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  • सनातन की एकता में ही सुरक्षा और मजबूती, अलग-अलग स्वर पराजय का कारण बनेंगे: सीएम योगी

    सनातन की एकता में ही सुरक्षा और मजबूती, अलग-अलग स्वर पराजय का कारण बनेंगे: सीएम योगी


    नई दिल्ली।
    गोरखपुर में मंगलवार को मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सनातन धर्म की एकता में ही हमारी सुरक्षा और मजबूती है। उन्होंने कहा कि पंथ और संप्रदाय की उपासना पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सभी का कल्याण वृहद सनातन धर्म की मजबूती में है। उनका कहना था कि 140 करोड़ लोग एक स्वर में हुंकार भरेंगे तो दुनिया की कोई ताकत सामने नहीं ठहर सकती। अलग-अलग गति प्रगति का कारण नहीं, बल्कि दुर्गति और अलग-अलग स्वर ताकत नहीं, बल्कि पराजय का कारण बनेंगे। मुख्यमंत्री गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित सप्त दिवसीय समारोह के तहत व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने दोनों आचार्यों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया।

    सीएम योगी ने कहा कि अयोध्या में भगवान राम और सनातन का वैभव जिन्हें स्वीकार नहीं है, वे दुष्प्रचार और भ्रम पैदा करेंगे। उन्होंने संजीवनी बूटी लेने जाते समय हनुमान जी द्वारा कालनेमि को पहचानने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि रामभक्तों को भी भ्रम फैलाने वालों को पहचानना होगा। उन्होंने महंत दिग्विजयनाथ के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे भारत की आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानते थे। उनके अनुसार संपूर्ण स्वाधीनता के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी जरूरी थी। महंत दिग्विजयनाथ का मानना था कि यदि सोमनाथ मंदिर की पुनर्प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है तो अयोध्या में भी यह कार्य होना चाहिए।

    1949 में रामलला के प्रकटीकरण के समय महंत दिग्विजयनाथ, बाबा अभिराम दास और महंत रामचंद्र दास परमहंस सक्रिय थे। इसकी रणनीति देवीपाटन में महंत दिग्विजयनाथ, महाराजा बलरामपुर और तत्कालीन गोंडा जिलाधिकारी केके नायर के बीच बनी थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि 500 वर्षों बाद अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर सनातन धर्मावलंबियों को गौरव की अनुभूति करा रहा है।

    मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि और विंध्यवासिनी धाम का भव्य स्वरूप सामने है। उन्होंने प्रयागराज महाकुंभ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस आयोजन ने दुनिया के सामने सनातन परंपरा का सामर्थ्य रखा है। उन्होंने वृंदावन के वैष्णव कुंभ का भी उल्लेख किया। मुख्यमंत्री के अनुसार महंत दिग्विजयनाथ ने बिखरे नाथ संप्रदाय को अखिल भारतीय भेष बारह पंथ योगी महासभा के रूप में एकजुट किया था। उन्होंने कहा कि अपनी परंपरा का पालन करते हुए वृहद सनातन धर्म की एकता को मजबूत करना होगा। सीएम योगी ने कहा कि दोनों आचार्यों ने जिन विषयों के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। महापुरुषों के दूरदर्शी कार्य भविष्य की मजबूत नींव तैयार करते हैं और गोरक्षपीठ तथा महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद दोनों आचार्यों के आदर्शों को आगे बढ़ा रहे हैं।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि देश गुलाम था और संसाधनों का अभाव था, तब महंत दिग्विजयनाथ ने 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की। महाराणा प्रताप को आदर्श बनाने के पीछे स्वदेश, स्वाभिमान और स्वधर्म का भाव था। उन्होंने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना में भी महंत दिग्विजयनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विश्वविद्यालय के लिए मठ की संपत्ति और दो संस्थाएं सरकार को देने में उन्होंने श्रेय की चिंता नहीं की।

    आज महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत 50 से 55 संस्थाएं संचालित हैं, जिनमें विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, आयुर्वेद कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक, विद्यालय, अस्पताल और कृषि विज्ञान केंद्र शामिल हैं। सीएम योगी ने कहा कि महंत दिग्विजयनाथ ने उस दौर में बालिका शिक्षा के लिए विद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए। गोरखपुर में फर्टिलाइजर कारखाने और बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्थापना के प्रयासों को आगे बढ़ाने में भी उनकी भूमिका रही। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ नाथ परंपरा की पीठ होते हुए भी पूरे सनातन धर्म के लिए समर्पित है। यहां जाति, पंथ या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होता। सभी जातियों के लोग एक पंक्ति में अन्न ग्रहण करते हैं और सभी आचार्यों व संतों को समान सम्मान मिलता है।
  • विधान परिषद चुनाव 2026: बीजेपी ने बिहार और यूपी की 10 सीटों पर घोषित किए उम्मीदवार, दरभंगा से सर्वेश कुमार और आगरा से हरि किशोर तिवारी को टिकट

    विधान परिषद चुनाव 2026: बीजेपी ने बिहार और यूपी की 10 सीटों पर घोषित किए उम्मीदवार, दरभंगा से सर्वेश कुमार और आगरा से हरि किशोर तिवारी को टिकट


    नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने बिहार और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान परिषद चुनाव 2026 के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। पार्टी ने दोनों राज्यों की कुल 10 सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की घोषणा की है। इनमें बिहार की चार और उत्तर प्रदेश की छह सीटें शामिल हैं। बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति ने स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के नामों को स्वीकृति प्रदान की है। घोषित सूची में दरभंगा स्नातक सीट से सर्वेश कुमार, आगरा शिक्षक सीट से इंजीनियर हरि किशोर तिवारी, पटना शिक्षक सीट से नवल किशोर यादव और वाराणसी स्नातक सीट से केदार नाथ सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। पार्टी ने अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के लिए स्नातक और शिक्षक वर्ग से जुड़े प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारा है।

    बिहार में विधान परिषद की चार सीटों पर चुनाव होना है। बीजेपी ने कोशी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. एन.के. यादव को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। दरभंगा स्नातक सीट से सर्वेश कुमार को टिकट दिया गया है। वहीं, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नवल किशोर यादव और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नरेंद्र प्रसाद सिंह को प्रत्याशी बनाया गया है। इस तरह बिहार की चारों सीटों के लिए पार्टी ने अपने उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है। सूची में दो स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। इन सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए बीजेपी ने अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतार दिया है।

    उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की छह सीटों के लिए बीजेपी ने उम्मीदवार घोषित किए हैं। पार्टी ने वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से डॉ. प्रमोद मिश्रा को टिकट दिया है, जबकि आगरा शिक्षक सीट से इंजीनियर हरि किशोर तिवारी चुनाव लड़ेंगे। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से ध्रुव त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया गया है। इसके अलावा वाराणसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से केदार नाथ सिंह, मेरठ स्नातक सीट से दिनेश गोयल और इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से अशोक कुमार राठौर को उम्मीदवार घोषित किया गया है। उत्तर प्रदेश की छह सीटों में तीन शिक्षक और तीन स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। बीजेपी ने सभी सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों को अंतिम रूप देते हुए सूची जारी कर दी है।

    बिहार और उत्तर प्रदेश में होने वाले इन चुनावों में स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें शामिल हैं। विधान परिषद चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही दोनों राज्यों में इन सीटों पर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव भी होने हैं। ऐसे में राज्य में हो रहे विधान परिषद चुनाव को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बीजेपी ने अपनी सूची में दोनों राज्यों की सभी 10 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नाम घोषित कर दिए हैं। बिहार में कोशी, दरभंगा, पटना और तिरहुत निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार उतारे गए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में वाराणसी, आगरा, गोरखपुर-फैजाबाद, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी के स्नातक एवं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए प्रत्याशियों की घोषणा की गई है।

  • बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की पदाधिकारियों को दोटूक सलाह, संगठन की जिम्मेदारी निभाएं और दिल्ली के चक्कर लगाने से बचें

    बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की पदाधिकारियों को दोटूक सलाह, संगठन की जिम्मेदारी निभाएं और दिल्ली के चक्कर लगाने से बचें

    नई दिल्ली: में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी के प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों को संगठनात्मक जिम्मेदारियों पर ध्यान देने की सलाह देते हुए दिल्ली के बार-बार चक्कर लगाने से बचने को कहा। 29 सितंबर 2026 को आयोजित बैठक में उन्होंने पदाधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें संगठन में जो जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसे प्राथमिकता के साथ निभाना चाहिए। बैठक के दौरान नितिन नवीन ने कहा कि पदाधिकारी दिल्ली की परिक्रमा करने के बजाय अपने निर्धारित संगठनात्मक कार्यों पर ध्यान दें। उन्होंने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि कई पदाधिकारियों के दिल्ली दरबार में बार-बार आने की लगातार शिकायतें सामने आ रही थीं।

    बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में 29 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नवनियुक्त प्रभारी तथा सह-प्रभारी शामिल हुए। बैठक के दौरान पार्टी अध्यक्ष ने उपस्थित सभी पदाधिकारियों को संबोधित किया और संगठन की ओर से सौंपी गई जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाने की बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि पदाधिकारियों को अपने कार्यक्षेत्र में संगठन को मजबूत करने और निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। बैठक में दिल्ली आने-जाने को लेकर दिए गए उनके संदेश को संगठनात्मक अनुशासन और जिम्मेदारियों के निर्वहन से जोड़कर देखा गया।

    बैठक के दौरान नितिन नवीन ने पदाधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि दिल्ली की परिक्रमा मत करना। उन्होंने कहा कि कई पदाधिकारियों के दिल्ली दरबार में जरूरत से ज्यादा चक्कर लगाने की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों को अपने-अपने राज्यों तथा निर्धारित क्षेत्रों में रहकर संगठनात्मक कामकाज पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी। पार्टी अध्यक्ष ने बैठक में शामिल पदाधिकारियों को यह संदेश दिया कि संगठन में मिली जिम्मेदारी को निभाना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके संबोधन में बार-बार दिल्ली आने के बजाय अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय रहकर संगठन के काम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

    बीजेपी की इस उच्चस्तरीय बैठक में आगामी विधानसभा चुनावों की रणनीति पर भी विस्तार से चर्चा की गई। इसके साथ ही पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने और आने वाले राजनीतिक कार्यक्रमों की तैयारियों को लेकर मंथन हुआ। बैठक में प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों की भूमिका तथा उनके माध्यम से राज्यों में संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाने से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी की रणनीति और संगठन के स्तर पर किए जाने वाले कार्यों पर विचार-विमर्श किया गया। बैठक में मौजूद सभी पदाधिकारियों को संगठनात्मक विषयों और आगामी कार्यक्रमों के संबंध में दिशा-निर्देश दिए गए।

    नितिन नवीन ने बैठक के दौरान पदाधिकारियों को दोटूक संदेश देते हुए संगठन की जिम्मेदारियों को प्राथमिकता देने और दिल्ली के अनावश्यक चक्कर लगाने से बचने की बात कही। बैठक में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों, संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और राजनीतिक कार्यक्रमों को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। प्रदेश प्रभारियों और सह-प्रभारियों की यह बैठक पार्टी के संगठनात्मक कामकाज और आगामी कार्यक्रमों की तैयारियों के लिहाज से आयोजित की गई थी।

  • पीएम मोदी की डिग्री मामले में अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाई कोर्ट से झटका, 25 हजार रुपये का जुर्माना बरकरार

    पीएम मोदी की डिग्री मामले में अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाई कोर्ट से झटका, 25 हजार रुपये का जुर्माना बरकरार


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग को लेकर चल रहे मामले में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को गुजरात हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली है। मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीए रे की डिवीजन बेंच ने केजरीवाल की अपील खारिज कर दी। अदालत ने उनके खिलाफ पहले लगाए गए 25 हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा है।
    केजरीवाल ने सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें जुर्माना लगाया गया था और प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित जानकारी देने के केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को रद्द कर दिया गया था। डिवीजन बेंच ने कहा कि पुराने फैसले में बदलाव करने का कोई आधार नहीं है। इससे पहले 24 सितंबर को अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

    यह मामला वर्ष 2016 में शुरू हुआ था, जब अरविंद केजरीवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की थी। अप्रैल 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की डिग्री से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। इस आदेश के बाद गुजरात विश्वविद्यालय ने अदालत का रुख किया और आयोग के निर्देश को चुनौती दी। विश्वविद्यालय की याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद केजरीवाल ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। अब डिवीजन बेंच ने उनकी अपील भी खारिज कर दी है, जिससे विश्वविद्यालय को जानकारी उपलब्ध कराने के आयोग के आदेश को रद्द करने का पूर्व फैसला बरकरार है।

    इस मामले में 31 मार्च 2023 को हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने अरविंद केजरीवाल पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। अदालत ने कहा था कि सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल उचित तरीके से नहीं किया गया। इस आदेश के खिलाफ केजरीवाल ने अपील की थी और जुर्माना हटाने की मांग की थी। अदालत में उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा। उन्होंने जुर्माने को हटाने की मांग करते हुए दलीलें पेश कीं। वहीं, गुजरात विश्वविद्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले को लंबे समय तक चलाया गया और विश्वविद्यालय के खिलाफ कई प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की गईं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पहले फैसला सुरक्षित रखा और 29 सितंबर को अपील खारिज करने का आदेश सुनाया।

    मामले की शुरुआत के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। अप्रैल 2016 में केंद्रीय सूचना आयोग के निर्देश के बाद गुजरात विश्वविद्यालय ने अदालत में इसे चुनौती दी थी। इसी दौरान मई 2016 में गुजरात विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एमएन पटेल ने कहा था कि नरेंद्र मोदी ने वर्ष 1983 में राजनीति विज्ञान विषय से एमए की पढ़ाई पूरी की थी। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री को इस परीक्षा में 62.3 प्रतिशत अंक मिले थे। उन्होंने यह भी कहा था कि विश्वविद्यालय ने बाद में डिग्री से जुड़ी जानकारी अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराई थी। इस तरह वर्ष 2016 में शुरू हुआ मामला कई वर्षों तक अदालत में चला। अब गुजरात हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने केजरीवाल की अपील खारिज करते हुए 25 हजार रुपये के जुर्माने को कायम रखा है।

  • गांधीनगर निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस ने 44 प्रत्याशियों को सुरक्षित स्थान पर भेजा, बीजेपी ने उठाए सवाल

    गांधीनगर निकाय चुनाव से पहले कांग्रेस ने 44 प्रत्याशियों को सुरक्षित स्थान पर भेजा, बीजेपी ने उठाए सवाल


    नई दिल्ली। गांधीनगर नगर निगम चुनाव में नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद कांग्रेस ने अपने सभी 44 प्रत्याशियों को एक अज्ञात सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है। पार्टी ने यह कदम संभावित पोचिंग और राजनीतिक दबाव से प्रत्याशियों को बचाने के लिए उठाया है। कांग्रेस के अनुसार, सभी उम्मीदवार 29 सितंबर तक पार्टी की निगरानी में रहेंगे, क्योंकि इसी दिन नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख है। गुजरात की राजधानी में निकाय चुनाव का प्रचार तेज होने के बीच कांग्रेस के इस कदम से चुनावी गतिविधियों में नया राजनीतिक विवाद सामने आया है।

    कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की ओर से उसके प्रत्याशियों और उनके परिजनों को फोन कर नामांकन वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि प्रत्याशियों को डराने-धमकाने और उन पर अनुचित दबाव डालने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के मुताबिक, संभावित राजनीतिक दबाव और प्रत्याशियों को अपने पक्ष में करने की कोशिशों से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखना जरूरी समझा गया। इसी वजह से नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी 44 प्रत्याशियों को गुप्त स्थान पर भेजा गया है।

    दूसरी ओर, बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। बीजेपी ने कांग्रेस के इस कदम पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर पार्टी को अपने ही प्रत्याशियों पर भरोसा है, तो उन्हें इस तरह सुरक्षित स्थान पर रखने की जरूरत क्यों पड़ी। बीजेपी ने कांग्रेस के दावों को स्वीकार नहीं किया और प्रत्याशियों को छिपाकर रखने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। इस बीच बीजेपी के सभी 44 प्रत्याशियों ने अपनी चुनावी तैयारियों को आगे बढ़ाते हुए जनसेवा का संकल्प लिया। विधानसभा परिसर के पास डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा के सामने आयोजित कार्यक्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और हर्ष संघवी भी मौजूद रहे। बीजेपी प्रत्याशियों ने शहर के समग्र विकास और जनहित में काम करने का वादा किया।

    गांधीनगर नगर निगम चुनाव में कुल 11 वार्डों की 44 सीटों पर मुकाबला होना है। बीजेपी और कांग्रेस की ओर से दाखिल किए गए सभी नामांकन वैध पाए गए हैं, जबकि आम आदमी पार्टी का एक पर्चा रद्द हुआ है। 29 सितंबर को नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद चुनावी तस्वीर साफ हो जाएगी। इसके बाद 11 अक्टूबर को मतदान कराया जाएगा और 13 अक्टूबर को मतगणना होगी।

  • एंटीलिया विस्फोटक और मनसुख हिरेन हत्याकांड में सचिन वाजे को जमानत, कोर्ट ने लगाईं कड़ी पाबंदियां

    एंटीलिया विस्फोटक और मनसुख हिरेन हत्याकांड में सचिन वाजे को जमानत, कोर्ट ने लगाईं कड़ी पाबंदियां


    नई दिल्ली। मुंबई के चर्चित एंटीलिया विस्फोटक मामले और मनसुख हिरेन हत्याकांड में पूर्व पुलिस अधिकारी सचिन वाजे को विशेष एनआईए अदालत से जमानत मिल गई है। विशेष न्यायाधीश चकोर एस. बाविस्कर ने 29 सितंबर 2026 को वाजे की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उनकी रिहाई के लिए कई कड़ी शर्तें तय की हैं। अदालत ने इस फैसले में वाजे के लंबे समय से हिरासत में रहने, मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में लगने वाले संभावित समय और सह-आरोपियों को मिली राहत जैसे पहलुओं पर विचार किया। वाजे को 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत मुचलके और इतनी ही राशि के स्थानीय जमानतदार पर रिहा किया जाएगा।

    जमानत के साथ अदालत ने वाजे की गतिविधियों पर कई तरह की पाबंदियां लगाई हैं। मुख्य गवाहों के बयान दर्ज होने तक वह मुंबई, नवी मुंबई, रायगढ़, ठाणे और पालघर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। उन्हें सात दिनों के भीतर इन जिलों से बाहर प्रस्तावित आवास का पता अदालत को देना होगा। इसके अलावा अपना पासपोर्ट एनआईए के पास जमा करना होगा। वाजे को प्रत्येक रविवार दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच स्थानीय पुलिस स्टेशन में उपस्थित होकर हाजिरी देनी होगी। एनआईए या पुलिस की ओर से कॉल अथवा वीडियो कॉल किए जाने पर उन्हें अपनी लोकेशन की जानकारी भी देनी होगी। अदालत की तय शर्तों का उल्लंघन होने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

    जमानत पर विचार करते समय अदालत ने मामले में यूएपीए के तहत आतंकवादी कृत्य और देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरे से जुड़े पहलुओं को भी देखा। आदेश में कथित विस्फोटक सामग्री, गवाहों के बयान और अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों का संदर्भ दिया गया। अदालत के सामने यह भी तथ्य रहा कि सचिन वाजे 13 मार्च 2021 से हिरासत में हैं। मामले में करीब 320 गवाह बताए गए हैं और चार्जशीट 14,000 से अधिक पन्नों की है। ऐसे में मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में लंबा समय लगने की संभावना को भी अदालत ने जमानत पर विचार करने के दौरान ध्यान में रखा। इसके साथ ही सह-आरोपी प्रदीप शर्मा और सुनील माने को मिली जमानत का पहलू भी सामने आया।

    मामला 25 फरवरी 2021 को उस समय सामने आया था, जब दक्षिण मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी के आवास एंटीलिया के पास विस्फोटक से लदी एक एसयूवी कार बरामद हुई थी। व्यवसायी मनसुख हिरेन ने दावा किया था कि यह एसयूवी उनके पास से चोरी हुई थी। इसके कुछ दिनों बाद 5 मार्च 2021 को पड़ोसी जिले ठाणे में हिरेन का शव मिला। इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ी और सचिन वाजे को गिरफ्तार किया गया। एनआईए के अनुसार, वाजे मुकेश अंबानी के आवास के पास एसयूवी खड़ी करने में संलिप्त था। एजेंसी ने दावा किया कि इसका मकसद अमीर लोगों में दहशत पैदा करना और एक बड़े नेता की ओर से कथित तौर पर तय किए गए 100 करोड़ रुपये के मासिक उगाही के लक्ष्य को पूरा करने के लिए पैसे वसूलना था।

    एनआईए ने यह भी दावा किया कि पूर्व एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा अपनी खोई हुई पहचान वापस पाना चाहता था। जांच एजेंसी के अनुसार, इसके बाद सचिन वाजे ने मनसुख हिरेन की हत्या की साजिश रची। एजेंसी का दावा था कि हिरेन ने विस्फोटक मामले में दोष लेने से इनकार कर दिया था और उसे ऐसी कमजोर कड़ी माना जा रहा था, जो कथित साजिश का खुलासा कर सकता था। इन आरोपों और मामले में चल रही न्यायिक प्रक्रिया के बीच अदालत ने वाजे को जमानत तो दी है, लेकिन गवाहों के बयान दर्ज होने तक पांच जिलों में प्रवेश समेत कई प्रतिबंध लागू रहेंगे।

  • INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल

    INDIA ब्लॉक की बैठक कल, SIR और चुनाव आयोग पर विपक्ष बनाएगा संयुक्त रणनीति, अखिलेश यादव नहीं होंगे शामिल


    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में होगी। बैठक में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR, चुनाव आयोग के भीतर सामने आए मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल संसद में प्रस्ताव लाने और इन मुद्दों पर संयुक्त रूप से आगे की रणनीति तैयार करने पर भी विचार कर सकते हैं। करीब साढ़े तीन महीने बाद होने वाली इस बैठक में चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच समन्वय को लेकर भी चर्चा हो सकती है।

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बैठक में शामिल नहीं होंगे। उनकी जगह पार्टी का एक अन्य नेता प्रतिनिधित्व करेगा। वहीं, शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में जुड़ेंगे। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत के मुताबिक, पार्टी 2 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन की तैयारियों में व्यस्त है। पार्टी ने संबंधित प्रदर्शन को समर्थन देने की बात भी कही है। ऐसे में बैठक में उद्धव ठाकरे की भागीदारी ऑनलाइन होगी, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से अखिलेश यादव के स्थान पर दूसरा नेता मौजूद रहेगा।

    बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के शामिल होने की संभावना है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, सांसद अभिषेक बनर्जी, राजद नेता तेजस्वी यादव, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और CPI(M) महासचिव एमए बेबी के भी पहुंचने की उम्मीद है। एमए बेबी ने अरविंद केजरीवाल से मुलाकात के बाद बताया था कि कांग्रेस बैठक के लिए विपक्षी दलों के बीच समन्वय कर रही है। उनके मुताबिक, केजरीवाल ने चुनाव आयोग के खिलाफ अभियान की जरूरत पर जोर दिया और इस मुद्दे पर अपनी पार्टी में चर्चा करने की बात कही।

    I.N.D.I.A. ब्लॉक की पिछली बैठक 8 जून को हुई थी, जिसमें 23 विपक्षी दल शामिल हुए थे। उस बैठक में SIR और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी। हालांकि, आम आदमी पार्टी और DMK उस बैठक में शामिल नहीं हुई थीं। इसके बावजूद 28 जून को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भेजे गए विपक्षी दलों के संयुक्त पत्र पर AAP और DMK ने भी हस्ताक्षर किए थे। पत्र में चुनाव आयोग और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे। पिछली बैठक के बाद अब विपक्षी दल एक बार फिर इन विषयों पर साथ बैठने जा रहे हैं।

    30 सितंबर की बैठक में विपक्षी दलों के बीच समन्वय, SIR के खिलाफ संभावित संयुक्त कार्रवाई और चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दों पर आगे की दिशा तय करने पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग और संसद में प्रस्ताव लाने से जुड़े विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। बैठक में अलग-अलग विपक्षी दलों के रुख और आगे की संयुक्त रणनीति को लेकर चर्चा होने की उम्मीद है।

  • तेलंगाना CM रेवंत रेड्डी के भगवान शिव और राम पर बयान से विवाद, BJP ने कांग्रेस पर लगाया मानसिक दिवालियापन का आरोप

    तेलंगाना CM रेवंत रेड्डी के भगवान शिव और राम पर बयान से विवाद, BJP ने कांग्रेस पर लगाया मानसिक दिवालियापन का आरोप


    नई दिल्ली। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के भगवान शिव और भगवान राम को लेकर दिए गए बयान पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। रेवंत रेड्डी ने एक कार्यक्रम के दौरान बीजेपी पर भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर बीजेपी की ओर से ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया जाता है, जबकि ‘हर हर महादेव’ का जयघोष नहीं किया जाता। मुख्यमंत्री ने भगवान शिव को गरीबों का देवता और भगवान राम को अमीरों का भगवान बताया। उनके इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी और विश्व हिंदू परिषद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

    रेवंत रेड्डी ने अपने संबोधन में भगवान शिव और भगवान राम की आस्था को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के संदर्भ में भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत में भगवान राम की पूजा अधिक होती है, जबकि दक्षिण भारत में भगवान शिव के प्रति आस्था मजबूत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी ने भगवान राम को राजनीतिक भावना से जोड़ दिया है और उन्हें राजनीतिक प्रतीक बना लिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि बीजेपी के सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया जाता है, लेकिन ‘हर हर महादेव’ का नारा क्यों नहीं लगाया जाता। इसी दौरान उन्होंने भगवान शिव को ‘गरीबों का भगवान’ और भगवान राम को ‘अमीरों का भगवान’ बताया।

    मुख्यमंत्री ने अपने बयान में गांधी परिवार और संघ परिवार को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने गांधी परिवार को देश के लिए बलिदान का प्रतीक बताया, जबकि संघ परिवार पर धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर भारत को बांटने का आरोप लगाया। रेवंत रेड्डी ने कहा कि भगवान राम को बीजेपी ने राजनीतिक भावना से जोड़ दिया है। उन्होंने भगवान शिव को गरीबों का देवता बताते हुए कहा कि यही वजह है कि बीजेपी के कार्यक्रमों में ‘हर हर महादेव’ की जगह ‘जय श्री राम’ का नारा सुनाई देता है। उनके इस बयान के बाद धार्मिक प्रतीकों और राजनीति के संबंध को लेकर सियासी बहस तेज हो गई।

    रेवंत रेड्डी की टिप्पणी पर बीजेपी की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी और राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री के बयान को मानसिक दिवालियापन बताया। बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद ने मुख्यमंत्री की टिप्पणी की आलोचना की। उनका कहना है कि भगवान शिव और भगवान राम को अलग-अलग सामाजिक वर्गों से जोड़कर इस तरह की टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी रेवंत रेड्डी के बयान पर आपत्ति जताई और कहा कि मुख्यमंत्री को इस तरह की टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में रेवंत रेड्डी की भगवान शिव, भगवान राम और बीजेपी की धार्मिक राजनीति को लेकर की गई टिप्पणियां हैं। मुख्यमंत्री ने ‘जय श्री राम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारों का अंतर बताते हुए बीजेपी पर भगवान राम को राजनीतिक प्रतीक बनाने का आरोप लगाया। वहीं बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद ने उनके बयान को लेकर कड़ा विरोध जताया और इसे मानसिक दिवालियापन बताया। इस बयान के बाद कांग्रेस और बीजेपी के बीच धार्मिक प्रतीकों, राजनीतिक विचारधारा और उत्तर-दक्षिण भारत के संदर्भ में बयानबाजी तेज हो गई है।

  • कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    नई दिल्ली: में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने दवाओं के प्राइस टू रिटेलर यानी PTR और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए बताया गया कि करीब 3,000 रुपये की PTR वाली दवा का MRP 27,000 रुपये है। अदालत ने सवाल किया कि जब दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,000 रुपये है, तो उसका अधिकतम खुदरा मूल्य 27,000 रुपये क्यों रखा गया है। अदालत ने यह भी पूछा कि आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि जरूरी दवाओं के लिए एक समान मूल्य निर्धारण मानदंड क्यों नहीं अपनाया जा सकता। अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की बिक्री की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है। अदालत ने सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों की दवाओं के खर्च को लेकर भी सवाल किया और कहा कि अंततः इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है।

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की जरूरत है, जिसमें सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बना रहे। अदालत ने दवाओं की कीमतों में अंतर और आवश्यक दवाओं के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी रखी। कैंसर की दवा के PTR और MRP के बीच सामने आए भारी अंतर को लेकर अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों मौजूद है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

    दूसरी ओर, केरल हाई कोर्ट ने भी सस्ती जीवनरक्षक कैंसर दवाओं की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार की शक्तियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार के पास जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति की व्यवस्था करने की शक्ति है। जरूरत पड़ने पर सरकार किसी कंपनी को दवा बनाने के लिए निर्देश दे सकती है। यह मामला महंगी कैंसर दवाओं को लेकर जून 2022 में दाखिल याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की सुनवाई पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो गई थी। अदालत ने कहा कि सरकार को सस्ती दवाओं की जरूरत, मरीजों की संख्या और सब्सिडी से होने वाले लाभ का आकलन करना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने तत्काल दवाओं का उत्पादन शुरू करने का आदेश नहीं दिया।

    इन दोनों मामलों में कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत, दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और आम मरीजों के लिए सस्ती जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दवाओं के PTR और MRP के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठे हैं, जबकि केरल हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित में सरकार के पास मौजूद कानूनी शक्तियों पर टिप्पणी की है। दोनों सुनवाइयों में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले खर्च से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई है।

  • मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    मल्लिकार्जुन खड़गे ने CEC ज्ञानेश कुमार पर लगाए गंभीर आरोप, कहा- लोकतंत्र को कमजोर कर रही चुनाव प्रक्रिया

    नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मंगलवार को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। दिल्ली के इंदिरा भवन में हुई बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को लेकर चर्चा की गई। खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मोदी सरकार की कठपुतली बन गए हैं और मतदाता सूची से नाम हटाकर लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर दिया।

    खड़गे ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने देश के पूर्वजों द्वारा बनाई गई मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में उन्होंने कहा कि पूरा देश अब जानता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का उद्देश्य भाजपा को लाभ पहुंचाना है। खड़गे ने ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जिनके दबाव में मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर ऐसा किया, प्रधानमंत्री मोदी को भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी की चिंताओं को बैठक में रखा।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर भी अपनी मांग सामने रखी। उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें इसकी पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने और अपील करने का अवसर भी मिलना चाहिए। खड़गे ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा और फैसलों में पारदर्शिता की मांग की। उनका कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव और चुनाव से जुड़े निर्णयों के संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता बनी रहे।

    खड़गे ने कहा कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी एक बार फिर कांग्रेस के कंधों पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने पिछले 12 वर्षों के दौरान देश की मजबूत लोकतांत्रिक नींव को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया है। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं से जुड़े मामलों में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर चर्चा की गई।

    मंगलवार की बैठक में खड़गे के बयानों के केंद्र में चुनाव आयोग की भूमिका, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया और चुनावी फैसलों में पारदर्शिता के मुद्दे रहे। खड़गे ने अपने आरोपों के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई और प्रधानमंत्री मोदी से भी नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है।