Category: National

  • राजस्थान में रेलवे विकास को मिली रिकॉर्ड रफ्तार, 600 करोड़ से 10,228 करोड़ पहुंचा बजट, स्टेशनों और कनेक्टिविटी पर बड़ा फोकस

    राजस्थान में रेलवे विकास को मिली रिकॉर्ड रफ्तार, 600 करोड़ से 10,228 करोड़ पहुंचा बजट, स्टेशनों और कनेक्टिविटी पर बड़ा फोकस

    नई दिल्ली । राजस्थान में रेलवे और बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर केंद्र सरकार ने बड़े निवेश और नई परियोजनाओं पर जोर देने की बात कही है। राज्य में रेलवे सुविधाओं के विस्तार, स्टेशनों के आधुनिकीकरण और सीमावर्ती क्षेत्रों में कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार का दावा है कि इससे न केवल यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी बल्कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी राज्य को लाभ होगा।

    राजस्थान देश के सबसे बड़े राज्यों में शामिल है और यहां रेलवे नेटवर्क का विस्तार लंबे समय से विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। सरकार के अनुसार पिछले एक दशक में रेलवे क्षेत्र के लिए बजट आवंटन में कई गुना वृद्धि हुई है। इसका असर नई रेल परियोजनाओं, ट्रैक उन्नयन, स्टेशन विकास और यात्री सुविधाओं के विस्तार के रूप में दिखाई दे रहा है।

    राज्य के सैकड़ों रेलवे स्टेशनों पर विभिन्न स्तरों पर आधुनिकीकरण का कार्य चल रहा है। कई स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म की ऊंचाई बढ़ाने, लंबाई विस्तार, यात्री प्रतीक्षालय, शेड और अन्य मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने का काम तेज गति से किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित, सुविधाजनक और आधुनिक यात्रा अनुभव उपलब्ध कराना है।

    रेलवे स्टेशनों के पुनर्विकास कार्यक्रम के तहत राजस्थान के कई प्रमुख और मध्यम श्रेणी के स्टेशनों को नए स्वरूप में विकसित किया जा रहा है। इन स्टेशनों को आधुनिक डिज़ाइन, बेहतर यात्री सुविधाओं और डिजिटल सेवाओं से लैस करने की योजना पर काम जारी है। इससे रेलवे परिसरों का स्वरूप बदलने के साथ-साथ स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

    रेल सेवाओं के विस्तार पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विभिन्न शहरों को जोड़ने वाली नई ट्रेनों के संचालन और मौजूदा सेवाओं के विस्तार से यात्रियों की आवाजाही आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है। बढ़ती यात्रा मांग को देखते हुए कुछ महत्वपूर्ण रेल सेवाओं की आवृत्ति बढ़ाने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं, जिससे यात्रियों को अतिरिक्त सुविधा मिल सके।

    राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर भी सरकार विशेष रणनीति पर काम कर रही है। सीमा से जुड़े इलाकों में बेहतर रेलवे और परिवहन नेटवर्क विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे स्थानीय निवासियों को लाभ मिलने के साथ-साथ रणनीतिक दृष्टि से भी क्षेत्र की मजबूती बढ़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में मजबूत बुनियादी ढांचा आर्थिक गतिविधियों और क्षेत्रीय विकास को गति देता है।

    रेलवे विकास के साथ-साथ तकनीकी क्षेत्र में भी राजस्थान को नई पहचान दिलाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे उभरते क्षेत्रों में अनुसंधान और प्रशिक्षण सुविधाओं को मजबूत करने की योजना बनाई गई है। इससे युवाओं को आधुनिक तकनीकी कौशल प्राप्त करने और भविष्य की रोजगार आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार होने में मदद मिलेगी।

    डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के तहत डेटा सेंटर और तकनीकी निवेश को भी बढ़ावा देने की योजना है। इससे राजस्थान में तकनीकी उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होगा और नए निवेश आकर्षित होने की संभावना बढ़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे, डिजिटल तकनीक और आधुनिक बुनियादी ढांचे में समानांतर निवेश राज्य के समग्र विकास को नई दिशा दे सकता है।

    आने वाले वर्षों में यदि घोषित परियोजनाएं निर्धारित समयसीमा में पूरी होती हैं तो राजस्थान परिवहन, तकनीक और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में देश के प्रमुख राज्यों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। बढ़ता निवेश, आधुनिक सुविधाएं और नई तकनीकों पर फोकस राज्य के विकास मॉडल को नई गति देने की क्षमता रखते हैं।

  • TMC में बड़ी टूट के संकेत? बागी सांसदों की भूपेंद्र यादव से मुलाकात, 19 सांसदों की सूची से मचा सियासी हड़कंप

    TMC में बड़ी टूट के संकेत? बागी सांसदों की भूपेंद्र यादव से मुलाकात, 19 सांसदों की सूची से मचा सियासी हड़कंप


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ती अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आती दिख रही है। पार्टी में असंतोष के बीच कई बागी नेताओं ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से उनके आवास पर मुलाकात की। इस बैठक में टीएमसी के कुछ बागी सांसद भी मौजूद रहे।

    जानकारी के अनुसार, इस बैठक में प्रतिमा मंडल, माला रॉय, मिताली बाग और सयानी घोष शामिल रहीं। बताया जा रहा है कि यह बैठक करीब एक घंटे तक चली, जिसमें राजनीतिक हालात और आगे की रणनीति पर चर्चा हुई।

    सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर असंतोष केवल विधायकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब कई सांसद भी बागी रुख अपनाते नजर आ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि 19 सांसदों की एक सूची सामने आई है, जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा और यूसुफ पठान जैसे प्रमुख नाम भी शामिल हैं। बताया यह भी जा रहा है कि इन सांसदों ने अपने हस्ताक्षर के साथ एक पत्र लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

    इस सूची के सामने आने के बाद राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। ऐसे में यदि 19 सांसदों के बागी होने का दावा सही साबित होता है, तो यह पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक संकट माना जा रहा है।

    उधर, कोलकाता में पार्टी के बागी विधायक और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 64 विधायक उनके समर्थन में हैं। उन्होंने कहा कि ये सभी विधायक जल्द ही विधानसभा अध्यक्ष को अपना पत्र सौंपेंगे और एक अलग राजनीतिक पहचान के साथ काम करेंगे।

    ऋतब्रत बनर्जी, जिन्हें 3 जून को टीएमसी से निष्कासित किया गया था, को विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी है। उनके अनुसार, उनका गुट अब पश्चिम बंगाल के हितों को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक दिशा तय करेगा।

    फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम पर टीएमसी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन बढ़ते दावों ने राज्य की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।

  • हिंदू कुश हिमालय पर मंडरा रहा जलवायु संकट, कम बारिश से बढ़ सकता है बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर झील फटने का खतरा

    हिंदू कुश हिमालय पर मंडरा रहा जलवायु संकट, कम बारिश से बढ़ सकता है बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर झील फटने का खतरा


    नई दिल्ली । मानसून के आगमन के साथ देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश दर्ज की जा रही है, लेकिन इसी बीच हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र को लेकर सामने आई एक नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों द्वारा जारी ताजा आकलन के अनुसार इस वर्ष मानसून के दौरान इस संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है। इसके साथ ही तापमान भी औसत से अधिक रह सकता है, जिससे जलवायु संबंधी कई गंभीर चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

    इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) और चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के इंस्टीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक फिजिक्स द्वारा जारी HKH मॉनसून आउटलुक 2026 में संकेत दिए गए हैं कि कम बारिश और बढ़ते तापमान का संयुक्त प्रभाव इस क्षेत्र में सूखे, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर झील फटने जैसी घटनाओं के खतरे को बढ़ा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो जैसी मौसमीय परिस्थितियां मानसून को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो सकता है।

    हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र लगभग 3,500 किलोमीटर तक फैला हुआ है और अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, चीन तथा म्यांमार जैसे देशों को जोड़ता है। यह क्षेत्र केवल पर्वतों और ग्लेशियरों के लिए ही नहीं, बल्कि एशिया की कई महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों का उद्गम स्थल होने के कारण भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्जी, मेकांग, इरावदी और अमू दरिया जैसी नदियां इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं, जिन पर करोड़ों लोगों की जल, कृषि और आजीविका संबंधी जरूरतें निर्भर करती हैं।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पिछले शीतकाल में बर्फ का टिकाव सामान्य से कम रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका अर्थ है कि क्षेत्र मानसून में अपेक्षाकृत कम जल भंडार के साथ प्रवेश कर रहा है। ऐसी स्थिति में स्थानीय समुदायों को वर्षा, भूजल और प्राकृतिक जल स्रोतों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। यदि बारिश उम्मीद से कम होती है, तो जल उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ जाएगी।

    विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि कम वर्षा का मतलब यह नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कम हो जाएगा। कम समय में अत्यधिक वर्षा होने की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं। अचानक आने वाली बाढ़, पहाड़ी ढलानों का खिसकना और ग्लेशियर झीलों का फटना ऐसे खतरे हैं जो कम बारिश वाले मौसम में भी सामने आ सकते हैं।

    रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को भी एक प्रमुख कारण बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार बदलते मौसम पैटर्न के कारण हिमालयी क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील हो गया है। तापमान में वृद्धि और वर्षा की अनिश्चितता भविष्य में इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, जल संसाधनों और स्थानीय आबादी पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन और नीति निर्माताओं को इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते हुए आपदा प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूलन की रणनीतियों को मजबूत करना होगा। क्योंकि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में होने वाले बदलाव केवल पर्वतीय इलाकों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका असर पूरे दक्षिण एशिया और उससे जुड़े करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है।

  • TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा

    TMC-कांग्रेस विलय की अटकलें तेज, ममता को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अभिषेक को महासचिव पद की पेशकश की चर्चा


    नई दिल्ली । देश की राजनीति में एक बार फिर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के संभावित विलय की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। दिल्ली में गांधी परिवार और बनर्जी परिवार के बीच हुई हालिया मुलाकातों के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि दोनों दलों की ओर से अब तक किसी भी प्रकार के विलय या औपचारिक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के हवाले से सामने आ रही खबरों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है।

    मीडिया रिपोर्ट्स में कांग्रेस सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि यदि भविष्य में तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होता है, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने का प्रस्ताव दिया गया है। वहीं, टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी को कांग्रेस महासचिव पद की पेशकश किए जाने की भी चर्चा है। हालांकि इन दावों की किसी भी पक्ष ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

    विलय की संभावनाओं को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक होगी। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि टीएमसी के भीतर कुछ नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। कुछ बागी नेताओं की ओर से पार्टी के भीतर असंतोष की बात कही जा रही है। हालांकि इन दावों पर भी पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्षी दलों को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना है तो कांग्रेस और टीएमसी के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी संदर्भ में हालिया बैठकों को देखा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि इन मुलाकातों में विपक्षी एकता, INDIA गठबंधन की रणनीति और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि बातचीत केवल गठबंधन तक सीमित है या भविष्य में किसी बड़े राजनीतिक समीकरण की भी संभावना है।

    इस बीच टीएमसी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से पार्टी के कांग्रेस में विलय की अटकलों को खारिज किया है। उनका कहना है कि तृणमूल कांग्रेस अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखेगी। दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो इससे विपक्षी राजनीति को नई दिशा मिल सकती है। हालांकि पश्चिम बंगाल कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय बताई जा रही है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार फिलहाल स्थिति पूरी तरह अटकलों और सूत्रों पर आधारित है। दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और कांग्रेस नेतृत्व की ओर से आने वाले दिनों में दिए जाने वाले बयानों पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी। फिलहाल इतना तय है कि दिल्ली में हुई मुलाकातों ने विपक्षी राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है और आगामी दिनों में इस विषय पर और स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकती है।

  • पीएम मोदी के रिकॉर्ड कार्यकाल पर राघव चड्ढा की टिप्पणी, बोले- आज के दौर में लगातार जनादेश हासिल करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण

    पीएम मोदी के रिकॉर्ड कार्यकाल पर राघव चड्ढा की टिप्पणी, बोले- आज के दौर में लगातार जनादेश हासिल करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने के नए रिकॉर्ड को लेकर देश की राजनीति में चर्चा तेज हो गई है। इस उपलब्धि पर विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी क्रम में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भी अपनी टिप्पणी देते हुए इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण क्षण बताया और प्रधानमंत्री मोदी तथा देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की परिस्थितियों की तुलना की।

    राघव चड्ढा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 4,399 दिनों तक निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। उनके अनुसार यह केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की जटिलताओं और मतदाताओं के लगातार विश्वास का भी प्रतीक है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल, बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरे देश में लगातार जनसमर्थन बनाए रखना किसी भी नेता के लिए आसान नहीं होता।

    उन्होंने अपने वक्तव्य में भारत की जनसंख्या, सामाजिक विविधता और चुनावी प्रणाली का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में करोड़ों मतदाता हैं, जिनकी प्राथमिकताएं, अपेक्षाएं और राजनीतिक सोच अलग-अलग हो सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में एक ही नेतृत्व को लगातार कई चुनावों में समर्थन मिलना लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

    राघव चड्ढा ने कहा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ने अलग-अलग दौर में देश का नेतृत्व किया। उनके अनुसार स्वतंत्रता के बाद का राजनीतिक वातावरण और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती दशकों में राजनीतिक समीकरण अलग थे, जबकि वर्तमान समय में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव, गठबंधन राजनीति और तीव्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चुनावी परिदृश्य को अधिक जटिल बनाती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक दौर में मतदाताओं की अपेक्षाएं पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो चुकी हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, सोशल मीडिया, क्षेत्रीय मुद्दों और तेज राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण किसी भी सरकार के लिए लगातार जनसमर्थन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में लगातार तीन आम चुनावों में नेतृत्व के प्रति भरोसा जताया जाना विशेष महत्व रखता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होगा। लगातार तीन चुनावों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव बनाए रखना और लंबे समय तक सत्ता में बने रहना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उल्लेखनीय उपलब्धि माना जाता है। यही कारण है कि इस उपलब्धि पर विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    राघव चड्ढा ने अपने बयान में भारतीय मतदाताओं की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है और लगातार जनादेश किसी भी नेतृत्व के प्रति जनता के विश्वास को दर्शाता है। उन्होंने प्रधानमंत्री के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हुए देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    प्रधानमंत्री मोदी के नए रिकॉर्ड ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में नेतृत्व, जनादेश और लोकतांत्रिक निरंतरता को लेकर बहस को केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में भी यह उपलब्धि राजनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से चर्चा का विषय बनी रहने की संभावना है।

  • सीएम डीके शिवकुमार ने सेब खाकर समर्थकों पर फेंके, वीडियो वायरल, बीजेपी बोली- यह व्यवहार कांग्रेस की सोच का आईना

    सीएम डीके शिवकुमार ने सेब खाकर समर्थकों पर फेंके, वीडियो वायरल, बीजेपी बोली- यह व्यवहार कांग्रेस की सोच का आईना

    नई दिल्ली । कर्नाटक की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा। वीडियो में मुख्यमंत्री एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान सेब खाते हुए और बाद में उसे समर्थकों की दिशा में उछालते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है और विपक्ष ने इसे जनता के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार पर निशाना साधा है।

    यह घटना मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र कनकपुरा में आयोजित एक सम्मान समारोह के दौरान की बताई जा रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने क्षेत्र में पहुंचे डीके शिवकुमार के स्वागत के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने विशेष कार्यक्रम आयोजित किया था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी रही और मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए विभिन्न प्रकार की तैयारियां की गई थीं।

    समारोह के दौरान मुख्यमंत्री को सेबों से तैयार एक विशेष माला पहनाई गई थी। कार्यक्रम में मौजूद लोगों के अनुसार यह माला आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी और स्वागत के प्रतीक के रूप में तैयार की गई थी। बाद में मुख्यमंत्री ने माला से कुछ सेब निकालकर खाए और फिर उन्हें समर्थकों की ओर उछाल दिया। इसी दौरान रिकॉर्ड किया गया वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और देखते ही देखते राजनीतिक बहस का विषय बन गया।

    वीडियो सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। भाजपा नेताओं ने इसे जनता और समर्थकों के प्रति अनुचित व्यवहार बताते हुए मुख्यमंत्री की आलोचना की। विपक्ष का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं से संयमित और सम्मानजनक व्यवहार की अपेक्षा की जाती है तथा इस प्रकार की घटनाएं गलत संदेश देती हैं।

    भाजपा ने इस मुद्दे को राजनीतिक तौर पर भी उठाया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जनता किसी भी जनप्रतिनिधि को सम्मान और विश्वास के आधार पर चुनती है, इसलिए सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनके साथ व्यवहार भी उसी भावना के अनुरूप होना चाहिए। भाजपा ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा करते हुए कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं।

    दूसरी ओर कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि घटना को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही है। उनका तर्क है कि कार्यक्रम का माहौल उत्सवपूर्ण था और मुख्यमंत्री ने समर्थकों के उत्साह के बीच सहज प्रतिक्रिया दी थी। समर्थकों का मानना है कि वीडियो के एक हिस्से के आधार पर पूरे घटनाक्रम का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा।

    इस बीच सोशल मीडिया पर वीडियो को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोगों ने इसे सामान्य और अनौपचारिक व्यवहार बताया है, जबकि अन्य ने इसे सार्वजनिक पद की गरिमा से जोड़कर देखा है। यही कारण है कि यह मामला केवल राजनीतिक विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया बहस का भी हिस्सा बन गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी और राजनीतिक माहौल में इस प्रकार की घटनाएं अक्सर प्रतीकात्मक महत्व हासिल कर लेती हैं। कई बार छोटे घटनाक्रम भी व्यापक राजनीतिक चर्चा का विषय बन जाते हैं और दल उन्हें अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं। फिलहाल डीके शिवकुमार का यह वीडियो कर्नाटक की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जारी रहने की संभावना है।

  • नामांकन मंजूर होने पर विधानसभा परिसर में हंगामा, परिमल नथवाणी को लेकर आमने-सामने आए कांग्रेस और भाजपा

    नामांकन मंजूर होने पर विधानसभा परिसर में हंगामा, परिमल नथवाणी को लेकर आमने-सामने आए कांग्रेस और भाजपा

    नई दिल्ली । झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही हैं। चुनावी प्रक्रिया के बीच निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नथवाणी के नामांकन को वैध घोषित किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। नामांकन को लेकर पहले से जारी बहस अब खुलकर राजनीतिक टकराव में बदलती दिखाई दे रही है। विधानसभा परिसर में कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के प्रदर्शन ने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है।

    राज्यसभा चुनाव की नामांकन प्रक्रिया के दौरान परिमल नथवाणी के दस्तावेजों को लेकर सवाल उठाए गए थे। जांच के दौरान कुछ आपत्तियों के कारण उनके नामांकन को तत्काल अंतिम स्वीकृति नहीं मिली थी और मामले की समीक्षा की जा रही थी। इस वजह से राजनीतिक हलकों में लगातार अटकलों का दौर जारी रहा। हालांकि समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद नामांकन को वैध मान लिया गया, जिसके बाद विवाद और तेज हो गया।

    कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि नामांकन से जुड़े जिन बिंदुओं पर सवाल उठाए गए थे, उनकी पर्याप्त और पारदर्शी जांच होनी चाहिए थी। पार्टी के नेताओं का आरोप है कि विभिन्न राज्यों में समान परिस्थितियों में अलग-अलग निर्णय लिए जा रहे हैं, जिससे निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में एकरूपता और पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।

    नामांकन को मंजूरी मिलने की सूचना सामने आते ही कांग्रेस कार्यकर्ता विधानसभा परिसर में विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंच गए। हाथों में झंडे और बैनर लेकर कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की तथा फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। प्रदर्शनकारियों ने चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की मांग करते हुए मामले की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

    दूसरी ओर भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए विरोध प्रदर्शन का जवाब प्रदर्शन से ही दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया निर्धारित नियमों और कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित होती है तथा संबंधित अधिकारियों द्वारा लिया गया निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस चुनावी माहौल को प्रभावित करने के उद्देश्य से अनावश्यक विवाद पैदा कर रही है।

    विधानसभा परिसर के बाहर दोनों पक्षों की सक्रियता ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया। विभिन्न नेताओं ने अपने-अपने पक्ष में बयान दिए और चुनावी प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग दावे किए। इस घटनाक्रम ने राज्यसभा चुनाव को केवल एक संसदीय चुनाव न रहने देकर उसे व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा चुनावों में संख्या बल के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में किसी उम्मीदवार के नामांकन को लेकर उठे विवाद का प्रभाव केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दलों की रणनीति और राजनीतिक धारणा को भी प्रभावित करता है।

    फिलहाल परिमल नथवाणी का नामांकन वैध घोषित होने के बाद चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन इस फैसले को लेकर पैदा हुआ विवाद अभी थमता दिखाई नहीं दे रहा। आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों की रणनीति, चुनावी समीकरण और संभावित प्रतिक्रियाएं इस मुद्दे को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकती हैं। राज्यसभा चुनाव के बीच झारखंड की राजनीति में यह मामला फिलहाल सबसे चर्चित विषयों में शामिल हो गया है।

  • एनडीए की मेगा बैठक में जुटे देशभर के दिग्गज नेता, 12 साल की उपलब्धियों और भविष्य की रणनीति पर होगा मंथन

    एनडीए की मेगा बैठक में जुटे देशभर के दिग्गज नेता, 12 साल की उपलब्धियों और भविष्य की रणनीति पर होगा मंथन

    नई दिल्ली । केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर बुधवार को राजधानी में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में हुई इस मेगा बैठक में गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य सरकार की उपलब्धियों की समीक्षा करना, विकास योजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन करना और आने वाले वर्षों के लिए रणनीतिक दिशा तय करना रहा।

    बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रही। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के बाद उन्होंने गठबंधन नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया। इस दौरान केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, सुशासन, बुनियादी ढांचा विकास, सामाजिक कल्याण योजनाओं और आर्थिक प्रगति से जुड़े विषयों पर व्यापक चर्चा की गई। बैठक को शासन और संगठन दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में चल रही विकास परियोजनाओं और प्रशासनिक पहलों की जानकारी साझा की। साथ ही केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाओं के क्रियान्वयन और उनके प्रभाव पर भी विचार किया गया। बैठक का उद्देश्य केवल उपलब्धियों का उल्लेख करना नहीं, बल्कि आगामी चुनौतियों और संभावित अवसरों की पहचान करना भी था।

    राजनीतिक दृष्टि से भी इस बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन नेतृत्व आने वाले समय में विकास, जनकल्याण और प्रशासनिक सुधारों को लेकर एक साझा दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसी क्रम में विभिन्न राज्यों के अनुभवों और सुझावों को भी महत्व दिया गया। नेताओं ने शासन की प्रभावशीलता बढ़ाने और आम नागरिकों तक योजनाओं का लाभ अधिक व्यापक रूप से पहुंचाने पर जोर दिया।

    बैठक में शामिल नेताओं के अनुसार, देश में आधारभूत संरचना, डिजिटल सेवाओं, परिवहन नेटवर्क, स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्षेत्र में हुए कार्यों पर विशेष चर्चा की गई। इसके अलावा भविष्य में निवेश, रोजगार सृजन, तकनीकी नवाचार और ग्रामीण विकास को गति देने के उपायों पर भी विचार-विमर्श हुआ। गठबंधन नेतृत्व का मानना है कि विकास आधारित राजनीति आने वाले समय में भी उसकी प्राथमिकता बनी रहेगी।

    इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और लंबे कार्यकाल को लेकर भी चर्चा हुई। नेताओं ने उनके नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलावों और नीतिगत पहलों का उल्लेख किया। कई वक्ताओं ने केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद की अवधारणा को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की बैठकें केवल संगठनात्मक मजबूती का मंच नहीं होतीं, बल्कि नीति निर्माण और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को तय करने का अवसर भी प्रदान करती हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विभिन्न राज्यों के अनुभव साझा होते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित कार्ययोजना तैयार करने में मदद मिलती है।

    भारत मंडपम में आयोजित यह बैठक आने वाले समय की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देने वाली मानी जा रही है। सरकार की उपलब्धियों की समीक्षा के साथ-साथ भविष्य की योजनाओं पर हुआ मंथन इस बात का संकेत है कि गठबंधन नेतृत्व विकास, सुशासन और जनसंपर्क को आगे भी अपनी प्राथमिकताओं में बनाए रखना चाहता है।

  • बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, बागी सांसदों और नेतृत्व संघर्ष के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने क्यों साध रखी है खामोशी?

    बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल, बागी सांसदों और नेतृत्व संघर्ष के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने क्यों साध रखी है खामोशी?


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तेज हलचल देखने को मिल रही है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर कथित मतभेदों और विभिन्न सांसदों के रुख को लेकर जारी चर्चाओं के बीच सबसे अधिक ध्यान जिस नाम पर केंद्रित है, वह वरिष्ठ अभिनेता और सांसद शत्रुघ्न सिन्हा हैं। पार्टी के भीतर चल रही राजनीतिक गतिविधियों पर जहां कई नेता खुलकर अपनी राय रख रहे हैं, वहीं शत्रुघ्न सिन्हा की चुप्पी ने राजनीतिक गलियारों में नई अटकलों को जन्म दे दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान वरिष्ठ नेताओं का सार्वजनिक रुख काफी महत्व रखता है। ऐसे समय में जब पार्टी के भीतर विभिन्न समूहों और नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज है, शत्रुघ्न सिन्हा का कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। उनकी खामोशी को अलग-अलग नजरिए से देखा जा रहा है।

    शत्रुघ्न सिन्हा लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति का सक्रिय चेहरा रहे हैं। केंद्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी सक्रिय मौजूदगी को पार्टी नेतृत्व के विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है। यही कारण है कि वर्तमान परिस्थितियों में उनका रुख राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि शत्रुघ्न सिन्हा फिलहाल परिस्थितियों का आकलन करने में जुटे हो सकते हैं। अनुभवी राजनेताओं की कार्यशैली अक्सर तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय घटनाक्रम को पूरी तरह समझने और उसके बाद निर्णय लेने की होती है। इसी कारण उनकी चुप्पी को जल्दबाजी में किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध के रूप में नहीं देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर कुछ राजनीतिक जानकार इसे रणनीतिक दूरी बनाए रखने की कोशिश भी मानते हैं। उनका कहना है कि किसी भी आंतरिक विवाद के दौरान कई वरिष्ठ नेता सार्वजनिक बयानबाजी से बचते हैं ताकि बाद में संगठनात्मक एकता की संभावनाएं प्रभावित न हों। ऐसे में शत्रुघ्न सिन्हा का मौन एक राजनीतिक संदेश भी हो सकता है कि वे फिलहाल किसी गुटीय संघर्ष का हिस्सा नहीं बनना चाहते।

    बंगाल की राजनीति में हाल के वर्षों में शत्रुघ्न सिन्हा की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। चुनावी राजनीति में उनकी सफलता और पार्टी के प्रति उनकी सार्वजनिक प्रतिबद्धता ने उन्हें महत्वपूर्ण नेताओं की श्रेणी में स्थापित किया है। इसलिए राजनीतिक हलकों में यह भी माना जा रहा है कि उनका अगला कदम परिस्थितियों को देखते हुए काफी सोच-समझकर उठाया जाएगा।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अनुभवी नेता अक्सर बदलते घटनाक्रमों के बीच संतुलित रुख अपनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे नेताओं का लक्ष्य केवल तत्काल राजनीतिक लाभ नहीं होता, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक प्रासंगिकता और विश्वसनीयता भी होती है। शत्रुघ्न सिन्हा की वर्तमान स्थिति को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

    फिलहाल उनकी चुप्पी ने जितने सवाल खड़े किए हैं, उतने ही राजनीतिक अनुमान भी पैदा किए हैं। आने वाले दिनों में यदि वे सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखते हैं तो उससे न केवल उनकी राजनीतिक रणनीति स्पष्ट होगी, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं की दिशा पर भी असर पड़ सकता है। तब तक उनकी खामोशी बंगाल की राजनीति में चर्चा और विश्लेषण का विषय बनी रहने की संभावना है।

  • मोदी सरकार के 12 साल….. विकास और जन कल्याण को रहे समर्पित

    मोदी सरकार के 12 साल….. विकास और जन कल्याण को रहे समर्पित


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने कहा कि उनकी सरकार (Government) के पिछले 12 वर्ष विश्वास, विकास और जन कल्याण को समर्पित रहे हैं। उन्होंने कहा कि 140 करोड़ देशवासियों के आशीर्वाद और सबसे पहले राष्ट्र भावना से प्रेरित होकर युवाओं, महिलाओं और किसान भाई-बहनों को सशक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। पीएम मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट में कहा, ‘अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही आज देश ने बुनियादी ढांचे से लेकर डिजिटल क्रांति तक विश्व स्तर पर एक नई पहचान हासिल की है।’ उन्होंने कहा कि विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए सरकार सेवा, सुशासन और समृद्धि के इस पथ पर निरंतर अग्रसर रहेगी।

    पीएम मोदी ने कहा, ‘हमारी सरकार के बीते 12 वर्ष विश्वास, विकास और जन कल्याण को समर्पित रहे हैं। देश के140 करोड़ लोगों के आशीर्वाद और राष्ट्र प्रथम की भावना से हमने युवाओं, महिलाओं और अपने किसान भाई-बहनों को सशक्त बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। यह हमारे अथक प्रयासों का ही नतीजा है कि इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर डिजिटल क्रांति तक आज देश को दुनिया भर में एक नई पहचान मिली है। विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए हम सेवा, सुशासन और समृद्धि के इसी पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहेंगे।’


    मोदी सरकार का 12 वर्ष का कार्यकाल पूरा

    केंद्र में मोदी सरकार का 12 वर्ष का कार्यकाल पूरा हो गया है। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। पीएम मोदी की ओर से निम्नलिखित कार्यों का जिक्र किया गया…


    गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं

    प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत 81 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 4 करोड़ से अधिक घरों का निर्माण किया गया है। इसके अलावा उज्ज्वला योजना के तहत 10.5 करोड़ से अधिक एलपीजी कनेक्शन वितरित किए गए हैं और देशभर में 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण कराया गया है।


    महिला सशक्तिकरण

    प्रधानमंत्री ने कहा कि महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। महिलाओं के नाम पर 32 करोड़ से अधिक जन धन बैंक खाते खोले गए हैं। सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन प्रदान किया गया है। उन्होंने बताया कि लखपति दीदी कार्यक्रम के तहत 3 करोड़ महिलाओं की वार्षिक आय 1 लाख रुपये या उससे अधिक हो चुकी है। साथ ही 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाएं 91 लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।


    बुनियादी ढांचे का विकास

    प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में शुरू और पूर्ण किए गए प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का उल्लेख किया। इनमें अटल सेतु, सुदर्शन सेतु, चिनाब रेल पुल, बोगीबील पुल और पंबन सी ब्रिज जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भारत का मेट्रो रेल नेटवर्क अब 26 शहरों में फैलकर 1,100 किलोमीटर से अधिक लंबा हो चुका है। वहीं देश में 164 वंदे भारत ट्रेनें संचालित हो रही हैं। इसके अलावा हवाई अड्डों की संख्या भी 74 से बढ़कर 164 हो गई है।


    युवाओं पर विशेष ध्यान

    प्रधानमंत्री ने कहा कि विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 2 करोड़ लोगों को कौशल प्रशिक्षण (स्किल ट्रेनिंग) प्रदान किया गया है। उन्होंने मुद्रा योजना का भी उल्लेख किया, जिसके तहत 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक के ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं। साथ ही भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से विकसित हुआ है और अब देश में 2.2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप मौजूद हैं। छात्रों में नवाचार और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए देशभर में 10,000 से अधिक अटल टिंकरिंग लैब्स स्थापित की गई हैं।


    स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार

    प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना के तहत 60 करोड़ से अधिक लोगों को लाभ मिला है। उन्होंने बताया कि अब 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को इस योजना के तहत 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि देशभर में संचालित 19,000 से अधिक जन औषधि केंद्रों के माध्यम से लोगों को आवश्यक दवाएं बाजार मूल्य की तुलना में 90 प्रतिशत तक की छूट पर उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे आम नागरिकों के स्वास्थ्य खर्च में काफी कमी आई है।


    राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा

    राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। उन्होंने आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद (लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म) के खिलाफ सरकार की कड़ी कार्रवाई का भी जिक्र किया और कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए अभियान को और मजबूत किया गया है। प्रधानमंत्री ने औपनिवेशिक दौर के प्रतीकों को हटाने के लिए उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया गया है। इसके अलावा, भारतीय नौसेना के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत से प्रेरित नए नौसैनिक ध्वज (नेवल एनसाइन) को अपनाया गया है, जो भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाता है।

    भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि मोदी सरकार के आने से पहले सरकार में बैठे लोगों के लिए सत्ता का उद्देश्य अपनी सत्ता बरकार रखना मात्र बन गया था, मोदी ने राष्ट्र प्रथम की सोच पैदा की और पूरे देश को उससे जोड़ा। उन्होंने कहा कि दुनिया में अमेरिका, चीन और किसी भी विकसित हुए देश को देखें तो वहां के लोगों ने -एक सपना लेकर तरक्की की। मोदी के नेतृत्व में भारत सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के मूल मंत्र के साथ 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने के सपने के साथ आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री ने 140 करोड़ की आबादी, और पूरे संगठन को इस सपने के साथ जोड़ा है। विकसित भारत आज सामूहिक संकल्प बन चुका है। सरकार इसी संकल्प के साथ चल रही है।