Category: National

  • फ्लाईदुबई फ्लाइट में 174 यात्रियों को बचाने वाले घायल पायलट स्मित मच्छार से पीएम मोदी ने की बात

    फ्लाईदुबई फ्लाइट में 174 यात्रियों को बचाने वाले घायल पायलट स्मित मच्छार से पीएम मोदी ने की बात

    नई दिल्ली। फ्लाईदुबई की फ्लाइट में 174 यात्रियों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सराहना की है। प्रधानमंत्री ने कैप्टन स्मित से बातचीत कर मुश्किल समय में उनके साहस की तारीफ की और उन्हें हीरो बताया। पीएम मोदी ने कहा कि गंभीर परिस्थिति में स्मित ने जिस तरह हिम्मत दिखाई, वह काबिले-तारीफ है। प्रधानमंत्री ने घायल भारतीय पायलट के परिवार से भी बातचीत की। फ्लाइट में हुई इस घटना के दौरान स्मित ने घायल होने के बावजूद हालात संभालने की कोशिश की और कॉकपिट का दरवाजा खोलकर मदद का रास्ता बनाया।

    इजरायल जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में उस समय हड़कंप मच गया, जब एक पायलट ने अपने ही साथी भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला कर दिया। हमला गंभीर था और इसके बाद विमान के हालात बिगड़ने लगे। फ्लाइट अचानक नीचे जाने लगी। घायल होने के बावजूद स्मित ने स्थिति को संभालने की कोशिश जारी रखी। उन्होंने कॉकपिट का दरवाजा खोलकर मदद मांगी। इसके बाद एक यात्री कॉकपिट के अंदर पहुंचा और स्थिति को संभालने में मदद की। वहीं, दूसरे यात्रियों और क्रू मेंबर ने आरोपी पायलट को काबू करने की कोशिश की।

    हमले के बाद विमान को संभालने में यात्रियों और क्रू की भूमिका सामने आई। कॉकपिट का दरवाजा खुलने के बाद इजरायली यात्री यानिव हयून अंदर पहुंचे। हयून पेशे से प्लंबर हैं। उन्होंने कॉकपिट में पहुंचकर देखा कि आरोपी पायलट विमान के कंट्रोल से छेड़छाड़ कर रहा था। इसके बाद हयून ने तुरंत विमान के कंट्रोल को पीछे की तरफ खींचा। इसी दौरान एक अन्य यात्री और क्रू मेंबर ने आरोपी पायलट को काबू कर लिया। स्थिति को नियंत्रित करने के बाद रिजर्व पायलट कॉकपिट में पहुंचे और विमान का कंट्रोल संभाल लिया।

    यानिव हयून की भूमिका भी इस घटनाक्रम में सामने आई। घटना के बाद एयरपोर्ट पर उनकी मुलाकात हुई। बताया गया कि हयून के कपड़ों पर घायल भारतीय पायलट का काफी खून लगा हुआ था। उन्होंने कॉकपिट में पहुंचने के बाद आरोपी पायलट को विमान के कंट्रोल से छेड़छाड़ करते देखा था और तत्काल कंट्रोल को पीछे की ओर खींचा था। इसके बाद दूसरे यात्री और क्रू मेंबर ने आरोपी पायलट को काबू किया, जबकि रिजर्व पायलट ने विमान को स्थिर करने की जिम्मेदारी संभाली। इस पूरे घटनाक्रम में घायल कैप्टन स्मित मच्छार ने भी कॉकपिट का दरवाजा खोलकर मदद का रास्ता बनाया था।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छार से बातचीत के दौरान उनकी हिम्मत की सराहना की। उन्होंने मुश्किल हालात में दिखाई गई बहादुरी के लिए भारतीय पायलट को हीरो बताया। पीएम मोदी ने स्मित के परिवार से भी बातचीत की। फ्लाइट में मौजूद 174 यात्रियों की जान बचाने की कोशिश के दौरान कैप्टन स्मित घायल हुए थे। घटना के दौरान यात्रियों और क्रू ने आरोपी पायलट को काबू करने में मदद की, जबकि रिजर्व पायलट ने बाद में विमान का नियंत्रण संभाला। इस तरह घायल भारतीय पायलट द्वारा मदद का रास्ता खोलने और यात्रियों तथा क्रू की मदद से विमान को संभालने का घटनाक्रम सामने आया।

  • एंटीलिया बम केस में सचिन वाजे की जमानत के खिलाफ NIA की अपील पर दो बेंचों ने सुनवाई से खुद को अलग किया

    एंटीलिया बम केस में सचिन वाजे की जमानत के खिलाफ NIA की अपील पर दो बेंचों ने सुनवाई से खुद को अलग किया


    नई दिल्ली । उद्योगपति मुकेश अंबानी के दक्षिण मुंबई स्थित आवास एंटीलिया से जुड़े बम धमकी मामले में सचिन वाजे की जमानत के बाद कानूनी प्रक्रिया में नया मोड़ आया है। बर्खास्त पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को विशेष मुंबई अदालत से जमानत मिल चुकी है। इस फैसले को चुनौती देते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन अपील पर सुनवाई को लेकर लगातार अड़चन सामने आई।

    बुधवार को हाईकोर्ट की एक बेंच ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। इससे पहले मंगलवार को भी एक अन्य बेंच ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। बुधवार की कार्यवाही के दौरान जजों के सवाल पर NIA ने बताया कि वाजे को उस समय तक जेल से रिहा नहीं किया गया था।

    बुधवार को मामला जस्टिस भारती एच. डांगरे और जस्टिस आशीष एस. चव्हाण की बेंच के सामने आया। बेंच ने बताया कि वाजे की ओर से दायर कुछ अलग कार्यवाहियों में जस्टिस डांगरे पहले ही खुद को मामले से अलग कर चुकी हैं। इसके बाद बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस आशीष एस. चव्हाण ने भी मामले की सुनवाई करने में असमर्थता जताई।

    जस्टिस चव्हाण ने बताया कि वह एक अलग लेकिन संबंधित मामले में सीबीआई की ओर से पेश हो चुके हैं। इसके बाद बेंच ने निर्देश दिया कि NIA की अपील को उसके सामने सूचीबद्ध नहीं किया जाए। इस तरह बुधवार को भी मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। इससे एक दिन पहले मंगलवार को जस्टिस सारंग वी. कोतवाल ने भी सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था।

    लगातार दो बेंचों से सुनवाई नहीं होने के बाद NIA ने बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी के सामने मामला उठाया। NIA की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कहा कि तीन अन्य डिवीजन बेंच भी इस मामले की सुनवाई करने की स्थिति में नहीं हो सकती हैं।

    अनिल सिंह ने यह भी कहा कि अगर इस बीच सचिन वाजे को रिहा कर दिया जाता है तो इससे आगे की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। इसके बाद मामले को जस्टिस गिरिश एस. कुलकर्णी की अगुवाई वाली बेंच को सौंप दिया गया।

    विशेष अदालत के जमानत आदेश के तुरंत बाद मंगलवार को ही NIA ने हाईकोर्ट का रुख किया था। ASG अनिल सिंह ने जस्टिस सारंग वी. कोतवाल की अगुवाई वाली डिवीजन बेंच के सामने विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की थी। हालांकि जस्टिस कोतवाल ने मामले से खुद को अलग कर लिया।

    जस्टिस कोतवाल ने कहा था कि वह उन पक्षों से जुड़े मामलों की सुनवाई नहीं करते, जिनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज मोहते पेश हुए हैं। मनोज मोहते पहले सचिन वाजे की ओर से पेश हो चुके हैं। इसके बाद मामले को बुधवार को जस्टिस भारती एच. डांगरे की अगुवाई वाली वैकल्पिक बेंच के सामने सूचीबद्ध किया गया था।

    सचिन वाजे को जमानत देते समय विशेष अदालत ने कहा था कि प्रथम दृष्टया उनका कृत्य गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA की धारा 15 में दी गई आतंकवादी कृत्य की परिभाषा को पूरा करता हुआ नहीं दिखता।

    विशेष अदालत ने यह भी कहा था कि NIA ऐसे बयान दर्ज करने में विफल रही, जिनसे यह साबित हो सके कि मुंबई स्थित घर के बाहर विस्फोटकों से भरी SUV मिलने के बाद अंबानी परिवार आतंकित हुआ था।

    यह मामला 25 फरवरी 2021 का है। उस दिन दक्षिण मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी के आवास एंटीलिया के पास खड़ी एक कार में धमकी भरा नोट मिला था। मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद बर्खास्त पुलिस अधिकारी सचिन वाजे की भूमिका सामने आई और उनके खिलाफ कार्रवाई हुई।

    अब विशेष अदालत से मिली जमानत को चुनौती देने वाली NIA की अपील की सुनवाई नए सिरे से आगे बढ़ेगी। लगातार बेंचों के मामले से अलग होने के बाद इसे जस्टिस गिरिश एस. कुलकर्णी की अगुवाई वाली बेंच को सौंपा गया है।

  • थलपति विजय की TVK ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से बनाई दूरी, SIR के विरोध पर कायम पार्टी

    थलपति विजय की TVK ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से बनाई दूरी, SIR के विरोध पर कायम पार्टी

    नई दिल्ली । तमिलनाडु की सत्ताधारी तमिळगा वेत्री कड़गम यानी TVK ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से खुद को अलग कर लिया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठा रहे हैं। हालांकि थलपति विजय की पार्टी ने इस मांग का समर्थन नहीं किया है।

    TVK की ओर से कहा गया है कि किसी एक व्यक्ति को पद से हटाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। पार्टी ने इसे मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली रणनीति बताया है। हालांकि इसके साथ ही TVK ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का विरोध जारी रखने की बात भी स्पष्ट की है।

    यह विवाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR प्रक्रिया को लेकर सामने आई आपत्तियों के बाद तेज हुआ। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने पिछले 10 महीनों में SIR की प्रक्रिया को लेकर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए और उनके खिलाफ इस्तीफे के साथ कानूनी कार्रवाई की मांग भी सामने आई।

    TVK के वरिष्ठ नेता और तमिलनाडु के स्कूली शिक्षा मंत्री ए राजमोहन ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि CEC को पद से हटाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक, किसी एक व्यक्ति को हटाने से व्यवस्था में बदलाव नहीं आएगा और पार्टी किसी भटकाने वाली रणनीति का हिस्सा नहीं बनेगी।

    हालांकि राजमोहन ने यह भी कहा कि TVK SIR का विरोध करती रहेगी। उन्होंने बताया कि पार्टी अध्यक्ष विजय ने सत्ता में आने से पहले ही SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की थी। राजमोहन के मुताबिक, SIR के दौरान चुनिंदा मतदाताओं के नाम हटाए गए और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत और बड़ी होती।

    विजय और कांग्रेस के बीच पहले भी मतभेद सामने आ चुके हैं। इससे पहले TVK के नेताओं और मंत्रियों की ओर से वर्ष 2029 के लिए विजय को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताए जाने के बाद विवाद पैदा हुआ था। उस समय कांग्रेस के मंत्रियों की ओर से कैबिनेट से इस्तीफा देने की धमकी तक सामने आई थी।

    फिलहाल तमिलनाडु में कांग्रेस के पांच विधायक हैं, जिनके समर्थन से TVK ने सरकार बनाई थी। इनमें से दो विधायकों को विजय ने मंत्री भी बनाया है। ऐसे में CEC के इस्तीफे के मुद्दे पर TVK का कांग्रेस से अलग रुख गठबंधन के भीतर मतभेदों को सामने लाता है।

    दूसरी ओर, डीएमके प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया है। डीएमके ने कहा है कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन संसद में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव आता है तो पार्टी उसका समर्थन करेगी।

    डीएमके प्रवक्ता टी के एस एलंगोवन ने कहा कि जब भी विपक्षी दल किसी मुद्दे पर बीजेपी का विरोध करेंगे, उनकी पार्टी उनके साथ खड़ी रहेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि डीएमके इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, लेकिन संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लाया जाता है तो पार्टी उसका समर्थन करेगी।

    इससे पहले 23 सितंबर को स्टालिन ने बयान जारी कर कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर कांग्रेस और डीएमके की मांग के बीच TVK ने अलग रुख अपनाया है। पार्टी ने SIR के विरोध को बरकरार रखते हुए CEC को हटाने की मांग को व्यवस्था में बदलाव का समाधान मानने से इनकार किया है।

  • SC जज संदीप मेहता के आरोपों पर पूर्व जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का पलटवार, बोले- जजों को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए

    SC जज संदीप मेहता के आरोपों पर पूर्व जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का पलटवार, बोले- जजों को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए

    नई दिल्ली । राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जज संदीप मेहता की ओर से लगाए गए आरोपों पर जवाब दिया है। शर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इनके पीछे पेशेवर ईर्ष्या की संभावना हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस मेहता को हाईकोर्ट के मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं था।

    जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा हाल ही में राजस्थान हाईकोर्ट के जज पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें जस्टिस संदीप मेहता से जिरह करने का मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि राजस्थान में वकीलों को उनके खिलाफ प्रदर्शन के लिए उकसाया गया।

    जस्टिस मेहता ने अगस्त में भारत के मुख्य न्यायाधीश को कई पत्र भेजे थे। इन पत्रों में उन्होंने जस्टिस शर्मा पर शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि उन्हें जस्टिस शर्मा के खिलाफ कई शिकायतें मिली हैं, जिनसे उनकी ईमानदारी को लेकर सवाल उठते हैं।

    इन शिकायतों के आधार पर जस्टिस मेहता ने कार्यवाहक चीफ जस्टिस को किसी दूसरे हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने और राजस्थान हाईकोर्ट में नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज संजय के. अग्रवाल को राजस्थान हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की। यह सिफारिश उस समय हुई जब वकीलों के विरोध के बीच जस्टिस शर्मा छुट्टी पर चले गए थे।

    जस्टिस शर्मा ने प्रभावशाली मुकदमेदारों को फायदा पहुंचाने, रोस्टर में हेरफेर करने, जांच में दखल देने और किसी खास पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए न्यायिक अधिकारियों के तबादले के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि काम करने के तरीके में अंतर होने का मतलब यह नहीं है कि कोई गलत है। उन्होंने कार्यवाहक चीफ जस्टिस के तौर पर अपने प्रशासनिक रिकॉर्ड का भी बचाव किया और लंबित पदोन्नतियों, तबादलों तथा बढ़ी हुई फंडिंग का जिक्र किया।

    शर्मा ने कहा कि अगर कोई शिकायत थी तो वह सबसे पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास क्यों नहीं गई। उन्होंने बताया कि उन्होंने जस्टिस मेहता के चार पत्रों के जवाब दिए हैं और खुद सीजेआई को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई जज हाईकोर्ट के कामकाज में दखल दे सकता है।

    जस्टिस शर्मा ने कहा कि जजों को अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए। उनके मुताबिक, जजों को यह समझना चाहिए कि उन्हें कहां बोलना है और कहां नहीं। उन्होंने कहा कि जज अपने फैसलों के जरिए बोलते हैं और उनके फैसलों की न्यायिक समीक्षा होती है। उन्होंने अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि करीब साढ़े नौ साल के छोटे से कार्यकाल में उन्होंने 88 हजार से अधिक मामलों का फैसला किया। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जांचे गए उनके कई फैसले बरकरार रखे गए।

    जब जस्टिस मेहता की ओर से लगाए गए आरोपों की वजह के बारे में पूछा गया तो शर्मा ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है। हालांकि उन्होंने इसकी वजह साधारण पेशेवर जलन होने की संभावना जताई। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में दोनों को सीनियर एडवोकेट बनाया गया था। शर्मा के मुताबिक, उन्होंने इसके लिए आवेदन नहीं किया था, जबकि जस्टिस मेहता ने आवेदन किया था।

    शर्मा ने कहा कि वह पहली पीढ़ी के वकील हैं, जबकि जस्टिस मेहता न्यायिक परिवार से आते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि दोनों के सीनियर एडवोकेट बनने के बाद पदोन्नति के समय जस्टिस मेहता ने यह सुनिश्चित किया कि वह चीफ जस्टिस न बनें।

    दोनों के कभी साथ काम नहीं करने की बात कहते हुए शर्मा ने बताया कि वकालत के दौरान जस्टिस मेहता जोधपुर और वह जयपुर में थे। जज बनने के बाद भी दोनों अलग-अलग जगहों पर रहे। उनके मुताबिक, जस्टिस मेहता मुख्य रूप से आपराधिक मामलों से जुड़े रहे, जबकि वह संवैधानिक मामलों के वकील रहे हैं।

    बूंदी के एक मुकदमेदार रघुबीर सिंह अत्री से मुलाकात पर सफाई देते हुए शर्मा ने कहा कि अत्री उनके साले नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्ते में भाई-बहन के संबंध में हैं। उन्होंने बताया कि अत्री छुट्टियों में आए थे और वह उन्हें मंदिर ले गए थे। उन्होंने कहा कि बाद में इस मुलाकात को मुकदमे को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर पेश किया गया।

    करीब 800 तबादलों के सवाल पर शर्मा ने कहा कि अत्री के मामले से इन्हें जोड़ना बिल्कुल बेतुका है। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर तबादले रजिस्ट्रार जनरल करते हैं और इसमें अधिकारी के किसी स्थान पर बिताए गए समय समेत कई बातों को देखा जाता है। रोस्टर में हेरफेर के आरोप पर उन्होंने कहा कि मामलों के आवंटन का अधिकार चीफ जस्टिस के पास होता है।

    उदयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी मामले पर शर्मा ने कहा कि तीन जजों के खुद को मामले से अलग करने के बाद उन्होंने इसकी सुनवाई की थी। उन्होंने बताया कि एडवोकेट जनरल ने उनसे अपील की सुनवाई करने का अनुरोध किया था। वकीलों के विरोध पर उन्होंने कहा कि यदि उनकी मांगों का आधार नहीं है तो जजों को उन्हें खुश करने की जरूरत नहीं है।

  • अभिजीत दीपके मुंबई की सड़क पर चेहरे पर नकाब लगाकर निकले, बोले- कई महीनों बाद अकेले चलने का मिला मौका

    अभिजीत दीपके मुंबई की सड़क पर चेहरे पर नकाब लगाकर निकले, बोले- कई महीनों बाद अकेले चलने का मिला मौका


    नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके इन दिनों मुंबई में हैं, जहां वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित आंदोलन की तैयारियों में जुटे हुए हैं। इसी दौरान उनका एक वीडियो सामने आया, जिसमें वह चेहरे पर रुमाल से नकाब बांधकर सड़क पर पैदल चलते नजर आए। उन्होंने इस दौरान बताया कि कई महीनों बाद उन्हें इस तरह अकेले सड़क पर चलने का मौका मिला है।

    दरअसल, सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने के बाद अभिजीत दीपके काफी चर्चित हो चुके हैं। उनके समर्थकों और आलोचकों की बड़ी संख्या है। ऐसे में आम लोगों की तरह सार्वजनिक जगहों पर अकेले घूमना उनके लिए आसान नहीं रहता। मुंबई में जब ट्रैफिक जाम के कारण उनकी गाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रही थी, तब उन्होंने कार से उतरकर पैदल चलने का फैसला किया।

    दीपके ने इस दौरान अपने चेहरे को रुमाल से ढक लिया था। उनके साथ मौजूद एक व्यक्ति ने इस पल को कैमरे में रिकॉर्ड किया और उनसे सड़क पर अकेले चलने के अनुभव के बारे में पूछा। इस पर दीपके ने खुशी जताते हुए कहा कि कई महीनों बाद वह इस तरह सड़क पर अकेले चल रहे हैं। उन्होंने ट्रैफिक रुकने की स्थिति को ही उनके लिए पैदल चलने का मौका बनने वाला कारण बताया।

    दीपके ने कहा कि सड़क पर कोई उनके साथ नहीं है और इस तरह अकेले चलना उन्हें अच्छा लग रहा है। उन्होंने इसे अच्छा अनुभव बताया। चेहरे पर नकाब लगाने की वजह से वह कुछ समय के लिए आम लोगों की तरह सड़क पर पैदल चल सके।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अभिजीत दीपके और उनके संगठन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है। आंदोलन की शुरुआत 2 अक्टूबर से मुंबई में करने की घोषणा की गई है। संगठन की ओर से मुंबई के शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की योजना बताई गई थी। हालांकि, मुंबई पुलिस ने वहां प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी है। पुलिस ने शिवाजी पार्क के इस्तेमाल से जुड़े नियमों और अन्य प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया है।

    दीपके ने अनुमति नहीं मिलने के बावजूद आंदोलन जारी रखने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अगर प्रदर्शन के अधिकार से रोका गया तो जेल भरो आंदोलन किया जाएगा। संगठन की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की जा रही है। यह मांग मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर उठाई गई है।

    चुनाव आयोग ने दूसरी ओर कहा है कि संस्थागत विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है तथा आयोग के फैसले कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हैं। इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग दावे और प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    अभिजीत दीपके इससे पहले भी आंदोलनों को लेकर चर्चा में रहे हैं। अब 2 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले उनका मुंबई की सड़क पर नकाब लगाकर अकेले पैदल चलना भी चर्चा का विषय बन गया है। उनके मुताबिक, ट्रैफिक जाम की वजह से मिला यह मौका उन्हें कई महीनों बाद सामान्य तरीके से सड़क पर चलने का अनुभव दे गया।

  • ट्रंप ने सुंदर पिचई को कहा ‘मॉन्स्टर’, गूगल CEO ने मुस्कुराकर दिया जवाब

    ट्रंप ने सुंदर पिचई को कहा ‘मॉन्स्टर’, गूगल CEO ने मुस्कुराकर दिया जवाब


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित एआई बैठक के बाद गूगल के सीईओ सुंदर पिचई को ‘मॉन्स्टर’ कहकर संबोधित किया। हालांकि, ट्रंप का इशारा अपमान की ओर नहीं बल्कि पिचई की तकनीकी क्षेत्र में प्रभावशाली पहचान और सफलता की ओर था। पिचई ने भी मुस्कुराते हुए इस टिप्पणी का हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया।

    मंगलवार को ट्रंप ने एआई और टेक्नोलॉजी जगत के कई दिग्गजों के साथ व्हाइट हाउस में बैठक की। इसमें पिचई के अलावा मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, एंथ्रोपिक के सीईओ डारियो अमोदेई, एनवीडिया के सीईओ जेनसन हुआंग और अन्य प्रमुख तकनीकी कंपनियों के अधिकारी शामिल हुए। बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने पिचई की ओर इशारा करते हुए उन्हें ‘मॉन्स्टर’ बताया।

    ट्रंप बोले- ‘यह व्यक्ति मॉन्स्टर है’

    ट्रंप ने पिचई को पत्रकारों से परिचित कराते हुए कहा कि ये लोग दुनिया के बड़े टेक लीडर हैं और पिचई के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इसके बाद उन्होंने पिचई की ओर इशारा करते हुए उन्हें ‘मॉन्स्टर’ बताया और कहा कि वे बिना रोजाना मीडिया का सामना किए शानदार जिंदगी जी रहे हैं।

    ट्रंप के बयान का संदर्भ पिचई की तकनीकी उपलब्धियों और प्रभाव से था। अमेरिकी बोलचाल में किसी व्यक्ति को अपने क्षेत्र में ‘मॉन्स्टर’ कहना असाधारण क्षमता या प्रभाव के लिए प्रशंसा के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है।

    पिचई ने इस टिप्पणी पर मुस्कुराते हुए कहा कि उम्मीद है कि इससे बेहतर टैगलाइन हो सकती थी कि ‘मैं मॉन्स्टर हूं’। उनके जवाब के बाद वहां मौजूद लोगों के बीच हल्का माहौल बन गया।

    एआई पर टेक कंपनियों ने किया स्वैच्छिक समझौता

    ट्रंप और टेक कंपनियों के प्रमुखों की बैठक का मुख्य मुद्दा उन्नत एआई तकनीक की सुरक्षा और निगरानी था। बैठक के बाद प्रमुख टेक कंपनियों ने एआई के विकास के लिए एक स्वैच्छिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसमें कंपनियों ने आंतरिक नियंत्रण मजबूत करने, स्वतंत्र बाहरी ऑडिट कराने और बोर्ड स्तर पर जोखिमों की समीक्षा जैसे कदमों पर सहमति जताई है।

    समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। ट्रंप ने इसे ‘मॉरल बाइंडिंग’ यानी नैतिक रूप से बाध्यकारी समझौता बताया और कहा कि एआई कंपनियों को खुद अपनी तकनीक पर निगरानी रखनी होगी।

    ट्रंप ने AI को ‘सुपर इंटेलिजेंस’ कहने का निर्देश दिया

    ट्रंप प्रशासन ने सरकारी संदर्भों में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ के बजाय ‘सुपर इंटेलिजेंस’ शब्द इस्तेमाल करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। ट्रंप का कहना है कि मौजूदा एआई तकनीक की क्षमताएं पारंपरिक ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की पुरानी अवधारणा से काफी आगे निकल चुकी हैं।

    ट्रंप ने यह भी कहा कि वह एआई के विकास को रोकने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि अमेरिका को इस तकनीकी क्षेत्र में अपनी बढ़त बनाए रखनी चाहिए। इसी के साथ उन्होंने कंपनियों से सुरक्षा और निगरानी के लिए खुद जिम्मेदारी लेने पर जोर दिया।

    पिचई बोले- सुपर इंटेलिजेंस पर हुआ समझौता

    बैठक के बाद सुंदर पिचई ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण बातचीत थी और उन्होंने ‘व्हाइट हाउस एकॉर्ड ऑन सुपर इंटेलिजेंस’ पर हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने बताया कि गूगल एआई क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है और आगे भी ऐसे उत्पाद विकसित करने पर काम जारी रखेगा, जो लोगों और कारोबारों के लिए उपयोगी हों।

    इस समझौते में कंपनियों की ओर से एआई सिस्टम के विकास और इस्तेमाल के दौरान जोखिमों की पहचान, आंतरिक नियंत्रण और स्वतंत्र समीक्षा जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।

  • पंजाब कांग्रेस में चुनाव से पहले फेरबदल: राजा वडिंग ने छोड़ा अध्यक्ष पद नए चेहरे को लेकर हाईकमान में मंथन तेज

    पंजाब कांग्रेस में चुनाव से पहले फेरबदल: राजा वडिंग ने छोड़ा अध्यक्ष पद नए चेहरे को लेकर हाईकमान में मंथन तेज


    नई दिल्ली। पंजाब कांग्रेस में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले बड़ा संगठनात्मक बदलाव सामने आया है। पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद पार्टी में नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस की ओर से नए अध्यक्ष के नाम की औपचारिक घोषणा अभी बाकी है लेकिन कई वरिष्ठ नेताओं के नाम संभावित दावेदारों के तौर पर सामने आ रहे हैं। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक पूर्व मंत्री विजय इंदर सिंगला का नाम प्रमुखता से चर्चा में है। उनके अलावा जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा का नाम भी सामने आया है।

    राजा वडिंग ने अप्रैल 2022 में पंजाब कांग्रेस की कमान संभाली थी। उनका कार्यकाल ऐसे समय शुरू हुआ था जब राज्य में कांग्रेस संगठन को अंदरूनी मतभेदों और चुनावी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। हाल के महीनों में पार्टी के भीतर अलग अलग नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक चर्चा का विषय बने। रिपोर्टों के मुताबिक वडिंग के नेतृत्व को लेकर पार्टी के एक धड़े में असहमति थी और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से जुड़े नेताओं की ओर से भी संगठन में बदलाव की मांग उठती रही।

    इस बीच कांग्रेस ने सितंबर में सचिन पायलट को पंजाब मामलों का प्रभारी नियुक्त किया। पायलट ने राज्य इकाई के नेताओं के साथ बातचीत कर संगठन की स्थिति का जायजा लिया। रिपोर्टों के अनुसार उनके स्तर पर पार्टी संगठन से जुड़े फीडबैक को हाईकमान के सामने रखा गया जिसके बाद प्रदेश अध्यक्ष को बदलने का फैसला सामने आया। कांग्रेस के सामने अब नए अध्यक्ष के चयन के साथ अलग अलग गुटों के बीच समन्वय बनाए रखने की चुनौती भी है।

    नए अध्यक्ष की चर्चा में विजय इंदर सिंगला का नाम प्रमुखता से सामने आया है। वह पंजाब सरकार में मंत्री रह चुके हैं और कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। रिपोर्टों में उन्हें संभावित दावेदारों में आगे बताया गया है। हालांकि अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान की ओर से किया जाना है और आधिकारिक घोषणा होने तक किसी नाम को तय अध्यक्ष मानना उचित नहीं होगा।

    परगट सिंह भी संभावित नामों में शामिल हैं। वह जालंधर कैंट से विधायक हैं और भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान रह चुके हैं। दूसरी ओर सुखजिंदर सिंह रंधावा गुरदासपुर से सांसद हैं और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। इनके अलावा कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं के नाम भी अलग अलग रिपोर्टों में संभावित दावेदारों के रूप में सामने आए हैं।

    पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित हैं और इसी वजह से कांग्रेस के लिए प्रदेश संगठन में नेतृत्व का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है। नए अध्यक्ष के सामने संगठन को सक्रिय करने उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाने तथा चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाने जैसी जिम्मेदारियां होंगी। पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर अंतिम तस्वीर कांग्रेस हाईकमान की आधिकारिक घोषणा के बाद ही साफ होगी।

    फिलहाल राजा वडिंग के इस्तीफे के बाद पंजाब कांग्रेस में नए नेतृत्व को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। विजय इंदर सिंगला परगट सिंह और सुखजिंदर सिंह रंधावा प्रमुख नामों में शामिल बताए जा रहे हैं जबकि अन्य वरिष्ठ नेताओं के नाम भी संभावित सूची में हैं। इसलिए अगले कुछ दिनों में होने वाली आधिकारिक घोषणा पर सभी की नजरें बनी हुई हैं।

  • महाराष्ट्र में सूखे का गहराता संकट: 80% फसलें तबाह, जलाशयों में 12% पानी

    महाराष्ट्र में सूखे का गहराता संकट: 80% फसलें तबाह, जलाशयों में 12% पानी


    मुंबई। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में इस बार बारिश की कमी ने खरीफ की फसलों को बर्बाद कर दिया है। लातूर, बीड और धाराशिव समेत प्रभावित इलाकों में करीब 80 फीसदी फसलें सूख चुकी हैं, जबकि लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत जल भंडारण महज 12.5 फीसदी रह गया है। किसान अब सिर्फ मौजूदा फसल के नुकसान से नहीं, बल्कि अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने और परिवार का खर्च चलाने के संकट से भी जूझ रहे हैं।

    आसमान से देखने पर मराठवाड़ा के कई हिस्से भले ही हरे दिखाई दें, लेकिन जमीन पर पहुंचते ही सूखे की भयावह तस्वीर सामने आती है। खेतों में सोयाबीन पीली पड़ चुकी है, कपास की बढ़वार रुक गई है, अरहर मुरझा गई है और गन्ना अपनी सामान्य ऊंचाई तक पहुंचने से पहले ही सूखने लगा है। लातूर, बीड और धाराशिव के आसपास बारिश की बेरुखी ने किसानों की खरीफ की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है।

    खर्च भी नहीं निकलने की चिंता

    मराठवाड़ा में लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में हैं। जून से सितंबर के बीच इन इलाकों में सामान्य बारिश 679.5 मिमी के मुकाबले सिर्फ 424.5 मिमी बारिश दर्ज हुई। बारिश की कमी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। पशुओं के चारे, ग्रामीण मजदूरी, घरेलू आमदनी और अगली फसल के लिए जरूरी पूंजी पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है।

    लातूर जिले के देवकरा गांव में पहली बार किसी किसान की आत्महत्या का मामला सामने आया है। दो एकड़ जमीन के काश्तकार तुकाराम गुट्टे ने आत्महत्या कर ली। कीनगांव से आगे बढ़ने पर खेतों में खड़ी फसलों के बजाय सूखे का असर साफ दिखाई देता है। सोयाबीन, कपास और अरहर की फसलें सूख रही हैं।

    हिंगणगांव के किसान तुकाराम अंबाजी करीब 40 एकड़ में खेती करते हैं। उन्होंने फसल पर प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपए खर्च किए हैं। उनका कहना है कि मौजूदा हालात देखकर ऐसा लगता है कि फसल से लागत निकलना भी मुश्किल होगा।

    डेढ़ लाख खर्च कर बोई फसल, हटाने में भी 40 हजार लगेंगे

    हगदल गांव के किसान बालाजी मुंडे गन्ने के खेत की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि सामान्य स्थिति में गन्ना 20 से 25 फुट तक ऊंचा होता है, लेकिन इस बार 10 से 12 फुट पर ही उसकी बढ़वार रुक गई है। अब फसल सूखने लगी है।

    मुंडे के मुताबिक, वर्ष 2025 में ज्यादा बारिश ने परेशान किया था और इस साल बारिश की कमी ने संकट खड़ा कर दिया है। सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे सोयाबीन, अरहर और ज्वार की खेती करते हैं। उन्होंने आठ एकड़ की फसल पर करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च किए हैं।

    अब स्थिति यह है कि यदि फसल पूरी तरह खराब हो जाती है तो खेत साफ करने के लिए भी प्रति एकड़ करीब 5 हजार रुपए खर्च करने पड़ेंगे। यानी आठ एकड़ की फसल हटाने में करीब 40 हजार रुपए और लगेंगे। बेल्लाडे के मुताबिक, फसल में कुछ बचा तो वह सिर्फ मवेशियों के चारे के काम आएगा।

    नदियां सूखीं, जलाशयों में सिर्फ 12.5% पानी

    लातूर और बीड जिलों में तालाबों और जलाशयों में पानी का स्तर भी तेजी से नीचे गया है। लातूर की जीवनवाहिनी मानी जाने वाली माजरा नदी भी सूखने की स्थिति में पहुंच गई है। लातूर शहर से करीब 70 किलोमीटर दूर धाराशिव और बीड की सीमा के पास स्थित माजरा बांध का जलस्तर बेहद नीचे पहुंच चुका है।

    लातूर जिले के 158 जलाशयों में औसत स्टोरेज करीब 12.5 फीसदी ही बचा है। क्षेत्र का नवाबकालीन साइ डैम भी इसी जल इतिहास का हिस्सा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल बताते हैं कि कभी साइ डैम के पानी से लातूर की प्यास बुझती थी, लेकिन अब यह इस्तेमाल में नहीं है। उनका कहना है कि जल रिसाव रोकने और पानी के बेहतर प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाता तो संकट की तीव्रता कुछ कम की जा सकती थी।

    बुआई से अब फसल हटाने तक पहुंचा संकट

    लातूर और आसपास के किसानों से बातचीत में वर्ष 1972 का सूखा बार-बार सामने आता है। पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद की सबसे गंभीर सूखा परिस्थितियों में से एक मानते हैं।

    इस बार संकट के संकेत मानसून के शुरुआती महीनों में ही दिखाई देने लगे थे। पहले किसानों के सामने बुआई का संकट था। इसके बाद बारिश की कमी के बीच खड़ी फसल को बचाने की चुनौती आई। अब तीसरा और सबसे गंभीर चरण सामने है—खराब हो चुकी फसल को खेत से हटाना और अगली खेती के लिए पूंजी जुटाना।

    किसानों के लिए समस्या सिर्फ इस साल की फसल के नुकसान तक सीमित नहीं है। यदि मौजूदा फसल से लागत नहीं निकलती और अगली बुआई के लिए पैसा नहीं बचता है तो इसका असर अगले कृषि चक्र पर भी पड़ सकता है।

    राहत के लिए 50 हजार करोड़ तक का बोझ

    महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित इलाकों में राहत प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठाए हैं। सितंबर के अंत में राज्य के 265 तालुकों के बाद 43 और तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में जोड़ा गया है। फसल नुकसान के पंचनामे, पानी और चारे की व्यवस्था समेत राहत उपायों पर चर्चा हुई है।

    अधिकारियों का अनुमान है कि सूखे से निपटने के लिए सरकारी खजाने पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। हालांकि किसानों के सामने राहत की जरूरत तत्काल है। फसल नुकसान की भरपाई, पीने और खेती के लिए पानी, पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराने के साथ ही अगली फसल तक परिवार का खर्च चलाने के लिए आय का सहारा भी जरूरी है।

    मराठवाड़ा के खेतों में सूखती फसलें इस संकट की सबसे साफ तस्वीर पेश कर रही हैं। किसानों के लिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस सीजन की फसल कितनी बची, बल्कि यह भी है कि अगली खेती शुरू करने के लिए वे पूंजी कहां से जुटाएंगे।

  • Form-6 से SIR का अतिरिक्त कॉलम हटने पर अभिजीत दीपके का तंज, बोले- ‘पहले क्यों जरूरत थी?’

    Form-6 से SIR का अतिरिक्त कॉलम हटने पर अभिजीत दीपके का तंज, बोले- ‘पहले क्यों जरूरत थी?’


    नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी कर चुके राज्यों में ऑनलाइन Form-6 से SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा हटा दी है। आयोग के इस फैसले पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आयोग के फैसले से जुड़ी खबर साझा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तंज कसा और लिखा- “पहले क्यों जरूरत थी, ज्ञानू?”

    Form-6 में अब अतिरिक्त घोषणा जरूरी नहीं

    चुनाव आयोग के मुताबिक, जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां नए मतदाता पंजीकरण के लिए ऑनलाइन Form-6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा अब नहीं भरनी होगी। यह बदलाव 26 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की मौजूदगी में हुई पूर्ण आयोग की बैठक के बाद किया गया।

    आयोग के अनुसार, Form-6 के साथ जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा SIR की प्रक्रिया के लिए थी। इसके तहत नए आवेदकों से यह जानकारी मांगी जाती थी कि वे, उनके माता-पिता या दादा-दादी पहले किसी गहन पुनरीक्षण के दौरान तैयार मतदाता सूची में शामिल थे या नहीं।

    जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया अभी जारी है, वहां यह घोषणा फिलहाल उपलब्ध है। वहीं, जहां प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां ECINET ऐप और पोर्टल के साथ संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पोर्टल से भी इसे हटा दिया गया है। अब ऐसे राज्यों में नए मतदाताओं को केवल ‘मतदाता पंजीकरण नियम, 1960’ के तहत निर्धारित वैधानिक Form-6 भरना होगा।

    Form-6 में बदलाव पर पहले उठे थे सवाल

    Form-6 में SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर पहले भी विवाद हुआ था। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form-6 में किए गए बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों अधिकारियों ने इस तरह के बदलाव को लेकर कानूनी प्रक्रिया और वैधानिक फॉर्म में संशोधन के अधिकार पर सवाल उठाए थे।

    एक अन्य इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर 14 अलग-अलग मौकों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें Form-6 में बदलाव के अलावा SIR से जुड़े अन्य मुद्दे भी शामिल थे।

    हालांकि, इन रिपोर्टों पर चुनाव आयोग का कहना रहा है कि आयोग के भीतर होने वाली चर्चाएं और मतभेद निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा अंतिम फैसले पूर्ण आयोग की ओर से लिए जाते हैं।

    दीपके ने सवाल के अंदाज में साधा निशाना

    Form-6 से अतिरिक्त घोषणा हटाए जाने के बाद अभिजीत दीपके ने इसी पुराने विवाद को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने आयोग के फैसले से संबंधित खबर शेयर करते हुए लिखा- “पहले क्यों जरूरत थी, ज्ञानू?”

    उनकी टिप्पणी का आशय इस बात से था कि अगर SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अतिरिक्त घोषणा को हटाया जा सकता है, तो इसे Form-6 में जोड़ने की जरूरत क्यों पड़ी थी।

    CJP के प्रदर्शन का भी ऐलान

    इस बीच चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक विवाद जारी है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं और उनके इस्तीफे की मांग की है।

    अभिजीत दीपके ने यह भी कहा है कि मुंबई पुलिस की अनुमति नहीं मिलने के बावजूद उनकी पार्टी CJP 2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में विरोध प्रदर्शन करेगी। उन्होंने पुलिस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे नागरिकों की आवाज दबाने का प्रयास बताया है। दीपके ने कहा है कि अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में CJP गांधी जयंती पर ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करेगी।

    इस तरह Form-6 से SIR की अतिरिक्त घोषणा हटाने के चुनाव आयोग के फैसले के बाद एक ओर प्रक्रिया में बदलाव हुआ है, वहीं दूसरी ओर इसी मुद्दे को लेकर आयोग पर पहले उठे सवाल और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी चर्चा में बनी हुई हैं।

  • नीला ड्रम कांड: दोषी ठहराए जाने के बाद फूट-फूट कर रोए मुस्कान-साहिल, रात का खाना भी नहीं खाया

    नीला ड्रम कांड: दोषी ठहराए जाने के बाद फूट-फूट कर रोए मुस्कान-साहिल, रात का खाना भी नहीं खाया


    मेरठ। सौरभ राजपूत हत्याकांड में दोषी ठहराए जाने के बाद मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला भावुक हो गए। बुधवार को दोनों जिला जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत की कार्यवाही में शामिल हुए थे। सुनवाई के दौरान मुस्कान की गोद में उसकी नन्हीं बेटी भी मौजूद थी। अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद दोनों रोते हुए वीसी रूम से बाहर निकले। वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा के मुताबिक, दोनों ने रात का खाना भी नहीं खाया।

    दोषी ठहराए जाने के बाद एक-दूसरे से भी दूरी

    बुधवार को जिला जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मुस्कान और साहिल की पेशी कराई गई। सुनवाई के दौरान मुस्कान अपनी नन्हीं बेटी को गोद में लिए हुए थी। वरिष्ठ जेल अधीक्षक ने बताया कि अदालत की कार्यवाही पूरी होने के बाद दोनों काफी उदास नजर आए। इसके बाद दोनों रोते हुए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूम से बाहर निकले। कार्यवाही खत्म होने के बाद भी मुस्कान और साहिल ने एक-दूसरे से दूरी बनाए रखी। दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा तक नहीं और अपने-अपने बैरक की ओर चले गए।

    फैसले के दिन सुबह से बेचैन थे दोनों

    जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा के अनुसार, बुधवार को फैसला आने की वजह से मुस्कान और साहिल सुबह से ही बेचैन दिखाई दे रहे थे। मुस्कान दिनभर पूजा-पाठ में लगी रही। दोनों ने दिन में भी सामान्य से कम खाना खाया। अदालत की ओर से दोषी करार दिए जाने के बाद दोनों की उदासी और बढ़ गई। जेल प्रशासन के मुताबिक, दोनों ने रात का खाना खाने से इनकार कर दिया और बाद में अपने-अपने बैरक में चले गए।

    अदालत ने दोनों को हत्या का दोषी माना

    मेरठ के जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा द्वितीय की अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पत्रावलियों के आधार पर मुख्य आरोपी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को सौरभ राजपूत की हत्या का दोषी करार दिया। अदालत ने कहा कि पत्रावलियों में मौजूद साक्ष्य इस बात को साबित करते हैं कि दोनों ने मिलकर वारदात को अंजाम दिया। इसके साथ ही अदालत ने सजा सुनाने के लिए 14 अक्टूबर की तारीख तय की है।

    सजा पर पक्ष रखने के लिए 15 दिन का समय

    वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हुई कार्यवाही के दौरान जिला जज ने मुस्कान और साहिल से सजा के बिंदु पर उनका पक्ष रखने को कहा। अदालत ने दोनों दोषियों को यह बताने के लिए 15 दिन का समय दिया है कि उनकी सजा क्यों कम की जानी चाहिए।

    इस अवधि में दोनों दोषी अपनी सफाई या दलील अदालत के सामने रख सकेंगे। इसके बाद 14 अक्टूबर को अदालत सजा का ऐलान करेगी। फिलहाल दोनों को दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन सजा की अवधि अभी तय नहीं हुई है। अगली सुनवाई इसी बिंदु पर होगी।