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  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना 2027 के लिए सवालों की सूची जारी कर दी है। इस बार जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि अब उन्हें भी अपनी जाति बतानी पड़ेगी। उनके इस बयान के बाद जाति जनगणना का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

    गिरिराज सिंह ने कहा कि जनगणना में जब जाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी तो राहुल गांधी को भी अपनी जाति बतानी होगी। उन्होंने राहुल गांधी पर राजनीतिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उन्हें अपनी जाति के बारे में जवाब देना पड़ा तो उनके लिए स्थिति अलग हो सकती है। केंद्रीय मंत्री ने इस दौरान राहुल गांधी के राजनीतिक रुख पर भी सवाल उठाए।

    जनगणना 2027 के लिए जारी किए गए प्रश्नों में जाति से संबंधित सवाल को विशेष रूप से शामिल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जाति संबंधी प्रश्न सूची में 10वें स्थान पर है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ जाति की जानकारी का विकल्प भी जोड़ा गया है। यह बदलाव सामाजिक संरचना से जुड़ा विस्तृत आंकड़ा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    आजादी के बाद होने वाली जनगणनाओं के संदर्भ में यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार सभी समुदायों की जाति संबंधी जानकारी दर्ज किए जाने की व्यवस्था की गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के फॉर्म में जाति से जुड़े सवाल के तहत मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज की जाती थी।

    नई जनगणना में केवल जाति तक सीमित जानकारी नहीं ली जाएगी। व्यक्ति का नाम, परिवार के मुखिया से संबंध, वैवाहिक स्थिति, विवाह के समय उम्र, पति या पत्नी का नाम, राष्ट्रीयता और धर्म जैसे विषयों से संबंधित जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसके साथ माता-पिता से जुड़ी जानकारी भी जनगणना प्रक्रिया का हिस्सा होगी।

    शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को लेकर भी सवाल पूछे जाने हैं। व्यक्ति किसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ रहा है या नहीं, उसकी उच्चतम शैक्षणिक योग्यता क्या है और संबंधित अध्ययन क्षेत्र कौन सा है, जैसी जानकारियां दर्ज की जाएंगी। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था और मानव संसाधन से जुड़े आंकड़ों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

    जनगणना में लोगों की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी भी जुटाई जाएगी। व्यक्ति ने पिछले एक वर्ष में काम किया है या नहीं, उसका व्यवसाय क्या है और वह किस क्षेत्र में कार्य करता है, जैसे प्रश्न शामिल किए गए हैं। कामगार की श्रेणी और काम से जुड़ी अन्य गतिविधियों के बारे में भी जानकारी ली जाएगी।

    इसके अलावा काम की तलाश, काम करने की उपलब्धता और कार्यस्थल तक आने जाने से जुड़े विवरण भी दर्ज किए जाएंगे। जनगणना के दौरान मोबाइल नंबर, आधार, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाते से संबंधित सवालों को भी शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    जाति जनगणना को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच पहले से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लंबे समय से जातिगत आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में जनगणना 2027 में जाति संबंधी जानकारी शामिल किए जाने का निर्णय राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • Independence Day 2026: तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंग का क्या है अर्थ, जानिए त्याग, शांति और विकास का संदेश

    Independence Day 2026: तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंग का क्या है अर्थ, जानिए त्याग, शांति और विकास का संदेश


    नई दिल्ली । 
    15 अगस्त को भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक बनकर हर जगह लहराता है। तिरंगे में शामिल केसरिया, सफेद और हरा रंग केवल उसकी पहचान का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके साथ अलग-अलग भाव और प्रतीकात्मक अर्थ भी जोड़े जाते हैं। भारतीय परंपरा और जीवन दर्शन में इन रंगों को त्याग, शांति, सत्य, प्रकृति और विकास जैसे मूल्यों से जोड़कर देखा जाता रहा है।

    तिरंगे की सबसे ऊपरी पट्टी का रंग केसरिया है। इसे साहस, त्याग, तपस्या और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक माना जाता है। भारतीय परंपरा में केसरिया रंग का संबंध संन्यास और वैराग्य से भी रहा है। साधु-संतों और संन्यासियों के वस्त्रों में इस रंग का प्रयोग लंबे समय से देखने को मिलता है।

    राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग का प्रतीकात्मक संदेश यह माना जाता है कि राष्ट्रहित में व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा, समर्पण और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इसे नेतृत्व, आत्मबल और दृढ़ संकल्प से भी जोड़ा जाता है। यही भाव स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश के लिए बलिदान देने वाले लोगों की भावना से भी जुड़ा दिखाई देता है।

    तिरंगे के बीच में सफेद रंग की पट्टी है। सफेद रंग को शांति, सत्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में सफेद रंग को सात्विकता और शुद्धता से जोड़ने की परंपरा रही है। धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर भी सफेद रंग को शांत और सकारात्मक भावनाओं से संबंधित माना जाता है।

    राष्ट्रीय ध्वज में सफेद रंग यह संदेश देता है कि राष्ट्र की शक्ति और प्रगति के साथ शांति तथा सत्य का महत्व भी बना रहना चाहिए। इसी सफेद पट्टी के बीच गहरे नीले रंग का अशोक चक्र स्थित है, जो निरंतर गति और प्रगति का प्रतीक माना जाता है।

    तिरंगे की सबसे निचली पट्टी हरे रंग की है। हरा रंग प्रकृति, हरियाली, उर्वरता और विकास से जुड़ा माना जाता है। पेड़-पौधे, कृषि और प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में हरे रंग को जीवन, समृद्धि और संतुलित विकास के व्यापक भाव से जोड़ा जाता है।

    भारतीय परंपराओं में हरे रंग और हरियाली का संबंध नवजीवन तथा प्रकृति से भी रहा है। खेती-किसानी और प्राकृतिक वातावरण से जुड़े समाज में हरियाली समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत मानी जाती है। राष्ट्रीय ध्वज में यह रंग देश के विकास के साथ प्रकृति और पर्यावरण के महत्व की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है।

    तिरंगे के तीनों रंगों को एक साथ देखें तो इनमें राष्ट्र जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतीकात्मक समन्वय दिखाई देता है। केसरिया त्याग और साहस का संदेश देता है, सफेद शांति और सत्य की याद दिलाता है, जबकि हरा विकास और प्रकृति से जुड़ी समृद्धि का भाव सामने रखता है।

    इन रंगों के बीच मौजूद अशोक चक्र भी तिरंगे की पहचान को पूर्ण करता है। इसमें 24 तीलियां हैं और यह निरंतर गति का संदेश देता है। इस तरह तिरंगा केवल राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि देश के नागरिकों को कर्तव्य, शांति, प्रगति और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाला राष्ट्रीय ध्वज भी है।

  • अभिजीत दीपके ने सौरव दास का किया समर्थन, बोले उनके वीडियो से लॉ छात्रों का भविष्य बचा और सवाल उठाना जरूरी है

    अभिजीत दीपके ने सौरव दास का किया समर्थन, बोले उनके वीडियो से लॉ छात्रों का भविष्य बचा और सवाल उठाना जरूरी है


    नई दिल्ली । 
    अभिजीत दीपके ने सौरव दास के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि वह देश और विशेष रूप से कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के हित में काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सौरव दास के एक वीडियो के सामने आने के बाद बार काउंसिल के चेयरमैन ने अपना नोटिफिकेशन वापस ले लिया था। दीपके के मुताबिक इससे बड़ी संख्या में लॉ छात्रों का भविष्य प्रभावित होने से बच गया।

    अभिजीत दीपके ने कहा कि सौरव दास का प्रयास देश के लिए सकारात्मक है और कानून के छात्रों के लिए भी इसका महत्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दे पर अपनी बात रख रहा है तो उसे जानबूझकर परेशान करने की कोशिश क्यों की जानी चाहिए।

    उन्होंने सौरव दास और उनके परिवार से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। दीपके के अनुसार दिल्ली में एक यूट्यूबर सौरव दास के घर में प्रवेश कर गया था। उन्होंने इस घटनाक्रम को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि सौरव और उनके परिवार को इस तरह परेशान करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी।

    दीपके ने यह भी सवाल उठाया कि परिवार के सदस्यों से उनकी निजी गतिविधियों और कामकाज से जुड़े सवाल क्यों किए गए। उन्होंने विशेष रूप से सौरव की मां को इस पूरे मामले में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई। उनके अनुसार परिवार को अनावश्यक रूप से परेशान करने की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।

    सौरव दास ने इससे पहले पुडुचेरी में अपने परिवार को पुलिस की ओर से डराए और धमकाए जाने का आरोप लगाया था। हालांकि, पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया था। पुलिस की ओर से बताया गया कि अधिकारी सौरव दास के रिश्तेदारों के घर जरूर गए थे, लेकिन यह कार्रवाई नियमित सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा थी।

    पुलिस के अनुसार स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसरों से पहले संवेदनशील स्थानों और प्रमुख मार्गों के आसपास रहने वाले लोगों के घर जाकर सुरक्षा संबंधी जानकारी जुटाई जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत सौरव दास के रिश्तेदारों के घर भी पुलिस पहुंची थी। पुलिस ने किसी तरह की धमकी या परेशान किए जाने के आरोपों से इनकार किया था।

    इस पूरे मामले के बीच अभिजीत दीपके ने सौरव दास के काम को लेकर अपना समर्थन दोहराया। उन्होंने कहा कि देश में कानून के छात्रों के भविष्य और शिक्षा से जुड़े विषयों पर आवाज उठाना जरूरी है। उनके अनुसार यदि किसी मुद्दे पर बदलाव की जरूरत है तो उसके बारे में सवाल पूछे जाने चाहिए और संबंधित व्यवस्था से जवाब मांगा जाना चाहिए।

    स्कूलों की स्थिति को लेकर भी अभिजीत दीपके ने अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश के कई बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत सुविधाओं की कमी दूर किए बिना देश की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।

    उन्होंने कहा कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार का सीधा संबंध देश के भविष्य से है और इस दिशा में लगातार काम करने की जरूरत है।

    सौरव दास से जुड़े विवाद में फिलहाल उनके आरोपों और पुलिस के स्पष्टीकरण के अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं। वहीं अभिजीत दीपके ने स्पष्ट रूप से सौरव के प्रयासों का समर्थन किया है और उनके खिलाफ होने वाली किसी भी अनावश्यक कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। मामले को लेकर आगे होने वाले घटनाक्रम पर अब नजर रहेगी।

  • अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर पर दिया बड़ा बयान, कहा भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी

    अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर पर दिया बड़ा बयान, कहा भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी


    नई दिल्ली । राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत की रणनीतिक क्षमता और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत की उदारता और सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी। जरूरत पड़ने पर देश जोखिम उठाने और अपने हितों की रक्षा के लिए कड़े फैसले लेने की क्षमता रखता है।

    डोभाल की यह टिप्पणी ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित आगामी दो हिस्सों वाली डॉक्यूसीरीज में सामने आई है। यह बातचीत अभियान के बाद उनके प्रमुख सार्वजनिक बयानों में से एक मानी जा रही है। इसमें उन्होंने सैन्य कार्रवाई के पीछे की सोच, सुरक्षा चुनौतियों और फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं पर बात की है।

    ऑपरेशन सिंदूर के बारे में डोभाल ने बताया कि करीब 88 घंटे चले सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाना था। कार्रवाई का संबंध पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़े ठिकानों से बताया गया। भारत ने इस अभियान के माध्यम से आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति और प्रतिक्रिया की क्षमता को स्पष्ट करने का प्रयास किया।

    उन्होंने कहा कि भारत शांति और सहनशीलता में विश्वास करता है, लेकिन इन दोनों मूल्यों को कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक देश जरूरत पड़ने पर ऐसे फैसले लेने में सक्षम है जिनमें जोखिम शामिल हो सकता है और जिनके संभावित परिणामों की परवाह किए बिना राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़ी है। हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी। इस अभियान को भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा गया।

    डॉक्यूसीरीज में अभियान के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य स्तर पर लिए गए फैसलों से जुड़े कई पहलुओं को सामने लाने की तैयारी है। इसमें वरिष्ठ सुरक्षा और सैन्य अधिकारियों के अनुभवों के माध्यम से अभियान की परिस्थितियों और निर्णय प्रक्रिया को समझाने की कोशिश की जाएगी।

    डोभाल इस कार्यक्रम में सैन्य कार्रवाई के पीछे मौजूद रणनीतिक सोच और विभिन्न स्तरों पर लिए गए फैसलों के बारे में जानकारी देते नजर आएंगे। इससे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सामने मौजूद चुनौतियों को समझने का अवसर मिल सकता है।

    अजीत डोभाल लंबे समय से भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त डोभाल को 30 मई 2014 को पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया था। इसके बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, खुफिया मामलों और रणनीतिक चुनौतियों से जुड़े विषयों पर उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

    डोभाल का करियर खुफिया और सुरक्षा क्षेत्र में लंबे अनुभव से जुड़ा रहा है। इसी पृष्ठभूमि के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में उनकी रणनीतिक समझ को विशेष महत्व दिया जाता है। ऑपरेशन सिंदूर पर उनकी टिप्पणी भी भारत की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ उसके दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।

    डॉक्यूसीरीज का प्रसारण शनिवार रात नौ बजे से निर्धारित है। कार्यक्रम में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े घटनाक्रम, सैन्य कार्रवाई और उससे संबंधित रणनीतिक फैसलों के बारे में विस्तार से जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

  • भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    नई दिल्ली । भारत की वैश्विक छवि को लेकर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में अलग-अलग देशों के लोगों की राय में बड़ा अंतर सामने आया है। 36 देशों में किए गए अध्ययन के मुताबिक भारत के प्रति दुनिया की औसत सकारात्मक धारणा 45 प्रतिशत रही, जबकि 41 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक राय व्यक्त की। आंकड़े बताते हैं कि भारत की लोकप्रियता कई देशों में मजबूत है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसकी छवि को लेकर मतभेद भी स्पष्ट हैं।

    सर्वे में भारत के पड़ोसी देशों की राय सबसे ज्यादा चर्चा में रही। श्रीलंका में भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का अनुपात 79 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा भारत के लिए सर्वे में शामिल देशों के बीच सबसे मजबूत सकारात्मक प्रतिक्रियाओं में शामिल है। इसके विपरीत पाकिस्तान में केवल 7 प्रतिशत लोगों ने भारत के बारे में सकारात्मक राय व्यक्त की।

    भारत की बेहतर छवि केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रही। केन्या और ब्रिटेन में भी लगभग दस में सात लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक रुख जताया। जर्मनी, इजरायल, इटली, स्वीडन, जापान और थाईलैंड में भी भारत को लेकर सकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही।

    यूरोपीय देशों में भारत की छवि में पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले सुधार भी दर्ज किया गया है। ब्रिटेन में एक वर्ष के दौरान भारत के प्रति सकारात्मक राय में 11 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। जर्मनी में सकारात्मक धारणा छह प्रतिशत अंक बढ़ी। फ्रांस में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय 2023 के 39 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।

    श्रीलंका में भारत की छवि में विशेष सुधार दिखाई दिया। वहां 2024 के मुकाबले भारत के प्रति सकारात्मक राय में 14 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज की गई। इससे दोनों देशों के बीच सामाजिक और क्षेत्रीय स्तर पर भारत की स्वीकार्यता की एक मजबूत तस्वीर सामने आती है।

    हालांकि अमेरिका में भारत को लेकर तस्वीर अपेक्षाकृत कमजोर रही। वहां 45 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय व्यक्त की, जबकि 50 प्रतिशत लोगों की राय नकारात्मक रही। यह भारत के लिए 2008 के बाद अमेरिका में दर्ज सबसे कम सकारात्मक रेटिंग बताई गई है। वर्ष 2023 में अमेरिका में भारत को लेकर 51 प्रतिशत सकारात्मक राय सामने आई थी।

    अमेरिका में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी भारत को लेकर अंतर दिखाई दिया। डेमोक्रेट समर्थकों में 50 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि रिपब्लिकन समर्थकों में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत रहा। इससे अमेरिकी समाज में भारत की छवि को लेकर राजनीतिक विभाजन का संकेत मिलता है।

    सर्वे में भारत के वैश्विक प्रभाव को लेकर भी अमेरिकी नागरिकों से सवाल किया गया। 54 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने माना कि दुनिया में भारत का प्रभाव लगभग पहले जैसा ही है। वहीं 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 13 प्रतिशत ने इसके कम होने की बात कही।

    तुर्किये में भारत के प्रति सकारात्मक राय केवल 15 प्रतिशत रही। वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत था। इजरायल में भी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर राय में अंतर सामने आया, जहां दक्षिणपंथी विचार रखने वालों में सकारात्मक धारणा 68 प्रतिशत और वामपंथी विचार रखने वालों में 46 प्रतिशत रही।

    कुल मिलाकर सर्वे भारत की वैश्विक छवि की मिश्रित तस्वीर पेश करता है। जहां श्रीलंका, ब्रिटेन, जर्मनी और कई अन्य देशों में भारत के प्रति सकारात्मक धारणा मजबूत हुई है, वहीं पाकिस्तान, तुर्किये और अमेरिका जैसे देशों में अलग रुझान दिखाई देता है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता एक समान नहीं है और अलग-अलग देशों में उसकी छवि क्षेत्रीय संबंधों, राजनीतिक परिस्थितियों और वैश्विक धारणा के अनुसार बदल रही है।

  • सावरकर टिप्पणी मामले में राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई खत्म, यूपी सरकार के अनुमति रिकॉर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    सावरकर टिप्पणी मामले में राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई खत्म, यूपी सरकार के अनुमति रिकॉर्ड पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को विनायक दामोदर सावरकर से जुड़ी मानहानि शिकायत के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने लखनऊ की निचली अदालत से राहुल गांधी के खिलाफ जारी समन को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही मानहानि शिकायत और उससे जुड़े निचली अदालत के पुराने आदेशों को भी समाप्त कर दिया गया है।

    यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में दाखिल किए गए हलफनामे के बाद आया। सरकार ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक अनुमति से संबंधित कोई रिकॉर्ड उसके पास उपलब्ध नहीं है। अदालत ने इसी तथ्य को कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण आधार माना।

    मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार का हलफनामा पीठ के सामने रखा गया। इसमें मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक अनुमति के रिकॉर्ड के उपलब्ध नहीं होने की जानकारी दी गई थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब आवश्यक अनुमति से संबंधित कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है, तो इस आधार पर निचली अदालत में आगे की आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं होगा। इसके बाद पीठ ने राहुल गांधी के खिलाफ जारी समन के साथ शिकायत और मजिस्ट्रेट द्वारा पहले पारित किए गए आदेशों को भी रद्द कर दिया।

    यह मामला वर्ष 2022 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान दिए गए एक बयान से संबंधित है। 17 नवंबर 2022 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में यात्रा के दौरान आयोजित एक जनसभा में राहुल गांधी ने सावरकर को लेकर टिप्पणी की थी। उनके बयान के बाद इस मामले को लेकर विवाद खड़ा हुआ और उनके खिलाफ मानहानि की शिकायत दाखिल की गई।

    शिकायतकर्ता वकील नृपेंद्र पांडे ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने सावरकर के बारे में टिप्पणी कर उनका जानबूझकर अपमान किया और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया। इसके बाद लखनऊ की अदालत में मामले की कार्यवाही आगे बढ़ी और राहुल गांधी के खिलाफ समन जारी किया गया।

    राहुल गांधी ने निचली अदालत की कार्रवाई और समन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। पिछली सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उनके बयान को लेकर नाराजगी जताते हुए सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ बयान देने की आवश्यकता पर जोर दिया था। हालांकि, उसी दौरान निचली अदालत से जारी समन पर रोक लगाकर उन्हें अंतरिम राहत दी गई थी।

    अब उत्तर प्रदेश सरकार के हलफनामे में आवश्यक अनुमति का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की बुनियादी कानूनी स्थिति पर विचार किया। अदालत के ताजा आदेश के बाद इस शिकायत के आधार पर राहुल गांधी के खिलाफ लखनऊ अदालत में चल रही संबंधित कार्यवाही समाप्त हो गई है।

    सावरकर से जुड़े बयानों को लेकर राहुल गांधी पहले भी राजनीतिक और कानूनी विवादों का सामना करते रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला उनके लिए महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है। हालांकि, अदालत की कार्रवाई का आधार राजनीतिक विवाद के बजाय मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक अनुमति से संबंधित रिकॉर्ड का उपलब्ध नहीं होना रहा।

  • जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    नई दिल्ली । देश में जनगणना 2027 की प्रक्रिया का दूसरा चरण 17 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। इस चरण में पहली बार आजादी के बाद देशव्यापी स्तर पर जातिगत आंकड़े जुटाए जाएंगे। केंद्र सरकार ने जनगणना के लिए पूछे जाने वाले 40 सवालों की सूची अधिसूचित कर दी है। नागरिकों से उनकी सामाजिक, जनसांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति से जुड़ी विभिन्न जानकारियां दर्ज की जाएंगी।

    जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना होगी, जबकि स्वतंत्रता के बाद यह आठवीं जनगणना के रूप में आयोजित की जा रही है। इस बार की जनगणना कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसमें जाति से संबंधित जानकारी भी आधिकारिक तौर पर दर्ज की जाएगी। इससे देश में विभिन्न सामाजिक समूहों की जनसंख्या से जुड़े आंकड़े सामने आने की संभावना है।

    निर्धारित 40 सवालों में नागरिकों से जाति, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी। इसके अलावा कोविड-19 टीकाकरण से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जनगणना के दौरान प्रत्येक परिवार और व्यक्ति से निर्धारित प्रश्नों के आधार पर जानकारी एकत्र की जाएगी।

    जनगणना दो चरणों में पूरी की जा रही है। पहले चरण में मकानों और आवास से संबंधित विवरण जुटाने की प्रक्रिया रखी गई है। दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक की जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी दर्ज की जाएगी। इसी दूसरे चरण में जातिगत आंकड़ों को भी शामिल किया गया है।

    इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से संचालित किया जा रहा है। मोबाइल उपकरणों के माध्यम से आंकड़े दर्ज करने के साथ नागरिकों को स्वयं अपनी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने की सुविधा भी दी गई है। इससे कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता कम करने और आंकड़ों को डिजिटल रूप में संग्रहित करने में मदद मिलेगी।

    पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों के लिए जनगणना का कार्यक्रम अलग रखा गया है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले एवं असमान क्षेत्रों में जनगणना का दूसरा चरण 1 सितंबर से 30 सितंबर तक चलेगा। इन क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए समयसीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इन क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को 17 अगस्त से 31 अगस्त तक स्वयं ऑनलाइन जानकारी दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध रहेगी। वहीं देश के अन्य हिस्सों में जनसंख्या की गणना फरवरी 2027 में की जाएगी। इस तरह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जनगणना का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है।

    जनगणना 2027 की प्रक्रिया में जातिगत जानकारी शामिल किए जाने को सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे सरकार के पास विभिन्न सामाजिक वर्गों की जनसंख्या से संबंधित अधिक विस्तृत आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे। इन आंकड़ों का उपयोग भविष्य में नीतियों और योजनाओं के निर्माण में किया जा सकता है।

    यह जनगणना मूल रूप से वर्ष 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसकी प्रक्रिया निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो सकी। अब कई वर्षों की देरी के बाद जनगणना की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन स्व-पंजीकरण और पहली बार जातिगत आंकड़ों का समावेश इस जनगणना को पिछली जनगणनाओं से अलग बनाता है।

  • स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली में बदलेगी ट्रैफिक व्यवस्था, सुबह 4 से 10 बजे तक लाल किले के आसपास कई रास्ते बंद रहेंगे

    स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली में बदलेगी ट्रैफिक व्यवस्था, सुबह 4 से 10 बजे तक लाल किले के आसपास कई रास्ते बंद रहेंगे

    नई दिल्ली । स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय समारोह को देखते हुए दिल्ली में यातायात व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया गया है। दिल्ली यातायात पुलिस ने 15 अगस्त को राजधानी के कई प्रमुख मार्गों पर वाहनों की आवाजाही को लेकर विशेष व्यवस्था लागू करने की तैयारी की है। सुरक्षा कारणों से शनिवार सुबह 4 बजे से सुबह 10 बजे तक लाल किले और उसके आसपास के कई रास्तों पर सामान्य यातायात प्रतिबंधित रहेगा।

    यातायात पुलिस ने लोगों से अपील की है कि वे स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान लाल किले और आसपास के प्रतिबंधित क्षेत्रों में अनावश्यक यात्रा से बचें। जिन लोगों को जरूरी काम से घर से निकलना है, उन्हें अपनी यात्रा पहले से निर्धारित करने और सामान्य दिनों की तुलना में अतिरिक्त समय लेकर चलने की सलाह दी गई है।

    लाल किले के आसपास नेताजी सुभाष मार्ग पर दिल्ली गेट से छत्ता रेल चौक तक यातायात प्रभावित रहेगा। इसके अलावा लोथियन रोड और दिल्ली के मुख्य डाकघर से छत्ता रेल चौक की दिशा में भी वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध रहेगा। एसपी मुखर्जी मार्ग से यमुना बाजार चौक की ओर जाने वाले रास्ते पर भी यातायात व्यवस्था बदली जाएगी।

    चांदनी चौक मार्ग पर फाउंटेन चौक से लाल किले की तरफ जाने वाले वाहनों को भी सामान्य रूप से आवाजाही की अनुमति नहीं होगी। निशाद राज मार्ग, एस्प्लेनेड रोड और संपर्क मार्ग से नेताजी सुभाष मार्ग की ओर जाने वाले हिस्सों में भी सुरक्षा व्यवस्था के अनुरूप यातायात प्रतिबंध लागू रहेगा।

    राजघाट से अंतरराज्यीय बस अड्डे की ओर जाने वाली रिंग रोड और कश्मीरी गेट के आसपास भी यातायात प्रभावित रहेगा। इन क्षेत्रों में निर्धारित सुरक्षा व्यवस्था के तहत केवल अधिकृत पहचान वाले वाहनों को प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। पुलिस ने वाहन चालकों से प्रतिबंधित क्षेत्रों में जाने के बजाय वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल करने की अपील की है।

    यातायात पुलिस ने इंडिया गेट के आसपास सी-हेक्सागन, कॉपरनिकस मार्ग, मंडी हाउस, तिलक मार्ग और मथुरा मार्ग जैसे प्रमुख मार्गों पर भी अनावश्यक आवाजाही से बचने की सलाह दी है। बीएसजेड मार्ग और जेएल नेहरू मार्ग की ओर जाने वाले यात्रियों को भी यात्रा से पहले मार्ग की स्थिति को ध्यान में रखने को कहा गया है।

    निजामुद्दीन खट्टा से अंतरराज्यीय बस अड्डे के बीच रिंग रोड तथा कश्मीरी गेट से बाहरी रिंग रोड होते हुए सलीमगढ़ बाईपास की ओर जाने वाले मार्ग पर भी यातायात दबाव और सुरक्षा व्यवस्था के कारण अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

    स्वतंत्रता दिवस को देखते हुए दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी की गई है। राजधानी की सीमाओं, प्रमुख बाजारों, मॉल, होटलों और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी बढ़ाई गई है। पुलिस की गश्त और वाहनों की जांच के साथ सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बल की तैनाती की गई है।

    सुरक्षा एजेंसियां संभावित आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयारियों का अभ्यास भी कर रही हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी के लिए तकनीकी साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि वे यातायात संकेतों का पालन करें और मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों के निर्देशों को प्राथमिकता दें।

    स्वतंत्रता दिवस के दिन दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही को देखते हुए पुलिस ने नागरिकों से संयम बरतने और यात्रा की योजना पहले से बनाने को कहा है। प्रतिबंधित मार्गों से बचने और निर्धारित वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने से यातायात को सुचारु बनाए रखने में मदद मिलेगी।

  • धार्मिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए रामलला के अर्चक अब बिना सिलाई वाले पीत वस्त्रों में नजर आएंगे।

    धार्मिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए रामलला के अर्चक अब बिना सिलाई वाले पीत वस्त्रों में नजर आएंगे।


    नई दिल्ली । 
    अयोध्या स्थित भव्य राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला की पूजा-अर्चना व्यवस्था को और अधिक सुव्यवस्थित तथा मर्यादित बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा तय की गई नई व्यवस्था के अंतर्गत अब गर्भगृह में सेवा देने वाले सभी अर्चक एक समान पारंपरिक वेशभूषा में नजर आएंगे। यह नया ड्रेस कोड 15 अगस्त से प्रभावी रूप से लागू किया जाएगा।

    नए ड्रेस कोड के दिशानिर्देशों के अनुसार, ग्रीष्म ऋतु के दौरान सभी अर्चक नीचे पीली धोती और ऊपर बिना सिला हुआ पीला रेशमी अंगवस्त्र धारण करेंगे। कंधों पर रखा जाने वाला यह अंगवस्त्र पूरी तरह से बिना सिलाई का होगा। धार्मिक परंपराओं में गर्भगृह की पवित्रता और शुचिता को बनाए रखने के लिए बिना सिले रेशमी वस्त्रों के उपयोग को विशेष रूप से प्राथमिकता दी जाती है।

    मौसम में परिवर्तन के अनुसार पुजारियों के परिधान सामग्री में बदलाव किया जाएगा, लेकिन वस्त्रों का रंग पीला ही रहेगा। आगामी शीत ऋतु के आगमन पर मौसम के अनुकूल पीले रंग के ऊनी वस्त्र उपलब्ध कराए जाएंगे। धार्मिक न्यास समिति के अनुसार, सनातन और वैष्णव परंपराओं में सूती अथवा सिले हुए कपड़ों की तुलना में रेशमी और ऊनी वस्त्रों को पूजा-अर्चना के दौरान सर्वाधिक शुद्ध माना गया है।

    पूजा-अर्चना में संलग्न पुजारियों का कार्य समय और रोस्टर प्रत्येक माह की अमावस्या और पूर्णिमा तिथियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। रोस्टर में बदलाव के साथ ही नए वस्त्र कोड का पालन अनिवार्य कर दिया गया है। मंदिर प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि इस पहल का उद्देश्य पूजा व्यवस्था में एकरूपता और धार्मिक मर्यादाओं का पूर्ण पालन सुनिश्चित करना है।

    अयोध्या में रामलला के नए ड्रेस कोड और धार्मिक अनुष्ठानों की शुचिता को लेकर देश भर के श्रद्धालुओं में विशेष श्रद्धा देखी जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल और उज्जैन जैसे सांस्कृतिक शहरों के राम भक्तों और धार्मिक विद्वानों ने भी इस पारंपरिक पहल का स्वागत किया है। मध्य प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में भी इस प्रकार की वैदिक परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है।

    श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा मंदिर परिसर की सुरक्षा, प्रबंधन और दान व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए लगातार समीक्षा बैठकें की जा रही हैं। पूर्व में सामने आई व्यवस्थात्मक कमियों को दूर करते हुए प्रबंधन में कई व्यापक सुधार किए गए हैं, जिसमें कर्मचारियों और अर्चकों की कार्यशैली को और अधिक अनुशासित बनाना शामिल है।

    वैदिक आचार्यों और धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि पवित्र गर्भगृह के भीतर मर्यादा और शुचिता का पालन सर्वोपरि होता है। बिना सिले वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना करने की यह प्राचीन पद्धति राम मंदिर की भव्यता और सनातन संस्कृति के गौरव को और अधिक प्रगाढ़ बनाएगी।

    इस नए नियम के लागू होने के बाद मंदिर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को रामलला के दर्शन के साथ-साथ अर्चकों की एकरूप और सात्विक वेशभूषा का अनूठा अनुभव प्राप्त होगा, जो मंदिर की पावन छवि को एक नया आयाम प्रदान करेगा।