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  • CJI चंद्रचूड़: 'सोचना भी नहीं कोई मुझे डरा-धमका सकता है' – पूर्व सांसद की याचिका पर क्यों कहना पड़ा यह

    CJI चंद्रचूड़: 'सोचना भी नहीं कोई मुझे डरा-धमका सकता है' – पूर्व सांसद की याचिका पर क्यों कहना पड़ा यह


    नई दिल्ली। मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सुर्यकांत ने कोर्ट में लंबित मामलों के दौरान हो रही टिप्पणियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान जजों द्वारा किए गए सवालों और टिप्पणियों को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया पर नैरेटिव बनाकर लोगों में भ्रम फैलाया जाता है।यह टिप्पणी उन्होंने पूर्व सांसद प्रज्जवल रेवन्ना की याचिका की सुनवाई के दौरान की। रेवन्ना ने अपने खिलाफ रेप मामलों के ट्रायल्स को ट्रांसफर करने का अनुरोध किया था। उनके वकीलों सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ दवे ने ट्रायल्स के दौरान जजों की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैंजिन्हें रिकॉर्ड से हटाना आवश्यक है। उन्होंने इसे पक्षपात का आधार बताते हुए ट्रायल ट्रांसफर की मांग की।

    सीजेआई सूर्यकांत के साथ सुनवाई में जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी मौजूद थे। जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि जज की टिप्पणियां पक्षपात का आधार नहीं बन सकतीं। बेंच ने कहा कि जज केवल वर्तमान मुकदमे में पेश सबूतों के आधार पर ही निर्णय देंगे और पहले मामले में दोषी पाए जाने का इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट में पूछे गए सवाल केवल दोनों पक्षों की ताकत और दलीलों की जाँच के लिए होते हैं और ये अंतिम निर्णय को नहीं दर्शाते। लेकिन लोग बिना समझे इन सवालों या टिप्पणियों को आधार बनाकर नतीजे पर पहुँच जाते हैं। उन्होंने जोर देकर कहामैं सोशल मीडिया या किसी भी दबाव से प्रभावित नहीं होता। अगर किसी को लगता है कि वे मुझे डराकर प्रभावित कर सकते हैं तो वे गलत हैं। मैं बहुत मजबूत आदमी हूं।

    यह टिप्पणी उस ओपन लेटर पर उनकी प्रतिक्रिया के तौर पर भी देखी जा रही हैजिसमें पूर्व जजोंवकीलों और कार्यकर्ताओं ने उनके रोहिंग्या शरणार्थियों पर दिए गए बयान पर आपत्ति जताई थी। इस मामले में सीजेआई ने सवाल किया था कि क्या घुसपैठियों का रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत करना चाहिए। उन्होंने यह सवाल हिरासत में लिए गए रोहिंग्याओं के लापता होने के मामले पर सुनवाई के दौरान किया था।सीजेआई ने कहा था कि अगर कोई देश में घुसपैठ कर ले और नागरिकों जैसे अधिकार मांगने लगे तो इसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक सवाल और टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें गलत अर्थ न लगाया जाए।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की यह टिप्पणी दर्शाती है कि न्यायपालिका किसी बाहरी दबाव या सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया से प्रभावित नहीं होतीऔर जज केवल सबूत और कानून के आधार पर निर्णय लेते हैं।

  • दिल्ली में जिलों की संख्या 11 से बढ़कर 13: प्रशासनिक कामकाज होगा तेज, पारदर्शी और जनता-केंद्रित

    दिल्ली में जिलों की संख्या 11 से बढ़कर 13: प्रशासनिक कामकाज होगा तेज, पारदर्शी और जनता-केंद्रित

    नई दिल्ली में शासन-प्रशासन का ढांचा अब बड़े सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। राजधानी की बढ़ती आबादी बढ़ते प्रशासनिक बोझ और बदलते शहरी ढांचे को देखते हुए दिल्ली कैबिनेट ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जिलों की संख्या 11 से बढ़ाकर 13 कर दी है। सरकार का दावा है कि इस बदलाव से सरकारी कामकाज में तेजी आएगी और जनता को सेवाओं तक आसान पहुँच मिलेगी। नई जिला संरचना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अब जिलों की सीमाएं MCD के जोनों के अनुरूप होंगी। इससे पहले जिले और निगम जोनों की सीमाएं अलग होने के कारण आम लोगों को भ्रम होता था कि किसी काम की जिम्मेदारी किस विभाग की है। नए ढांचे से विभागों के बीच तालमेल बढ़ेगा प्रशासनिक कामकाज तेज होगा और नागरिकों को समय पर सेवाएं मिलेंगी।

    नए जिले और प्रशासनिक बदलाव

    पुरानी दिल्ली जिला अब ‘सदर जोन’ की जगह लेगी जिससे ऐतिहासिक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों का प्रबंधन आसान होगा। ईस्ट और नॉर्थ ईस्ट जिलों का पुनर्गठन कर शाहदरा नॉर्थ और शाहदरा साउथ बनाए गए हैं। बड़े नॉर्थ दिल्ली जिले को सिविल लाइन्स और पुरानी दिल्ली में बांटा गया है। इसके अलावा नजफगढ़ को स्वतंत्र जिला घोषित किया गया है जो पहले साउथ वेस्ट दिल्ली का हिस्सा था। इस पुनर्गठन में जनसंख्या ट्रैफिक दबाव और प्रशासनिक कार्यभार को ध्यान में रखा गया है।

    जनता को मिलेगा सबसे बड़ा फायदा

    नई जिला व्यवस्था से लोगों को सरकारी सेवाओं के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी। प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन लैंड रिकॉर्ड जाति/निवास/आय प्रमाणपत्र म्यूटेशन और शिकायत निवारण जैसी सेवाएं अब आसानी से नज़दीकी दफ्तरों से उपलब्ध होंगी। छोटे जिलों और मिनी सेक्रेटेरिएट के माध्यम से वन-स्टॉप सुविधा मिलेगी जिससे भीड़ कम होगी और काम तेजी से होगा।

    सर्विस डिलीवरी में सुधार और पारदर्शिता

    छोटे प्रशासनिक क्षेत्र और स्पष्ट जिम्मेदारियों से फाइलों का निपटारा तेज होगा भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और ऑनलाइन सेवाओं की दक्षता बढ़ेगी। नई संरचना में 33 सब-डिवीज़न बढ़कर 39 हो गए हैं जिससे लैंड रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन और म्यूटेशन प्रक्रियाओं में तेजी आएगी। मिनी सेक्रेटेरिएट में सब-रजिस्ट्रार ऑफिस राजस्व रिकॉर्ड विभाग और पब्लिक सर्विस सेंटर शामिल होंगे।

    पुरानी उलझन खत्म प्रशासनिक जवाबदेही बढ़ी
    पहले विभागों और निगम जोनों की सीमाओं का मेल न होने से कई बार फाइलें कई दिनों तक अटकी रहती थीं। नए ढांचे में जिलों को MCD जोनों के अनुरूप जोड़कर अधिकार क्षेत्र स्पष्ट किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप विभागों के बीच तालमेल बढ़ा परियोजनाओं के अनुमोदन में तेजी आई और नागरिक समस्याओं का समाधान सरल हुआ।

    दिल्ली प्रशासन अब तेज पारदर्शी और जनता-केंद्रित

    जिलों की संख्या बढ़ाने से प्रशासनिक इकाइयाँ अधिक सटीक और प्रभावी हो गई हैं। सरकार का अनुमान है कि इससे सेवाएं समय पर मिलेंगी फाइलों का निपटारा तेज होगा और राजधानी का प्रशासन अधिक कुशल और जवाबदेह बनेगा। आने वाले वर्षों में यह सुधार दिल्ली को स्मार्ट गवर्नेंस मॉडल और आधुनिक प्रशासनिक ढांचे की दिशा में अग्रसर करेगा।

  • रोहिणी आचार्य के बयान पर राजनीति और समाज में हलचल, बेटियों की सुरक्षा पर जोर

    रोहिणी आचार्य के बयान पर राजनीति और समाज में हलचल, बेटियों की सुरक्षा पर जोर


    नई दिल्ली। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने बिहार की राजनीति और समाज में नई बहस छेड़ दी है। रोहिणी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “हर बेटी का यह अधिकार है कि उसका मायका सुरक्षित और भरोसेमंद स्थान हो, जहां वह बिना डर, अपराधबोध या शर्म के वापस आ सके”। इस बयान में उन्होंने बिहार में बेटियों के अधिकार और परिवारों में सुरक्षा की अहमियत को उजागर किया, जो समाज में महिला सुरक्षा और सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है।

    शांभवी चौधरी का बयान: बेटियों का सम्मान सर्वोपरि
    रोहिणी के बयान पर शांभवी चौधरी, जो लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) सांसद और जेडीयू नेता अशोक चौधरी की बेटी हैं, ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “यह किसी भी परिवार का निजी मामला हो सकता है, लेकिन बेटियों का सम्मान सर्वोपरि है।” शांभवी ने आगे कहा, “बेटों को जो अधिकार मिलते हैं, वही अधिकार बेटियों को भी मिलना चाहिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की एक बड़ी चुनौती है। शांभवी ने यह भी व्यक्त किया कि उन्हें खुशी है कि लालू यादव के परिवार के लोग भी अब राज्य सरकार से सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं।

    सरकार की प्रतिक्रिया: महिला सुरक्षा पर संजीदगी
    इस बयान पर जेडीयू सांसद संजय झा ने कहा, “नीतीश कुमार हमेशा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील रहे हैं। अगर रोहिणी ने अपनी चिंता जाहिर की है, तो सरकार इसे गंभीरता से संज्ञान में लेगी।” उन्होंने कहा कि बिहार सरकार की सक्रियता इस मामले में स्पष्ट है और “जनता देख रही है कि राजद की राजनीति कितनी खोखली हो चुकी है”।

    मायके की सुरक्षा और बेटियों के अधिकार की अहमियत
    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि बेटियों का सम्मान और उनका मायका सुरक्षित होना किसी भी समाज की मजबूती और परिवार की प्रतिष्ठा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिहार में इस मुद्दे पर चल रही बहस सामाजिक चेतना और राजनीतिक जिम्मेदारी दोनों को उजागर करती है, जिससे महिला सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होती है।

  • भारत में लॉन्च हुई डायबिटीज की दवा ओज़ेम्पिक: जानें कीमत और फायदे

    भारत में लॉन्च हुई डायबिटीज की दवा ओज़ेम्पिक: जानें कीमत और फायदे


    नई दिल्ली। डेनमार्क की प्रमुख दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारत में अपनी बहुप्रतीक्षित दवा ओज़ेम्पिक (Ozempic) को आधिकारिक तौर पर लॉन्च कर दिया है। यह दवा टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण उपचार विकल्प बन सकती है। ओज़ेम्पिक को 2017 में अमेरिकी खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) द्वारा अनुमोदित किया गया था और तब से यह दुनिया भर में सबसे ज्यादा बिकने वाली दवाओं में से एक बन गई है। भारत में इसकी कीमत 0.25 मिलीग्राम की खुराक के लिए ₹2,200 प्रति सप्ताह रखी गई है। वहीं, 0.5 मिलीग्राम और 1 मिलीग्राम की खुराक के लिए कीमत ₹10,170 और ₹11,175 प्रति माह होगी।

    यह दवा सेमाग्लूटाइड (Semaglutide) नामक सक्रिय घटक से बनती है, जो शरीर में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले GLP-1 हार्मोन की तरह काम करता है। यह हार्मोन शरीर को यह संकेत भेजता है कि पेट भरा हुआ है, जिससे भूख कम लगती है और व्यक्ति कम कैलोरी का सेवन करता है। इसके अतिरिक्त, ओज़ेम्पिक का असर पेट की पाचन क्रिया को धीमा करने पर भी पड़ता है, जिससे व्यक्ति लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करता है और बार-बार खाने से बचता है। इसके कारण यह दवा वजन घटाने में भी प्रभावी साबित हो रही है, जिससे यह डायबिटीज के मरीजों के अलावा अन्य लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो रही है।

    भारत में सीडीएससीओ (केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन) ने अक्टूबर 2023 में ओज़ेम्पिक को टाइप 2 डायबिटीज के इलाज के लिए मंजूरी दी थी। यह दवा अब ग्लाइसेमिक नियंत्रण में सुधार करने के साथ-साथ उन मरीजों में हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम को भी कम करने में मदद करती है, जिन्हें पहले से हृदय रोग है। यह दवा खासतौर पर डाइट और एक्सरसाइज के साथ मिलकर काम करती है और मरीजों के रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में मदद करती है।

    हालांकि ओज़ेम्पिक की कीमतें कुछ उच्च हैं, लेकिन यह एक कारगर उपचार विकल्प हो सकती है। फिर भी, किसी भी नई दवा का उपयोग करने से पहले, मरीजों को अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह उनके लिए सही है और उन्हें इसके किसी साइड इफेक्ट का सामना नहीं करना पड़ेगा।

  • इंडिगो संकटDGCA ने 4 फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स को सस्पेंड किया सेफ्टी और नियमों की अनदेखी का आरोप

    इंडिगो संकटDGCA ने 4 फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स को सस्पेंड किया सेफ्टी और नियमों की अनदेखी का आरोप



    नई दिल्ली ।
    भारत की प्रमुख एयरलाइन इंडिगो के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं क्योंकि भारतीय नागर विमानन महानिदेशालय DGCA ने चार फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स को सुरक्षा और नियमों की अनदेखी के कारण सस्पेंड कर दिया है। यह कार्रवाई तब की गई जब इंडिगो ने 5 दिसंबर को एक ही दिन में रिकॉर्ड 1600 फ्लाइट्स रद्द कर दी थीं जिससे यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। यह कदम इंडिगो द्वारा सुरक्षा और परिचालन अनुपालन में नाकामी के चलते उठाया गया है।

    सस्पेंड किए गए अधिकारी

    DGCA द्वारा सस्पेंड किए गए अधिकारियों में चार फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स शामिल हैं जो एयरलाइन के सुरक्षा और परिचालन नियमों के पालन के लिए जिम्मेदार थे। DGCA ने इन अधिकारियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने एयरलाइन के संचालन के लिए आवश्यक सुरक्षा मानकों और नियमों का पालन नहीं किया जिसके कारण विमानन क्षेत्र में व्यवधान उत्पन्न हुआ और यात्रियों को खासी दिक्कतें आईं।

    इंडिगो का संचालन प्रभावित

    इंडिगो ने हाल ही में पायलट और क्रू मेंबर की ड्यूटी से संबंधित नियमों का पालन करने में असफलता दिखाई थी जिसके परिणामस्वरूप कई फ्लाइट्स रद्द हो गईं। इससे न केवल यात्रियों को परेशानी हुई बल्कि टूरिज्म सेक्टर को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। 5 दिसंबर को एयरलाइन द्वारा किए गए 1600 फ्लाइट रद्द किए जाने की घटना ने इस संकट को और बढ़ा दिया। हालांकि इंडिगो ने बाद में कहा कि अब उनका संचालन सामान्य हो गया है और वे सामान्य स्तर पर लौट आए हैं।

    डीजीसीए की कड़ी निगरानी

    इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करते हुए DGCA ने अब एयरलाइन के मुख्यालय पर कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। डीजीसीए के अधिकारी अब इंडिगो के फ्लाइट ऑपरेशन रिफंड और अन्य प्रक्रियाओं पर रोजाना रिपोर्ट पेश करेंगे। इसके अलावा डीजीसीए के वरिष्ठ अधिकारियों ने 11 घरेलू एयरपोर्ट्स पर इंडिगो के संचालन का निरीक्षण करने का निर्णय लिया है। इन अधिकारियों का यह निरीक्षण अगले कुछ दिनों में होगा और वे हर हवाई अड्डे का दौरा करने के बाद रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे।

    इंडिगो CEO को DGCA के सामने पेश होना होगा

    इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स को डीजीसीए के सामने शुक्रवार को पेश होना होगा। डीजीसीए ने एक चार सदस्यीय पैनल का गठन किया था जिसमें वरिष्ठ अधिकारियों जैसे संयुक्त महानिदेशक संजय ब्रह्मणे उप महानिदेशक अमित गुप्ता वरिष्ठ उड़ान संचालन निरीक्षक कपिल मंगलिक और लोकेश रामपाल शामिल हैं। इस पैनल का मुख्य कार्य घरेलू एयरलाइन में व्यापक परिचालन व्यवधानों के कारणों की पहचान करना है।

    धन वापसी और यात्री मुआवजा की निगरानी

    डीजीसीए ने अब एयरलाइन के संचालन में शामिल किसी भी प्रकार के वापसी मुआवजा और सामान के लौटने के मामलों को लेकर कड़ी निगरानी रखना शुरू कर दिया है। डीजीसीए के अधिकारियों ने इंडिगो के कॉरपोरेट कार्यालय में भी एक वरिष्ठ अधिकारी और उप निदेशक को तैनात किया है जो फ्लाइट रद्द होने पर यात्रियों को मुआवजा और समय पर धन वापसी सुनिश्चित करेंगे।

    निगरानी बढ़ी

    इंडिगो के संचालन पर हुई इस कार्रवाई से स्पष्ट है कि DGCA अब फ्लाइट ऑपरेशंस की सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए और कड़ी निगरानी रखेगा। इसके साथ ही एयरलाइन को अब परिचालन नियमों का सख्ती से पालन करना होगा ताकि भविष्य में ऐसे व्यवधानों से बचा जा सके।

    इंडिगो के लिए यह संकट सुरक्षा और संचालन के मानकों पर ध्यान केंद्रित करने का समय है। DGCA की सख्ती और निगरानी से एयरलाइन को सुधारने का एक अवसर मिलेगा लेकिन इसे अपनी प्रणाली में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सके।

  • फर्जी रॉ अधिकारी ने बिहार की महिला जज सहित पांच महिलाओं से की करोड़ों की ठगी

    फर्जी रॉ अधिकारी ने बिहार की महिला जज सहित पांच महिलाओं से की करोड़ों की ठगी


    नई दिल्‍ली । नोएडा एसटीएफ(Noida STF) के द्वारा गिरफ्तार किए गए फर्जी रॉ अधिकारी (Fake RAW officer)सुनीत की जांच में हुए खुलासे से एसटीएफ के अधिकारी भी दंग हैं। एसटीएफ के अनुसार सुनीत ने बिहार की महिला जज से गृहमंत्रालय(Home Ministry) का अधिकारी बनकर शादी करने के अलावा चार अन्य महिलाओं के साथ भी करोड़ों की ठगी की है।

    आरोपी ने किसी महिला को उसने आईएएस अधिकारी तो किसी को सेना का अधिकारी और किसी को रॉ का अधिकारी बन कर अपने प्रेम जाल में फंसा रखा था। इन महिलाओं से भी वह करोड़ों रुपये की ठगी कर चुका है। नोएडा एसटीएफ की टीम ने इस फर्जी अधिकारी को 19 नवंबर को ग्रेटर नोएडा की पैरामाउंट गोल्फ सोसाइटी से गिरफ्तार किया था। यहां पर वह फर्जी रॉ अधिकारी बनकर रह रहा था। एसटीएफ के अधिकारियों के अनुसार जांच में खुलासा हुआ है कि यह आरोपी फर्जी अधिकारी बनकर महिलाओं को भी ठग रहा था। वह महिला जज के अलावा चार अन्य महिलाओं के भी संपर्क में था। इन महिलाओं से भी उसने करोड़ों की ठगी की है। इसके साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। एक महिला ने ही शिकायत की है कि वह उससे 50 लाख रुपये से अधिक ठग चुका है।

    इसके अलावा भी अन्य महिलाओं ने जानकारी दी है, लेकिन वह बदनामी के चलते सामने नहीं आना चाहतीं। अभी संभव है कि आरोपी के द्वारा ठगी गई कुछ और अन्य महिलाएं भी सामने आएं। वह इन महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाकर उनसे ठगी कर रहा था और सभी को वह स्वयं को उच्चाधिकारी और अविवाहित बताता था।

    महिला जज को झांसे में लेकर शादी रचाई
    एसटीएफ के अनुसार सुनीत कुमार ने करीब एक साल पहले बिहार के छपरा में कार्यरत महिला जज से शादी की थी। उसने महिला जज को बताया था कि वह गृह मंत्रालय में तैनात है। एसटीएफ ने जब महिला जज से बात की तो उन्होंने भी पति को गृह मंत्रालय में तैनात बताया और कहा कि वह इन दिनों गोपनीय मिशन पर गए हैं। एसटीएफ के अधिकारियों ने सुनीत के बारे में जब सारी सच्चाई महिला जज को बताई तो वह भी अचंभित रह गईं।

  • अन्ना हजारे ने 30 जनवरी 2026 से अनशन का किया ऐलान, बोले- "कानून लागू होने तक अंतिम सांस तक करेंगे आंदोलन

    अन्ना हजारे ने 30 जनवरी 2026 से अनशन का किया ऐलान, बोले- "कानून लागू होने तक अंतिम सांस तक करेंगे आंदोलन


    नई दिल्‍ली । समाजसेवी(social worker) अन्ना हजारे ने एक बार फिर देश को हिला देने वाला ऐलान कर दिया है। 30 जनवरी 2026 से महाराष्ट्र(Maharashtra) के रालेगण सिद्धि में वे आमरण अनशन(Hunger Strike till death) पर बैठने जा रहे हैं और यह अनशन उनकी अंतिम सांस तक चलेगा। अन्ना ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस(Devendra Fadnavis) को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि अगर कानून तुरंत लागू नहीं हुआ तो वे प्राण त्याग देंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे। अन्ना के इस ऐलान से एक बार फिर महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक सियासी गलियारे में हड़कंप मच गया है। गौरतलब है कि इससे पहले 2011 में अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन किया था। उस वक्त आंदोलन का ऐसा असर हुआ था कि केंद्र के साथ-साथ दिल्ली की कांग्रेस सरकार की विदाई हो गई थी।

    फिर आंदोलन पर क्यों उतरे अन्ना हजारे?
    अब सवाल यह है कि अन्ना हजारे ने अचानक फिर आंदोलन की घोषणा क्यों की? दरअसल, इस बार अनशन का कारण महाराष्ट्र में लोकायुक्त कानून को लागू करने में हो रही देरी है। बता दें कि राज्य में लोकायुक्त कानून को मंजूरी मिले दो साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। इसी से नाराज समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर आंदोलन के मूड में हैं।

    रालेगण सिद्धि में होगा आमरण अनशन
    अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर साफ कहा है कि अगर लोकायुक्त कानून तुरंत लागू नहीं किया गया तो वे 30 जनवरी 2026 से अपने गांव रालेगण सिद्धि में आमरण अनशन शुरू कर देंगे। पत्र में उन्होंने लिखा है कि हार्ट अटैक से मरने की बजाय देश और समाज के हित में प्राण त्यागना उनके लिए सौभाग्य की बात होगी। बता दें कि अन्ना हजारे लंबे समय से महाराष्ट्र में मजबूत लोकायुक्त कानून लागू करने की मांग करते आ रहे हैं।

    2024 में राज्यपाल ने दी थी मंजूरी
    अन्ना हजारे के मुताबिक, लोकायुक्त विधेयक 2022 में विधानसभा से और 2023 में विधान परिषद से पारित हो चुका है। 2024 में राज्यपाल की मंजूरी भी मिल गई, इसके बावजूद आज तक कानून लागू नहीं हुआ। अन्ना ने कहा कि राज्य सरकार ने यह विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए केंद्र को भेज दिया है, पर एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई है।

    मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अन्ना हजारे ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि यह उनका निजी मुद्दा नहीं, बल्कि देश की जनता और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का सवाल है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार में इस कानून को लागू करने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही। इसलिए उनके पास आमरण अनशन के अलावा अब कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।

  • 1000 करोड़ का क्रिप्टो घोटाला: CBI ने चीनी मास्टरमाइंड सहित 30 आरोपियों के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट

    1000 करोड़ का क्रिप्टो घोटाला: CBI ने चीनी मास्टरमाइंड सहित 30 आरोपियों के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट


    नई दिल्‍ली । केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 1000 करोड़ रुपये से अधिक के क्रिप्टोकरेंसी(Cryptocurrency) निवेश घोटाले में दो चीनी नागरिकों वान जून और ली अनमिंग सहित कुल 30 आरोपियों के खिलाफ दिल्ली की विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है। यह मामला कोविड लॉकडाउन(Covid Lockdown) के दौरान फर्जी ‘एचपीजेड टोकन’ (‘HPZ Token’)ऐप के जरिए लोगों को लुभाकर बिटकॉइन माइनिंग के नाम पर ठगने से जुड़ा है। जांच में पता चला है कि यह घोटाला विदेशी साइबर अपराधी गिरोह का हिस्सा था, जिसने भारत की नई-नई शुरू हुई पेमेंट एग्रीगेटर (Payment Aggregator)व्यवस्था का भी हेराफेरी कर बड़े पैमाने पर धन विदेश भेजा।

    दरअसल, यह पूरा घोटाला कथित तौर पर चीनी नागरिकों द्वारा नियंत्रित कंपनी शिगू टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड ने चलाया था। बताया गया कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान इस गिरोह ने बड़ी मात्रा में पैसा इकट्ठा किया और उसे हेराफेरी कर विदेश भेज दिया। कुछ ही महीनों में 150 से ज्यादा फर्जी कंपनियों के बैंक खातों में 1000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा हो गई थी। ये खाते अपराध से कमाए धन को इकट्ठा करने और उसे वैध दिखाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे थे।

    सीबीआई जांच में सामने आया है कि यह विदेशी नागरिकों द्वारा संचालित एक बड़े और सुनियोजित साइबर अपराध नेटवर्क का हिस्सा था। यही गिरोह कोविड के बाद के समय में कई अन्य घोटालों के लिए भी जिम्मेदार था, जिनमें फर्जी लोन ऐप, फर्जी निवेश स्कीम और फर्जी ऑनलाइन जॉब ऑफर के जरिए भारतीय नागरिकों को ठगा गया। जांच में पता चला कि ठगों ने लोगों का विश्वास जीतने के लिए शुरुआती निवेश पर कुछ रिटर्न भी दिए, लेकिन बाद में पूरी राशि क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश भेज दी।

    सीबीआई जांच में ये भी पता चला कि मुख्य आरोपी चीनी नागरिक वान जून की पहचान जिलियन कंसल्टेंट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (एक चीनी संस्था की सहायक कंपनी) के प्रमुख निदेशक के तौर पर हुई। उसने डॉर्टसे नामक एक व्यक्ति की मदद से शिगू टेक्नोलॉजी सहित कई शेल कंपनियां बनाईं। बाद में सीबीआई में डॉर्टसे को भी गिरफ्तार कर लिया था।

    सीबीआई की चार्जशीट में मुख्य साजिशकर्ताओं समेत 27 व्यक्ति और 3 कंपनियों को जिम्मेदार ठहराया गया है। वहीं गिरोह के कई सदस्य अभी भी सीबीआई की पहुंच से बाहर हैं। फिलहाल उनकी तलाश और जांच जारी है। बता दें कि एजेंसी ने पिछले साल अप्रैल में इस मामले में FIR दर्ज की थी। इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जांच शुरू की और विभिन्न बैंक खातों में जमा 91.6 करोड़ रुपये फ्रीज कर दिए थे।

  • पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग

    पर्सनल लॉ बोर्ड ने किरेन रीजीजू से की मुलाकात, वक्फ संपत्तियों के 'उम्मीद' पोर्टल की दिक्कतों को दूर करने की मांग


    नई दिल्‍ली । ऑल इंडिया (All India)मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार (Thursday)को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू(Kiren Rijiju) से मुलाकात कर आग्रह किया कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित ‘उम्मीद’ पोर्टल से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने के साथ ही दस्तावेजों के अपलोड की समयसीमा एक साल के लिए और बढ़ाई जाए। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कुछ पदाधिकारियों के साथ ही सांसद असदुद्दीन ओवैसी, मोहम्मद जावेद और चंद्रशेखर भी रीजीजू से मिले।

    रीजीजू ने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट किया कि आज मेरे कार्यालय में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत हुई। हमने उम्मीद पोर्टल में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की और विचारों का सुखद आदान-प्रदान किया।

    वहीं, बोर्ड ने एक बयान में कहा कि पंजीकृत वक्फ संपत्तियों को अपलोड करने के लिए निर्धारित छह महीने की समय सीमा बेहद कम थी। पोर्टल पर विवरण अपलोड करते समय कई तकनीकी समस्याओं और गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा। इसलिए, सभी संपत्तियों को अपलोड करना बेहद कठिन और व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। नतीजतन, पंजाब वक्फ बोर्ड, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड, गुजरात वक्फ बोर्ड और राजस्थान वक्फ बोर्ड ने समय बढ़ाने की मांग करते हुए न्यायाधिकरण से संपर्क किया और न्यायाधिकरण ने समयसीमा बढ़ा दी।

    उसका कहना है कि इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वक्फ बोर्ड भी छह महीने की समयसीमा का पालन करने में असमर्थ थे और उन्हें अधिक समय का अनुरोध करना पड़ा। उसने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने अनुरोध किया कि मुतवल्लियों के सामने आने वाली कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए अपलोड करने की समयसीमा एक वर्ष और बढ़ा दी जाए।

    कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने बताया कि हमने मंत्री के समक्ष उम्मीद पोर्टल से जुड़ी समस्याओं को रखा और उन्होंने आश्चासन दिया कि दिक्कतों को दूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पोर्टल से संबंधित दिक्कतों को दूर किया जाना बहुत जरूरी है क्योंकि अब तक लाखों वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण नहीं हो सका है।

  • मोदी राज में गरीबी लगभग खत्म, अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिंदू: नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष का रिसर्च

    मोदी राज में गरीबी लगभग खत्म, अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिंदू: नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष का रिसर्च


    नई दिल्‍ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi)के शासनकाल में बड़े पैमाने पर अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) खत्म हुई है। बड़ी बात यह है कि अत्यधिक गरीबी खत्म होने की दर हिन्दुओं से ज्यादा मुस्लिमों में रही है। यानी अब मुस्लिमों से ज्यादा गरीब हिन्दू हैं। नीति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया(Arvind Panagariya) ने अपने एक रिसर्च पेपर में यह दावा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2011-12 और 2023-24 के बीच भारत ने लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म कर दी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मुसलमानों में गरीबी दर (उनकी आबादी का) 1.5% रह गया है, जबकि हिंदुओं में यह 2.3% है जो कि तुलना में थोड़ा ज्यादा है।

    कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और सोलहवें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया और नई दिल्ली स्थित रिसर्च और कंसल्टिंग फर्म इंटेलिंक एडवाइजर्स के संस्थापक विशाल मोरे द्वारा लिखे गए एक नए पेपर में यह दावा किया गया है। पेपर इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हुआ है। पेपर के अनुसार, वर्ष 2022-23 में भी दोनों समुदायों के बीच गरीबी का अंतर लगभग एक समान था। उस दौरान मुसलमानों में गरीबी दर उनकी आबादी का 4% था, जबकि हिंदुओं में यह 4.8% था, जो 0.8 प्रतिशत ज्यादा है।

    आंकड़े आम धारणा के विपरीत
    पेपर में यह भी दावा किया गया है कि ये आंकड़े उस आम धारणा के विपरीत हैं जिसके तहत कहा जाता रहा है कि मुसलमानों में हिंदुओं की तुलना में ज्यादा गरीबी है और इसमें सुधार की जरूरत है, कम से कम अत्यधिक गरीबी के संबंध में। बता दें कि विश्व बैंक क्रय शक्ति समानता (PPP) के संदर्भ में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 3 डॉलर से कम खरीद क्षमता को अत्यधिक गरीबी के रूप में परिभाषित किया जाता है। लेखकों के अनुसार, यह तेंदुलकर कमेटी की गरीबी रेखा के करीब है, जो आखिरी आधिकारिक तौर पर अपनाई गई गरीबी रेखा थी।

    देश से लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म
    एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह पेपर सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक समूहों, और ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी के स्तर का अनुमान लगाता है। इसमें लेखकों ने लिखा है, “अनुमान बताते हैं कि 2011-12 से 2023-24 तक 12 वर्षों में गरीबी में गिरावट काफी और व्यापक रही है, इस हद तक कि देश ने लगभग अत्यधिक गरीबी खत्म कर दी है।”

    लेखकों के अनुसार, तेंदुलकर पद्धति के आधार पर राष्ट्रीय (ग्रामीण+शहरी) गरीबी रेखा 2011-12 में प्रति व्यक्ति प्रति माह 932 रुपये, 2022-23 में 1,714 रुपये और 2023-24 में 1,804 रुपये निर्धारित की गई थी। इस पेपर में, हर घर को राज्य और इलाके (ग्रामीण या शहरी) के लिए गरीबी रेखा के आधार पर गरीब या गैर-गरीब माना गया है। जिन्हें गरीब के तौर पर क्लासिफाई किया गया है, उन्हें फिर ग्रुप के हिसाब से जोड़ा गया है।

    2011-2024 के बीच कुल गरीबी में तेज़ और लगातार गिरावट
    पेपर के अनुसार, 2011-2024 की अवधि में कुल गरीबी में तेज़ और लगातार गिरावट देखी गई है। पेपर में दावा किया गया है कि राष्ट्रीय गरीबी दर 2011-12 में 21.9% (आबादी का) से घटकर 2023-24 में 2.3% हो गई। यानी 12 सालों में गरीबी दर में 19.7 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई है, जो प्रति वर्ष के हिसाब से 1.64 प्रतिशत की गिरावट है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शहरी इलाकों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में गिरावट ज़्यादा तेज़ रही है। ररिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में जहां 2011-12 में शुरुआती गरीबी का स्तर राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा था, उस अवधि में 22.5 प्रतिशत अंकों की कमी आई, या सालाना 1.87 प्रतिशत अंकों की कमी आई। इसके विपरीत, शहरी गरीबी में 12.6 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई, जो मोटे तौर पर प्रति वर्ष 1 प्रतिशत अंक के बराबर है। पेपर में ये भी कहा गया है कि वर्ग के हिसाब से भी, सभी प्रमुख सामाजिक समूहों – अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), और अगड़ी जाति के समूहों में भी गरीबी में काफी कमी आई है।

    ST समुदाय में भी गरीबी दर 8.7% रह गई
    लेखकों ने इस बात पर फोकस किया है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय के अंदर 2023-24 में गरीबी घटकर 8.7% रह गई है। पेपर में कहा गया है कि जहां हिंदुओं में गरीबी की दर 2.3% अनुमानित है, वहीं मुसलमानों में अब 1.5%, ईसाइयों में 5%, बौद्धों में 3.5%, और सिखों और जैनियों में 0% है। रिपोर्ट में यह दावा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अत्यधिक गरीबी में अंतर लगभग खत्म हो गया है, हैरान करने वाला है।

    पेपर में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में भी हिंदुओं की तुलना में मुसलमान कम ही गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह आंकड़ा मुस्लिमों में 1.6% है जबकि हिन्दुओं में 2.8% है। हालांकि, शहरी इलाकों में 2011-12 में मुसलमानों में गरीबी दर 20.8% थी, जबकि हिंदुओं में यह 12.5% ​​थी, जो 2023-24 तक घटकर अब क्रमशः 1.2% और 1% रह गई है।