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  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ तीनों आरोप साबित, जांच समिति ने लोकसभा में अंतिम रिपोर्ट पेश की

    नई दिल्ली ।हाई कोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ गठित जांच समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश कर दी। समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को सिद्ध पाया है। रिपोर्ट में अघोषित नकदी, साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही तथा जांच के दौरान दिए गए टालमटोल वाले और असंतोषजनक जवाब से जुड़े आरोप शामिल हैं।

    जांच समिति ने मामले से संबंधित कार्यवाही का रिकॉर्ड, जरूरी दस्तावेज और उपलब्ध साक्ष्य सक्षम प्राधिकारी को भी सौंप दिए हैं। अब समिति की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों के आधार पर कानून के अनुसार आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी। इस घटनाक्रम के बाद पूर्व जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच का औपचारिक चरण पूरा हो गया है।

    पहले आरोप के तहत नई दिल्ली स्थित 30, तुगलक क्रेसेंट के आधिकारिक आवासीय परिसर के स्टोररूम से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने के मामले की जांच की गई। समिति के अनुसार, वहां 500 रुपये के नोटों के रूप में रखी गई नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और स्वामित्व को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सका।

    समिति ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अघोषित नकदी से संबंधित आरोप को सिद्ध माना। जांच में नकदी के संबंध में स्पष्ट और संतोषजनक जवाब का अभाव महत्वपूर्ण आधारों में शामिल रहा। इस निष्कर्ष के साथ समिति ने पहले आरोप को अपनी अंतिम रिपोर्ट में प्रमाणित माना है।

    दूसरा आरोप मामले से जुड़े भौतिक साक्ष्यों के संरक्षण में कथित लापरवाही से संबंधित था। समिति ने पाया कि संबंधित स्टोररूम की स्थिति को कानूनी सीलिंग और निरीक्षण से पहले बदले जाने की बात सामने आई। इसके अलावा बाद में कुछ करेंसी नोटों के गायब या अनुपलब्ध होने को लेकर भी स्पष्ट स्पष्टीकरण नहीं मिल सका।

    समिति ने इस स्थिति को साक्ष्यों के संरक्षण में गंभीर लापरवाही और विफलता के रूप में देखा। हालांकि, रिपोर्ट के निष्कर्ष के अनुसार साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही का यह मतलब नहीं है कि जज ने स्वयं किसी नोट को हटाया था। आरोप का आधार साक्ष्यों को उचित तरीके से सुरक्षित रखने में हुई विफलता से जुड़ा रहा।

    तीसरा आरोप जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और जांच के दौरान उनके रुख से संबंधित था। समिति ने विशेष रूप से 22 मार्च 2025 को दिए गए उनके जवाब को संतोषजनक नहीं माना। रिपोर्ट के अनुसार, उनके जवाब में अपेक्षित स्पष्टता का अभाव था और उनका रुख टालमटोल वाला पाया गया।

    समिति ने स्वतंत्र आधिकारिक गवाहों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर इस आरोप को भी सिद्ध माना। उसके अनुसार, मामले में जज से संस्थागत जिम्मेदारी के अनुरूप स्पष्ट और संतोषजनक जवाब की अपेक्षा थी, लेकिन प्रस्तुत स्पष्टीकरण उस कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

    तीनों आरोपों के सिद्ध पाए जाने के बाद समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट संबंधित प्रक्रिया के लिए सक्षम प्राधिकारी को सौंप दी है। अब रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्षों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कानूनी तथा संस्थागत कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में अंतिम कदम संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत तय होंगे।

  • कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी

    कर्नाटक सरकार ने तंबाकू सेवन पर लगाम कसने के लिए गुटखा और प्रतिबंधित निकोटिन उत्पादों के निर्माण-बिक्री पर लगाई पाबंदी


    नई दिल्ली ।कर्नाटक सरकार ने राज्य में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू या निकोटिन युक्त प्रतिबंधित उत्पादों के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए एक साल के लिए रोक लगा दी है। सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने इस संबंध में 10 अगस्त 2026 को अधिसूचना जारी की। अधिसूचना जारी होने के साथ ही पूरे राज्य में यह प्रतिबंध प्रभावी हो गया है और अगले एक साल तक लागू रहेगा।

    नए आदेश के तहत तंबाकू और या निकोटिन वाले गुटखा, पान मसाला तथा अन्य प्रतिबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर रोक रहेगी। इसका मतलब है कि ऐसे उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई की जा सकेगी। सरकार ने इस फैसले को सार्वजनिक स्वास्थ्य से जोड़ते हुए राज्य में तंबाकू की लत को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    कर्नाटक सरकार ने प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए विशेष निरीक्षण और प्रवर्तन अभियान भी शुरू किया है। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के नेतृत्व में गठित टीमें अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिबंधित तंबाकू और निकोटिन उत्पादों की उपलब्धता तथा बिक्री पर नजर रखेंगी। दुकानों और अन्य स्थानों पर जांच के दौरान यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

    सरकार की अधिसूचना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(a) और खाद्य सुरक्षा और मानक नियमों के तहत निर्धारित प्रावधानों के आधार पर जारी की गई है। संबंधित विभाग को खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को देखते हुए ऐसे उत्पादों की बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार प्राप्त है।

    राज्य सरकार के इस फैसले का एक प्रमुख उद्देश्य तंबाकू और निकोटिन की लत को नियंत्रित करना है। गुटखा और तंबाकू उत्पादों का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। सरकार का मानना है कि इन उत्पादों की उपलब्धता सीमित करने से इनके इस्तेमाल को रोकने और लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।

    प्रतिबंध के साथ ही प्रशासन ने आम लोगों से भी सहयोग की अपील की है। विभाग ने कहा है कि यदि किसी स्थान पर प्रतिबंधित तंबाकू या निकोटिन उत्पादों के निर्माण, भंडारण, बिक्री या वितरण की जानकारी मिलती है तो इसकी सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई जानी चाहिए। इससे प्रवर्तन अभियान को प्रभावी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    कर्नाटक में लागू यह पाबंदी ऐसे समय में आई है जब सार्वजनिक स्वास्थ्य के स्तर पर तंबाकू सेवन को नियंत्रित करना सरकारों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। अब खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की निगरानी और जांच अभियान यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में दोबारा उपलब्ध न हों।

    सरकार ने इस फैसले को स्वस्थ और नशा-मुक्त कर्नाटक की दिशा में उठाया गया कदम बताया है। आने वाले महीनों में प्रतिबंध के पालन को लेकर बाजारों, दुकानों और आपूर्ति से जुड़े स्थानों पर निरीक्षण जारी रहने की संभावना है। एक साल की अवधि में प्रशासन की कार्रवाई और आम लोगों की भागीदारी इस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण होगी।

  • संसद में नीट मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने, रिजिजू ने तत्काल बहस की पेशकश की, हंगामे से सदन स्थगित

    संसद में नीट मुद्दे पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने, रिजिजू ने तत्काल बहस की पेशकश की, हंगामे से सदन स्थगित

    नई दिल्ली ।संसद के मॉनसून सत्र में बुधवार को नीट के मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध खत्म करने की कोशिश हुई, लेकिन सदन में जारी हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष से अपनी सीटों पर लौटने और शांतिपूर्वक चर्चा में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि सरकार नीट के मुद्दे पर बहस के लिए तैयार है।

    रिजिजू ने सदन में कहा कि सरकार चर्चा से पीछे नहीं हट रही है और गृहमंत्री अमित शाह विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने विपक्षी सांसदों से सदन के वेल से हटने का आग्रह किया और कहा कि यदि सदस्य अपनी सीटों पर लौट आते हैं तो चर्चा तत्काल शुरू की जा सकती है।

    संसदीय कार्यमंत्री ने कहा कि मॉनसून सत्र के अब केवल दो दिन शेष हैं और इन दिनों का उपयोग संसदीय कामकाज के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने विपक्ष के विरोध के तरीके पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अनुशासन के साथ सदन में मुद्दे उठाए जाने चाहिए। सरकार की ओर से चर्चा की तैयारी होने के बावजूद हंगामा जारी रहने से कार्यवाही प्रभावित हुई।

    इस दौरान विपक्षी सांसदों ने सदन के वेल में पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया। सांसदों की ओर से नीट सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और सरकार से जवाब की मांग की जा रही थी। विरोध के कारण सदन का सामान्य कामकाज आगे नहीं बढ़ सका। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी जारी रहा।

    पीठासीन अधिकारी जगदंबिका पाल ने विपक्षी सांसदों से सदन का वेल खाली करने और अपनी सीटों पर लौटने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है और गृहमंत्री अमित शाह जवाब देने को तैयार हैं। ऐसे में विपक्ष को सदन की कार्यवाही सामान्य बनाने में सहयोग करना चाहिए।

    जगदंबिका पाल ने यह भी कहा कि लगातार सदन बाधित करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आने वाली पीढ़ी को गलत संदेश जा सकता है। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि वह चर्चा में शामिल हो और संबंधित मुद्दों को सदन के भीतर उठाए, ताकि सरकार की ओर से उनका जवाब दिया जा सके।

    सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस के लिए संसदीय प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। रिजिजू ने विपक्ष को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि सरकार नीट के विषय पर चर्चा के लिए तैयार है और संबंधित सवालों पर जवाब देने की प्रक्रिया सदन में आगे बढ़ाई जा सकती है।

    इस बीच भाजपा सांसद नितिन नबीन ने विपक्ष के लगातार व्यवधान पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बच रहा है और संसद की कार्यवाही रोक रहा है। उनके मुताबिक सरकार की ओर से चर्चा के लिए बार-बार प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन विपक्ष का विरोध जारी है।

    हालांकि, सदन में हंगामा कम नहीं हुआ और अंततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई। अब सदन की अगली बैठक 13 अगस्त 2026 को सुबह 11 बजे होगी। मॉनसून सत्र के अंतिम दिनों में नीट के मुद्दे पर चर्चा और सरकार के जवाब को लेकर दोनों पक्षों के रुख पर नजर रहेगी। गतिरोध समाप्त करने के लिए सदन में संवाद और चर्चा की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

  • तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने बुधवार को विधानसभा में परिसीमन के मुद्दे पर प्रस्ताव पेश करते हुए लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग की। प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा की कुल 543 सीटों को बरकरार रखने और इनके आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की अपील की गई है।

    मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया के कारण राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका को देखते हुए मौजूदा सीट व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र से मांग की कि लोकसभा की 543 सीटों की वर्तमान संख्या को स्थायी रूप से बरकरार रखा जाए और राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात भी सुरक्षित रखा जाए।

    विजय ने महिला आरक्षण को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में अब और देरी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने पर इसके लागू होने में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसलिए मौजूदा 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण को किसी प्रकार की रियायत मानने के बजाय संवैधानिक अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण को जल्द लागू किया जाना आवश्यक है। विजय ने तमिलनाडु में महिलाओं की चुनावी भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने मतदान किया है।

    विधानसभा में पेश प्रस्ताव का एक प्रमुख हिस्सा परिसीमन के संभावित प्रभावों से जुड़ा है। तमिलनाडु की ओर से यह मांग रखी गई है कि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का वर्तमान अनुपात प्रभावित नहीं होना चाहिए। प्रस्ताव में कहा गया है कि 543 सीटों की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए ही भविष्य में प्रतिनिधित्व से जुड़े बदलावों पर विचार किया जाना चाहिए।

    विजय की इस मांग के बीच विपक्षी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता ईपीएस ने परिसीमन के मुद्दे पर अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि परिसीमन में अपने आप में कुछ गलत नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का लोकसभा में मौजूदा 7.18 प्रतिशत हिस्सा किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।

    इस तरह विधानसभा में परिसीमन को लेकर राज्य के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण दोनों मुद्दे एक साथ सामने आए। मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बनाए रखने, राज्यों के बीच वर्तमान सीट अनुपात को सुरक्षित रखने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द लागू करने की मांग शामिल है।

    विजय ने विशेष रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव को महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा के रूप में सामने रखा। उनका तर्क है कि यदि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया गया तो इसके प्रभावी होने में देरी हो सकती है। इसलिए मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही इसे लागू किया जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के सामने परिसीमन को लेकर अपनी राजनीतिक और संवैधानिक चिंताएं रखी हैं। अब इस मुद्दे पर केंद्र और अन्य राज्यों के रुख के साथ आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। साथ ही महिला आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करने की मांग राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व और चुनावी व्यवस्था से जुड़े विमर्श को भी प्रभावित कर सकती है।

  • महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने सख्त कार्रवाई की है। राज्यभर में लाइसेंस प्राप्त 434 आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली इकाइयों का निरीक्षण किया गया। जांच के दौरान अलग-अलग स्तर पर नियमों का उल्लंघन और निर्माण प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आने के बाद 135 निर्माताओं को शोकॉज नोटिस जारी किए गए हैं।

    FDA की इस कार्रवाई का उद्देश्य आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है। जिन कंपनियों को नोटिस जारी किए गए हैं, उन्हें निरीक्षण के दौरान सामने आई कमियों पर स्पष्टीकरण देने और निर्धारित नियमों के अनुपालन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।

    जांच अभियान के दौरान ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 और शेड्यूल टी के तहत निर्धारित प्रावधानों के पालन की जांच की गई। शेड्यूल टी में आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस यानी GMP से जुड़े मानक निर्धारित हैं।

    निरीक्षण में कुछ इकाइयों में योग्य या स्वीकृत तकनीकी कर्मचारियों की कमी सामने आई। ऐसी स्थिति भी पाई गई जहां आवश्यक तकनीकी स्टाफ की पर्याप्त मौजूदगी के बिना दवा निर्माण किया जा रहा था। कई कंपनियों में गुणवत्ता नियंत्रण विभाग अपेक्षित तरीके से काम नहीं कर रहे थे।

    कुछ निर्माण इकाइयों में दवाओं के उत्पादन और परीक्षण के लिए जरूरी मशीनरी तथा उपकरणों की भी कमी पाई गई। इसके अलावा साफ-सफाई से जुड़े मानकों में खामियां, बैच उत्पादन के रिकॉर्ड का अभाव और कच्चे माल से संबंधित दस्तावेजों में अनियमितताएं सामने आईं।

    जांच के दौरान कुछ उत्पादों के लेबल पर गलत निर्माण तिथियां दर्ज होने की बात भी सामने आई। कच्चे माल और तैयार उत्पादों की जांच से जुड़े रिकॉर्ड तथा परीक्षण व्यवस्था में भी कमियां पाई गईं। कुछ निर्माताओं के पास कच्चे माल का उचित रिकॉर्ड नहीं था और कुछ निर्माण इकाइयों का लेआउट स्वीकृत व्यवस्था के अनुरूप नहीं पाया गया।

    तकनीकी कर्मचारियों और श्रमिकों की मेडिकल जांच से जुड़े रिकॉर्ड का अभाव भी निरीक्षण में सामने आया। इसके अलावा कुछ कंपनियों में कर्मचारियों को दी गई ट्रेनिंग का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। कंट्रोल सैंपल और मास्टर फॉर्मूला रिकॉर्ड जैसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता नियंत्रण दस्तावेज भी कुछ इकाइयों में नहीं मिले।

    दवा निर्माण के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की कमियां भी सामने आईं। क्रॉस-कंटामिनेशन की स्थिति में एक उत्पाद या कच्चे पदार्थ का दूसरे उत्पाद में अनजाने में मिलना दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

    सबसे गंभीर मामलों में FDA ने 10 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिए। इन इकाइयों में ऐसी कमियां पाई गईं जिन्हें दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता के लिए गंभीर माना गया। कार्रवाई का उद्देश्य ऐसी निर्माण प्रक्रियाओं पर रोक लगाना है जिनसे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

    महाराष्ट्र FDA ने आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं को स्पष्ट किया है कि पारंपरिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण मान्यता प्राप्त संदर्भ ग्रंथों और निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। वहीं पेटेंट और प्रोप्राइटरी आयुर्वेदिक दवाओं के लिए निर्धारित गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यकताओं का पालन जरूरी है।

    राज्यभर में चलाया गया यह निरीक्षण अभियान आयुर्वेदिक दवा निर्माण क्षेत्र में नियामकीय अनुपालन मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। FDA ने संकेत दिया है कि शेड्यूल टी के GMP मानकों का पालन नहीं करने वाली इकाइयों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इससे निर्माताओं पर गुणवत्ता नियंत्रण, दस्तावेजीकरण, स्वच्छता और सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

  • साइबर अपराध जांच में बैंक खाते फ्रीज होने से पेट्रोल पंप डीलरों की चिंता बढ़ी, डिजिटल भुगतान रोकने की चेतावनी

    साइबर अपराध जांच में बैंक खाते फ्रीज होने से पेट्रोल पंप डीलरों की चिंता बढ़ी, डिजिटल भुगतान रोकने की चेतावनी

    नई दिल्ली । तमिलनाडु में पेट्रोल पंप संचालकों ने डिजिटल भुगतान से जुड़ी एक गंभीर समस्या को लेकर राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। डीलरों का आरोप है कि साइबर अपराध से जुड़े मामलों की जांच के दौरान उनके बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाते हैं, जबकि संबंधित संदिग्ध लेनदेन में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती। समस्या का समाधान नहीं होने पर उन्होंने यूपीआई और अन्य कैशलेस भुगतान स्वीकार करना बंद करने की चेतावनी दी है।

    तमिलनाडु पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन राज्य के करीब 5 हजार पेट्रोल पंपों का प्रतिनिधित्व करती है। एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि पेट्रोल पंप संचालक ग्राहकों से ईंधन बिक्री के बदले सामान्य कारोबारी प्रक्रिया के तहत डिजिटल भुगतान स्वीकार करते हैं।

    डीलरों के अनुसार किसी ग्राहक के यूपीआई भुगतान की पूरी पृष्ठभूमि की जांच करना उनके लिए संभव नहीं है। पेट्रोल पंप पर भुगतान प्राप्त करते समय कारोबारी के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं होती जिससे यह पता लगाया जा सके कि ग्राहक के बैंक खाते या उससे पहले हुए किसी लेनदेन का संबंध किसी साइबर अपराध की जांच से है या नहीं।

    डीलरों ने बताया कि डिजिटल भुगतान अब उनके कारोबार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। एक औसत पेट्रोल पंप पर प्रतिदिन करीब 200 से 500 डिजिटल लेनदेन होने का दावा किया गया है। कई पेट्रोल पंपों पर कुल कारोबार का आधे से अधिक हिस्सा यूपीआई और दूसरे कैशलेस माध्यमों से आने की बात कही गई है।

    समस्या तब गंभीर हो जाती है जब किसी ग्राहक का भुगतान बाद में साइबर अपराध की जांच में शामिल पाया जाता है। डीलरों का कहना है कि ऐसी स्थिति में जांच एजेंसियों के निर्देश पर बैंक संबंधित राशि पर रोक लगा सकते हैं या कई मामलों में पूरे बैंक खाते को फ्रीज कर देते हैं।

    पेट्रोल पंप संचालकों का तर्क है कि एक विवादित लेनदेन के कारण पूरे कारोबारी खाते को रोक देना उनके लिए गंभीर वित्तीय परेशानी पैदा करता है। पेट्रोल पंप का दैनिक संचालन लगातार बैंकिंग सुविधाओं पर निर्भर रहता है। ईंधन की खरीद, कर्मचारियों का वेतन, बिजली और अन्य कारोबारी खर्चों के लिए बैंक खाते का सुचारू रूप से काम करना आवश्यक होता है।

    एसोसिएशन ने पुलिस कार्रवाई के तरीके को लेकर भी चिंता जताई है। संगठन का आरोप है कि कुछ मामलों में पेट्रोल पंप संचालकों को पूछताछ के लिए सुबह के समय ले जाया गया, जबकि शुरुआत में उन्हें कथित तौर पर यह स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई कि किस लेनदेन को जांच के दायरे में रखा गया है।

    डीलरों का कहना है कि अधिकृत डिजिटल भुगतान प्रणाली के जरिए ग्राहक से पैसा स्वीकार करने वाले व्यापारी को केवल इसलिए संदिग्ध नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि बाद में उस भुगतान को किसी साइबर अपराध की जांच से जोड़ दिया गया है। उनका कहना है कि कारोबारी और संदिग्ध अपराधी के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए।

    एसोसिएशन ने राज्य सरकार से ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की है, जिसमें वैध कारोबारियों के बैंक खातों को पर्याप्त आधार और स्पष्ट प्रक्रिया के बिना फ्रीज न किया जाए। संगठन चाहता है कि जांच एजेंसियां विवादित राशि और पूरे कारोबारी खाते के बीच अंतर करें, ताकि जांच भी जारी रहे और सामान्य कारोबार भी प्रभावित न हो।

    डीलरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान नहीं निकला तो राज्य के पेट्रोल पंप यूपीआई और अन्य डिजिटल भुगतान स्वीकार करना बंद कर सकते हैं। ऐसा होने पर ग्राहक फिर से नकद भुगतान पर निर्भर हो सकते हैं। इससे तमिलनाडु में तेजी से बढ़े डिजिटल भुगतान के इस्तेमाल पर भी असर पड़ने की आशंका है।

  • जेवर एयरपोर्ट पर तेज बारिश के बाद जलभराव, पार्किंग में भरा पानी देख उठे सवाल; 30 मिनट में संभाली गई स्थिति

    जेवर एयरपोर्ट पर तेज बारिश के बाद जलभराव, पार्किंग में भरा पानी देख उठे सवाल; 30 मिनट में संभाली गई स्थिति


    नई दिल्ली। ग्रेटर नोएडा के जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर तेज बारिश के बाद कुछ समय के लिए जलभराव की स्थिति बन गई। एयरपोर्ट के पार्किंग कंपाउंड के पास बड़ी मात्रा में पानी जमा हो गया और टर्मिनल से पार्किंग एरिया की ओर जाने वाले रास्ते पर भी पानी भर गया। जलभराव का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पार्किंग क्षेत्र के पास पानी जमा दिखाई दे रहा है, जबकि एयरपोर्ट से जुड़े कर्मचारी जल निकासी की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। इस घटना के बाद एयरपोर्ट परिसर में बारिश के पानी की निकासी व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    बताया जा रहा है कि दिन के समय अचानक हुई तेज बारिश के बाद टर्मिनल और पार्किंग को जोड़ने वाले मार्ग पर पानी जमा हो गया। कुछ समय के लिए यात्रियों और एयरपोर्ट परिसर में मौजूद लोगों को आवाजाही में परेशानी का सामना करना पड़ा। हालांकि एयरपोर्ट प्रबंधन को जलभराव की जानकारी मिलते ही टीमों को सक्रिय किया गया और पानी निकालने का काम शुरू कर दिया गया।

    नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रबंधन की ओर से जारी बयान में कहा गया कि तेज बारिश के कारण टर्मिनल से पार्किंग एरिया को जोड़ने वाले रास्ते पर कुछ समय के लिए पानी जमा हुआ था। एयरपोर्ट की टीम ने तत्काल कार्रवाई करते हुए करीब 30 मिनट के भीतर जलभराव को पूरी तरह खत्म कर दिया। प्रबंधन के मुताबिक इस दौरान उड़ानों के संचालन पर कोई असर नहीं पड़ा और एयरपोर्ट की अन्य व्यवस्थाएं भी सामान्य रूप से चलती रहीं।

    एयरपोर्ट प्रशासन का कहना है कि यात्रियों की आवाजाही को बनाए रखने के लिए जरूरी कदम तुरंत उठाए गए। जलभराव वाले हिस्से में स्थिति सामान्य होने के बाद आवागमन भी सुचारु हो गया। साथ ही मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है ताकि बारिश के दौरान किसी तरह की परेशानी होने पर तुरंत कार्रवाई की जा सके।

    हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने एयरपोर्ट की जल निकासी व्यवस्था को लेकर चर्चा जरूर छेड़ दी है। यात्रियों और सोशल मीडिया यूजर्स की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं कि आधुनिक सुविधाओं से लैस एयरपोर्ट परिसर में तेज बारिश के बाद पानी जमा होने की स्थिति क्यों बनी। खास तौर पर टर्मिनल और पार्किंग के बीच के मार्ग में पानी भरने को लेकर लोग व्यवस्था की क्षमता पर सवाल कर रहे हैं।

    नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का पहला चरण 28 मार्च 2026 को उद्घाटित हुआ था और 15 जून से यहां कमर्शियल उड़ान संचालन शुरू हुआ। ऐसे में शुरुआती बारिश के दौरान सामने आई जलभराव की तस्वीरों ने एयरपोर्ट की आधारभूत सुविधाओं और ड्रेनेज सिस्टम को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। हालांकि एयरपोर्ट प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि जलभराव अस्थायी था और महज 30 मिनट में पानी निकाल दिया गया था।

    फिलहाल एयरपोर्ट प्रशासन की प्राथमिकता बारिश के दौरान यात्रियों की आवाजाही को सुचारु बनाए रखना और जलभराव की स्थिति दोबारा बनने पर तत्काल कार्रवाई करना है। वायरल वीडियो के बाद उठे सवालों के बीच आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भारी बारिश के दौरान एयरपोर्ट परिसर की जल निकासी व्यवस्था किस तरह काम करती है।

  • विमानन सुरक्षा पर मंडराया नशीले पदार्थों का खतरा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के क्रू मेंबर्स की डोप टेस्टिंग बढ़ाने की मांग

    विमानन सुरक्षा पर मंडराया नशीले पदार्थों का खतरा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के क्रू मेंबर्स की डोप टेस्टिंग बढ़ाने की मांग

    नई दिल्ली । फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान में हुई हालिया घटना के बाद देश के नागरिक उड्डयन क्षेत्र में सुरक्षा और जांच मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विमान के पायलट के नशीले पदार्थों के शुरुआती डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए जाने के बाद विमानन नियामक ने सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं।

    विमानन विशेषज्ञों के अनुसार थाईलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में कुछ पदार्थों की कानूनी सुलभता एयरलाइंस कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। शराब की उपस्थिति जांचने के लिए नियमित ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट उपलब्ध हैं, लेकिन अन्य साइकोएक्टिव पदार्थों का परीक्षण अपेक्षाकृत जटिल प्रक्रिया माना जाता है।

    अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक किसी भी नशीले पदार्थ के प्रभाव में विमान का संचालन यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है। ऐसे पदार्थों का असर शरीर में लंबे समय तक बना रहता है जिससे चालक दल की निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है।

    वर्तमान में नागरिक उड्डयन महानिदेशालय के नियमों के तहत सभी अनुसूचित वाणिज्यिक एयरलाइंस को अपने कम से कम 10 प्रतिशत क्रू मेंबर्स और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर्स का वार्षिक रूप से रैंडम डोप टेस्ट कराना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के प्रमुख हवाई अड्डों पर अब इन नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।

    विमानन अधिकारियों का मानना है कि केवल स्व-घोषणा या नशामुक्ति अभियानों के भरोसे इस समस्या से नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए रैंडम डोप जांच की आवृत्ति बढ़ाने और नियमों को अधिक कठोर बनाने की आवश्यकता जताई जा रही है ताकि उड़ानों के दौरान यात्रियों की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित की जा सके।

    नियामक संस्थाएं अब चिकित्सा अधिकारियों के साथ मिलकर परीक्षण प्रक्रियाओं को और अधिक सटीक बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। संदिग्ध मामलों में कानूनी कार्रवाई और लाइसेंस निलंबन जैसे कड़े प्रावधान लागू करने पर भी विचार किया जा रहा है।

  • चीफ जस्टिस की कॉकरोच टिप्पणी के दुरुपयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सीबीआई को भेजा नोटिस

    चीफ जस्टिस की कॉकरोच टिप्पणी के दुरुपयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सीबीआई को भेजा नोटिस


    नई दिल्ली । 
    भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्चुअल अदालती कार्यवाही के वीडियो को संपादित कर सोशल मीडिया पर गलत संदर्भ में प्रसारित करने और उसका व्यावसायिक उपयोग करने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस विषय पर केंद्र सरकार और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से विस्तृत जवाब तलब किया है।

    यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा तीन माह पूर्व एक सुनवाई के दौरान की गई कॉकरोच टिप्पणी से जुड़ा हुआ है। दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालती कार्यवाही की चुनिंदा वीडियो क्लिप्स को चालाकी से एडिट कर सार्वजनिक किया गया जिसका मूल संदर्भ से कोई संबंध नहीं था।

    याचिकाकर्ता के अनुसार 15 मई को फर्जी वकीलों और अदालती प्रक्रियाओं के दुरुपयोग पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की थी। हालांकि बाद में इस वक्तव्य को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स और व्यावसायिक सामग्री के रूप में प्रचारित किया गया।

    याचिका में दलील दी गई है कि न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने और जजों की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। वर्तमान में अदालती कार्यवाहियों के अनधिकृत उपयोग और उससे होने वाली कमाई को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानूनी तंत्र उपलब्ध नहीं है।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न विधिक हलकों में न्यायालयीन कार्यवाहियों की लाइव स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई जा रही है। शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों से इस प्रकार के दुरुपयोग को रोकने तथा संबंधित संस्थाओं की गतिविधियों की जांच करने के संबंध में रुख स्पष्ट करने को कहा है।