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  • जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी के बीच पार्क में जुटे CJP समर्थकों को रेजिडेंट्स ने बैठक से रोका, पुलिस पहुंची

    जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी के बीच पार्क में जुटे CJP समर्थकों को रेजिडेंट्स ने बैठक से रोका, पुलिस पहुंची

    नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनकी टीम से जुड़ा दिल्ली का एक मामला सामने आने के बाद राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। जानकारी के अनुसार दीपके अपनी टीम के कुछ सदस्यों और समर्थकों के साथ दिल्ली की एक रेजिडेंट सोसाइटी के पार्क में जंतर-मंतर सीजन 2 की तैयारी को लेकर बैठक कर रहे थे। इसी दौरान सोसाइटी के कई निवासी वहां पहुंच गए और बैठक का विरोध किया।

    बताया गया कि दीपके के साथ सौरभ दास, आशुतोष रंका और कुछ समर्थक मौजूद थे। बैठक के दौरान आगामी कार्यक्रम की रणनीति पर चर्चा की जा रही थी। इसी बीच स्थानीय लोगों को वहां राजनीतिक बैठक होने की जानकारी मिली। इसके बाद कई निवासी पार्क में पहुंचे और टीम से बैठक बंद कर वहां से जाने को कहा।

    स्थानीय लोगों की आपत्ति का आधार यह बताया गया कि सोसाइटी का पार्क निवासियों के घूमने और सामान्य गतिविधियों के लिए है। उनका कहना था कि पार्क में धरना या राजनीतिक प्रदर्शन की योजना नहीं बनाई जानी चाहिए। विरोध के दौरान दोनों पक्षों के बीच बहस की स्थिति भी बनी। बाद में पुलिसकर्मियों के हस्तक्षेप के बाद स्थिति को नियंत्रित किया गया और दीपके तथा उनके साथ मौजूद लोगों को पार्क से जाना पड़ा।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अभिजीत दीपके जंतर-मंतर सीजन 2 शुरू करने की बात कह चुके हैं। इससे पहले जून में CJP ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। उस दौरान संगठन की ओर से केंद्र सरकार और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर विरोध दर्ज कराया गया था। दीपके ने बाद में आंदोलन को आगे बढ़ाने के संकेत भी दिए थे।

    पार्क में बैठक करने की वजह को लेकर दीपके की ओर से कहा गया कि टीम को दिल्ली में अपने वॉलंटियर्स के साथ बैठक करनी थी। उनके अनुसार इसके लिए इनडोर स्थान तलाशने का प्रयास किया गया था, लेकिन हॉल उपलब्ध कराने में कठिनाई आई। उनका दावा है कि पहले एक हॉल की व्यवस्था हुई थी, लेकिन बाद में वहां भी बैठक की अनुमति नहीं मिली।

    इसके बाद टीम ने सोसाइटी के पार्क में बैठक करने का फैसला किया। दीपके के अनुसार बैठक के दौरान समर्थकों से आंदोलन की आगे की रणनीति पर चर्चा की गई। इसी दौरान उन्होंने समर्थकों से पूछा कि अब किसके इस्तीफे की मांग की जानी चाहिए। समर्थकों की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिया गया।

    पार्क में हुए विरोध के बाद दीपके ने आरोप लगाया कि उनकी टीम को बैठक करने से रोकने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने इसके पीछे बीजेपी का हाथ होने का दावा किया। उनका आरोप है कि लोगों को CJP से दूरी बनाए रखने के लिए डराया धमकाया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

    पूरे घटनाक्रम में एक तरफ सार्वजनिक स्थान के इस्तेमाल को लेकर सोसाइटी के निवासियों की आपत्ति सामने आई, तो दूसरी तरफ CJP ने इसे अपने राजनीतिक कार्यक्रमों को रोकने की कोशिश बताया। मामले में किसी बड़ी झड़प की जानकारी नहीं है और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद स्थिति शांत हुई।

    अभिजीत दीपके की टीम अब जंतर-मंतर सीजन 2 की आगे की रणनीति पर काम करने की बात कह रही है। ऐसे में दिल्ली में उनके अगले कार्यक्रम को लेकर गतिविधियां बढ़ सकती हैं। वहीं, सोसाइटी पार्क की घटना ने राजनीतिक बैठकों के लिए सार्वजनिक और निजी सामुदायिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।

  • सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा

    सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे से पहले उमर अब्दुल्ला का दो टूक संदेश, कहा आंतरिक समस्याओं का समाधान भारत करेगा


    नई दिल्ली । 
    भारत में अमेरिका के राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत सर्जियो गोर के जम्मू कश्मीर और लद्दाख दौरे के बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर की समस्याओं का समाधान वॉशिंगटन से नहीं आएगा, बल्कि इनका समाधान भारत को ही करना है। उमर अब्दुल्ला का यह बयान सर्जियो गोर के श्रीनगर पहुंचने से पहले आया है।

    सर्जियो गोर दो दिवसीय दौरे पर जम्मू कश्मीर और लद्दाख पहुंचे हैं। उनके कार्यक्रम में श्रीनगर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के साथ अलग अलग संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत भी शामिल है। अमेरिकी राजदूत के लंबे अंतराल के बाद जम्मू कश्मीर दौरे को क्षेत्रीय और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह सर्जियो गोर की बात सुनना अधिक पसंद करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अमेरिकी राजदूत के सामने जम्मू कश्मीर के आंतरिक मामलों को शिकायत के रूप में नहीं उठाएंगे। मुख्यमंत्री के मुताबिक किसी दूसरे देश के राजदूत के सामने अपने ही देश की शिकायत करना उनकी आदत नहीं है।

    उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर के हालात और क्षेत्र से जुड़े विषयों पर सर्जियो गोर से बातचीत जरूर होगी। हालांकि, वह इन मुद्दों का समाधान किसी दूसरे देश से हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे। उमर अब्दुल्ला का यह रुख जम्मू कश्मीर के आंतरिक विषयों पर विदेशी हस्तक्षेप की मांग से दूरी बनाए रखने वाला माना जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान देश के भीतर ही तलाशना होगा। उनके बयान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि के साथ बातचीत से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई, बल्कि बातचीत का दायरा क्षेत्र की स्थिति और संबंधित विषयों तक रखने की बात कही है।

    इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्जियो गोर के कश्मीर दौरे को लेकर अलग मुद्दा उठाया है। उन्होंने कश्मीर यात्रा के संबंध में जारी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर उसे वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि कश्मीर में बड़ी संख्या में परिवार पर्यटन पर निर्भर हैं और ऐसी सलाह क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने में बाधा पैदा करती है।

    महबूबा मुफ्ती ने यह भी कहा कि ट्रैवल एडवाइजरी को हटाना कश्मीर के लोगों के लिए विश्वास बढ़ाने वाला कदम हो सकता है। पर्यटन जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है।

    सर्जियो गोर के दौरे के दौरान क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर स्थानीय प्रतिनिधियों से बातचीत होने की संभावना है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का बयान इस बात को रेखांकित करता है कि जम्मू कश्मीर से जुड़े आंतरिक मामलों पर स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व समाधान के लिए देश के संस्थानों और सरकारों को प्राथमिक पक्ष मानता है।

    कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में अमेरिकी राजदूत का जम्मू कश्मीर दौरा स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उमर अब्दुल्ला ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिका के साथ बातचीत को शिकायत या बाहरी हस्तक्षेप की मांग का माध्यम नहीं बनाएंगे।

    सर्जियो गोर की यात्रा के दौरान होने वाली बैठकों से क्षेत्र की स्थिति, स्थानीय अपेक्षाओं और भारत-अमेरिका संबंधों से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा का अवसर मिलेगा। फिलहाल उमर अब्दुल्ला का संदेश स्पष्ट है कि जम्मू कश्मीर की आंतरिक समस्याओं पर संवाद हो सकता है, लेकिन उनके समाधान की जिम्मेदारी भारत की ही है।

  • अमित शाह के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नई रणनीति, विनोद तावड़े के सामने संगठन और सामाजिक समीकरण संभालने की चुनौती

    अमित शाह के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी की नई रणनीति, विनोद तावड़े के सामने संगठन और सामाजिक समीकरण संभालने की चुनौती


    नई दिल्ली । 
    उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी ने राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। उनके साथ राष्ट्रीय मंत्री जगदीश ईश्वरभाई पटेल को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। तावड़े के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सामाजिक और संगठनात्मक आधार को मजबूत करना तथा समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण का मुकाबला करना है।

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के लिए अमित शाह का दौर एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले अमित शाह को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली थी। उस समय पार्टी ने विभिन्न सामाजिक समूहों को साथ लाने और बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने की रणनीति पर काम किया। इसके बाद 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी सफलता मिली।

    अब करीब एक दशक बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत की और बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता हासिल की। अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को जोड़ने की कोशिश की। ऐसे में बीजेपी को अपने गैर यादव ओबीसी और अन्य पारंपरिक सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।

    विनोद तावड़े की पहचान शांत कार्यशैली और संगठनात्मक प्रबंधन के लिए होती है। उन्हें बूथ स्तर तक चुनावी रणनीति को लागू करने और पार्टी कार्यकर्ताओं के नेटवर्क को सक्रिय रखने का अनुभव है। बिहार विधानसभा चुनाव में भी उनकी भूमिका को चुनावी प्रबंधन और सामाजिक समीकरणों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया। इसी अनुभव के आधार पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है।

    तावड़े के सामने केवल विपक्षी दलों की रणनीति का मुकाबला करना ही चुनौती नहीं है। उन्हें राज्य संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर समन्वय भी बनाए रखना होगा। टिकट वितरण, क्षेत्रीय समीकरण, पार्टी के भीतर संभावित मतभेद और स्थानीय स्तर पर विधायकों के खिलाफ नाराजगी जैसे मुद्दों का समाधान भी उनके चुनावी प्रबंधन का हिस्सा होगा।

    उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कई सहयोगी दल भी हैं। निषाद पार्टी, अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सहित अन्य सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखना और चुनावी परिस्थितियों के अनुसार सीटों के बंटवारे पर सहमति बनाना भी महत्वपूर्ण होगा। तावड़े के लिए यह अनुभव बिहार की तुलना में अधिक व्यापक चुनौती लेकर आएगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं और प्रत्येक क्षेत्र के सामाजिक समीकरण अलग हैं।

    तावड़े की प्राथमिकताओं में पार्टी के बूथ नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करना और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय मजबूत करना शामिल हो सकता है। इसके साथ अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में बीजेपी के कमजोर हुए जनाधार को मजबूत करना भी अहम रहेगा। पार्टी को उन मतदाताओं तक दोबारा पहुंच बनाने की जरूरत होगी, जिनका रुख पिछले चुनाव में बदला दिखाई दिया।

    अमित शाह के समय बीजेपी की रणनीति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, मजबूत संगठन और व्यापक चुनावी माहौल का लाभ मिला था। 2027 में राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। विपक्षी दल अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं और सपा ने पीडीए को अपनी राजनीतिक रणनीति का प्रमुख आधार बनाया है। ऐसे में तावड़े के सामने अमित शाह की रणनीति की हूबहू नकल करने के बजाय मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप नई रणनीति तैयार करने की जरूरत होगी।

    विनोद तावड़े की नियुक्ति से यह संकेत भी मिलता है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में केवल बड़े नेताओं की रैलियों पर निर्भर रहने के बजाय संगठन और माइक्रो मैनेजमेंट पर विशेष जोर देना चाहती है। बूथ स्तर की सक्रियता, सामाजिक समूहों के बीच संतुलन, सहयोगी दलों से तालमेल और संगठन के भीतर एकजुटता 2027 के चुनाव में पार्टी की स्थिति तय करने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।

    अब तावड़े के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह बीजेपी के पुराने सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से मजबूत कर पाएंगे और सपा के पीडीए आधार का प्रभाव कम कर सकेंगे। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में उनका प्रदर्शन यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगा कि संगठनात्मक रणनीति के दम पर बीजेपी 2027 में सत्ता बरकरार रखने की अपनी कोशिश को कितनी मजबूती दे पाती है।

  • तमिलनाडु में विजय सरकार ने छात्रों को CJP और वामपंथी प्रदर्शनों से दूर रखने वाला विवादित आदेश वापस लिया

    तमिलनाडु में विजय सरकार ने छात्रों को CJP और वामपंथी प्रदर्शनों से दूर रखने वाला विवादित आदेश वापस लिया

    नई दिल्ली । तमिलनाडु में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार ने छात्रों को कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP और वामपंथी संगठनों के प्रदर्शनों में शामिल होने से रोकने वाला अपना निर्देश वापस ले लिया है। सरकार की ओर से यह फैसला 19 अगस्त को लिया गया। इससे पहले 14 अगस्त को कॉलेजिएट शिक्षा निदेशालय की ओर से संबंधित विभागों और संस्थानों को निर्देश जारी किया गया था।

    इस निर्देश में स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों तथा युवाओं को राजनीतिक प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल होने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया था। संबंधित प्रशासनिक और शैक्षणिक अधिकारियों से इस दिशा में कार्रवाई करने की अपेक्षा की गई थी। आदेश सामने आने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में इसको लेकर बहस तेज हो गई।

    निर्देश में विशेष रूप से CJP और वामपंथी दलों की ओर से आयोजित आंदोलनों का उल्लेख किया गया था। सरकार का रुख छात्रों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने पर केंद्रित था, लेकिन इस व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठने लगे। आलोचकों ने इसे छात्रों की राजनीतिक अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक गतिविधियों में भागीदारी से जोड़कर देखा।

    CJP ने सरकार के इस कदम का विरोध करते हुए निर्देश को असंवैधानिक बताया था। संगठन का कहना था कि छात्रों को किसी खास राजनीतिक आंदोलन में शामिल होने से रोकने के लिए प्रशासनिक निर्देश जारी करना उनके अधिकारों के दायरे से जुड़ा गंभीर विषय है। आदेश वापस लिए जाने के बाद इस विवाद को लेकर सरकार का रुख पहले की तुलना में बदला हुआ दिखाई दिया।

    इस पूरे घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी की प्रतिक्रिया भी सामने आई थी। भाजपा नेता विनोज पी. सेल्वम ने सरकार के शुरुआती निर्देश का समर्थन करते हुए CJP और वामपंथी संगठनों पर छात्रों को प्रभावित करने का आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया था कि ऐसे संगठन युवाओं को आंदोलनों में शामिल करते हैं और बाद में उन्हें परिस्थितियों का सामना करने के लिए छोड़ देते हैं।

    तमिलनाडु की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम ने राज्य की राजनीति में नई भूमिका बनाई है। सरकार के गठन में कांग्रेस और वामपंथी दलों के समर्थन का भी राजनीतिक संदर्भ मौजूद है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वामपंथी दलों ने सरकार को समर्थन दिया है, जबकि उनके किसी नेता को मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला है।

    ऐसे में छात्रों को वामपंथी संगठनों और CJP के प्रदर्शनों से दूर रखने वाला निर्देश राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गया था। सरकार द्वारा इसे वापस लेने के बाद अब संबंधित संस्थानों के लिए पहले जारी प्रतिबंधात्मक निर्देश प्रभावी नहीं रहेगा।

    यह घटनाक्रम तमिलनाडु में छात्र राजनीति, राजनीतिक भागीदारी और प्रशासनिक निर्देशों को लेकर चल रही व्यापक बहस के बीच सामने आया है। सरकार का आदेश वापस लेना इस बात का संकेत है कि फिलहाल छात्रों को इन प्रदर्शनों से दूर रखने संबंधी पहले जारी निर्देश को आगे लागू नहीं किया जाएगा।

    हालांकि, राजनीतिक दलों और संगठनों की प्रतिक्रियाओं के बीच यह मुद्दा राज्य की राजनीति में आगे भी चर्चा का विषय बना रह सकता है। सरकार के फैसले ने एक ओर प्रशासनिक स्तर पर जारी निर्देश को समाप्त किया है, वहीं दूसरी ओर छात्रों की राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी और संस्थानों की भूमिका को लेकर नए सवाल भी सामने रखे हैं।

  • आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी फिर ED के निशाने पर 15 अफसरों की टीम ने खंगाले दस्तावेज कई ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई

    आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी फिर ED के निशाने पर 15 अफसरों की टीम ने खंगाले दस्तावेज कई ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई


    उत्तर प्रदेश । समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने बुधवार सुबह रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी समेत आजम खान और जौहर ट्रस्ट से जुड़े कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की। कार्रवाई सुबह करीब 7 बजे शुरू हुई। जानकारी के मुताबिक ED की टीम कई वाहनों से यूनिवर्सिटी पहुंची और वहां मौजूद दस्तावेजों तथा वित्तीय रिकॉर्ड की जांच शुरू की। छापेमारी के दौरान यूनिवर्सिटी के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा। खास बात यह रही कि कार्रवाई के बीच यूनिवर्सिटी में नियमित कक्षाएं भी चलती रहीं और छात्रों को पहचान पत्र की जांच के बाद प्रवेश दिया गया।

    ED की यह कार्रवाई रामपुर तक सीमित नहीं रही। सहारनपुर और दिल्ली समेत कुल 10 ठिकानों पर एक साथ तलाशी अभियान चलाए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें जौहर ट्रस्ट से जुड़े लोगों और परिसरों के अलावा सहारनपुर के चार्टर्ड अकाउंटेंट दीपक गुप्ता का कार्यालय और आवास भी शामिल है। ED की टीम इन जगहों पर वित्तीय लेनदेन से संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड और अन्य कागजात खंगाल रही है। बताया जा रहा है कि कार्रवाई प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानी PMLA के तहत की जा रही है।

    जांच एजेंसियों के सामने मुख्य सवाल कथित तौर पर सरकारी ठेकों से मिले पैसों के इस्तेमाल को लेकर है। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि सरकारी ठेकों से प्राप्त धनराशि किन लोगों या कंपनियों के माध्यम से जौहर यूनिवर्सिटी अथवा उससे जुड़े ट्रस्ट तक पहुंची। आरोपों की जांच के दौरान यह भी देखा जा रहा है कि इस रकम का इस्तेमाल यूनिवर्सिटी की संपत्तियां तैयार करने या अन्य गतिविधियों में किस तरह किया गया। हालांकि छापेमारी अभी जांच का हिस्सा है और कार्रवाई पूरी होने के बाद ही ED की ओर से सामने आने वाली जानकारी से तस्वीर और स्पष्ट होगी।

    जौहर यूनिवर्सिटी पिछले कुछ समय से लगातार विवादों में रही है। 15 जुलाई को रामपुर के जिलाधिकारी ने यूनिवर्सिटी की 40 में से 38 इमारतों को ढहाने का आदेश दिया था। प्रशासन की ओर से आरोप लगाया गया था कि इन इमारतों का निर्माण स्वीकृत नक्शे के बिना कराया गया। हालांकि बाद में मुरादाबाद के कमिश्नर आन्जनेय सिंह की अदालत ने जिलाधिकारी के इस आदेश पर रोक लगा दी। इस मामले को लेकर कानूनी प्रक्रिया जारी है।

    ED की कार्रवाई के बीच यूनिवर्सिटी के बाहर सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई। बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई ताकि छापेमारी के दौरान किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। यूनिवर्सिटी में छात्रों को पहचान पत्र देखकर प्रवेश दिया गया जबकि अभिभावकों को गेट से ही वापस लौटाया गया। दूसरी तरफ आजम खान के आवास पर इस कार्रवाई के दौरान कोई छापेमारी नहीं हुई और वहां सामान्य स्थिति बनी रही।

    आजम खान और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई पहले भी हो चुकी है। जुलाई 2019 में ED ने यूनिवर्सिटी से जुड़े परिसरों में तलाशी अभियान चलाया था और दस्तावेज जब्त किए थे। इसके बाद सितंबर 2023 में आयकर विभाग और ED ने आजम खान के आवास तथा जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े ठिकानों पर लगातार तीन दिनों तक छापेमारी की थी। उस कार्रवाई के बाद संदिग्ध बैंक लेनदेन से संबंधित जानकारी सामने आने पर ED की ओर से समन भी जारी किए गए थे।

    आजम खान इस समय रामपुर जेल में बंद हैं। उनके खिलाफ कई मामले दर्ज रहे हैं और उनके वकील के मुताबिक दोहरे पैन कार्ड मामले को छोड़कर अन्य मामलों में उन्हें राहत मिल चुकी है या वे बरी हो चुके हैं। फिलहाल दोहरे पैन कार्ड मामले में अदालत की सजा के बाद वह जेल में हैं और जमानत के लिए हाईकोर्ट में अपील की गई है।

    ED की ताजा कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब आजम खान को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी बयानबाजी तेज है। हाल ही में शिवपाल यादव ने जेल में आजम खान से मुलाकात के बाद कहा था कि समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर उन्हें गृहमंत्री बनाया जाएगा। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। ऐसे में ED की कार्रवाई ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है।

    फिलहाल जांच एजेंसी की टीम अलग अलग ठिकानों पर दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की पड़ताल कर रही है। छापेमारी से जुड़े पूरे मामले में ED की जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होगा कि एजेंसी को किन वित्तीय लेनदेन या संपत्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं और इस कार्रवाई के बाद आजम खान तथा जौहर ट्रस्ट से जुड़े लोगों पर क्या कानूनी कदम उठाए जाते हैं।

  • शहजाद पूनावाला ने बीजेपी छोड़ने की बताई वजह, आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लिया बड़ा फैसला

    शहजाद पूनावाला ने बीजेपी छोड़ने की बताई वजह, आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लिया बड़ा फैसला

    नई दिल्ली । बीजेपी के चर्चित प्रवक्ताओं में शामिल रहे शहजाद पूनावाला ने पार्टी की जिम्मेदारी से अलग होने के बाद अपने फैसले की वजह स्पष्ट की है। उन्होंने बताया कि इस्तीफे के पीछे केवल राजनीतिक कारण नहीं थे, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबे समय तक पार्टी के लिए पूर्णकालिक भूमिका निभाने के कारण उनके लिए आय का कोई दूसरा नियमित माध्यम बनाए रखना मुश्किल हो गया था। अब उन्होंने प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया है।

    शहजाद पूनावाला ने बताया कि राजनीति में सक्रिय रहते हुए घर चलाने से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही थीं। किराया, रोजमर्रा के खर्च और परिवार की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना उनके लिए कठिन होता जा रहा था। पार्टी के काम को पूरा समय देने के कारण वह किसी अन्य नौकरी या पेशेवर गतिविधि में नियमित रूप से शामिल नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में बचत के सहारे खर्च चलाया गया, लेकिन समय के साथ बचत भी समाप्त होने लगी।

    परिवार से जुड़ी परिस्थितियों ने भी उनके फैसले को प्रभावित किया। शहजाद पूनावाला के अनुसार, उनकी मां कुछ समय पहले एक दुर्घटना का शिकार हुई थीं। ऐसे समय में उनके साथ रहना और उनकी देखभाल करना उनके लिए प्राथमिकता बन गया। राजनीतिक गतिविधियों में लगातार व्यस्त रहने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को संतुलित करना मुश्किल हो रहा था। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने 30 जुलाई को अपना इस्तीफा दिया, जिसे बातचीत के बाद पार्टी ने स्वीकार कर लिया।

    पार्टी से अलग होने के बावजूद शहजाद पूनावाला ने स्पष्ट किया कि उनके वैचारिक रुख में बदलाव नहीं आया है। उन्होंने कहा कि वह बीजेपी की विचारधारा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक बने हुए हैं। उनके मुताबिक, पार्टी की जिम्मेदारी छोड़ना उनके राजनीतिक विचारों से दूरी बनाने का संकेत नहीं है। उन्होंने अपने फैसले को मुख्य रूप से व्यक्तिगत, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों से जुड़ा बताया है।

    अब शहजाद पूनावाला निजी क्षेत्र में नौकरी तलाशने की तैयारी कर रहे हैं। वह पहले भी कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुके हैं, इसलिए उनका मानना है कि पेशेवर जीवन में वापस लौटना उनके लिए नया अनुभव नहीं होगा। हालांकि उन्होंने अभी किसी विशेष कंपनी या पद को लेकर अंतिम निर्णय नहीं किया है। उनका अगला कदम प्राइवेट सेक्टर में रोजगार हासिल करने की दिशा में होगा।

    बीजेपी की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद शहजाद ने मीडिया और सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाने की भी बात कही है। उनका कहना है कि पार्टी पद से जुड़े दायित्वों के कारण जिन सीमाओं और जिम्मेदारियों का पालन करना पड़ता था, अब उनमें बदलाव आएगा। वह सार्वजनिक मुद्दों और राजनीतिक विषयों पर अपनी राय पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता के साथ रखने की कोशिश करेंगे।

    शहजाद पूनावाला ने बीजेपी को युवाओं से जुड़ने को लेकर भी सुझाव दिया है। उनके अनुसार, बदलते दौर में राजनीतिक दलों को युवाओं की भाषा, उनकी प्राथमिकताओं और डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका को अधिक गंभीरता से समझना चाहिए। उनका मानना है कि सोशल मीडिया और नए डिजिटल माध्यमों के जरिए युवा वर्ग से संवाद मजबूत किया जा सकता है। बीजेपी से उनकी औपचारिक जिम्मेदारी समाप्त होने के बावजूद पार्टी के प्रति उनका समर्थन कायम रहने की बात उन्होंने दोहराई है। इस्तीफे के बाद उनका फोकस अब आर्थिक स्थिरता, परिवार की जिम्मेदारियों और पेशेवर जीवन में वापसी पर रहेगा।

  • सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली में सियासी घमासान, केजरीवाल ने बीजेपी पर लगाया राजनीतिक बदले का आरोप

    सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली में सियासी घमासान, केजरीवाल ने बीजेपी पर लगाया राजनीतिक बदले का आरोप


    नई दिल्ली ।
    दिल्ली जल बोर्ड के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट यानी STP से जुड़े कथित टेंडर घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ACB की कार्रवाई के बाद राजधानी की राजनीति गरमा गई है। जांच एजेंसी ने आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन समेत छह लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी उदित प्रकाश राय भी शामिल हैं। कार्रवाई के बाद आम आदमी पार्टी ने इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया है, जबकि जांच एजेंसी की कार्रवाई टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर केंद्रित है।

    मामला दिल्ली जल बोर्ड की सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट परियोजनाओं के विस्तार और सुधार से संबंधित बताया गया है। आरोप है कि इन परियोजनाओं के लिए जारी टेंडर की शर्तों में बदलाव किए गए और निर्धारित नियमों तथा प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। इन कथित अनियमितताओं को लेकर दिल्ली सरकार के सतर्कता निदेशालय की शिकायत के आधार पर 11 मई 2024 को मामला दर्ज किया गया था।

    जांच के दौरान टेंडर प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों तथा अन्य लोगों की भूमिका की पड़ताल की गई। इसी क्रम में ACB ने छह लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई की है। सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी ने मामले को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण बना दिया है, क्योंकि वह दिल्ली सरकार में मंत्री रह चुके हैं और आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं।

    आम आदमी पार्टी ने गिरफ्तारी की टाइमिंग और मामले में सत्येंद्र जैन की कथित भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेता अनुराग ढांडा ने कहा कि जिस टेंडर को मामले का आधार बनाया जा रहा है, वह अक्टूबर 2022 में हुआ था। उनका दावा है कि उस समय सत्येंद्र जैन पहले से ही एक अन्य मामले में जेल में थे। इसी आधार पर पार्टी ने जैन की भूमिका को लेकर जांच एजेंसी के दावों पर सवाल खड़े किए हैं।

    पार्टी ने आरोप लगाया है कि सत्येंद्र जैन के खिलाफ की गई कार्रवाई राजनीतिक दबाव का हिस्सा है। AAP नेताओं का कहना है कि विपक्ष से जुड़े नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। पार्टी ने मामले में लगाए गए आरोपों को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।

    सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी पर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि जैन को दोबारा गिरफ्तार कराया गया है। केजरीवाल ने सत्येंद्र जैन से जुड़े पुराने मामले का उल्लेख करते हुए जेल में उनके साथ कथित व्यवहार पर भी सवाल उठाए।

    केजरीवाल ने दावा किया कि जैन के खिलाफ पिछला मामला भी गलत था और मौजूदा मामले में भी जांच आगे बढ़ने के बाद आरोप सही साबित नहीं होंगे। उनके बयान के बाद AAP और बीजेपी के बीच राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है।

    दूसरी ओर, ACB की कार्रवाई का आधार दिल्ली जल बोर्ड के STP टेंडर में कथित अनियमितताओं की जांच है। जांच एजेंसी ने जिन आरोपों के आधार पर गिरफ्तारियां की हैं, उनकी पुष्टि आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में होगी। फिलहाल मामला जांच के स्तर पर है और गिरफ्तार किए गए लोगों की भूमिका तथा टेंडर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों से जुड़े तथ्यों की पड़ताल जारी है।

    इस कार्रवाई ने दिल्ली में सरकारी टेंडर, भ्रष्टाचार के आरोप और जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस को फिर सामने ला दिया है। अब मामले में आगे होने वाली जांच और अदालत की कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि आरोपों से जुड़े तथ्यों और गिरफ्तार आरोपियों की कथित भूमिका के संबंध में क्या स्थिति सामने आती है।

  • गंगा का रौद्र रूप और बारिश का कहर यूपी में बिगड़े हालात सड़कें जलमग्न घाट डूबे कई गांवों पर बाढ़ का खतरा

    गंगा का रौद्र रूप और बारिश का कहर यूपी में बिगड़े हालात सड़कें जलमग्न घाट डूबे कई गांवों पर बाढ़ का खतरा


    उत्तर प्रदेशउत्तर प्रदेश में मानसून की सक्रियता ने कई जिलों में हालात बिगाड़ दिए हैं। लगातार हो रही बारिश के चलते नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है और कई इलाकों में सड़कें तथा घर पानी में डूब गए हैं। बिजनौर में गंगा का पानी स्टेट हाईवे तक पहुंच गया है। सड़क पर करीब दो फीट तक पानी बहने के कारण वाहनों की आवाजाही प्रभावित हुई है। हालात ऐसे बने कि लोगों को अपनी कार और बाइक ट्रैक्टर ट्रॉली की मदद से पानी पार करानी पड़ी। वहीं प्रयागराज में पिछले तीन दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए हैं।

    प्रयागराज के करेली इलाके में बारिश का पानी लोगों के घरों के भीतर तक पहुंच गया है। कई मकानों में करीब दो फीट तक पानी भर गया है। पानी बढ़ने के कारण घरों में रखा बेड सोफा और दूसरे जरूरी सामान भी प्रभावित हुए हैं। कुछ परिवारों को मजबूरी में घर की पहली मंजिल या छत पर शरण लेनी पड़ी है। लगातार बारिश के कारण इलाके के लोगों की परेशानी बढ़ती जा रही है। वहीं रामबाग रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर भी बारिश का पानी जमा हो गया जिससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

    वाराणसी में भी गंगा का जलस्तर बढ़ने से घाटों पर हालात चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। घाटों के किनारे बने कई मंदिरों में गंगा का पानी प्रवेश कर गया है। मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के शवदाह स्थल भी जलमग्न हो गए हैं। ऐसे में अंतिम संस्कार के लिए घाट के ऊपरी हिस्से का इस्तेमाल किया जा रहा है। नमो घाट की सीढ़ियां भी पानी में डूब गई हैं। गंगा का पानी लगातार बढ़ने के कारण प्रशासन ने लोगों को नदी के किनारे जाने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग की है। दशाश्वमेध घाट पर होने वाली प्रसिद्ध गंगा आरती भी अब घाट के ऊपरी हिस्से और छत पर कराई जा रही है।

    गोंडा में घाघरा नदी के उफान ने ग्रामीण इलाकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। जिले के पांच गांव बाढ़ की चपेट में बताए जा रहे हैं और नदी खतरे के निशान के ऊपर बह रही है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में मवेशियों के लिए पहुंचाए गए सूखे भूसे को लेकर भी अफरा तफरी का माहौल देखने को मिला। भूसा लेने के लिए ग्रामीणों की भीड़ जुट गई और स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को मौके पर बुलाना पड़ा। बाद में पुलिस की मौजूदगी में भूसे का वितरण कराया गया ताकि सभी जरूरतमंद लोगों तक चारा पहुंच सके।

    लखनऊ में भी पिछले चार दिनों से बारिश का सिलसिला जारी है। बुधवार सुबह राजधानी के कुछ इलाकों में हल्की बारिश हुई। इसके अलावा बाराबंकी समेत कई जिलों में बूंदाबांदी दर्ज की गई। आगरा वाराणसी कानपुर समेत प्रदेश के 40 से अधिक शहरों में सुबह बादल छाए रहे हालांकि बाद में कुछ इलाकों में धूप निकल आई। इसके बावजूद मौसम विभाग ने प्रदेश में बारिश का दौर जारी रहने की संभावना जताई है।

    मौसम विभाग ने उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में बारिश का अलर्ट जारी किया है। प्रयागराज गोंडा कौशांबी गाजीपुर और भदोही में 12वीं कक्षा तक के स्कूलों में छुट्टी घोषित की गई है। वहीं जौनपुर सोनभद्र और मिर्जापुर में आठवीं कक्षा तक के स्कूल बंद रखने का फैसला लिया गया है। प्रशासन लगातार जलभराव और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों पर नजर बनाए हुए है।

    लखनऊ के मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह के मुताबिक हवा में कम दबाव का क्षेत्र बनने मानसून ट्रफ के उत्तर की ओर खिसकने और बंगाल की खाड़ी से बड़ी मात्रा में नमी आने के कारण मानसून सक्रिय हुआ है। उनके अनुसार 23 अगस्त तक मानसूनी गतिविधियों में तेजी बनी रह सकती है। बंगाल की खाड़ी में बन रहे कम दबाव वाले सिस्टम के प्रभाव से बारिश का सिलसिला आगे भी जारी रहने की संभावना है। 20 और 21 अगस्त को प्रदेश के कई हिस्सों में भारी बारिश हो सकती है।

    ऐसे में अगले कुछ दिन उत्तर प्रदेश के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं। नदियों का बढ़ता जलस्तर बारिश और जलभराव पहले ही कई जिलों में लोगों की मुश्किलें बढ़ा चुका है। प्रशासन की ओर से लोगों को जलभराव वाले क्षेत्रों और नदियों के किनारे जाने से बचने की सलाह दी जा रही है। मौसम विभाग के अलर्ट के बीच लोगों की नजर अब आने वाले दिनों की बारिश पर टिकी है क्योंकि लगातार बारिश से हालात और गंभीर होने की आशंका बनी हुई है।

  • FBI की मोस्ट वांटेड सूची में भारतीय मूल का मेजर सिंह, हथियार और ड्रग्स तस्करी से जुड़े गंभीर आरोपों ने बढ़ाई तलाश

    FBI की मोस्ट वांटेड सूची में भारतीय मूल का मेजर सिंह, हथियार और ड्रग्स तस्करी से जुड़े गंभीर आरोपों ने बढ़ाई तलाश


    नई दिल्ली ।
    भारतीय मूल के कथित गैंगस्टर मेजर सिंह को अमेरिका की संघीय जांच एजेंसी FBI ने अपनी मोस्ट वांटेड सूची में शामिल किया है। एजेंसी के अनुसार मेजर सिंह पर हथियारों के अवैध कारोबार, ड्रग्स की आपूर्ति और तस्करी की साजिश तथा संगठित आपराधिक गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप हैं। अमेरिका में उसकी तलाश के लिए जांच एजेंसियों ने कार्रवाई तेज कर दी है और उसके बारे में जानकारी रखने वाले लोगों से संपर्क करने की अपील की गई है।

    FBI के मुताबिक मेजर सिंह का संबंध पंजाब से जुड़े जग्गू भगवानपुरिया क्राइम ग्रुप से बताया जाता है। जांच एजेंसी का आरोप है कि इस आपराधिक नेटवर्क की गतिविधियां केवल भारत तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इसके संपर्क और कथित आपराधिक संचालन अमेरिका के कुछ हिस्सों तक भी पहुंचे। इसी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े मामलों की जांच के दौरान मेजर सिंह का नाम सामने आया है।

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मेजर सिंह के खिलाफ कैलिफोर्निया की संघीय अदालत से गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा चुका है। यह वारंट 25 जून 2026 को जारी किया गया था। उस पर Racketeer Influenced and Corrupt Organizations यानी RICO कानून के तहत साजिश से संबंधित आरोप लगाए गए हैं। इसके अलावा बिना लाइसेंस हथियारों के कारोबार और अन्य आपराधिक गतिविधियों से जुड़े आरोप भी उसके खिलाफ दर्ज हैं।

    जांच एजेंसी ने मेजर सिंह पर ड्रग्स की आपूर्ति और तस्करी से जुड़ी साजिश में शामिल होने का भी आरोप लगाया है। अमेरिका में RICO कानून का इस्तेमाल संगठित आपराधिक नेटवर्क से जुड़े मामलों में किया जाता है। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति की कथित भूमिका को व्यापक आपराधिक गतिविधियों और नेटवर्क के संदर्भ में देखती हैं। मेजर सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि अदालत में होना अभी बाकी है और कानूनी प्रक्रिया के दौरान उसके पक्ष को भी सुना जाएगा।

    FBI के अनुसार जिस जग्गू भगवानपुरिया क्राइम ग्रुप से मेजर सिंह का कथित संबंध बताया जा रहा है, उसकी जड़ें पंजाब में हैं। जांच एजेंसी का दावा है कि इस नेटवर्क की आपराधिक गतिविधियों का विस्तार अंतरराष्ट्रीय स्तर तक हुआ। हथियारों और मादक पदार्थों की कथित तस्करी से जुड़े नेटवर्क पर अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब अंतरराष्ट्रीय अपराध संगठनों के बीच सीमा पार संपर्क जांच का बड़ा विषय बने हुए हैं।

    मेजर सिंह की तलाश में FBI का लॉस एंजिलिस कार्यालय भी सक्रिय है। एजेंसी ने आम लोगों से अपील की है कि यदि किसी व्यक्ति के पास मेजर सिंह के ठिकाने, गतिविधियों या उससे संबंधित कोई विश्वसनीय जानकारी है तो वह जांच एजेंसी तक पहुंचाए। मोस्ट वांटेड सूची में नाम शामिल होने के बाद उसकी तलाश को लेकर अमेरिकी एजेंसियों की कार्रवाई और तेज होने की संभावना है।

    मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मेजर सिंह पर लगाए गए आरोप केवल व्यक्तिगत आपराधिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कथित संगठित अपराध, हथियार और ड्रग्स तस्करी तथा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े बताए जा रहे हैं। अब अमेरिकी जांच एजेंसियां उसके संभावित ठिकानों और संपर्कों की जानकारी जुटाने में लगी हैं। अदालत में आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई से यह स्पष्ट होगा कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई साबित होती है।

  • अमेरिका-कनाडा व्यापार विवाद निर्णायक मोड़ पर, ट्रंप की समयसीमा से पहले समझौते की कोशिशें तेज, टैरिफ बढ़ने का खतरा मंडराया

    अमेरिका-कनाडा व्यापार विवाद निर्णायक मोड़ पर, ट्रंप की समयसीमा से पहले समझौते की कोशिशें तेज, टैरिफ बढ़ने का खतरा मंडराया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और कनाडा के बीच लंबे समय से चल रहा व्यापार विवाद अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां आने वाले कुछ घंटे दोनों देशों के आर्थिक और राजनीतिक संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के साथ समझौते के लिए बुधवार दोपहर 12 बजकर 1 मिनट तक की समयसीमा तय की है। निर्धारित समय तक सहमति नहीं बनने की स्थिति में कनाडा से अमेरिका पहुंचने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी दी गई है। इससे दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण व्यापारिक रिश्तों पर दबाव और बढ़ गया है।

    ट्रंप की ओर से रखी गई मांगें केवल टैरिफ व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। अमेरिका चाहता है कि कनाडा अधिक अमेरिकी सैन्य उपकरण खरीदे। इसके अलावा कनाडा की अमेरिका के गोल्डन डोम मिसाइल रक्षा प्रणाली में भागीदारी और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों तक अमेरिकी पहुंच भी बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल है। रणनीतिक खनिजों को लेकर अमेरिका की चिंता का संबंध चीन पर निर्भरता कम करने की व्यापक नीति से है। ऐसे खनिज आधुनिक रक्षा उपकरणों, ऊर्जा तकनीक और उच्च तकनीक वाले उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और ट्रंप के बीच पिछले दो दिनों में दो बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। कार्नी ने बातचीत को गहन और नाजुक बताया है और संकेत दिया है कि इस स्तर की चर्चा के विवरण को सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष अंतिम समय तक समझौते की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। हालांकि, दोनों देशों की प्राथमिकताओं में अंतर इतना बड़ा है कि समयसीमा समाप्त होने से पहले सहमति बनना आसान नहीं माना जा रहा।

    ट्रंप का कनाडा के प्रति मौजूदा रुख पारंपरिक अमेरिकी नीति से काफी अलग दिखाई देता है। उन्होंने कनाडाई उत्पादों पर अलग-अलग स्तर के टैरिफ लगाए हैं और कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने जैसी टिप्पणियां भी की हैं। इन बयानों और व्यापारिक कदमों से कनाडा में अमेरिका के प्रति असंतोष बढ़ा है। कनाडाई सरकार पर घरेलू स्तर पर यह दबाव भी है कि वह अमेरिकी दबाव के सामने अपने आर्थिक हितों से समझौता न करे।

    अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक मतभेद हालांकि नए नहीं हैं। सॉफ्टवुड लकड़ी, डेयरी बाजार और कई अन्य उत्पादों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहे हैं। मौजूदा टैरिफ संघर्ष ने इन पुराने मतभेदों को और गंभीर बना दिया है। हॉकी स्टिक और टंग डिप्रेशर जैसे उत्पादों पर भी अमेरिकी शुल्क लगाए जाने से विवाद का दायरा स्पष्ट होता है।

    दोनों देशों के बीच करीब 5,525 मील लंबी सीमा है और इस सीमा के जरिए रोजाना लगभग 3.3 लाख लोग तथा करीब 2 अरब डॉलर का सामान आवाजाही करता है। कनाडा के कुल माल निर्यात का लगभग 72 प्रतिशत अमेरिका को जाता है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाला व्यापार युद्ध कनाडा की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है, जबकि अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी महंगे आयात और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का असर पड़ सकता है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप की तय समयसीमा समाप्त होने से पहले दोनों पक्ष कोई समझौता कर पाएंगे। अंतिम दौर की बातचीत जारी रहने से उम्मीद बनी हुई है, लेकिन अमेरिकी मांगों और कनाडा की घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के बीच संतुलन बनाना कठिन है। यदि आखिरी समय में समझौता हो जाता है तो दोनों देशों को तत्काल आर्थिक दबाव से राहत मिल सकती है, लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो नए और ऊंचे टैरिफ व्यापारिक संबंधों को और तनावपूर्ण बना सकते हैं।