Category: National

  • 80 नहीं, पूरे 136 विधायक मेरे साथ: कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं पर डीके शिवकुमार का करारा जवाब

    80 नहीं, पूरे 136 विधायक मेरे साथ: कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं पर डीके शिवकुमार का करारा जवाब


    बेंगलुरु/नई दिल्ली। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर मची हलचल के बीच उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने एक बड़ा बयान देकर नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को नया मोड़ दे दिया है। दिल्ली में पार्टी आलाकमान के साथ बैठकों के दौर के बीच शिवकुमार ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि उनके खेमे में विधायकों की संख्या कम है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा कि विधानसभा में कांग्रेस के सभी 136 विधायक उनके साथ हैं।

    पिछले कुछ समय से राज्य में ‘पावर-शेयरिंग’ फॉर्मूलेढाई-ढाई साल के कार्यकाल को लेकर कयासों का बाजार गर्म है, खासकर तब जब नवंबर 2025 में सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो चुका है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र सिद्धारमैया के उस बयान के बाद कि ‘उनके पिता पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहेंगे’, राजनीति और गरमा गई थी। इसी पृष्ठभूमि में शिवकुमार का यह कहना कि136 विधायक मेरे साथ हैं, न केवल उनकी संगठन पर पकड़ को दर्शाता है, बल्कि आलाकमान को भी अपनी ताकत का सीधा संकेत है।

    शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके बीच कोई गोपनीय समझौता नहीं है जो सार्वजनिक न हो। उन्होंने पार्टी नेताओं को चेतावनी भी दी कि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी से पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचता है। हालांकि, उन्होंने यह जरूर जोड़ा कि वह दिल्ली में आगामी चुनावोंजैसे असम विधानसभा चुनाव की रणनीति और पार्टी मामलों पर चर्चा करने आए हैं, न कि मुख्यमंत्री की कुर्सी की मांग करने।

    राज्य में विपक्ष भाजपा लगातार कांग्रेस के भीतर चल रहे इस शीतयुद्ध को ‘अस्थिरता’ का नाम दे रहा है। ऐसे में शिवकुमार का ‘136 विधायकों’ वाला बयान पार्टी के भीतर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति भी माना जा रहा है। अब सबकी निगाहें मार्च 2026 में पेश होने वाले राज्य बजट पर टिकी हैं, जहाँ सिद्धारमैया अपना रिकॉर्ड 17वां बजट पेश करेंगे।

  • मोहन भागवत बनाम राज ठाकरे: 'भाषा की राजनीति' पर छिड़ी नई जंग, मनसे प्रमुख ने फिल्म हस्तियों की मौजूदगी को बताया 'दहसत की भीड़'

    मोहन भागवत बनाम राज ठाकरे: 'भाषा की राजनीति' पर छिड़ी नई जंग, मनसे प्रमुख ने फिल्म हस्तियों की मौजूदगी को बताया 'दहसत की भीड़'


    मुंबई/नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित भव्य समारोह अब एक बड़े सियासी विवाद में तब्दील हो गया है। इस कार्यक्रम में सलमान खान, अक्षय कुमार, रवीना टंडन और करण जौहर जैसी दिग्गज फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी ने जितनी सुर्खियां बटोरी थीं, उससे कहीं ज्यादा चर्चा अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के तीखे बयानों की हो रही है। राज ठाकरे ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला करते हुए दावा किया है कि मंच पर बैठे सितारे किसी वैचारिक प्रेम के कारण नहीं, बल्कि सत्ता की दहशत के कारण वहां जुटे थे।

    राज ठाकरे ने तंज कसते हुए कहा कि समारोह में शामिल लोग मोदी सरकार के डर से वहां मौजूद थे। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा कि अगर यह डर नहीं होता, तो कोई भी इतने उबाऊ और बोरिंग भाषण सुनने के लिए अपना समय खराब नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ प्रमुख मोहन भागवत को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि यह भीड़ उनके प्रति स्नेह या सम्मान के कारण उमड़ी थी। उनके अनुसार, यह केंद्र की सत्ता का रसूख था जिसने बॉलीवुड को कतार में खड़ा कर दिया।

    हमले का दूसरा बड़ा मोर्चा ‘भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता’ पर था। दरअसल, मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भाषा के नाम पर आंदोलन करने को एक ‘बीमारी’ करार दिया था। इस पर पलटवार करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि भारत में राज्यों का गठन ही भाषाई आधार पर हुआ है। कर्नाटक, तमिलनाडु, बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम करना अगर बीमारी है, तो यह पूरे देश में फैली है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब बाहरी लोग किसी प्रदेश में आकर वहां की संस्कृति का अनादर करते हैं, तब स्थानीय लोगों का आक्रोश स्वाभाविक है, इसे बीमारी कहना वास्तविकता को नकारना है।

    राज ठाकरे ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि जब गुजरात में यूपी-बिहार के लोगों को निकाला गया था, तब भाईचारे का संदेश देने वाले ये लोग कहां थे? उन्होंने मराठी समाज की सहनशीलता को कमजोरी समझने की चेतावनी देते हुए कहा कि संघ को गैर-राजनीतिक होने का दावा छोड़कर परोक्ष राजनीति बंद करनी चाहिए। अंत में उन्होंने चुनौती दी कि यदि संघ सच में सद्भाव चाहता है, तो उसे पहले केंद्र द्वारा थोपी जा रही हिंदी पर खुलकर अपना स्टैंड साफ करना चाहिए।

  • भारत में न्यायाधीशों की संख्या चीन-यूएस के मुकाबले बेहद कम, बिहार सबसे पिछड़ा

    भारत में न्यायाधीशों की संख्या चीन-यूएस के मुकाबले बेहद कम, बिहार सबसे पिछड़ा


    नई दिल्ली। देश की जिला अदालतों में मुकदमों के भारी बोझ के बीच प्रति दस लाख जनसंख्या पर सिर्फ 22 जज हैं। विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार 2007 तक यह संख्या कम से कम 50 जज होनी चाहिए थी। खासकर बिहार उत्तर प्रदेश झारखंड और पश्चिम बंगाल में यह औसत राष्ट्रीय स्तर से भी कम है।

    केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देशभर में जिला अदालतों के लिए 25 439 जजों की स्वीकृत संख्या है लेकिन करीब 5 000 पद अभी रिक्त हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार जिला अदालतों में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 22 जज ही उपलब्ध हैं। आज की अनुमानित जनसंख्या 140 करोड़ से अधिक होने के कारण यह अनुपात और घट सकता है।

    विधि आयोग ने 1987 में अपनी 120वीं रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 50 जज होने चाहिए ताकि न्याय की त्वरित उपलब्धता सुनिश्चित हो। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ऑल इंडिया जज एसोसिएशन बनाम भारत सरकार मामले में इसे लागू करने का आदेश दिया था।

    भारत चीन और अमेरिका से काफी पीछे

    जनसंख्या और जज के अनुपात की तुलना में भारत अन्य देशों से बहुत पीछे है।
    चीन: प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 300 जज
    अमेरिका: 150 जज
    यूरोप: 220 जज

    सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों की स्थिति

    सुप्रीम कोर्ट: प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 0.028 जज स्वीकृत क्षमता 34 वर्तमान में 33 कार्यरत
    उच्च न्यायालय: प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 0.92 जज स्वीकृत क्षमता 1 122 लगभग 300 पद रिक्त

    प्रमुख राज्यों में प्रति 10 लाख जनसंख्या जजों की स्थिति:

    बिहार – 19.45
    उत्तर प्रदेश – 18.52
    झारखंड – 21.43
    उत्तराखंड – 29.55
    दिल्ली – 53.43
    पश्चिम बंगाल – 12.05
    मध्य प्रदेश – 27.92
    गुजरात – 28.46
    असम – 15.54
    मिजोरम – 67.44

    विश्लेषकों का कहना है कि जजों की कमी और बढ़ती जनसंख्या के कारण अदालतों में न्याय की प्रक्रिया धीमी हो रही है और त्वरित न्याय मिलना मुश्किल हो रहा है।

  • बांग्लादेश को अमेरिका से मिली टेक्सटाइल छूट, भारत के कपड़ा उद्योग के लिए चिंता का विषय

    बांग्लादेश को अमेरिका से मिली टेक्सटाइल छूट, भारत के कपड़ा उद्योग के लिए चिंता का विषय


    नई दिल्ली। अमेरिका और बांग्लादेश के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए चुनौती बनता दिख रहा है। इस समझौते के तहत बांग्लादेश से अमेरिका को जाने वाले कपड़े पर आयात शुल्क शून्य रखा जाएगा। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी।

    उद्योग का कहना है कि अगर बांग्लादेश को शून्य शुल्क पर निर्यात करने की सुविधा मिल रही है तो भारत को भी समान लाभ मिलना चाहिए। मसौदे के अनुसार बांग्लादेश जितने मूल्य का कॉटन अमेरिका को भेजेगा उतने मूल्य के कपड़े और वस्त्र शून्य शुल्क पर अमेरिका को निर्यात कर पाएगा। इससे बांग्लादेशी कंपनियां अमेरिकी बाजार में सस्ती दरों पर अपने उत्पाद बेच पाएंगी।

    बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और वहां सस्ती श्रमशक्ति के कारण वस्त्र उत्पादन की लागत कम है। वर्तमान में बांग्लादेश अमेरिका को सालाना 9-10 अरब डॉलर के कपड़े निर्यात करता है और शून्य शुल्क मिलने के बाद यह निर्यात और तेजी से बढ़ सकता है।

    भारत के लिए चुनौती

    भारत का कुल टेक्सटाइल निर्यात 36-37 अरब डॉलर है जिसमें 2024-25 में लगभग 10 अरब डॉलर अमेरिका को गया। भारत मुख्य रूप से रेडीमेड गारमेंट्स कॉटन मैन-मेड फैब्रिक्स और होम टेक्सटाइल्स निर्यात करता है। बांग्लादेश को मिलने वाली छूट के कारण भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में नुकसान होने का खतरा है।

    उद्योग की मांग
    टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन विजय कुमार अग्रवाल का कहना है कि अमेरिका द्वारा बांग्लादेश को दी जा रही छूट से भारतीय निर्यातकों को नुकसान होगा। इसलिए उद्योग संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि भारत को भी बांग्लादेश जैसी छूट दी जाए ताकि भारतीय कंपनियां अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

  • कांग्रेस नेता का रील के लिए 'धुरंधर स्‍टाइल', रहमान डकैत के अंदाज में लहराई गन, पुलिस ने शुरू की जांच

    कांग्रेस नेता का रील के लिए 'धुरंधर स्‍टाइल', रहमान डकैत के अंदाज में लहराई गन, पुलिस ने शुरू की जांच

    नई दिल्ली । कर्नाटक के कलबुर्गी में एक कांग्रेस नेता ने ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍म धुरंधर के बेहद लोकप्रिय गाने Fa9la पर रील बनाकर विवाद खड़ा कर दिया है. इस रील में कांग्रेस विधायक के बेहद करीबी मतीन पटेल वीडियो में पिस्तौल और बंदूक लहराते नजर आते हैं. अब इस मामले में पुलिस ने जांच शुरू कर दी है.

    कलबुर्गी के पुलिस कमिश्‍नर शरणप्पा एसडी ने मंगलवार को पत्रकारों से कहा कि सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक व्यक्ति हथियार लहराता दिख रहा है. हम वीडियो में दिख रहे व्यक्ति को जानते हैं. मैंने अधिकारियों को यह पता लगाने के लिए कहा है कि वीडियो कहां बनाया गया और यह किस पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है.

    पुलिस कमिश्‍नर ने दिए निर्देश
    साथ ही पुलिस कमिश्‍नर ने कहा कि उन्होंने पुलिस को निर्देश दिया है कि पता लगाएं कि किस हथियार का इस्तेमाल किया गया था और क्या वह असली है या नहीं. साथ ही कहा कि अगर यह असली है तो हम देखेंगे कि क्या यह लाइसेंसी था या नहीं. अगर यह लाइसेंसी था तो हम जांच करेंगे कि क्या शर्तों का उल्लंघन हुआ था. शरणप्पा ने कहा कि अगर यह अवैध पाया गया, तो शस्त्र अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी.

    रहमान डकैत के अंदाज में डांस

    वीडियो में मतीन अपनी काली एसयूवी से उतरते हैं और फिर अपने दोस्तों के साथ डांस करते हुए आगे बढ़ते हैं यह ठीक बिलकुल वैसा ही है, जैसा फिल्‍म धुरंधर में रहमान डकैत अक्षय खन्ना बलूचिस्तान में एक हथियार डीलर के कैंप में घुसते वक्‍त करते हैं.

  • देश में पांच साल में गड्ढों में गिरने से 9 हजार 109 लोगों की मौत… रोजाना 6 लोगों ने गंवाई जान

    देश में पांच साल में गड्ढों में गिरने से 9 हजार 109 लोगों की मौत… रोजाना 6 लोगों ने गंवाई जान


    नई दिल्ली।
    सड़क परिवहन मंत्रालय (Ministry of Road Transport) के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 से 2023 के बीच देश में सड़कों पर बने गड्ढों (Potholes Roads) के कारण हुए सड़क हादसों (Road Accidents) में 9,109 लोगों की मौत हुई थी.यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है.वर्ष 2022 में जहां ऐसे हादसों में 1,856 लोगों की मौत हुई, वहीं 2023 में यह आंकड़ा बढ़ कर 2,161 तक पहुंच गया.यानी उस साल रोजाना औसतन छह लोगों की मौत हुई थी.उसके बाद का आंकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

    यह गड्ढे दोपहिया वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए सड़क हादसे की सबसे प्रमुख वजह बन गए हैं.मानसून में यह समस्या बेहद गंभीर हो जाती है.बीते सप्ताह दिल्ली के जनकपुरी इलाके में जल बोर्ड की ओर से खोदे गए गड्ढे में गिरकर कमल नामक 25 वर्ष के एक युवक की मौत हो गई थी।

    अदालतों की फटकार भी बेअसर

    बंबई हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने बीते साल अक्तूबर में इन मौतों से संबंधित एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद ऐसे मामलों में मृतकों के परिजनों को कम से कम छह लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया था.इससे पहले जुलाई 2018 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि सड़कों पर बने गड्ढों के कारण होने वाले हादसों से साफ है कि इनके लिए जिम्मेदार अधिकारी सही तरीके से अपनी ड्यूटी नहीं निभा रहे हैं. शीर्ष अदालतों की टिप्पणी और फटकार के बावजूद यह समस्या कम होने की बजाय बढ़ती ही जा रही है।

    परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों पर बने गड्ढे दोपहिया वाहनों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.सड़कों की मरम्मत के लिए जिम्मेदार नगर निगम, लोक निर्माण विभाग या नगरपालिकाएं अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाती.क्यों बनते हैं सड़कों पर गड्ढे?लेकिन आखिर सड़कों पर ऐसे गड्ढे क्यों हो जाते हैं और समय पर इनकी मरम्मत के उपाय क्यों नहीं किए जाते?

    इस सवाल पर लोक निर्माण विभाग के एक पूर्व इंजीनियर समरेश भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, “मानसून के सीजन में सड़कों पर पानी भरना और रिसना इसका एक प्रमुख कारण है.ज्यादातर मामलों में सड़कों पर भरे पानी को निकालने के लिए ड्रेनेज सिस्टम ठीक नहीं होता. उस दौरान भारी वाहनों के गुजरने के कारण सड़कों पर गड्ढे बन जाते हैं.इसके अलावा सड़क निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल भी दूसरी बड़ी वजह है”समरेश का कहना है कि कई बार बिजली और जल निगम जैसे विभाग भी सड़कों पर गड्ढे खोदकर उनको जस का तस छोड़ देते हैं.विभिन्न विभागों के बीच तालमेल की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है.उनके मुताबिक, कोई बड़ा हादसा होने के बाद राजनीतिक तौर पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है और तमाम विभाग अपना पल्ला झाड़ने लगते हैं.

    मुआवजे की कोई गारंटी नहीं

    एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक मोहम्मद तस्लीम डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हाल की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गड्ढों के कारण रोजाना 19 सड़क हादसे होते हैं और इनमें औसतन छह लोगों की मौत हो जाती है.इसके अलावा कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर जीवन भर के लिए अपाहिज हो जाते हैं.ऐसे लोगों का कोई आंकड़ा नहीं है” उनके मुताबिक, ऐसे हादसों में वाहनों को होने वाले नुकसान का भी कोई आंकड़ा कहीं नहीं मिलता. क्या ऐसे हादसों से प्रभावित लोगों को कानूनी तौर पर मुआवजा मिल सकता है?

    कलकत्ता हाईकोर्ट के एक एडवोकेट दीपक कुमार डीडब्ल्यू से कहते हैं, “सैद्धांतिक तौर पर प्रभावित लोग या उनके परिजन मुआवजे के हकदार हैं.लेकिन न्याय का रास्ता लंबा और जटिल है और उसके बाद भी जीत की कोई गारंटी नहीं है.कानूनी खामियों का फायदा उठा कर अक्सर तमाम विभाग एक-दूसरे पर अंगुली उठा कर बच निकलते हैं”हादसों को कैसे रोका जाएपरिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ जगह एआई तकनीक वाले कैमरे से सड़कों पर बने गड्ढों का पता लगा कर उनकी मरम्मत का काम जरूर किया जा रहा है लेकिन यह नाकाफी है.समरेश कहते हैं कि ऐसे हादसों पर अंकुश लगाने के लिए विभागों की जवाबदेही तय करनी होगी और तय समय सीमा के भीतर गड्ढों की मरम्मत नहीं करने की स्थिति में उन पर भारी जुर्माना लगाना होगा.वहीं मोहम्मद तस्लीम का कहना है कि समस्या तकनीक या पैसों की नहीं बल्कि इच्छाशक्ति और सोच की है.जब तक संबंधित विभागों का रवैया लापरवाह रहेगा, ऐसे हादसे बढ़ते ही रहेंगे.सड़क जैसे आधारभूत ढांचे के प्रबंधन पर गंभीरता से ध्यान दिया जाने की जरूरत है।

  • टीना अंबानी ने 40 हजार करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस ED के सामने पेश होने से किया इन्कार

    टीना अंबानी ने 40 हजार करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस ED के सामने पेश होने से किया इन्कार


    मुम्बई।
    बिजनेसमैन अनिल अंबानी (Businessman Anil Ambani) की पत्नी टीना अंबानी (Tina Ambani) ने आज प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है। ईडी लगभग 40,000 करोड़ रुपये के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामलों (Money laundering cases) की जांच कर रही है। सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय जांच एजेंसी इस मामले में टीना अंबानी को नया समन जारी करेगी। प्रवर्तन निदेशालय ने अनिल धीरूभाई अंबानी समूह (ADAG) और उससे जुड़ी संस्थाओं से जुड़े 40,000 करोड़ रुपये के कथित बैंकिंग और कॉर्पोरेट घोटाले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है।

    एक खबर में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि SIT का नेतृत्व संघीय जांच एजेंसी की मुख्यालय जांच इकाई (HIU) में अतिरिक्त निदेशक स्तर के अधिकारी कर रहे हैं और इसमें आधा दर्जन अन्य जांचकर्ता शामिल हैं। यह कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा ADAG के खिलाफ मामलों की समीक्षा करने के बाद उठाया गया है। पिछले सप्ताह, सर्वोच्च न्यायालय ने ईडी को एक SIT गठित करने का निर्देश दिया था जो मामले में निष्पक्ष, स्वतंत्र, त्वरित और निष्पक्ष जांच करेगी। अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को कथित सांठगांठ, मिलीभगत और साजिश की जांच करने और अपनी जांच को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने के लिए कहा था।

    ईडी पिछले साल से अनिल अंबानी और उनकी रिलायंस समूह की कंपनियों की जांच कर रहा है। अब तक एजेंसी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत तीन प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIRs) दर्ज की हैं। इसके अलावा, 12,000 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क भी की गई है। अनिल अंबानी से पिछले साल उनकी समूह की कंपनियों के कथित बैंक ऋण अनियमितताओं के लिए ईडी द्वारा पूछताछ की गई थी। कंपनी के एक पूर्व शीर्ष कार्यकारी और RCOM के पूर्व अध्यक्ष, पुनीत गर्ग को हाल ही में एजेंसी द्वारा गिरफ्तार किया गया है। अनिल अंबानी समूह की कंपनियों ने अतीत में किसी भी गलत काम से इनकार किया है।

  • भ्रष्टाचार के मामले में सुधरी भारत की रैकिंग, 185 देशों की लिस्ट में 5 स्थान की छलांग… 91वें स्थान पर पहुंचा

    भ्रष्टाचार के मामले में सुधरी भारत की रैकिंग, 185 देशों की लिस्ट में 5 स्थान की छलांग… 91वें स्थान पर पहुंचा


    नई दिल्ली।
    भारत (India) मंगलवार को जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (Corruption Perceptions Index.-CPI) 2025 में 182 देशों और क्षेत्रों में से 91वें स्थान पर पहुंच गया। यह पिछली रैंकिंग की तुलना में पांच स्थान बेहतर है। वैश्विक गैर-सरकारी संगठन (Global Non-Governmental Organizations) ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (Transparency International) के नवीनतम सीपीआई के अनुसार, भारत का स्कोर पिछले साल की तुलना में एक अंक बढ़ा है। वहीं, उसकी रैंक बेहतर हुई है। बर्लिन स्थित भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया प्रशांत इलाके में भ्रष्टाचार विरोधी प्रगति की वृद्धि धीमी रही है। वजह, कई देशों में पिछले साल जनता का गुस्सा देखा गया।


    दुनिया के हर हिस्से में खतरा

    2025 भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक दिखाता है कि भ्रष्टाचार दुनिया के हर हिस्से में एक गंभीर खतरा बना हुआ है। हालांकि इसकी प्रगति की रफ्तार जरूर प्रभावित हुई है। रिपोर्ट में कहा गया कि नेताओं को सत्ता के दुरुपयोग और इस गिरावट को प्रेरित करने वाले व्यापक कारकों, जैसे लोकतांत्रिक जांच और संतुलन की वापसी और स्वतंत्र नागरिक समाज पर हमलों से निपटने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए। इसमें आगे कहा गया है कि दुनिया भर में सरकार विरोधी प्रदर्शन यह दिखाते हैं कि लोग अक्षम नेतृत्व से उकता चुके हैं। यह लोग अब सुधार की मांग कर रहे हैं।


    पत्रकारों के लिए खतरनाक

    सीपीआई दुनिया के 182 देशों और क्षेत्रों को उनके सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के अनुमानित स्तर के अनुसार रैंक करता है। परिणाम जीरो (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (बहुत साफ) के पैमाने पर दिए जाते हैं। रिपोर्ट में भारत को उन देशों में भी सूचीबद्ध किया गया है जो भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट करने वाले पत्रकारों के लिए खतरनाक हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जब पत्रकारों पर भ्रष्टाचार की जांच करने के लिए हमला किया जाता है या उन्हें मार दिया जाता है, तो सत्ता को प्रभावी ढंग से जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता और भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। 2012 से, वैश्विक स्तर पर गैर-संघर्ष क्षेत्रों में 829 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है। इन हत्याओं में से 90 फीसदी से अधिक उन देशों में हुई हैं, जहां भ्रष्टाचार सूचकांक 50 से कम है। इनमें ब्राजील (35), भारत (39), मैक्सिको (27), पाकिस्तान (28) और इराक (28) शामिल हैं। यह विशेष रूप से उन पत्रकारों के लिए खतरनाक हैं जो भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करते हैं।


    भ्रष्टाचार की कीमत

    रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 के बाद से 31 देशों ने अपने भ्रष्टाचार के स्तर में काफी कमी की है। बाकी इस समस्या से निपटने में विफल रहे हैं। इस अवधि के दौरान या तो वह स्थिर रहे हैं या बदतर हो गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक औसत गिरकर 42 के नए निचले स्तर पर आ गया है, जबकि दो-तिहाई से अधिक देश 50 से नीचे स्कोर कर रहे हैं। लोग इसकी कीमत चुका रहे हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण अस्पताल की सुविधाओं में कमी आती है। बाढ़ से निपटने की क्षमता पर असर पड़ता है। कुल मिलाकर यह युवाओं के सपनों पर खत्म कर देता है। इस सूचकांक में डेनमार्क 89 प्वॉइंट्स के साथ टॉप पर है। वह फिनलैंड और सिंगापुर से आगे है। वहीं, दक्षिण सूडान और सोमालिया की हालत भ्रष्टाचार के मामले में काफी खराब है। दोनों के नौ-नौ प्वॉइंट्स हैं। इनके बाद वेनेजुएला है।

  • Research : उत्तराखंड में मामूली बारिश भी मचा सकती है भारी तबाही… वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

    Research : उत्तराखंड में मामूली बारिश भी मचा सकती है भारी तबाही… वैज्ञानिकों ने जताई चिंता


    देहरादून।
    उत्तराखंड (Uttarakhand.) के पहाड़ी क्षेत्रों (Hilly Areas) में अतिवृष्टि या बादल फटने (Heavy Rainfall or Cloudburst) से ही नहीं, बल्कि लगातार हल्की बारिश (Light Rain) से भी धराली जैसी आपदा आ सकती है। पहाड़ों पर जगह-जगह जमा मलबे के ढेर मामूली बारिश (Light Rain) में ही आपदा के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं।

    दून विश्वविद्यालय ने देश के छह नामी संस्थानों के वैज्ञानिकों के साथ किए अध्ययन में ये चिंता जताई है वैज्ञानिकों के मुताबिक, पहाड़ों पर यदि 15 से 30 दिन तक रोज छह से सात मिलीमीटर बारिश होती है तो मलबा जानलेवा हो सकता है। मलबे के ढेर पानी सोखने के बाद दस किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से खिसक सकते हैं और ये स्थिति निचले क्षेत्रों में रह रही आबादी के लिए कहर साबित हो सकती है।


    धराली जैसी आपदा का डर

    उत्तरकाशी का धराली इसका ताजा और डरावना उदाहरण है। धराली में पांच अगस्त को आई आपदा एक-दो दिन की नहीं बल्कि पूरे एक माह की बारिश का नतीजा थी। इस इलाके में पांच जुलाई से पांच अगस्त तक 195 एमएम बारिश दर्ज की गई थी। बारिश के रूप में धीरे-धीरे आए पानी को मलबे ने सोखा और बाद में खीरगंगा के बहाव के साथ धराली में तबाही मचा दी। दून विवि के भूगर्भ विज्ञान के एचओडी डॉ.विपिन कुमार के अनुसार, धराली में बारिश के बाद मलबा 60 किलो पास्कल का दबाव बनाकर दस किमी प्रति सेकेंड की गति से नीचे आकर तबाही का कारण बना था।


    मलबे का निस्तारण और निरंतर निगरानी जरूरी

    शोध रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने राज्य की प्रमुख नदियों, ग्लेशियरों के मुहाने, नाले-धारों और ऊंचाई वाले पहाड़ों पर जमा मलबे का पता लगाने की सलाह दी है, ताकि उसे निस्तारित किया जा सके। इसके अलावा ऐसे इलाकों की लगातार निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने की भी सलाह दी है।


    भविष्य के लिए सिफारिश

    सेडिमेंट सोर्स मैपिंग अनिवार्य की जाए, जिससे गिलेशियर व हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में मलबे के स्रोतों की निरंतर पहचान और निगरानी की जा सके। सरकार की आपदा प्रबंधन नीतियों में क्वांटिटेटिव हजार्ड साइंस को शामिल किया जाए, ताकि जोखिम का वैज्ञानिक आकलन कर समय रहते टोस और प्रभावनी निर्णय लिए जा सके।


    एक नजर चेतावनी पर

    रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड राज्य में हर वर्ष औसतन 2 हजार आपदाएं आथी हैं। 2025 में उत्तराखंड राज्य ने 2100 से ज्यादा छोटी-बड़ी आपदाएं झेली। इन आपदाओं में 263 लोगों की जान चली गई थी।

  • बुड्ढा लड़का लोफर है…', RJD ने सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार पर की अभद्र टिप्पणी

    बुड्ढा लड़का लोफर है…', RJD ने सोशल मीडिया पर नीतीश कुमार पर की अभद्र टिप्पणी


    नई दिल्ली । बिहार में विधान परिषद में सत्र की कार्यवाही के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा पूर्व सीएम राबड़ी देवी को लड़की कहे जावने के मामले पर विवाद बढ़ता चला जा रहा है। पहले रोहिणी आचार्य ने इस मामले को लेकर सीएम नीतीश पर निशाना साधा था। इसके बाद तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश को डिमेंशिया और अल्जाइमर का शिकार बता दिया था। वहीं अब राजद ने सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की है। राजद ने सीएम नीतीश को लोफर और बुड्ढा तक कह दिया था।

    RJD ने क्या ट्वीट किया?
    राजद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपने आधिकारिक हैंडल से ट्वीट किया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए विवादित टिप्पणी की। राजद ने कहा संवैधानिक पद पर बैठ महिलाओं के लिए अश्लील बातें करने वाला बिहार का बुड्ढा लड़का लोफर है।
    आज विधान परिषद में मार्शल बुलाए गए
    मंगलवार को बिहार विधानसभा में लगातार हंगामा देखने को मिला। इसके बाद विपक्ष के लगातार हंगामे के बाद सभापति ने हंगामा कर रहे विपक्षी सदस्यों को मार्शल से दिन भर के लिए बाहर करवा दिया। सभापति ने बार बार कहा कि प्रश्नकाल को बाधित नहीं करें सदन की कार्यवाही में व्यवधान न डालें बावजूद विपक्ष के सदस्य बेल तक पहुंचकर नारेबाजी और हंगामा करते रहे। इसके बाद सभापति ने कड़ी कार्रवाई करते हुए विपक्षी सदस्यों को पूरे दिन के लिए सदन से बाहर करने का आदेश दे दिया। बाहर भी विपक्ष का हंगामा जारी रहा।
    सुनील सिंह और मंत्री अशोक चौधरी के बीच तीखी नोकझोंक
    सभापति के आदेश से मार्शल बुलाए गए जिन्होंने बीच-बचाव करते हुए सदस्यों को अलग किया। सुनील सिंह और मंत्री अशोक चौधरी के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। मंत्री अशोक चौधरी काफी गुस्से में दिखाई दिए वहीं विपक्ष के नेता भी आक्रोशित नजर आए। इस दौरान अशोक चौधरी ने सुनील सिंह से कहा तुम क्या हो जिस पर सुनील सिंह ने जवाब देते हुए उन्हें नौटंकीबाज तक कह दिया। पूरे घटनाक्रम के दौरान सदन में भारी शोर-शराबा और हंगामे का माहौल बना रहा।