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  • अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल कर 2.77 करोड़ की उगाही का आरोप, यूथ कांग्रेस नेता समेत दो गिरफ्तार

    नई दिल्ली । कर्नाटक के मंगलुरु में एक कारोबारी से करोड़ों रुपये की कथित जबरन वसूली के मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पुलिस ने एक व्यापारी को ब्लैकमेल कर लगभग 2.77 करोड़ रुपये वसूलने के आरोप में यूथ कांग्रेस के एक पदाधिकारी और उसके सहयोगी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों के अनुसार मामला केवल आर्थिक उगाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सुनियोजित धोखाधड़ी, मानसिक दबाव और फर्जी घटनाक्रम रचने जैसे गंभीर आरोप भी शामिल हैं।

    पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों की पहचान यूथ कांग्रेस से जुड़े पदाधिकारी निजाम और उसके सहयोगी जितेश के रूप में हुई है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि कथित तौर पर व्यापारी को पहले निजी और संवेदनशील सामग्री के आधार पर निशाना बनाया गया। आरोप है कि व्यापारी की अश्लील तस्वीरों और वीडियो का उपयोग कर उसे ब्लैकमेल किया गया तथा बदनामी का डर दिखाकर बड़ी रकम की मांग की गई।

    जांच अधिकारियों के अनुसार शुरुआत में व्यापारी से 35 लाख रुपये मांगे गए थे। आरोपियों ने कथित रूप से वीडियो सार्वजनिक करने और परिवार तक पहुंचाने की धमकी दी थी। सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक छवि को नुकसान पहुंचने की आशंका के चलते व्यापारी ने रकम का भुगतान कर दिया। हालांकि इसके बाद भी पैसों की मांग बंद नहीं हुई और कथित तौर पर लगातार दबाव बनाया जाता रहा।

    मामले में नया मोड़ तब आया जब पीड़ित ने सहायता के लिए निजाम से संपर्क किया। व्यापारी को उम्मीद थी कि वह विवाद सुलझाने में मदद करेगा, लेकिन पुलिस का दावा है कि निजाम भी कथित उगाही की पूरी योजना में शामिल था। जांच एजेंसियों का कहना है कि दोनों आरोपियों ने मिलकर व्यापारी पर दबाव बनाए रखने के लिए एक और साजिश रची।

    पुलिस के अनुसार मई 2024 में व्यापारी को यह विश्वास दिलाया गया कि जितेश ने आत्महत्या कर ली है। आरोपियों ने कथित तौर पर एक फर्जी सुसाइड नोट का हवाला दिया, जिसमें व्यापारी का नाम होने की बात कही गई। इसके साथ ही मौत और अंतिम संस्कार से जुड़ी तस्वीरें दिखाकर यह साबित करने का प्रयास किया गया कि घटना वास्तविक है। व्यापारी को यह भी बताया गया कि उसके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामला दर्ज हो सकता है।

    गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई के भय से व्यापारी लगातार पैसे देता रहा। पुलिस का दावा है कि वर्ष 2024 से 2026 के बीच विभिन्न माध्यमों से कुल 2.77 करोड़ रुपये की उगाही की गई। इस दौरान पीड़ित मानसिक दबाव और सामाजिक बदनामी की आशंका में आरोपियों की मांगें पूरी करता रहा।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब जून 2026 में व्यापारी ने जितेश को मंगलुरु में जीवित देखा। जिस व्यक्ति को वह मृत समझ रहा था, उसे सामने देखकर उसे पूरे घटनाक्रम पर संदेह हुआ। इसके बाद उसने उरवा पुलिस स्टेशन पहुंचकर विस्तृत शिकायत दर्ज कराई और पूरे मामले की जानकारी अधिकारियों को दी।

    शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। जांच एजेंसियां अब वित्तीय लेन-देन, कथित ब्लैकमेलिंग नेटवर्क और मामले से जुड़े अन्य संभावित पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या इस कथित रैकेट में अन्य लोग भी शामिल थे।

    गिरफ्तारी के बाद यह मामला राजनीतिक चर्चा का विषय भी बन गया है। सोशल मीडिया पर विभिन्न राजनीतिक कार्यक्रमों और नेताओं के साथ आरोपी की तस्वीरें साझा की जा रही हैं। हालांकि जांच एजेंसियों का कहना है कि फिलहाल पूरा ध्यान आरोपों की सत्यता, वित्तीय रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच पर केंद्रित है।

  • भारतीय जड़ों से जुड़ी नित्या रमन ने बढ़ाया भारत का गौरव, लॉस एंजिलिस मेयर चुनाव के रनऑफ में बनाई जगह

    भारतीय जड़ों से जुड़ी नित्या रमन ने बढ़ाया भारत का गौरव, लॉस एंजिलिस मेयर चुनाव के रनऑफ में बनाई जगह

    नई दिल्ली । अमेरिका के लॉस एंजिलिस शहर की राजनीति में भारतीय मूल की नेता नित्या रमन एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। मेयर पद की दौड़ में उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए उन्होंने रनऑफ चुनाव में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है। इस उपलब्धि के बाद नवंबर में उनका मुकाबला मौजूदा मेयर करेन बैस से होगा। नित्या रमन की राजनीतिक सफलता को भारतीय मूल के नेताओं की बढ़ती वैश्विक पहचान के रूप में भी देखा जा रहा है।

    44 वर्षीय नित्या रमन का जन्म भारत के केरल राज्य में हुआ था। हालांकि उनका पारिवारिक संबंध तमिल समुदाय से है और उनके माता-पिता तमिल मूल के थे। बचपन में ही उनका परिवार अमेरिका चला गया, जहां उन्होंने अपनी शिक्षा और पेशेवर जीवन की शुरुआत की। अमेरिका में पली-बढ़ीं नित्या ने शिक्षा, सामाजिक विकास और शहरी नियोजन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

    उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने अर्बन प्लानिंग के क्षेत्र में काम किया और सामाजिक मुद्दों से जुड़े अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक यात्रा की मजबूत नींव बना।

    नित्या रमन पहली बार व्यापक चर्चा में तब आईं जब उन्होंने वर्ष 2020 में लॉस एंजिलिस सिटी काउंसिल चुनाव में एक स्थापित नेता को हराकर जीत दर्ज की। इस जीत ने उन्हें शहर की राजनीति में एक नए और प्रभावशाली चेहरे के रूप में स्थापित किया। वर्ष 2024 में उन्होंने दोबारा चुनाव जीतकर अपनी लोकप्रियता और जनसमर्थन को मजबूत किया।

    मेयर पद की मौजूदा दौड़ में नित्या ने फरवरी 2026 में अंतिम समय पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह फैसला जोखिम भरा माना जा रहा था, क्योंकि उनके सामने मौजूदा मेयर करेन बैस जैसी अनुभवी नेता थीं। इसके बावजूद नित्या ने अपने अभियान को आवास, शहरी विकास, बेघर लोगों की समस्या और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित रखा, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिला।

    उनकी राजनीतिक पहचान एक प्रगतिशील और सुधारवादी नेता के रूप में बन चुकी है। वे लंबे समय से आवास संकट, सामाजिक असमानता और शहरी विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही हैं। लॉस एंजिलिस में बेघर लोगों की बढ़ती संख्या और आवास की उपलब्धता को लेकर उनके विचारों को बड़ी संख्या में मतदाताओं का समर्थन मिला है।

    नित्या रमन का निजी जीवन भी भारतीय मूल से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनके पति वली चंद्रशेखरन भारतीय मूल के टीवी निर्माता और पटकथा लेखक हैं। दोनों के जुड़वां बच्चे हैं और परिवार लंबे समय से अमेरिका में रह रहा है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वैश्विक दृष्टिकोण के मेल ने उनकी सार्वजनिक छवि को और मजबूत बनाया है।

    अब नवंबर में होने वाला चुनाव लॉस एंजिलिस की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शहर में बेघर लोगों की समस्या, आर्थिक चुनौतियां, सार्वजनिक सुरक्षा, हॉलीवुड उद्योग के पुनरुद्धार और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रहेंगे। नित्या रमन इन विषयों पर लगातार मुखर रही हैं और खुद को बदलाव तथा नई सोच का प्रतिनिधि चेहरा बता रही हैं।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि रनऑफ चुनाव में उनकी मौजूदगी केवल एक स्थानीय राजनीतिक घटना नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं की बढ़ती भागीदारी और प्रभाव का भी संकेत है। आने वाले महीनों में उनकी चुनावी रणनीति और जनसमर्थन लॉस एंजिलिस की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत की परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी, SIPRI रिपोर्ट के अनुसार 190 हथियारों के साथ पाकिस्तान को छोड़ा पीछे

    भारत की परमाणु क्षमता में बढ़ोतरी, SIPRI रिपोर्ट के अनुसार 190 हथियारों के साथ पाकिस्तान को छोड़ा पीछे

    नई दिल्ली । स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत ने परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में पाकिस्तान पर बढ़त बना ली है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जनवरी 2026 तक भारत के पास लगभग 190 परमाणु वारहेड्स मौजूद थे, जबकि पाकिस्तान का परमाणु भंडार करीब 170 वारहेड्स पर स्थिर रहा। यह आकलन दक्षिण एशिया के बदलते सामरिक परिदृश्य और दोनों देशों की रक्षा क्षमताओं को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पिछले वर्ष की तुलना में अपने परमाणु भंडार में वृद्धि की है। वर्ष 2025 में भारत के पास लगभग 180 परमाणु हथियार होने का अनुमान लगाया गया था, जो अब बढ़कर 190 तक पहुंच गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति और विकसित हो रही रक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप है।

    SIPRI ने अपनी रिपोर्ट में भारत की न्यूक्लियर ट्रायड क्षमता का विशेष उल्लेख किया है। न्यूक्लियर ट्रायड का अर्थ उन तीन माध्यमों से है जिनके जरिए परमाणु हथियारों का उपयोग किया जा सकता है। इसमें वायु आधारित प्लेटफॉर्म, जमीन से दागी जाने वाली मिसाइलें और परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत इस त्रिस्तरीय क्षमता को लगातार मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत नई मिसाइल प्रणालियों के लिए अतिरिक्त परमाणु वारहेड विकसित कर रहा है। साथ ही देश की रक्षा अनुसंधान गतिविधियां लंबी दूरी तक मार करने वाली प्रणालियों और उन्नत मिसाइल तकनीकों पर अधिक केंद्रित दिखाई दे रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रयासों का उद्देश्य क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना है।

    SIPRI ने यह भी संकेत दिया है कि भारत बहु-वारहेड क्षमता वाली मिसाइल तकनीकों की दिशा में प्रगति कर रहा है। इस तकनीक के तहत एक ही मिसाइल से कई अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बनाया जा सकता है। ऐसी क्षमताओं को आधुनिक सामरिक प्रतिरोधक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    दूसरी ओर रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने भी वर्ष 2025 के दौरान अपनी परमाणु डिलीवरी प्रणालियों के विकास पर काम जारी रखा। हालांकि उसके परमाणु हथियारों की अनुमानित संख्या में कोई विशेष बदलाव दर्ज नहीं किया गया। पाकिस्तान की भूमि और वायु आधारित परमाणु क्षमताएं पहले से स्थापित हैं, जबकि समुद्र आधारित क्षमता अभी विकास और परीक्षण की प्रक्रिया में बताई गई है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान भविष्य में अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार कर सकता है। इसके पीछे नई मिसाइल प्रणालियों का विकास और विखंडनीय सामग्री के बढ़ते भंडार को प्रमुख कारण माना गया है। हालांकि इस संबंध में सटीक आकलन करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है क्योंकि आधिकारिक सार्वजनिक आंकड़े सीमित उपलब्ध हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशिया में परमाणु संतुलन केवल हथियारों की संख्या का विषय नहीं है, बल्कि तकनीकी क्षमता, प्रतिरोधक रणनीति और कमांड-एंड-कंट्रोल ढांचे से भी जुड़ा हुआ है। SIPRI की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत और पाकिस्तान दोनों अपनी सामरिक क्षमताओं को आधुनिक बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि हाल के वर्षों में क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण अधिक जटिल हुआ है। ऐसे में दोनों देशों द्वारा प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के प्रयास जारी हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को समझने के लिए परमाणु रणनीति, तकनीकी विकास और क्षेत्रीय कूटनीति तीनों कारकों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक होगा।

  • विपक्षी एकता की तस्वीरों से आगे नहीं बढ़ पा रहा समीकरण, मोदी युग में क्यों कमजोर पड़ रहा भावनात्मक राजनीति का असर?

    विपक्षी एकता की तस्वीरों से आगे नहीं बढ़ पा रहा समीकरण, मोदी युग में क्यों कमजोर पड़ रहा भावनात्मक राजनीति का असर?

    नई दिल्ली । विपक्षी दलों के गठबंधन की हालिया बैठक के दौरान कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गर्मजोशी भरी मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। दोनों नेताओं के गले मिलने की तस्वीरें सामने आते ही इसे विपक्षी एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा। हालांकि भारतीय राजनीति का हालिया इतिहास बताता है कि ऐसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक क्षण हमेशा दीर्घकालिक राजनीतिक समीकरणों में नहीं बदल पाते।

    राजनीति में तस्वीरों और प्रतीकों का अपना महत्व होता है। कई बार एक तस्वीर लंबे भाषणों से अधिक प्रभाव छोड़ती है और जनता तक एक मजबूत संदेश पहुंचाती है। यही कारण है कि विपक्षी दलों की बैठकों में नेताओं की आपसी निकटता, मंच साझा करना और सार्वजनिक सौहार्द अक्सर राजनीतिक संदेश का हिस्सा बन जाता है। लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में केवल प्रतीकात्मक एकता पर्याप्त साबित नहीं हो रही है।

    हालिया बैठक में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात को विपक्षी दलों के बीच बढ़ती निकटता के संकेत के रूप में देखा गया। बैठक का उद्देश्य भी विभिन्न विपक्षी दलों को साझा मुद्दों पर एक मंच पर लाना था। ऐसे समय में जब राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन आधारित रणनीतियों की चर्चा तेज है, यह तस्वीर स्वाभाविक रूप से सुर्खियों में आ गई।

    हालांकि राजनीतिक विश्लेषक याद दिलाते हैं कि अतीत में भी विपक्षी एकता की कई ऐसी तस्वीरें सामने आई थीं, जिन्होंने तत्कालीन राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया था। कई अवसरों पर विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं और कांग्रेस नेतृत्व के बीच सार्वजनिक निकटता दिखाई दी, लेकिन समय के साथ राजनीतिक प्राथमिकताएं, क्षेत्रीय हित और चुनावी समीकरण बदलते गए। परिणामस्वरूप कई गठबंधन लंबे समय तक टिक नहीं सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक दौर में मतदाता केवल भावनात्मक संदेशों या राजनीतिक प्रतीकों से अधिक ठोस एजेंडे, नेतृत्व क्षमता और शासन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं। विकास, रोजगार, सामाजिक कल्याण, आर्थिक अवसर और स्थानीय मुद्दे चुनावी निर्णयों में अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में केवल सार्वजनिक सौहार्द की तस्वीरें राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं मानी जा सकतीं।

    विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राजनीतिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करने की है। कई राज्यों में सहयोगी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी रहे हैं, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता बनाए रखना आसान नहीं होता। यही कारण है कि गठबंधन राजनीति में तस्वीरों से आगे बढ़कर साझा रणनीति और स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम की आवश्यकता महसूस की जाती है।

    दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष लगातार संगठनात्मक मजबूती, नेतृत्व की स्थिरता और विकास आधारित राजनीतिक संदेश पर जोर देता रहा है। इसके चलते विपक्षी दलों के लिए केवल सरकार विरोधी भावना के आधार पर व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि किसी भी गठबंधन की सफलता अंततः उसकी नीतिगत स्पष्टता, नेतृत्व समन्वय और जमीनी संगठनात्मक क्षमता पर निर्भर करती है।

    इंडिया गठबंधन की हालिया बैठक से निकली तस्वीरें निश्चित रूप से विपक्षी एकता का संदेश देती हैं, लेकिन भविष्य में उनकी राजनीतिक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विभिन्न दल साझा मुद्दों पर कितनी मजबूती से साथ खड़े रहते हैं। भारतीय राजनीति में प्रतीकों का महत्व बना रहेगा, लेकिन चुनावी सफलता के लिए केवल प्रतीक नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक रणनीति और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी उतना ही आवश्यक होगा।

  • भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री

    भारतीय राजनीति में नया अध्याय, 4398 दिनों के कार्यकाल के साथ पीएम मोदी बने सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ते हुए देश के सबसे लंबे समय तक कार्यरत निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं और इसी के साथ उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार सबसे लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद वर्ष 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी उनके नेतृत्व में एनडीए को सफलता मिली और उन्होंने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 9 जून 2026 तक उनके कार्यकाल के 4398 दिन पूरे हो चुके हैं, जो किसी निर्वाचित भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल माना जा रहा है।

    इससे पहले यह रिकॉर्ड भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम था। नेहरू ने 1952 के पहले आम चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अपना निर्वाचित कार्यकाल शुरू किया था और लगातार 4397 दिनों तक इस पद पर बने रहे थे। हालांकि वह 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन स्वतंत्रता के बाद शुरुआती वर्षों में वह अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्य कर रहे थे। इसी कारण निर्वाचित प्रधानमंत्री के कार्यकाल की गणना अलग आधार पर की जाती है।

    प्रधानमंत्री मोदी की इस उपलब्धि को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वह देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी हैं जिन्होंने लगातार दो बार पूर्ण बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व किया और तीसरे कार्यकाल में भी सत्ता की कमान संभाल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उपलब्धि भारतीय राजनीति में उनके लंबे प्रभाव और जनसमर्थन को दर्शाती है।

    एनडीए सरकार इस अवसर को विशेष रूप से चिह्नित करने की तैयारी में है। 10 जून को गठबंधन शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सहयोगी दलों के नेताओं की बैठक प्रस्तावित है। बैठक में पिछले 12 वर्षों के दौरान सरकार की प्रमुख उपलब्धियों, विकास योजनाओं और नीतिगत पहलों पर चर्चा किए जाने की संभावना है। गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हुए कार्यों को रेखांकित करने वाला प्रस्ताव भी पेश किया जा सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इससे पहले जुलाई 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लगातार प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ा था। वहीं मार्च 2026 में उन्होंने एक और उपलब्धि हासिल की, जब गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनके कुल शासनकाल ने भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता संभालने वाले नेताओं की सूची में उन्हें शीर्ष स्थान पर पहुंचा दिया।

    राजनीतिक इतिहास में प्रधानमंत्री मोदी का नाम लगातार तीन लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज कर सरकार बनाने वाले चुनिंदा नेताओं में भी शामिल हो चुका है। जवाहरलाल नेहरू के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने, जिन्होंने लगातार तीन आम चुनावों में अपने नेतृत्व में गठबंधन को जीत दिलाकर तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

    प्रधानमंत्री मोदी की एक और विशेष पहचान यह है कि वे स्वतंत्र भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को हुआ था, जबकि उनसे पहले देश के सभी प्रधानमंत्रियों का जन्म स्वतंत्रता से पूर्व हुआ था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि केवल एक राजनीतिक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से अधिक समय से भारतीय राजनीति में बने नेतृत्व, चुनावी सफलता और प्रशासनिक निरंतरता का भी प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह रिकॉर्ड भारतीय राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाएगा।

  • भारत इनोवेट्स 2026 में आईआईटी मद्रास की बड़ी मौजूदगी, 15 स्टार्टअप्स और अत्याधुनिक शोध परियोजनाएं होंगी प्रदर्शित

    भारत इनोवेट्स 2026 में आईआईटी मद्रास की बड़ी मौजूदगी, 15 स्टार्टअप्स और अत्याधुनिक शोध परियोजनाएं होंगी प्रदर्शित

    नई दिल्ली । भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास वैश्विक स्तर पर भारतीय तकनीकी नवाचारों और स्टार्टअप इकोसिस्टम की क्षमता को प्रदर्शित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। फ्रांस में आयोजित होने वाले ‘भारत इनोवेट्स 2026’ कार्यक्रम में संस्थान अपने डीप-टेक अनुसंधान, उभरती प्रौद्योगिकियों और नवाचार आधारित स्टार्टअप्स को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करेगा। इस आयोजन को भारत और फ्रांस के बीच तकनीकी सहयोग तथा नवाचार साझेदारी को मजबूत करने के एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

    यह कार्यक्रम 14 से 16 जून के बीच आयोजित किया जाएगा, जिसमें भारत के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों और तकनीकी संगठनों से जुड़े नवाचारों को वैश्विक समुदाय के सामने रखा जाएगा। आयोजन का उद्देश्य उभरती तकनीकों और स्टार्टअप्स को निवेशकों, नीति निर्माताओं, उद्योग विशेषज्ञों, शोध संस्थानों और तकनीकी साझेदारों से जोड़ना है, ताकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के अवसर मिल सकें।

    आईआईटी मद्रास इस कार्यक्रम में प्रमुख भूमिका निभाते हुए दो महत्वपूर्ण विषयगत क्षेत्रों का नेतृत्व करेगा। संस्थान अपने साथ जुड़े 15 स्टार्टअप्स को भी प्रदर्शित करेगा, जो विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों में अभिनव समाधान विकसित कर रहे हैं। इसके अलावा पांच प्रमुख शोध परियोजनाओं को भी प्रदर्शित किया जाएगा, जो भारत की स्वदेशी तकनीकी क्षमताओं और अनुसंधान आधारित विकास को रेखांकित करेंगी।

    प्रदर्शित की जाने वाली प्रमुख तकनीकों में हाइपरलूप परिवहन प्रणाली, लैब-ग्रोन डायमंड तकनीक, स्वदेशी 5जी और 6जी संचार समाधान, स्मार्ट पोर्ट ऑटोमेशन तथा कम कंप्यूटिंग संसाधनों पर आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल शामिल हैं। ये सभी परियोजनाएं भविष्य की तकनीकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विकसित की जा रही हैं और इनमें वैश्विक स्तर पर उपयोग की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

    संस्थान के अनुसार, हाइपरलूप तकनीक भारत की अगली पीढ़ी की परिवहन व्यवस्था को नई दिशा दे सकती है। इसी प्रकार स्वदेशी 5जी और 6जी समाधान देश को दूरसंचार क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। वहीं, कम कंप्यूटिंग क्षमता पर कार्य करने वाले एआई मॉडल्स को ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन डिजिटल समाधान की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है।

    कार्यक्रम में ब्लू इकोनॉमी से जुड़े नवाचारों को भी विशेष स्थान मिलेगा। समुद्री और ऑफशोर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विकसित स्वायत्त प्रणालियां, अंडरवॉटर निरीक्षण तकनीकें और समुद्री शैवाल आधारित टिकाऊ उत्पाद इस क्षेत्र की प्रमुख आकर्षण परियोजनाओं में शामिल होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी तकनीकें पर्यावरणीय स्थिरता और औद्योगिक दक्षता दोनों को बढ़ावा दे सकती हैं।

    आईआईटी मद्रास के नेतृत्व का मानना है कि यह आयोजन केवल तकनीकी प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत और फ्रांस के बीच शोध, नवाचार, स्टार्टअप सहयोग और प्रतिभा आदान-प्रदान के नए अवसर भी पैदा करेगा। विशेष रूप से दूरसंचार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और सतत विकास से जुड़े क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भारतीय संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी देश के नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को नई पहचान दिला रही है। आईआईटी मद्रास की भागीदारी इस बात का संकेत है कि भारतीय अनुसंधान संस्थान अब केवल शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक तकनीकी विकास और उद्योग परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    ‘भारत इनोवेट्स 2026’ जैसे आयोजन भारतीय स्टार्टअप्स और शोध परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय निवेश, साझेदारी और तकनीकी सहयोग के नए अवसर उपलब्ध करा सकते हैं। इससे भारत की नवाचार क्षमता को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • शहीदी दिवस से पहले पाकिस्तान का बड़ा कदम, भारतीय श्रद्धालुओं को मिला वीजा

    शहीदी दिवस से पहले पाकिस्तान का बड़ा कदम, भारतीय श्रद्धालुओं को मिला वीजा


    नई दिल्ली । सिख समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक खबर सामने आई है। गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस के अवसर पर पाकिस्तान सरकार ने भारतीय सिख श्रद्धालुओं के लिए वीजा जारी कर धार्मिक यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया है। पाकिस्तान उच्चायोग ने 10 से 19 जून तक आयोजित होने वाले वार्षिक धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए 737 भारतीय तीर्थयात्रियों को वीजा प्रदान किए हैं।

    पाकिस्तान उच्चायोग की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, वीजा प्राप्त श्रद्धालु पाकिस्तान स्थित प्रमुख सिख धार्मिक स्थलों के दर्शन कर सकेंगे। इनमें गुरुद्वारा पंजा साहिब, गुरुद्वारा ननकाना साहिब, गुरुद्वारा करतारपुर साहिब सहित कई ऐतिहासिक और आस्था से जुड़े स्थान शामिल हैं। हर वर्ष बड़ी संख्या में भारतीय सिख श्रद्धालु इन पवित्र स्थलों की यात्रा करते हैं और गुरु अर्जुन देव जी की शहादत को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

    भारत में पाकिस्तान के कार्यवाहक उच्चायुक्त साद अहमद वाराइच ने सभी श्रद्धालुओं को सफल, सुरक्षित और शांतिपूर्ण यात्रा की शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक यात्राओं को सुगम बनाना दोनों देशों के बीच स्थापित द्विपक्षीय समझौतों और धार्मिक स्वतंत्रता के सम्मान का हिस्सा है। पाकिस्तान उच्चायोग ने यह भी स्पष्ट किया कि वीजा जारी करने की प्रक्रिया 1974 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए धार्मिक स्थलों की यात्रा संबंधी प्रोटोकॉल के तहत की गई है।

    इधर, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को भी इस संबंध में बड़ी राहत मिली है। एसजीपीसी की धर्म प्रचार समिति के सचिव गुरिंदर सिंह मथरेवाल ने जानकारी दी कि कमेटी ने कुल 561 तीर्थयात्रियों के पासपोर्ट पाकिस्तान दूतावास में जमा कराए थे। इनमें से 541 श्रद्धालुओं को वीजा स्वीकृत कर दिया गया, जबकि 20 आवेदनों को मंजूरी नहीं मिल सकी।

    मथरेवाल के अनुसार, वीजा प्राप्त श्रद्धालुओं का जत्था बुधवार को अमृतसर स्थित एसजीपीसी मुख्यालय से पाकिस्तान के लिए रवाना होगा। यात्रा के दौरान श्रद्धालु विभिन्न ऐतिहासिक गुरुद्वारों में मत्था टेकेंगे और गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस से जुड़े विशेष धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। यह धार्मिक यात्रा 19 जून तक चलेगी, जिसके बाद श्रद्धालु भारत लौट आएंगे।

    सिख समुदाय के लिए यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि अपनी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी मानी जाती है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद धार्मिक यात्राओं के लिए वीजा जारी होना श्रद्धालुओं के लिए राहत और खुशी का विषय माना जा रहा है।

    गुरु अर्जुन देव जी की शहादत को सिख इतिहास में त्याग, साहस और धर्म के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उनके शहीदी दिवस पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को पाकिस्तान स्थित पवित्र स्थलों के दर्शन का अवसर मिलना सिख संगत के लिए विशेष महत्व रखता है।

  • "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला

    "जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें राजनीति से ज्यादा प्रचार में रुचि रखने वाली नेता बताया है। उनके बयान ने टीएमसी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर दिया है।

    एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान काकोली घोष ने कहा कि जब ममता बनर्जी ने राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की थी, तब आज खुद को उनका करीबी बताने वाले कई चेहरे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने बिना नाम लिए महुआ मोइत्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेश में बैठकर ट्वीट करने वाले लोग वास्तविक राजनीति नहीं करते, बल्कि केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बयानबाजी करते हैं।

    काकोली घोष की यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई है जब हाल ही में महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों को “लालची”, “मतलबी” और “गद्दार” करार दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है। घोष ने कहा कि कुछ नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनसे मीडिया में उनकी चर्चा बनी रहे, लेकिन इससे पार्टी संगठन को नुकसान पहुंचता है।

    इस बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि उसके साथ करीब 20 सांसदों का समर्थन मौजूद है। काकोली घोष ने स्वयं को भी इस गुट का हिस्सा बताया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसदों ने हाल के दिनों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बैठकें की हैं, जिससे टीएमसी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं।

    उधर, पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे ने भी टीएमसी में असंतोष की खबरों को बल दिया है। बताया जा रहा है कि रॉय कई सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पहुंचे थे, जहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा हुई। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के कई लोकसभा सांसदों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं।

    दिल्ली में चल रहे इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर उथल-पुथल जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के बाद कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है और संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर यह असंतोष और बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक रणनीतियों और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर उनके लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।

  • दिल दहला देने वाले मर्डर केस में बड़ा फैसला, आरोपी भाई-बहन को मौत की सजा

    दिल दहला देने वाले मर्डर केस में बड़ा फैसला, आरोपी भाई-बहन को मौत की सजा


    नई दिल्ली । हैदराबाद से सामने आए एक दिल दहला देने वाले मामले में अदालत ने कड़ा फैसला सुनाते हुए एक भाई और बहन को मौत की सजा सुनाई है। दोनों को अपने ही पिता की हत्या का दोषी पाया गया। इस मामले ने न केवल पूरे इलाके को झकझोर दिया था, बल्कि पारिवारिक रिश्तों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। अदालत ने मामले में मृतक की बहू को भी दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक 70 वर्षीय रेलवे के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से वर्ष 2000 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी और पेंशन प्राप्त कर रहे थे। जांच में सामने आया कि उनके बेटे, बेटी और बहू की नजर उनकी पेंशन और संपत्ति पर थी। इसी लालच में तीनों ने मिलकर हत्या की साजिश रची।

    मामले के अनुसार, आरोपियों ने वृद्ध व्यक्ति के भोजन में जहर मिलाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। हत्या के बाद उन्होंने अपराध को छिपाने की कोशिश की। बताया गया कि शव को ठिकाने लगाने में असफल रहने पर उसके कई टुकड़े किए गए और उन्हें घर के भीतर अलग-अलग बाल्टियों में भरकर रखा गया। इस भयावह घटना का खुलासा तब हुआ जब घर से लगातार दुर्गंध आने लगी।

    18 अगस्त 2019 को आसपास के लोगों को घर से आ रही बदबू पर संदेह हुआ। स्थानीय लोगों ने स्थिति की जानकारी लेने की कोशिश की और बाद में पुलिस को सूचना दी। पुलिस जब मौके पर पहुंची तो घर के भीतर मानव अवशेष मिलने से सनसनी फैल गई। जांच के दौरान पुलिस ने पूरे घटनाक्रम का खुलासा किया और तीनों आरोपियों को 21 अगस्त 2019 को गिरफ्तार कर लिया गया।

    मल्काजगिरि स्थित प्रधान जिला एवं सत्र न्यायालय में चले मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कई महत्वपूर्ण साक्ष्य और गवाह पेश किए। अदालत ने पाया कि आरोपियों ने पूर्व नियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दिया था। मामले की गंभीरता, हत्या की क्रूरता और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने मृतक के बेटे और बेटी को फांसी की सजा सुनाई, जबकि बहू को उम्रकैद की सजा दी गई।

    यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि इसमें लालच के लिए अपने ही पिता की निर्मम हत्या की गई थी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस प्रकार के जघन्य अपराध समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करते हैं तथा ऐसे मामलों में कठोर दंड आवश्यक है।

    इस फैसले को न्याय व्यवस्था की सख्ती और अपराध के प्रति शून्य सहिष्णुता के रूप में देखा जा रहा है। वहीं यह घटना परिवार और रिश्तों में विश्वास को झकझोर देने वाली घटनाओं में से एक मानी जा रही है।

  • राजू पाल हत्याकांड: अतीक अहमद के शूटर आबिद को हाईकोर्ट से जमानत, SC जाएंगी पूजा पाल

    राजू पाल हत्याकांड: अतीक अहमद के शूटर आबिद को हाईकोर्ट से जमानत, SC जाएंगी पूजा पाल

    प्रयागराज। बहुचर्चित राजू पाल हत्याकांड में एक अहम कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। मामले में दोषी ठहराए गए अतीक अहमद के शूटर आबिद को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सशर्त जमानत प्रदान की है। कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर प्रदेश का चर्चित हत्याकांड सुर्खियों में आ गया है।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने आबिद की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह राहत दी। अदालत ने मामले के विभिन्न तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद जमानत मंजूर की, हालांकि इसके साथ कुछ शर्तें भी लगाई गई हैं, जिनका पालन करना अभियुक्त के लिए अनिवार्य होगा।

    2005 में हुई थी दिनदहाड़े हत्या
    गौरतलब है कि 25 जनवरी 2005 को प्रयागराज के धूमनगंज क्षेत्र में तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय यह घटना प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक और आपराधिक वारदातों में शामिल रही थी।

    हमले में राजू पाल के अलावा देवी लाल पाल और संदीप यादव की भी जान गई थी, जबकि तीन अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस मामले में राजू पाल की पत्नी और वर्तमान विधायक पूजा पाल की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया गया था।

    जांच में सामने आए थे कई बड़े नाम
    जांच के दौरान कई आरोपियों के नाम सामने आए थे, जिनमें माफिया अतीक अहमद और उसके करीबी सहयोगी भी शामिल थे। लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया और सुनवाई के बाद मामले में कई आरोपियों को दोषी ठहराया गया था।

    हाईकोर्ट के फैसले से असहमत पूजा पाल
    आबिद को जमानत दिए जाने के फैसले पर राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने नाराजगी जताई है। उन्होंने साफ कहा है कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। हाईकोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर आगे क्या रुख अपनाया जाता है और जमानत आदेश पर क्या निर्णय आता है।