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  • राघव चड्ढा का ही ये बिल अगर पास हो जाता तो नहीं बदल पाते पार्टी, चली जाती सांसदी! जानिए कैसे ?

    राघव चड्ढा का ही ये बिल अगर पास हो जाता तो नहीं बदल पाते पार्टी, चली जाती सांसदी! जानिए कैसे ?


    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता राघव चड्ढा द्वारा हाल ही में राज्यसभा के 6 अन्य सदस्यों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास सामने आया है। अगर चार साल पहले उन्होंने खुद जिस दल-बदल विरोधी कानून को और सख्त बनाने का प्रस्ताव रखा था, वह कानून बन गया होता, तो आज उनकी राजनीतिक स्थिति पूरी तरह अलग होती।

    सूत्रों के अनुसार, मौजूदा नियमों के तहत राज्यसभा में किसी दल के दो-तिहाई (2/3) सांसदों के एक साथ अलग होने पर उन्हें दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से छूट मिल जाती है। इसी आधार पर 10 में से 7 सांसदों (चड्ढा सहित) के एक साथ जाने से उनकी सदस्यता सुरक्षित रहने की बात सामने आई है। लेकिन मामला यहीं दिलचस्प मोड़ लेता है। वर्ष 2022 में राज्यसभा में प्रवेश के कुछ ही महीनों बाद राघव चड्ढा ने एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया था, जिसमें उन्होंने दल-बदल कानून को और सख्त बनाने की मांग की थी।

    उनके प्रस्तावित बिल में क्या था खास?

    इस विधेयक में उन्होंने मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव सुझाए थे। प्रस्ताव था कि किसी पार्टी के विलय को वैध मानने के लिए 2/3 की जगह 3/4 (तीन-चौथाई) समर्थन जरूरी किया जाए। साथ ही, पार्टी बदलने वाले सांसदों और विधायकों पर 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का भी सुझाव दिया गया था। इसके अलावा, ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ और विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए भी सख्त प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे, जिसमें सरकार गिरने की स्थिति में सांसदों/विधायकों को तय समय में सदन के सामने पेश होने की अनिवार्यता शामिल थी।

    संवैधानिक बदलाव का प्रस्ताव

    चड्ढा ने अपने विधेयक में संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 तथा दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की थी, ताकि जनप्रतिनिधियों को अधिक जवाबदेह बनाया जा सके और दल-बदल पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

    वर्तमान स्थिति

    राज्यसभा रिकॉर्ड के अनुसार, राघव चड्ढा का यह प्राइवेट मेंबर बिल अब भी लंबित है और कानून का रूप नहीं ले पाया। इसी बीच राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि यदि उनका ही प्रस्तावित सख्त कानून लागू हो जाता, तो आज दल-बदल के मौजूदा नियमों के तहत उन्हें और उनके साथियों को मिलने वाली छूट संभव नहीं होती।

  • आसाराम के आश्रम को सुप्रीम कोर्ट से राहत, बुलडोजर कार्रवाई पर लगाई रोक, जाने क्या है मामला?

    आसाराम के आश्रम को सुप्रीम कोर्ट से राहत, बुलडोजर कार्रवाई पर लगाई रोक, जाने क्या है मामला?


    जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने अहमदाबाद स्थित आसाराम के आश्रम से जुड़े मामले में बड़ा अंतरिम आदेश देते हुए बुलडोजर कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि विवादित 45 हजार वर्ग मीटर जमीन पर 4 मई तक यथास्थिति बनाए रखी जाए।

    यह जमीन 2030 कॉमनवेल्थ गेम्स के स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए गुजरात सरकार द्वारा वापस लिए जाने की प्रक्रिया में है। वहीं आश्रम ट्रस्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें अतिक्रमण और पट्टे की शर्तों के उल्लंघन के आधार पर जमीन खाली करने का आदेश दिया गया था।

    SC ने क्या कहा?

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान गुजरात सरकार से जमीन से जुड़े सभी दस्तावेज पेश करने को कहा है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रस्ट को उचित नोटिस नहीं दिए गए थे। सरकार को तीन दिन के भीतर दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, जबकि ट्रस्ट को भी जवाब देने के लिए समान समय दिया गया है। अदालत ने साफ किया कि अगली सुनवाई तक जमीन पर किसी भी तरह की तोड़-फोड़ या कार्रवाई नहीं की जाएगी।

    सरकार और ट्रस्ट के दावे
    गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि ट्रस्ट द्वारा पट्टे की शर्तों का उल्लंघन किया गया है और बिना अनुमति कई निर्माण किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के आरोप हैं। वहीं ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह जमीन सामाजिक कार्यों और स्कूल संचालन के लिए दी गई थी और 1960 में चैरिटेबल ट्रस्ट को वैध रूप से आवंटित की गई थी। उनके अनुसार, किसी भी तरह का उल्लंघन नहीं हुआ है और सरकार अब जमीन वापस लेने की कोशिश कर रही है।

    अदालत की टिप्पणी

    सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाते हुए कहा कि पहले जमीन का पट्टा दिया गया, फिर विस्तार किया गया और अब उसे अचानक खत्म करने की प्रक्रिया क्यों शुरू की गई। अंत में सरकार की ओर से अदालत को भरोसा दिलाया गया कि 4 मई तक मौके पर कोई भी निर्माण या तोड़-फोड़ नहीं होगी। अगली सुनवाई अगले सोमवार को होगी।

  • केरल में 8 जहरीले सांपों और किंग कोबरा के लिए नहीं है खास एंटीवेनम, इलाज बना चुनौती

    केरल में 8 जहरीले सांपों और किंग कोबरा के लिए नहीं है खास एंटीवेनम, इलाज बना चुनौती


    नई दिल्ली। केरल में सांप काटने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में पाए जाने वाले आठ प्रमुख विषैले सांपों और किंग कोबरा के लिए कोई विशेष एंटीवेनम उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से डॉक्टरों को मरीजों का इलाज केवल लक्षणों के आधार पर करना पड़ रहा है।

    स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पिट वाइपर प्रजाति के सांप इस समस्या के केंद्र में हैं। इनमें कूबड़दार नाक वाला पिट वाइपर (हाइपनेल हाइपनेल) सबसे खतरनाक माना जाता है, जो जंगलों, रबर बागानों और खेतों में आमतौर पर पाया जाता है। यह केरल में सांप काटने के लगभग 25 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार बताया जाता है और इसकी मृत्यु दर भी अधिक है।

    इलाज सीमित, चुनौतियां बड़ी

    फिलहाल इन मामलों में इलाज डायलिसिस और प्लाज्मा थेरेपी जैसे तरीकों से लक्षण नियंत्रित करने तक सीमित है। स्वास्थ्य और वन विभाग लंबे समय से स्थानीय एंटीवेनम विकसित करने की सिफारिश कर रहे हैं, लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हो पाई है।

    केरल में पाए जाने वाले प्रमुख विषैले सांप

    राज्य में मालाबार पिट वाइपर की विभिन्न किस्में, हॉर्सशू पिट वाइपर की दो प्रजातियां, बांस पिट वाइपर और बड़े आकार के पिट वाइपर जैसे सांप पाए जाते हैं। इनमें से कई प्रजातियां राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई हैं और इनके काटने के मामले सामने आते रहते हैं।

    किंग कोबरा और कोरल स्नेक पर भी संकट

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किंग कोबरा के लिए भारत में कोई स्वदेशी एंटीवेनम उपलब्ध नहीं है। असम में एक उत्पादन केंद्र पहले मौजूद था, लेकिन कम मांग के कारण उसे बंद कर दिया गया। इसी तरह पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले कोरल स्नेक के लिए भी कोई एंटीवेनम विकसित नहीं किया गया है।

    वर्तमान में भारत में बहुसंयोजक (मल्टी-वैलेंट) एंटीवेनम चेन्नई से एकत्र किए गए विष के आधार पर तैयार किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केरल की स्थानीय सांप प्रजातियों के अनुसार अलग एंटीवेनम तैयार करना जरूरी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो राज्य में सांप काटने से होने वाली मौतों का खतरा और बढ़ सकता है।

  • वाराणसी में ऐतिहासिक तैयारी,पीएम मोदी के दौरे से पहले शहर में रोशनी और विकास का अद्भुत नजारा

    वाराणसी में ऐतिहासिक तैयारी,पीएम मोदी के दौरे से पहले शहर में रोशनी और विकास का अद्भुत नजारा

    नई दिल्ली। वाराणसी इस समय एक अलग ही रंग में नजर आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिवसीय दौरे से पहले पूरा शहर रोशनी, सजावट और उत्साह से भर गया है। सड़कें, चौराहे और प्रमुख मार्ग इस तरह सजाए गए हैं कि पूरा शहर किसी बड़े पर्व जैसा दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों से लेकर प्रशासन तक हर कोई इस दौरे को सफल बनाने में जुटा हुआ है।

    दौरे की शुरुआत धार्मिक परंपराओं के साथ हुई, जहां काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस पूजा ने पूरे कार्यक्रम को आध्यात्मिक शुरुआत दी और इसे केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा से जुड़ा अवसर भी बना दिया। मंदिर परिसर में मौजूद लोगों ने इस क्षण को बेहद महत्वपूर्ण बताया और इसे काशी की सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा।

    इसके बाद शहर में तैयारियों का दायरा और बढ़ गया। जिन रास्तों से प्रधानमंत्री गुजरेंगे, उन्हें विशेष रूप से सजाया गया है। सड़क किनारे रोशनी, रंगीन सजावट और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा गया है। पूरा शहर एक नए रूप में नजर आ रहा है, जहां आधुनिक विकास और पारंपरिक संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिल रहा है।

    इस दौरे के दौरान एक बड़ा जनसंबोधन कार्यक्रम भी प्रस्तावित है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है। खासकर महिलाओं की भागीदारी को लेकर विशेष व्यवस्था की गई है, जिससे यह कार्यक्रम सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है। इस अवसर पर कई विकास परियोजनाओं की घोषणा और शुरुआत की जाएगी, जो क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही हैं।

    इन परियोजनाओं में सड़क, परिवहन और शहरी विकास से जुड़े कई बड़े काम शामिल हैं। इसके अलावा कुछ नई ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाई जाएगी, जिससे विभिन्न शहरों के बीच संपर्क और मजबूत होगा। इन सभी योजनाओं को क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए गए हैं। पूरे शहर में बड़ी संख्या में सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है। महिला पुलिस बल की भी मजबूत उपस्थिति देखने को मिल रही है। निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है और पूरे क्षेत्र को कई सुरक्षा स्तरों में बांटा गया है ताकि किसी भी स्थिति पर तुरंत नियंत्रण पाया जा सके।

    प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में एक लंबा रोड शो भी शामिल है, जहां वे जनता का अभिवादन करते हुए शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरेंगे। इस रोड शो को लेकर लोगों में खासा उत्साह है और बड़ी संख्या में नागरिक सड़कों पर उनका स्वागत करने की तैयारी में हैं।

    पूरे शहर का माहौल इस समय एक उत्सव जैसा है, जहां आस्था, विकास और जनसंपर्क एक साथ दिखाई दे रहे हैं। वाराणसी का यह दृश्य न केवल स्थानीय लोगों के लिए खास है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

  • काशी में हाई अलर्ट: पीएम मोदी के आगमन से पहले सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक-चौबंद

    काशी में हाई अलर्ट: पीएम मोदी के आगमन से पहले सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चाक-चौबंद

    नई दिल्ली। वाराणसी में प्रधानमंत्री के आगामी दौरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत किया गया है। पूरे शहर में सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट मोड पर हैं और हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण से लेकर वीआईपी मूवमेंट तक के लिए विशेष योजना तैयार की है, ताकि कार्यक्रम बिना किसी बाधा के संपन्न हो सके।

    शहर के प्रमुख आयोजन स्थलों और मार्गों पर भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। सुरक्षा व्यवस्था में महिला पुलिसकर्मियों की भी बड़ी संख्या शामिल है, जिन्हें विशेष रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। जिस स्थान पर बड़ा जनसमूह जुटने की संभावना है, वहां अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किया गया है।

    पूरे कार्यक्रम क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से लैस सुरक्षा घेरे में रखा गया है। निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का व्यापक नेटवर्क सक्रिय किया गया है, जिससे हर गतिविधि पर रियल टाइम नजर रखी जा सके। इसके साथ ही ड्रोन गतिविधियों को रोकने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम भी लगाया गया है।

    भीड़ प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई है और यातायात को सुचारू रखने के लिए वैकल्पिक मार्गों की योजना बनाई गई है। इससे आम लोगों को कम से कम असुविधा हो और शहर में आवाजाही सामान्य बनी रहे।

    कार्यक्रम के दौरान एक बड़े महिला सम्मेलन का आयोजन भी प्रस्तावित है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं के शामिल होने की संभावना है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया गया है, ताकि पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।

    इसके अलावा प्रधानमंत्री के धार्मिक कार्यक्रमों को देखते हुए भी विशेष तैयारी की गई है। शहर में उत्साह का माहौल है और लोग उनके स्वागत के लिए तैयार हैं। प्रशासन का पूरा ध्यान इस बात पर है कि दौरा पूरी तरह सुरक्षित, व्यवस्थित और सफल रहे।

  • मुंबई में परिवार की मौत के बाद तरबूज पर सवाल, क्या इससे हो सकती है फूड प्वाइजनिंग? डॉक्टरों ने बताया सच

    मुंबई में परिवार की मौत के बाद तरबूज पर सवाल, क्या इससे हो सकती है फूड प्वाइजनिंग? डॉक्टरों ने बताया सच


    नई दिल्ली।
    गर्मियों में तरबूज को सबसे ताजगी देने वाले फलों में गिना जाता है, लेकिन हाल ही में मुंबई में हुई एक दर्दनाक घटना ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत के बाद आशंका जताई जा रही है कि मामला फूड प्वाइजनिंग से जुड़ा हो सकता है। बताया जा रहा है कि परिवार ने पहले बिरयानी खाई थी और उसके बाद घर में रखा तरबूज खाया था। कुछ ही घंटों बाद सभी की तबीयत बिगड़ गई और उल्टी-दस्त जैसे लक्षण सामने आए। अस्पताल पहुंचने पर सभी की मौत हो गई।

    पुलिस ने इस पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है और इसे फिलहाल संदिग्ध फूड प्वाइजनिंग मानते हुए खाद्य सामग्री को जांच के लिए भेजा गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद ही मौत के कारणों की स्पष्ट पुष्टि हो सकेगी।

    क्या तरबूज से हो सकती है मौत?
    इस घटना के बाद यह सवाल चर्चा में आ गया है कि क्या तरबूज खाना जानलेवा भी हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, तरबूज खुद में सुरक्षित फल है, लेकिन अगर यह दूषित हो जाए या गलत तरीके से स्टोर किया जाए तो इसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं, जिससे फूड प्वाइजनिंग हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि तरबूज में पानी और प्राकृतिक शुगर की मात्रा अधिक होती है, इसलिए खराब या संक्रमित होने पर यह बैक्टीरिया के लिए अनुकूल वातावरण बन सकता है। कुछ मामलों में इसमें मिठास बढ़ाने के लिए बाहरी पदार्थ मिलाने की भी आशंका रहती है, जो जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

    डॉक्टरों के मुताबिक फूड प्वाइजनिंग के लक्षणों में उल्टी, दस्त और पेट दर्द शामिल हैं। इसकी गंभीरता बैक्टीरिया के प्रकार और व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल तरबूज को दोष देना सही नहीं है। फूड प्वाइजनिंग किसी भी दूषित भोजन या असुरक्षित तरीके से रखे गए खाने से हो सकती है, इसलिए पूरे मामले की जांच के बाद ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है।

  • बंगाल की सियासी ज़मीन पर टकराव: IPS अधिकारी और TMC उम्मीदवार के बीच बयानबाज़ी से बढ़ा तनाव

    बंगाल की सियासी ज़मीन पर टकराव: IPS अधिकारी और TMC उम्मीदवार के बीच बयानबाज़ी से बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली।पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है और इसी बीच दक्षिण 24 परगना क्षेत्र में सामने आया एक विवाद अब राजनीतिक चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गया है। इस घटनाक्रम में कानून व्यवस्था संभाल रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और एक राजनीतिक उम्मीदवार के बीच हुई बयानबाज़ी ने पूरे क्षेत्र में तनाव का माहौल पैदा कर दिया है। मामला सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह खुली राजनीतिक टकराव की स्थिति में बदल गया है।

    पूरा घटनाक्रम तब शुरू हुआ जब कुछ स्थानीय लोगों ने शिकायत दर्ज कराई कि एक राजनीतिक उम्मीदवार के समर्थक इलाके में लोगों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए सुरक्षा एजेंसियों की टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया गया। इसी दौरान पुलिस अधिकारी ने सख्त रुख अपनाते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि किसी भी तरह की धमकी, अनुशासनहीनता या कानून तोड़ने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

    उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। कुछ ही समय बाद राजनीतिक उम्मीदवार ने भी सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी। अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत चाहे किसी भी तरफ से मानी जाए, लेकिन उसका अंत वही तय करेंगे। उनके शब्दों में आत्मविश्वास के साथ-साथ चुनौती का भाव भी साफ दिखाई दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी भी दबाव या सुरक्षा व्यवस्था से डरने वाले नहीं हैं और जनता उनके साथ मजबूती से खड़ी है।

    इस बयानबाज़ी के बाद इलाके का राजनीतिक माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया है। एक तरफ समर्थकों के बीच जोश और उत्साह देखने को मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना को रोका जा सके। चुनावी समय में इस तरह की बयानबाज़ी अक्सर जनता की राय और राजनीतिक माहौल दोनों को प्रभावित करती है, जिससे तनाव और बढ़ जाता है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं चुनावी प्रक्रिया को और जटिल बना देती हैं। जब प्रशासनिक जिम्मेदारियों और राजनीतिक दावों के बीच सीधा टकराव जैसा माहौल बनता है, तो स्थिति को संभालना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय में सभी पक्षों के लिए संयम और संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ सके।

  • अल्मोड़ा के श्मशान में जोड़े ने रचाई शादी, देवभूमि की परंपराओं पर छिड़ा भीषण विवाद

    अल्मोड़ा के श्मशान में जोड़े ने रचाई शादी, देवभूमि की परंपराओं पर छिड़ा भीषण विवाद

    नई दिल्ली। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने जीवन और मृत्यु के बीच की पारंपरिक मर्यादाओं को हिलाकर रख दिया है। आमतौर पर विवाह के लिए लोग पवित्र मंदिरों या आलीशान महलों का चुनाव करते हैं, लेकिन अल्मोड़ा के मर्चुला क्षेत्र में एक जोड़े ने इसके बिल्कुल उलट श्मशान घाट की दहलीज पर अपना नया जीवन शुरू करने का फैसला किया। रामगंगा और बदनगढ़ नदी के संगम पर स्थित यह वही स्थान है, जहां वर्षों से लोग अपनों को अंतिम विदाई देते आए हैं। इसी जगह पर फूलों का मंडप सजाया गया और मंत्रोच्चार के बीच जयमाला की रस्म पूरी की गई। इस घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को स्तब्ध कर दिया है, बल्कि पूरे क्षेत्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

    इस विवाह समारोह की जानकारी तब सार्वजनिक हुई जब समारोह का एक वीडियो इंटरनेट पर तेजी से प्रसारित होने लगा। वीडियो में देखा जा सकता है कि जिस स्थान पर अर्थियां जलाई जाती हैं, वहां बिजली की झालरें और भव्य सजावट की गई थी। मेहमानों की मौजूदगी में जोड़े ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। जैसे ही यह दृश्य स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सामने आया, विरोध के स्वर तेज हो गए। लोगों का कहना है कि श्मशान घाट को शास्त्रों में वैराग्य और दुख का स्थान माना गया है, वहां इस तरह का जश्न मनाना हिंदू परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं का सीधा अपमान है। स्थानीय लोगों ने इसे आस्था के साथ खिलवाड़ करार देते हुए कड़ा ऐतराज जताया है।

    विरोध की आंच अब प्रशासन तक भी पहुंच गई है। अधिकारियों ने इस मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी सार्वजनिक स्थान, विशेषकर अंत्येष्टि स्थलों का उपयोग किसी निजी मांगलिक कार्य के लिए करना नियमों के खिलाफ है। प्रशासन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस तरह के आयोजन के लिए कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि आधुनिकता के नाम पर इस तरह के संवेदनशील स्थानों की गरिमा को ठेस पहुँचाना अनुचित है। फिलहाल, इस अनोखी लेकिन विवादित शादी ने देवभूमि में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जहां एक पक्ष इसे व्यक्तिगत चुनाव मान रहा है, तो वहीं दूसरा पक्ष इसे समाज और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन बता रहा है।

  • मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, घोषित करने की आवश्यकता नहीं

    मोहन भागवत का बड़ा बयान, कहा- भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र, घोषित करने की आवश्यकता नहीं

    नई दिल्ली। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को नागपुर में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अयोध्या राम मंदिर और भारत की सांस्कृतिक पहचान को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि राम मंदिर का निर्माण सत्ता में बैठे लोगों की प्रतिबद्धता और देशभर के लोगों के सहयोग से संभव हुआ है।

    यह कार्यक्रम डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा उन लोगों के सम्मान में आयोजित किया गया था, जिन्होंने राम मंदिर निर्माण में नेतृत्व और योगदान दिया। भागवत ने कहा कि राम मंदिर भगवान राम की इच्छा का प्रतीक है और इसके निर्माण में पूरे समाज की भागीदारी रही है। उन्होंने इसकी तुलना गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा से करते हुए कहा कि जैसे भगवान कृष्ण की उंगली पर पर्वत टिक गया था, वैसे ही यह मंदिर भी सामूहिक सहयोग से संभव हुआ।

    भागवत ने योगी अरविंद का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन धर्म के पुनरुत्थान के लिए भारत का उभार आवश्यक है। उनके अनुसार यह प्रक्रिया 1857 से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों का जिक्र करते हुए ‘द गार्डियन’ के एक लेख का हवाला दिया, जिसमें भारत की राजनीतिक और ऐतिहासिक दिशा पर टिप्पणी की गई थी। भागवत ने कहा कि तकनीकी रूप से आजादी 1947 में मिली थी, लेकिन वास्तविक आत्मविश्वास बाद में मजबूत हुआ।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि सत्ता में बैठे लोग प्रतिबद्ध नहीं होते और जनआंदोलन नहीं चलता, तो राम मंदिर का निर्माण संभव नहीं था। भागवत के अनुसार, पहले ‘हिंदू राष्ट्र’ की बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते थे, लेकिन अब यह विचार व्यापक रूप से स्वीकार किया जाने लगा है।

    उन्होंने कहा कि जैसे सूरज का पूर्व से उगना एक प्राकृतिक सत्य है और उसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही भारत का हिंदू राष्ट्र होना भी एक वास्तविकता है। अंत में उन्होंने कहा कि अब समय है देश को और अधिक समृद्ध और मजबूत बनाने की दिशा में काम करने का, और भारत का उदय पूरी दुनिया के लिए सकारात्मक भूमिका निभाएगा।

  • अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….

    अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….


    नई दिल्ली।
    साल 2025 में दुनिया भर में अपनी सेनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों (Countries Spend Most Military) की सूची में भारत (India) पांचवें स्थान पर रहा है। भारत से आगे केवल चार देश हैं। वहीं पाकिस्तान (Pakistan) इस मामले में भारत के आसपास भी नहीं ठहरता है। पिछले साल दुनिया भर में हुए कुल सैन्य खर्च में भारत की हिस्सेदारी 3.2% रही है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं।


    भारत का रक्षा खर्च और ‘ऑपरेशन सिंदूर’

    स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा सोमवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका (USA), चीन, रूस और जर्मनी इस लिस्ट में सबसे आगे यानी टॉप 4 देश हैं। इसके बाद भारत नंबर 5 पर है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है।

    बढ़ोतरी का कारण: इस वृद्धि का एक बड़ा कारण पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था। इस सैन्य अभियान के दौरान सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखने हेतु सशस्त्र बलों ने आपातकालीन आधार पर हथियारों और साजो-सामान की कई महत्वपूर्ण खरीदारियां कीं।


    पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) की क्या स्थिति है?

    सिपरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पड़ोसियों ने भी अपनी सेना पर खर्च बढ़ाया है।

    चीन: दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश चीन है। उसने अपने रक्षा बजट में 7.4% की वृद्धि की है, जिससे उसका कुल खर्च 336 अरब डॉलर हो गया है।

    पाकिस्तान: आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य खर्च में 11% की वृद्धि देखी गई है। 11.9 अरब डॉलर के खर्च के साथ पाकिस्तान इस सूची के 40 देशों में 31वें स्थान पर है।


    वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में रक्षा खर्च रिकॉर्ड स्तर पर

    शीर्ष तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस मिलकर वैश्विक सैन्य खर्च का 51% हिस्सा कवर करते हैं। इन तीनों देशों ने कुल मिलाकर 1,480 अरब डॉलर खर्च किए। साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।


    यूरोप में भारी वृद्धि

    वैश्विक स्तर पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यूरोप रहा, जहां सैन्य खर्च में 14% की वृद्धि (कुल 864 अरब डॉलर) हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के चौथे साल में प्रवेश करने और यूरोपीय नाटो देशों द्वारा खुद को फिर से हथियारों से लैस करने की कोशिशों के कारण शीत युद्ध के बाद से मध्य और पश्चिमी यूरोप में यह सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है।


    हथियारों के आयात में भारत अभी भी आगे

    मार्च में प्रकाशित सिपरी की एक अन्य रिपोर्ट “ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स” के अनुसार- 2016-20 और 2021-25 की अवधि के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4% की गिरावट आई है। गिरावट के बावजूद, भारत अभी भी सैन्य हार्डवेयर का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हथियारों के आयात में 8.2% हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर चल रहा तनाव है।


    रूस पर निर्भरता कम कर रहा है भारत

    पिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियारों की खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब रूस के बजाय पश्चिमी देशों (खासकर फ्रांस, इजरायल और अमेरिका) की ओर रुख कर रहा है। 2011-15 के दौरान भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 70% थी, जो 2016-20 में घटकर 51% और 2021-25 में 40% रह गई है। इसके बावजूद, वर्तमान में भारत को सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति करने वाले शीर्ष तीन देश रूस, फ्रांस और इजरायल ही हैं।


    भविष्य की तैयारियां: रक्षा बजट 2026-27

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित की है: रक्षा बजट में 15% से अधिक की बढ़ोतरी की गई है।

    इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
    इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ का ‘पूंजीगत परिव्यय’ रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाएगा, जिसमें नए लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, आर्टिलरी गन, स्मार्ट हथियार, मिसाइलें, रॉकेट और कई तरह के मानव रहित (ड्रोन) सिस्टम खरीदना शामिल है।