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  • NEET पेपर लीक मामले में मनीषा वाघमारे की जमानत पर फैसला सुरक्षित, CBI ने लगाए गंभीर आरोप

    NEET पेपर लीक मामले में मनीषा वाघमारे की जमानत पर फैसला सुरक्षित, CBI ने लगाए गंभीर आरोप

    नई दिल्ली । देशभर में चर्चा का विषय बने NEET पेपर लीक मामले में आरोपी मनीषा वाघमारे की जमानत याचिका पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस बहुचर्चित मामले में जमानत को लेकर अदालत का निर्णय निर्धारित तिथि पर सुनाया जाएगा। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और जांच एजेंसी दोनों ने अपने-अपने तर्क विस्तार से अदालत के समक्ष रखे।

    सुनवाई के दौरान मनीषा वाघमारे की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल एक प्रमाणित एजुकेशन काउंसलर हैं और लंबे समय से शैक्षणिक परामर्श का कार्य कर रही हैं। बचाव पक्ष का कहना था कि उनके बैंक खाते में जो रकम जांच एजेंसी संदिग्ध बता रही है, वह पारिवारिक संपत्ति से संबंधित लेनदेन का हिस्सा है। साथ ही यह भी दलील दी गई कि जांच के दौरान उनके आवास पर कई बार तलाशी ली गई, लेकिन कोई आपत्तिजनक नकदी या ऐसा साक्ष्य नहीं मिला जिससे उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखने की आवश्यकता साबित हो सके।

    बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष मनीषा की स्वास्थ्य स्थिति का भी मुद्दा उठाया। बताया गया कि वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं और उन्हें लगातार चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता है। वकील ने कहा कि जेल में रहने के दौरान भी उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। इस आधार पर अदालत से मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जमानत देने का अनुरोध किया गया।

    हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों और जमानत याचिका को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि जेल प्रशासन के पास आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और यदि किसी अतिरिक्त उपचार की जरूरत हो तो उसके लिए अलग से आवेदन किया जा सकता है।

    दूसरी ओर केंद्रीय जांच एजेंसी ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। एजेंसी ने दावा किया कि मनीषा वाघमारे की भूमिका केवल शैक्षणिक परामर्श तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह कथित रूप से प्रश्नपत्र से जुड़े सवालों को आगे पहुंचाने की प्रक्रिया में शामिल थीं। जांच एजेंसी के अनुसार उनके खिलाफ ऐसे छात्रों के बयान मौजूद हैं जिन्होंने कथित तौर पर प्रश्न प्राप्त करने के बदले धनराशि देने की बात स्वीकार की है।

    सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि मामले की जांच में जुटी टीम के पास कई ऐसे तथ्य और बयान हैं जो आरोपी की भूमिका की ओर संकेत करते हैं। एजेंसी का दावा है कि प्रश्नों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने की श्रृंखला में मनीषा की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई है। इसी आधार पर जमानत का विरोध किया गया।

    अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि वह उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का विस्तृत अध्ययन करेगी। विशेष रूप से उन छात्रों के बयानों की भी समीक्षा की जाएगी जिनका उल्लेख जांच एजेंसी ने किया है।

    NEET पेपर लीक मामला देश की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में से एक की विश्वसनीयता से जुड़ा होने के कारण लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। ऐसे में अदालत का आगामी फैसला न केवल इस मामले के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इससे जांच की आगे की दिशा भी प्रभावित हो सकती है।

  • पटना फायरिंग मामले में खान सर पर FIR, गार्ड्स के खुलासों के बाद जांच ने पकड़ी नई दिशा

    पटना फायरिंग मामले में खान सर पर FIR, गार्ड्स के खुलासों के बाद जांच ने पकड़ी नई दिशा

    नई दिल्ली । बिहार की राजधानी पटना में चर्चित कोचिंग संस्थान के बाहर हुई फायरिंग और हिंसा की घटना ने नया मोड़ ले लिया है। मामले में पुलिस ने खान सर उर्फ फैसल खान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच को आगे बढ़ाया है। हालिया घटनाक्रम के बाद यह मामला राज्यभर में चर्चा का विषय बन गया है और छात्रों से लेकर प्रशासनिक हलकों तक इसकी गूंज सुनाई दे रही है।

    घटना उस समय सुर्खियों में आई जब शहर के एक प्रमुख कोचिंग संस्थान के बाहर कथित हमला, तोड़फोड़ और फायरिंग की सूचना सामने आई। घटना के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई और बड़ी संख्या में छात्र तथा स्थानीय लोग मौके पर जुट गए। हालात को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया और पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई।

    प्रारंभिक जांच के दौरान पुलिस को कुछ वीडियो और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले, जिनमें संस्थान से जुड़े सुरक्षाकर्मी हथियारों के साथ दिखाई दिए। इसके बाद पुलिस ने दोनों सुरक्षाकर्मियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की। पूछताछ और तकनीकी जांच के आधार पर दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके पास मौजूद हथियार भी जब्त कर लिए गए और उनकी जांच की जा रही है।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार गार्ड्स से पूछताछ के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। इन बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच का दायरा बढ़ाया गया और खान सर के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। अधिकारियों का कहना है कि घटना से जुड़े प्रत्येक पहलू की निष्पक्ष जांच की जा रही है और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों का सत्यापन किया जाएगा।

    इस मामले से पहले कोचिंग संस्थान पर कथित हमले और तोड़फोड़ को लेकर भी शिकायत दर्ज कराई गई थी। जांच एजेंसियों ने उस मामले में भी कई लोगों से पूछताछ की है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि हिंसा और फायरिंग की घटनाएं किस क्रम में हुईं और इनके पीछे क्या कारण थे।

    घटना के बाद छात्रों में भी भारी आक्रोश देखने को मिला। कई छात्रों ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता जताई और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। वहीं दूसरी ओर मामले से जुड़े विभिन्न पक्ष अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं, जिससे जांच और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

    पुलिस फिलहाल सीसीटीवी फुटेज, वायरल वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य तकनीकी साक्ष्यों का विश्लेषण कर रही है। फोरेंसिक जांच रिपोर्ट का भी इंतजार किया जा रहा है, जिससे घटना के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्पष्टता आने की उम्मीद है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही किसी व्यक्ति की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा।

    यह मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था, निजी सुरक्षा कर्मियों की भूमिका और शिक्षा क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल सभी की नजर पुलिस जांच पर टिकी हुई है और आने वाले दिनों में इस मामले में और महत्वपूर्ण खुलासे सामने आ सकते हैं।

  • मणिपुर में शांति प्रयासों को झटका, लोइबोल खुल्लेन गांव में गोलीबारी और आगजनी; तीन मृत, सात घर तबाह

    मणिपुर में शांति प्रयासों को झटका, लोइबोल खुल्लेन गांव में गोलीबारी और आगजनी; तीन मृत, सात घर तबाह

    नई दिल्ली । मणिपुर में शांति बहाली की कोशिशों के बीच एक बार फिर हिंसा की गंभीर घटना सामने आई है। कांगपोकपी जिले के सैतू-गामफाजोल उपखंड स्थित लोइबोल खुल्लेन गांव पर शुक्रवार तड़के सशस्त्र हमलावरों ने हमला कर दिया, जिसमें एक महिला सहित तीन लोगों की मौत हो गई। इस दौरान आगजनी की घटनाओं में कम से कम सात घर पूरी तरह जलकर नष्ट हो गए। घटना ने एक बार फिर राज्य में सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

    अधिकारियों के अनुसार हमला सुबह लगभग चार बजे हुआ, जब गांव के अधिकांश लोग अपने घरों में मौजूद थे। अचानक हुई गोलीबारी से पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार हमलावरों और स्थानीय समूहों के बीच कई मिनट तक गोलीबारी होती रही। स्थिति बिगड़ते देख ग्रामीण अपने परिवारों के साथ जान बचाने के लिए आसपास के जंगलों और सुरक्षित स्थानों की ओर भाग गए।

    घटना में जिन तीन लोगों की मौत हुई है, उनकी पहचान लेटखोंगाम हाओकिप, टिनमैरी हाओकिप और जांगमिनलाल हाओकिप के रूप में हुई है। मृतकों में एक महिला भी शामिल है। स्थानीय प्रशासन ने शवों को कब्जे में लेकर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। साथ ही प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की गई है ताकि किसी भी प्रकार की नई हिंसक घटना को रोका जा सके।

    हमले के दौरान कई घरों में आग लगा दी गई, जिससे सात मकान पूरी तरह जलकर राख हो गए। प्रभावित परिवारों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। प्रशासन द्वारा नुकसान का आकलन किया जा रहा है और राहत एवं पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की जा रही है। स्थानीय लोगों ने घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की मांग उठाई है।

    मणिपुर की उपमुख्यमंत्री नेमचा किपगेन ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे बेहद दुखद और अस्वीकार्य घटना बताया। उन्होंने कहा कि निर्दोष लोगों की हत्या और घरों को जलाना किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। सरकार इस मामले को अत्यंत गंभीरता से ले रही है और दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।

    उपमुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार प्रभावित लोगों के साथ खड़ी है। उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी तरह की अफवाह या उकसावे में न आने की अपील की। उनके अनुसार राज्य में स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

    इस बीच कुकी समुदाय के शीर्ष संगठन कुकी इंपी मणिपुर ने भी घटना की तीखी आलोचना की है। संगठन ने बयान जारी कर कहा कि निहत्थे नागरिकों को निशाना बनाना मानवता और मूलभूत मानवाधिकारों के खिलाफ है। संगठन ने दोषियों की शीघ्र गिरफ्तारी, निष्पक्ष जांच और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना ऐसे समय में हुई है जब राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास जारी हैं। ऐसे में इस प्रकार की हिंसक घटनाएं शांति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। सुरक्षा एजेंसियां हमले के पीछे शामिल लोगों की पहचान और उनके मकसद का पता लगाने में जुटी हुई हैं।

    फिलहाल पूरे इलाके में तनाव का माहौल है, जबकि प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है। राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और प्रभावित नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हर आवश्यक कदम उठाया जाएगा।

  • शपथ के दो दिन बाद ही कांग्रेस सरकार में खींचतान, विभाग आवंटन को लेकर वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी खुलकर सामने आई

    शपथ के दो दिन बाद ही कांग्रेस सरकार में खींचतान, विभाग आवंटन को लेकर वरिष्ठ मंत्रियों की नाराजगी खुलकर सामने आई

    नई दिल्ली । कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व में गठित नई कांग्रेस सरकार को गठन के शुरुआती दिनों में ही आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। मंत्रिमंडल में विभागों के आवंटन को लेकर उठे विवाद अब और गहराते दिखाई दे रहे हैं। वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी की नाराजगी के बाद अब खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री केएच मुनियप्पा ने भी अपने विभाग में बदलाव की मांग उठाकर सरकार और पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है।

    सरकार के गठन के बाद विभागों के वितरण को लेकर कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। केएच मुनियप्पा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने मौजूदा मंत्रालय को बदलने का अनुरोध पार्टी नेतृत्व के समक्ष रखा है। उनका कहना है कि उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए उन्हें ऐसे विभाग दिए जाने चाहिए जहां वे अधिक प्रभावी ढंग से जनसेवा कर सकें।

    मुनियप्पा ने संकेत दिया है कि वह इस विषय पर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से भी चर्चा करेंगे। उनका मानना है कि वरिष्ठ नेताओं को उनकी अनुभव क्षमता और राजनीतिक योगदान के अनुरूप जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वह पिछले कई वर्षों से खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग से जुड़े रहे हैं और अब नई जिम्मेदारी संभालकर जनता के लिए अधिक व्यापक स्तर पर काम करना चाहते हैं।

    वरिष्ठ मंत्री ने समाज कल्याण, कृषि और सिंचाई जैसे विभागों में रुचि जताई है। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों में कार्य करने का उन्हें पर्याप्त अनुभव है और इन विभागों के माध्यम से वह ग्रामीण क्षेत्रों तथा सामाजिक विकास से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी योगदान दे सकते हैं। उनके इस बयान ने सरकार के भीतर विभागों के बंटवारे को लेकर चल रही चर्चाओं को और हवा दे दी है।

    इससे पहले रामलिंगा रेड्डी भी विभाग आवंटन को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें बेंगलुरु विकास विभाग दिए जाने का आश्वासन मिला था, लेकिन अंतिम समय में उन्हें बड़ी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस फैसले के बाद उन्होंने अपनी असहमति खुलकर व्यक्त की थी, जिससे सरकार के भीतर असंतोष पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आया।

    मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने हालांकि स्थिति को सामान्य बताते हुए कहा है कि सभी मुद्दों का समाधान बातचीत के माध्यम से निकाला जाएगा। उन्होंने रामलिंगा रेड्डी को अपना करीबी सहयोगी और सम्मानित वरिष्ठ नेता बताते हुए भरोसा जताया कि उनकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा। मुख्यमंत्री का कहना है कि सरकार और संगठन दोनों स्तरों पर संवाद जारी है और किसी भी प्रकार के मतभेद को सुलझाने की कोशिश की जाएगी।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नई सरकार के शुरुआती चरण में इस तरह की नाराजगी प्रशासनिक स्थिरता और राजनीतिक संदेश दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि वह वरिष्ठ नेताओं की अपेक्षाओं और सरकार की कार्यक्षमता के बीच संतुलन बनाए रखे। यदि असंतोष को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो यह आगे चलकर संगठनात्मक एकता को प्रभावित कर सकता है।

    फिलहाल कांग्रेस नेतृत्व स्थिति पर नजर बनाए हुए है और माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में नाराज नेताओं से बातचीत कर समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। विभागों को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व और राजनीतिक प्रबंधन क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

  • भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव, घुसपैठ रोकने की कार्रवाई के बीच आमने-सामने आए दोनों देश

    भारत-बांग्लादेश सीमा पर बढ़ा तनाव, घुसपैठ रोकने की कार्रवाई के बीच आमने-सामने आए दोनों देश


    नई दिल्ली । भारत और बांग्लादेश के बीच साझा अंतरराष्ट्रीय सीमा एक बार फिर सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियों के केंद्र में आ गई है। हाल के दिनों में सीमा क्षेत्रों में बढ़ी सतर्कता और अवैध आवाजाही को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बीच दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र सक्रिय नजर आ रहे हैं। सीमा पर बढ़ी निगरानी के साथ-साथ कई संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है।

    सीमा सुरक्षा बल द्वारा पूर्वी क्षेत्र में लगातार निगरानी और गश्त बढ़ाए जाने के बाद कई संदिग्ध गतिविधियों पर रोक लगाई गई है। अधिकारियों के अनुसार सीमा पार से अवैध प्रवेश, तस्करी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके तहत संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त जवानों की तैनाती की गई है और तकनीकी संसाधनों का उपयोग भी बढ़ाया गया है।

    इसी बीच सीमा से जुड़े कुछ घटनाक्रमों को लेकर भारत और बांग्लादेश के सुरक्षा बलों के बीच फ्लैग मीटिंग आयोजित की गई। बैठक में दोनों पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखे और सीमा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की। बांग्लादेश की ओर से कुछ आपत्तियां और चिंताएं व्यक्त की गईं, जबकि भारतीय पक्ष ने सीमा सुरक्षा और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया।

    सीमाई क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे पूर्वी सेक्टर में सतर्कता बढ़ा दी है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी प्रकार की अवैध घुसपैठ या सीमा उल्लंघन को रोकना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में नियमित गश्त के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

    नदी मार्गों, जंगलों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी अभियान चलाए जा रहे हैं। ड्रोन कैमरों, नाइट विजन उपकरणों और अन्य आधुनिक निगरानी प्रणालियों की मदद से चौबीसों घंटे गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि तकनीकी निगरानी से सीमा पार होने वाली संदिग्ध गतिविधियों को समय रहते पहचानने और रोकने में मदद मिल रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-बांग्लादेश सीमा दुनिया की सबसे व्यस्त और संवेदनशील सीमाओं में से एक है, जहां सुरक्षा, मानवीय और आर्थिक पहलू एक साथ जुड़े रहते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की स्थिति को संभालने के लिए दोनों देशों के बीच संवाद और समन्वय महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सीमा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का समाधान आमतौर पर द्विपक्षीय बातचीत और स्थापित तंत्र के माध्यम से किया जाता रहा है।

    वर्तमान घटनाक्रम के बीच सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ सभी अंतरराष्ट्रीय नियमों और द्विपक्षीय व्यवस्थाओं का पालन किया जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच संपर्क और संवाद की प्रक्रिया जारी रहने की संभावना है, ताकि सीमा से जुड़े किसी भी मुद्दे का समाधान शांतिपूर्ण और संस्थागत माध्यमों से किया जा सके।
  • भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    भाजपा से अलग हुए के. अन्नामलाई, गठबंधन राजनीति से नाराजगी बनी वजह; नई राजनीतिक पारी की अटकलें तेज

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में शुक्रवार को उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया जब भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने उनका इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही पार्टी में अन्नामलाई का कई वर्षों का राजनीतिक सफर समाप्त हो गया है और राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    भाजपा की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि के. अन्नामलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी इस्तीफा सौंप दिया था। राष्ट्रीय नेतृत्व ने उनके निर्णय पर विचार करने के बाद उसे स्वीकार कर लिया। पार्टी की ओर से जारी संक्षिप्त बयान में उनके योगदान की सराहना भी की गई है।

    अन्नामलाई का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब उन्होंने हाल ही में नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की थी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मनाने की कोशिश की थी। हालांकि बातचीत के बावजूद कोई सहमति नहीं बन सकी और अंततः उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार अन्नामलाई आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर सकते हैं, जिसमें वह अपने राजनीतिक भविष्य और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा करेंगे। उनके अगले कदम को लेकर राजनीतिक हलकों में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि अभी तक उन्होंने किसी नई पार्टी के गठन या किसी अन्य दल में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया है।

    पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने वर्ष 2020 में अपनी सरकारी सेवा छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। अपनी तेजतर्रार छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और जमीनी सक्रियता के कारण वह बहुत कम समय में तमिलनाडु भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल हो गए। वर्ष 2021 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, जिसके बाद उन्होंने संगठन विस्तार और कार्यकर्ता आधार मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया।

    उनके नेतृत्व में भाजपा ने राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति बढ़ाने के लिए कई अभियान चलाए। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ने को भी उनकी रणनीति और मेहनत का परिणाम माना गया था। हालांकि सीटों में इसका सीधा लाभ नहीं मिल सका। इसके बावजूद अन्नामलाई को भाजपा के उभरते राष्ट्रीय चेहरों में गिना जाने लगा था।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआईएडीएमके के साथ गठबंधन को लेकर अन्नामलाई और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद समय के साथ गहराते गए। माना जा रहा है कि वह गठबंधन की रणनीति से पूरी तरह सहमत नहीं थे। उनके समर्थकों का तर्क है कि भाजपा ने स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की दिशा में जो प्रगति की थी, गठबंधन की राजनीति के कारण उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।

    हाल के महीनों में चेन्नई और कोयंबटूर सहित कई शहरों में अन्नामलाई के समर्थन में पोस्टर लगाए गए थे, जिनमें उन्हें भविष्य के बड़े नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई थीं। विधानसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका न निभाने के बाद से ही उनके अगले कदम को लेकर अटकलों का दौर जारी था।

    के. अन्नामलाई का इस्तीफा केवल एक नेता के पार्टी छोड़ने की घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे तमिलनाडु में भाजपा की भविष्य की रणनीति और संगठनात्मक दिशा से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें उनकी प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस और आने वाले राजनीतिक फैसलों पर टिकी हैं, जो राज्य की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे सकते हैं।

  • राजधानी में सुरक्षा अलर्ट, धमकी भरे ईमेल के बाद मेयर दफ्तर, धार्मिक स्थलों और रेलवे नेटवर्क की निगरानी बढ़ी

    राजधानी में सुरक्षा अलर्ट, धमकी भरे ईमेल के बाद मेयर दफ्तर, धार्मिक स्थलों और रेलवे नेटवर्क की निगरानी बढ़ी

    नई दिल्ली । कर्नाटक में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस सरकार के भीतर विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मंत्री केएच मुनियप्पा द्वारा खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग का कार्यभार संभालने से इनकार किए जाने के बाद राज्य की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। इससे पहले वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी भी विभाग आवंटन को लेकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। लगातार दूसरे वरिष्ठ मंत्री के विरोध ने सरकार और कांग्रेस नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

    बेंगलुरु ग्रामीण जिले के देवनहल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान केएच मुनियप्पा ने स्पष्ट किया कि वह मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें सौंपे गए विभाग का प्रभार ग्रहण नहीं करेंगे। उनका कहना है कि विभागों का आवंटन करते समय वरिष्ठ नेताओं के अनुभव, राजनीतिक योगदान और संगठन में उनकी भूमिका का पर्याप्त सम्मान नहीं किया गया। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक पार्टी नेतृत्व इस मामले की समीक्षा कर कोई संतोषजनक निर्णय नहीं लेता, तब तक वह मंत्रालय का कार्यभार नहीं संभालेंगे।

    पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा ने कहा कि लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव वाले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपते समय वरिष्ठता को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर संतुलन और विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार ऐसे फैसले होने चाहिए जो संगठनात्मक एकता को मजबूत करें और कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश पहुंचाएं।

    मुनियप्पा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से सीधे हस्तक्षेप की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि पार्टी अध्यक्ष को एक अभिभावक की भूमिका निभाते हुए सभी वरिष्ठ नेताओं की भावनाओं को समझना चाहिए और ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे किसी भी स्तर पर असंतोष की स्थिति न बने। उन्होंने बताया कि अपनी नाराजगी से वह राहुल गांधी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, केसी वेणुगोपाल, सिद्धारमैया और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा चुके हैं।

    हालांकि मुनियप्पा ने किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन उनके बयान ने कांग्रेस सरकार के भीतर चल रही असहजता को उजागर कर दिया है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कुछ वरिष्ठ नेता इस बात से असंतुष्ट हैं कि कई प्रभावशाली विभाग अपेक्षाकृत युवा नेताओं या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों से जुड़े नेताओं को दिए गए हैं, जबकि लंबे समय से संगठन में योगदान देने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप जिम्मेदारियां नहीं मिलीं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल विभागों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार और संगठन के भीतर शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। नई सरकार के गठन के बाद यदि वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी लगातार बढ़ती है तो इसका असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक संदेश दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे समय में कांग्रेस नेतृत्व के लिए सभी पक्षों को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मुनियप्पा की नाराजगी को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि वह कर्नाटक कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। सात बार सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा का राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है। रामलिंगा रेड्डी के बाद उनका विरोध यह संकेत देता है कि विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष व्यापक रूप ले सकता है। अब कांग्रेस हाईकमान और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के भीतर एकजुटता बनाए रखने और नाराज नेताओं को संतुष्ट करने की होगी।

  • बंगाल की राजनीति में बढ़ा सस्पेंस, बागी टीएमसी गुट में मतभेद खुलकर आए सामने, ममता के नेतृत्व पर फिर बनी सहमति

    बंगाल की राजनीति में बढ़ा सस्पेंस, बागी टीएमसी गुट में मतभेद खुलकर आए सामने, ममता के नेतृत्व पर फिर बनी सहमति


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े घटनाक्रम लगातार नए मोड़ ले रहे हैं। कुछ दिन पहले पार्टी के भीतर बड़े राजनीतिक विभाजन की खबरों के बीच जिस बागी गुट ने खुद को संगठन की नई ताकत के रूप में पेश किया था, उसी समूह के भीतर अब मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं। कई विधायकों द्वारा सार्वजनिक रूप से ममता बनर्जी के नेतृत्व के समर्थन ने इस पूरे घटनाक्रम को नई दिशा दे दी है।

    राज्य की सत्तारूढ़ राजनीति में यह बदलाव उस समय सामने आया है जब हाल ही में पार्टी से अलग हुए विधायकों के एक समूह ने अपना स्वतंत्र गुट बनाकर नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठाई थी। इस गुट ने दावा किया था कि बड़ी संख्या में विधायक उनके साथ हैं और वे संगठन के भविष्य को नई दिशा देना चाहते हैं। इसके बाद विधानसभा स्तर पर भी उनकी सक्रियता देखने को मिली थी और विपक्षी नेतृत्व को लेकर महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया था।

    हालांकि अब बागी गुट के भीतर से ही अलग-अलग आवाजें सामने आने लगी हैं। हावड़ा क्षेत्र के विधायक गुलशन मलिक ने स्पष्ट रूप से कहा है कि ममता बनर्जी केवल मार्गदर्शक की भूमिका में रहें और नेतृत्व किसी अन्य व्यक्ति को सौंप दिया जाए, यह विचार उन्हें स्वीकार नहीं है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ही उनके लिए सर्वोच्च नेता हैं और पार्टी का नेतृत्व भी उनके हाथों में ही रहना चाहिए।

    गुलशन मलिक के इस बयान को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि बागी गुट के भीतर नेतृत्व को लेकर पूर्ण सहमति नहीं है। उन्होंने दावा किया कि कई अन्य विधायक भी इसी सोच से सहमत हैं और इस विषय पर आपसी चर्चा हो चुकी है। उनके अनुसार पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भावनाएं भी ममता बनर्जी के नेतृत्व के साथ जुड़ी हुई हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम बागी गुट की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। यदि बड़ी संख्या में विधायक नेतृत्व परिवर्तन के बजाय ममता बनर्जी के नेतृत्व को जारी रखने के पक्ष में रहते हैं तो बागी खेमे की राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक दावे कमजोर पड़ सकते हैं। इससे भविष्य में गुट की एकजुटता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

    गौरतलब है कि हाल के दिनों में बड़ी संख्या में विधायकों द्वारा अलग समूह बनाए जाने के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई थी। बागी खेमे ने विधानसभा स्तर पर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की थी और राजनीतिक मान्यता हासिल करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं भी पूरी की थीं। इस कदम को राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा था।

    अब जबकि उसी समूह के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आने लगे हैं, राजनीतिक समीकरण फिर बदलते दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि बागी गुट अपनी एकजुटता बनाए रख पाता है या फिर आंतरिक मतभेद उसके प्रभाव को सीमित कर देते हैं। फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी यह घटनाक्रम राज्य के राजनीतिक भविष्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है और सभी दलों की नजरें आगे होने वाले घटनाक्रमों पर टिकी हुई हैं।
  • बंगाल चुनाव परिणामों के बाद बदलीं सियासी करवटें; ममता बनर्जी के धुर विरोधी हुमायूं कबीर ने दी अपनी जीती हुई सुरक्षित सीट से जिताने की गारंटी

    बंगाल चुनाव परिणामों के बाद बदलीं सियासी करवटें; ममता बनर्जी के धुर विरोधी हुमायूं कबीर ने दी अपनी जीती हुई सुरक्षित सीट से जिताने की गारंटी

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में एक अप्रत्याशित और नाटकीय मोड़ सामने आया है। कभी तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे मुखर आलोचक रहे आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) के संस्थापक हुमायूं कबीर ने अब संकट के समय उनके प्रति सहानुभूति दिखाई है। कबीर ने घोषणा की है कि यदि ममता बनर्जी चाहें तो वह अपनी नवनिर्वाचित रेजीनगर विधानसभा सीट से इस्तीफा देने के लिए तैयार हैं, ताकि बनर्जी वहां से उपचुनाव लड़कर राज्य विधानसभा में गरिमामय वापसी कर सकें।

    यह राजनीतिक प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे गंभीर दौर से गुजर रही हैं। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है और भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई है। इस हार के बाद टीएमसी के भीतर बड़े पैमाने पर आंतरिक विद्रोह हुआ है, जिससे पार्टी में बिखराव की स्थिति पैदा हो गई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी नंदीग्राम सीट खाली करते हुए भवानीपुर सीट अपने पास रखी है, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को पराजित किया था। इस पराजय के बाद बनर्जी फिलहाल विधानसभा से बाहर हैं।

    हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले की दो विधानसभा सीटों, नौदा और रेजीनगर, दोनों से ऐतिहासिक जीत हासिल की है। चुनाव नियमों के अनुसार, उन्हें निर्धारित समय के भीतर इन दोनों में से किसी एक सीट से इस्तीफा देना होगा। कबीर ने संवाददाताओं से अनौपचारिक बातचीत में स्पष्ट कहा कि यदि ममता बनर्जी उनके पास आती हैं, तो वह रेजीनगर निर्वाचन क्षेत्र को उनके लिए खाली कर देंगे। उन्होंने राजनीतिक विश्लेषण साझा करते हुए दावा किया कि ममता बनर्जी अगर दोबारा नंदीग्राम से चुनाव लड़ती हैं, तो उनके जीतने की संभावना न के बराबर है, लेकिन रेजीनगर में उनके नेतृत्व में बनर्जी की जीत पूरी तरह सुनिश्चित की जा सकती है।

    गौरतलब है कि हुमायूं कबीर को पिछले साल पार्टी नेतृत्व के साथ लंबे समय तक चले वैचारिक मतभेदों के कारण तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने आम जनता उन्नयन पार्टी का गठन किया और ममता बनर्जी सरकार की नीतियों पर जमकर प्रहार किया। कबीर ने वर्तमान स्थिति पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि आज दीदी जिस दौर से गुजर रही हैं, उसे देखकर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर पीड़ा होती है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वह आज सार्वजनिक जीवन में जिस मुकाम पर हैं, उसके पीछे कहीं न कहीं ममता बनर्जी का शुरुआती सहयोग रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को मुर्शिदाबाद और उसके आसपास के क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं के बीच कबीर के बढ़ते प्रभाव के रूप में भी देख रहे हैं। कबीर ने अपने प्रभाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही आज पूरे राज्य में ममता बनर्जी की बात का प्रभाव कम हो गया हो, परंतु रेजीनगर क्षेत्र में हुमायूं कबीर का निर्णय ही अंतिम और सर्वोपरि माना जाता है। टीएमसी में मची इस ऐतिहासिक बगावत के बीच पूर्व सहयोगियों द्वारा दी जा रही इस प्रकार की राजनीतिक जीवनदान की पेशकश बंगाल की भविष्य की राजनीति को एक नया आयाम दे सकती है।

  • वैश्विक पटल पर भारत का बड़ा रणनीतिक कदम: एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा संभालेंगे विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक का कार्यभार

    वैश्विक पटल पर भारत का बड़ा रणनीतिक कदम: एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा संभालेंगे विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक का कार्यभार

    नई दिल्ली । वैश्विक वित्तीय और प्रशासनिक पटल पर भारत की स्थिति को और मजबूत करते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया है। वर्तमान में एक्सिस बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार समिति (EAC-PM) के प्रमुख सदस्य नीलकंठ मिश्रा को विश्व बैंक में भारत का नया एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर (कार्यकारी निदेशक) नियुक्त किया गया है। 4 जून को केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने इस हाई-प्रोफाइल नियुक्ति को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी है।

    प्रशासनिक आदेश के अनुसार, विश्व बैंक के वाशिंगटन स्थित मुख्यालय में नीलकंठ मिश्रा का कार्यकाल अगले तीन वर्षों के लिए होगा। वे इस महत्वपूर्ण वैश्विक पद पर पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी परमेश्वरन अय्यर का स्थान ग्रहण करेंगे, जिनका निर्धारित कार्यकाल जल्द ही समाप्त होने जा रहा है। सरकार द्वारा जारी कूटनीतिक दिशानिर्देशों के तहत, जब तक नीलकंठ मिश्रा वाशिंगटन पहुंचकर विधिवत रूप से अपना नया कार्यभार नहीं संभाल लेते, तब तक परमेश्वरन अय्यर बोर्ड में इस पद पर बने रहेंगे ताकि कूटनीतिक निरंतरता बनी रहे।

    विश्व बैंक के संगठनात्मक ढांचे में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर का यह पद रणनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस पद पर आसीन होकर नीलकंठ मिश्रा विश्व बैंक के उस मुख्य शासी बोर्ड में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे, जो दुनिया भर के विकासशील देशों को दिए जाने वाले वित्तीय ऋण, ब्याज दरों के निर्धारण, नीतिगत सुधारों और वैश्विक कल्याणकारी योजनाओं में पूंजी निवेश जैसे अत्यंत संवेदनशील और बड़े फैसले लेता है।

    नीलकंठ मिश्रा की गिनती भारत के सबसे कुशल और प्रखर बाजार रणनीतिकारों तथा अर्थशास्त्रियों में की जाती है। वे वर्तमान में एक्सिस कैपिटल में ग्लोबल रिसर्च के प्रमुख और पूर्णकालिक निदेशक की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। एक्सिस ग्रुप के साथ जुड़ने से पहले, उन्होंने लगभग दो दशकों तक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय दिग्गज ‘क्रेडिट सुइस’ के साथ काम किया था, जहां उन्होंने एशिया-पैसिफिक (APAC) क्षेत्र के लिए सह-रणनीतिकार के रूप में अपनी विशिष्ट वित्तीय पहचान बनाई थी।

    शैक्षणिक और व्यावसायिक पृष्ठभूमि के दृष्टिकोण से भी नीलकंठ मिश्रा का सफर काफी प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा झारखंड के बोकारो स्टील सिटी स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर से कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की। स्नातक होने के बाद, उन्होंने वर्ष 1997 से 2000 तक हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड में सिस्टम मैनेजर के रूप में अपने कॉरपोरेट करियर की शुरुआत की थी और धीरे-धीरे वित्तीय विश्लेषण के क्षेत्र में शीर्ष मुकाम हासिल किया।