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  • कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!

    कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। पहली अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल (Crude oil) की बढ़ती कीमतें (Rising Prices) और दूसरी मानसून के कमजोर रहने से पैदा हुआ सूखे का खतरा। ये दोनों समस्याएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन जब एक साथ सामने आती हैं, तो इनका असर देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी की रसोई तक दिखाई दे सकता है। महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल को बढ़ाता है और परिवहन से लेकर खेती तक की लागत पर दबाव डालता है। वहीं, बारिश की कमी से फसलों की पैदावार प्रभावित होने, किसानों की आमदनी घटने और खाने-पीने की चीजों के महंगे होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि भारत के लिए चिंता की बात ज्यादा क्या है? महंगा कच्चा तेल, सूखा या फिर इन दोनों का एक साथ असर? आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि असली चुनौती इन दोनों समस्याओं के एक साथ बढ़ने से पैदा हो रही है।


    महंगे तेल ने बढ़ाया भारत का आयात बिल

    भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। एक साल पहले इसी अवधि में यह 61.9 अरब डॉलर था। खास बात यह है कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा में एक प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई।

    इसका मतलब है कि आयात बिल में तेज उछाल के पीछे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की बड़ी भूमिका रही। आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में अब तक भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि जुलाई में यह लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल थी। इससे भारत को पहले के मुकाबले तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इसका असर देश के व्यापार संतुलन और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।


    महंगे कच्चे तेल का आम आदमी पर क्या असर होगा?

    – कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।
    – परिवहन महंगा होने का खतरा:- ट्रक, बस और दूसरे मालवाहक वाहनों के ऑपरेशन की लागत बढ़ सकती है।
    – खाने-पीने की चीजों पर दबाव:- खेतों से मंडियों और मंडियों से दुकानों तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है।
    – खेती की लागत में बढ़ोतरी:- डीजल से चलने वाले पंप, ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों का इस्तेमाल महंगा पड़ सकता है।
    – कंपनियों की लागत बढ़ेगी:- फैक्ट्रियों और अन्य उद्योगों को उत्पादन और माल की ढुलाई पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगे। सरकार के टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। अगर पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहते हैं, तब भी महंगे तेल का आर्थिक बोझ कहीं और पड़ सकता है। कंपनियां अपने मुनाफे में कटौती कर सकती हैं या धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकती हैं।


    कमजोर मानसून से खेती पर मंडराया संकट

    एक तरफ महंगा तेल भारत के खर्च को बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून कृषि क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा सकता है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी बारिश पर निर्भर है। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी कम हो सकती है, जलाशयों में पानी घट सकता है और फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के मानसून सीजन में देश में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश का असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहता। अगर जलाशयों और जमीन के नीचे मौजूद पानी का स्तर गिरता है, तो किसानों के लिए अगली रबी फसल की बुवाई और सिंचाई करना भी मुश्किल हो सकता है। गेहूं, सरसों, चना और दूसरी रबी फसलों की बुवाई के समय पर्याप्त नमी और सिंचाई का पानी उपलब्ध होना जरूरी है। पानी की कमी होने पर किसानों को अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है या उन्हें कम क्षेत्र में खेती करनी पड़ सकती है।


    जलाशयों में पानी की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही

    केंद्रीय जल आयोग (CWC) के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 निगरानी वाले प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 66.7 प्रतिशत था। लेकिन, दक्षिण भारत के 50 निगरानी वाले जलाशयों की स्थिति अधिक चिंताजनक रही। इनमें जल भंडारण 42.34 प्रतिशत था, जबकि पिछले 10 सालों का इसी अवधि का औसत 77.94 प्रतिशत रहा है। यह अंतर बताता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर जलाशयों में पर्याप्त पानी दिखाई देने के बावजूद कुछ क्षेत्रों के किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलाशयों के ये आंकड़े देश के सभी कुओं, नदियों और सिंचाई स्रोतों की स्थिति नहीं बताते। फिर भी जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है और जलाशयों में पानी घटा है, वहां खेती पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।


    महंगा तेल और सूखा एक साथ आए तो क्या होगा?

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इन दोनों समस्याओं का एक साथ सामने आना है। अगर फसल की पैदावार घटती है और उसी समय डीजल महंगा होता है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और बाजार तक कृषि उत्पाद पहुंचाने का खर्च भी अधिक हो सकता है। इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    पहला असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण अगर फसल खराब होती है, तो किसानों के पास बेचने के लिए कम उपज होगी। ऐसे में बाजार में कुछ फसलों की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों की कुल कमाई घट सकती है।

    वहीं, दूसरा असर आम परिवारों के बजट पर होगा। अगर सब्जियों, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवारों को रोजमर्रा के खर्च के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसके साथ ही परिवहन और दूसरी सेवाओं की लागत बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    तीसरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हो सकता है। खेती से आमदनी कम होने पर ग्रामीण परिवार कपड़े, वाहन, घरेलू उपकरण और अन्य सामानों पर खर्च घटा सकते हैं। इससे उन कारोबारों पर भी असर पड़ सकता है, जो ग्रामीण मांग पर निर्भर हैं। हालांकि, महंगाई पर इन दोनों कारकों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं, फसल उत्पादन कितना प्रभावित होता है और सरकार आपूर्ति को बेहतर बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है।


    महंगाई के आंकड़े क्या बता रहे हैं?

    महंगे तेल और कमजोर मानसून की चिंता ऐसे समय बढ़ रही है, जब खुदरा महंगाई में भी तेजी दर्ज की गई है। दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई दर भी अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत पहुंच गई। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी का मतलब है कि आम लोगों को खाने-पीने की वस्तुओं के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि खाद्य महंगाई में हुई पूरी बढ़ोतरी सिर्फ कमजोर मानसून के कारण है। मौसमी बदलाव, बाजार में आपूर्ति और पिछले साल की कीमतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं। फिर भी अगर बारिश की कमी के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और महंगे ईंधन से परिवहन लागत बढ़ती है, तो खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    RBI के सामने क्यों बढ़ेगी चुनौती?

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने की होगी। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ती है। वहीं, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर आम लोगों की खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों से जुड़े फैसले लेना आसान नहीं रहता। RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। उसकी मौद्रिक नीति में कमजोर बारिश, अल नीनो और ऊर्जा की ऊंची कीमतों को महंगाई के लिए जोखिम के रूप में रेखांकित किया गया था।

    रेपो रेट वह दर है, जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर समय के साथ होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। ब्याज दर बढ़ाने से बारिश नहीं बढ़ सकती और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सीधे कम हो सकती है। इसका उद्देश्य महंगाई के व्यापक और लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभाव को सीमित करना है। दूसरी तरफ ब्याज दरें अधिक रहने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घर खरीदने, वाहन खरीदने और कारोबार में निवेश करने की गति प्रभावित हो सकती है। यानी RBI को महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।

  • आंध्र प्रदेश में चक्रवात अर्नब का तांडव… 5 की मौत, हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद, CM ने किया राहत का ऐलान

    आंध्र प्रदेश में चक्रवात अर्नब का तांडव… 5 की मौत, हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद, CM ने किया राहत का ऐलान


    विशाखापत्तनम।
    आंध्र प्रदेश (Andhra Pradesh) में चक्रवात अर्नब (Cyclone Arnab) ने भारी तबाही मचाई है। बुधवार तड़के राज्य के तटीय इलाकों से गुजरे इस भीषण चक्रवाती तूफान (Cyclonic storm) के कारण पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि फसलों और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है। मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू (Chief Minister N. Chandrababu Naidu) ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने का ऐलान किया है। राज्य सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए भी आर्थिक सहायता की घोषणा की है।

    मुख्यमंत्री नायडू ने बुधवार शाम राज्य सचिवालय स्थित रियल टाइम गवर्नेंस सिस्टम (आरटीजीएस) केंद्र में हालात की समीक्षा की। इसके बाद उन्होंने पत्रकारों को बताया कि तूफान के कारण कई जिलों में जान-माल का नुकसान हुआ है। शुरुआती आकलन के मुताबिक, राज्य में करीब 15 हजार बिजली के खंभे उखड़ गए हैं। वहीं, हजारों हेक्टेयर में खड़ी फसलें जलमग्न हो गईं या उन्हें नुकसान पहुंचा है।

    अब ये तूफान ओडिशा में दस्तक दे चुका है। हालांकि पहले से इसकी तीव्रता कम हो गई है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने चेतावनी दी कि आंध्र प्रदेश में तबाही मचाने के बाद, जैसे-जैसे चक्रवात ओडिशा की ओर बढ़ेगा, मलकानगिरि और अधिक प्रभावित हो सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा, ”सरकार गंजाम, गजपति, रायगडा, कोरापुट, मलकानगिरि और नबरंगपुर जिलों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।”


    कहां कितने लोगों की मौत हुई?

    मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के मुताबिक, चक्रवात के कारण पांच लोगों की जान गई है। इनमें से तीन की मौत विशाखापत्तनम जिले में बिजली के खंभे और पेड़ गिरने से हुई। इसके अलावा अनाकापल्ली और भीमावरम में एक-एक व्यक्ति की मौत हुई है। नायडू ने मृतकों के परिवारों के प्रति संवेदना जताते हुए प्रत्येक परिवार को पांच लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।


    3.45 लाख किसानों पर असर, 2.24 लाख हेक्टेयर में फसलें प्रभावित

    चक्रवात और इसके साथ हुई बारिश ने कृषि क्षेत्र को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। मुख्यमंत्री के अनुसार, शुरुआती अनुमान में करीब 3.45 लाख किसानों के प्रभावित होने की बात सामने आई है। राज्य के 14 जिलों में 2,24,489 हेक्टेयर क्षेत्र में खड़ी फसलें जलमग्न हुई हैं या उन्हें नुकसान पहुंचा है।

    मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर फसलों और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि कृषि और बागवानी फसलों को लगभग 70,900 हेक्टेयर क्षेत्र में नुकसान पहुंचने का अनुमान है। इनमें धान की फसल भी शामिल है। करीब 10,450 हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों के जलमग्न होने या क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिली है।


    प्रभावित किसानों को कितना मुआवजा मिलेगा?

    – राज्य सरकार ने चक्रवात से प्रभावित किसानों के लिए फसल के प्रकार और नुकसान की सीमा के आधार पर आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया है।
    – कपास और गन्ने की फसल के लिए 25,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की सहायता दी जाएगी।
    – केले की खेती को नुकसान होने पर 15,000 रुपये प्रति हेक्टेयर दिए जाएंगे।
    – टमाटर की फसल के लिए 25,000 रुपये की सहायता घोषित की गई है।
    – अन्य फसलों के किसानों को सरकार की राहत व्यवस्था के तहत संबंधित श्रेणियों के अनुसार आर्थिक मदद मिलेगी।

    मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि नुकसान के ये आंकड़े शुरुआती आकलन पर आधारित हैं। फील्ड सर्वे पूरा होने के बाद इनमें बदलाव हो सकता है। सत्यापन के बाद राज्य सरकार केंद्र को नुकसान का विस्तृत ब्योरा सौंपेगी।


    180 मकान क्षतिग्रस्त, सड़कों पर गिरे 220 से ज्यादा पेड़

    चक्रवात ने बिजली व्यवस्था के साथ-साथ मकानों और सड़कों को भी नुकसान पहुंचाया है। मुख्यमंत्री के अनुसार, करीब 180 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इनमें ज्यादातर मकान कोनसीमा जिले में हैं। राज्य की सड़कों पर 220 से अधिक पेड़ गिर गए थे। इनमें से बुधवार दोपहर तक 170 से ज्यादा पेड़ों को हटाया जा चुका था। तटीय इलाकों में सड़क संबंधी बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचने की खबर है।

    मुख्यमंत्री ने बताया कि गोदावरी डेल्टा के तटीय इलाकों में तूफान का असर खास तौर पर देखने को मिला। इनमें कोनसीमा, काकीनाडा, पूर्वी गोदावरी, पश्चिमी गोदावरी, कृष्णा और अनाकापल्ली जिले शामिल हैं। विशाखापत्तनम के चार वार्डों में जलभराव की स्थिति पैदा हो गई। पेड़ गिरने जैसी घटनाओं से निपटने के लिए दमकल और आपातकालीन सेवा कर्मियों को 220 से अधिक कॉल मिलीं।


    28 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया

    चक्रवात के खतरे को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़े पैमाने पर राहत और बचाव अभियान चलाया। मुख्यमंत्री के मुताबिक, एहतियाती कदम के तौर पर 28 हजार से अधिक लोगों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया। मछली पकड़ने वाली सभी नौकाओं को भी वापस बंदरगाह पर बुला लिया गया।

    प्रशासन ने प्रभावित जिलों में चिकित्सा दल, एंबुलेंस, राहत सामग्री, बिजली आपूर्ति बहाल करने वाली टीमें और सड़क से मलबा हटाने वाले कर्मियों को तैनात किया है। जिला कलेक्टरों को मौके पर राहत कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। राज्य सरकार ने 14 जिलों में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की 16 और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (एसडीआरएफ) की 11 टीमों को तैनात किया। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल और अन्य केंद्रीय एजेंसियों से लगातार सहयोग देने की अपील की। उन्होंने नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय टीम जल्द भेजने का भी आग्रह किया।

    नायडू ने कहा कि प्रशासन का ध्यान उन परिवारों की मदद पर रहेगा, जिन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा है या जिनके मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। बारिश और समुद्र में ऊंची लहरों से खतरा पूरी तरह टलने तक राहत एवं बचाव दल तैनात रहेंगे।

    125 से 135 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चली हवाएं
    भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, चक्रवात अर्नब बुधवार सुबह दो बजे से आठ बजे के बीच आंध्र प्रदेश-यानम तट से गुजरा। उस समय यह अत्यंत भीषण चक्रवाती तूफान था और इसकी अधिकतम निरंतर हवा की रफ्तार 125 से 135 किलोमीटर प्रति घंटे थी। सुबह करीब 8:30 बजे यह कमजोर होकर भीषण चक्रवाती तूफान में बदल गया। इसके बाद हवा की रफ्तार घटकर 110 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे रह गई।

    मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक, अगले दो दिनों में तूफान के उत्तर-उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ने की संभावना थी। इसके धीरे-धीरे कमजोर होकर चक्रवाती तूफान और फिर गहरे दबाव के क्षेत्र में बदलने का अनुमान जताया गया। इसके दक्षिणी ओडिशा के कुछ हिस्सों से गुजरने के बाद उत्तर-पश्चिम दिशा में छत्तीसगढ़ की ओर बढ़ने की संभावना थी।


    ओडिशा में भी अलर्ट, 30 हजार से ज्यादा लोगों को निकाला गया

    चक्रवात से प्रभावित ओडिशा में भी प्रशासन ने बड़े पैमाने पर एहतियाती कदम उठाए। बारिश के कारण राज्य में 30 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। दक्षिणी ओडिशा के कई जिलों में अलर्ट जारी किया गया। राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री सुरेश पुजारी ने बताया कि निचले इलाकों और भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों से लोगों को निकालने का अभियान जारी था। उन्होंने कहा कि चक्रवात का असर बढ़ने के कारण अगले 24 घंटे बेहद अहम रहने की आशंका थी।

    संवेदनशील इलाकों में कुल 313 राहत एवं बचाव दल तैनात किए गए। इनमें ओडिशा आपदा त्वरित कार्रवाई बल (ओडीआरएएफ) की 60, एनडीआरएफ की नौ और दमकल एवं आपातकालीन सेवाओं की 244 टीमें शामिल थीं। राज्य की सभी 19,143 मछली पकड़ने वाली नौकाएं तट पर लौट आई थीं। भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों में एहतियात के तौर पर कुछ सड़कों पर आवाजाही भी रोकी गई।

    रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि ट्रेनों का परिचालन सुरक्षित और सुचारू बनाए रखने के लिए स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही थी। उन्होंने बताया कि 10 स्थानों पर पेड़ गिरने जैसी छोटी बाधाओं को समय रहते दूर कर लिया गया। भुवनेश्वर हवाई अड्डे के निदेशक प्रसन्ना प्रधान के मुताबिक, उड़ानों का परिचालन ज्यादातर सामान्य था, हालांकि एक उड़ान रद्द हुई। प्रभावित विशाखापत्तनम हवाई क्षेत्र से बचने के लिए चेन्नई और हैदराबाद से भुवनेश्वर आने वाली उड़ानों को रायपुर के ऊपर से वैकल्पिक मार्ग दिया गया।

    ओडिशा के नबरंगपुर, रायगढ़ा, कोरापुट, मलकानगिरि, गजपति और गंजाम जिलों में अत्यंत भारी बारिश को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया था। इन इलाकों में 50 से 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलने की भी चेतावनी दी गई। हालांकि, राज्य के विशेष राहत आयुक्त राजेश पी. पाटिल ने बताया कि दक्षिणी जिलों के कुछ हिस्सों में पेड़ गिरने की घटनाएं हुईं, लेकिन बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं थी।

  • देशभर में आज करवा चौथ की धूम…. सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत

    देशभर में आज करवा चौथ की धूम…. सुहागिन महिलाओं ने पति की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत


    नई दिल्ली।
    देशभर में करवा चौथ (Karwa Chauth 2026) का व्रत आज 29 अक्टूबर, गुरुवार को रखा जा रहा है. इस दिन सुहागिन महिलाएं (Married Women) पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं. सुबह सरगी खाने के बाद व्रत शुरू होता है और रात में चंद्रमा (Moon) को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है. करवा चौथ पर पूजा का शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय और व्रत कथा का विशेष महत्व है।

    करवा चौथ 2026 तिथि
    हिंदू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. साल 2026 में करवा चौथ 29 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जा रहा है. इस दिन महिलाएं सुबह से चंद्रमा निकलने तक व्रत रखती हैं. शाम को भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा की जाती है।


    करवा चौथ 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त

    करवा चौथ पर पूजा के लिए शुभ मुहूर्त का ध्यान रखा जाता है. दिल्ली-एनसीआर के लिए पूजा का समय इस प्रकार बताया जा रहा है:
    – करवा चौथ की तारीख: 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार
    – चतुर्थी तिथि शुरू: 29 अक्टूबर की रात करीब 1:06 बजे
    – चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर की रात करीब 10:09 बजे
    – पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम करीब 5:38 बजे से 6:56 बजे तक
    – दिल्ली में चंद्रोदय: रात करीब 8:17 बजे
    – गुरुग्राम में चंद्रोदय: रात करीब 8:18 बजे

    चंद्रोदय का समय शहर के हिसाब से बदल सकता है. इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय चंद्रोदय समय-सारणी से समय की पुष्टि जरूर कर लें.


    करवा चौथ पर सुबह सरगी खाने की परंपरा

    करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी खाती हैं. कई परिवारों में सास अपनी बहू को सरगी देती हैं. इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे और दूसरी पौष्टिक चीजें शामिल होती हैं. सरगी खाने के बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेती हैं और फिर पूरे दिन भोजन नहीं करतीं.


    परंपरा के अनुसार, कई महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं.

    करवा चौथ की पूजा के लिए महिलाएं पहले से ही थाली तैयार कर लेती हैं. पूजा में आमतौर पर इन चीजों की जरूरत होती है। करवा या मिट्टी का पात्र, जल से भरा लोटा, पूजा की थाली, छलनी, दीपक, घी, रुई, रोली, कुमकुम, अक्षत, हल्दी, फूल, मिठाई, फल, धूप-अगरबत्ती और भगवान शिव, माता पार्वती तथा भगवान गणेश की तस्वीर या प्रतिमा. इसके अलावा परिवार की परंपरा के अनुसार पूजा में इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री भी रखी जा सकती है।


    करवा चौथ पूजा विधि: ऐसे करें पूजा

    1. सुबह व्रत का संकल्प लें: सूर्योदय से पहले सरगी खाएं और व्रत का संकल्प लें. इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करें.
    2. शाम को पूजा की तैयारी करें: घर के पूजा स्थल की सफाई करें. चौकी पर कपड़ा बिछाकर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें.
    3. देवी-देवताओं का पूजन करें: दीपक जलाएं और रोली, अक्षत, फूल तथा मिठाई अर्पित करें. माता पार्वती से अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र की कामना करें.
    4. करवा माता की पूजा करें: करवा में जल भरकर पूजा में रखें. अपने परिवार और क्षेत्र में प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार करवा पूजन की रस्म पूरी करें.
    5. व्रत कथा सुनें: पूजा के दौरान करवा चौथ की कथा पढ़ें या सुनें. इसके बाद आरती करें, परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें.
    6. चंद्रमा को अर्घ्य दें: रात में चंद्रमा दिखाई देने पर जल अर्पित करें. कई जगहों पर महिलाएं छलनी से चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखती हैं.
    7. पति के हाथों खोलें व्रत: चंद्रमा की पूजा के बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत खोलने की परंपरा है. इसके बाद महिलाएं भोजन करती हैं.


    करवा चौथ व्रत कथा

    करवा चौथ पर वीरावती की कथा सुनने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कथा का संबंध व्रत की श्रद्धा और पति की लंबी उम्र की कामना से है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक साहूकार की वीरावती नाम की बेटी थी. वह अपने सात भाइयों की इकलौती बहन थी. विवाह के बाद जब वीरावती ने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो वह सुबह से ही भूखी-प्यासी रहकर चंद्रमा निकलने की प्रतीक्षा करने लगी। दिनभर भूखे रहने के कारण वीरावती कमजोर पड़ने लगी. अपनी बहन की हालत देखकर उसके सातों भाई परेशान हो गए. वे चाहते थे कि उनकी बहन जल्द से जल्द भोजन कर ले. इसके लिए उन्होंने एक उपाय सोचा.

    कथा के अनुसार, भाइयों ने दूर एक पेड़ पर दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख दिया. दूर से देखने पर ऐसा लगा, जैसे चंद्रमा निकल आया हो. वीरावती ने उस रोशनी को चंद्रमा समझ लिया और उसके दर्शन करने के बाद व्रत खोलने बैठ गई। लेकिन जैसे ही उसने भोजन करना शुरू किया, उसे अपने पति के बारे में अशुभ समाचार मिला. यह सुनकर वीरावती दुखी हो गई. उसे अपनी भूल का एहसास हुआ, उसने माता पार्वती की आराधना शुरू कर दी. उसने सच्चे मन से प्रार्थना की कि उसके पति को जीवनदान मिले.

    कथा के प्रचलित रूप के अनुसार, वीरावती की भक्ति से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसे आशीर्वाद दिया और उसके पति को फिर से जीवन मिल गया. इसके बाद वीरावती ने श्रद्धा और विधि-विधान के साथ व्रत पूरा किया। इसी मान्यता के चलते करवा चौथ पर महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करने, पूजा करने और व्रत कथा सुनने के बाद ही व्रत खोलती हैं।


    करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देने का महत्व

    करवा चौथ की पूजा में चंद्रमा के दर्शन का खास महत्व माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंद्रमा को अर्घ्य देकर महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। चंद्रमा निकलने के बाद महिलाएं जल अर्पित करती हैं. इसके बाद कई परिवारों में छलनी से चंद्रमा और पति का चेहरा देखने की रस्म निभाई जाती है. पति पत्नी को जल पिलाकर व्रत खुलवाते हैं. हालांकि, इस रस्म का तरीका अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकता है।


    करवा चौथ पर इन बातों का रखें ध्यान

    करवा चौथ के दिन पूजा की तैयारी समय से कर लें. शाम के शुभ मुहूर्त में पूजा करें, व्रत कथा सुनना न भूलें. चंद्रमा निकलने के समय की पुष्टि अपने शहर के अनुसार करें. अगर बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं देता, तो जल्दबाजी में किसी दूसरी रोशनी को चंद्रमा न समझें. ऐसी स्थिति में अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मार्गदर्शन का पालन करें। करवा चौथ पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और साथ निभाने के संकल्प से जुड़ा त्योहार है. इस दिन महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।

  • नागपुर MLC चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी की जीत, BJP प्रत्याशी को 3271 वोटों से हराया

    नागपुर MLC चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी की जीत, BJP प्रत्याशी को 3271 वोटों से हराया


    नागपुर। महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के अभिजीत गोविंदराव वंजारी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराकर विधान परिषद की सीट बरकरार रखी। वंजारी को कुल 67,231 वोट मिले, जबकि कोहले के खाते में 63,960 मत आए। करीब 41 घंटे तक चली मतगणना के बाद गुरुवार को परिणाम घोषित हुआ।

    2020 में पहली बार जीता था चुनाव
    अभिजीत वंजारी ने दिसंबर 2020 में पहली बार नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की थी। उस समय उन्होंने महा विकास अघाड़ी (MVA) के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और भाजपा के संदीप जोशी को 18 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया था।

    नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र लंबे समय तक भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में वंजारी की लगातार दूसरी जीत कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस बार उनका मुकाबला भाजपा के सुधाकर कोहले से था। मतगणना के शुरुआती दौर में कोहले ने बढ़त बनाई, लेकिन दूसरी वरीयता के मतों की गिनती के बाद वंजारी ने जीत दर्ज की।

    कौन हैं अभिजीत वंजारी?
    अभिजीत वंजारी नागपुर के राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता स्वर्गीय गोविंदराव मारोतराव वंजारी दक्षिण नागपुर विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके थे। अभिजीत ने राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय से कला स्नातक (BA) और विधि स्नातक (LLB) की पढ़ाई की है। वह नागपुर विश्वविद्यालय की सीनेट और प्रबंधन परिषद के सदस्य भी रह चुके हैं। राजनीति के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियता रही है। वह अधिवक्ता और शिक्षाविद् के रूप में पहचाने जाते हैं तथा लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े हुए हैं।

    छात्र राजनीति से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
    अभिजीत वंजारी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी। वह 1998 से 2002 तक महाराष्ट्र प्रदेश एनएसयूआई के महासचिव रहे। इसके बाद उन्हें महाराष्ट्र प्रदेश युवा कांग्रेस में सचिव की जिम्मेदारी मिली।

    वह कई वर्षों तक नागपुर जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव और मुख्य प्रवक्ता भी रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार सहित दूसरे राज्यों में कांग्रेस के चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में भी काम कर चुके हैं।

    वंजारी ने विधानसभा चुनावों में भी अपनी किस्मत आजमाई थी। उन्होंने 2005 में दक्षिण नागपुर विधानसभा उपचुनाव और 2014 में पूर्व नागपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों ही मुकाबलों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

    शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय
    राजनीतिक गतिविधियों के अलावा अभिजीत वंजारी शिक्षा और सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हैं। वह नागपुर के अमर सेवा मंडल शिक्षण संस्था के सचिव हैं। यह संस्था विदर्भ क्षेत्र में इंजीनियरिंग, फार्मेसी, कानून, मैनेजमेंट और कला-विज्ञान सहित विभिन्न विषयों के कॉलेज संचालित करती है।

    इसके साथ ही वह गोविंद अर्बन क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं। गोविंदराव वंजारी फाउंडेशन के माध्यम से स्वास्थ्य शिविर, रक्तदान अभियान, पौधरोपण और युवा विकास से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    41 घंटे चली मतगणना, दूसरी वरीयता के मतों से पलटा परिणाम
    नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव की मतगणना 27 अक्टूबर को शुरू हुई थी और 41 घंटे से अधिक समय तक चली। पहली वरीयता के मतों में भाजपा के सुधाकर कोहले को 60,924 और अभिजीत वंजारी को 56,630 वोट मिले थे। इस चरण में कोहले 4,294 मतों से आगे थे।

    हालांकि, कोई भी उम्मीदवार जीत के लिए जरूरी मतों का निर्धारित कोटा हासिल नहीं कर सका। इसके बाद दूसरी वरीयता के मतों की गिनती की गई। अंतिम परिणाम में वंजारी को 67,231 और कोहले को 63,960 मत मिले। इस तरह वंजारी ने 3,271 वोटों से जीत हासिल की और नागपुर स्नातक सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा।

  • कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके पर आठवले की नजर, RPI में शामिल होने का फिर दिया ऑफर

    कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके पर आठवले की नजर, RPI में शामिल होने का फिर दिया ऑफर


    नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके को एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA में शामिल होने का न्योता दिया गया है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के प्रमुख रामदास आठवले ने दीपके को अपनी पार्टी से जुड़ने का खुला प्रस्ताव दिया है। आठवले का कहना है कि यदि अभिजीत दीपके उनकी पार्टी में शामिल होते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों और उनके राजनीतिक सपने को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं की भागीदारी जरूरी है।

    रामदास आठवले ने यह बयान नागपुर में मंगलवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि अभिजीत दीपके भी आंबेडकरवादी हैं और यदि वे उनकी पार्टी के साथ जुड़ते हैं तो संगठन को मजबूती मिल सकती है। आठवले के मुताबिक उन्होंने पहले भी दीपके से पार्टी में आने को कहा था। हालांकि अभी तक अभिजीत दीपके ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। केंद्रीय मंत्री ने साफ किया कि उनकी ओर से पार्टी में शामिल होने का न्योता खुला है और दीपके आने का फैसला करते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा।

    यह पहली बार नहीं है जब रामदास आठवले ने अभिजीत दीपके को अपनी पार्टी से जुड़ने का प्रस्ताव दिया हो। इससे पहले अगस्त में भी उन्होंने दीपके को रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया यानी RPI में शामिल होने का न्योता दिया था। उस समय आठवले ने कहा था कि बाबासाहेब आंबेडकर के सपनों को साकार करने और उनकी राजनीतिक विचारधारा को मजबूत बनाने के लिए युवाओं को आगे आना चाहिए। इसके बाद भी वह कई मौकों पर दीपके को लेकर बयान दे चुके हैं।

    आठवले ने अभिजीत दीपके को अपने समाज से जुड़ा बताते हुए उनके साथ राजनीतिक सहयोग की संभावना जताई है। हालांकि उन्होंने CJP और उसके समर्थकों की कुछ गतिविधियों तथा बयानों पर नाराजगी भी जाहिर की है। इसी महीने की शुरुआत में उन्होंने कहा था कि अभिजीत दीपके को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि आठवले एक ओर दीपके को अपनी पार्टी में शामिल होने का आमंत्रण दे रहे हैं तो दूसरी ओर उनके कुछ राजनीतिक बयानों से असहमति भी जता चुके हैं।

    दूसरी तरफ अभिजीत दीपके पहले दिए गए इस प्रस्ताव पर सरकार और भाजपा के रवैये को लेकर सवाल उठा चुके हैं। अगस्त में उन्होंने भाजपा के कुछ नेताओं के बयानों का जिक्र करते हुए तंज कसा था कि कुछ समय पहले तक उन्हें राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा था और अब उन्हें पार्टी में आने का न्योता दिया जा रहा है। उनके इस बयान के बाद भी राजनीतिक हलकों में चर्चा हुई थी कि क्या वह भविष्य में किसी राजनीतिक दल के साथ जुड़ेंगे या अपनी अलग पहचान बनाए रखेंगे।

    अभिजीत दीपके पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि फिलहाल उनकी पार्टी का चुनाव लड़ने का इरादा नहीं है। उनके मुताबिक CJP अभी एक प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करेगी। इसका अर्थ है कि संगठन फिलहाल चुनावी राजनीति में उतरने के बजाय अपने मुद्दों को उठाने और सरकार तथा राजनीतिक दलों पर दबाव बनाने की रणनीति पर ध्यान देना चाहता है।

    रामदास आठवले के ताजा बयान के बाद अभिजीत दीपके के अगले कदम पर नजर रहेगी। फिलहाल उनकी ओर से न्योते को स्वीकार करने की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में यह देखना बाकी है कि दीपके अपनी मौजूदा राजनीतिक रणनीति पर कायम रहते हैं या भविष्य में RPI के साथ जुड़ने पर विचार करते हैं।

  • कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, चारों सीटों पर हारी पार्टी; बैलेट पेपर पर भी उठे सियासी सवाल

    कर्नाटक MLC चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, चारों सीटों पर हारी पार्टी; बैलेट पेपर पर भी उठे सियासी सवाल


    नई दिल्ली। कर्नाटक विधान परिषद सदस्य यानी MLC चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। राज्य में सरकार होने के बावजूद पार्टी चारों सीटों पर हार गई। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की जबकि जनता दल सेक्युलर यानी JDS को एक सीट मिली। इन नतीजों के बाद विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। खास तौर पर बैलेट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस की हार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस लंबे समय से चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के इस्तेमाल पर सवाल उठाती रही है और बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग करती रही है। ऐसे में कर्नाटक के नतीजों को लेकर भाजपा और JDS ने कांग्रेस पर तंज कसा है।

    कर्नाटक में भाजपा और JDS ने मिलकर चुनाव लड़ा था। परिणाम में भाजपा ने उत्तर पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र दक्षिण पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की। वहीं बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट JDS के खाते में गई। चारों सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। इन नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

    बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में JDS के एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के पुट्टन्ना को हराया। रंगनाथ को 10 हजार 810 वोट मिले जबकि पुट्टन्ना को 9 हजार 902 वोट प्राप्त हुए। इस सीट पर जीत के बाद JDS नेताओं ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति और बैलेट पेपर से मतदान को लेकर उसके रुख पर सवाल उठाए। पार्टी नेता निखिल कुमारस्वामी ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस बार कांग्रेस EVM को लेकर आरोप नहीं लगा सकती क्योंकि चुनाव बैलेट पेपर से हुआ था। उन्होंने भाजपा और JDS के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जीत की बधाई भी दी।

    उत्तर पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के मौजूदा विधान परिषद सदस्य शशिल जी नामोशी ने कांग्रेस के शरणप्पा मट्टूर को हराया। नामोशी को 15 हजार 596 वोट मिले जबकि मट्टूर को 12 हजार 299 वोट प्राप्त हुए। इस तरह भाजपा उम्मीदवार ने 3 हजार 297 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इस सीट पर भाजपा ने अपना प्रभाव बरकरार रखा।

    दक्षिण पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के केएम सुरेश ने कांग्रेस उम्मीदवार शशि हुलिकुंते मठ को बड़े अंतर से पराजित किया। वहीं पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के एसवी संकनूर ने कांग्रेस के मोहन लिंबिकई को हराया। इन दोनों सीटों पर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने अपना प्रदर्शन मजबूत किया।

    बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मतदान का आंकड़ा भी उल्लेखनीय रहा। यहां 81.98 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। कुल 27 हजार 405 मतदाताओं में से 22 हजार 468 लोगों ने मतदान किया। इनमें 21 हजार 56 मत वैध पाए गए जबकि 1 हजार 857 मत अवैध घोषित किए गए।

    कर्नाटक के इन नतीजों को कांग्रेस के लिए राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। राज्य में सत्ता में होने के बावजूद पार्टी विधान परिषद की चारों सीटें नहीं जीत सकी। दूसरी ओर भाजपा और JDS गठबंधन ने सभी सीटों पर जीत हासिल की। विपक्ष अब इन परिणामों को कांग्रेस के चुनावी दावों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि विधान परिषद के इन चुनावों के नतीजों से पूरे राज्य के मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा क्योंकि इन निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता वर्ग आम विधानसभा चुनाव से अलग है।

  • पाकिस्तान पर FATF का शिकंजा कसने की तैयारी, मसूद अजहर और आतंकी फंडिंग पर उठेंगे सवाल

    पाकिस्तान पर FATF का शिकंजा कसने की तैयारी, मसूद अजहर और आतंकी फंडिंग पर उठेंगे सवाल


    नई दिल्ली। पाकिस्तान की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन सकती है। भारत फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी FATF की बैठक में जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई का मुद्दा उठाने की तैयारी में है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत यह सवाल उठाएगा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जा चुके मसूद अजहर की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए पाकिस्तान ने क्या ठोस कदम उठाए हैं। हालांकि पाकिस्तान को दोबारा FATF की ग्रे लिस्ट में शामिल किया जाएगा या नहीं इस पर अभी कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

    रिपोर्ट के अनुसार 28 से 30 अक्टूबर के बीच पेरिस में FATF की पूर्ण बैठक आयोजित होनी है। भारत ने इस मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए सहयोगी देशों के राजनयिकों और संगठन के प्रमुख सदस्य देशों से संपर्क किया है। बैठक में पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी प्रयासों और आतंकवादी संगठनों की फंडिंग रोकने के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा होने की उम्मीद है। भारत का जोर इस बात पर रह सकता है कि पाकिस्तान के दावों के साथ कार्रवाई के प्रमाण भी सामने आने चाहिए।

    इस पूरे मामले में मसूद अजहर भारत के लिए प्रमुख मुद्दा है। जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर का नाम संसद पर 2001 में हुए हमले पठानकोट एयरबेस पर 2016 में हुए हमले और 2019 के पुलवामा आतंकी हमले जैसे मामलों से जुड़ा रहा है। भारत लंबे समय से उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग करता रहा है। दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC 814 के अपहरण के बाद यात्रियों की रिहाई के बदले भारत को मसूद अजहर समेत तीन आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था। मई 2019 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया था।

    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने मसूद अजहर के अफगानिस्तान में होने की बात कही थी लेकिन तालिबान शासन ने इस दावे को खारिज कर दिया। भारत इस मुद्दे को उठाकर पाकिस्तान से यह सवाल कर सकता है कि मसूद अजहर के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई और उसके नेटवर्क को रोकने के लिए कौन से कदम उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान ने लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद सहित कुछ अन्य आतंकवादियों से जुड़ी गतिविधियों पर कार्रवाई के कदम उठाए हैं लेकिन मसूद अजहर के खिलाफ ठोस कार्रवाई के पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आने की बात कही गई है।

    पाकिस्तान पहले भी FATF की ग्रे लिस्ट में रह चुका है। वर्ष 2018 से 2022 तक उसे इस सूची में रखा गया था। उस दौरान आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ व्यवस्था मजबूत करने में कमियों को लेकर सवाल उठे थे। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों की फंडिंग रोकने तथा संयुक्त राष्ट्र के वित्तीय प्रतिबंधों को प्रभावी ढंग से लागू करने को लेकर भी पाकिस्तान पर दबाव रहा था। FATF की निगरानी के बाद पाकिस्तान ने कई सुधारात्मक कदम उठाए और बाद में उसे ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया गया।

    FATF की ग्रे लिस्ट में शामिल किए जाने का अर्थ है कि किसी देश की वित्तीय व्यवस्था में आतंकवाद के वित्तपोषण या मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े जोखिमों को लेकर कमियां पाई गई हैं और उन्हें दूर करने के लिए निगरानी की जरूरत है। ऐसी सूची में शामिल होने से देश की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय छवि प्रभावित हो सकती है और वित्तीय संस्थानों के साथ लेनदेन पर अतिरिक्त जांच का दबाव बढ़ सकता है।

    अब पेरिस में होने वाली बैठक पर नजर रहेगी। भारत मसूद अजहर के मामले को उठाकर आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकवादी नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई की मांग कर सकता है। लेकिन पाकिस्तान को दोबारा ग्रे लिस्ट में डालने का फैसला FATF की समीक्षा और सदस्य देशों के आकलन पर निर्भर करेगा। इसलिए फिलहाल इसे संभावित घटनाक्रम के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

  • CJI सूर्यकांत के खिलाफ पोस्ट पर घिरी केरल कांग्रेस, मानी गलती; न्यायपालिका के सम्मान का दिया भरोसा

    CJI सूर्यकांत के खिलाफ पोस्ट पर घिरी केरल कांग्रेस, मानी गलती; न्यायपालिका के सम्मान का दिया भरोसा



    नई दिल्ली। केरल कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई विवादित टिप्पणी को लेकर बिना शर्त माफी मांग ली है। पार्टी ने स्वीकार किया है कि उसके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से प्रकाशित पोस्ट की भाषा अनुचित थी और इसे पार्टी नेतृत्व की जानकारी या मंजूरी के बिना साझा किया गया था। विवाद बढ़ने के बाद पार्टी ने पोस्ट को हटा दिया और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई भी की। कांग्रेस ने अपने जवाब में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और भारत के मुख्य न्यायाधीश के संवैधानिक पद के प्रति सम्मान दोहराते हुए भविष्य में ऐसी घटना नहीं होने देने का भरोसा दिया है।

    केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी KPCC के अध्यक्ष सनी जोसेफ ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव और अधिवक्ता मीनेश दुबे की ओर से भेजे गए कानूनी नोटिस के जवाब में यह माफी मांगी। पार्टी ने स्पष्ट किया कि 12 अक्टूबर को उसके आधिकारिक एक्स अकाउंट से की गई पोस्ट कांग्रेस की आधिकारिक नीति या विचारधारा को नहीं दर्शाती थी। नेतृत्व ने भी इन टिप्पणियों को अनुचित बताते हुए उनसे असहमति जताई थी।

    दरअसल विवादित पोस्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संबोधित करते हुए उनसे इस्तीफा देने की मांग की गई थी। पोस्ट में कहा गया था कि यदि कानून व्यवस्था उनके अधिकार क्षेत्र का विषय नहीं है तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। साथ ही यह भी टिप्पणी की गई थी कि उनकी जगह किसी अन्य व्यक्ति को जिम्मेदारी संभालने के लिए खोजा जा सकता है। पोस्ट सामने आने के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में विवाद खड़ा हो गया। इसके बाद पार्टी ने पोस्ट हटा दी और इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति विजय थोट्टाथिल को पद से हटा दिया। उन्हें सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए भी कहा गया।

    कानूनी नोटिस के जवाब में केरल कांग्रेस ने माना कि पोस्ट की भाषा मुख्य न्यायाधीश के संवैधानिक पद के प्रति अनादर प्रदर्शित करती थी। पार्टी ने कहा कि ऐसी सामग्री को आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रकाशित नहीं किया जाना चाहिए था। कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों से असहमति जताना और न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली भाषा का इस्तेमाल करना अलग-अलग बातें हैं। राजनीतिक मतभेद किसी भी स्थिति में अनुचित टिप्पणी को सही नहीं ठहरा सकते।

    इस मामले में पार्टी ने अपनी सोशल मीडिया व्यवस्था की कमियों को भी स्वीकार किया है। KPCC के मुताबिक आधिकारिक अकाउंट तक पहुंच रखने वाले लोगों के अधिकारों और पोस्ट प्रकाशित करने से पहले मंजूरी लेने की प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी। पार्टी ने कहा कि डिजिटल संचार के लिए किसी बाहरी एजेंसी की सेवाएं लेने से आधिकारिक अकाउंट की निगरानी की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। प्रकाशित होने वाली हर सामग्री की उचित जांच और निगरानी जरूरी है।

    पार्टी अब पोस्ट तैयार करने से लेकर उसकी समीक्षा और प्रकाशन तक की प्रक्रिया की जांच करेगी। इसमें अकाउंट की अनुमति से जुड़े विवरण और संबंधित आंतरिक संवाद की भी समीक्षा की जाएगी। कांग्रेस ने यह भी कहा कि मामले से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएंगे ताकि आवश्यकता पड़ने पर उनकी जांच की जा सके।

    सनी जोसेफ ने विवादित पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से निर्देशित करने या मंजूरी देने से इनकार किया है। हालांकि उन्होंने संचार व्यवस्था में संभावित चूक को गंभीरता से लेते हुए सुधार की जरूरत स्वीकार की। पार्टी ने भरोसा दिया कि माफी और स्पष्टीकरण को उसी आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर साझा किया जाएगा जहां विवादित पोस्ट प्रकाशित हुई थी। इस घटनाक्रम के बाद केरल कांग्रेस के सामने अपनी डिजिटल संचार व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की चुनौती है।

  • ट्रेनों में अब रात 11 से सुबह 5 बजे तक मोबाइल चार्ज नहीं कर सकेंगे यात्री… चार्जिंग पॉइंट रहेंगे बंद

    ट्रेनों में अब रात 11 से सुबह 5 बजे तक मोबाइल चार्ज नहीं कर सकेंगे यात्री… चार्जिंग पॉइंट रहेंगे बंद


    जम्मू।
    भारतीय रेल (Indian Railways) में अब यात्रा के दौरान रात 11 बजे से सुबह 5 बजे तक मोबाइल फोन चार्जिंग पॉइंट (Mobile Phone Charging Point) की सुविधा नहीं मिलेगी। रेलवे बोर्ड (Railway Board) ने यात्री सुरक्षा के मद्देनजर सभी जोनल रेलवे को इस अविध में ट्रेन के डिब्बों के मोबाइल फोन चार्जिंग पॉइंट अनिवार्य रूप से बंद रखने के निर्देश दिए हैं।

    बोर्ड ने दक्षिण पूर्व रेलवे में हुए एक हादसे के बाद ये निर्देश दोबारा जारी कर उन्हें सख्ती से लागू करने की हिदायत दी है। बोर्ड ने अपने पत्र में बताया कि चार्जिंग पॉइंट बंद नहीं होने से एक यात्री का पावर बैंक फट गया था।

    रेलवे बोर्ड ने कर्मचारियों को निर्देशों के प्रति जागरूक करने, आवश्यक प्रशिक्षण देने और उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने को कहा है। अधिकारियों और पर्यवेक्षकों को औचक निरीक्षण करने को भी कहा गया है।

  • कैंसर के 11,000 के इंजेक्शन के लिए वसूले 1.30 लाख…. SC ने दवाओं की कीमतों पर उठाए सवाल…जताई नाराजगी

    कैंसर के 11,000 के इंजेक्शन के लिए वसूले 1.30 लाख…. SC ने दवाओं की कीमतों पर उठाए सवाल…जताई नाराजगी


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दवाओं की कीमतों (Medicines Prices) को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि क्या पूरा सिस्टम (Entire System) दवा कंपनियों (Pharmaceutical Companies) की मदद करने में जुटा है? दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) और दुकानदारों को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच भारी अंतर पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने कहा कि सरकार की नजरों के सामने यह सब हो रहा है। क्या इस तरह की मनमानी की अनुमति दी जा सकती है?

    दवाओं की कीमतों से जुड़े दो मामलों पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने टिप्पणी की कि यह संस्था पूरी तरह निष्क्रिय नजर आती है।


    कैंसर के इंजेक्शन की कीमत 11 हजार से सीधे 1.30 लाख रुपये कैसे?

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाले एक इंजेक्शन का उदाहरण देते हुए दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर सवाल उठाए।

    अदालत ने बताया कि एक दवा कारोबारी की पत्नी का निजी अस्पताल में कैंसर का इलाज चल रहा था। कारोबारी ने अस्पताल को बताया कि वह खुद दवा विक्रेता है और उसे कीमोथेरेपी का इंजेक्शन 11,000 रुपये में मिलता है। इसके बावजूद अस्पताल ने उसी इंजेक्शन को उस कीमत पर देने से इनकार कर दिया और इसके लिए 1.30 लाख रुपये वसूले। अदालत ने सवाल किया कि इतनी बड़ी कीमत का कोई औचित्य कैसे हो सकता है? आखिर इस अंतर की वजह क्या है और यह पैसा कहां जा रहा है?

    केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के कई देशों के मुकाबले कम हैं। इस पर अदालत ने कहा कि जब मरीजों और उनकी जिंदगी का सवाल हो, तो क्या इस तरह की पूंजीवादी सोच अपनाई जानी चाहिए?


    दवाओं की कीमतों पर केंद्र की नीति से संतुष्ट नहीं अदालत

    केंद्र की ओर से कहा गया कि सरकार दवाओं की कीमतों से जुड़ी नीतियों में लगातार बदलाव और सुधार कर रही है। हालांकि, अदालत ने इस दलील पर असहमति जताई। पीठ ने कहा कि सरकार जिस प्रक्रिया को कीमतों में संतुलन बनाने की कोशिश बता रही है, वह बेहद असंगत है। एक इंजेक्शन की कीमत 11,000 रुपये से बढ़कर 1.30 लाख रुपये हो जाना किसी भी तरह से संतुलन बनाने की प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता।

    अदालत ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर मौजूदा व्यवस्था को ‘लूट और डकैती’ करार दिया। पीठ ने कहा कि इस व्यवस्था का खामियाजा उन मरीजों को भुगतना पड़ रहा है, जो पहले से ही मुश्किल परिस्थितियों में हैं।


    कैंसर की दवाओं पर 30 फीसदी ट्रेड मार्जिन की सीमा

    सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को भी कैंसर की दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी पर चिंता जताई थी। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि जब कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन की सीमा तय की जा सकती है, तो दूसरी दवाओं के मामले में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत की आलोचना के बाद केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 फीसदी तक ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने का फैसला किया था। इस फैसले पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) की 8 अक्टूबर को हुई 151वीं बैठक में विचार किया गया था।

    सरकार के इस कदम से मरीजों को हर साल करीब 2,500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस कदम से संतुष्ट नहीं था। अदालत ने कहा कि इस फैसले में मरीजों के लिए खुशी की कोई खास बात नहीं है।


    11 रुपये की सलाइन बाजार में 270 रुपये में बिक रही

    अदालत ने दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में अंतर के कई अन्य उदाहरण भी दिए।
    – सलाइन ड्रिप: अदालत ने कहा कि एक सलाइन ड्रिप, जिसकी वास्तविक कीमत 11 रुपये है, बाजार में 270 रुपये में बेची जा रही है।
    – हार्ट स्टेंट: भारत में बने एक कार्डियक स्टेंट की कीमत करीब 5,000 रुपये बताई गई, जबकि अस्पताल इसे 25,000 रुपये से अधिक में बेच रहे हैं।
    – एजिथ्रोमाइसिन: आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले इस एंटीबायोटिक की वास्तविक कीमत करीब 28 रुपये है, जबकि इसे 70 रुपये से अधिक में बेचा जा रहा है।
    – अदालत ने इन उदाहरणों के आधार पर दवाओं और चिकित्सा उत्पादों की कीमतों में अंतर को लेकर सरकार की नीति पर सवाल उठाए।


    सरकार ने क्या दी दलील?

    केंद्र सरकार का कहना है कि दवाओं की कीमतों पर एक सीमा से अधिक नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता। सरकार के मुताबिक, कारोबार में पर्याप्त मार्जिन मिलने से दवाओं को दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने में मदद मिलती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO) के तहत आने वाली दवाएं मरीजों तक नहीं पहुंच रही हैं, तो उन्हें उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि असली सवाल यह है कि किन दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा जाना चाहिए और किन्हें इससे बाहर रखा जाना चाहिए। दवाओं की कीमतों से जुड़े दोनों मामलों में दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।