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  • यूपी कैबिनेट में 21 बड़े फैसलों पर मुहर: जेवर लिंक एक्सप्रेसवे को मंजूरी, किसानों के लिए गए कई अहम निर्णय

    यूपी कैबिनेट में 21 बड़े फैसलों पर मुहर: जेवर लिंक एक्सप्रेसवे को मंजूरी, किसानों के लिए गए कई अहम निर्णय

    लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई उत्तर प्रदेश मंत्रिपरिषद (कैबिनेट) की बैठक में राज्य के विकास, बुनियादी ढांचे, किसानों, श्रमिकों और प्रशासनिक सुधारों से जुड़े 21 महत्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। कैबिनेट ने कनेक्टिविटी बढ़ाने, कृषि सुरक्षा, सामाजिक कल्याण और प्रशासनिक सुधारों पर विशेष जोर देते हुए कई बड़े फैसले लिए।

    74 किमी के जेवर लिंक एक्सप्रेसवे को हरी झंडी
    कैबिनेट ने जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट को गंगा एक्सप्रेसवे से जोड़ने वाले 74.467 किलोमीटर लंबे छह लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के निर्माण को मंजूरी दी। बुलंदशहर होते हुए बनने वाला यह एक्सप्रेसवे भविष्य में आठ लेन तक विस्तारित किया जा सकेगा। इसके अलावा प्रयागराज-चित्रकूट क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के गठन को भी स्वीकृति दी गई। प्रदेश के सात प्रमुख स्थानों पर बहुउद्देशीय हब विकसित करने के लिए लोक निर्माण विभाग की भूमि आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया। लखनऊ और नोएडा में अत्याधुनिक ‘यू-हब’ स्थापित किए जाएंगे।

    किसानों के लिए फसल बीमा योजना लागू
    किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और मौसम संबंधी नुकसान से राहत देने के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 में पूरे प्रदेश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।

    घुमंतू विकास बोर्ड और विश्वकर्मा योजना को बढ़ावा
    विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए उत्तर प्रदेश घुमंतू विकास बोर्ड के गठन को स्वीकृति दी गई। वहीं विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना 2.0 के दिशा-निर्देशों में संशोधन और नए बजटीय प्रावधान को भी मंजूरी मिली। इसके साथ ही ग्राम्य विकास विभाग और एचसीएल फाउंडेशन के बीच समुदाय परियोजना से जुड़े समझौते को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाने का फैसला किया गया।

    शिक्षा, श्रम और प्रशासनिक सुधारों पर भी फैसले
    कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुरूप उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 में संशोधन को मंजूरी दी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश मजदूरी संहिता नियमावली-2026, राज्य संपत्ति विभाग सेवा नियमावली और भूतत्त्व एवं खनिकर्म सेवा नियमावली में संशोधन को भी स्वीकृति दी गई।

    साथ ही उत्तर प्रदेश शीरा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक-2026 को विधानसभा में पेश करने तथा इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण नीति-2017 के तहत एक निजी कंपनी को व्यावसायिक परिचालन तिथि में छूट देने का निर्णय लिया गया।

    अनुपूरक बजट और सीएजी रिपोर्ट को भी मंजूरी
    कैबिनेट ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के अनुपूरक अनुदान और विनियोग विधेयक को मंजूरी दी। साथ ही भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की राज्य वित्त, मनरेगा, जल जीवन मिशन, सिविल और राजस्व ऑडिट से संबंधित रिपोर्टों को विधानमंडल में पेश करने से पहले राज्यपाल की अनुमति लेने के प्रस्ताव को भी स्वीकृति प्रदान की।

  • यूपी विधानसभा में अनुपूरक बजट पर हंगामा, पांच मिनट ही बोल पाए CM योगी, सपा विधायक पर भड़के विस अध्‍यक्ष

    यूपी विधानसभा में अनुपूरक बजट पर हंगामा, पांच मिनट ही बोल पाए CM योगी, सपा विधायक पर भड़के विस अध्‍यक्ष


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में बुधवार को अनुपूरक बजट पर चर्चा के दौरान जोरदार हंगामा हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बोलना शुरू करते ही समाजवादी पार्टी के विधायकों ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर पहले चर्चा कराने की मांग को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। लगातार शोर-शराबे के कारण मुख्यमंत्री करीब पांच मिनट ही अपनी बात रख सके और सदन की कार्यवाही बाधित हो गई।

    मुख्यमंत्री ने विपक्ष के हंगामे पर कहा कि अनुपूरक बजट पर चर्चा का एजेंडा पहले से तय था और यह प्रदेश की 25 करोड़ जनता से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों के लिए निर्धारित किया गया था। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने चर्चा में भाग लेने के बजाय व्यवधान पैदा करना उचित समझा।

    ‘विपक्ष का आचरण शर्मनाक’
    सीएम योगी ने कहा कि विपक्ष का यह रवैया लोकतांत्रिक और संवैधानिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष न तो सार्थक चर्चा में विश्वास रखता है और न ही सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलने देना चाहता है। उनके अनुसार विपक्ष लगातार सदन की कार्यवाही बाधित करने का प्रयास कर रहा है।

    तस्वीर दिखाने पर भड़के सतीश महाना
    मुख्यमंत्री के संबोधन के दौरान विपक्ष के एक विधायक ने उनसे जुड़ी तस्वीर सदन में दिखाई। इस पर विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने कड़ी आपत्ति जताते हुए संबंधित विधायक को पूरे सत्र के लिए सदन से बाहर करने के निर्देश दिए। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति होने पर विशेषाधिकार प्रस्ताव लाकर सदस्यता समाप्त करने जैसी कार्रवाई भी की जा सकती है। लगातार हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही बाधित रही और विधानसभा का माहौल काफी देर तक गरमाया रहा।

  • यूपी सरकार ने ₹59 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट किया पेश, उद्योग-इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सबसे अधिक फोकस

    यूपी सरकार ने ₹59 हजार करोड़ का अनुपूरक बजट किया पेश, उद्योग-इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सबसे अधिक फोकस


    लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए विधानसभा में ₹59,019.54 करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी ₹11,240.97 करोड़ होगी, जबकि शेष ₹47,778.57 करोड़ का भार राज्य सरकार वहन करेगी। सरकार ने स्पष्ट किया कि इस अतिरिक्त व्यय की व्यवस्था कर एवं गैर-कर राजस्व में वृद्धि तथा अनुत्पादक खर्चों में कटौती के जरिए की जाएगी।

    उद्योग और आधारभूत ढांचे पर सबसे अधिक जोर
    अनुपूरक बजट में औद्योगिक विकास, बुनियादी ढांचे और ऊर्जा क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। भारी एवं मध्यम उद्योग विभाग के लिए लगभग ₹20,905.88 करोड़ का पूंजीगत और ₹130.30 करोड़ का राजस्व प्रावधान किया गया है। वहीं ग्राम्य विकास विभाग को करीब ₹14,184.72 करोड़ का पूंजीगत और ₹81.03 करोड़ का राजस्व आवंटन मिला है। ऊर्जा क्षेत्र के लिए ₹7,022.27 करोड़ राजस्व मद तथा ₹400 करोड़ पूंजीगत मद में रखे गए हैं। पंचायती राज विभाग को ₹156.33 करोड़ राजस्व और ₹139.98 करोड़ पूंजीगत मद में दिए गए हैं।

    कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती
    कृषि विभाग के लिए ₹132.38 करोड़ राजस्व और ₹159 करोड़ पूंजीगत बजट का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण, पशुपालन, दुग्ध विकास, मत्स्य और भूमि विकास एवं जल संसाधन विभागों के लिए भी अतिरिक्त धनराशि स्वीकृत की गई है, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित गतिविधियों को गति मिल सके।

    स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर फोकस
    स्वास्थ्य क्षेत्र में एलोपैथी चिकित्सा को सबसे अधिक आवंटन मिला है। इसके तहत ₹1,100 करोड़ राजस्व और ₹96 करोड़ पूंजीगत मद में दिए गए हैं। परिवार कल्याण विभाग को ₹704.25 करोड़, सार्वजनिक स्वास्थ्य को ₹60.65 करोड़ तथा आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा के लिए भी अलग बजट का प्रावधान किया गया है।
    स्वास्थ्य क्षेत्र में एलोपैथी चिकित्सा को सबसे अधिक आवंटन मिला है। इसके तहत ₹1,100 करोड़ राजस्व और ₹96 करोड़ पूंजीगत मद में दिए गए हैं। परिवार कल्याण विभाग को ₹704.25 करोड़, सार्वजनिक स्वास्थ्य को ₹60.65 करोड़ तथा आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा के लिए भी अलग बजट का प्रावधान किया गया है।

    शिक्षा और संस्कृति को ₹955 करोड़ से अधिक
    शिक्षा एवं संस्कृति क्षेत्र के लिए कुल ₹955.32 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसमें तकनीकी शिक्षा को ₹521.14 करोड़, प्राथमिक शिक्षा को ₹351.25 करोड़, माध्यमिक शिक्षा को ₹74.50 करोड़, उच्च शिक्षा को ₹5 करोड़, व्यावसायिक शिक्षा को ₹1.98 करोड़ और संस्कृति विभाग को ₹2.43 करोड़ आवंटित किए गए हैं। सरकार का कहना है कि अनुपूरक बजट का उद्देश्य प्रदेश में औद्योगिक निवेश, बुनियादी ढांचे के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण क्षेत्रों में विकास योजनाओं को गति देना है।

  • राम मंदिर चढ़ावा मामले पर CM योगी का पलटवार, बोले- दोषी साधु-संत नहीं, विपक्ष का रवैया सनातन विरोधी

    राम मंदिर चढ़ावा मामले पर CM योगी का पलटवार, बोले- दोषी साधु-संत नहीं, विपक्ष का रवैया सनातन विरोधी


    लखनऊ। राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि मामले की जांच के लिए गठित एसआईटी की पड़ताल में अब तक कोई साधु-संत दोषी नहीं पाया गया है। ऐसे में पूरे संत समाज और मंदिर से जुड़े कर्मचारियों पर आरोप लगाना अनुचित है।

    मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने बताया कि जांच के दौरान न्यायालय के निर्देश पर एसआईटी का पुनर्गठन भी किया गया, लेकिन अब तक की जांच में किसी साधु-संत की संलिप्तता सामने नहीं आई।

    ‘सनातन और रामजन्मभूमि का हमेशा विरोध किया’
    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सपा और कांग्रेस लगातार रामजन्मभूमि, भगवान राम और सनातन परंपरा के प्रति विरोध का रुख अपनाती रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद और सदन के भीतर विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोप सनातन आस्था का अपमान हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन लोगों पर कार्रवाई हो रही है, उनका भाजपा या संत समाज से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण मिलने के बावजूद विपक्ष के कई नेताओं ने उसमें भाग नहीं लिया, जबकि अब वही लोग आस्था की बात कर रहे हैं।

    ‘यूपी की छवि खराब करने की कोशिश’
    मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि विपक्ष उत्तर प्रदेश की छवि धूमिल करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य अब बीमारू प्रदेश की छवि से बाहर निकलकर देश की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बना रहा है, लेकिन विपक्ष इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है। उन्होंने सदन में हुए हंगामे और मार्शलों के साथ धक्कामुक्की की भी निंदा करते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक परंपराओं और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है। उनके अनुसार, इस तरह का व्यवहार प्रदेश में धार्मिक पर्यटन और विकास की गति को प्रभावित करने का प्रयास है।

    विधानसभा में हंगामे पर भी जताई नाराजगी
    मुख्यमंत्री ने कहा कि विधानसभा में अनुपूरक बजट पर चर्चा का एजेंडा पहले से तय था, लेकिन विपक्ष ने बजट पर चर्चा करने के बजाय दूसरे मुद्दों को लेकर व्यवधान उत्पन्न किया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताते हुए विपक्ष के आचरण को “शर्मनाक” करार दिया।

  • राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को राम मंदिर चढ़ावा से जुड़े आरोपों को लेकर राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार से जवाब की मांग करते हुए सदन में जोरदार हंगामा किया, जबकि सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया। लगातार शोर-शराबे के कारण राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय से पहले कई बार स्थगित करनी पड़ी।

    राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चर्चा के दौरान कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में केंद्र सरकार की भूमिका रही है और मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि चढ़ावे से जुड़े आरोपों के मामले में संबंधित एजेंसियों की ओर से क्या कार्रवाई की गई है। उन्होंने सरकार से इस विषय पर सदन में स्पष्ट जवाब देने की मांग की।

    खरगे के वक्तव्य का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अतीत में राम मंदिर आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों का विरोध किया था। रिजिजू ने आरोप लगाया कि अब वही दल इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि सरकार किसी भी विषय पर तथ्यों के आधार पर जवाब देने के लिए तैयार है।

    सदन में लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही पहले कुछ समय के लिए स्थगित की गई और दोबारा शुरू होने के बाद भी व्यवधान जारी रहने पर फिर स्थगन करना पड़ा। विपक्षी दलों का कहना था कि राम मंदिर चढ़ावे से जुड़े आरोपों पर विस्तृत चर्चा कराई जाए और सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करे। वहीं सत्तापक्ष ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने और राजनीतिक माहौल बनाने का आरोप लगाया।

    संसद भवन परिसर में भी इस मुद्दे को लेकर विपक्षी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में कई विपक्षी नेता शामिल हुए और उन्होंने सरकार से कथित आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने तथा सदन में जवाब देने की मांग दोहराई। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने विभिन्न नारे लगाकर अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाया। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि संसद में महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं और विपक्ष को चर्चा के लिए सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

    मॉनसून सत्र के दौरान विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार तथा विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिल रहा है। ऐसे में राम मंदिर चढ़ावा विवाद भी संसद के प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो गया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर दोनों पक्षों के बीच बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल सदन के सुचारु संचालन और लंबित विधायी कार्यों को लेकर भी राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

  • पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    पेपर लीक पर भाजपा का विपक्ष पर पलटवार, कर्नाटक-झारखंड का मुद्दा उठाकर राहुल गांधी से पूछा बड़ा सवाल

    नई दिल्ली । पेपर लीक के मुद्दे पर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को प्रेस वार्ता कर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया। भाजपा सांसद और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों के मामलों को राजनीतिक मुद्दा बनाता है, जबकि कर्नाटक और झारखंड में सामने आए कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं के मामलों पर चुप्पी साधे हुए है। उन्होंने कहा कि छात्रों के हितों को लेकर विपक्ष का रुख समान नहीं है।

    संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि झारखंड में बड़ी संख्या में छात्र लंबे समय से कथित परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की ओर से उनके समर्थन में कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर भी विपक्ष इन मामलों को प्रमुखता से नहीं उठा रहा है। भाजपा का दावा है कि विपक्ष केवल उन्हीं मुद्दों को आगे बढ़ाता है जिनसे उसे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना दिखाई देती है।

    भाजपा ने संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के संचालन को लेकर भी विपक्ष पर निशाना साधा। संबित पात्रा ने कहा कि संसद का प्रत्येक सत्र जनता के धन से चलता है और इस पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन लगातार हंगामे के कारण प्रश्नकाल और कई महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के रवैये की वजह से महत्वपूर्ण विषयों पर सदन में अपेक्षित चर्चा नहीं हो पा रही है।

    प्रेस वार्ता के दौरान भाजपा ने कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे के एक बयान का भी उल्लेख किया। पार्टी ने दावा किया कि पेपर लीक के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के संबंध में मंत्री की टिप्पणी असंवेदनशील थी। भाजपा ने इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी से भी प्रतिक्रिया देने की मांग करते हुए कहा कि उन्हें इस विषय पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। वहीं कांग्रेस की ओर से इस मामले में अलग-अलग अवसरों पर अपने विचार व्यक्त किए जाते रहे हैं।

    इधर झारखंड में राज्य लोक सेवा आयोग और कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी छात्र निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। इसी मामले में झारखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष से जांच एजेंसियों द्वारा कई दौर की पूछताछ भी की जा चुकी है। उन्होंने इससे पहले अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं।

    पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बना हुआ है। विभिन्न राज्यों में सामने आए मामलों को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। वहीं अभ्यर्थियों की मांग है कि सभी मामलों की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद और राज्यों की राजनीति में भी प्रमुख बना रह सकता है।

  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत का फैसला बदला, बच्चे से मुलाकात पर शुल्क लगाना बताया पूरी तरह अनुचित

    कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पारिवारिक अदालत का फैसला बदला, बच्चे से मुलाकात पर शुल्क लगाना बताया पूरी तरह अनुचित


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक पारिवारिक विवाद से जुड़ी याचिका पर फैसला सुनाते हुए बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है कि पिता को अपने ही बच्चे से मिलने का अधिकार बिना किसी आर्थिक शर्त के मिलना चाहिए। अदालत ने निचली पारिवारिक अदालत के उस फैसले में संशोधन किया जिसमें अलग रह रहे पिता को बच्चे से हर बार मिलने के बदले पांच हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने साफ तौर पर कहा कि जब यह मुलाकात न्यायालय परिसर के अंदर स्थित विजिटेशन रूम में आयोजित की जानी है, तब किसी भी तरह का शुल्क वसूलना तर्कसंगत नहीं है।

    यह मामला एक ऐसे पति-पत्नी से संबंधित है जिनके बीच तलाक का मुकदमा अदालत में लंबित है। वर्तमान में चार साल के बच्चे की देखरेख और अंतरिम कस्टडी मां के पास है, जबकि पिता ने बच्चे की स्थायी अभिरक्षा पाने के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल की हुई है। इससे पहले पारिवारिक अदालत ने पिता को महीने के तय दिनों में बच्चे से मिलने की अनुमति तो दी थी, लेकिन साथ ही हर मुलाकात के लिए पांच हजार रुपये जमा करने की शर्त भी लागू कर दी थी।

    उच्च न्यायालय में जब पिता ने इस शर्त को चुनौती दी, तो अदालत ने स्थिति का निष्पक्षता से मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि जब मां ने स्वयं विजिटेशन रूम को मुलाकात के लिए सुरक्षित और उपयुक्त स्थान माना है, तो पिता पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने का कोई औचित्य नहीं बनता। उच्च न्यायालय ने माना कि इस तरह का आर्थिक दबाव न्याय के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है और इसलिए फीस से जुड़ी शर्त को तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया।

    मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों पक्षों के घर के बीच कोई बहुत अधिक दूरी नहीं है। इसके बावजूद दस्तावेजों और रिकॉर्ड से संकेत मिला कि मां कई अवसरों पर बच्चे को तय समय पर मुलाकात के लिए लेकर नहीं आती थी। इस पर चिंता व्यक्त करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि भविष्य में भी मुलाकात के समय में इस प्रकार की अड़चनें पैदा की जाती हैं, तो इसका प्रभाव अंतिम कस्टडी के निर्णय पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का सर्वांगीण विकास और उसका सर्वोत्तम हित ही न्याय का सबसे प्रमुख आधार है।

    पिता ने अदालत के सामने यह बात भी रखी थी कि उन्हें बच्चे के साथ अकेले और सहज माहौल में समय बिताने का मौका नहीं दिया जाता, जिससे बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर मां का कहना था कि बच्चा पिता के पास जाने में हिचकिचाता है और पिता भरण पोषण की जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं संभाल रहे हैं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुनते हुए एक व्यावहारिक व्यवस्था बनाई ताकि बच्चे और पिता के बीच संवाद बेहतर हो सके।

    उच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था के तहत निर्देश दिया कि मुलाकात के दौरान बच्चे के दादा-दादी वहां उपस्थित नहीं रहेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पिता और पुत्र बिना किसी दबाव के आपस में गुणवत्तापूर्ण समय बिता सकें। अदालत ने अंत में दोहराया कि स्थायी कस्टडी का मुख्य फैसला अभी लंबित है और वह सभी साक्ष्यों एवं बच्चे के हितों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।

  • पंकजा मुंडे के राजनीतिक भविष्य पर बढ़ी चर्चा, कांग्रेस नेता बोले- भाजपा छोड़ें, पहली ओबीसी महिला सीएम बनाने में करेंगे सहयोग

    पंकजा मुंडे के राजनीतिक भविष्य पर बढ़ी चर्चा, कांग्रेस नेता बोले- भाजपा छोड़ें, पहली ओबीसी महिला सीएम बनाने में करेंगे सहयोग


    नई दिल्ली ।
    महाराष्ट्र के राजनीतिक परिदृश्य में उस समय एक नया मोड़ देखने को मिला, जब राज्य सरकार में मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता पंकजा मुंडे को विपक्षी खेमे से एक बड़ा राजनीतिक प्रस्ताव मिला। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता विजय वडेट्टीवार ने कहा कि यदि पंकजा मुंडे भाजपा का साथ छोड़ने का मन बनाती हैं, तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दल उन्हें महाराष्ट्र की पहली ओबीसी महिला मुख्यमंत्री के रूप में समर्थन देने पर विचार कर सकते हैं। यह राजनीतिक बयानबाजी ऐसे समय में सामने आई है, जब पंकजा मुंडे ने हाल ही में सार्वजनिक मंच से अपने संन्यास के संकेत दिए थे।

    विजय वडेट्टीवार ने संवाददाताओं से चर्चा के दौरान कहा कि पंकजा मुंडे राज्य की एक कद्दावर ओबीसी नेता हैं और उन्हें इतनी जल्दी सार्वजनिक जीवन से पीछे नहीं हटना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि वे भाजपा त्यागती हैं, तो वे व्यक्तिगत रूप से पार्टी के शीर्ष कमान से सिफारिश करेंगे कि उन्हें कांग्रेस में ससम्मान शामिल किया जाए। हालांकि, उन्होंने यह साफ किया कि यह उनका अपना निजी दृष्टिकोण है और इसे पार्टी का औपचारिक अधिकारिक निमंत्रण नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि इस विषय पर अंतिम मोहर केंद्रीय नेतृत्व ही लगाएगा।

    कांग्रेस नेता ने इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली पर कटाक्ष करते हुए आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल में पिछड़ा वर्ग के प्रमुख चेहरों को हाशिये पर धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेताओं में उपेक्षा को लेकर भारी असंतोष व्याप्त है, क्योंकि उनकी निष्ठा और जनाधार को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। वडेट्टीवार के अनुसार, पंकजा मुंडे की हालिया भावुक टिप्पणी इसी अंदरूनी घुटन और उपेक्षा का परिणाम मानी जा सकती है।

    उल्लेखनीय है कि पंकजा मुंडे ने बीते दिनों अपने गृहांचल पारली में बुनियादी विकास और सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। उन्होंने कहा था कि निरंतर प्रयासों के बावजूद क्षेत्र की स्थिति में अपेक्षित सुधार न होना उनके लिए निराशाजनक है। इसी क्रम में उन्होंने यह टिप्पणी की थी कि वे मौजूदा राजनीतिक ढर्रे से थक चुकी हैं और राजनीति को अलविदा कहने पर विचार कर रही हैं, यद्यपि उन्होंने यह भी जोड़ा था कि उन्होंने इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है।

    पंकजा मुंडे के इस बयान के बाद राज्य के सियासी गलियारों में कयासों का दौर बेहद तेज हो गया। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक विश्लेषक महाराष्ट्र में बन रहे इस नए घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। विपक्ष के कई अन्य नेताओं ने भी उनकी स्थिति पर सहानुभूति प्रकट करते हुए अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं।

    इस बीच, कांग्रेस नेता के इस लुभावने ऑफर पर पंकजा मुंडे या उनके करीबी सूत्रों की तरफ से कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है। दूसरी ओर, भाजपा संगठन ने भी इस सियासी बयानबाज़ी पर फिलहाल अपनी चुप्पी बरकरार रखी है। जानकारों का मानना है कि आगामी चुनाव से ठीक पहले इस प्रकार की हलचल महाराष्ट्र के राजनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकती है। अब सभी की निगाहें पंकजा मुंडे के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

  • उद्धव ठाकरे ने पार्टी नेताओं को लगाई फटकार, अभिजीत दीपके का उदाहरण देकर गुटबाजी पर जताई नाराजगी

    उद्धव ठाकरे ने पार्टी नेताओं को लगाई फटकार, अभिजीत दीपके का उदाहरण देकर गुटबाजी पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) की एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक के दौरान पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का बेहद सख्त रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। ठाणे-कल्याण क्षेत्र के प्रमुख पदाधिकारियों की समीक्षा बैठक के दौरान उन्होंने स्थानीय नेताओं के बीच जारी आपसी खींचतान और पद-प्रतिष्ठा को लेकर चल रहे विवादों पर खुलकर अपनी तीव्र नाराजगी व्यक्त की। इस दौरान उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के हालिया आंदोलन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पार्टी पदाधिकारियों से बड़े राजनीतिक लक्ष्यों और संगठनात्मक मजबूती पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह समीक्षा बैठक कल्याण लोकसभा क्षेत्र में कई निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं को सांगठनिक जिम्मेदारियों से अलग किए जाने के बाद पनपे असंतोष की पृष्ठभूमि में बुलाई गई थी। बैठक के दौरान वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और नए मनोनीत पदाधिकारियों के बीच वर्चस्व की जंग और नेतृत्व के मसले को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में आयोजित इस बैठक में संगठनात्मक स्थिति की गहन समीक्षा की जा रही थी, जहां आंतरिक गुटबाजी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई।

    अपने आक्रामक संबोधन में उद्धव ठाकरे ने पदाधिकारियों को स्पष्ट ताकीद दी कि राज्य के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में सभी को निजी महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर बड़े जनहित के मुद्दों के लिए एकजुट होना होगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ जब देश और राज्य में जनसमस्याओं को लेकर विभिन्न स्तरों पर संघर्ष किए जा रहे हैं, तब दल के भीतर आंतरिक पदों के लिए खींचतान होना संगठन की नींव को कमजोर करता है। इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने अभिजीत दीपके द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए नेताओं से राजनीतिक सक्रियता और अनुशासन की सीख लेने को कहा।

    सूत्रों का कहना है कि पार्टी प्रमुख का यह कड़ा रुख केवल मौखिक चेतावनी तक सीमित नहीं रहने वाला है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि संगठन में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नेतृत्व का मानना है कि यदि इस गुटबाजी को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका सीधा नकारात्मक असर धरातल पर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा। मध्य प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों के राजनीतिक विश्लेषक भी महाराष्ट्र के इस तेजी से बदलते सियासी घटनाक्रम और शिवसेना (यूबीटी) की अंदरूनी हलचलों पर पैनी नजर रखे हुए हैं।

    इसके अतिरिक्त, हालिया खबरों में यह बात भी सामने आई है कि उद्धव ठाकरे और अभिजीत दीपके के मध्य टेलीफोन के माध्यम से सीधी बातचीत हुई थी। इस संवाद के दौरान ठाकरे ने उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियानों की प्रगति जानी और उन्हें मुंबई स्थित अपने निजी निवास मातोश्री आने का न्योता भी दिया। यद्यपि, इस मुलाकात और बातचीत के विस्तृत एजेंडे को लेकर दोनों ही खेमों की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है।

    ठाणे और उसके समीपवर्ती इलाके ऐतिहासिक रूप से शिवसेना के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। ऐसे में आगामी स्थानीय निकायों और अन्य चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की दरार पार्टी के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उद्धव ठाकरे की यह सख्त नसीहत पार्टी के भीतर अनुशासन, एकजुटता और कैडर को पुनः सक्रिय करने का एक रणनीतिक प्रयास है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष नेतृत्व की इस चेतावनी के बाद संगठन में क्या जमीनी बदलाव आते हैं।

  • लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    नई दिल्ली । संसद के जारी मॉनसून सत्र के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के मध्य तल्खी लगातार बढ़ती जा रही है। मंगलवार को भी संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामे और नारेबाजी की पूरी संभावना बनी हुई है। विपक्षी दल विभिन्न ज्वलंत जनमुद्दों पर सरकार को घेरने की अपनी रणनीति पर पूरी मजबूती के साथ कायम हैं। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि जब तक इन अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत और नियमबद्ध विचार-विमर्श की अनुमति प्रदान नहीं की जाती तथा संबंधित मंत्रालयों की ओर से आधिकारिक जवाब प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक विधायी कामकाज का सुचारू रूप से संचालन हो पाना बेहद कठिन रहेगा। इसके कारण संसदीय कार्यप्रणाली पर अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं।

    विपक्षी गठबंधन ने अपनी रणनीतिक रूपरेखा को और अधिक धार देते हुए हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलित छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई तथा अयोध्या में राम मंदिर दान प्रक्रिया से जुड़े विवादों को प्राथमिक मुद्दे के रूप में उभारा है। विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग है कि देश के केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं सदन के पटल पर उपस्थित होकर इस समूचे घटनाक्रम पर सरकार का स्पष्ट पक्ष रखें। इसके अतिरिक्त, मंदिर में अर्पित चढ़ावे तथा वित्तीय लेनदेन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी बिना किसी विलंब के स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा कराने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि जनसंशय दूर हो सके।

    संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की सदन में निरंतर अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था में जनता से सीधे जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों का कहना है कि सरकार को विपक्ष के तर्कसंगत प्रश्नों का उत्तर देने से बचने के बजाय सकारात्मक रुख अपनाते हुए खुले संवाद की पहल करनी चाहिए, जिससे जारी गतिरोध को समाप्त किया जा सके।

    दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल का मानना है कि निरंतर व्यवधान और विरोध के कारण देश से जुड़े कई अति आवश्यक विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि, इस भारी राजनीतिक खींचातान के मध्य भी लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी से संबंधित महत्वपूर्ण कानून को पारित करा लिया गया। इसके साथ ही देश की बैंकिंग प्रणाली में आधुनिक डिजिटल तकनीक एवं क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को कानूनी मान्यता प्रदान करने वाले एक नए बैंकिंग संशोधन विधेयक को भी पटल पर प्रस्तुत किया गया। सत्तापक्ष का दावा है कि विपक्ष जनकल्याणकारी कानूनों पर बहस करने के बजाय केवल व्यवधान पैदा कर रहा है।

    संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी रणनीति की तीखी आलोचना करते हुए दोहराया है कि सरकार नियमानुसार सभी जनहितकारी विषयों पर सार्थक और स्वस्थ बहस के लिए पूरी तरह तत्पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल वास्तव में गंभीर चर्चा से भाग रहे हैं और केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से नारेबाजी का सहारा ले रहे हैं। उनका तर्क था कि संसद को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का केंद्र बनाने के स्थान पर जनहित में विधेयकों को विचार-विमर्श के पश्चात पारित कराने में रचनात्मक योगदान दिया जाना चाहिए।

    इसी बीच, संसद भवन परिसर स्थित मकर द्वार के निकट विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर जोरदार प्रदर्शन किया और तख्तियां दिखाकर नारेबाजी की। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक भी इस निरंतर जारी संसदीय गतिरोध पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में भी दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम सहमति न बन पाने के कारण यह स्पष्ट है कि मॉनसून सत्र के आगामी दिनों में भी सामान्य कामकाज बहाल होना काफी मुश्किल दिखाई दे रहा है।