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  • कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका, दो विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस की पांचवीं सीट की राह आसान

    कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका, दो विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस की पांचवीं सीट की राह आसान


    नई दिल्ली । कर्नाटक विधान परिषद की सात सीटों के लिए जारी चुनावी प्रक्रिया के बीच भारतीय जनता पार्टी को एक अप्रत्याशित राजनीतिक झटका लगा है। मतदान के दौरान भाजपा से निष्कासित दो विधायकों द्वारा कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किए जाने की खबर ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बढ़त और भाजपा के लिए रणनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

    विधान परिषद की सात सीटों के लिए हो रहे चुनाव में कुल आठ उम्मीदवार मैदान में हैं। सामान्य परिस्थितियों में विधानसभा में मौजूद दलों की संख्या के आधार पर कांग्रेस चार और भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती थी। हालांकि सातवीं सीट को लेकर पहले से ही कड़ा मुकाबला माना जा रहा था। अब क्रॉस वोटिंग की खबरों ने इस मुकाबले को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

    राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा उन दो विधायकों को लेकर हो रही है जिन्होंने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। दोनों नेताओं को पहले भाजपा से निष्कासित किया जा चुका है, लेकिन उनके वोटों का असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। मतदान के दौरान उनकी मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ मौजूदगी ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना है।

    कर्नाटक में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन के बाद डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला है। ऐसे में विधान परिषद का यह चुनाव उनके नेतृत्व की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। कांग्रेस की कोशिश है कि उपलब्ध संख्या बल के अलावा निर्दलीय और अन्य समर्थन जुटाकर परिषद में अपनी स्थिति और मजबूत बनाई जाए। दूसरी ओर भाजपा इस चुनाव को अपनी संगठनात्मक मजबूती और विपक्षी भूमिका के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रही है।

    निर्वाचन प्रक्रिया के अनुसार प्रत्येक उम्मीदवार को जीत सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम 28 वोटों की आवश्यकता है। विधानसभा में कांग्रेस के पास सबसे अधिक विधायक हैं, जबकि भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) भी अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। सातवीं सीट के लिए आवश्यक अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती दोनों प्रमुख दलों के सामने रही है। ऐसे में क्रॉस वोटिंग की घटना चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम का असर केवल परिषद चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में राज्य की राजनीतिक दिशा और दलों के भीतर अनुशासन संबंधी सवालों को भी प्रभावित कर सकता है। विशेष रूप से भाजपा के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि पार्टी से अलग हो चुके नेताओं का प्रभाव अभी भी कुछ क्षेत्रों में बना हुआ है।

    चुनाव मैदान में कांग्रेस, भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला जारी है। कांग्रेस ने पांच उम्मीदवार उतारे हैं जबकि भाजपा के दो और जेडीएस का एक प्रत्याशी मैदान में है। इस कारण अंतिम सीट को लेकर राजनीतिक रणनीतियां लगातार बदलती रही हैं।

    मतदान समाप्त होने के बाद मतगणना के साथ ही तस्वीर साफ होगी कि क्रॉस वोटिंग का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा। हालांकि मतदान के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक की राजनीति में अंदरूनी खींचतान और राजनीतिक पुनर्संरेखण की प्रक्रिया अभी भी जारी है।

    विधान परिषद चुनाव के नतीजे न केवल दलों की वर्तमान ताकत को दर्शाएंगे, बल्कि आने वाले समय में राज्य की राजनीतिक रणनीतियों और गठबंधनों की दिशा भी तय कर सकते हैं। इसी कारण सभी दलों की नजर अब मतगणना और अंतिम परिणामों पर टिकी हुई है।

  • CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल रोक से इनकार, विस्तृत सुनवाई तक जारी रहेगा नया नियम, छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बरकरार

    CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल रोक से इनकार, विस्तृत सुनवाई तक जारी रहेगा नया नियम, छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बरकरार

    नई दिल्ली । कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा लागू की गई नई तीन-भाषा नीति को लेकर जारी विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति पर तत्काल रोक लगाने की मांग को स्वीकार करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि इतने महत्वपूर्ण शैक्षणिक और नीतिगत विषय पर कोई भी अंतरिम आदेश विस्तृत सुनवाई के बाद ही पारित किया जा सकता है। अदालत के इस रुख से फिलहाल बोर्ड की नई व्यवस्था प्रभावी बनी रहेगी, जबकि नीति का विरोध कर रहे अभिभावकों और शिक्षकों की चिंताएं भी बरकरार हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया था कि आगामी शैक्षणिक सत्र में इस नीति के क्रियान्वयन पर अस्थायी रोक लगाई जाए। उनका तर्क था कि नई व्यवस्था के तहत छात्रों को दो भारतीय भाषाओं सहित कुल तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिसके लिए स्कूलों में अभी पर्याप्त तैयारी नहीं है। हालांकि अवकाशकालीन पीठ ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और कहा कि इस विषय से जुड़ी अन्य याचिकाएं पहले से लंबित हैं, जिनकी सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिका को भी पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ा जाएगा ताकि सभी संबंधित पक्षों की दलीलें एक साथ सुनी जा सकें। न्यायालय का मानना है कि शिक्षा नीति से जुड़े ऐसे मामलों में जल्दबाजी में कोई फैसला देना उचित नहीं होगा और सभी तथ्यों तथा परिस्थितियों की गहन समीक्षा आवश्यक है।

    विवाद की जड़ हाल के महीनों में बोर्ड द्वारा जारी किए गए निर्देशों में हुए बदलाव को माना जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पहले यह संकेत दिया गया था कि नई भाषा व्यवस्था को आगामी वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, लेकिन बाद में अचानक समयसीमा बदलकर इसे जल्दी लागू करने का निर्णय लिया गया। इससे छात्रों, अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि कई विद्यालय अभी तक नई भाषा व्यवस्था के अनुरूप आवश्यक संसाधन विकसित नहीं कर पाए हैं। कई क्षेत्रों में प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सीमित है, जबकि कुछ भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें भी समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। ऐसे में विद्यार्थियों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

    अभिभावकों और शिक्षकों का एक वर्ग यह भी तर्क दे रहा है कि भाषा सीखना व्यक्तिगत रुचि, क्षेत्रीय आवश्यकता और शैक्षणिक सुविधा से जुड़ा विषय है। उनका मानना है कि पहले से निर्धारित पाठ्यक्रम के बीच नई भाषा को अनिवार्य रूप से शामिल करने से छात्रों को समायोजन संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए चुनौती अधिक हो सकती है जो पहले से दो भाषाओं के साथ अन्य विषयों का संतुलन बना रहे हैं।

    दूसरी ओर, नई शिक्षा व्यवस्था के समर्थकों का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा छात्रों के बौद्धिक विकास, सांस्कृतिक समझ और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में सहायक हो सकती है। उनका तर्क है कि भारतीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा देना शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप है और इससे विद्यार्थियों को विविध भाषाई परिवेश को समझने का अवसर मिलेगा।

    फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नई तीन-भाषा नीति पर अंतिम निर्णय आने में अभी समय लगेगा। आगामी सुनवाई में अदालत बोर्ड, संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विस्तार से विचार करेगी। तब तक यह मुद्दा देश के शिक्षा क्षेत्र में चर्चा और बहस का प्रमुख विषय बना रहेगा।

  • पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे को WhatsApp जालसाजों ने बनाया निशाना, 7.8 करोड़ की साइबर ठगी से मचा हड़कंप

    पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे को WhatsApp जालसाजों ने बनाया निशाना, 7.8 करोड़ की साइबर ठगी से मचा हड़कंप

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में सामने आए एक बड़े साइबर फ्रॉड ने एक बार फिर डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन पहचान की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल के पुत्र और पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश कुमार गुजराल साइबर ठगी का शिकार हो गए। जालसाजों ने बेहद सुनियोजित तरीके से उनकी पहचान का इस्तेमाल करते हुए करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी को अंजाम दिया। इस मामले में करीब 7.8 करोड़ रुपये की रकम ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दी गई, जिसके बाद पुलिस और साइबर एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं।

    प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने नरेश गुजराल की तस्वीर का उपयोग कर व्हाट्सऐप पर एक फर्जी प्रोफाइल तैयार की। इसके बाद ठगों ने उनके स्टाफ के एक सदस्य से संपर्क किया और खुद को नरेश गुजराल बताकर बातचीत शुरू की। संदेशों के माध्यम से यह विश्वास दिलाया गया कि वह किसी महत्वपूर्ण बैठक में व्यस्त हैं और तत्काल एक वित्तीय लेनदेन कराना आवश्यक है। इसी बहाने स्टाफ को एक निर्धारित बैंक खाते में आरटीजीएस के जरिए बड़ी राशि ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए।

    ठगों की योजना इतनी सुनियोजित थी कि शुरुआती स्तर पर किसी को संदेह नहीं हुआ। व्हाट्सऐप प्रोफाइल पर नरेश गुजराल की तस्वीर लगी होने और संवाद की शैली विश्वसनीय लगने के कारण संबंधित कर्मचारी निर्देशों का पालन करता रहा। हालांकि बाद में लेनदेन की प्रकृति और रकम को लेकर संदेह पैदा हुआ, जिसके बाद मामले ने नया मोड़ लिया।

    घटना का खुलासा तब हुआ जब संबंधित कर्मचारी ने पूरे मामले की जानकारी नरेश गुजराल की बेटी दीक्षा गुजराल को दी। उन्हें लेनदेन में कुछ असामान्य लगा और उन्होंने तत्काल अपने पिता से संपर्क कर भुगतान संबंधी निर्देशों की पुष्टि की। बातचीत के दौरान स्पष्ट हो गया कि नरेश गुजराल ने ऐसा कोई संदेश या आदेश जारी नहीं किया था। इसके बाद परिवार को एहसास हुआ कि वे एक बड़े साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुके हैं।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्काल साइबर अपराध हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत मिलते ही साइबर विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों ने मनी ट्रेल की जांच शुरू कर दी। बैंक खातों और लेनदेन के रिकॉर्ड को खंगालते हुए अधिकारियों ने तेजी से कार्रवाई की, जिसके परिणामस्वरूप ठगी गई राशि का एक बड़ा हिस्सा समय रहते फ्रीज कराया जा सका। शुरुआती कार्रवाई में लगभग चार करोड़ रुपये को सुरक्षित कर लिया गया, जिससे संभावित नुकसान को काफी हद तक सीमित करने में मदद मिली।

    पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि ठगों ने व्यक्तिगत जानकारी और संपर्क विवरण कैसे प्राप्त किए। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस धोखाधड़ी के पीछे कोई संगठित साइबर गिरोह सक्रिय है या नहीं। जांच एजेंसियां डिजिटल साक्ष्यों, बैंकिंग रिकॉर्ड और संचार माध्यमों का विश्लेषण कर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।

    यह घटना इस बात का बड़ा उदाहरण है कि आज के समय में केवल फोटो और नाम का इस्तेमाल कर किसी की पहचान का दुरुपयोग किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी वित्तीय निर्देश को केवल मैसेज के आधार पर स्वीकार करने के बजाय स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना जरूरी है। विशेष रूप से बड़ी रकम के लेनदेन से पहले फोन कॉल या प्रत्यक्ष पुष्टि जैसी प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक हो गया है।

    साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच यह प्रकरण आम लोगों और संस्थानों दोनों के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सतर्कता, पहचान की पुष्टि और त्वरित शिकायत ही ऐसे अपराधों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मानी जा रही है।

  • बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, ऋतब्रत बनर्जी को मिली राहत; ममता खेमे को झटका

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर चल रहे विवाद के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दिए जाने के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। इस आदेश के साथ ही यह साफ हो गया है कि फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी ही पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाते रहेंगे।

    यह मामला उस समय अदालत पहुंचा था जब विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रिया में मूल राजनीतिक दल की अनुशंसा और संगठनात्मक स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी आधार पर अदालत से मांग की गई थी कि अंतिम निर्णय आने तक इस नियुक्ति पर तत्काल रोक लगाई जाए।

    मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क अदालत के समक्ष रखे। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने उपलब्ध तथ्यों और कानूनी पक्षों पर विचार करने के बाद अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि वर्तमान परिस्थितियों में नियुक्ति पर रोक लगाने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता। इसके परिणामस्वरूप विधानसभा अध्यक्ष का पूर्व निर्णय प्रभावी बना रहेगा।

    अदालत के आदेश से ऋतब्रत बनर्जी को बड़ी राहत मिली है। अब वे अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक विपक्ष के नेता के रूप में सदन के भीतर अपनी भूमिका जारी रख सकेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला विधानसभा की शक्ति संरचना और विपक्ष की रणनीति दोनों पर प्रभाव डाल सकता है। साथ ही यह राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में नए समीकरण भी पैदा कर सकता है।

    हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए दोनों पक्षों को विस्तृत हलफनामे और लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि अगली सुनवाई से पहले सभी संबंधित पक्ष अपने तर्क, दस्तावेज और कानूनी आधार रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें। इसके बाद मामले के विभिन्न पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की जाएगी और अंतिम निर्णय की दिशा तय होगी।

    इस फैसले के बाद विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र और उनके प्रशासनिक निर्णय को भी फिलहाल कानूनी संरक्षण मिला है। अदालत के रुख से यह संकेत मिला है कि संवैधानिक पदों से जुड़े मामलों में न्यायालय बिना विस्तृत सुनवाई के हस्तक्षेप करने से बचना चाहता है। यही कारण है कि अदालत ने अंतिम निर्णय से पहले यथास्थिति बनाए रखने को प्राथमिकता दी है।

    राजनीतिक दृष्टि से यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्य की सत्तारूढ़ राजनीति और विपक्षी खेमे के बीच पहले से जारी टकराव के बीच यह मामला केवल एक पद की नियुक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियां, दलगत अधिकार, संसदीय परंपराएं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई संवैधानिक प्रश्न भी शामिल हो गए हैं।

    फिलहाल सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं, जहां दोनों पक्ष अपने विस्तृत कानूनी तर्क अदालत के सामने रखेंगे। तब तक ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य करते रहेंगे और विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय पूरी तरह लागू माना जाएगा।

  • कच्चे तेल में नरमी के बावजूद तुरंत नहीं घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें, सरकार ने बताया 12,000 करोड़ रुपये के बोझ और वैश्विक हालात का पूरा गणित

    कच्चे तेल में नरमी के बावजूद तुरंत नहीं घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें, सरकार ने बताया 12,000 करोड़ रुपये के बोझ और वैश्विक हालात का पूरा गणित

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट के बाद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम कम होने की उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल कच्चे तेल के सस्ता होने से उपभोक्ताओं को तुरंत राहत मिलना संभव नहीं है। सरकार का कहना है कि घरेलू ईंधन कीमतों का निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें वैश्विक बाजार की स्थिति के साथ-साथ आयात, परिवहन, कर व्यवस्था और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल होते हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से दिए गए बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय बाजार तक पहुंचने में समय लगता है। कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल तुरंत रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचता, बल्कि इसके आयात, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में आई तात्कालिक नरमी का सीधा प्रभाव घरेलू खुदरा कीमतों पर तुरंत दिखाई नहीं देता।

    सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी थी। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने अतिरिक्त वित्तीय दबाव अपने ऊपर लिया।

    सरकारी आकलन के अनुसार, बढ़ी हुई लागत का असर सीमित रखने के प्रयास में केंद्र को लगभग 12,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा। सरकार का मानना है कि इस आर्थिक दबाव की भरपाई और बाजार संतुलन बनाए रखने के लिए मूल्य निर्धारण में सावधानी बरतना आवश्यक है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी गिरावट आते ही खुदरा ईंधन दरों में तत्काल कटौती करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव से निर्धारित नहीं होतीं। इसमें रिफाइनिंग लागत, फ्रेट चार्ज, बीमा, मुद्रा विनिमय दर, केंद्रीय और राज्य कर तथा विपणन खर्च भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से किसी एक क्षेत्र में लागत बढ़ती है तो उसका असर अंतिम कीमतों पर पड़ सकता है।

    इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुरुवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 78 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी नरम रुख के साथ 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कूटनीतिक प्रयासों में प्रगति के संकेतों ने निवेशकों की चिंताओं को कुछ हद तक कम किया है, जिससे तेल कीमतों पर दबाव घटा है।

    हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि वैश्विक बाजार अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। भू-राजनीतिक घटनाक्रम, आपूर्ति श्रृंखला की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे कारक आने वाले समय में तेल कीमतों की दिशा तय करेंगे। ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर किसी भी त्वरित निर्णय की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई देती है।

  • सपा में जल्द हो सकता है बड़ा राजनीतिक बदलाव, ओपी राजभर के दावों ने अटकलों को दी हवा

    सपा में जल्द हो सकता है बड़ा राजनीतिक बदलाव, ओपी राजभर के दावों ने अटकलों को दी हवा

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर संभावित टूट को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) प्रमुख और एनडीए सहयोगी ओमप्रकाश राजभर के लगातार दावों ने इस चर्चा को और हवा दे दी है कि सपा में जल्द बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है।

    राजभर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए दावा किया कि सपा के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और इसका असर जल्द सामने आएगा। उनके अनुसार, सपा के ‘बागी सांसदों’ के समूह का नेतृत्व उत्तर प्रदेश के उस क्षेत्र का एक नेता करेगा, जिसे वह ‘बागी भूमि’ कहते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाल ही में सपा कार्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम को लेकर कुछ वर्गों में नाराजगी बढ़ी है, जिससे पार्टी के अंदर असंतोष और गहरा गया है।

    राजभर ने अपने बयान में यह भी कहा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अब “सांसद बचाओ अभियान” शुरू करना चाहिए और नाराज सांसदों से मिलकर स्थिति संभालनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के भीतर कई सांसद असंतुष्ट हैं और समय के साथ बड़ा बदलाव सामने आ सकता है।

    अखिलेश यादव का पलटवार
    राजभर के इन बयानों पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि भविष्य की भविष्यवाणी करने वालों को पहले अपनी पार्टी की स्थिति देखनी चाहिए। अखिलेश ने एनडीए सहयोगियों पर सीट बंटवारे को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया और कहा कि भाजपा गठबंधन के भीतर असंतोष की वास्तविकता को छिपाने की कोशिश की जा रही है।

    राजभर का जवाब और तीखी बयानबाजी
    अखिलेश की प्रतिक्रिया के बाद ओमप्रकाश राजभर ने एक और पोस्ट में अपने हमले और तेज कर दिए। उन्होंने कहा कि पहले उन्हें लगता था कि अखिलेश यादव राजनीतिक रूप से अधिक समझदार हैं, लेकिन अब उनकी यह धारणा बदल गई है। राजभर ने दावा किया कि सपा के अंदरूनी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले समय में कई चौंकाने वाले घटनाक्रम सामने आ सकते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वे भविष्य में कुछ और राजनीतिक खुलासे कर सकते हैं।

    पुराने मुद्दों का भी जिक्र
    अपने बयान में राजभर ने 2008 के चर्चित ‘वोट के बदले नोट’ प्रकरण का भी उल्लेख किया और उस दौर की राजनीति पर सवाल उठाए। हालांकि उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई नया प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया।

  • IRCTC की काशी तीर्थ यात्रा: सिर्फ 16,700 रुपये में काशी, अयोध्या और प्रयागराज के दर्शन, रहने-खाने की पूरी व्यवस्था

    IRCTC की काशी तीर्थ यात्रा: सिर्फ 16,700 रुपये में काशी, अयोध्या और प्रयागराज के दर्शन, रहने-खाने की पूरी व्यवस्था


    नई दिल्ली । देशभर के श्रद्धालुओं के लिए इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पोरेशन (IRCTC) ने एक विशेष आध्यात्मिक यात्रा पैकेज लॉन्च किया है। ‘काशी तीर्थ यात्रा’ नाम से शुरू की गई यह 9 दिवसीय धार्मिक यात्रा श्रद्धालुओं को भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों के दर्शन कराने का अवसर देगी। खास बात यह है कि इस पैकेज में यात्रा, भोजन, ठहरने और स्थानीय परिवहन जैसी सभी आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं, जिससे यात्रियों को अलग से किसी व्यवस्था की चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

    यह विशेष यात्रा 9 सितंबर 2026 को तिरुनेलवेली से शुरू होकर 17 सितंबर 2026 तक चलेगी। यात्रा के दौरान श्रद्धालु गया, बोधगया, वाराणसी, अयोध्या और प्रयागराज जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करेंगे। IRCTC की भारत गौरव ट्रेन योजना के तहत संचालित इस टूर का उद्देश्य देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से लोगों को जोड़ना है।

    यात्रा के पहले दिन ट्रेन तिरुनेलवेली से रवाना होगी। रास्ते में कई प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को चढ़ने और उतरने की सुविधा दी जाएगी। तीसरे दिन श्रद्धालु गया पहुंचेंगे, जहां उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था की जाएगी। इसके बाद बोधगया स्थित विश्व प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर के दर्शन कराए जाएंगे। यह वही स्थान है जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और यह बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में गिना जाता है।

    इसके बाद यात्रा वाराणसी पहुंचेगी, जहां श्रद्धालु काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा देवी मंदिर, काशी विशालाक्षी मंदिर और काल भैरव मंदिर के दर्शन करेंगे। वाराणसी की प्रसिद्ध गंगा आरती भी इस यात्रा का प्रमुख आकर्षण होगी। शाम के समय गंगा घाटों पर होने वाली यह आरती श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और अद्भुत अनुभव प्रदान करती है।

    वाराणसी के बाद यात्रा अयोध्या पहुंचेगी। यहां श्रद्धालु राम जन्मभूमि, हनुमानगढ़ी और अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन करेंगे। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या देशभर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। इसके बाद ट्रेन प्रयागराज पहुंचेगी, जहां यात्री त्रिवेणी संगम में स्नान कर सकेंगे और प्रसिद्ध बड़े हनुमान मंदिर के दर्शन भी करेंगे।

    IRCTC ने इस पैकेज को तीन श्रेणियों में उपलब्ध कराया है। स्लीपर क्लास का किराया 16,700 रुपये प्रति व्यक्ति रखा गया है। वहीं थर्ड एसी के लिए 26,100 रुपये और सेकंड एसी के लिए 34,100 रुपये निर्धारित किए गए हैं। बच्चों के लिए अलग रियायती दरें लागू होंगी। पैकेज में रेल यात्रा, होटल में ठहरने की व्यवस्था, भोजन, स्थानीय परिवहन और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण शामिल है।

    धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और श्रद्धालुओं को सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया यह पैकेज उन लोगों के लिए बेहतरीन अवसर है, जो एक ही यात्रा में भारत की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के दर्शन करना चाहते हैं। काशी, अयोध्या और प्रयागराज जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा निश्चित रूप से श्रद्धालुओं के लिए एक यादगार और आध्यात्मिक अनुभव साबित हो सकती है।

  • हिमाचल प्रदेश….. चंबा-मसरूंड मार्ग पर 500 मीटर गहरी खाई में गिरी बोलेरो, 7 लोगों की मौत

    हिमाचल प्रदेश….. चंबा-मसरूंड मार्ग पर 500 मीटर गहरी खाई में गिरी बोलेरो, 7 लोगों की मौत


    चंबा।
    हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के चंबा जिले (Chamba district) में वीरवार को चंबा-मसरूंड मार्ग (Chamba-Masrund Road) पर छतरूंड के समीप एक बोलेरो (Bolero) अनियंत्रित होकर करीब 500 मीटर गहरी खाई (500-Meter-Feep Gorge) में जा गिरी, जिसमें सवार सभी सात लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। इस दर्दनाक हादसे ने क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ा दी है।


    मुंडन संस्कार में शामिल होकर लौट रहे थे घर

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, बोलेरो (एचपी-01सी-2581) में ग्राम महल पंचायत के सपरोठ गांव के छह लोग, जिनमें तीन महिलाएं और तीन पुरुष शामिल थे और वाहन का चालक सवार था। ये सभी लोग काकड़ोथा गांव में आयोजित एक मुंडन संस्कार में शामिल होकर अपने घर लौट रहे थे। इसी दौरान छतरूंड के पास अनियंत्रित होकर वाहन सड़क से लुढ़क गया और खाई में समा गया। खाई की गहराई लगभग 500 मीटर बताई जा रही है।


    राहत एवं बचाव कार्य

    हादसे की सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और ग्रामीण तत्काल मौके पर पहुंचे। तुरंत राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया। गहरी खाई से सभी सात शवों को बड़ी मुश्किल से बाहर निकाला गया। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है, ताकि मौत के कारणों की पुष्टि हो सके।


    जांच शुरू, कारणों की पड़ताल जारी

    प्रशासन ने इस भीषण हादसे की जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक तौर पर दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं। सड़कों की स्थिति, वाहन की गति, या किसी अन्य यांत्रिक खराबी जैसे संभावित कारणों की जांच की जा रही है। इस दर्दनाक हादसे ने सपरोठ पंचायत में मातम का माहौल बना दिया है।


    पहाड़ी रास्तों पर सुरक्षा की चिंता

    चंबा जैसे पहाड़ी जिलों में इस तरह के सड़क हादसे कोई नई बात नहीं हैं। संकरे और घुमावदार रास्ते, तीव्र ढलानें और कई बार खराब सड़क की स्थिति, इन सभी कारणों से दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। इस घटना ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में सड़क सुरक्षा के उपायों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि ऐसे हादसों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएं और सड़कों की स्थिति को सुधारा जाए।

  • PM मोदी कल PM-VBRY के तहत वितरित करेंगे 2400 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि

    PM मोदी कल PM-VBRY के तहत वितरित करेंगे 2400 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) शुक्रवार को विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (पीएम-वीबीआरवाई) (Pradhan Mantri Viksit Bharat Rojgar Yojana-PM-VBRY) के तहत करीब 2,400 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि का वितरण करेंगे।

    केंद्र सरकार की इस खास योजना का मकसद देश में नए रोजगार पैदा करना, नौकरियों को औपचारिक रूप देना और युवाओं की कार्यक्षमता को बढ़ाना है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, इस योजना का लक्ष्य हर क्षेत्र के श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा का लाभ पहुंचाना है। योजना के जरिये अब तक देशभर में 15 लाख नए रोजगार के मौके तैयार किए जा चुके हैं। पीएम-वीबीआरवाई को इस तरह बनाया गया है कि यह श्रमिकों और नियोक्ताओं (कंपनियों) दोनों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करे।


    पहली नौकरी पर मिलेंगे 15,000

    योजना के तहत पहली बार नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को 15,000 रुपये तक की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जिससे उन्हें अपने कॅरियर की शुरुआत में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।

    वहीं, जो कंपनियां अपने यहां अतिरिक्त रोजगार पैदा करती हैं, उन्हें हर नए कर्मचारी पर प्रति माह 3,000 रुपये तक की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, ताकि निरंतर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिले। विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियां चार साल तक , जबकि अन्य सभी क्षेत्रों की कंपनियां दो साल तक इसका लाभ उठा सकती हैं।

    दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम को पीएम नरेंद्र मोदी संबोधित करेंगे और डिजिटल माध्यम से राशि वितरित करेंगे। इसके बाद देशभर के कार्यालय ऑनलाइन माध्यम से जुड़ेंगे और अपने अधीन जिलों के लाभार्थियों को नियुक्ति पत्र देंगे। ईपीएफओ क्षेत्रीय कार्यालय की ओर से आईजीपी में होने वाले राज्यस्तरीय कार्यक्रम में प्रदेशभर से 1200 कर्मचारियों और 300 कंपनियों को आमंत्रित किया गया है। अन्य सभी कर्मचारियों को उनके खाते में डीबीटी के माध्यम से प्रोत्साहन राशि भेजी जाएगी। लखनऊ परिक्षेत्र के छह जिलों से योजना के तहत 4800 कंपनियों ने पंजीकरण कराया है। 60 हजार नए कर्मचारी जोडे़ गए हैं और 1.3 लाख कर्मी दोबारा सेवा में आए हैं।

  • होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट

    होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट


    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे समुद्री मार्गों का महत्व अक्सर चर्चा में रहता है। इन मार्गों पर किसी भी तरह का भू-राजनीतिक तनाव या सैन्य संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इन दिनों पश्चिमी देशों और वैज्ञानिकों की चिंता किसी समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राकृतिक समुद्री धारा को लेकर है जो यूरोप के मौसम और जीवनशैली की आधारशिला मानी जाती है। यह धारा है गल्फ स्ट्रीम, जिसके कमजोर पड़ने की आशंका ने वैज्ञानिकों को सतर्क कर दिया है।

    गल्फ स्ट्रीम अटलांटिक महासागर में बहने वाली गर्म समुद्री धारा है, जो एक बड़े समुद्री परिसंचरण तंत्र का हिस्सा है। वैज्ञानिक इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) के नाम से जानते हैं। यह प्रणाली समुद्र के भीतर एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों से गर्म पानी उत्तर दिशा की ओर बहता है और ठंडे क्षेत्रों में पहुंचकर नीचे डूब जाता है। इसके बाद यह ठंडा पानी फिर दक्षिण की ओर लौटता है। यह सतत चक्र पृथ्वी के तापमान और मौसम को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

    यूरोप के अपेक्षाकृत गर्म मौसम के पीछे भी इसी गल्फ स्ट्रीम का बड़ा योगदान माना जाता है। ब्रिटेन, नॉर्वे और पश्चिमी यूरोप के कई देशों में सर्दियां उतनी कठोर नहीं होतीं जितनी समान अक्षांश वाले अन्य क्षेत्रों में होती हैं। इसका कारण यही गर्म समुद्री धारा है, जो इन क्षेत्रों तक गर्मी पहुंचाती रहती है। यदि यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है तो यूरोप का जलवायु संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग इस समुद्री तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। बढ़ते तापमान के कारण आर्कटिक और उत्तरी क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मीठा पानी खारे पानी की तुलना में हल्का होता है, जिससे समुद्री जल का सामान्य डूबने वाला चक्र प्रभावित हो सकता है। यदि पानी पर्याप्त मात्रा में नीचे नहीं डूबेगा तो AMOC की गति धीमी पड़ सकती है और गल्फ स्ट्रीम कमजोर हो सकती है।

    यदि ऐसा होता है तो इसके प्रभाव बेहद व्यापक होंगे। उत्तर-पश्चिम यूरोप में तापमान कई डिग्री तक गिर सकता है, जिससे भीषण ठंड का दौर शुरू हो सकता है। दक्षिणी यूरोप में बारिश का पैटर्न बदलने से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, ऊर्जा की मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा वैश्विक मुद्दा बन सकता है।

    हालांकि वैज्ञानिकों को कुछ उम्मीदें भी दिखाई दे रही हैं। हालिया शोधों में संकेत मिले हैं कि आर्कटिक महासागर में बर्फ पिघलने से बनने वाले नए खुले समुद्री क्षेत्र पानी को तेजी से ठंडा करने में मदद कर सकते हैं। इससे समुद्री परिसंचरण तंत्र को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि यह संभावना अभी शोध के स्तर पर है और वैज्ञानिक लगातार इस पर निगरानी बनाए हुए हैं।

    कुल मिलाकर गल्फ स्ट्रीम का भविष्य केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक और नीति निर्माता इस समुद्री धारा की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं।