Category: National

  • गणतंत्र दिवस पर पिछले 16 सालों में कौन-कौन से राज्य रहे झांकी के विजेता, जानिए कैसे होता है चयन ?

    गणतंत्र दिवस पर पिछले 16 सालों में कौन-कौन से राज्य रहे झांकी के विजेता, जानिए कैसे होता है चयन ?

    नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस की झांकियां भारत के राष्ट्रीय उत्सव में एक खास जगह रखती हैं। हर भारतीय के बचपन की यादें समेटे हुए यह परेड श की एक बदलती हुई कहानी दिखाती है। 1952 में कल्चरल झांकियां शुरू की गईं, जिससे परेड में गर्व और अनेकता की भावना का एक नया पहलू जुड़ा।

    सांस्कृतिक झांकियों की शुरुआत असल में “विविधता में एकता” के तहत हुई थी। शुरुआती परेड में साधारण झांकियां होती थीं जिनमें फ्लैटबेड ट्रकों पर क्षेत्रीय हस्तशिल्प और लोक कलाकार होते थे। धीरे-धीरे समय के साथ झांकियों की झलक भी बदलती गई। आज हम यहां पिछले 16 सालों में जो झांकियां विजेता रहीं, उनकी बात करेंगे।

    उत्तर प्रदेश, महाकुंभ 2025
    इस झांकी ने महाकुंभ मेले का एक शानदार नजारा पेश किया था। इसमें ‘समुद्र मंथन’, ‘अमृत कलश’ और संगम के किनारे पवित्र स्नान करते साधु-संतों को दिखाकर आध्यात्मिक भव्यता को दर्शाया गया था। इसमें ‘विरासत’ और ‘विकास’ के लाक्षणिक संगम को भी दिखाया गया था।
    ओडिशा, महिला सशक्तिकरण और रेशम 2024

    झांकी में पट्टाचित्र कला रूप दिखाया गया था और राज्य की हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पर जोर दिया गया था। इसकी बारीक हाथ से बनी डिटेल्स और पारंपरिक नर्तकियों की लाइव परफॉर्मेंस के लिए इसकी खूब तारीफ हुई।
    उत्तराखंड, मानसखंड 2023

    इस झांकी में घने देवदार के जंगलों के बीच जागेश्वर धाम को दिखाया गया था। यह कर्तव्य पथ पर शांत, ‘देवभूमि’ का माहौल लाने के लिए खास थी।

    उत्तर प्रदेश, अयोध्या और राम मंदिर 2021
    इसमें बन रहे राम मंदिर का एक भव्य मॉडल दिखाया गया था। इसमें दीपोत्सव की झलकियां और रामायण महाकाव्य की अलग-अलग कहानियों के साथ-साथ ऋषि वाल्मीकि की एक विशाल मूर्ति भी दिखाई गई थी।

    असम, भोरताल नृत्य और हस्तशिल्प 2020
    इस झांकी को भोरताल नृत्य और राज्य के बांस और बेंत की कारीगरी पर फोकस करके दिखाया गया था। झांकी पर कलाकारों द्वारा मंजीरों की लयबद्धता से एक अनोखा अनुभव हुआ।
    त्रिपुरा 2019

    इस झांकी में गांधीवादी तरीके से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनता हुआ दर्शाया गया था।
    महाराष्ट्र 2018

    इस झांकी में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज तिलक को दर्शाया गया था।
    अरुणाचल प्रदेश 2017

    इस झांकी में मोनपास के याक डांस को दर्शाया गया।

    पश्चिम बंगाल 2016

    इस झांकी में भटके हुए जोगियों को दर्शाया गया।
    महाराष्ट्र 2015

    इस झांकी की थीम वारी से पंढर पुर थी।
    पश्चिम बंगाल 2014

    इस झांकी की थीम पुरुलिया छऊ नृत्य थी।
    केरल 2013

    इसने “गॉड्स ओन कंट्री” की प्राकृतिक सुंदरता को वहां के लोगों की आजीविका के साथ खूबसूरती से बैलेंस किया, जिसमें एक विशाल हाउस-बोट (केट्टुवल्लम) का रेप्लिका दिखाया गया था।
    एचआरडी मंत्रालय 2012

    इस झांकी थीम साक्षर भारत थी।
    दिल्ली 2011

    इस झांकी की थीम सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव थी।
    संस्कृति मंत्रालय, 2010

    इस झांकी थीम भारतीय संगीत वाद्ययंत्र थी।

  • महिला गिग वर्कर्स की हड़ताल! आज ऑनलाइन हड़ताल, सब कुछ बंद

    महिला गिग वर्कर्स की हड़ताल! आज ऑनलाइन हड़ताल, सब कुछ बंद


    नई दिल्‍ली। गिग और प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले कर्मचारियों ने अपने अधिकार और सुरक्षा की मांग को लेकर पूरे देश में आंदोलन करने का ऐलान किया है। गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन के अनुसार, कर्मचारी 26 जनवरी 2026 को ऐप बंद करके ऑनलाइन हड़ताल करेंगे। इसके बाद 3 फरवरी 2026 को सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया जाएगा। बड़ी संख्या में महिला गिग वर्कर्स इस आंदोलन की अगुवाई करेंगी।

    यूनियन के मुताबिक, देश में लाखों गिग वर्कर्स अलग-अलग ऐप कंपनियों से जुड़े हुए हैं। ये लोग फूड डिलीवरी, घरेलू काम से लेकर लॉजिस्टिक्स तक कई क्षेत्रों में काम करते हैं। इसके बावजूद उन्हें अब तक श्रमिक का दर्जा नहीं मिला है।

    उन्हें हमेशा कमाई की अनिश्चितता और कंपनियों की मनमानी नीतियों का सामना करना पड़ता है।
    सबसे ज्यादा महिला वर्कर्स के सामने चुनौतियां
    यूनियन के अनुसार, महिला कर्मचारियों का कहना है कि जब वे ऐसी समस्याओं की शिकायत कंपनियों से करती हैं, तो उन्हें अक्सर सही और संतोषजनक जवाब नहीं मिलता। कई बार शिकायत करने के बाद उनकी आईडी ही बंद कर दी जाती है, जिससे उनकी रोजी-रोटी छिन जाती है।
    गिग वर्कर्स की सबसे बड़ी शिकायत मनमाने तरीके से आईडी ब्लॉक किया जाना शामिल है। उनका कहना है कि बिना स्पष्ट कारण उन्हें काम से हटा दिया जाता है। इस वजह से उनकी आय अचानक बंद हो जाती है और परिवार की आजीविका संकट में पड़ जाती है।

    यूनियन का कहना है कि कंपनियों द्वारा अपनाए जा रहे ऑटो असाइन सिस्टम, रेटिंग सिस्टम और बंडल बुकिंग जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शी नहीं हैं और इनके जरिए श्रमिकों पर अतिरिक्त दबाव बनाया जाता है। इसके अलावा, आय दरों में लगातार कटौती और जुर्मानों की वजह से आमदनी पहले से भी अस्थिर हो गई है।

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    रायपुर। यह खबर वाकई चौंकाने वाली है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादी प्रभाव से मुक्त हुए 41 गांवों में गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली बार तिरंगा फहराया जाएगा। यह कदम ‘लाल आतंक’ के अंत की लड़ाई में मिली सफलता को साफ तौर पर दर्शाती है। साथ ही यह खबर शांति एवं विकास का संकेत भी देती है।
    पुलिस महानिरीक्षक (आईजी), बस्तर रेंज, सुंदरराज पी ने बताया कि इन 41 गांवों में से 13 गांव बीजापुर जिले में, 18 नारायणपुर में और 10 सुकमा में हैं।
    गणतंत्र दिवस पूरे जोश से मनाने की तैयारी

    उन्होंने कहा, ‘‘बस्तर मंडल के 41 गांवों में पहली बार 77वां गणतंत्र दिवस पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। ये गांव दशकों से इस तरह के राष्ट्रीय समारोहों से दूर रहे थे, लेकिन अब देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक भावना में वे एक्टिव होकर भाग ले रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में इन जगहों पर सुरक्षा शिविरों की स्थापना ने स्थानीय आबादी के बीच विश्वास, सुशासन और अपनेपन की भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई है।

    धीरे-धीरे स्थापित हो रही है शांति

    आईडी सुंदरराज पी ने कहा, ‘‘सुरक्षा बलों के निरंतर प्रयासों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से यह सकारात्मक परिवर्तन संभव हो पाया है। पिछले वर्ष 13 गांवों में 15 अगस्त को पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। अब, इन 13 गांवों सहित कुल 54 गांव पहली बार गणतंत्र दिवस मनाएंगे।” सुंदरराज ने कहा कि अबूझमाड़, राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र आदि में बसवराजु, के रामचंद्र रेड्डी, सुधाकर, कट्टा सत्यनारायण रेड्डी और अन्य माओवादी कैडर को निष्क्रिय करने से क्षेत्र में चरमपंथी प्रभाव काफी कमजोर हो गया है। नक्सलियों की ताकत और उनके प्रभाव कमजोर होने से भय और धमकी की जगह धीरे-धीरे शांति, विकास और प्रशासनिक संपर्क स्थापित हो रहे हैं।
    रायपुर में राज्यपाल फहराएंगे तिरंगा

    इस बीच, एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि राज्य भर में गणतंत्र दिवस समारोह की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि राज्यपाल रमन डेका सोमवार सुबह रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे और विभिन्न सुरक्षा इकाइयों से ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (सलामी गारद) लेंगे, जबकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साई बिलासपुर जिले में तिरंगा फहराएंगे।

  • UGC बिल 2026 बना विवाद की वजह! सवर्ण समाज का विरोध, बृजभूषण शरण सिंह के बयान के 5 बड़े पॉइंट

    UGC बिल 2026 बना विवाद की वजह! सवर्ण समाज का विरोध, बृजभूषण शरण सिंह के बयान के 5 बड़े पॉइंट


    नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( UGC ) की ओर से लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम- 2026’ को लेकर विवाद गहरा गया है। उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक विवाद की गूंज सुनाई दे रही है। सवर्ण समाज इस बिल के विरोध में खड़ा हो गया है। समानता को बढ़ावा देने और जातीय भेदभाव को खत्म करने वाले कानून को बड़े स्तर असमानता का कानून होने की दलील दी जा रही है। इसको लेकर लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा में पेपर लीक का मामला ऐसा गरमाया था, युवा वर्ग नाराज हो गया।

    युवाओं की नाराजगी का खामियाजा उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को चुनावी रिजल्ट में भुगतना पड़ा। युवा वर्ग को नाराज करने का जोखिम सरकार लेने के मूड में नहीं दिख रहा है। वहीं, कानून को लेकर जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि अभी इसका अध्ययन कर रहा हूं। जो बोलूंगा, सोच-समझकर बोलूंगा। इससे साफ है कि सीनियर भाजपा नेता भी इस मामले में कोई भी बयान देने से बचते दिख रहे हैं।
    1. क्यों हो रहा है विरोध?
    यूजीसी की ओर से यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर जातीय भेदभाव को खत्म करने के लिए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू किया गया हैं। 15 जनवरी 2026 से यह रेगुलेशन पूरे देश में यूजीसी से संबद्ध सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों प्रभावी हुआ है। सवर्ण समाज से जुड़े संगठनों और समूहों ने इसके लागू होने के बाद ही विरोध शुरू किया था। दरअसल, नए रेगुलेशन में ओबीसी को भी जातीय भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया।

    एससी और एसटी छात्रों को पहले से ही कई अधिकार मिले हुए थे। वे भी इस दायरे में आ गए हैं। नए कानून के तहत इनके साथ-साथ ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायत सक्षम पदाधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकते हैं।

    2. नए कोषांग के गठन के निर्देश
    यूजीसी ओर से लागू किए गए रेगुलेशन के तहत यूनिवर्सिटी और कॉलेज स्तर पर नए कोषांग का गठन किया जाना है। समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन हर संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी छात्र, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों के लिए किया जाना है। यूनिवर्सिटी लेवल पर समानता समिति होगी। इसमें एससी, एसटी के साथ-साथ ओबीसी, महिला और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिध सदस्य के तौर पर शामिल किए जाने हैं। हर छह माह में यह समिति रिपोर्ट तैयार कर यूजीसी को भेजेगी। इसके आधार पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज की स्थिति को मापा जाएगा।

    3. सवर्ण समाज का विरोध क्यों?
    मामले में सवर्ण समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस कानून में कोई भी एससी, एसटी, ओबीसी छात्र, शिक्षक या शिक्षकेतर कर्मचारी हमारे खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। इसके बाद हमें अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। बड़े स्तर पर इस नियम का दुरुपयोग किया जा सकता है। विश्वविद्यालयों में कुलपति और कॉलेजों में प्राचार्य सभी छात्रों की शिकायतों पर जब सुनवाई करते हैं तो फिर नई व्यवस्था से असमानता ही फैलेगी। सवर्ण वर्ग को अलग-थलग किए जाने की साजिश के तौर पर इस कानून को पेश किया जा रहा है।

    सवर्ण समाज की ओर से अपनी बात को उठाने के लिए यूनवर्सिटी स्तर पर फोरम तैयार किए गए हैं। इन फोरम का कहना है कि ओबीसी को यूनवर्सिटी में एडमिशन में आरक्षण 1990 से मिल रहा है। फैकल्टी नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था वर्ष 2010 से है। ऐसे में नए कानून से सवर्ण समाज को और अधिक दबाने की कोशिश की जा रही है।

    4. यति नरसिंहानंद से गरमाया विवाद
    मामले को लेकर पिछले दिनों डासना देवी मंदिर के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने की योजना बनाई। इसके लिए वे लाव-लश्कर के साथ गाजियाबाद से निकले तो दिल्ली बॉर्डर पर उन्हें रोक दिया गया। उन्होंने इस मुद्दे पर कहा कि हर वर्ग की बात हो रही है, लेकिन ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार और अन्य सवर्ण समाज के लोगों की बात क्यों नहीं की जा रही। उनके हितों की बात कहां होगी। अगर उनके साथ कुछ गलत होता है तो वे कहां पर शिकायत करेंगे। इस प्रकार के कानून उच्च शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक माहौल को खराब करेंगे।

    5. कानून वापस लिए जाने की चर्चा
    यूजीसी कानून का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनावी साल से पहले विरोध को गहराता देख अब यूजीसी के स्तर पर इस कानून को लेकर विचार होने की बात कही जा रही है। माना जा रहा है कि यूजीसी इस कानून को वापस ले सकता है। इसके कड़े विरोध ने सरकार को अपनी इस नीति पर दोबारा विचार करने को मजबूर किया है।

  • Republic Day Special: डेढ़ लीटर दूध के दाम में 10 ग्राम सोना! 76 सालों में कितना बदल गया भारत

    Republic Day Special: डेढ़ लीटर दूध के दाम में 10 ग्राम सोना! 76 सालों में कितना बदल गया भारत

    नई दिल्ली। आज अगर आपके गुल्लक में या आलमारी के किसी कोने में 25 पैसे का सिक्का है तो आप उससे कुछ नहीं खरीद सकते, लेकिन आजादी के समय, पहले गणतंत्र दिवस के समय आप इससे 1 लीटर दूध, 1 लीटर पेट्रोल भरवा सकते थे. जिसमें आज एक लीटर दूध मिलता है, उतने ही रुपये में आप आजादी के वक्त 10 ग्राम सोना खरीद सकते थे. जितने में आज एक लीटर दूध खरीदते हैं, उतने में 4 बार आप दिल्ली से मुंबई ट्रेन से सफर कर सकते थे. आबादी बढ़ी और साथ में महंगाई भी. अगर एक नजर साल 1950 से साल 2026 तक के सफर में डाले तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि महंगाई का आलम कितना है.

    साल 1950 से लेकर साल 2026 तक का सफर
    आजादी के समय देश की जनसंख्या सिर्फ 34 करोड़ थी. पहली बार जब 1951 में जनगणना हुई तो उस वक्त देश की आबादी 34 करोड़ से बढ़कर 36 करोड़ हो गई थी. आज भारत की आबादी 140 करोड़ के ऊपर पहुंच गई है. आबादी के साथ देश की अर्थव्यवस्था भी बढ़ी, देश की जीडीपी में विस्तार देखने को मिली. 1950 से लेकर अब तक भारत की जीडीपी 55 गुना से अधिक बढ़ चुकी है. 1950 में भारत की अर्थव्यवस्था करीब 2.7 लाख करोड़ की थी, जो साल 2026 में बढ़कर 4.51 ट्रिलियन पर पहुंच गई है

    1950 में कितने का था सोना-चांदी
    सोने-चांदी की बात करें तो भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था. लोगों के घरों में सोने-चांदी के जेवरों की ढ़ेर लगे थे. आज भी दुनिया के कई देशों की जीडीपी से ज्यादा सोना भारत के घरों में है, जो कई पीढ़ियों से चली आ रही है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक भारत के घरों में 25 हजार टन से ज्यादा सोना है. अगर कीमत की बात करें तो साल 1950 में भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर सोने की कीमत 99 रुपये प्रति 10 ग्राम थी. इससे पहले आजादी के वक्त 1947 में सोना मात्र 89 रुपये प्रति 10 ग्राम का बिक रहा था. आज साल 2026 में सोने की कीमत 155000 रुपये प्रति 10 ग्राम को पार कर गया है. चांदी की बात करें तो उस वक्त 1 किलो चांदी 100-159 रुपये में मिल जाती थी. 10 ग्राम चांदी के लिए के लिए 1 रुपये से 1.50 रुपये तक खर्च करना पड़ता था. आज उतनी ही चांदी खरीदने के लिए आपको साढ़े 3 लाख रुपये चाहिए.

    1950 से अब तक कितना महंगा हुआ तेल

    1950 से लेकर अब तक पेट्रोल की कीमत 300 गुना बढ़ चुकी है. 1951 के मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट के गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन डेटा के मुताबिक उस समय देश में 3 लाख गाड़ियां रजिस्टर्ड थीं. 1947 में पेट्रोल की कीमत 27 पैसे प्रति लीटर था, जो 1950 में 30 पैसे पर पहुंच गया था. आज 2026 में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत औसत रूप से 100 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गई है.

    76 सालों में रेल किराया कितना महंगा हुआ

    भारत में पहली ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को चली थी. 76 सालों में रेल यात्रियों की संख्या जिस तेजी से बढ़ी उतनी ही तेजी से रेल किराया भी. 1951 से लेकर अब तक रेल किराए में 30 गुना से अधिक बढ़ोतरी हुई. 1950-51 में रेलवे हर एक किमी पर 1.5 पैसा किराया वसूलती थी जो साल 2018-19 में बढ़कर 44 पैसे से ऊपर पहुंच गई. रेलवे ने हाल ही में प्रति किलोमीटर में रेल किराए में 2 पैसा प्रति किमी की बढ़ोतरी कर दी है.

    डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का हाल

    1947 में आजादी के वक्त 1 डॉलर की वैल्यू 1 रुपए के बराबर थी. साल 1950 में डॉलर के मुकाबले रुपया काफी मजबूत था और इसकी वैल्यूएशन $1 = ₹4.76 थी. आज डॉलर के मुकाबले रुपया 92 रुपये पर पहुंच गया है. कर्तव्य पथ बनेगा ‘पावर पथ’, 77वें गणतंत्र दिवस पर दुनिया देखेगी भारत के अर्जुन-ब्रह्मोस का दम

  • अटारी-वाघा बॉर्डर पर मिठास पर ब्रेक, भारत-पाक जवानों के बीच नहीं होगा मिठाई का आदान-प्रदान

    अटारी-वाघा बॉर्डर पर मिठास पर ब्रेक, भारत-पाक जवानों के बीच नहीं होगा मिठाई का आदान-प्रदान

    नई दिल्ली।  अटारी-वाघा बॉर्डर पर नहीं मिलेगी मिठास! भारत-पाक जवानों के बीच नहीं होगा मिठाई का आदान-प्रदान2019 में जम्मू और कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर युद्धविराम उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं के कारण भारत ने बीटिंग रिट्रीट परंपरा को छोड़ने का फैसला किया था. सितंबर 2016 में भारतीय सेना द्वारा सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक के बाद बीएसएफ ने पाकिस्तान रेंजर्स को मिठाइयां नहीं दी थीं.
    इस बार गणतंत्र दिवस के मौके पर वाघा बॉर्डर पर भारत और पाकिस्तान के बीच मिठाई एक्सचेंज करने की परंपरा नहीं निभाई जाएगी. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद से बने नियमों के तहत बीएसएफ (BSF) और पाक रेंजर्स के जवान न तो हाथ मिलाएंगे और न ही सरहद का गेट खोला जाएगा. बॉर्डर पर दोपहर 2.50 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे और शाम 4.30 बजे दोनों देशों के जवान अपने-अपने क्षेत्र में परेड करेंगे.

    कई बार तोड़ी गई मिठाई आदान-प्रदान की परंपरा
    जनवरी 2025 (गणतंत्र दिवस) यानी पिछले साल भी सीमा पर जारी घुसपैठ की कोशिशों और सुरक्षा कारणों से बीएसएफ (BSF) ने पाकिस्तान को मिठाई देने से मना कर दिया था. भारत द्वारा अनुच्छेद 370 (Article 370) को निष्प्रभावी किए जाने के बाद पाकिस्तान ने कड़ा विरोध जताया था. तनाव इतना अधिक था कि दोनों ओर से कोई मिठाई नहीं बांटी गई थी.

    जनवरी 2017 और 2018 में नियंत्रण रेखा (LoC) पर पाकिस्तान द्वारा लगातार किए जा रहे संघर्ष विराम उल्लंघन (Ceasefire Violations) और भारतीय सैनिकों की शहादत के विरोध में बीएसएफ ने परंपरा को तोड़ा था. वहीं अक्टूबर 2016 में उरी हमले के बाद भारत द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक (Surgical Strike) के कारण दिवाली के मौके पर मिठाई का आदान-प्रदान नहीं हुआ था. इसके अलावा अक्टूबर 2014 में दिवाली के दौरान सीमा पर भारी गोलाबारी के चलते बीएसएफ ने पाकिस्तान को मिठाई देने से इनकार कर दिया था.

    कहां है वाघा बॉर्डर
    बता दें कि अटारी-वाघा जॉइंट चेक पोस्ट अमृतसर से लगभग 30 किमी और पाकिस्तान के लाहौर से 22 किमी दूर है, जहां करीब 25,000 दर्शक बीटिंग रिट्रीट समारोह को देखने आते हैं.

  • बर्फीली हवाओं के घेरे में उत्तर भारत: पहाड़ों पर भारी हिमपात और मैदानों में शीतलहर का 'डबल अटैक', अलर्ट जारी

    बर्फीली हवाओं के घेरे में उत्तर भारत: पहाड़ों पर भारी हिमपात और मैदानों में शीतलहर का 'डबल अटैक', अलर्ट जारी


    नई दिल्ली/शिमला। उत्तर भारत में कुदरत के दो अलग-अलग रंग देखने को मिल रहे हैं। एक तरफ जहां ऊंचे हिमालयी क्षेत्र भारी बर्फबारी के बाद सफेद चादर में लिपटे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ पहाड़ों से आ रही बर्फीली हवाओं ने दिल्ली NCR सहित पूरे मैदानी बेल्ट को डीप फ्रीजर बना दिया है। मकर संक्रांति के 10 दिन बीत जाने के बाद भी सर्दी का सितम कम होने के बजाय और गहरा गया है। मौसम विभाग ने अगले 72 घंटों के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी करते हुए चेतावनी दी है कि फिलहाल राहत के आसार नहीं हैं।

    पहाड़ों पर बर्फ का प्रहार जनजीवन अस्त-व्यस्त
    हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले इलाकों में पिछले 48 घंटों से रुक-रुक कर हो रही बर्फबारी ने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। हिमाचल शिमला और मनाली जैसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों पर भारी हिमपात के कारण कई सड़कें बंद हो गई हैं। बिजली और पानी की आपूर्ति पर भी बुरा असर पड़ा है। उत्तराखंड और जम्मू उत्तरकाशी, चमोली और डोडा में बर्फ की मोटी परत जमने से यातायात पूरी तरह ठप है। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से टूट गया है।

    दिल्ली-NCR बारिश के बाद कोहरे का पहरा

    राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में शुक्रवार को हुई बारिश ने फिजा में नमी भर दी है, जिसके कारण शनिवार को विजिबिलिटी दृश्यता काफी कम रही। तापमान: दिल्ली में न्यूनतम तापमान 8-9 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, लेकिन 15-20 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही ठंडी हवाओं ने कनकनी बढ़ा दी है। यातायात: घने कोहरे के कारण दिल्ली आने वाली कई ट्रेनें और उड़ानें देरी से चल रही हैं।

    पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ‘रेड अलर्ट’ जैसी स्थिति

    मैदानी राज्यों में ठंड का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखा जा रहा है।पंजाब-हरियाणा: यहां कई शहरों में पारा 4 डिग्री से नीचे चला गया है। मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों में ‘घना से बहुत घना’ कोहरा छाए रहने की संभावना जताई है, जिससे विजिबिलिटी शून्य रह सकती है।राजस्थान: मरुधरा में मौसम का मिजाज सबसे ज्यादा बिगड़ा हुआ है। ने कई जिलों में ओलावृष्टि और गरज-चमक के साथ बारिश का अलर्ट जारी किया है। फतेहपुर और चूरू जैसे इलाकों में तापमान 0 से 5 डिग्री के बीच रहने की संभावना है।

    विशेषज्ञों की राय: कब मिलेगी राहत

    मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण यह स्थिति बनी है।अगले 2 से 3 दिनों तक मौसम का यही कड़ा रुख बना रहेगा। 27-28 जनवरी के बाद ही तापमान में मामूली बढ़ोतरी की उम्मीद की जा सकती है। तब तक शीतलहर और पाला पड़ने की संभावना बनी रहेगी।प्रवक्ता सावधानी की अपील: प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे लंबी दूरी की यात्रा से बचें और विशेषकर रात व सुबह के समय वाहन चलाते समय फॉग लाइट का प्रयोग करें।
  • सुप्रीम कोर्ट के जज का चेतावनी भरा संदेश, कॉलेजियम प्रणाली पर उठाए सवाल

    सुप्रीम कोर्ट के जज का चेतावनी भरा संदेश, कॉलेजियम प्रणाली पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कॉलेजियम सिस्टम में सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता जताई है। शनिवार को पुणे के ILS लॉ कॉलेज में दिए व्याख्यान में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहरी ताकतों से नहीं, बल्कि भीतर से है।

    जस्टिस भुइयां ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले का उदाहरण देते हुए कॉलेजियम के फैसले पर सवाल उठाया। अगस्त में कॉलेजियम ने उन्हें छत्तीसगढ़ HC भेजने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र सरकार के अनुरोध पर अक्टूबर में उनका तबादला इलाहाबाद HC कर दिया गया।यह तबादला उस समय हुआ जब जस्टिस श्रीधरन ने मई में एक भाजपा मंत्री द्वारा सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर स्वतः संज्ञान लिया था। कानून विशेषज्ञ इसे सरकार के खिलाफ असुविधाजनक निर्णय की “सजा” मानते हैं।

    अधिकार और संवैधानिक नैतिकता:
    जस्टिस भुइयां ने कहा, “जजों के तबादले में सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। यह न्यायपालिका का अनन्य क्षेत्र है।” उन्होंने कॉलेजियम के सदस्यों से आग्रह किया कि वे बिना किसी डर या पक्षपात के अपनी शपथ का पालन करें और सिस्टम की अखंडता बनाए रखें। वेने कहा, “यदि न्यायपालिका अपनी साख खो देगी, तो जज और अदालतें रह जाएंगी, लेकिन न्यायपालिका की आत्मा गायब हो जाएगी।”

    कॉलेजियम प्रणाली में सुधार:

    जस्टिस भुइयां ने स्वीकार किया कि वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली जजों की नियुक्ति के लिए आदर्श नहीं है और इसमें सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश की व्यक्तिगत राजनीतिक विचारधारा हो सकती है, लेकिन फैसले हमेशा संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए।

  • मुरादाबाद: 5 मुस्लिम छात्राओं ने हिंदू छात्रा को सड़क पर घेरकर जबरन बुर्का पहनाया, भाई ने लगाया धर्मांतरण का आरोप FIR दर्ज

    मुरादाबाद: 5 मुस्लिम छात्राओं ने हिंदू छात्रा को सड़क पर घेरकर जबरन बुर्का पहनाया, भाई ने लगाया धर्मांतरण का आरोप FIR दर्ज



    मुरादाबाद। यूपी के मुरादाबाद में एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें 5 मुस्लिम छात्राओं पर एक हिंदू नाबालिग छात्रा को जबरन बुर्का पहनाने का आरोप लगा है। घटना 20 दिसंबर की बताई जा रही है, लेकिन पीड़िता के भाई ने 22 जनवरी को पुलिस में FIR दर्ज कराई।

    पीड़िता और आरोपी छात्राएं सभी 12वीं की छात्राएं हैं और एक ही स्कूल तथा कोचिंग में पढ़ती हैं। आरोप है कि कोचिंग से निकलने के बाद आरोपित छात्राओं ने छात्रा को सड़क पर घेर लिया, उसके बैग से बुर्का निकाला और उसे पहनाने पर मजबूर किया।

    भाई ने लगाया बड़ा आरोप: “इस्लाम कबूल करने से किस्मत बदलेगी”
    पीड़िता के भाई ने पुलिस को दी तहरीर में बताया कि शुरुआत में दोस्ती के बहाने आरोपी छात्राओं ने उसकी बहन का ब्रेनवॉश किया और उसे बार-बार इस्लाम अपनाने के लिए उकसाया। उसने दावा किया कि उसकी बहन के मन में हिंदू धर्म के प्रति नकारात्मक भाव पैदा किए गए।

    भाई ने बताया कि 11वीं में दोस्ती बढ़ी और धीरे-धीरे बहन ने परिवार की बात नहीं सुननी शुरू कर दी। 20 दिसंबर को ट्यूशन के बाद आरोपी छात्राओं ने उसे रोककर बुर्का पहनाया और उसका वीडियो/फोटो भी लिया जा सकता है।

    मामले में FIR दर्ज, जांच जारी
    पुलिस ने 5 आरोपी छात्राओं के खिलाफ आईपीसी और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। CCTV फुटेज भी सामने आया है, जिसमें छात्रा को बुर्का पहनाते हुए देखा गया है।

    भाई का दावा: पीछे साजिश है
    पीड़िता के भाई का कहना है कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि धर्मांतरण की साजिश है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किसी संगठन द्वारा छात्राओं को उकसाकर हिंदू नाबालिगों को धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
    भाई ने यह भी कहा कि ट्यूशन टीचर ने सबसे पहले बहन को बुर्का पहनाने की जानकारी दी थी और बाद में जब बहन से पूछा गया तो वह डरकर कुछ नहीं बताई।

  • यूपी बना सिनेमा का 'हॉटस्पॉट': वाराणसी की गलियों से मिर्जापुर के स्वैग तक, सिल्वर स्क्रीन पर छा रहा है उत्तर प्रदेश

    यूपी बना सिनेमा का 'हॉटस्पॉट': वाराणसी की गलियों से मिर्जापुर के स्वैग तक, सिल्वर स्क्रीन पर छा रहा है उत्तर प्रदेश

    नई दिल्ली/वाराणसी। आज उत्तर प्रदेश अपना 77वां स्थापना दिवस मना रहा है। जनसंख्या के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य अब केवल राजनीति ही नहीं बल्कि मनोरंजन जगत की धुरी भी बन चुका है। अपनी प्राचीन वास्तुकला गंगा के घाटों और ऐतिहासिक धरोहरों के दम पर यूपी फिल्म मेकर्स के लिए हब बन गया है। साल 2021 में मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का नेशनल अवार्ड जीतने वाला यह राज्य अब दुनिया भर के निर्देशकों को आकर्षित कर रहा है।

    बनारस: फिल्मकारों की पहली पसंद वाराणसी की संकरी गलियां और मणिकर्णिका घाट की जीवन-मृत्यु की गाथा ने मसान जैसी संजीदा फिल्मों को जन्म दिया तो वहीं अस्सी घाट की जीवंतता रांझणा और मोहल्ला अस्सी की आत्मा बनी। ब्रह्मास्त्र जैसी बड़े बजट की फिल्मों से लेकर वनवास और भूल चूक माफ जैसी नई कहानियों तक काशी का कैनवास हर रंग में फिट बैठता है।

    अपराध और इमोशन का कॉकटेल यूपी की पृष्ठभूमि ने भारतीय डिजिटल स्पेस को मिर्जापुर और असुर जैसी कल्ट वेब सीरीज दी हैं। वहीं गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों ने राज्य के देहाती और औद्योगिक परिवेश को वैश्विक पहचान दिलाई। लखनऊ आगरा और कानपुर जैसे शहर अब केवल पर्यटन केंद्र नहीं बल्कि बड़े फिल्म स्टूडियो में तब्दील हो चुके हैं।

    सरकार का प्रोत्साहन और भविष्य उत्तर प्रदेश सरकार की फिल्म बंधु एजेंसी और नई फिल्म पॉलिसी ने शूटिंग के नियमों को बेहद सरल बना दिया है। सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए न केवल ऑनलाइन अनुमति मिलती है बल्कि वेब सीरीज और फिल्मों के लिए भारी सब्सिडी का भी प्रावधान है। नोएडा के सेक्टर 21 में बन रही फिल्म सिटी इस क्रांति को नए पंख लगाने के लिए तैयार है।