Category: National

  • पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    नई दिल्ली । भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी सामग्री को लेकर सरकार का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक वीडियो को फेसबुक से हटाए जाने के विवाद के बाद Meta पर सरकार की निगरानी और दबाव बढ़ा था। इसी पृष्ठभूमि में अब कंपनी की ओर से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी गैरकानूनी सामग्री यानी CSAM के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और उन्हें मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है।

    सरकारी रुख के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियां यदि अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद गैरकानूनी सामग्री के खिलाफ जरूरी कदम नहीं उठाती हैं तो उन्हें कानूनी संरक्षण को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अधिकारियों का कहना है कि कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री के मामलों में सेफ हार्बर का लाभ स्वतः सुनिश्चित नहीं माना जा सकता। हालांकि किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है या नहीं और उसे सेफ हार्बर सुरक्षा मिलेगी या नहीं इसका अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

    Meta के लिए यह मामला केवल CSAM सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है। कंपनी के एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और प्लेटफॉर्म पर सामग्री की पहुंच बढ़ाने वाली प्रणालियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकार की ओर से कंपनी से इस बात को लेकर जवाब मांगा गया है कि गैरकानूनी सामग्री को रोकने और बार बार सामने आने वाली ऐसी सामग्री पर कार्रवाई करने के लिए उसकी तकनीकी प्रणालियां किस तरह काम करती हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के बाद भारत में Meta की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद काफी बढ़ गया था। इस घटनाक्रम के बाद कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के बीच बैठक भी हुई थी। Meta की ओर से वीडियो हटाए जाने को गलती बताया गया और कंपनी के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने इस मामले पर माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार ने प्लेटफॉर्म पर मौजूद अन्य गंभीर समस्याओं को लेकर भी कंपनी से जवाब तलब किया।

    संसदीय स्तर पर भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर सख्त संदेश दिया गया था। समिति ने बाल यौन शोषण सामग्री, महिलाओं से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री और अन्य गैरकानूनी कंटेंट को हटाने की जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने की बात कही थी। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि कानून का पालन नहीं करने की स्थिति में संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

    सरकार और Meta के बीच हुई चर्चाओं में CSAM के अलावा डीपफेक, वेरिफाइड अकाउंट की सुरक्षा, एल्गोरिद्मिक पक्षपात और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे मुद्दे भी सामने आए। इससे स्पष्ट है कि भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए केवल कंटेंट हटाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपनी मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रक्रियाओं को भी अधिक जवाबदेह बनाना पड़ सकता है।

    दुनिया के दूसरे देशों में भी सोशल मीडिया से जुड़े नुकसान और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन सहित कई देशों में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और डिजिटल सामग्री की निगरानी को लेकर नियम कड़े किए जा रहे हैं। भारत में भी सरकार का मौजूदा रुख इसी व्यापक वैश्विक बहस के बीच सोशल मीडिया कंपनियों पर बढ़ती जवाबदेही का संकेत माना जा रहा है।

  • नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । नेपाल में एक बार फिर देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन में देश की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया। सम्मेलन में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की बात कही गई, जिसके बाद वहां के राजनीतिक माहौल में नई बहस शुरू हो गई है।

    नेपाल लंबे समय तक हिंदू राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता था, लेकिन वर्ष 2008 में राजशाही के अंत और राजनीतिक परिवर्तन के बाद देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया। इसके बाद से हिंदू राष्ट्र की मांग अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूहों की ओर से समय-समय पर उठती रही है। हाल के दिनों में मधेश और तराई क्षेत्रों में सामने आए सांप्रदायिक तनाव तथा सामाजिक असंतोष के बीच इस मांग ने फिर जोर पकड़ा है।

    देउबा गुट के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में नेपाल की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं को राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। प्रस्ताव में सनातन धर्म की पहचान को आगे बढ़ाने के साथ हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात भी कही गई। इसके साथ ही सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने पर जोर दिया गया।

    सम्मेलन के समापन समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने अपने धार्मिक विश्वास को लेकर खुलकर बयान दिया। उन्होंने कहा कि वह हिंदू हैं और उन्हें यह कहने का अधिकार होना चाहिए कि वह हिंदू हैं। देउबा ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनका रुख किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। उनके इस बयान को नेपाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सम्मेलन में नेपाल के मौजूदा संविधान को लेकर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए। हालांकि, ऐसे किसी भी बदलाव के लिए सभी संबंधित समूहों के साथ बातचीत और सहमति की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि संविधान में धार्मिक पहचान से जुड़े किसी बदलाव को लेकर व्यापक राजनीतिक संवाद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली का मुद्दा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की राजनीति, संविधान और सामाजिक संरचना से भी है। नेपाल में हिंदू और बौद्ध परंपराओं का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है, जबकि देश में अन्य धार्मिक समुदाय भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ऐसे में हिंदू राष्ट्र की मांग के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों को लेकर भी बहस तेज होने की संभावना है।

    देउबा गुट की ओर से सामने आया प्रस्ताव नेपाली कांग्रेस के भीतर भी राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक पहचान के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अब सम्मेलन में हिंदू राष्ट्र की पहचान को लेकर उठी आवाज ने इस बहस को फिर राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। हालांकि, नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संवैधानिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रक्रिया से गुजरना होगा।

  • CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    नई दिल्ली ।पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान दर्ज FIR को रद्द करने की मांग पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में प्रदर्शनकारियों की ओर से सभी FIR खत्म करने की मांग रखी गई, जबकि सरकार ने इसका विरोध करते हुए कुछ मामलों में जांच जारी रखने की जरूरत बताई।

    सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने पूरे मामले के लिए हाई पावर्ड कमेटी गठित करने की बात कही। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्ष कमेटी के सामने अपनी बात रख सकेंगे। कमेटी मामले से जुड़े तथ्यों और विभिन्न पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।

    प्रदर्शनकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत से सभी FIR रद्द करने का आदेश देने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों पर व्यापक स्तर पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया और कुछ मामलों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों को राहत देने पर आपत्ति जताई गई।

    सरकार की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी है। उनका तर्क था कि यदि सभी FIR एक साथ रद्द कर दी जाती हैं तो इससे गलत संदेश जा सकता है। संसद मार्च का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान उठाया गया और इसे कानून के दायरे में रहने की आवश्यकता से जोड़ा गया।

    इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने का अधिकार देता है। हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रदर्शन के दौरान कानून का उल्लंघन या गंभीर आपराधिक गतिविधि के आरोपों वाले मामलों को अलग नजरिए से देखा जा सकता है।

    सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट से अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सभी FIR खत्म करने की मांग की जा रही है। अदालत ने सरकार की आपत्तियों और सुझावों को सुनते हुए कहा कि सभी पक्षों की बात को प्रस्तावित कमेटी के समक्ष रखा जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी अपनी बात रखने की मांग की गई। उनके पक्ष का कहना था कि FIR या अन्य मामलों में कोई निर्णय लेने से पहले प्रभावित पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से उन मामलों की सूची भी मांगी जिनमें जांच आगे जारी रखना आवश्यक समझा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि प्रस्तावित कमेटी सभी मामलों को देखने के बाद यह समझने में मदद करेगी कि किन मामलों में कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और किन मामलों में राहत पर विचार किया जा सकता है।

    कमेटी की संरचना को लेकर अदालत ने बताया कि एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, पूर्व पुलिस महानिदेशक और पूर्व सीबीआई निदेशक से सहमति ली गई है। इसके अलावा कमेटी में अन्य सदस्यों को शामिल करने के सुझावों पर भी विचार किया जाएगा।

    अदालत की इस पहल से अब FIR से जुड़े सभी पक्षों को अपनी स्थिति विस्तार से रखने का अवसर मिलेगा। कमेटी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। फिलहाल अदालत ने सभी संबंधित मामलों की सूची और पक्षों की दलीलों को एक व्यापक प्रक्रिया के तहत देखने का रास्ता तैयार किया है।

  • TISS दीक्षांत समारोह में बड़ा बदलाव, CJI सूर्यकांत की जगह डॉ. सीएस प्रमेश होंगे 22 अगस्त को मुख्य अतिथि

    TISS दीक्षांत समारोह में बड़ा बदलाव, CJI सूर्यकांत की जगह डॉ. सीएस प्रमेश होंगे 22 अगस्त को मुख्य अतिथि

    नई दिल्ली । मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज ने अपने 86वें दीक्षांत समारोह के लिए मुख्य अतिथि के रूप में किए गए बदलाव की जानकारी दी है। 22 अगस्त को आयोजित होने वाले समारोह में अब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत मुख्य अतिथि नहीं होंगे। उनकी जगह टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. सीएस प्रमेश को मुख्य अतिथि बनाया गया है। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब हाल के दिनों में CJI को लेकर हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी में छात्रों के विरोध का मामला चर्चा में रहा है।

    TISS के दीक्षांत समारोह के लिए पहले CJI सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। उन्हें समारोह में विद्यार्थियों को संबोधित भी करना था। हालांकि अब संस्थान ने कार्यक्रम में बदलाव करते हुए डॉ. सीएस प्रमेश को मुख्य अतिथि बनाया है। डॉ. प्रमेश टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के निदेशक होने के साथ मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर में थोरैसिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष भी हैं।

    TISS का यह दीक्षांत समारोह पहले 2 अगस्त को आयोजित किया जाना था, लेकिन आयोजन से ठीक दो दिन पहले इसे स्थगित कर दिया गया था। संस्थान ने उस समय अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला देते हुए कार्यक्रम को टालने का फैसला किया था। संस्थान के अनुसार, उस समय छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों और आमंत्रित अतिथियों की सुरक्षा के साथ सामान्य कैंपस गतिविधियों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता थी।

    कार्यक्रम स्थगित किए जाने के बाद CJI सूर्यकांत की संभावित मौजूदगी को लेकर कैंपस में विरोध की आशंका भी सामने आई थी। इसके बाद अब 22 अगस्त के कार्यक्रम के लिए मुख्य अतिथि बदलने का निर्णय लिया गया है। हालांकि संस्थान की ओर से बदलाव के पीछे किसी एक कारण को औपचारिक रूप से अंतिम आधार के रूप में नहीं बताया गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में NALSAR का विवाद भी महत्वपूर्ण है। हैदराबाद स्थित इस प्रमुख विधि विश्वविद्यालय में CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह का मुख्य अतिथि बनाए जाने को लेकर छात्रों के एक वर्ग ने आपत्ति जताई थी। शुरुआत में करीब 70 छात्रों के विरोध से शुरू हुआ मामला बाद में 450 से अधिक छात्रों तक पहुंच गया था।

    छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र देकर निमंत्रण वापस लेने की मांग की थी। इसके बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से पूरे 2026 बैच के छात्रों के वकील के रूप में नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया गया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद CJI सूर्यकांत ने छात्रों को अपनी बात रखने के अधिकार पर जोर दिया और दंडात्मक कार्रवाई से बचने की बात कही।

    इसके बाद संबंधित निर्देश वापस ले लिया गया और विवाद कुछ हद तक शांत हुआ। CJI सूर्यकांत ने बाद में यह भी स्पष्ट किया था कि उन्होंने NALSAR के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनने का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में उनके समारोह में शामिल होने का प्रश्न भी नहीं उठता था।

    TISS के मामले में मुख्य अतिथि के बदलाव ने उच्च शिक्षा संस्थानों में दीक्षांत समारोहों के आयोजन, कैंपस वातावरण और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को फिर चर्चा में ला दिया है। फिलहाल 22 अगस्त के समारोह में डॉ. सीएस प्रमेश विद्यार्थियों को संबोधित करेंगे और दीक्षांत कार्यक्रम में मुख्य अतिथि की भूमिका निभाएंगे।

  • बारिश ने प्रयागराज में मचाई तबाही, 5 हजार घर जलमग्न; 6 फीट तक पानी में फंसे लोग बोले- क्या खाएं, कहां जाएं?

    बारिश ने प्रयागराज में मचाई तबाही, 5 हजार घर जलमग्न; 6 फीट तक पानी में फंसे लोग बोले- क्या खाएं, कहां जाएं?


    उत्तर प्रदेश । प्रयागराज में लगातार हुई भारी बारिश ने शहर की व्यवस्था की पोल खोल दी है। रविवार रात करीब 1 बजे शुरू हुई बारिश सोमवार दोपहर तक जारी रही और करीब 90 मिमी बारिश दर्ज की गई। कुछ ही घंटों की बारिश के बाद शहर के कई निचले इलाकों में हालात बाढ़ जैसे हो गए। पांच हजार से ज्यादा घरों में पानी घुसने की बात सामने आई है। कई मकानों में चार से छह फीट तक पानी भर गया। ग्राउंड फ्लोर पर रखा घरेलू सामान पानी में डूब गया और लोगों को मजबूरी में ऊपरी मंजिलों या छतों पर शरण लेनी पड़ी। प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि घर में पानी भरा है तो खाना कैसे बने और जाएं तो जाएं कहां।

    करेली इलाके में बारिश का असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया। यहां सड़कों पर खड़ी कारें और दोपहिया वाहन पानी में डूब गए। स्थानीय जानकारी के मुताबिक अकेले करेली में करीब 200 कारें पानी में फंस गईं। कई वाहनों को शाम तक ठेलकर या टू-चेन की मदद से गैराज तक पहुंचाया गया। इसके अलावा एक हजार से ज्यादा बाइक और स्कूटी भी जलभराव की चपेट में आ गईं। पानी में लंबे समय तक डूबे रहने के कारण कई वाहनों के खराब होने की आशंका है।

    मुंडेरा समेत कई इलाकों में घरों के भीतर पानी भरने से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। मुंडेरा की रहने वाली उषा देवी ने बताया कि घर में चारों तरफ पानी ही पानी है। छोटे बच्चे घर में हैं और पानी भरने के बाद खाना बनाने से लेकर पीने के पानी तक की समस्या खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि समझ नहीं आ रहा कि बच्चों को लेकर क्या करें और कहां जाएं।

    जलभराव को लेकर बच्चों में भी नाराजगी दिखाई दी। मुंडेरा में कुछ बच्चे हाथों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें लेकर सड़क पर पहुंचे और इलाके से पानी निकालने की मांग की। बच्चों का कहना था कि पानी भरने के कारण वे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। घरों के वॉशरूम तक पानी में डूबे हैं और कई जगह सीवर ओवरफ्लो होने से गंदा पानी भी आसपास फैल गया है।

    नैनी इलाके में भी हालात बेहद खराब बताए जा रहे हैं। एक परिवार ने अपने घर के अंदर का हाल दिखाया जहां किचन बेडरूम और वॉशरूम तक पानी पहुंच गया। कई परिवारों ने ग्राउंड फ्लोर पर रखा जरूरी सामान ऊपर की मंजिलों पर शिफ्ट किया। जिन मकानों में ऊपरी मंजिल नहीं है वहां लोग छतों पर बैठकर पानी कम होने का इंतजार करते नजर आए।

    करेली से नैनी तक कई इलाके जलमग्न

    प्रयागराज के करेली के सोलह मार्केट बी ब्लॉक गौस नगर शम्स नगर जेके नगर गड्ढा कॉलोनी और इस्लाम नगर के साथ नैनी के चकदौदी चक फैजुल्ला पंजाबी हाता और जमुनानगर जैसे इलाकों में भी जलभराव की गंभीर स्थिति बनी रही। टैगोर टाउन और सिविल लाइंस जैसे इलाकों में भी बारिश का असर देखने को मिला। कई जगह बारिश के पानी के साथ बड़े नालों का गंदा पानी भी घरों तक पहुंच गया।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश के दौरान हर साल जलभराव की समस्या सामने आती है लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर है। लोगों ने जल निकासी की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि बारिश का पानी निकालने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं दिखाई दिए।

    ड्रेनेज कनेक्शन को लेकर उठे सवाल

    मुंडेरा के राहुल यादव ने आरोप लगाया कि इलाके से होकर जाने वाली ड्रेनेज लाइन को आगे मुख्य सीवर लाइन से जोड़ा ही नहीं गया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते ड्रेनेज सिस्टम को मेन सीवर से जोड़ दिया जाता तो जलभराव की स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। उन्होंने नगर निगम कर्मचारियों और सीवर का काम करने वाले ठेकेदारों पर लापरवाही का आरोप लगाया।

    राहुल यादव के मुताबिक करीब छह महीने पहले IGRS और स्पीड पोस्ट के जरिए पूर्व मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह मेयर गणेश केसरवानी और पार्षद शिव कुमार को समस्या की जानकारी दी गई थी। उनका दावा है कि शिकायतों के बाद आश्वासन तो मिला लेकिन जमीनी स्तर पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।

    प्रयागराज में बारिश के बाद पैदा हुए इन हालातों ने एक बार फिर शहर की जल निकासी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हजारों परिवारों के घरों में पानी घुसने से घरेलू सामान का नुकसान हुआ है और कई परिवारों के सामने खाने पीने और सुरक्षित जगह पर पहुंचने की चुनौती खड़ी हो गई है। अब लोगों की निगाह प्रशासन पर है कि जलभराव वाले इलाकों से पानी निकालने और प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने के लिए कितनी तेजी से कदम उठाए जाते हैं।

  • यूपी में बारिश का कहर! लखनऊ समेत 30 शहरों में झमाझम बारिश, 10 जिलों में स्कूल बंद; काशी के घाट-मंदिर डूबे

    यूपी में बारिश का कहर! लखनऊ समेत 30 शहरों में झमाझम बारिश, 10 जिलों में स्कूल बंद; काशी के घाट-मंदिर डूबे


    उत्तर प्रदेशउत्तर प्रदेश में मानसून एक बार फिर पूरी तरह सक्रिय हो गया है। मंगलवार तड़के करीब 3 बजे से लखनऊ समेत प्रदेश के 30 से ज्यादा शहरों में रुक-रुककर बारिश का सिलसिला जारी है। कई इलाकों में सुबह से ही आसमान घने काले बादलों से ढका रहा और दिन निकलने के बावजूद अंधेरा छाया रहा। लगातार बारिश के कारण शहरों और कस्बों में जलभराव की स्थिति गंभीर होती जा रही है। कहीं सड़कें तालाब बन गई हैं तो कहीं पुलिस थाने और सरकारी अस्पताल तक पानी में घिर गए हैं। हालात को देखते हुए प्रदेश के करीब 10 जिलों में स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी गई है।

    संभल में तेज बारिश के बाद रोडवेज बस अड्डा पूरी तरह जलमग्न हो गया। सरकारी अस्पताल में भी बारिश का पानी घुस गया। प्रतापगढ़ के लालगंज इलाके में स्थिति और ज्यादा खराब नजर आई। यहां तहसील परिसर के साथ कोतवाली पुलिस स्टेशन प्राइमरी स्कूल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में करीब दो फीट तक पानी भर गया। पुलिस की गाड़ियों के पहिए तक पानी में डूब गए। निचले इलाकों में कई घरों के भीतर भी बारिश का पानी पहुंच गया है।

    भदोही और कौशांबी में भी भारी जलभराव देखने को मिला। कई प्रमुख सड़कों पर करीब एक फीट तक पानी जमा होने से लोगों को आवागमन में परेशानी हुई। प्रतापगढ़ में रातभर हुई बारिश के कारण मंदिरों और रिहायशी इलाकों में घुटनों तक पानी भरने की तस्वीरें सामने आई हैं। जलभराव के कारण कई स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हुई और बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए छुट्टी कर दी गई।

    भारी बारिश की चेतावनी को देखते हुए प्रयागराज प्रतापगढ़ मिर्जापुर कौशांबी भदोही हरदोई अमेठी और जौनपुर समेत करीब 10 जिलों में स्कूल बंद रखने का फैसला किया गया है। मौसम विभाग ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में बारिश की संभावना जताई है। प्रशासन की ओर से लोगों को जलभराव वाले क्षेत्रों और नदियों के किनारे जाने से बचने की सलाह दी जा रही है।

    काशी में गंगा का बढ़ा जलस्तर

    बारिश के साथ गंगा और यमुना समेत उत्तर प्रदेश की कई नदियों का जलस्तर भी लगातार बढ़ रहा है। वाराणसी में गंगा का पानी घाटों की सीढ़ियों से ऊपर पहुंच गया है। घाट किनारे बने 100 से ज्यादा छोटे मंदिर पानी से घिर गए हैं। मणिकर्णिका घाट पर स्थित रत्नेश्वर महादेव मंदिर और दशाश्वमेध घाट का ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर काफी हिस्से तक पानी में डूब गया है। कई जगह मंदिरों का केवल ऊपरी हिस्सा ही दिखाई दे रहा है।

    नमो घाट की सीढ़ियों तक भी गंगा का पानी पहुंच गया है। सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने बैरिकेडिंग कर दी है और लोगों से घाटों के किनारे नहीं जाने की अपील की गई है। दशाश्वमेध घाट पर होने वाली गंगा आरती अब छत के ऊपर कराई जा रही है।

    मणिकर्णिका घाट पर बदली अंतिम संस्कार की जगह

    गंगा का जलस्तर बढ़ने से मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के शवदाह स्थलों तक भी पानी पहुंच गया है। इसके बाद अंतिम संस्कार के लिए ऊपरी सीढ़ियों वाले हिस्से का इस्तेमाल किया जा रहा है। घाटों पर मौजूद लोगों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन लगातार निगरानी कर रहा है।

    कानपुर और उन्नाव में भी गंगा के किनारे बसे इलाकों में पानी भरने की स्थिति बनी हुई है। कई सौ घरों में पानी पहुंचने के कारण प्रभावित परिवारों को छतों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा है। चित्रकूट में मंदाकिनी और बरदहा नदी का जलस्तर बढ़ने से रामघाट की कई सीढ़ियां पानी में डूब गई हैं।

    23 अगस्त तक सक्रिय रह सकता है मानसून

    लखनऊ के मौसम वैज्ञानिक अतुल कुमार सिंह के मुताबिक हवा में कम दबाव का क्षेत्र बनने मानसून ट्रफ के उत्तर दिशा में खिसकने और बंगाल की खाड़ी से लगातार नमी आने के कारण मानसून सक्रिय हुआ है। 19 से 23 अगस्त के बीच प्रदेश में मानसूनी गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। बंगाल की खाड़ी में बन रहे कम दबाव के सिस्टम का असर भी उत्तर प्रदेश के मौसम पर दिखाई दे सकता है। खास तौर पर 20 और 21 अगस्त को कई इलाकों में भारी बारिश की संभावना जताई गई है।

    ऐसे में आने वाले दिनों में नदियों के जलस्तर में और बढ़ोतरी हो सकती है। प्रशासन ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। लोगों से अपील की गई है कि वे जलभराव वाले रास्तों से गुजरने से बचें और नदी तथा घाटों के आसपास जाने में विशेष सावधानी बरतें।

  • भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक

    भारत के अति प्राचीन रहस्यमयी मंदिर, जिनकी अनसुलझी पहेलियों और अकल्पनीय चमत्कारों के सामने विज्ञान भी हुआ नतमस्तक


    नई दिल्ली ।
    भारत की पहचान सदियों से उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण माने जाने वाले प्राचीन मंदिरों से रही है। देश के विभिन्न भूभागों में स्थित कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां की परंपराएं और अनोखी विशेषताएं आज के आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी कौतूहल का विषय बनी हुई हैं। इन मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं न केवल श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का प्रतीक हैं, बल्कि इनके निर्माण और चमत्कारों के पीछे छिपे रहस्यों को समझ पाना आज भी शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

    उत्तरी भारत के राजस्थान राज्य में स्थित कई प्रमुख मंदिर अपनी विशिष्ट परंपराओं के लिए जाने जाते हैं। बीकानेर के प्रसिद्ध देवी मंदिर में हजारों की संख्या में रहने वाले चूहों की मौजूदगी और उन्हें दिए जाने वाले प्रसाद की परंपरा अद्भुत मानी जाती है। इसी प्रकार धौलपुर क्षेत्र में चंबल नदी के निकट स्थित प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दिन में तीन बार रंग बदलने की मान्यता भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। दौसा जिले में स्थित हनुमान मंदिर में भी नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति और आध्यात्मिक शांति के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं।

    दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में स्थित वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर की अपनी अलग भव्यता और धार्मिक महत्ता है। इस मंदिर परिसर से जुड़ी अनेक धार्मिक कल्पनाएं और प्राकृतिक ध्वनियों की अनुभूति श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित करती है। असम के गुवाहाटी में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या देवी का स्थल भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है, जहां प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

    तटीय राज्यों की बात करें तो गुजरात के अरब सागर तट पर स्थित शिव मंदिर ज्वार-भाटे की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण दिन में दो बार समुद्र के पानी में पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और पानी उतरने पर पुनः स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगता है। भावनगर तट के समीप स्थित एक अन्य शिव मंदिर में भी समुद्र की लहरें प्राकृतिक रूप से शिवलिंग का जलाभिषेक करती हैं, जहां भक्त केवल पानी का स्तर घटने पर ही पैदल पहुंचकर पूजा-अर्चना कर पाते हैं।

    मध्य प्रदेश के तटीय और सीमावर्ती जिलों में स्थित अनेक प्राचीन मंदिरों की महत्ता भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाती है। भिंड जिले में स्थित प्रसिद्ध हनुमान मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियों के अनुसार श्रद्धालु असाध्य रोगों से राहत पाने की आस में यहां माथा टेकने आते हैं। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में भी ऐसे मंदिर मौजूद हैं, जहां शिवलिंग पर प्राकृतिक बिजली गिरने के बाद उसका पुनः जुड़ जाना, एक लाख छिद्रों वाले शिवलिंग का अस्तित्व होना अथवा कोणार्क के रथ रूपी सूर्य मंदिर के पहियों से सटीक समय का अनुमान लगाना जैसी अद्भुत विशेषताएं देखने को मिलती हैं।

    इन सभी स्थलों की ऐतिहासिकता, वास्तुकला और धार्मिक अनुष्ठान भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने कई बार इन घटनाओं के पीछे के भौतिक और वैज्ञानिक कारणों को समझने का प्रयास किया है, परंतु अनेक प्रश्नों के उत्तर आज भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सके हैं। यही कारण है कि यह सभी स्थान न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • दिल्ली कूच पर अड़े किसानों ने ठुकराया सीएम का न्योता, 29 अगस्त तक खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा जारी

    दिल्ली कूच पर अड़े किसानों ने ठुकराया सीएम का न्योता, 29 अगस्त तक खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा जारी


    नई दिल्ली ।
    विभिन्न मांगों को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ने पर अड़े किसान संगठनों ने एक बार फिर अपना रुख कड़ा कर लिया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें आयोजित की गईं, परंतु बॉर्डर खोलने और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने की अनुमति देने को लेकर दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी। सहमति न बन पाने की स्थिति में किसानों ने राजमार्ग के एक हिस्से में तंबू गाड़ दिए हैं और वहां अपना मोर्चा स्थापित कर लिया है।

    किसान नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे 29 अगस्त तक खनौरी सीमा पर ही बने रहेंगे। संगठन की ओर से यह भी साफ किया गया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के यातायात को पूरी तरह बाधित नहीं किया जाएगा। किसान केवल सड़क के एक किनारे बैठकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे ताकि आम जनता को अत्यधिक असुविधा का सामना न करना पड़े। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य प्रशासन की ओर से मुख्यमंत्री स्तर की वार्ता का न्योता दिया गया था, जिसे किसान प्रतिनिधियों ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

    किसान प्रतिनिधियों का तर्क है कि उनकी प्रमुख मांगें केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से संबंधित हैं, इसलिए राज्य स्तर की बैठकों से समाधान निकलना संभव नहीं है। उन्होंने मांग रखी है कि केंद्रीय कृषि मंत्री अथवा केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के साथ उनकी सीधी वार्ता आयोजित कराई जाए। उनका कहना है कि पिछले आंदोलनों के दौरान जिन बिंदुओं पर बातचीत रुक गई थी, वहीं से पुनः नए सिरे से आधिकारिक चर्चा शुरू की जानी चाहिए।

    दूसरी ओर, सीमावर्ती क्षेत्रों पर लगातार दूसरे दिन भी पुलिस और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती देखने को मिली। सुरक्षा के दृष्टिकोण से कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई है और मुख्य रास्तों को सील कर दिया गया है। इसके चलते दिल्ली और पंजाब को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारी वाहनों के साथ-साथ यात्री वाहनों की आवाजाही पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। यातायात को सुचारू रखने के लिए प्रशासन ने विभिन्न वैकल्पिक मार्गों से गाड़ियों को डाइवर्ट किया है।

    मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों के किसान संगठन भी देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे किसान आंदोलनों और उनकी मांगों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं। कृषि नीतियों, न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा अन्य वित्तीय राहत से जुड़े मुद्दे देश भर के किसान समुदायों के लिए अत्यंत संवेदनशील और प्रासंगिक माने जाते हैं।

    वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी स्वयं बॉर्डर पर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था तथा कंक्रीट बैरिकेडिंग का जायजा ले रहे हैं। गश्त बढ़ा दी गई है और सभी संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। पंजाब और हरियाणा दोनों पक्षों के पुलिस अधिकारी लगातार प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे और किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

    किसान प्रतिनिधियों का कहना है कि वे किसी भी स्थिति में कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में नहीं लेंगे और उनका यह प्रदर्शन पूरी तरह से अनुशासित तथा शांतिपूर्ण रहेगा। हालांकि जब तक केंद्रीय स्तर पर उनकी वार्ता की मांग पूरी नहीं हो जाती, तब तक वे खनौरी बॉर्डर पर ही अपना ठहराव जारी रखेंगे।

    फिलहाल, सुरक्षा बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर हैं और पुलिस प्रशासन स्थिति की लगातार समीक्षा कर रहा है। सीमा से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां तैनात की गई हैं। अब यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में केंद्रीय स्तर से संवाद की प्रक्रिया शुरू होती है या प्रदर्शन स्थल पर गतिरोध इसी प्रकार बरकरार रहता है।

  • भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने पद से दिया इस्तीफा, आर्थिक परिस्थितियों और नौकरी में वापसी को बताया वजह

    भाजपा राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने पद से दिया इस्तीफा, आर्थिक परिस्थितियों और नौकरी में वापसी को बताया वजह


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने अपने पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से त्यागपत्र देकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। अपने इस अप्रत्याशित कदम के पीछे उन्होंने व्यक्तिगत और आर्थिक परिस्थितियों को मुख्य कारण बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दलों में प्रवक्ता का पद पूरी तरह से स्वैच्छिक होता है और इसके लिए कोई वेतन या मानदेय प्रदान नहीं किया जाता है।

    प्राप्त विवरण के अनुसार, पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता ने काफी समय पहले ही राजनीति और अपने पेशेवर जीवन के बीच संतुलन बनाने की योजना तैयार कर ली थी। पूर्व में कॉर्पोरेट और सर्विस इंडस्ट्री में कार्यरत रहने के कारण उन्होंने अपने जीविकोपार्जन के लिए पुनः पुरानी नौकरी में लौटने का मन बनाया है। उनका कहना है कि लंबे समय तक राजनीति को पूर्णकालिक समय देने के बाद अब आर्थिक प्राथमिकताओं को संभालना अत्यंत आवश्यक हो गया था।

    पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया था, परंतु उन्होंने अपने रुख पर कायम रहने की बात कही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष को भेजे गए औपचारिक पत्र में उल्लेख किया गया है कि यद्यपि पार्टी के इस फैसले से वे अत्यंत भावुक हुए, लेकिन गहन चिंतन-मनन के पश्चात उन्होंने सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का अंतिम निर्णय लिया।

    पूर्व प्रवक्ता ने पार्टी के भीतर अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि विचार अभिव्यक्ति के मामले में उन्हें सदैव स्वतंत्रता प्राप्त रही। संगठन के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सभी विषयों पर खुली चर्चा का माहौल रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे सीधे तौर पर पार्टी की गतिविधियों का हिस्सा नहीं रहेंगे, परंतु राष्ट्र निर्माण और विचारधारा के स्तर पर उनका समर्थन निरंतर बना रहेगा।

    मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी जहां युवा वर्ग राजनीति और पेशेवर करियर के बीच संतुलन बनाने के प्रयास में रहता है, इस प्रकार के घटनाक्रम से यह संदेश जाता है कि जनसेवा के साथ आर्थिक स्वावलंबन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारतीय राजनीति में प्रवक्ताओं की भूमिका और उनकी कार्यप्रणाली को लेकर भी अक्सर इस प्रकार के सवाल उठते रहे हैं।

    भविष्य की योजनाओं के विषय में जानकारी देते हुए उन्होंने संकेत दिया है कि वे एक नया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म शुरू करने जा रहे हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य मध्यम वर्ग के दैनिक जीवन से जुड़े विषयों, कर प्रणाली और उनके नागरिक अधिकारों को मजबूती से उठाना होगा। इसके माध्यम से नागरिकों के जीवन स्तर और सरकारी सुविधाओं के संतुलन पर संवाद स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

    राजनीतिक सफर की बात करें तो वे कई वर्षों पूर्व एक अन्य प्रमुख राजनीतिक दल को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। अपने कार्यकाल के दौरान वे विभिन्न टीवी बहसों और सार्वजनिक मंचों पर पार्टी का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं। अचानक आए इस फैसले ने उनके समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है।

    फिलहाल, उनके द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात पर बहस जारी है कि किस प्रकार पेशेवर पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के लिए राजनीति में निरंतर बने रहना एक बड़ी चुनौती साबित होता है। स्थिति यह है कि उनका त्यागपत्र अब पूरी तरह से अंतिम माना जा रहा है और वे अपने नए प्रोजेक्ट पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

  • मुजफ्फरनगर के जज की सुरक्षा पर खतरा, 22 को फांसी सुनाने के बाद बिना अनुमति हटाया गया गनर

    मुजफ्फरनगर के जज की सुरक्षा पर खतरा, 22 को फांसी सुनाने के बाद बिना अनुमति हटाया गया गनर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में अत्यंत संवेदनशील मामलों में कड़े फैसले सुनाने वाले फास्ट ट्रैक कोर्ट के न्यायाधीश की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के पीठासीन अधिकारी अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने अपनी जान को खतरा बताते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को एक पत्र लिखा है। न्यायाधीश ने पुलिस महकमे के जिम्मेदार अधिकारियों पर गंभीर लापरवाही, मनमानी और सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन के आरोप लगाए हैं।

    उल्लेखनीय है कि संबंधित न्यायाधीश ने महज 129 दिनों के अल्प समय में 9 अत्यंत चर्चित और जघन्य आपराधिक मामलों की सुनवाई पूरी करते हुए कुल 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। लगातार कठोर फैसले सुनाए जाने के कारण उनकी सुरक्षा व्यवस्था बेहद संवेदनशील मानी जा रही थी। ऐसे में सुरक्षा घेरे में अचानक किए गए बदलाव ने न्यायिक हलकों और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

    डीजीपी को भेजे गए पत्र में न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि उनकी सुरक्षा में तैनात गनर को बिना किसी ठोस वजह और बिना उनकी पूर्व अनुमति के अचानक हटा दिया गया। पत्र के अनुसार प्रतिसार निरीक्षक द्वारा लिया गया यह निर्णय प्रशासनिक व्यवस्था में गंभीर प्रोटोकॉल उल्लंघन की श्रेणी में आता है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि गनर को हटाए जाने के तुरंत बाद संबंधित पुलिसकर्मी ने भी बिना कोई सूचना दिए अपनी ड्यूटी छोड़ दी।

    न्यायाधीश ने अपने पत्र में प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों के बीच सुरक्षा प्रोटोकॉल में किए जाने वाले भेदभाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने उल्लेख किया कि आमतौर पर जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या अन्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के गनरों को उनकी सहमति या जानकारी के बिना नहीं बदला जाता, लेकिन संवेदनशील न्यायिक पदों पर आसीन अधिकारियों के मामले में इस निर्धारित प्रक्रिया का अनदेखा किया जा रहा है।

    यह मामला केवल मुजफ्फरनगर तक सीमित न होकर पूरे देश के न्यायिक वर्ग की सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय बन गया है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। सुरक्षा में इस प्रकार की चूक न्यायिक कार्यों के निष्पक्ष और निडर संपादन में बड़ी बाधा बन सकती है।

    पत्र के माध्यम से मांग की गई है कि इस पूरे प्रकरण की जांच कराई जाए और दोषी पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। इसके साथ ही न्यायाधीश की सुरक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से कड़ा करने और पूर्ववत प्रोटोकॉल को बहाल करने का आग्रह किया गया है, ताकि संवेदनशील मुकदमों की सुनवाई निर्भीक वातावरण में जारी रह सके।