है। इसी बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने अपने विरोधियों को जवाब देते हुए एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया है। उन्होंने पार्टी के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति की नई सूची चुनाव आयोग को भेजकर स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि संगठन पर उनकी पकड़ अभी भी मजबूत है।

    दरअसल सोमवार को पार्टी के बागी नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक आयोजित कर तृणमूल कांग्रेस की समानांतर वर्किंग कमेटी बनाने का दावा किया था। इस बैठक में ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा की गई और उनकी जगह अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुने जाने का दावा किया गया। इतना ही नहीं बागी गुट की ओर से ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार का पद देने का प्रस्ताव भी सामने आया।

    बागी नेताओं की इस कार्रवाई के बाद ममता बनर्जी ने तुरंत राजनीतिक जवाबी रणनीति अपनाई। उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्यों की नई सूची चुनाव आयोग को भेज दी। इस सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है जबकि अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव और सुब्रत बख्शी को उपाध्यक्ष के रूप में दर्शाया गया है।

    नई सूची के चुनाव आयोग तक पहुंचने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी का आधिकारिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक ढांचे को वैध और प्रभावी बनाए रखने के लिए सक्रिय हो गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बागी गुट को सीधा संदेश देने की रणनीति भी है।

    दूसरी ओर बागी गुट का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी में संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। उनका दावा है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और नए संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए गए। इसी वजह से उन्होंने समानांतर कार्यसमिति के गठन को उचित ठहराया है।

    अब पार्टी पर नियंत्रण को लेकर दोनों गुट आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नेतृत्व वाला आधिकारिक संगठन है तो दूसरी तरफ बागी नेताओं का गुट अपने दावों के साथ मैदान में उतर चुका है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि विवाद और बढ़ता है तो मामला चुनाव आयोग के साथ-साथ अदालत तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी ने नई सूची भेजकर यह संकेत जरूर दे दिया है कि वह पार्टी नेतृत्व को लेकर किसी भी चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले समय में नए समीकरण पैदा कर सकता है और TMC के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    मानसून की सुस्ती से बढ़ी कृषि क्षेत्र की चिंता, कपास-सोयाबीन की बुआई घटी, टेक्सटाइल सेक्टर पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने देश में खरीफ सीजन की तैयारियों पर असर डालना शुरू कर दिया है। अब तक सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश दर्ज होने के कारण कपास और सोयाबीन जैसी प्रमुख नकदी फसलों की बुआई अपेक्षा से काफी पीछे चल रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो इसका असर कृषि उत्पादन के साथ-साथ उद्योगों पर भी दिखाई दे सकता है।

    कृषि मंत्रालय के 19 जून तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुआई 17.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 22.82 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार करीब 5.69 लाख हेक्टेयर कम क्षेत्र में कपास बोई गई है। कपास के रकबे में आई यह गिरावट संकेत दे रही है कि किसान फिलहाल इस फसल की ओर कम रुझान दिखा रहे हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि अगले कुछ सप्ताह में कपास की बुआई में तेजी नहीं आई तो कच्चे कपास और यार्न की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे वस्त्र उद्योग की लागत बढ़ने की आशंका है।

    सोयाबीन की सुस्ती से तिलहन क्षेत्र भी प्रभावित

    कपास के साथ-साथ तिलहन फसलों की बुआई भी दबाव में है। इसकी प्रमुख वजह सोयाबीन की धीमी बुआई है। पिछले वर्ष इसी अवधि में सोयाबीन का रकबा 2.50 लाख हेक्टेयर था, जो इस बार घटकर 1.30 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी करीब 1.20 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।

    सोयाबीन के कमजोर प्रदर्शन का असर कुल तिलहन क्षेत्र पर भी पड़ा है। पिछले साल जहां तिलहन फसलों का रकबा 8.11 लाख हेक्टेयर था, वहीं इस बार यह घटकर 7.24 लाख हेक्टेयर रह गया है। हालांकि मूंगफली और सूरजमुखी की खेती में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन वह सोयाबीन की कमी की भरपाई नहीं कर पा रही है।

    धान और बाजरा किसानों की पहली पसंद बने

    इसके विपरीत धान और मोटे अनाजों की बुआई में वृद्धि दर्ज की गई है। धान का रकबा 4.26 लाख हेक्टेयर बढ़कर 12.36 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वहीं बाजरा सहित मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 2.14 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.05 लाख हेक्टेयर हो गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धान और मोटे अनाजों में सरकारी खरीद की मजबूत व्यवस्था और अपेक्षाकृत कम जोखिम किसानों को आकर्षित कर रहे हैं। दूसरी ओर कपास और सोयाबीन में वैश्विक बाजार की अनिश्चितता तथा कीट प्रकोप का खतरा किसानों को सतर्क बना रहा है।

    जल प्रबंधन व्यवस्था पर मूडीज की चिंता

    इस बीच, मूडीज रेटिंग्स ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की जल प्रबंधन व्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। एजेंसी का कहना है कि पानी के आवंटन, मूल्य निर्धारण और वितरण से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाएं देश के लिए वित्तीय और क्रेडिट जोखिम पैदा कर रही हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार यदि जल प्रबंधन ढांचे में समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में राज्यों की वित्तीय स्थिति और उनकी क्रेडिट रेटिंग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    खेती में खप रहा 80 फीसदी ताजा पानी

    मूडीज के मुताबिक भारत में पानी की कीमतें विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए अत्यधिक रियायती हैं। देश के कुल ताजे जल संसाधनों का लगभग 80 फीसदी हिस्सा खेती में उपयोग हो रहा है। सब्सिडी आधारित व्यवस्था के कारण पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

    एआई और डाटा सेंटर भी बढ़ा रहे दबाव

    रिपोर्ट में एक नए उभरते खतरे की ओर भी संकेत किया गया है। देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के साथ बड़े पैमाने पर डाटा सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। इन केंद्रों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।

    मूडीज का मानना है कि डाटा सेंटरों की बढ़ती जल मांग पहले से दबाव झेल रही जल आपूर्ति व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन सकती है। आने वाले वर्षों में सरकारों और यूटिलिटी कंपनियों को इस अतिरिक्त दबाव से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति बनानी होगी।

  • भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी मजबूत: 482 मिलियन डॉलर का सपोर्ट पैकेज, अपाचे और M777 की बढ़ेगी ताकत

    भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी मजबूत: 482 मिलियन डॉलर का सपोर्ट पैकेज, अपाचे और M777 की बढ़ेगी ताकत


    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को एक और बड़ा बढ़ावा मिला है। अमेरिका ने भारत के लिए 482.2 मिलियन डॉलर यानी लगभग 4,555 करोड़ रुपये के सैन्य सहायता पैकेज को मंजूरी दी है। यह प्रस्तावित डील भारत के पास मौजूद AH-64E अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर और M777A2 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपों के लिए सपोर्ट सर्विसेज से जुड़ी है। इस डील के तहत किसी नए हथियार की खरीद नहीं की जा रही है, बल्कि मौजूदा सिस्टम की ऑपरेशनल क्षमता को बनाए रखने और मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

    अमेरिकी रक्षा सुरक्षा सहयोग एजेंसी यानी DSCA ने 17 जून को इस प्रस्ताव की औपचारिक सूचना फेडरल रजिस्टर में जारी की। इसके बाद इसे भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह सहायता पैकेज भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत करेगा और मौजूदा एवं संभावित सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की क्षमता को बेहतर बनाएगा।

    इस पैकेज में अपाचे हेलीकॉप्टरों और M777 हॉवित्जर तोपों के लिए तकनीकी सहायता, स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस सपोर्ट, लॉजिस्टिक सेवाएं और प्रशिक्षण शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ये दोनों अत्याधुनिक हथियार प्रणाली हमेशा युद्ध के लिए तैयार स्थिति में रहें।

    भारत पहले ही अमेरिका से M777A2 अल्ट्रा-लाइट हॉवित्जर तोपें खरीद चुका है, जिन्हें विशेष रूप से ऊंचाई वाले और दुर्गम इलाकों में तैनात करने के लिए डिजाइन किया गया है। इनका इस्तेमाल भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता को मजबूत करने के लिए किया जाता है, खासकर सीमावर्ती और पहाड़ी क्षेत्रों में।

    इसी तरह, भारतीय सेना और वायुसेना के पास AH-64E अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर भी मौजूद हैं, जिन्हें दुनिया के सबसे उन्नत कॉम्बैट हेलीकॉप्टरों में गिना जाता है। ये हेलीकॉप्टर सटीक हमलों और युद्ध के मैदान में समर्थन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इस प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा कि यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी को और गहरा करता है। उन्होंने कहा कि दोनों देश लगातार रक्षा क्षेत्र में मिलकर काम कर रहे हैं और यह सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन के लिए भी अहम है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील केवल तकनीकी सहायता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच रणनीतिक भरोसे और दीर्घकालिक सैन्य सहयोग को भी दर्शाती है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते सुरक्षा हालात के बीच यह साझेदारी भारत की सैन्य तैयारी को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    इस तरह यह 482 मिलियन डॉलर का पैकेज भारतीय सेना की मौजूदा क्षमता को बनाए रखने के साथ-साथ उसकी परिचालन दक्षता को भी बढ़ाएगा, जिससे अपाचे हेलीकॉप्टर और M777 हॉवित्जर सिस्टम और अधिक प्रभावी तरीके से काम कर सकेंगे।

  • कॉलेजियम पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सिर्फ वरिष्ठता से नहीं मिलता जज बनने का अधिकार

    कॉलेजियम पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: सिर्फ वरिष्ठता से नहीं मिलता जज बनने का अधिकार


    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि केवल वरिष्ठता किसी अधिकारी को हाईकोर्ट का जज बनने का अधिकार नहीं देती। अदालत ने दोहराया कि जजों के चयन की प्रक्रिया में उम्मीदवार की उपयुक्तता योग्यता और समग्र मूल्यांकन को प्राथमिकता दी जाती है। साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा लिए गए निर्णय न्यायिक समीक्षा और सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर हैं।

    यह टिप्पणी हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। मल्होत्रा ने दावा किया था कि उनकी उम्मीदवारी को उचित तरीके से नहीं देखा गया और उनसे जूनियर अधिकारियों को हाईकोर्ट जज के पद के लिए आगे बढ़ा दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाईकोर्ट कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का पूरी तरह पालन नहीं किया।

    मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कॉलेजियम के निर्णयों में दखल देना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे पूरी चयन प्रक्रिया पर अनावश्यक विवाद खड़ा हो सकता है। पीठ ने कहा कि किसी भी उम्मीदवार का चयन व्यापक विचार विमर्श और मूल्यांकन के बाद किया जाता है तथा केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि पहले दिए गए एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने चयन प्रक्रिया को अधिक सामूहिक और पारदर्शी बनाने की आवश्यकता जताई थी। हालांकि अदालत ने माना कि कॉलेजियम की प्रक्रिया अपने निर्धारित मानकों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर संचालित होती है तथा इसमें उम्मीदवारों की उपयुक्तता का मूल्यांकन सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है।

    पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी जूनियर अधिकारी की सिफारिश की जाती है तो इससे वरिष्ठ अधिकारी को स्वतः कानूनी चुनौती देने का अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत के अनुसार कॉलेजियम का निर्णय उसकी संतुष्टि और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित होता है और उस संतुष्टि को न्यायिक मंच पर चुनौती नहीं दी जा सकती। यही कारण है कि कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर माना गया है।

    सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाल ही में हिमाचल प्रदेश से तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम हाईकोर्ट जज के रूप में मंजूर किए थे। अदालत ने कहा कि इन नामों पर विचार करते समय सभी संबंधित दस्तावेजों सूचनाओं और रिपोर्टों का अध्ययन किया गया था। इसलिए एक बार कॉलेजियम द्वारा निर्णय ले लिए जाने के बाद अदालत उसके सही या गलत होने पर न्यायिक स्तर पर पुनर्विचार नहीं कर सकती।

    पीठ ने अरविंद मल्होत्रा को सलाह देते हुए कहा कि वे अभी अपेक्षाकृत युवा हैं और उन्हें धैर्य रखना चाहिए। साथ ही उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी गई कि यदि उनके खिलाफ कोई लंबित जांच या प्रशासनिक प्रक्रिया है तो उसके शीघ्र निपटारे के लिए वे संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं।

    इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्ति की प्रक्रिया केवल वरिष्ठता पर आधारित नहीं है बल्कि योग्यता क्षमता निष्पक्षता और समग्र उपयुक्तता जैसे कई महत्वपूर्ण मानकों पर निर्भर करती है। अदालत का यह रुख भविष्य में जज नियुक्ति से जुड़े विवादों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक माना जा रहा है।

  • Delhi: तकिया काले खान इलाके में बाल्मीकि बस्ती में लगी भीषण आग…. कई झुग्गियां जलीं

    Delhi: तकिया काले खान इलाके में बाल्मीकि बस्ती में लगी भीषण आग…. कई झुग्गियां जलीं


    नई दिल्ली।
    देश की राजधानी दिल्ली (Delhi) में एक बार फिर आग की घटना सामने आई है. मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (Maulana Azad Medical College) के पीछे, तकिया काले खान इलाके (Takiya Kale Khan area) की बाल्मीकि बस्ती (Valmiki Basti) की झुग्गियों में भीषण आग लग गई. घटना की जानकारी मिलते ही दमकल की 24 गाड़ियां तुरंत मौके पर पहुंचीं।

    कड़ी मशक्कत के बाद अब आग पर पूरी तरह से काबू पा लिया गया है. राहत की बात ये है कि इस हादसे में फिलहाल किसी के हताहत होने या किसी की जान जाने की कोई खबर नहीं है।

    फायर ब्रिगेड अधिकारी ने बताया कि उन्हें 11 बजकर 22 मिनट पर आग की जानकारी मिली थी. आग की गंभीरता देखते हुए फायर ब्रिगेड की गाड़ियां बढ़ाई गईं और मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया।


    रात करीब 11 बजे भड़की आग

    घटना के एक चश्मदीद मोहम्मद फैजान ने मीडिया को बताया, ‘रात के पौने 11 बज रहे थे. हम सामने बैठे थे और हमने आग की लपटें उठती हुई देखीं. तो हम इधर की तरफ भागकर आए तो देखा कि आग लग गई थी और आग ऐसी थी कि बुझाए नहीं बुझ रही थी. हम अंदर जा रहे थे तो उसकी लपटें हमारे ऊपर आ रही थीं।

    चश्मदीद ने आगे बताया, ‘एक बिल्डिंग में 8 लोग फंसे हुए थे, जिन्हें अंडरग्राउंड रास्ते से उन्हें निकाला गया. उनके बाहर आते ही सिलेंडर फटने लगे और आग बढ़ती चली गई. फिर फोन करने के 5 मिनट बाद ही एंबुलेंस और फायर ब्रिगेड आ गईं. जब हम बाहर निकल रहे थे, तब तक आग बेकाबू हो चुकी थी. फिर बिजली के खंभों में आग लगने लगी और आग बढ़ते-बढ़ते चारों तरफ फैल गई।


    लकड़ियों की भारी मात्रा के चलते बेकाबू हुई आग

    दूसरे चश्मदीद मोहम्मद यूसुफ ने बताया, ‘जब आग लगी तो हमने हल्की आग समझी और ड्रमों से पानी डालकर बुझाने की कोशिश की. हमने ऊपर सो रहे लोगों को बचाया, फिर लकड़ियां हटवाईं. लेकिन लकड़ियां बहुत थीं, लकड़ी की और पक्की झुग्गियां थीं लेकिन आग काबू नहीं आई. फिर हमें फायर ब्रिगेड की गाड़ियों ने आग से बाहर निकाला क्योंकि बिजली के तारों में भी आग लगी थी. हमने 5-10 लोगों को बचाया।

  • PM मोदी जुलाई में करेंगे 3 देशों की यात्रा ! 38 साल बाद इस देश जाएगा कोई भारतीय प्रधानमंत्री

    PM मोदी जुलाई में करेंगे 3 देशों की यात्रा ! 38 साल बाद इस देश जाएगा कोई भारतीय प्रधानमंत्री


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) जुलाई के महीने में एक अहम विदेशी दौरे पर जा सकते हैं। जानकारी के मुताबिक, पीएम मोदी 6 से 11 जुलाई के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific region) के तीन देशों- इंडोनेशिया (Indonesia), ऑस्ट्रेलिया (Australia) और न्यूजीलैंड (New Zealand) की यात्रा कर सकते हैं। तैयारियों से जुड़े लोगों का कहना है कि इस दौरे के दौरान राष्ट्राध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं और भारतीय समुदाय से बातचीत मुख्य एजेंडे में शामिल होगी।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल प्रधानमंत्री के इस प्रस्तावित दौरे का पूरा शेड्यूल अंतिम रूप से तैयार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) या विदेश मंत्रालय (MEA) की तरफ से अभी तक इस यात्रा को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में यात्रा की तारीखों, जगहों और कार्यक्रमों में बदलाव की संभावना भी बनी हुई है।


    किस देश में क्या रहेगा पीएम मोदी का एजेंडा?

    पीएम मोदी के इस संभावित 3 देशों के दौरे को रणनीतिक और व्यापारिक लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। दौरे का फोकस कुछ इस तरह रह सकता है।

    इंडोनेशिया: अपने दौरे के दौरान पीएम मोदी की मुलाकात इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो से हो सकती है। गौरतलब है कि इससे पहले 7 जून को नई दिल्ली में भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आयोग की बैठक हुई थी। इसमें दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी, ऊर्जा और आपसी संबंधों को लेकर समीक्षा की थी। पीएम मोदी की यह वार्ता इसी आधार पर आगे बढ़ सकती है।

    ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया दौरे पर पीएम मोदी वहां के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ कई अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे। माना जा रहा है कि दोनों नेताओं की इस बातचीत का मुख्य फोकस व्यापक रणनीतिक साझेदारी (कम्प्रेहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप), रक्षा और सुरक्षा सहयोग, क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों), शिक्षा और व्यापार पर रहेगा।

    न्यूजीलैंड का ऐतिहासिक दौरा: इस यात्रा का सबसे खास हिस्सा न्यूजीलैंड का दौरा माना जा रहा है। यहां पीएम मोदी न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के साथ वार्ता कर सकते हैं। यह दौरा इसलिए भी अहम है क्योंकि साल 1986 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की यात्रा के बाद किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का यह पहला न्यूजीलैंड दौरा होगा।


    फ्रांस दौरे से लौटे हैं पीएम मोदी

    बता दें कि हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी 13 से 18 जून तक फ्रांस और स्लोवाकिया की यात्रा संपन्न करने के बाद लौट आए हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लिया और विश्व के कई नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। प्रधानमंत्री मोदी 13 जून को भूमध्यसागरीय शहर नीस पहुंचे थे, जहां उन्होंने मैक्रों के साथ ‘भारत इनोवेट्स’ कार्यक्रम का उद्घाटन किया और द्विपक्षीय बैठक भी की। इससे पहले मोदी ने स्लोवाकिया की “ऐतिहासिक” यात्रा पूरी की। मोदी स्लोवाकिया की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं।

  • मेघालय में 530 मिमी बारिश से हालात गंभीर, असम समेत सात राज्यों के लिए मौसम विभाग का अलर्ट

    मेघालय में 530 मिमी बारिश से हालात गंभीर, असम समेत सात राज्यों के लिए मौसम विभाग का अलर्ट


    नई दिल्ली । पूर्वोत्तर भारत में मानसून ने एक बार फिर अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने असम और मेघालय समेत कई पूर्वोत्तर राज्यों के लिए भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। मौसम विभाग के अनुसार 28 जून तक क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों में व्यापक वर्षा गतिविधियां जारी रहने की संभावना है। इसके साथ ही कई स्थानों पर गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएं भी हो सकती हैं।

    आईएमडी के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश असम मेघालय नागालैंड मणिपुर मिजोरम और त्रिपुरा में आने वाले दिनों में लगातार बारिश का दौर बना रहेगा। 22 जून से 26 जून के बीच कई इलाकों में तेज हवाओं के साथ गरज-चमक और बिजली गिरने की आशंका जताई गई है। मौसम विभाग ने लोगों को सतर्क रहने और आवश्यक सावधानियां बरतने की सलाह दी है।

    रविवार को मेघालय और त्रिपुरा के कई क्षेत्रों में भारी बारिश दर्ज की गई। त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में पिछले 24 घंटों के दौरान 102.5 मिमी वर्षा रिकॉर्ड की गई। लगातार बारिश के कारण शहर और आसपास के क्षेत्रों में जलभराव की स्थिति पैदा हो गई जिससे यातायात व्यवस्था प्रभावित हुई और लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

    वहीं मेघालय में बारिश ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। पूर्वी खासी हिल्स जिले के मावसिनराम में मात्र 24 घंटे के भीतर 530 मिमी बारिश दर्ज की गई। मौसम विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह मात्रा राजस्थान के कई शुष्क शहरों में छह महीने से अधिक समय में होने वाली कुल बारिश के बराबर है। इसके अलावा आरकेएम सोहरा में 470 मिमी और मावकिरवाट में 390 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई।

    लगातार हो रही मूसलाधार वर्षा का असर क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर भी दिखाई देने लगा है। शिलांग को भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित डावकी से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। सड़क को नुकसान पहुंचने से वाहनों की आवाजाही प्रभावित हुई है और स्थानीय प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है।

    मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार शेला में 100 मिमी विलियमनगर में 90 मिमी मावरिंगक्नेंग में 90 मिमी जोवाई में 80 मिमी बारापानी में 70 मिमी और रताछेरा में 70 मिमी बारिश दर्ज की गई। इन क्षेत्रों में भी लगातार बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित हुआ है।

    दक्षिण-पश्चिम मानसून इस वर्ष 7 जून को पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में पहुंचा था जो सामान्य तिथि से दो दिन देर से था। हालांकि इसके बाद मानसून ने तेजी पकड़ी और सिक्किम सहित पूर्वोत्तर के सभी आठ राज्यों को पूरी तरह कवर कर लिया। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियां मानसून के और मजबूत होने के लिए अनुकूल हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक संरचना घने वन क्षेत्र और पहाड़ी भूभाग के कारण यहां मानसूनी गतिविधियां अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक स्थिर रहती हैं। यही वजह है कि अलनीनो जैसे वैश्विक मौसमीय प्रभावों का असर भी यहां अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है।

    मौसम विभाग का अनुमान है कि इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान पूर्वोत्तर राज्यों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। ऐसे में प्रशासन और स्थानीय लोगों को अगले कुछ दिनों तक विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत होगी क्योंकि भारी बारिश के चलते बाढ़ भूस्खलन और यातायात बाधित होने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

  • इतिहास के पन्नों में 22 जून: सुभाष बोस का बड़ा फैसला, अमरीश पुरी का जन्म और कई ऐतिहासिक घटनाएं

    इतिहास के पन्नों में 22 जून: सुभाष बोस का बड़ा फैसला, अमरीश पुरी का जन्म और कई ऐतिहासिक घटनाएं


    नई दिल्ली ।इतिहास में 22 जून की तारीख कई महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल जगत की घटनाओं के कारण विशेष महत्व रखती है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विश्व राजनीति और खेल इतिहास तक इस दिन कई ऐसे घटनाक्रम हुए जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में गहरा प्रभाव छोड़ा।

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 22 जून 1897 का दिन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसी दिन क्रांतिकारी चाफेकर बंधुओं दामोदर और बालकृष्ण चाफेकर ने पुणे में ब्रिटिश प्लेग कमिश्नर डब्ल्यू.सी. रैंड पर हमला कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध का संदेश दिया था। इस घटना ने स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारी विचारधारा को नई ऊर्जा प्रदान की।

    22 जून 1940 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस नेतृत्व से वैचारिक मतभेदों के बाद फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की थी। इस संगठन का उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन को अधिक आक्रामक और जनकेंद्रित दिशा देना था। नेताजी का यह कदम भारतीय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।

    भारतीय सिनेमा के महान अभिनेता अमरीश पुरी का जन्म भी 22 जून 1932 को हुआ था। अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और यादगार अभिनय के दम पर उन्होंने हिंदी सिनेमा में अमिट पहचान बनाई। मिस्टर इंडिया फिल्म में निभाया गया उनका ‘मोगैम्बो’ का किरदार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय खलनायकों में गिना जाता है। इसी दिन प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा का जन्म भी हुआ था, जिन्होंने सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कई चर्चित फिल्में बनाई हैं।

    22 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके तीन दिन बाद 25 जून की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की औपचारिक घोषणा की थी। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और बहुचर्चित अध्याय माना जाता है।

    विज्ञान और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी यह दिन खास रहा है। वर्ष 2009 में 21वीं सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण भारत में दिखाई दिया था। देशभर में लाखों लोगों ने इस दुर्लभ खगोलीय घटना को देखा और वैज्ञानिकों ने भी इसका अध्ययन किया। इसी वर्ष डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच ईस्टमैन कोडक ने अपनी प्रसिद्ध कोडाक्रोम फिल्म की बिक्री बंद करने की घोषणा की थी, जिसने फोटोग्राफी के एक युग के अंत का संकेत दिया।

    विश्व इतिहास में 22 जून 1941 को नाजी जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला करते हुए ऑपरेशन बारबरोसा की शुरुआत की थी। यह द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे बड़ी सैन्य कार्रवाइयों में से एक मानी जाती है। वहीं वर्ष 1986 में फीफा विश्व कप के दौरान अर्जेंटीना के महान फुटबॉलर डिएगो माराडोना ने इंग्लैंड के खिलाफ ‘हैंड ऑफ गॉड’ और ‘गोल ऑफ द सेंचुरी’ जैसे ऐतिहासिक गोल कर खेल इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया।

    इस प्रकार 22 जून केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं बल्कि अनेक ऐतिहासिक घटनाओं, महान व्यक्तित्वों और यादगार उपलब्धियों का प्रतीक है। यह दिन हमें इतिहास के उन महत्वपूर्ण पड़ावों की याद दिलाता है जिन्होंने समाज, राजनीति, खेल और संस्कृति की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।