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  • म्यांमार के रखाइन में बाजार के पास हवाई हमला, 49 लोगों की मौत, 58 घायल; 22 की हालत गंभीर

    म्यांमार के रखाइन में बाजार के पास हवाई हमला, 49 लोगों की मौत, 58 घायल; 22 की हालत गंभीर

    नई दिल्ली। म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य में स्थानीय बाजार के पास हुए हवाई हमले में कम से कम 49 लोगों की मौत हो गई, जबकि 58 अन्य घायल बताए गए हैं। क्याउक्ताव टाउनशिप में सोमवार दोपहर हुए इस हमले में बाजार में सामान बेच रहे व्यापारी, खरीदारी करने पहुंचे लोग और राहगीर भी चपेट में आ गए। घायलों में 22 लोगों की हालत गंभीर बताई गई है। हमले के बाद इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। हालांकि, हताहतों की संख्या की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

    अराकान आर्मी की ओर से मंगलवार तड़के जारी बयान के मुताबिक, सोमवार दोपहर एक लड़ाकू विमान ने क्याउक्ताव टाउनशिप में स्थित स्थानीय बाजार के पास दो बम गिराए। संगठन के अनुसार, हमले में 49 लोगों की मौत हुई और 58 लोग घायल हुए। घायलों में 22 की स्थिति गंभीर बताई गई है। रखाइन में बचाव कार्य से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी वाई हुन आंग ने भी घटनास्थल पर मौजूद बचावकर्मियों के हवाले से हताहतों की संख्या की पुष्टि की। हमले के बाद प्रभावित इलाके में बचाव और राहत से जुड़े प्रयास किए गए।

    क्याउक्ताव टाउनशिप म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य में स्थित है और इस क्षेत्र पर शक्तिशाली जातीय सशस्त्र संगठन अराकान आर्मी का नियंत्रण है। यह इलाका मांडले से करीब 340 किलोमीटर पश्चिम में है। हमले की चपेट में आया बाजार पूरे रखाइन राज्य के प्रमुख थोक केंद्रों में शामिल बताया गया है। यहां अलग-अलग इलाकों से व्यापारी और खरीदार पहुंचते थे। बचाव कार्य से जुड़े अधिकारी वाई हुन आंग ने इस हमले को रखाइन में हुए सबसे घातक हवाई हमलों में से एक बताया है। हालांकि, घटना से जुड़े सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    हमले के बाद अराकान आर्मी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों और संगठनों के खिलाफ जल्द प्रभावी जवाबी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। इस घटना को म्यांमार में लंबे समय से जारी संघर्ष के बीच हुई एक बड़ी हिंसक घटना के तौर पर बताया गया है। क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई और सशस्त्र संगठनों के बीच संघर्ष के कारण आम लोगों की सुरक्षा लगातार प्रभावित होती रही है। बाजार जैसे सार्वजनिक स्थान पर हमले के कारण बड़ी संख्या में लोगों के प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है।

    म्यांमार में 1 फरवरी 2021 को सेना द्वारा आंग सान सू की की निर्वाचित सरकार को सत्ता से हटाए जाने के बाद से संघर्ष जारी है। सैन्य शासन के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई के बाद कई लोकतंत्र समर्थक समूहों ने हथियार उठा लिए थे। इसके बाद सेना और विभिन्न विद्रोही संगठनों के बीच संघर्ष तेज हुआ। देश के कई हिस्सों में हवाई हमलों और सशस्त्र झड़पों की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी जारी संघर्ष के बीच पश्चिमी रखाइन राज्य के क्याउक्ताव टाउनशिप में बाजार के पास हुए इस हवाई हमले में 49 लोगों की मौत और 58 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते करेगा सुनवाई, आयोग के फैसलों की प्रक्रिया पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करेगा। मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने उठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मामले में जल्द सुनवाई की मांग रखी, जिसके बाद अदालत ने याचिका को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी। याचिका में यह सवाल उठाया गया है कि क्या चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्थान से जुड़े फैसले अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए जा सकते हैं।

    याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ फैसले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंजूरी के बिना लिए गए। इसमें कहा गया है कि आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 के तहत सामूहिक रूप से फैसले लेने की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। याचिका में चुनाव आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप, निर्णय लेने की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों से जुड़े कई मुद्दे उठाए गए हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने समेत कई मांगें भी की गई हैं।

    मामले में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से सवाल उठाया गया है कि SIR से जुड़े फैसले पूरे आयोग की सहमति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं। याचिका में दावा किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मामलों में आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों को चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया है और इसी आधार पर याचिका में आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के अधिकार तथा प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है।

    याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ी मांगों के साथ यह भी कहा गया है कि आयोग में निहित सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि आयोग के नाम पर लिए गए फैसलों में सभी सदस्यों की भूमिका और सहमति किस तरह रही। इस मामले का एक प्रमुख हिस्सा SIR से जुड़े निर्णय हैं, जिनको लेकर याचिका में यह जानने की मांग की गई है कि संबंधित फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर लिए गए थे या नहीं।

    वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रशासनिक मुद्दों से जुड़े थे और उनका SIR या आयोग के नीतिगत फैसलों से संबंध नहीं था। ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया, मुख्य चुनाव आयुक्त की शक्तियों और SIR से जुड़े फैसलों को लेकर उठाए गए सवालों पर सुनवाई होगी। अदालत अगले सप्ताह इस मामले में याचिका में की गई मांगों और उठाए गए मुद्दों पर विचार करेगी।

  • शरद पवार ने NCP विलय की अटकलों पर साफ किया रुख, बोले- हम कहीं नहीं जाएंगे, साथ आना है तो हमारे साथ आएं

    शरद पवार ने NCP विलय की अटकलों पर साफ किया रुख, बोले- हम कहीं नहीं जाएंगे, साथ आना है तो हमारे साथ आएं

    नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में NCP (SP) के संभावित विलय और NDA के साथ जाने को लेकर चल रही अटकलों के बीच शरद पवार ने सोमवार को पार्टी का रुख स्पष्ट कर दिया। मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक को संबोधित करते हुए NCP (SP) प्रमुख ने कहा कि उनकी पार्टी कहीं नहीं जाने वाली है। उन्होंने साफ कहा कि यदि किसी को उनके साथ आना है तो वह उनके साथ आए। शरद पवार के इस बयान से पार्टी के किसी दूसरे दल में विलय करने और सत्ता पक्ष के साथ जाने की चर्चाओं के बीच उनका रुख सामने आ गया है।

    शरद पवार ने कहा कि पार्टी को लेकर कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। पिछले कई महीनों से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा थी कि NCP (SP) भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA के साथ जा सकती है। इसके साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर भी चर्चा होती रही है। सोमवार को मुंबई में आयोजित पार्टी की बैठक में शरद पवार ने इन चर्चाओं के बीच स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी सत्ता हासिल करने के लिए किसी दूसरे दल में विलय नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि अब संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाएगा।

    पार्टी की राज्य इकाई की बैठक करीब ढाई घंटे तक चली। इस दौरान संगठन से जुड़े मुद्दों के साथ सूखे की स्थिति और किसानों की समस्याओं पर भी चर्चा हुई। शरद पवार ने कहा कि बैठक में उन्हें सूखे को लेकर कई तरह की मांगें और सुझाव मिले हैं। उन्होंने सूखा राहत के मुद्दे पर सरकार को आंदोलन की चेतावनी भी दी। बैठक में किसानों से जुड़े विषयों पर चर्चा के साथ सूखे की स्थिति को लेकर पार्टी की आगे की रणनीति पर भी विचार किया गया। शरद पवार ने इस मुद्दे को लेकर सरकार के सामने मांगें रखने की बात कही।

    शरद पवार के बयान में उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार को भी अप्रत्यक्ष संदेश माना गया। सुनेत्रा पवार अजित पवार गुट से जुड़ी हैं। NCP के दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर लंबे समय से राजनीतिक चर्चाएं चल रही थीं। ऐसे समय में शरद पवार ने कहा कि NCP (SP) कहीं नहीं जा रही है और अगर किसी को उनके साथ आना है तो वह उनके साथ आए। उनके इस रुख के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में दोनों गुटों के संभावित विलय को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है।

    NCP (SP) फिलहाल महा विकास आघाड़ी का हिस्सा है। इस गठबंधन में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूटीबी) और कांग्रेस भी शामिल हैं। शरद पवार के बयान से पार्टी की मौजूदा राजनीतिक दिशा को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है। वहीं, बैठक में सूखे और किसानों की समस्याओं को लेकर भी पार्टी ने सरकार पर दबाव बनाने का संकेत दिया। इस तरह सोमवार की बैठक में संगठन को मजबूत करने, विलय की अटकलों और सूखा राहत जैसे प्रमुख मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे।

  • कोलकाता में पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन से जुड़े 15 ठिकानों पर ED की छापेमारी, दुर्गा पूजा प्रीव्यू शो के नाम पर करोड़ों जुटाने का आरोप

    कोलकाता में पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन से जुड़े 15 ठिकानों पर ED की छापेमारी, दुर्गा पूजा प्रीव्यू शो के नाम पर करोड़ों जुटाने का आरोप


    नई दिल्ली : कोलकाता में प्रवर्तन निदेशालय ने कथित वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए MassArt सोसाइटी से जुड़े 15 ठिकानों पर छापेमारी की है। इनमें पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता इंद्रनील सेन से जुड़े परिसर भी शामिल हैं। यह कार्रवाई दुर्गा पूजा के प्रीव्यू शो के नाम पर कथित तौर पर बाजार से करोड़ों रुपये जुटाने और उस धनराशि से जुड़ी गतिविधियों की जांच के तहत की जा रही है। जांच का संबंध MassArt सोसाइटी की गतिविधियों और प्रीव्यू शो के नाम पर लोगों से जुटाई गई रकम से बताया जा रहा है।

    दुर्गा पूजा की तैयारियों के बीच सामने आए इस मामले में आरोप है कि MassArt सोसाइटी ने दुर्गा पूजा के प्रीव्यू शो आयोजित करने के नाम पर आम लोगों से बड़ी रकम जुटाई। इसके लिए पूजा पास बेचने की बात भी सामने आई है। जांच एजेंसी का आरोप है कि संस्था के नाम पर जुटाई गई इस रकम का इस्तेमाल उससे जुड़े लोगों ने निजी फायदे के लिए किया। मामले में कई लोगों और संस्थाओं को जांच के दायरे में रखा गया है। एजेंसी की ओर से की जा रही तलाशी के दौरान दस्तावेजों और अन्य संदिग्ध रिकॉर्ड की जांच की जा रही है, ताकि धनराशि जुटाने और उसके इस्तेमाल से संबंधित जानकारी सामने आ सके।

    मंगलवार तड़के शुरू हुई कार्रवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय की टीमें पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन और उनके करीबियों से जुड़े परिसरों पर पहुंचीं। इनमें हाइलैंड पार्क और हिंदुस्तान पार्क स्थित उनके ठिकाने भी शामिल हैं। इसके अलावा उनके रिश्तेदारों और अन्य संबंधित स्थानों पर भी तलाशी अभियान चलाया गया। दी गई जानकारी के अनुसार, कोलकाता में इंद्रनील सेन के घर समेत कुल 10 जगहों पर ED की टीमें तलाशी कर रही थीं। तलाशी के दौरान उनके घर से कुछ सबूत मिलने की बात भी सामने आई है। कार्रवाई का उद्देश्य मामले से जुड़े दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड की जांच करना है।

    जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू MassArt सोसाइटी की पहचान और उसके नाम पर धन जुटाने से जुड़ा है। एजेंसी को जानकारी मिली है कि संस्था को लोगों के सामने यूनेस्को से मान्यता प्राप्त या उससे जुड़ी संस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था। इसी आधार पर विभिन्न गतिविधियों के लिए धन जुटाए जाने की बात कही गई है। जांच एजेंसी अब इस पूरे मामले में संस्था की गतिविधियों, प्रीव्यू शो के नाम पर जुटाई गई रकम और उससे जुड़े लोगों की भूमिका की पड़ताल कर रही है। कार्रवाई के दौरान सामने आने वाले दस्तावेज और रिकॉर्ड इस जांच का हिस्सा हैं।

  • प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी की मौत पर सवाल, ग्राइंडर, मोबाइल और डायरी से जांच में सामने आएंगे कई राज

    प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी की मौत पर सवाल, ग्राइंडर, मोबाइल और डायरी से जांच में सामने आएंगे कई राज

    नई दिल्ली ।वृंदावन में प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण की मौत का मामला जांच के घेरे में है। दीपक ने शुक्रवार सुबह करीब साढ़े 10 बजे गुरुकृपा कुंज अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से छलांग लगा दी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोट और अधिक रक्तस्राव के कारण मौत की बात सामने आई है। पुलिस मामले को आत्महत्या से जोड़कर जांच कर रही है।

    जांच के दौरान पुलिस को दीपक के कमरे से इलेक्ट्रिक ग्राइंडर, मोबाइल फोन, डायरी और अन्य सामान मिला है। इन वस्तुओं को कब्जे में लेकर जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फोरेंसिक जांच के बाद मौत से जुड़ी परिस्थितियों को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।

    दीपक मध्य प्रदेश के जबलपुर के गौर इलाके के परसवाड़ा गांव का रहने वाला था। परिवार के अनुसार, वह पढ़ाई में काफी तेज था और पढ़-लिखकर नौकरी करना चाहता था। उसके रिश्तेदार बृजेश कुमार पटेल ने बताया कि दीपक स्वभाव से सीधा-सादा था और उसका अधिकांश ध्यान पढ़ाई पर रहता था। वह अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए नौकरी की तैयारी कर रहा था।

    परिवार के मुताबिक, कॉलेज के दौरान दीपक की धार्मिक रुचि बढ़ने लगी। इसके बाद उसने भक्ति का मार्ग अपना लिया। नर्मदा परिक्रमा करने के बाद वह वृंदावन पहुंचा और प्रेमानंद महाराज के आश्रम से जुड़ गया। यहीं से उसे रसिक दुलारी शरण के नाम से भी जाना जाने लगा।

    परिजनों ने बताया कि दीपक वर्ष 2024 में आश्रम से जुड़ा था। इसके बाद उसका परिवार से संपर्क लगातार कम होता गया। एक बार वृंदावन से जबलपुर लौटने के बाद वह दोबारा वहां गया और करीब दो साल से घर नहीं आया था। परिवार का कहना है कि आश्रम में रहने के दौरान उसका संपर्क उनसे लगभग पूरी तरह खत्म हो गया था।

    दीपक के बहनोई सोनू पटेल ने भी बताया था कि वह परिवार में सबसे अच्छा लड़का था। उनके मुताबिक, आश्रम से जुड़ने के बाद दीपक के पास मोबाइल भी नहीं रहता था, इसलिए परिवार के लोग उससे बातचीत नहीं कर पाते थे। परिजनों का आरोप है कि वे आश्रम के बाहर घंटों इंतजार करते रहे, लेकिन उन्हें दीपक से मिलने का मौका नहीं मिला।

    दीपक की मौत की जानकारी मिलने के बाद परिवार के सदस्य वृंदावन पहुंचे। परिजनों का कहना है कि वे उसकी मौत की परिस्थितियों को लेकर संतुष्ट नहीं हैं। उनका दावा है कि मौत से जुड़े कई सवालों का जवाब जांच के बाद ही मिल सकेगा।

    मामले में सामने आए सीसीटीवी फुटेज के आधार पर पुलिस आत्महत्या के पहलू की जांच कर रही है। हालांकि, परिवार इस निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग की है।

    पुलिस ने मौके से मिले मोबाइल, डायरी, इलेक्ट्रिक ग्राइंडर और अन्य सामान को जांच का हिस्सा बनाया है। अब फोरेंसिक जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मौत की परिस्थितियों की पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के पीछे वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं।

  • ‘अरे! कम से कम एक साल का समय दीजिए’; TMC के चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का तंज

    ‘अरे! कम से कम एक साल का समय दीजिए’; TMC के चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी का तंज


    नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को समयसीमा में फैसला लेने का निर्देश दिया है। इस आदेश पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने तंज कसा है। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने व्यंग्य करते हुए कहा कि चुनाव आयोग को इस मामले में कम से कम एक साल का समय दिया जाना चाहिए था।

    दरअसल, TMC के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच पार्टी के नाम और ‘फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न को लेकर विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने 18 सितंबर को अंतरिम व्यवस्था के तहत मूल पार्टी के नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए गए।

    सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ्ते में दलीलें पूरी करने को कहा

    सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दोनों गुटों को चुनाव आयोग के समक्ष अपनी दलीलें और जरूरी दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया। इसके बाद चुनाव आयोग को दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के तीन महीने के भीतर विवाद पर फैसला करने का निर्देश दिया गया है। इस तरह पूरी प्रक्रिया के लिए प्रभावी तौर पर करीब चार महीने की समयसीमा तय हुई है।

    पीठ ने कहा कि दोनों पक्ष चार सप्ताह के भीतर अपने हलफनामे, अतिरिक्त हलफनामे और अन्य जरूरी सामग्री रिकॉर्ड पर रखें। इसके बाद चुनाव आयोग मामले पर निर्णय लेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई असाधारण कठिनाई सामने आती है तो आयोग दोबारा अदालत का रुख कर सकता है।

    चुनाव आयोग ने मांगा था छह महीने का समय

    सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसे विवादों में बड़ी संख्या में दस्तावेज और हलफनामे जमा होते हैं, जिनकी जांच में समय लगता है। आयोग की ओर से मामले का फैसला करने के लिए छह महीने का समय मांगा गया था।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की मांग स्वीकार नहीं की। पीठ ने तीन महीने की अवधि को पर्याप्त माना।

    क्या है पूरा विवाद?

    TMC में संगठनात्मक विवाद के बाद दो गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अपना दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने विवाद का अंतिम निपटारा होने तक दोनों गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल और घास’ चिह्न के इस्तेमाल से रोकते हुए अंतरिम तौर पर अलग-अलग नाम और प्रतीक दिए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश इसी विवाद के अंतिम निपटारे की समयसीमा से जुड़ा है। अब दोनों पक्षों को चार सप्ताह में चुनाव आयोग के समक्ष अपना पक्ष पूरा करना होगा और उसके बाद आयोग को तीन महीने के भीतर अपना फैसला देना होगा।

  • ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    ममता बनर्जी की पार्टी में बड़ी टूट, 100 से ज्यादा नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल, उपचुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक हलचल

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के लिए उपचुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मालदा के महीष बाथानी क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े 100 से अधिक नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें 13 पंचायत सदस्य, एक पंचायत समिति सदस्य, पार्टी के क्षेत्रीय अध्यक्ष, ब्लॉक उपाध्यक्ष और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल बताए गए हैं।

    यह दल-बदल ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं। महीष बाथानी क्षेत्र में रविवार को आयोजित कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में तृणमूल समर्थकों ने कांग्रेस का दामन थामा। इस दौरान कांग्रेस के जिला और प्रदेश स्तर के नेता तथा एक पूर्व विधायक भी मौजूद रहे।

    महीष बाथानी क्षेत्र को पहले कांग्रेस का मजबूत इलाका माना जाता था। हालांकि, ममता बनर्जी के राजनीतिक प्रभाव के बढ़ने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव मजबूत हुआ। अब बड़ी संख्या में तृणमूल नेताओं और कार्यकर्ताओं के कांग्रेस में जाने से क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले शराफत अली ने कहा कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा के खिलाफ लड़ाई के लिए कांग्रेस के साथ आना जरूरी है। उन्होंने क्षेत्रीय दल के तौर पर तृणमूल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने की बात कही।

    पश्चिम बंगाल में 6 अक्टूबर को नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर उपचुनाव होना है, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने के बाद खाली हुई है। दूसरी ओर रेजीनगर सीट आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर के नौदा सीट बरकरार रखने के कारण खाली हुई। रेजीनगर से उनके बेटे चुनाव मैदान में हैं।

    ममता बनर्जी के गुट ने रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, नंदीग्राम को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रही हैं। ममता बनर्जी के गुट की ओर से यह सीट कांग्रेस के लिए छोड़ने की पेशकश किए जाने की बात सामने आई थी, जबकि रेजीनगर में समर्थन मांगे जाने का भी जिक्र हुआ। कांग्रेस ने दोनों सीटों पर समर्थन देने की मांग को स्वीकार नहीं किया।

    नंदीग्राम सीट पर ममता गुट के उम्मीदवार के तौर पर नामित संचिता प्रधान डे ने नाम वापस ले लिया है। इसके चलते इस सीट पर ममता गुट के पास फिलहाल कोई उम्मीदवार नहीं है।

    इसी बीच तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी मामला चल रहा है। चुनाव आयोग ने तृणमूल नाम और ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न को फ्रीज किया हुआ है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को अंतिम फैसला लेने के लिए समयसीमा तय की है।

    अदालत ने संबंधित पक्षों को हलफनामे और अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद चुनाव आयोग को तीन महीने के भीतर नाम और चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर फैसला लेने को कहा गया है। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से समय लगने की दलील दी गई, जिस पर अदालत ने निर्धारित अवधि में फैसला लेने को कहा। अदालत ने इस प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद लेने का सुझाव भी दिया है।

  • केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, अडानी को ‘भाई’ और जय शाह को ‘भतीजा’ बताते हुए लगाए कई गंभीर आरोप

    केजरीवाल का मोदी सरकार पर हमला, अडानी को ‘भाई’ और जय शाह को ‘भतीजा’ बताते हुए लगाए कई गंभीर आरोप

    नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक बार फिर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि लोगों को उम्मीद थी कि नई सरकार के आने के बाद भाई-भतीजावाद खत्म होगा और देश में बदलाव आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केजरीवाल ने दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में भाई-भतीजावाद का सबसे बड़ा उदाहरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हैं।

    केजरीवाल ने कहा कि मोदी का एक ‘भाई’ है, जिसका नाम अडानी है। उनके मुताबिक, पिछले 12 वर्षों में अगर किसी एक व्यक्ति ने सबसे ज्यादा आर्थिक तरक्की की है तो वह अडानी हैं। इसी तरह उन्होंने जय शाह को प्रधानमंत्री का ‘भतीजा’ बताते हुए कहा कि इस अवधि में किसी युवा ने सबसे ज्यादा तरक्की की है तो वह जय शाह हैं। केजरीवाल ने इन उदाहरणों के आधार पर मोदी सरकार पर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

    उन्होंने कहा कि 12 साल के शासन के बाद जनता को यह देखना चाहिए कि उसे क्या हासिल हुआ। केजरीवाल ने दावा किया कि इस दौरान मीडिया और चुनाव व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। उन्होंने राजनीतिक दल बदलने की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि पहले विधायक या नेता के पार्टी बदलने को अनैतिक माना जाता था, लेकिन अब बड़े पैमाने पर दल-बदल और सरकारें गिराने की घटनाओं को राजनीतिक रणनीति के रूप में पेश किया जाता है।

    केजरीवाल ने कहा कि विधायकों और सांसदों के दल बदलने तथा सरकारों को गिराने की घटनाओं को ‘चाणक्य नीति’ बताना गलत है। उन्होंने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में विधायकों की खरीद-फरोख्त हुई और इसके लिए पैसे तथा केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यों को रणनीति नहीं बल्कि देश के साथ विश्वासघात के रूप में देखा जाना चाहिए।

    उन्होंने अपने राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने आयकर विभाग में संयुक्त आयुक्त की नौकरी छोड़कर झुग्गियों में काम किया और करीब 10 साल वहां लोगों के बीच बिताए। केजरीवाल ने कहा कि उनका उद्देश्य व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि देश में बदलाव लाना था। उन्होंने कहा कि अगर लोकपाल आंदोलन के समय ही लोकपाल कानून बना दिया जाता तो राजनीतिक दल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।

    एसआईआर और मतदाता सूची के मुद्दे पर भी केजरीवाल ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि दिल्ली में बैठे अधिकारी पूरे देश की मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की शक्ति रखते हैं और बिना पर्याप्त जांच के किसी मतदाता का नाम हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    केजरीवाल ने कहा कि 12 साल किसी भी देश के इतिहास में कम अवधि नहीं होती। उन्होंने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली सीटों का उल्लेख करते हुए कहा कि इतने लंबे समय में देश को विकास के अलग स्तर पर पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने अर्थव्यवस्था, बैंकिंग, रेलवे और विमानन क्षेत्र को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए और दावा किया कि कई क्षेत्रों की स्थिति खराब हुई है।

    अंत में केजरीवाल ने कहा कि देश के सामने मौजूद मुद्दों पर जनता को सवाल पूछने चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षित काम नहीं किया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को भी नुकसान पहुंचा है।

  • रक्षा उत्पादन में बड़ा बदलाव, 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट से एचएएल बाहर, निजी कंपनियों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

    रक्षा उत्पादन में बड़ा बदलाव, 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट से एचएएल बाहर, निजी कंपनियों को मिली बड़ी जिम्मेदारी

    नई दिल्ली। देश में स्वदेशी लड़ाकू विमान और रक्षा उत्पादों के निर्माण को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान तैयार करने वाली एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए परियोजना से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बाहर कर दिया गया है। यह पहली बार होगा जब किसी स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना में एचएएल की भागीदारी नहीं होगी।

    एएमसीए को देश की उन्नत लड़ाकू विमान परियोजनाओं में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का विकास करना है। एचएएल लंबे समय से देश के लड़ाकू विमान निर्माण कार्यक्रमों का प्रमुख हिस्सा रही है, लेकिन इस बार परियोजना की अगली प्रक्रिया में उसे शामिल नहीं किया गया है।

    रक्षा सचिव आरके सिंह के मुताबिक, एचएएल को कुछ जरूरी तकनीकी शर्तें पूरी नहीं कर पाने के कारण परियोजना से बाहर किया गया। एचएएल इस समय तेजस-एमके2 लड़ाकू विमान के विकास पर भी काम कर रही है। ऐसे में एएमसीए परियोजना से उसका बाहर होना रक्षा विमान निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव है।

    एचएएल के बाहर होने के बाद अब एएमसीए के प्रोटोटाइप तैयार करने की दौड़ में तीन दावेदार बचे हैं। इनमें टाटा एडवांस्ड सिस्टम, एलएंडटी-बेल-डायनामैटिक कंसोर्टियम और भारत फोर्ज-बीईएमएल-डाटा पैटर्न्स का कंसोर्टियम शामिल है।

    इस बदलाव के साथ पहली बार किसी लड़ाकू विमान परियोजना के प्रोटोटाइप निर्माण की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र की कंपनियों के हाथों में जाने जा रही है। इससे देश के निजी रक्षा उद्योग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। अब चयनित कंपनी को एएमसीए परियोजना के तहत निर्धारित तकनीकी और निर्माण संबंधी जिम्मेदारियों को पूरा करना होगा।

    एएमसीए परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये बताई गई है। चुनी जाने वाली कंपनी को कुल पांच उड़ने वाले प्रोटोटाइप तैयार करने होंगे। इसके अलावा एक ऐसा विमान भी बनाना होगा, जिसका इस्तेमाल जमीन पर तकनीकी परीक्षण के लिए किया जा सके।

    परियोजना की समयसीमा के अनुसार एएमसीए का पहला प्रोटोटाइप सितंबर 2028 में पहली उड़ान भर सकता है। इसके बाद बाकी प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे और उनकी अलग-अलग स्तर पर टेस्टिंग की जाएगी। इस परीक्षण प्रक्रिया के जरिए विमान की तकनीकी क्षमताओं और परियोजना से जुड़ी आवश्यकताओं को परखा जाएगा।

    एएमसीए परियोजना से एचएएल के बाहर होने के बाद अब निजी क्षेत्र की कंपनियों के बीच प्रोटोटाइप निर्माण के लिए प्रतिस्पर्धा होगी। परियोजना में चयनित कंपनी को विमान के विकास और प्रोटोटाइप निर्माण से जुड़ी निर्धारित जिम्मेदारियां निभानी होंगी। इस तरह पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में पहली बार निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका मिलने जा रही है।

  • देश के 62% राष्ट्रीय राजमार्गों पर चलना खतरे से खाली नहीं… मॉनसून के बाद खराब हो जाती हैं हालत

    देश के 62% राष्ट्रीय राजमार्गों पर चलना खतरे से खाली नहीं… मॉनसून के बाद खराब हो जाती हैं हालत


    नई दिल्ली।
    देश में एक तरफ जहां हर दिन रिकॉर्ड गति (Record Speed) से नए एक्सप्रेस-वे (New Expressways) और राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) (National Highway – NH) बिछाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हाईवे बनने के बाद उनके रख-रखाव की अनदेखी हो रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल 1.46 लाख किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में से लगभग 62 फीसदी हिस्सा स्थायी डेवलपर या डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड (डीएलपी) (Defect Liability Period – DLP) के सुरक्षा कवच में नहीं हैं। यानी नेटवर्क पर सफर सुरक्षित नहीं है। क्योंकि, इन सड़कों को महज अल्पकालिक अनुबंधों (एसटीसी) और पेचवर्क की खानापूर्ति के भरोसे छोड़ दिया गया है, जो हाईवे पर सफर करने वाले करोड़ों यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के सूत्रों ने बताया, देश के 90,000 किलोमीटर से अधिक लंबा हाईवे नेटवर्क बिना किसी स्थायी जवाबदेही के केवल अल्पकालिक अनुबंधों और प्रदर्शन-आधारित रखरखाव अनुबंधों के भरोसे है।


    चालकों को गंवानी पड़ती है जान

    विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे के दावों के बीच पेचवर्क की इस खानापूर्ति का सबसे दर्दनाक और सीधा परिणाम देश के आम वाहन चालकों को अपनी जान गंवाकर भुगतना पड़ रहा है। कोई पारदर्शी केंद्रीय डेटाबेस न होने से जवाबदेही किसी एक बड़ी कंपनी के बजाय छोटे-छोटे स्थानीय ठेकेदारों में बंट जाती है, जिससे काम की गुणवत्ता की निगरानी लगभग न के बराबर हो जाती है। शॉर्ट-टर्म मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स की औसतन अवधि केवल 1 से 2 वर्ष होती है। इतने कम समय के लिए कोई भी ठेकेदार सड़क के डामरीकरण या उसकी नींव को मजबूत करने जैसा स्थायी कार्य नहीं करता। इन अनुबंधों का दायरा केवल गड्ढे भरने, नालियों की सफाई या साइनबोर्ड लगाने तक सीमित रह जाता है।


    ब्लैक स्पॉट्स कई साल तक नहीं सुधारे जाते

    दीर्घकालिक डेवलपर न होने के कारण सड़कों के ब्लैक स्पॉट्स वर्षों तक नहीं सुधारे जाते हैं। इसके अलावा क्रैश बैरियर, रेट्रो-रिफ्लेक्टिव साइनेज, सोलर स्टड्स और पर्याप्त स्ट्रीट लाइटों का रखरखाव समय पर न होने से रात या कोहरे में वाहन चालकों को किनारे या डिवाइडर का सही अंदाजा नहीं लगता। मानसून में ड्रेनेज खराब होने से सड़क पर पानी जमा होने से गाड़ियों का फिसलना और बड़े गड्ढे जानलेवा साबित होते हैं।


    जिन हाईवे का रखरखाव नहीं, वहां ज्यादा मौतें

    मंत्रालय और सेवलाइफ फाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार, हाईवे पर होने वाली कुल मौतों में से लगभग 55 से 62 फीसदी मौतें उन्हीं हिस्सों पर होती हैं, जहां दीर्घकालिक रखरखाव का अभाव है। राष्ट्रीय राजमार्गों के 58 फीसदी से 60 प्रतिशत हादसे इन 90,000 किमी से अधिक फैले शॉर्ट-टर्म मेंटेनेंस वाले हिस्सों में होते हैं। हाईवे पर हर साल 55 हजार से 60 हजार मौतें दर्ज की जाती हैं।


    मानसून के बाद हर बार सड़कें हो जाती हैं बदहाल

    हाईवे विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी राष्ट्रीय राजमार्ग की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पूरी लाइफ-साइकिल मेंटेनेंस (5 से 10 वर्ष की दीर्घकालिक जवाबदेही) आवश्यक होती है। 1-2 साल के टुकड़ों में बांटे गए अनुबंध सड़क की उम्र बढ़ाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं और हर मानसून के बाद सड़कें फिर बदहाल हो जाती हैं। वहीं, रखरखाव में पर्याप्त धनराशि खर्च नहीं की जाती है।