Category: National

  • टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक..UGC के वो 4 नियम कौन से हैं जिनपर बवाल मचा हुआ है?


    नई दिल्ली । देशभर में UGC के नए नियम को लेकर भारी विरोध देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर यूजीसी आरोलबैक तेजी से ट्रेंड करने लगा, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला बताया गया। इसी बीच, बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस बदलाव का विरोध करते हुए इस्तीफा दे दिया। इस पूरे विवाद के बीच सवाल उठता है कि UGC ने कौन से नियम बनाए हैं और आखिर क्यों टीचर्स, स्टूडेंट्स और आम लोग इसमें नाराज हैं।

    UGC का नया नियम क्या है

    UGC ने 13 जनवरी 2026 को नया नियम लागू किया, जिसका नाम है उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के विनियम 2026 । इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव और असमानता को रोकना बताया गया है। नए नियम के तहत सभी विश्वविद्यालय और कॉलेजों को इक्विटी सेंटर, इक्विटी स्क्वाड और इक्विटी कमेटी बनाने होंगे, साथ ही 24×7 हेल्पलाइन का प्रावधान भी होगा। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता, तो UGC उनकी मान्यता रद्द कर सकता है या फंड रोक सकता है। UGC का कहना है कि पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ शिकायतों में 2020 से 2025 के बीच 100% से अधिक वृद्धि देखी गई है। इसके अलावा, रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए यह नियम बनाया गया है, ताकि उच्च शिक्षा में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    क्यों मचा बवाल

    UGC के नए नियम के कुछ सेक्शन विशेष रूप से विवादित बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका PIL में कहा गया है कि Section 3C अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसके अलावा, सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज के छात्र और शिक्षक भी नाराज हैं। बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इसे सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बनाने जैसा बताया। छात्र और शिक्षक दोनों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कार्रवाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है, और सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि देशभर में इस नियम को लेकर तीव्र विरोध और बहस चल रही है।

    UGC के 4 विवादित नियम / बदलाव ,इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड का गठन

    नए नियम के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में इक्विटी समिति और इक्विटी स्क्वाड बनाना अनिवार्य है। हालांकि, छात्रों का कहना है कि इसमें सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व जरूरी नहीं है, जिससे निर्णयों में पक्षपात होने का डर है। साथ ही इक्विटी स्क्वाडको बहुत अधिकार दिए गए हैं, लेकिन ‘भेदभाव’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, जिससे इसकी कार्यवाही और सीमाओं को लेकर शंका बनी हुई है।

    अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों पर ध्यान
    नए नियम का मुख्य उद्देश्य एससी, एसटी और पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव को रोकना है। हालांकि, सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक इसे एकतरफा मान रहे हैं। उनका कहना है कि इस नियम के तहत सवर्ण छात्रों को ‘संभावित अपराधी’ मानकर देखा जा सकता है, जिससे वास्तव में भेदभाव बढ़ने और माहौल में तनाव पैदा होने की संभावना है।

    सख्त कार्रवाई का अधिकार
    नए नियम के तहत, अगर कोई संस्थान के नियमों का पालन नहीं करता, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है या फंड रोक दिया जा सकता है। छात्र और शिक्षक मानते हैं कि यह कदम संस्थानों पर अत्यधिक दबाव डालता है और बिना पर्याप्त प्रशिक्षण और संसाधन के इसे लागू करना मुश्किल और जटिल होगा।
    छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया
    कई छात्र संगठन और शिक्षक संघ के नए नियम का विरोध कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड कर रहा है, जबकि बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा देकर अपना विरोध जताया। छात्रों का कहना है कि नियम एकतरफा है, झूठी शिकायतों पर कोई रोक नहीं है, और सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

    UGC का पक्ष
    UGC का कहना है कि यह नियम उच्च शिक्षा में समान अवसर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है। आयोग के अनुसार, बिना निगरानी और संरचना के पिछड़ी जातियों के खिलाफ भेदभाव रोकना मुश्किल है। यह भी बताता है कि नियम धीरे-धीरे लागू किए जाएंगे और उद्देश्य केवल समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। जबकि यह कदम शिक्षा प्रणाली में समानता और सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास है, नियम के कुछ सेक्शन विवादास्पद माने जा रहे हैं।

    सवर्ण छात्रों और शिक्षकों की चिंता और भविष्य की राह

    टीचर्स से लेकर स्टूडेंट्स तक सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नया नियम सवर्ण छात्रों और शिक्षकों के अधिकारों के खिलाफ तो नहीं जा रहा। अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर हैं, जिससे तय होगा कि नियम में कोई संशोधन या बदलाव करता है या नहीं। फिलहाल, यह मामला शिक्षा जगत में सबसे बड़ा और गर्म चर्चा का विषय बन गया है, और भविष्य में इसके प्रभाव को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।

  • बंगाल में मौत का तांडव: दो गोदामों में लगी भीषण आग, 8 मजदूरों की मौत, मलबे में अभी भी कई के फंसे होने की आशंका

    बंगाल में मौत का तांडव: दो गोदामों में लगी भीषण आग, 8 मजदूरों की मौत, मलबे में अभी भी कई के फंसे होने की आशंका


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के नरेंद्रपुर थाना क्षेत्र में सोमवार को आग ने ऐसा तांडव मचाया कि हंसते-खेलते 8 परिवारों के चिराग बुझ गए। नजीराबाद स्थित दो सटे हुए गोदामों में तड़के करीब 3 बजे उस वक्त भीषण आग लग गई जब वहां सो रहे मजदूरों को भागने का मौका तक नहीं मिला। पुलिस और दमकल विभाग के अनुसार, अब तक 8 शव बरामद किए जा चुके हैं, जो इतनी बुरी तरह झुलस गए हैं कि उनकी शिनाख्त करना मुश्किल हो रहा है।

    साजिश या लापरवाही बताया जा रहा है कि इन गोदामों में एक डेकोरेटिंग कंपनी और एक प्रसिद्ध मोमो चेन का काम होता था। यहां रहने वाले मजदूर पुरबा मेदिनीपुर और दक्षिण 24 परगना के निवासी थे। चश्मदीदों और भाजपा विधायक अशोक डिंडा के अनुसार, आधी रात को गोदाम का मुख्य गेट बाहर से बंद था, जिसके कारण आग लगने पर मजदूर बाहर नहीं निकल पाए और अंदर ही फंस गए। हालांकि, चार मजदूरों ने किसी तरह भागकर अपनी जान बचाई, लेकिन लापता लोगों की संख्या 10 से अधिक होने की आशंका जताई जा रही है।

    रेस्क्यू ऑपरेशन और प्रशासनिक चुनौतियां दमकल की 12 गाड़ियों ने करीब 7 घंटे तक आग से लोहा लिया, तब जाकर सुबह 10 बजे लपटों पर काबू पाया जा सका। बिजली मंत्री आरूप बिस्वास ने बताया कि गोदाम के भीतर धुआं इतना घना था कि कोलकाता नगर निगम की डिमोलिशन टीम को दीवारें तोड़ने के लिए बुलाना पड़ा। बारुईपुर के पुलिस अधीक्षक शुभेंदु कुमार ने स्पष्ट किया कि मलबा पूरी तरह साफ होने के बाद ही मौतों का सटीक आंकड़ा सामने आ पाएगा।

    सियासी घमासान शुरू इस त्रासदी ने बंगाल की राजनीति में भी उबाल ला दिया है। नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने राज्य सरकार पर असंवेदनशीलता का आरोप लगाते हुए कहा कि जब मजदूर मर रहे थे, तब वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री छुट्टी मना रहे थे। दूसरी ओर, अग्निशमन मंत्री सुजीत बोस ने कहा कि सुरक्षा मानकों की जांच की जा रही है और मालिकों की जवाबदेही तय की जाएगी। फिलहाल, पूरे इलाके में मातम छाया हुआ है और बचाव दल मलबे में दबे संभावित जिंदगियों की तलाश में जुटा है।

  • उत्तराखंड में सख्ती बढ़ी: गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन, बदरीनाथ-केदारनाथ पर भी प्रस्ताव की तैयारी

    उत्तराखंड में सख्ती बढ़ी: गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन, बदरीनाथ-केदारनाथ पर भी प्रस्ताव की तैयारी


    देहरादून। हरिद्वार के गंगा घाटों पर प्रतिबंध के बाद अब उत्तराखंड में धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का कदम बढ़ता जा रहा है। गंगोत्री धाम में यह फैसला लागू कर दिया गया है और अब बदरीनाथ-केदारनाथ में भी इसी तरह का प्रस्ताव बोर्ड में लाया जाएगा।

    गंगोत्री धाम में गैर-हिंदुओं की एंट्री बैन
    श्री गंगोत्री मंदिर समिति के अध्यक्ष सुरेश सेमवाल ने बताया कि सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया है।
    गंगोत्री धाम के साथ-साथ शीतकालीन प्रवास स्थल मुखबा में भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित रहेगा।

    बदरीनाथ-केदारनाथ में भी प्रस्ताव लाया जाएगा
    श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि बोर्ड की अगली बैठक में बदरीनाथ और केदारनाथ में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव लाया जाएगा।
    इसके बाद इसे शासन और सरकार के समक्ष रखा जाएगा।

    हरिद्वार के बाद अब अन्य स्थलों पर मांग बढ़ी
    हरिद्वार में सरकार ने पहले ही गंगा घाटों, हर की पैड़ी और अन्य प्रमुख स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाई है।
    धार्मिक संस्थाओं की मांग है कि पूरे कुंभ क्षेत्र में भी इसी तरह का प्रतिबंध लागू किया जाए।

    बीकेटीसी अध्यक्ष का बयान
    हेमंत द्विवेदी ने इसे “ऐतिहासिक फैसला” बताया और कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा लिया गया यह कदम बदरी-केदार धाम में भी लागू होगा।
    उन्होंने कहा कि बोर्ड में प्रस्ताव पास होने के बाद सरकार को इसे लागू कराने की प्रक्रिया शुरू होगी।

    मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का रुख
    मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि पवित्र धाम हमारी आस्था के धाम हैं और यहाँ पौराणिक मान्यता व संस्कृति के अनुसार ही निर्णय होंगे।
    उन्होंने कहा कि मंदिर समिति और तीर्थ पुरोहितों की मांग पर सरकार काम करेगी।
    हरिद्वार के गंगा घाटों के पुराने एक्ट का अध्ययन करके आगे निर्णय लिया जाएगा।


    सरकार का संकेत
    धामी ने कहा कि अगर बीकेटीसी से प्रस्ताव आता है, तो सरकार सभी पहलुओं को देखते हुए आगे निर्णय करेगी।
    सरकार सनातन धर्म के आस्था केंद्रों की पवित्रता बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाने को तैयार है।

  • राष्ट्रगीत के 150 साल… सिनेमा में हर बार नए जोश और अंदाज के साथ गूंजा 'वंदे मातरम'

    राष्ट्रगीत के 150 साल… सिनेमा में हर बार नए जोश और अंदाज के साथ गूंजा 'वंदे मातरम'


    नई दिल्ली। वंदे मातरम केवल राष्ट्रीय गीत नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक है, यह भारतीय सिनेमा में भी बार-बार देशभक्ति की भावना जगाता रहा है। हर बार जब स्क्रीन पर यह गीत सुनाई दिया, तो जोश, ऊर्जा और राष्ट्रप्रेम की लहर दौड़ गई।

    ‘वंदे मातरम’ क्लासिकल से मॉडर्न तक विकसित होता रहा। लता मंगेशकर से विशाल-शेखर तक कई हस्तियों ने इसे गाया। सिनेमा में यह बलिदान और एकता का प्रतीक बना।

    भारतीय सिनेमा में ‘वंदे मातरम’ पहली बार 1952 की फिल्म ‘आनंद मठ’ में गूंजा। लता मंगेशकर ने इसे गाया और हेमंत कुमार ने संगीत दिया। यह क्लासिक वर्जन आज भी सबसे प्रसिद्ध है। फिल्म में यह गीत स्वतंत्रता संग्राम की भावना को दर्शाता है।

    यही नहीं साल 1997 में एआर. रहमान ने ‘वंदे मातरम’ (मां तुझे सलाम) नाम से एक इंडिपेंडेंट एल्बम ट्रैक जारी किया। यह नॉन-फिल्म म्यूजिक वीडियो था। भारत बाला और मेहबूब ने वीडियो बनाया। आधुनिक फ्यूजन, रॉक और क्लासिकल मिश्रण के साथ गीत नए अंदाज में पेश किया गया।

    साल 2001 की फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ में ‘वंदे मातरम’ को उषा उत्थुप और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया। संगीत संदेश शांडिल्य का था। यह गाना फिल्म के अंत में आता है। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, काजोल जैसे कलाकारों वाली इस फिल्म में परिवार और देशभक्ति का मिश्रण दिखाया गया।

    वंदे मातरम साल 2015 की फिल्म ‘एबीसीडी 2’ में सचिन-जिगर ने ‘वंदे मातरम’ को नए अंदाज में पेश किया। यह डांस फिल्म थी। गीत में एनर्जेटिक बीट्स थे। फिल्म में देशभक्ति और डांस का मेल दिखाया गया। यह आधुनिक पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक रहा। वहीं, साल 2024 की फिल्म ‘फाइटर’ में विशाल-शेखर ने ‘वंदे मातरम’ (द फाइटर एंथम) गाया। विशाल ददलानी, शेखर रवजियानी मुख्य गायक थे। ऋतिक रोशन, दीपिका पादुकोण, अनिल कपूर स्टारर फिल्म के इस गाने को खूब पसंद किया गया।

    साल 2022 में रिलीज हुई फिल्म ‘कोड नेम: तिरंगा’ में शंकर महादेवन ने ‘वंदे मातरम’ गाया। यह देशभक्ति थीम वाली फिल्म थी। गीत ने राष्ट्रप्रेम का संदेश मजबूत किया। वहीं, साल 2024 की फिल्म ‘ऑपरेशन वेलेंटाइन’ में भी ‘वंदे मातरम’ का नया वर्जन इस्तेमाल हुआ। यह आधुनिक एंथम स्टाइल में था। फिल्म देशभक्ति और एक्शन पर आधारित थी। गीत ने क्लाइमैक्स में जोश भरा।

    इसके अलावा, कई अन्य फिल्मों के छोटे-छोटे हिस्सों में भी यह गीत इस्तेमाल होता रहा है। वहीं, साल 2021 में टाइगर श्रॉफ ने ‘वंदे मातरम’ का अपना इंडिपेंडेंट वर्जन गाया। यह उनका हिंदी सिंगिंग डेब्यू था। जैकी भगनानी प्रोडक्शन में म्यूजिक वीडियो बना। युवा और एनर्जेटिक स्टाइल में देशभक्ति थीम पर आधारित गाने को विशाल मिश्रा ने कंपोज किया था।

    ‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल यह गीत मातृभूमि को देवी के रूप में पूजने का संदेश देता है। साल 2025 में ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 नवंबर 2025 को इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम, नई दिल्ली में एक साल भर चलने वाले राष्ट्रव्यापी समारोह की शुरुआत की। यह जश्न 7 नवंबर 2026 तक चलेगा।

  • कराची-लाहौर में दोपहर में ‘अंधेरा’! भारत के रणनीतिक कदम से पाकिस्तान में हलचल, आज दिखेगी ‘सूर्यास्त्र’ की पहली झलक

    कराची-लाहौर में दोपहर में ‘अंधेरा’! भारत के रणनीतिक कदम से पाकिस्तान में हलचल, आज दिखेगी ‘सूर्यास्त्र’ की पहली झलक


    नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस 2026 के मौके पर भारत एक ऐसे हथियार को कर्तव्य पथ पर उतारने जा रहा है, जिसकी एक झलक से ही दुश्मन के दिमाग में खौफ पैदा हो सकता है। भारत का पहला स्वदेशी मल्टी-कैलिबर लॉन्ग-रेंज रॉकेट लॉन्चर सिस्टम ‘सूर्यास्त्र’ आज परेड में पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखाई देगा। यह सिस्टम 300 किलोमीटर की गहराई तक स्ट्राइक करने में सक्षम है और रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इससे पाकिस्तान के कई बड़े शहर कराची, लाहौर और रावलपिंडी जैसे केंद्र अब भारत की पहुंच में हैं।

    सूर्यास्त्र क्या है और क्यों खास है?
    ‘सूर्यास्त्र’ भारत का पहला Made-in-India, Multi-Caliber, Long-Range Rocket Launcher System है, जिसे पुणे स्थित NIBE लिमिटेड ने इज़राइल की एल्बिट सिस्टम्स के सहयोग से विकसित किया है। यह Elbit के PULS (Precise & Universal Launching System) आर्किटेक्चर पर आधारित है, जो 150 किलोमीटर और 300 किलोमीटर तक बेहद सटीक हमले करने में सक्षम है।

    सूर्यास्त्र की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
    सूर्यास्त्र की टेस्टिंग में 5 मीटर से भी कम CEP (Circular Error Probable) की सटीकता दिखाई गई है, जो इसे दुश्मन के एयरबेस, रडार, कमांड सेंटर और मिसाइल ठिकानों के लिए घातक बनाती है।इसके अलावा, यह सिस्टम 100 किलोमीटर तक लोइटरिंग मिशन भी चला सकता है, जिससे दुश्मन के रडार और सुरक्षा नेटवर्क को चकमा देना आसान हो जाता है।

    मल्टी-कैलिबर क्षमता: एक ही लॉन्चर, कई रॉकेट
    सूर्यास्त्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी मल्टी-कैलिबर क्षमता है।
    यानी एक ही लॉन्चर से अलग-अलग प्रकार के रॉकेट और गाइडेड म्यूनिशन दागे जा सकते हैं, जिससे ऑपरेशनल लचीलापन बढ़ता है और लॉजिस्टिक बोझ कम होता है।
    यह सिस्टम BEML के हाई मोबिलिटी व्हीकल (HMV) पर स्थापित है, जिससे यह तेजी से स्थान बदलकर सुरक्षित स्थिति में आ सकता है।

    कराची, लाहौर, पिंडी… सब पर सूर्यास्त्र का साया
    रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सूर्यास्त्र से भारत की डीप-स्ट्राइक डिटरेंस क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ है।
    अब पाकिस्तान के बड़े शहर कराची, लाहौर, रावलपिंडी जैसी जगहें भी भारत की सीधी पहुंच में आ गई हैं।
    सूर्यास्त्र के एक सटीक हमले से दुश्मन के लिए दोपहर 12 बजे भी ‘सूरज डूब’ सकता है—यह भारत की नई रणनीतिक गहराई का प्रतीक माना जा रहा है।

    गणतंत्र दिवस पर दिखेंगे और कई आधुनिक हथियार
    गणतंत्र दिवस परेड में सूर्यास्त्र के अलावा ब्रह्मोस, आकाश मिसाइल सिस्टम, MRSAM, ATAGS, धनुष तोप, शक्तिबान जैसे कई आधुनिक हथियार भी दिखेंगे।
    साथ ही इस बार चार जांस्कर पोनी, दो बैक्ट्रियन ऊंट, शिकारी पक्षी और सेना के कुत्ते भी पहली बार परेड में नजर आएंगे।
    आज कर्तव्य पथ पर जब सूर्यास्त्र की झलक दिखेगी, तो यह सिर्फ एक हथियार नहीं बल्कि भारत की नई सैन्य ताकत और आत्मविश्वास का प्रतीक होगा।
    यह सिस्टम न सिर्फ दुश्मन को दूर से मारने की क्षमता देता है, बल्कि भारतीय सेना की मोबिलिटी और फ्लेक्सिबिलिटी को भी बढ़ाता है।
    विशेषज्ञों का मानना है कि सूर्यास्त्र ने भारत की रणनीतिक गहराई को मजबूत कर दिया है और पाकिस्तान के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि भारत अब डिफेंसिव नहीं, बल्कि ऑफेंसिव डीप-स्ट्राइक में भी सक्षम हो गया है।

  • पाकिस्तान ही नहीं, इस देश में भी घुसी थी इंडियन आर्मी: पलक झपकते ही 9 उग्रवादियों का ‘खातमा’, अब आधिकारिक खुलासा

    पाकिस्तान ही नहीं, इस देश में भी घुसी थी इंडियन आर्मी: पलक झपकते ही 9 उग्रवादियों का ‘खातमा’, अब आधिकारिक खुलासा



    नई दिल्ली। भारत की सीमापार आतंकवाद विरोधी रणनीति ने एक बार फिर सबको चौंका दिया है। पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद अब म्यांमार में भारतीय सेना द्वारा किए गए covert operation का औपचारिक खुलासा हुआ है। इस ऑपरेशन में 9 उग्रवादी मार गिराए गए और एक बड़े आतंकवादी ठिकाने को ध्वस्त कर दिया गया था।
    77वें गणतंत्र दिवस पर शौर्य चक्र से हुआ खुलासा
    77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे आदित्य श्रीकुमार को शौर्य चक्र से सम्मानित किया। शौर्य चक्र से जुड़े आधिकारिक प्रशस्ति पत्र (Citation) में पहली बार जुलाई 2025 में म्यांमार के अंदर की गई एक गोपनीय सैन्य कार्रवाई का औपचारिक उल्लेख किया गया।

    इस ऑपरेशन को 11 से 13 जुलाई 2025 के बीच भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र में अंजाम दिया गया बताया गया है।

    Citation के अनुसार, लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे के नेतृत्व में सटीक और तेज कार्रवाई में एक मजबूत आतंकवादी ठिकाना नष्ट किया गया और 9 हथियारबंद कैडर को मार गिराया गया। इनमें एक वरिष्ठ नेता भी शामिल था।

    किस संगठन को निशाना बनाया गया?
    सेना ने ऑपरेशन के स्थान और लक्ष्य संगठन का नाम सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन यह घटनाक्रम जुलाई 2025 में सामने आए दावों से मेल खाता है।

    उस समय प्रतिबंधित ULFA-I (United Liberation Front of Asom – Independent) ने दावा किया था कि म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र में उसके तीन शीर्ष नेताओं को ड्रोन और मिसाइल हमलों में मारा गया था।

    संगठन ने आरोप लगाया था कि भारतीय सेना ने उसके मोबाइल शिविरों को निशाना बनाया था।

    इसी दौरान भारत की ओर से इस तरह की किसी कार्रवाई से इनकार किया गया था, जबकि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी स्पष्ट किया था कि राज्य पुलिस इस कार्रवाई में शामिल नहीं थी।

    ऑपरेशन की खासियत: सटीक, सीमित और गोपनीय
    शौर्य चक्र साइटेशन में ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखते हुए कहा गया कि लक्ष्य एक राष्ट्रविरोधी संगठन के शिविर थे।

    Citation में लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे की रणनीतिक सूझबूझ, नेतृत्व क्षमता और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता की सराहना की गई।सेना का कहना है कि मिशन बिना किसी नुकसान के सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

    क्या यह भारत की नई सीमा-पार नीति का संकेत है?
    रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस खुलासे से भारत की सीमापार आतंकवाद विरोधी रणनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है। पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों पर शिकंजा कसने की कोशिशें तेज हुई हैं और यह ऑपरेशन इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    हालांकि सरकार और सेना ऐसे अभियानों पर आम तौर पर सीमित जानकारी साझा करती हैं, लेकिन इस सम्मान के जरिए पहली बार इस ऑपरेशन की पुष्टि हो सकी है।

    यह मामला भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में सटीक, सीमित और गोपनीय ऑपरेशन की भूमिका को रेखांकित करता है। सीमा पार सक्रिय आतंकवादी ढांचों को कमजोर करना, बिना किसी बड़े कूटनीतिक तनाव के और इस मिशन की सफलता ने भारतीय सेना की तैयारी, रणनीति और साहस को फिर से साबित कर दिया है।

  • गणतंत्र दिवस परेड की शुरुआत स्वदेशी तोपों की सलामी के साथ

    गणतंत्र दिवस परेड की शुरुआत स्वदेशी तोपों की सलामी के साथ

    नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस समारोह में इस वर्ष स्वदेशी रक्षा उपकरणों की बेहतरीन झलक देखने को मिली। गणतंत्र दिवस परेड की शुरुआत भी स्वदेशी तोपों की सलामी के साथ हुई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कर्तव्य पथ से गणतंत्र दिवस समारोह का नेतृत्व किया।

    इस दौरान यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित रहीं। कर्तव्य पथ पर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के 150 वर्ष, भारत की अभूतपूर्व प्रगति, मजबूत सैन्य शक्ति, व समृद्ध सांस्कृतिक विविधता देखने को मिली।

    कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के दौरे से हुई। यहां उन्होंने माल्यार्पण करके अपने प्राण न्योछावर करने वाले राष्ट्र नायकों को श्रद्धांजलि दी। वहीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष के साथ ‘पारंपरिक बग्गी’ में कर्तव्य पथ पर आईं। उनके साथ राष्ट्रपति के अंगरक्षक थे जो भारतीय सेना की सबसे वरिष्ठ रेजिमेंट है। परंपरा के अनुसार कर्तव्य पथ पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इसके बाद 105 एमएम लाइट फील्ड गन से 21 तोपों की सलामी दी गई। यह देश में बना तोपखाना हथियार सिस्टम है।

    वहीं पहले 21 तोपों की सलामी के लिए ब्रिटिश काल की 25 पाउंडर तोपों का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अब बीते कुछ समय से 172 फील्ड रेजिमेंट की 1721 सेरेमोनियल बैटरी 21 तोपों की सलामी दे रही है। दरअसल गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्रीय ध्वज को 21 तोपों की सलामी देना एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक परंपरा है। इस परंपरा के तहत गणतंत्र दिवस पर 21 तोपों की सलामी के लिए 105 मिमी लाइट फील्ड गन का उपयोग किया गया। गौरतलब है कि यह भारत में ही बनी एक पूर्णत स्वदेशी तोप प्रणाली है। यह प्रणाली आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भारत की रक्षा निर्माण क्षमता को प्रदर्शित करती है।

    रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक 105 मिमी लाइट फील्ड गन के प्रयोग से न केवल पुरानी परंपरा को आधुनिक स्वरूप मिला है, बल्कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के सशक्त होने का संदेश गया है। यह स्वदेशी रक्षा प्रणालियों पर भारतीय सेना के बढ़ते विश्वास का भी प्रतीक है। राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिया जाने वाला 21 तोपों का सलामी समारोह भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज को प्रदान किया जाने वाला सर्वोच्च सैन्य सम्मान है। यह सलामी कर्तव्य पथ के लॉन से दी जाती है।

    भारतीय सेना द्वारा संचालित इस समारोह का प्रत्येक क्षण अत्यंत अनुशासन, सटीकता और गरिमा का प्रतीक होता है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह सलामी कर्तव्य पथ के लॉन से दी गई। 21 तोपों की यह सलामी भारत की सैन्य परंपराओं की निरंतरता को दर्शाती है। इसके साथ ही यह आधुनिक, सक्षम और आत्मनिर्भर भारतीय सेना की सशक्त छवि को भी राष्ट्र और विश्व के समक्ष प्रस्तुत करती है। इसके उपरांत ‘विविधता में एकता’ थीम पर 100 सांस्कृतिक कलाकार परेड की शुरुआत करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर हुए। यह म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स का शानदार प्रदर्शन रहा।

    इस दृश्य ने देश की एकता और समृद्ध सांस्कृतिक विविधता को दर्शाया। वहीं 129 हेलीकॉप्टर यूनिट के चार एमआई-17 हेलीकॉप्टर ध्वज फॉर्मेशन में फूलों की पंखुड़ियों की बारिश करते हुए कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े। राष्ट्रीय ध्वज को लेकर, हेलीकॉप्टरों के इस फॉर्मेशन का नेतृत्व ग्रुप कैप्टन आलोक अहलावत ने किया। इसके बाद राष्ट्रपति के सलामी लेने के साथ परेड शुरू हुई।

    दिल्ली क्षेत्र के जनरल ऑफिसर कमांडिंग परेड कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल भवनीश कुमार ने परेड की कमान संभाली। वह दूसरी पीढ़ी के अधिकारी हैं। मुख्यालय दिल्ली क्षेत्र के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल नवराज ढिल्लों परेड के सेकंड-इन-कमांड थे। वह तीसरी पीढ़ी के सेना अधिकारी हैं। इसके बाद सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों के गर्वित विजेता आए। इनमें परमवीर चक्र विजेता – सूबेदार मेजर (मानद कैप्टन) योगेंद्र सिंह यादव (रिटायर्ड) और सूबेदार मेजर संजय कुमार – और अशोक चक्र विजेता – मेजर जनरल सीए पिथावालिया (रिटायर्ड) और कर्नल डी श्रीराम कुमार शामिल थे।

  • गणतंत्र दिवस पर नई उड़ान: लद्दाख स्काउट्स भारत में आइस हॉकी को नई पहचान दिलाने को तैयार

    गणतंत्र दिवस पर नई उड़ान: लद्दाख स्काउट्स भारत में आइस हॉकी को नई पहचान दिलाने को तैयार

    नई दिल्ली। देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ते भारत में आइस हॉकी का खेल भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसके केंद्र में है इंडियन आर्मी की विशेष माउंटेन इन्फेंट्री रेजिमेंट लद्दाख स्काउट्स। बर्फ से ढके पहाड़ों और कठिन परिस्थितियों में देश की रक्षा करने वाली यह रेजिमेंट भारत में आइस हॉकी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही है।

    इस समय 2026 खेलो इंडिया विंटर गेम्स के छठे संस्करण का पहला चरण लेह (लद्दाख) में खेला जा रहा है। आइस हॉकी और आइस स्केटिंग जैसे खेलों में देश के बेहतरीन एथलीट हिस्सा ले रहे हैं। एक बार फिर, इन खेलों में लद्दाख स्काउट्स के प्रतिनिधि, यानी आर्मी की टीम, शानदार प्रदर्शन करते हुए अजेय नजर आ रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर आर्मी टीम पुरुषों के फाइनल में चंडीगढ़ से भिड़ेगी।

    लद्दाख स्काउट्स का असली योगदान सिर्फ पदक जीतने तक सीमित नहीं है। आइस रिंक के बाहर उनकी सोच और कोशिशें कहीं ज्यादा अहम हैं। उनका सपना है कि आइस हॉकी को केवल लेह और लद्दाख तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे देश के मैदानों और तटीय इलाकों तक पहुंचाया जाए। वे चाहते हैं कि यह खेल पूरे भारत में पहचाना जाए और युवाओं के लिए एक नया विकल्प बने।

    माना जाता है कि लद्दाख स्काउट्स ने 1970 के दशक के आखिर में आइस हॉकी खेलना शुरू किया था। उस समय न तो सही सतह थी और न ही आधुनिक उपकरण। सैनिक बर्फ पर फिसलते हुए इस खेल का आनंद लेते थे। 1980 के दशक के अंत में उन्होंने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया। इस खेल के लिए जरूरी संसाधन विकसित किए गए और महंगे उपकरण मंगाए गए।

    साल 2000 में जब लद्दाख स्काउट्स को एक पूर्ण इन्फेंट्री रेजिमेंट का दर्जा मिला, तब आइस हॉकी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और भी बढ़ गई। आज भारत में सिर्फ दो ओलंपिक-साइज आर्टिफिशियल आइस रिंक हैं एक देहरादून में और दूसरा लेह के इनडोर नवांग दोरजे स्टोबदान स्टेडियम में।

    2026 खेलो इंडिया विंटर गेम्स में हिस्सा ले रही आर्मी टीम के कप्तान पार्थ जगताप मानते हैं कि आइस हॉकी को लोकप्रिय बनाने के लिए देशभर में और रिंक बनाने की जरूरत है। उनके मुताबिक, अभी यह खेल ज्यादातर लेह तक सीमित है और अगर इसे आगे बढ़ाना है तो बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की जरूरत होगी। उन्होंने खेलो इंडिया पहल की तारीफ करते हुए कहा कि मीडिया कवरेज और सरकारी सहयोग से इस खेल के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ी है।

    पिछले साल लद्दाख स्काउट्स की ओर से भारतीय महिला आइस हॉकी टीम को आखिरी समय में दी गई फंडिंग बेहद अहम साबित हुई। इसी मदद से भारतीय महिला टीम ने यूएई में आयोजित आईआईएचएफ महिला एशिया कप में अपना पहला ब्रॉन्ज मेडल जीता।

    आइस हॉकी का खेल महंगा है। पूरे आइस हॉकी गियर की कीमत चार लाख रुपये तक हो सकती है। आइस रिंक बनाना बेहद महंगा है। एक साधारण रिंक पर करीब 15 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। यही इस खेल की सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में इस खेल को देश में विकसित करने में कॉर्पोरेट जगत की भूमिका अहम हो जाती है।

    लद्दाख स्काउट्स ने इस दिशा में पहल करते हुए कॉर्पोरेट सहयोग का विचार भी रखा है। सैनिक सिर्फ सीमाओं की रक्षा ही नहीं करते, बल्कि कई बार वे समाज के लिए ऐसी जिम्मेदारियां भी उठा लेते हैं, जो उनकी ड्यूटी से कहीं आगे होती हैं। आइस हॉकी इसका बेहतरीन उदाहरण है।

  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कर्तव्य पथ पर ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को किया अशोक चक्र से सम्मानित

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कर्तव्य पथ पर ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को किया अशोक चक्र से सम्मानित

    नई दिल्ली।  भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को देश के सर्वोच्च शांति कालीन वीरता सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कर्तव्य पथ पर आयोजित 77वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।

    शुभांशु शुक्ला ने एक्सिओम-4 मिशन के तहत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की यात्रा की और 2025 में अपनी स्पेस फ्लाइट पूरी की थी। विंग कमांडर राकेश शर्मा के बाद वह अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय अंतरिक्ष यात्री बने थे।

    इस मिशन के दौरान उन्होंने असाधारण साहस, त्वरित निर्णय क्षमता और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण का परिचय दिया, जिसके लिए उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान मिला है।

    अंतरिक्ष में अपने प्रवास के दौरान शुक्ला ने कई वैज्ञानिक प्रयोग किए और कृषि से जुड़े परीक्षण भी किए। उन्होंने अंतरिक्ष में मेथी और मूंग के बीज को सफलतापूर्वक उगाया, जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि उनका यह सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा और यह संदेश देगा कि मजबूत इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के साथ कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। उनकी पेशेवर दक्षता, नेतृत्व क्षमता और शांत निर्णय लेने की कला को इस सम्मान के जरिए सराहा गया है।

    इस उपलब्धि को भारतीय वायुसेना और पूरे देश के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। उनका साहस और समर्पण युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

    इससे पहले, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश की रक्षा में असाधारण साहस, कर्तव्यनिष्ठा और बलिदान दिखाने के लिए 70 सशस्त्र बलों के जवानों को वीरता पुरस्कार देने की मंजूरी दी है। इनमें से छह पुरस्कार मरणोपरांत दिए जाएंगे।

    वीरता पुरस्कारों में एक अशोक चक्र, तीन कीर्ति चक्र, 13 शौर्य चक्र (एक मरणोपरांत), एक बार टू सेना मेडल (वीरता), 44 सेना मेडल (वीरता) (पांच मरणोपरांत), छह नौसेना मेडल (वीरता), और दो वायुसेना मेडल (वीरता) शामिल हैं।

    इसके अलावा, ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालकृष्णन नायर को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया जाएगा। वे एक प्रतिष्ठित फाइटर टेस्ट पायलट हैं और भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ के लिए चुने गए चार अंतरिक्ष यात्रियों में शामिल हैं। उनके नाम 3,000 घंटे से अधिक की उड़ान का अनुभव दर्ज है और वे 2019 से इसरो के साथ गगनयान कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण ले रहे हैं।

  • सविता पुनिया और बलदेव सिंह को पद्मश्री मिलने पर हॉकी इंडिया ने दी बधाई

    सविता पुनिया और बलदेव सिंह को पद्मश्री मिलने पर हॉकी इंडिया ने दी बधाई

    नई दिल्ली। हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की ने कहा, “सविता और बलदेव सिंह को पद्मश्री मिलना पूरी हॉकी बिरादरी के लिए बहुत गर्व की बात है। सविता ने विश्व हॉकी में गोलकीपिंग के स्तर को फिर से तय किया है और भारतीय महिला टीम के लिए हर तरह से एक स्टार रही हैं। 300 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच हासिल करना उनके बेहतरीन काम के बारे में बहुत कुछ बताता है। एक खिलाड़ी और कोच के तौर पर बलदेव सिंह की विरासत बेमिसाल है। भारतीय हॉकी खिलाड़ियों की कई पीढ़ियों को उनके ज्ञान, अनुशासन और विजन से फायदा हुआ है।”

    हॉकी इंडिया के सचिव भोला नाथ सिंह ने कहा, “सविता का सफर लगन और मेहनत की ताकत दिखाता है, और उनकी उपलब्धियां देश भर के युवा एथलीटों को प्रेरित करती रहती हैं। बलदेव ने अपनी जिंदगी प्रतिभा को निखारने और भारतीय हॉकी को जमीनी स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बनाने में लगा दी है। यह सम्मान पूरी तरह से उनके लायक है और खेल के लिए दशकों की बिना किसी स्वार्थ के सेवा को पहचान देता है।”

    भारतीय महिला हॉकी का बड़ा नाम सविता ने 20 साल की उम्र में डेब्यू किया था। 2025 में, वह पीआर श्रीजेश के बाद 300 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाली दूसरी भारतीय गोलकीपर बनी। उन्होंने टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत के ऐतिहासिक चौथे स्थान पर रहने में भी अहम योगदान दिया। रियो ओलंपिक 2016 और 2018 हॉकी विमेंस विश्व कप के दौरान गोलकीपर के तौर पर उनका अनुभव और मौजूदगी अहम रही।

    भारत की विमेंस हॉकी टीम की पूर्व कप्तान सविता ने टीम को कई बड़ी सफलताएं दिलाई हैं। बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में ब्रॉन्ज पदक जीतना और एफआइएच नेशंस कप में जीत पक्की करना इसमें अहम है। उनकी लीडरशिप में भारत ने 2023 और 2024 में विमेंस एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में लगातार गोल्ड मेडल जीते, जिससे पूरे एशिया में टीम का बढ़ता दबदबा दिखा।

    2018 में, सविता को उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्हें 2022 और 2023 में दो बार प्लेयर ऑफ द ईयर के लिए हॉकी इंडिया बलबीर सिंह सीनियर अवॉर्ड भी मिला है। गोलकीपर के तौर पर उनके शानदार स्किल्स ने उन्हें लगातार तीन सीजन 2020–21, 2021–22, और 2022–23 के लिए एफआइएच गोलकीपर ऑफ द ईयर अवॉर्ड दिलाया है।

    बलदेव सिंह को एक हॉकी खिलाड़ी और कोच के तौर पर उनके यादगार योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। उन्होंने 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक्स में भारत के लिए हिस्सा लिया था। वह तीन हॉकी विश्व कप 1971 में बार्सिलोना, जहां भारत ने ब्रॉन्ज मेडल जीता, 1973 में एम्स्टर्डम, जहां सिल्वर मेडल जीता, और 1978 में ब्यूनस आयर्स में हिस्सा ले चुके हैं। इसके अलावा, वह 1970 और 1974 में एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीतने वाली भारतीय टीमों का हिस्सा थे।

    खिलाड़ी के तौर पर रिटायर होने के बाद, बलदेव सिंह कोच बन गए। उन्होंने ओलंपिक मेडलिस्ट और पूर्व ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह, भारतीय महिला टीम की पूर्व कैप्टन रानी रामपाल, दीदार सिंह, संजीव कुमार डांग, हरपाल सिंह, और नवजोत कौर जैसे बड़े और सफल खिलाड़ियों को कोचिंग दी है। उन्हें 2009 में द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।