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  • प्रशिक्षण के दौरान विवाह पर रोक के विवादित फरमान से छात्राओं का भविष्य अधर में, संस्थान ने दी नामांकन रद्द करने की धमकी।

    प्रशिक्षण के दौरान विवाह पर रोक के विवादित फरमान से छात्राओं का भविष्य अधर में, संस्थान ने दी नामांकन रद्द करने की धमकी।

    नई दिल्ली: बिहार के गोपालगंज जिले में एक शैक्षणिक संस्थान द्वारा जारी किए गए अनूठे और सख्त आदेश ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संस्थानिक नियमों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जिले के एक प्रतिष्ठित स्वास्थ्य प्रशिक्षण संस्थान में प्रशासन द्वारा जारी एक आधिकारिक सूचना ने छात्राओं के बीच हड़कंप मचा दिया है। संस्थान परिसर में चस्पा किए गए इस निर्देश में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया है कि प्रशिक्षण की निर्धारित अवधि के दौरान कोई भी छात्रा विवाह के बंधन में नहीं बंध सकती है। आदेश में इस बात का भी कड़ाई से उल्लेख किया गया है कि यदि कोई छात्रा इस नियम का उल्लंघन करती है या चोरी-छिपे विवाह कर लेती है, तो उसका नामांकन तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाएगा और उसे अपना प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ना होगा।

    इस कठोर निर्णय के पीछे संस्थान प्रशासन का अपना तर्क है। अधिकारियों का मानना है कि नर्सिंग और स्वास्थ्य से जुड़े पाठ्यक्रम अत्यंत संवेदनशील और आवासीय प्रकृति के होते हैं जिनमें शत-प्रतिशत उपस्थिति और मानसिक एकाग्रता की आवश्यकता होती है। प्रशासन के अनुसार शैक्षणिक सत्र के मध्य में विवाह करने से छात्राओं का ध्यान अपनी पढ़ाई और नैदानिक अभ्यास से भटक जाता है जिससे उनके व्यावसायिक कौशल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि प्रवेश के समय ही छात्राओं से इस आशय का एक शपथ पत्र लिया जाता है जिसमें वे पाठ्यक्रम पूर्ण होने तक अविवाहित रहने की प्रतिबद्धता जताती हैं। संस्थान का दावा है कि यह नियम अनुशासन सुनिश्चित करने और भविष्य के कुशल स्वास्थ्य कर्मियों को तैयार करने के उद्देश्य से बनाया गया है।

    जैसे ही यह आदेश सार्वजनिक हुआ इसे लेकर नागरिक समाज और कानूनी विशेषज्ञों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। कई जानकारों ने इसे छात्राओं के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन और उनकी व्यक्तिगत पसंद के संवैधानिक अधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप करार दिया है। आलोचकों का मानना है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही वयस्क छात्राओं पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना न केवल सामाजिक रूप से पिछड़ापन दर्शाता है बल्कि यह कानून की नजर में भी अनुचित है। मामले की संवेदनशीलता और बढ़ते विरोध को देखते हुए जिला प्रशासन ने भी इस पर कड़ा रुख अपनाया है। संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस आदेश की वैधानिकता की जांच के निर्देश दिए हैं और संस्थान के प्रबंधन से इस संबंध में विस्तृत जवाब तलब किया गया है।

    स्वास्थ्य विभाग के क्षेत्रीय अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी भी संस्थान के आंतरिक नियम देश के कानूनों और व्यक्तिगत गरिमा से ऊपर नहीं हो सकते। प्राथमिक जांच के आदेश जारी होने के बाद फिलहाल इस विवादित निर्देश के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। प्रशासन इस बात की पड़ताल कर रहा है कि क्या इस तरह के नियम किसी सरकारी नियमावली का हिस्सा हैं या यह केवल संस्थान की अपनी उपज है। इस घटना ने पूरे प्रदेश में शैक्षणिक संस्थानों की कार्यप्रणाली और वहां लागू होने वाले मनमाने नियमों की सीमाओं पर एक गंभीर विमर्श को जन्म दे दिया है।

    वर्तमान में इस आदेश को लेकर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है और छात्राएं अपनी शैक्षणिक भविष्य को लेकर चिंतित हैं। जिला प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि किसी भी छात्रा के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और नियमों की समीक्षा कर एक न्यायसंगत समाधान निकाला जाएगा। यह मामला अब केवल एक संस्थान तक सीमित न रहकर व्यक्तिगत स्वायत्तता और शिक्षा के अधिकार के बीच एक बड़े विधिक प्रश्न के रूप में उभरकर सामने आया है जिसका परिणाम भविष्य में अन्य संस्थानों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकता है।

  • तमिलनाडु विधानसभा चुनाव सिनेमाई सितारों की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य का नया इम्तिहान

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव सिनेमाई सितारों की लोकप्रियता और राजनीतिक भविष्य का नया इम्तिहान

    नई दिल्ली/चेन्नई। दक्षिण भारत की राजनीति में सिनेमा और सत्ता का अटूट रिश्ता एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलटने को तैयार है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के इस दौर में चुनावी मैदान केवल घोषणापत्रों और नारों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह सिल्वर स्क्रीन के नायकों की जमीनी पकड़ का सबसे बड़ा परीक्षण केंद्र बन गया है। दशकों से राज्य की जनता ने अपने पसंदीदा अभिनेताओं को पलकों पर बिठाया है और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया है। वर्तमान चुनाव इस विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ रहे हैं जहां फिल्मी चमक दमक और जनसेवा के वादों के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। इस बार के चुनाव में नए राजनीतिक दलों का उदय और बड़े फिल्मी नामों की सीधी भागीदारी ने पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के समीकरणों को चुनौती दी है।

    चुनावी सरगर्मी के बीच यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग विशेष रूप से युवा पीढ़ी अपने चहेते सितारों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। अभिनेताओं ने अपने विशाल प्रशंसक समूहों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं में तब्दील कर दिया है जो घर घर जाकर नए भविष्य का सपना बेच रहे हैं। हालांकि राजनीति की यह राह उतनी आसान नहीं है जितनी फिल्मों की पटकथा होती है। स्थापित राजनीतिक दलों ने भी अपनी किलेबंदी मजबूत कर ली है और वे फिल्मी ग्लैमर के मुकाबले अपने संगठनात्मक अनुभव और कल्याणकारी योजनाओं का हवाला दे रहे हैं। ऐसे में मुकाबला केवल व्यक्ति विशेष का न रहकर विचारधारा और कार्यशैली के बीच का संघर्ष बन गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और प्रशासनिक सुधारों के वादे के साथ फिल्मी सितारे जनता के बीच जा रहे हैं जिससे मुकाबला त्रिकोणीय या उससे भी अधिक जटिल होने की संभावना बढ़ गई है।

    क्षेत्रीय मुद्दों की बात करें तो कृषि ऋण की माफी शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन और महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता जैसे विषय चर्चा के केंद्र में हैं। फिल्मी सितारों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में इन संवेदनशील मुद्दों को प्राथमिकता दी है जिससे आम जनमानस में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी है। उनकी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सिनेमाई करिश्मा आज भी जनता के दिलों पर राज करता है। परंतु मतदान केंद्र तक इस भीड़ को वोटों में तब्दील करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां बुनियादी सुविधाओं की मांग प्रबल है वहां फिल्मी सितारों की साख और उनकी योजनाओं की व्यवहारिकता की कड़ी जांच हो रही है।

    राज्य की राजनीति में दशकों पुराने द्रविड़ वर्चस्व को चुनौती देना किसी भी नए खिलाड़ी के लिए कठिन कार्य रहा है। लेकिन इस बार के चुनाव में बदलाव की बयार महसूस की जा रही है क्योंकि फिल्मी चेहरों ने सीधे तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं है बल्कि यह राज्य की राजनीतिक संस्कृति के भविष्य को भी तय करेगा। क्या जनता एक बार फिर पर्दे के नायक को अपना वास्तविक नेता चुनेगी या फिर अनुभव और पुरानी निष्ठा जीत का आधार बनेगी यह आने वाले परिणाम ही स्पष्ट करेंगे। फिलहाल पूरे राज्य में चुनावी शोर अपने चरम पर है और हर तरफ केवल इसी बात की चर्चा है कि इस बार बॉक्स ऑफिस की सफलता मतपेटियों में कितनी प्रभावी साबित होगी।

  • लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े

    लोकसभा में नहीं पास हो सका महिला आरक्षण बिल, बहुमत से 54 वोट कम पड़े


    नई दिल्ली । सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण से जुड़े तीनों विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सके। 131वें संविधान संशोधन बिल को पास कराने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया, जिसमें सरकार को जरूरी 352 वोटों के मुकाबले सिर्फ 298 वोट ही मिल सके।

    संख्या बल में कमी से गिरा प्रस्ताव
    विधेयक के खिलाफ 230 वोट पड़े, जिसके चलते यह आवश्यक बहुमत तक नहीं पहुंच सका और गिर गया। बिल के असफल होने के बाद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों ने मकर द्वार पर विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 अप्रैल से देशभर में विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है।

    सरकार ने विपक्ष को ठहराया जिम्मेदार

    गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने के लिए कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस पर प्रतिक्रिया दी और बिल के असफल होने पर जश्न मनाए जाने की आलोचना की। यह विधेयक एक दिन पहले कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था।

    लंबी बहस के बावजूद नहीं बनी सहमति

    इस बिल पर संसद में करीब 20 घंटे से अधिक समय तक चर्चा हुई। गुरुवार को सुबह 11 बजे से लेकर देर रात 1 बजे तक बहस चली, जबकि शुक्रवार को भी सुबह से शाम तक चर्चा जारी रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने का आग्रह किया था, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया।

    परिसीमन बना मुख्य विवाद का कारण

    चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने साफ कहा कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर सहमत नहीं हैं। इसी कारण उन्होंने विधेयक का विरोध किया।

    संसदीय प्रक्रिया और राजनीतिक टकराव

    गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विधेयक को विचार के लिए पेश किया, लेकिन मतदान में यह आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। बता दें कि बजट सत्र को लेकर भी सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक सत्र बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जबकि विपक्ष ने चुनावों के बाद सर्वदलीय बैठक की मांग की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया।

  • गुजरात में मानवता की मिसाल: ब्रेन-डेड किसान के अंगों से 7 लोगों को नई जिंदगी

    गुजरात में मानवता की मिसाल: ब्रेन-डेड किसान के अंगों से 7 लोगों को नई जिंदगी

    अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद से एक भावुक और प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जहां एक ब्रेन-डेड किसान के अंगदान ने सात लोगों को नई जिंदगी दे दी। 39 वर्षीय मनुभाई परमार के परिवार ने कठिन समय में बड़ा फैसला लेते हुए अंगदान की सहमति दी और मानवता की मिसाल पेश की।

    सड़क हादसे के बाद ब्रेन-डेड घोषित
    खेड़ा जिले के रहने वाले मनुभाई परमार 12 अप्रैल को एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सिर में गहरी चोट लगने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके और ब्रेन-डेड घोषित कर दिया गया।

    परिवार ने लिया साहसी फैसला
    डॉक्टरों की सलाह पर उनकी पत्नी अरखाबेन ने अंगदान का निर्णय लिया। परिवार की इस सहमति के बाद दिल, लिवर, किडनी, आंखें और त्वचा दान की गईं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को तुरंत लाभ मिला।

    कहां-कहां हुए ट्रांसप्लांट?

    लिवर और किडनी का ट्रांसप्लांट अहमदाबाद सिविल अस्पताल में किया गया
    दिल को CIMS अस्पताल भेजा गया
    आंखें एम एंड जे नेत्र अस्पताल को दान की गईं
    त्वचा सिविल अस्पताल के स्किन बैंक में संरक्षित की गई

    डॉक्टरों ने की सराहना
    अस्पताल के सुपरिटेंडेंट डॉ. राकेश जोशी ने परिवार के इस फैसले को सराहनीय बताते हुए कहा कि मनुभाई भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अंगों ने सात लोगों को नया जीवन दिया है।

    अंगदान के बढ़ते मामले
    अहमदाबाद सिविल अस्पताल के अनुसार, अब तक 234 ब्रेन-डेड मरीजों द्वारा अंगदान किया जा चुका है, जिससे 774 अंग प्राप्त हुए हैं। इनमें सैकड़ों किडनी, लिवर, दिल और फेफड़े शामिल हैं।

    बढ़ रही जागरूकता
    गुजरात में पिछले कुछ वर्षों में अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है। सरकारी पहल और सामाजिक प्रयासों के चलते लोग इस दिशा में आगे आ रहे हैं।

    मनुभाई परमार और उनके परिवार का यह निर्णय न केवल सात जिंदगियां बचाने वाला है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कठिन परिस्थितियों में लिया गया एक साहसी फैसला कई लोगों के जीवन में रोशनी ला सकता है।

  • भारत में बढ़ी चीतों की संख्या…… दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु पहुंचे 4 नए मेहमान

    भारत में बढ़ी चीतों की संख्या…… दक्षिण अफ्रीका से बेंगलुरु पहुंचे 4 नए मेहमान


    बेंगलुरु।
    भारत (India) में चीतों का कुनबा लगातार बढ़ रहा है. दक्षिण अफ्रीका (South Africa) से चार और चीतों को भारत लाया गया है. ये सभी चीते सुरक्षित तरीके से बेंगलुरु पहुंचे चुके हैं और उन्हें कर्नाटक (Karnataka) के बैनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क (Bannerghatta Biological Park) में रखा जाएगा. यह कदम राज्य में वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने और लोगों में जैव-विविधता के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से उठाया गया है.

    अधिकारियों के मुताबिक, चीतों को विशेष निगरानी के बीच लाया गया है. फिलहाल वन विभाग और पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम उनकी सेहत पर लगातार नजर रख रही है. शुरुआती जांच के बाद सभी चीतों को निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत निगरानी में रखा गया है, जिससे नए वातावरण में उन्हें किसी तरह की परेशानी न हो।


    कर्नाटक के वन मंत्री ने दिए ये निर्देश

    कर्नाटक के वन मंत्री ईश्वर खंड्रे ने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए हैं कि जलवायु और पर्यावरण में बदलाव के कारण चीतों को किसी प्रकार का तनाव या स्वास्थ्य संबंधी समस्या न हो. उन्होंने कहा कि सभी चीतों को कम से कम 30 दिनों के लिए क्वारंटीन में रखा जाएगा. इस दौरान उन्हें निर्धारित आहार दिया जाएगा और किसी भी संक्रमण या बीमारी की पूरी जांच की जाएगी।

    वन मंत्री ने यह भी कहा कि चीतों को उनके नए आवास में छोड़ने से पहले सभी आवश्यक मेडिकल परीक्षण पूरे किए जाएंगे. सुरक्षा और देखभाल में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

    कर्नाटक में चीतों को कहा जाता है ‘शिवंगी’
    गौरतलब है कि कर्नाटक में कभी चीतों को स्थानीय रूप से ‘शिवंगी’ कहा जाता था. हालांकि यह प्रजाति दशकों पहले राज्य के जंगलों से विलुप्त हो चुकी थी. अब चीतों की वापसी को वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक अहम कदम माना जा रहा है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है.

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • 2029 में लागू हो सकता है महिला आरक्षण बिल…. जानें कानूनी विकल्प

    2029 में लागू हो सकता है महिला आरक्षण बिल…. जानें कानूनी विकल्प


    नई दिल्ली।
    संसद में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन विधेयक (131st Constitutional Amendment Bill) भले ही दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया हो, लेकिन इससे महिला आरक्षण (Women’s reservation.) की मूल योजना खत्म नहीं हुई है। 2023 में पारित मूल कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम-Women’s Empowerment Worship Act) अभी भी प्रभावी है और 2029 में इसके लागू होने की संभावनाएं बरकरार हैं।

    आपको बता दें कि सरकार ने 131वां संशोधन विधेयक मुख्य रूप से आरक्षण को आसान बनाने के लिए पेश किया था। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 816 करना था। इसके विफल होने का मतलब केवल यह है कि फिलहाल सीटों की संख्या बढ़ाने का सरकारी फॉर्मूला रुक गया है, लेकिन महिला कोटा का मुख्य जनादेश अभी भी सुरक्षित है।

    कैसे लागू होगा 2029 में आरक्षण?
    मूल कानून (अनुच्छेद 334A) के तहत आरक्षण लागू करने के लिए दो शर्तें पूरी होनी जरूरी हैं। 2023 में कानून बनने के बाद एक नई जनगणना होनी चाहिए, जो अभी प्रगति पर है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया 2029 के आम चुनाव से पहले पूरी हो जाती है, तो आरक्षण को लागू करने में कोई कानूनी बाधा नहीं आएगी।

    विकल्प क्या हैं?
    सरकार के पास अब भी दो वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं। सरकार अनुच्छेद 334A में संशोधन कर आरक्षण को ‘परिसीमन’ की शर्त से अलग कर सकती है। इससे मौजूदा 543 सीटों पर ही 33% कोटा लागू किया जा सकेगा। अनुच्छेद 82 का उपयोग करते हुए 2026 के बाद परिसीमन पर लगा संवैधानिक प्रतिबंध हट जाएगा, जिससे सीटों के समायोजन का रास्ता साफ हो सकता है।

    सरकार के पास अब भी है मौका
    संसद में परिसीमन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े दो अन्य बिल अभी भी लंबित हैं। सरकार ने इन्हें वापस नहीं लिया है, जिसका मतलब है कि इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान किसी भी समय इन्हें दोबारा चर्चा के लिए लाया जा सकता है। इससे परिसीमन आयोग के गठन का विकल्प खुला हुआ है।

    तकनीकी चुनौतियां
    भले ही तकनीकी रूप से रास्ता खुला हो, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। लोकसभा की 550 सीटों की वर्तमान सीमा को बढ़ाने के लिए सरकार को फिर से संसद में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा, जो एक बड़ी चुनौती है। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद बढ़ सकता है। यदि सरकार सीटों की संख्या बढ़ाए बिना केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करती है तो विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनने की उम्मीद ज्यादा है।

  • भारत-चीन रिश्तों में नई नरमी! SCO मंच पर पहली खास बैठक, जिनपिंग के भारत दौरे के संकेत

    भारत-चीन रिश्तों में नई नरमी! SCO मंच पर पहली खास बैठक, जिनपिंग के भारत दौरे के संकेत


    नई दिल्ली।
    लंबे तनाव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में फिर से गर्माहट दिखने लगी है। साल 2024 में पूर्वी लद्दाख विवाद सुलझने के बाद पहली बार दोनों देशों के बीच शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के तहत अहम द्विपक्षीय वार्ता हुई। 16-17 अप्रैल को हुई इस बैठक को कूटनीतिक रिश्तों में सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

    क्या रही बैठक की अहम बातें?
    विदेश मंत्रालय के मुताबिक, दोनों देशों ने SCO नेताओं के फैसलों को लागू करने और संगठन की भविष्य की रणनीति पर गहन चर्चा की। सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर सहयोग मजबूत करने पर सहमति बनी।

    इस दौरान प्रतिनिधिमंडलों ने विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सिबी जॉर्ज से भी मुलाकात की, जहां द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की समीक्षा की गई।

    BRICS और SCO में बढ़ती नजदीकियां
    लद्दाख विवाद सुलझने के बाद भारत और चीन अब BRICS और SCO जैसे मंचों पर मिलकर काम कर रहे हैं। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद लगातार बढ़ रहा है।

    जिनपिंग के भारत दौरे की चर्चा
    बीजिंग ने भारत की BRICS अध्यक्षता का समर्थन किया है। इसी क्रम में चीन के विदेश मंत्री वांग यी मई में भारत आ सकते हैं। वहीं, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सितंबर में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की संभावना जताई जा रही है।

    SCO पर भारत का साफ रुख
    भारत SCO को क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए अहम मंच मानता है, लेकिन उसने साफ किया है कि किसी भी कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं होगा।

    पीएम मोदी का संदेश
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ऐसी कनेक्टिविटी, जो संप्रभुता का सम्मान नहीं करती, वह टिकाऊ नहीं हो सकती।

    भारत और चीन के बीच बढ़ती बातचीत यह संकेत दे रही है कि दोनों देश तनाव को पीछे छोड़कर सहयोग की नई राह पर बढ़ना चाहते हैं। अब सबकी नजर संभावित उच्चस्तरीय दौरों और आने वाले फैसलों पर टिकी है।

  • क्या भाजपा को पहले से था विधेयक गिरने का अंदाजा, फिर क्यों महिला आरक्षण में संशोधन का खेला दांव

    क्या भाजपा को पहले से था विधेयक गिरने का अंदाजा, फिर क्यों महिला आरक्षण में संशोधन का खेला दांव

    नई दिल्‍ली। लोकसभा में नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक के गिरने के बाद बीजेपी विपक्ष पर आक्रामक है तो वहीं विपक्ष का कहना है कि यह बीजेपी की सोची-समझी साजिश है। बिना संवाद के विशेष सत्र बुलाया गया और फिर विधेयक ना पास होने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा रहा है।
    महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2023 और परिसीमन विधेयक 2026 समेत तीन विधेयकों को पास कराने के लिए पांच राज्यों में चुनाव के बीच ही संसद का विशेष सत्र बुलाया गया। पहले दिन रात 1 बजे के बाद तक विधेयकों पर चर्चा होती रही। 17 अप्रैल को सरकार ने महिला आरक्षण कानून को लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर दी और फिर शाम को जब वोटिंग हुई तो विधेयक निचले सदन में गिर गया। विधेयक गिरते ही बीजेपी विपक्ष पर आक्रामक हो गई।
    बीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस समेत विपक्ष महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ है। वहीं कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बीजेपी पर आरोप लगाया है कि यह एक तरह का षड्यंत्र था ताकि बीजेपी विधानसभा चुनाव के बीच बिना ठीक से संवाद किए ऐसी परिस्थितियां बनाए कि विधेयक पारित ना होने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा सके।

    बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में वोटिंग से पहले ही सोशल मीडिया पर अपना संदेश जारी करते हुए कहा विपक्षी सांसदों से भी अपील की थी कि वे विधेयक के पक्ष में वोटिंग करें। वहीं विपक्ष के सांसदों का कहना था कि 2023 में पारित विधेयक को उसी रूप में लागू किया जाए। इसमें संशोधन की जरूरत कहां से पड़ गई अशोक गहलोत ने शुक्रवार को कहा, धानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित पूरी सरकार को यह पहले दिन से मालूम था कि संविधान संशोधन विधेयक विपक्ष के सहयोग के बिना पास नहीं हो सकता। इसके बावजूद उन्होंने विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं लिया।
    बीजेपी ने किया विपक्ष में फूट डालने का प्रयास- गहलोत

    गहलोत ने कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे लगातार इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर रहे थे, परन्तु इतने महत्वपूर्ण विषय पर प्रधानमंत्री ने सभी विपक्षी पार्टियों को एक साथ बुलाकर बात करने के बजाय अलग-अलग बात कर उनमें फूट डालने का प्रयास किया।

    कैसे गिर गया विधेयक

    सदन में ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’, पर हुए मत विभाजन के दौरान इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। विधेयक पर मत विभाजन में 528 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इस विधेयक को पारित करने के लिए 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी।

    विधेयक गिरने का भी फायदा उठाएगी बीजेपी?

    विधानसभा चुनावों में बीजेपी अकसर महिला वोटों के लिए कोई ना कोई दांव खेलती है। ऐसे में जानकारों का कहना है कि बीजेपी को पहले से पता था कि इस विधेयक को लेकर विपक्ष एकजुट होने का प्रयास करेगा। अगर विधेयक पास होता है तब भी बीजेपी इसे बंगाल चुनाव में मुद्दा बना सकती है। वहीं अगर विधेयक पास नहीं होता है तो वह इसी के बहाने विपक्ष को निशाने पर ले सकती है। अब इस राजनीति की शुरुआत पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से हो चुकी है। यह मुद्दा 2029 के चुनाव में भी भुनाया जा सकता है।

  • आधी रात को पुणे एयरपोर्ट पर फाइटर जेट की हार्ड लैंडिंग….अस्थाई रूप से बंद करना पड़ा रनवे

    आधी रात को पुणे एयरपोर्ट पर फाइटर जेट की हार्ड लैंडिंग….अस्थाई रूप से बंद करना पड़ा रनवे


    पुणे।
    भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के फाइटर जेट की हार्ड लैंडिंग (IAF fighter jet Hard Landing) के कारण आधी रात को पुणे एयरपोर्ट (Pune Airport) ही बंद करना पड़ गया। पुणे एयरपोर्ट पर शुक्रवार की रात को इंडियन एयरफोर्स के फाइटर एयरक्राफ्ट की हार्ड लैंडिंग हुई. इसके कारण ही रनवे को बंद कर दिया गया। राहत की बात है कि पायलट सुरक्षित है और किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ है।

    अधिकारियों ने जानकारी दी कि भारतीय वायुसेना का एक फाइटर जेट के हार्ड लैंडिंग से जुड़ी घटना के बाद शुक्रवार को पुणे एयरपोर्ट का रनवे अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया. उसने कहा कि रनवे को फिर से चालू करने के प्रयास जारी हैं।

    इंडियन एयरफोर्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा, ‘ भारतीय वायुसेना के एक विमान से जुड़ी घटना के कारण पुणे का रनवे अस्थायी रूप से बंद है. विमान का क्रू सुरक्षित है और किसी भी आम नागरिक की संपत्ति को कोई नुकसान नहीं हुआ है.’ उसने कहा, ‘रनवे को फिर से चालू करने और जल्द से जल्द सामान्य परिचालन शुरू करने के प्रयास जारी हैं.’

    यह पुणे एयरपोर्ट यानी हवाई अड्डा ‘दोहरे उपयोग वाले मॉडल’ पर काम करता है. इसमें आम नागरिकों की कमर्शियल उड़ानों को एक सक्रिय वायु सेना स्टेशन के साथ जोड़ा जाता है. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि वायुसेना के एक विमान की ‘हार्ड लैंडिंग’ हुई, लेकिन उन्होंने इस बारे में और कोई जानकारी देने से मना कर दिया।

    पुणे इंटरनेशनल एयरपोर्ट के अधिकारियों के अनुसार, शुक्रवार की रात करीब 10:25 बजे लैंडिंग के दौरान भारतीय वायुसेना का एक लड़ाकू विमान का अंडरकैरिज (पहिए) खराब हो गया. इसके चलते हार्ड लैंडिंग हुई और फिर पूरा रनवे बंद हो गया. उन्होंने कहा, ‘भारतीय वायुसेना के ATC के अनुसार रनवे को साफ करने और सामान्य परिचालन बहाल करने में 4-5 घंटे लगेंगे.’


    केंद्रीय मंत्री ने क्या कहा

    केंद्रीय नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने हवाई अड्डे पर रनवे का परिचालन रोके जाने की पुष्टि की. मुरलीधर मोहोल ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘शुक्र है कि विमान का क्रू सुरक्षित है और किसी भी आम नागरिक की संपत्ति को कोई नुकसान नहीं हुआ है. एयरलाइंस को सूचित कर दिया गया है और रनवे पर सामान्य परिचालन बहाल करने में लगभग 5 घंटे लग सकते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘मैं हवाई अड्डे के निदेशक और वायु सेना के अधिकारियों के लगातार संपर्क में हूं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्थिति जल्द से जल्द सुलझ जाए।