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  • ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    ईमेल से मिली बम धमकी के बाद ISRO परिसर में हाई अलर्ट, सुरक्षा एजेंसियों का व्यापक सर्च ऑपरेशन; स्रोत की पड़ताल जारी

    नई दिल्ली । बेंगलुरु स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के न्यू BEL रोड परिसर को बम से उड़ाने की धमकी मिलने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह सतर्क कर दी गई। धमकी भरा ईमेल प्राप्त होते ही एहतियात के तौर पर पूरे परिसर को तत्काल खाली कराया गया और सुरक्षा एजेंसियों ने व्यापक तलाशी अभियान शुरू कर दिया। घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई तथा सभी प्रवेश और निकास बिंदुओं पर निगरानी बढ़ा दी गई।

    सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस, बम निरोधक दस्ता और अन्य सुरक्षा इकाइयों की टीमें मौके पर पहुंचीं। इसके बाद भवन और परिसर के प्रत्येक हिस्से की सावधानीपूर्वक जांच की गई। कई घंटों तक चले सर्च ऑपरेशन के दौरान किसी भी प्रकार का विस्फोटक, संदिग्ध सामग्री या सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली वस्तु बरामद नहीं हुई। प्रारंभिक जांच में धमकी को फर्जी माना जा रहा है, हालांकि सुरक्षा एजेंसियां मामले को पूरी गंभीरता से लेते हुए सभी पहलुओं की जांच कर रही हैं।

    अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों से जुड़ी किसी भी प्रकार की धमकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यही कारण है कि सूचना मिलते ही निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के अनुसार परिसर को खाली कराया गया और विशेषज्ञ टीमों की निगरानी में विस्तृत तलाशी अभियान चलाया गया। जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था को अतिरिक्त रूप से मजबूत रखा गया।

    जांच एजेंसियां अब धमकी भरे ईमेल के स्रोत, उसकी तकनीकी जानकारी और उसे भेजने वाले व्यक्ति या समूह की पहचान करने में जुटी हैं। डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ईमेल किस माध्यम से भेजा गया और इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका तो नहीं है। साइबर विशेषज्ञ भी तकनीकी जांच में सहयोग कर रहे हैं।

    हाल के समय में कई सरकारी संस्थानों, न्यायिक परिसरों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को भी इसी प्रकार के धमकी भरे ईमेल प्राप्त होने की घटनाएं सामने आई हैं। अधिकांश मामलों में तलाशी के दौरान कोई विस्फोटक नहीं मिला, लेकिन प्रत्येक सूचना पर सुरक्षा एजेंसियां पूरी सतर्कता के साथ कार्रवाई कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।

    इसी क्रम में एक संदिग्ध व्यक्ति को विभिन्न संस्थानों को कथित रूप से फर्जी बम धमकी वाले ईमेल भेजने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या वर्तमान घटना का उससे कोई संबंध है या यह मामला अलग है। फिलहाल इस संबंध में विस्तृत जांच जारी है और सभी तथ्यों का सत्यापन किया जा रहा है।

    सुरक्षा एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि संबंधित परिसर पूरी तरह सुरक्षित है और सामान्य स्थिति बहाल करने की प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अपुष्ट जानकारी या अफवाह पर विश्वास न करें तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं पर ही भरोसा करें। मामले की जांच पूरी होने तक सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जाएगी।

  • क्राइम सीन पर अब तुरंत फॉरेंसिक जांच, गुजरात की 47 हाईटेक मोबाइल वैन से मजबूत होगी जांच और दोषसिद्धि की प्रक्रिया

    क्राइम सीन पर अब तुरंत फॉरेंसिक जांच, गुजरात की 47 हाईटेक मोबाइल वैन से मजबूत होगी जांच और दोषसिद्धि की प्रक्रिया

    गांधीनगर । गुजरात में अपराध जांच को अधिक वैज्ञानिक, सटीक और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से राज्यभर में 47 मोबाइल फॉरेंसिक वैन सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इन अत्याधुनिक वाहनों की मदद से पुलिस को घटनास्थल पर ही प्रारंभिक वैज्ञानिक परीक्षण, साक्ष्यों के संरक्षण और शुरुआती फॉरेंसिक विश्लेषण की सुविधा मिल रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महत्वपूर्ण साक्ष्य समय रहते सुरक्षित किए जा सकें और उनके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ या दूषित होने की संभावना न्यूनतम रहे।

    राज्य में फॉरेंसिक विज्ञान के विस्तार के लिए पिछले वर्षों में विशेष प्रयास किए गए हैं। इसी दिशा में फॉरेंसिक शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए स्थापित संस्थान को अब केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिल चुका है। इसके साथ ही अपराध जांच में वैज्ञानिक तरीकों के अधिकतम उपयोग पर लगातार जोर दिया गया है, जिससे पुलिस जांच की गुणवत्ता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार आया है।

    नई आपराधिक व्यवस्था लागू होने के बाद वैज्ञानिक जांच की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। विशेष रूप से ऐसे मामलों में, जिनमें सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, फॉरेंसिक जांच को अनिवार्य बनाए जाने के बाद घटनास्थल पर तत्काल विशेषज्ञ सहायता की आवश्यकता बढ़ी है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मोबाइल फॉरेंसिक वैन की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।

    पिछले दो वर्षों के दौरान ये मोबाइल फॉरेंसिक वैन राज्यभर में हजारों अपराध स्थलों पर पहुंचकर जांच एजेंसियों की सहायता कर चुकी हैं। हत्या, यौन अपराध, पॉक्सो, लूट, चोरी, आगजनी, मादक पदार्थों से जुड़े मामलों और अन्य गंभीर अपराधों में घटनास्थल पर वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने का कार्य किया गया। इसके अलावा संदिग्ध मौत, हिरासत में मृत्यु, दुर्घटनाओं और अन्य संवेदनशील मामलों में भी इन वैनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    इन विशेष वाहनों में आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों और परीक्षण किटों की व्यापक व्यवस्था की गई है। इनमें डीएनए और जैविक नमूनों की जांच, यौन अपराधों से जुड़े साक्ष्यों का संग्रह, मादक पदार्थों और विस्फोटक पदार्थों की प्रारंभिक पहचान, आगजनी से संबंधित विश्लेषण तथा गन शॉट अवशेषों की जांच के लिए आवश्यक किट उपलब्ध हैं। इसके साथ ही पैरों और टायर के निशानों के संरक्षण तथा अन्य सूक्ष्म साक्ष्यों के संग्रह की भी सुविधा मौजूद है।

    मोबाइल फॉरेंसिक वैन में उच्च क्षमता वाले कैमरे, स्टीरियो माइक्रोस्कोप, जीपीएस आधारित बॉडी कैमरा, लैपटॉप, प्रिंटर, मिनी रेफ्रिजरेटर, एलईडी डिस्प्ले, उच्च तीव्रता वाली फॉरेंसिक लाइट और अन्य आधुनिक उपकरण लगाए गए हैं। इनकी सहायता से घटनास्थल पर रक्त के धब्बों, फिंगरप्रिंट, बाल, फाइबर, मिट्टी, कांच के टुकड़ों, जैविक नमूनों और अन्य सूक्ष्म साक्ष्यों की प्रारंभिक जांच और सुरक्षित संग्रहण किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फॉरेंसिक वैन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अपराध स्थल पर तुरंत वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध हो जाती है, जिससे महत्वपूर्ण साक्ष्यों के नष्ट होने या दूषित होने की आशंका काफी कम हो जाती है। विशेषकर यौन अपराध और पॉक्सो जैसे मामलों में समय पर जैविक साक्ष्य एकत्र करना जांच की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के व्यापक उपयोग से गुजरात में अपराध जांच की कार्यप्रणाली अधिक सुदृढ़, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बन रही है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया को भी मजबूत आधार मिलने की उम्मीद है।

  • 'गेम बदलने' के दावे के साथ मैदान में उतरे ओवैसी, मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस से सपा-कांग्रेस की बढ़ी चिंता, बीजेपी भी रख रही पैनी नजर

    'गेम बदलने' के दावे के साथ मैदान में उतरे ओवैसी, मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस से सपा-कांग्रेस की बढ़ी चिंता, बीजेपी भी रख रही पैनी नजर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने राज्य की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। हाल के दिनों में विभिन्न जिलों के दौरों और लगातार जनसभाओं के जरिए उन्होंने यह संकेत दिया है कि उनकी पार्टी इस बार पहले की तुलना में अधिक संगठित और आक्रामक रणनीति के साथ चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। इसी क्रम में उनके ‘गेम बदलने’ वाले दावे ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

    ओवैसी ने मुस्लिम बहुल और सामाजिक रूप से प्रभावशाली मानी जाने वाली विधानसभा सीटों पर विशेष फोकस करने की रणनीति बनाई है। पार्टी का कहना है कि वह प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में संगठन को मजबूत कर रही है और स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। चुनावी सभाओं के माध्यम से एआईएमआईएम खुद को एक वैकल्पिक राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

    हालांकि उत्तर प्रदेश में अब तक पार्टी को विधानसभा चुनावों में कोई सीट हासिल नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई सीटों पर सीमित वोटों का अंतर भी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में यदि एआईएमआईएम कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय वोट हासिल करती है तो इसका असर उन दलों पर पड़ सकता है, जिनका पारंपरिक समर्थन आधार अल्पसंख्यक मतदाता रहे हैं।

    प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टियां लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से को अपने साथ बनाए रखने का प्रयास करती रही हैं। ऐसे में एआईएमआईएम की सक्रियता विपक्षी दलों के लिए नई चुनौती के रूप में देखी जा रही है। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि विपक्षी मतों का बिखराव होता है तो इसका सीधा असर कई करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर दिखाई दे सकता है।

    दूसरी ओर, एआईएमआईएम का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी दल को नुकसान पहुंचाना नहीं बल्कि अपने राजनीतिक आधार का विस्तार करना और उन वर्गों की आवाज को मजबूती देना है, जिन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला। पार्टी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह प्रदेश की राजनीति में दीर्घकालिक भूमिका निभाने के इरादे से चुनाव लड़ रही है।

    चुनावी तैयारियों के बीच संभावित राजनीतिक गठबंधनों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। अलग-अलग क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल की संभावनाओं पर समय-समय पर अटकलें लगती रही हैं, हालांकि फिलहाल किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है। राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार चुनाव नजदीक आने पर नए समीकरण बनने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव केवल सीटों की संख्या का मुकाबला नहीं होता, बल्कि सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और मतों के ध्रुवीकरण जैसे कई कारक परिणाम तय करते हैं। ऐसे में एआईएमआईएम का प्रदर्शन भले सीटों में न बदले, लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों में उसका प्रभाव चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है।

    आने वाले महीनों में जैसे-जैसे चुनावी गतिविधियां तेज होंगी, विभिन्न दल अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देंगे। ऐसे माहौल में ओवैसी की सक्रियता और उनकी पार्टी की चुनावी योजना उत्तर प्रदेश की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बनी हुई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चुनावी मैदान में यह रणनीति वास्तविक जनसमर्थन में कितनी बदल पाती है और प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों पर इसका कितना असर पड़ता है।

  • डेकेयर सेंटर में बच्चों से कथित दुर्व्यवहार का मामला, कैपजेमिनी ने उठाया बड़ा कदम, पांच केयरगिवर्स पर केस दर्ज

    डेकेयर सेंटर में बच्चों से कथित दुर्व्यवहार का मामला, कैपजेमिनी ने उठाया बड़ा कदम, पांच केयरगिवर्स पर केस दर्ज

    नई दिल्ली। बेंगलुरु स्थित एक कॉर्पोरेट डेकेयर सेंटर में छोटे बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप सामने आने के बाद आईटी क्षेत्र में गंभीर चिंता का माहौल बन गया है। मामले के सामने आने के बाद कैपजेमिनी ने अपने कैंपस में संचालित डेकेयर सुविधा को एहतियातन अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। कंपनी का कहना है कि कर्मचारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा तथा बच्चों की भलाई उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और वह पूरे मामले में संबंधित अधिकारियों के साथ पूर्ण सहयोग कर रही है।

    बताया गया है कि यह डेकेयर सेंटर बेंगलुरु के ब्रुकफील्ड क्षेत्र स्थित कंपनी के कैंपस में संचालित किया जा रहा था। मामले ने तब तूल पकड़ा जब सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार के दृश्य दिखाई देने का दावा किया गया। वीडियो सामने आने के बाद संबंधित अधिकारियों ने तत्काल संज्ञान लेते हुए जांच प्रक्रिया शुरू की।

    जिला बाल संरक्षण इकाई की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया है। जांच के दौरान डेकेयर सेंटर में कार्यरत पांच महिला केयरगिवर्स के खिलाफ किशोर न्याय कानून की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू की गई है। पुलिस अब उपलब्ध वीडियो, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही है ताकि आरोपों की सत्यता का पता लगाया जा सके।

    शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डेकेयर सेंटर में दो से तीन वर्ष की आयु के बच्चों के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता था। आरोपों के अनुसार बच्चों के रोने पर उन्हें डराया-धमकाया जाता था, उनके साथ मारपीट की जाती थी और कई बार उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी किया गया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि कुछ बच्चों को बाथरूम में बंद करने, उनके साथ अनुचित शारीरिक व्यवहार करने और उन्हें भयभीत करने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। इन आरोपों की पुष्टि फिलहाल जांच के बाद ही हो सकेगी।

    कंपनी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया गया है और संबंधित एजेंसियों को हर संभव सहयोग दिया जा रहा है। साथ ही, जांच पूरी होने तक डेकेयर सुविधा को बंद रखने का निर्णय एहतियाती कदम के रूप में लिया गया है। कंपनी ने यह भी भरोसा दिलाया है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सभी मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाएगा और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला कॉर्पोरेट परिसरों में संचालित डेकेयर केंद्रों की निगरानी, सुरक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों के प्रशिक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। बच्चों की देखभाल से जुड़ी संस्थाओं में नियमित निरीक्षण, पारदर्शी निगरानी प्रणाली और शिकायत निवारण तंत्र को और मजबूत बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    फिलहाल पुलिस पूरे मामले की विस्तृत जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं, इस घटना ने अभिभावकों के बीच भी बच्चों की सुरक्षा और डेकेयर केंद्रों की कार्यप्रणाली को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

  • दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार

    दिल्ली में बड़े आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़, चार आरोपी हथियारों समेत गिरफ्तार


    नई दिल्ली।
    राजधानी दिल्ली में संभावित आतंकी साजिश को समय रहते विफल करते हुए पुलिस ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से जुड़े बताए जा रहे एक संदिग्ध नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। इस कार्रवाई में चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें तीन पंजाब और एक दिल्ली से पकड़ा गया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि आरोपी राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में हिंसक वारदात को अंजाम देने की तैयारी में थे। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से विदेशी हथियार, जिंदा कारतूस और कई मोबाइल फोन बरामद किए हैं, जिनकी फोरेंसिक जांच कराई जा रही है।

    जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए संदिग्ध एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा थे, जो सीमा पार बैठे संचालकों के संपर्क में रहकर गतिविधियों को अंजाम देने की तैयारी कर रहा था। पुलिस का दावा है कि आरोपियों को राजधानी में संवेदनशील स्थानों की निगरानी करने और हमले की योजना तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इस नेटवर्क की गतिविधियों पर लंबे समय से नजर रखी जा रही थी और पर्याप्त साक्ष्य मिलने के बाद समन्वित कार्रवाई की गई।

    पूछताछ के दौरान सामने आया कि नेटवर्क का एक प्रमुख सदस्य पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजी जाने वाली हथियारों और मादक पदार्थों की खेप प्राप्त करने में सक्रिय भूमिका निभाता था। जांच में यह भी पता चला कि विदेशी नंबरों के माध्यम से सीमा पार मौजूद संचालकों से लगातार संपर्क बनाए रखा जाता था। पुलिस अब इन संचार माध्यमों, डिजिटल रिकॉर्ड और कॉल डिटेल का विश्लेषण कर नेटवर्क की पूरी श्रृंखला तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

    जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार किए गए कुछ आरोपी पहले भी मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों में कानून के शिकंजे में आ चुके हैं। पुलिस का मानना है कि संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और आतंकी गतिविधियों के बीच संभावित संबंधों की भी जांच की जाएगी। इसी आधार पर विभिन्न राज्यों की एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है ताकि नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान की जा सके।

    दिल्ली से गिरफ्तार आरोपी के मोबाइल फोन की जांच में कई महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य मिलने का दावा किया गया है। प्रारंभिक जांच के अनुसार, उसे राजधानी के धार्मिक स्थलों, पुलिस थानों और सुरक्षा प्रतिष्ठानों की रेकी करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा उसे दिल्ली में फायरिंग जैसी वारदात को अंजाम देने के निर्देश मिलने के संकेत भी मिले हैं। पुलिस इन डिजिटल साक्ष्यों की तकनीकी जांच कर यह पता लगाने में जुटी है कि साजिश कितनी व्यापक थी और इसमें अन्य कौन-कौन लोग शामिल हो सकते हैं।

    पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ आतंक से संबंधित प्रावधानों, हथियार रखने और अन्य आपराधिक धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी है। जांच एजेंसियों का कहना है कि बरामद हथियारों की उत्पत्ति, वित्तीय लेनदेन, सीमा पार संपर्क और डिजिटल नेटवर्क की विस्तृत पड़ताल की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला मानते हुए सभी पहलुओं की गहन जांच कर रही हैं, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते निष्प्रभावी बनाया जा सके।

  • ईंधन कीमतों में कटौती से बढ़ी राहत की उम्मीद, पेट्रोल 5 और डीजल 3 रुपये सस्ता, बचत पर उपभोक्ताओं की नजर

    ईंधन कीमतों में कटौती से बढ़ी राहत की उम्मीद, पेट्रोल 5 और डीजल 3 रुपये सस्ता, बचत पर उपभोक्ताओं की नजर

    नई दिल्ली। बढ़ती महंगाई के बीच ईंधन की कीमतों में आई राहत ने आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन और डिलीवरी सेवाओं से जुड़े लोगों को भी राहत की उम्मीद दी है। निजी क्षेत्र की प्रमुख ईंधन विपणन कंपनी नायरा एनर्जी ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में क्रमशः 5 रुपये और 3 रुपये प्रति लीटर की कटौती का फैसला लागू किया है। इस निर्णय के बाद कई शहरों में कंपनी के पेट्रोल पंपों पर ईंधन पहले की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध हो रहा है।

    ईंधन की कीमतों में यह कटौती ऐसे समय की गई है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी देखने को मिल रही है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव कम होने और आपूर्ति संबंधी चिंताओं में कमी आने से कच्चे तेल के दाम नीचे आए हैं। इसका असर घरेलू ईंधन बाजार पर भी दिखाई देने लगा है और निजी कंपनियों ने उपभोक्ताओं तक इसका लाभ पहुंचाना शुरू कर दिया है।

    कीमतों में कमी का सबसे अधिक फायदा उन लोगों को मिलने की उम्मीद है, जिनका दैनिक खर्च ईंधन पर निर्भर करता है। टैक्सी चालक, कैब सेवा से जुड़े ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर, छोटे कारोबारी और रोजाना लंबी दूरी तय करने वाले वाहन मालिकों के लिए यह कटौती मासिक ईंधन खर्च में उल्लेखनीय बचत का कारण बन सकती है। कई उपभोक्ताओं ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे महंगाई के दौर में राहत देने वाला कदम बताया है।

    ईंधन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं तो आगे भी खुदरा कीमतों में राहत की संभावना बनी रह सकती है। हालांकि, अंतिम कीमतें वैश्विक बाजार, विनिमय दर, कर संरचना और विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति जैसे कई कारकों पर निर्भर करती हैं।

    दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने फिलहाल पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। राष्ट्रीय राजधानी सहित कई प्रमुख शहरों में सरकारी कंपनियों के पंपों पर पहले से लागू दरें ही प्रभावी हैं। ऐसे में निजी और सरकारी कंपनियों की मूल्य नीति के बीच अंतर भी उपभोक्ताओं का ध्यान आकर्षित कर रहा है।

    ईंधन के अलावा हाल ही में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में भी कमी दर्ज की गई है, जिससे होटल, रेस्तरां और छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को परिचालन लागत घटाने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में कीमतों की यह नरमी यदि लंबे समय तक बनी रहती है तो परिवहन लागत पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे वस्तुओं की ढुलाई की लागत कम होने के साथ कई क्षेत्रों में महंगाई का दबाव भी कुछ हद तक घट सकता है। फिलहाल उपभोक्ताओं की नजर इस बात पर बनी हुई है कि आने वाले दिनों में अन्य ईंधन कंपनियां भी कीमतों में इसी तरह की राहत देती हैं या नहीं।

  • 30 दिन की न्यायिक हिरासत पर जाएगी PM-CM की कुर्सी? 130वें संविधान संशोधन विधेयक ने बढ़ाया सियासी तापमान, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

    30 दिन की न्यायिक हिरासत पर जाएगी PM-CM की कुर्सी? 130वें संविधान संशोधन विधेयक ने बढ़ाया सियासी तापमान, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

    नई दिल्ली । संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले 130वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री ऐसे गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, तो उसका पद स्वतः रिक्त माना जाएगा। इस प्रस्ताव को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखा मतभेद सामने आ गया है और इसकी संवैधानिक वैधता पर भी व्यापक चर्चा हो रही है।

    प्रस्तावित संशोधन के अनुसार केवल गिरफ्तारी के आधार पर किसी जनप्रतिनिधि का पद समाप्त नहीं होगा। कार्रवाई तभी होगी जब संबंधित व्यक्ति लगातार 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहेगा। इसके बाद 31वें दिन प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के मामले में राष्ट्रपति तथा राज्यों में मुख्यमंत्री और मंत्रियों के मामले में राज्यपाल आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करेंगे। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 75, 164 और 239AA में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है।

    सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का संचालन जेल से नहीं किया जा सकता। उसका तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए जवाबदेही और नैतिक मानकों का पालन आवश्यक है। सरकार का यह भी कहना है कि किसी भी आरोपी को न्यायालय से जमानत पाने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं और यदि 30 दिन बाद भी न्यायिक हिरासत जारी रहती है तो मामले की गंभीरता स्वतः स्पष्ट होती है। साथ ही अदालतों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे और किसी भी राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई की स्थिति में न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।

    विपक्ष इस प्रस्ताव का लगातार विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत दोषी घोषित नहीं करती, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है। विपक्ष का आरोप है कि केवल हिरासत को आधार बनाकर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि का पद समाप्त करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। विपक्षी दलों ने यह भी आशंका जताई है कि जांच एजेंसियों के माध्यम से राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाकर इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।

    इस विधेयक की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट मानसून सत्र से पहले प्रस्तुत करने की तैयारी में है। माना जा रहा है कि समिति मूल प्रावधान को बरकरार रखने के साथ कुछ अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की भी सिफारिश कर सकती है, ताकि राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित मामलों में इस कानून का गलत इस्तेमाल रोका जा सके। समिति में शामिल कुछ विपक्षी सदस्य असहमति नोट भी दर्ज करा सकते हैं।

    विधेयक के पारित होने की राह आसान नहीं मानी जा रही है क्योंकि संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है। मौजूदा संसदीय गणित में सत्तापक्ष को अभी भी अपेक्षित समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में क्षेत्रीय दलों का रुख और संभावित राजनीतिक समीकरण इस विधेयक के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल कानूनी बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही, संघीय ढांचे, न्यायिक प्रक्रिया और जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक जिम्मेदारियों से जुड़े व्यापक प्रश्न भी खड़े करता है। संसद के मानसून सत्र में इस मुद्दे पर विस्तृत बहस होने की संभावना है और यह तय करेगा कि जवाबदेही और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।

  • हनीमून मर्डर केस में नया मोड़, सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची मेघालय पुलिस, शुक्रवार को होगी अहम सुनवाई

    हनीमून मर्डर केस में नया मोड़, सोनम रघुवंशी की जमानत रद्द कराने सुप्रीम कोर्ट पहुंची मेघालय पुलिस, शुक्रवार को होगी अहम सुनवाई


    नई दिल्ली । चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है। इस मामले में मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को मिली जमानत के खिलाफ मेघालय पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पुलिस ने शीर्ष अदालत से निचली अदालत द्वारा दिए गए जमानत आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। पुलिस का कहना है कि आरोपी के फरार होने की आशंका को देखते हुए तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करने का निर्देश दिया है।

    यह मामला वर्ष 2025 में सामने आया था, जब इंदौर के ट्रांसपोर्ट कारोबारी राजा रघुवंशी अपनी पत्नी सोनम रघुवंशी के साथ विवाह के कुछ दिनों बाद हनीमून मनाने मेघालय पहुंचे थे। यात्रा के दौरान चेरापूंजी क्षेत्र में राजा अचानक लापता हो गए थे। व्यापक तलाश के बाद उनका शव एक गहरी खाई से बरामद हुआ, जिसके बाद मामले ने हत्या का रूप ले लिया और जांच एजेंसियों ने विस्तृत पड़ताल शुरू की।

    जांच के दौरान पुलिस ने सोनम रघुवंशी, उसके कथित प्रेमी राज कुशवाहा तथा अन्य सहयोगियों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश से जुड़े आरोप दर्ज किए। जांच में जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने विस्तृत चार्जशीट अदालत में प्रस्तुत की और दावा किया कि वारदात पूर्व नियोजित थी तथा इसे आर्थिक लाभ और निजी कारणों को ध्यान में रखकर अंजाम दिया गया था। बाद में सोनम को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया गया।

    हालांकि, मामले में एक तकनीकी त्रुटि ने कानूनी प्रक्रिया को नया मोड़ दे दिया। गिरफ्तारी के दौरान तैयार किए गए अरेस्ट मेमो में हत्या से संबंधित लागू धारा के स्थान पर गलत धारा दर्ज कर दी गई। इतना ही नहीं, दस्तावेज में कुछ अन्य तथ्यात्मक त्रुटियां भी सामने आईं। अदालत ने माना कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को कानून के अनुरूप सही जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। इसी आधार पर निचली अदालत ने सोनम रघुवंशी को सशर्त जमानत प्रदान कर दी।

    इसके बाद राज्य सरकार ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिल सकी। उच्च न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में बरती गई लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विधिक प्रक्रिया का पालन प्रत्येक आपराधिक मामले में अनिवार्य है और जांच एजेंसियों से अपेक्षित सावधानी बरतना आवश्यक है।

    अब मेघालय पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा है कि गिरफ्तारी मेमो में दर्ज त्रुटियां जानबूझकर नहीं की गई थीं, बल्कि यह प्रशासनिक और टाइपिंग संबंधी चूक का परिणाम थीं। पुलिस का कहना है कि गंभीर अपराध से जुड़े मामले में केवल तकनीकी भूल के आधार पर आरोपी को राहत देना न्यायहित में उचित नहीं माना जा सकता। याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में साक्ष्यों, अपराध की प्रकृति और जांच की गंभीरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि जमानत आदेश पर अंतरिम रोक लगाई जाए या नहीं तथा गिरफ्तारी प्रक्रिया में हुई तकनीकी त्रुटियों का इस मामले पर कितना कानूनी प्रभाव पड़ता है। इस निर्णय का असर न केवल राजा रघुवंशी हत्याकांड की आगे की सुनवाई पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी प्रक्रिया और कानूनी औपचारिकताओं की व्याख्या के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • टीएमसी में सियासी संग्राम तेज, बागी गुट का चुनाव आयोग में शक्ति प्रदर्शन; दो-तिहाई विधायकों के समर्थन का दावा, बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां

    टीएमसी में सियासी संग्राम तेज, बागी गुट का चुनाव आयोग में शक्ति प्रदर्शन; दो-तिहाई विधायकों के समर्थन का दावा, बढ़ीं ममता बनर्जी की चुनौतियां

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सियासी खींचतान अब एक नए चरण में पहुंच गई है। पार्टी के बागी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर संगठन पर अपना दावा पेश किया और कहा कि उन्हें विधानसभा में पार्टी के दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इस घटनाक्रम के बाद राज्य की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है तथा तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    बागी गुट की ओर से चुनाव आयोग के समक्ष यह दावा किया गया कि हाल ही में आयोजित प्रतिनिधि सम्मेलन में नई राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया था। इसके बाद संगठनात्मक बदलाव की जानकारी आयोग को भेजी गई और आधिकारिक तौर पर पक्ष रखने का अवसर मांगा गया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक, पार्षद और जिला परिषद सदस्य जुड़े हुए हैं, इसलिए वास्तविक बहुमत उनके पास है।

    बागी नेताओं ने अपनी मुहिम को केवल नेतृत्व परिवर्तन का मामला नहीं बताया, बल्कि इसे संगठन की कार्यशैली से जुड़ा मुद्दा बताया। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया गया है और संगठन सीमित नेतृत्व के प्रभाव में सिमट गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी नहीं रही, जिसके कारण असंतोष लगातार बढ़ता गया।

    गुट के नेताओं ने यह भी दावा किया कि वे स्वयं को तृणमूल कांग्रेस का वास्तविक प्रतिनिधि मानते हैं। उनका कहना है कि पार्टी की मूल विचारधारा और संगठनात्मक संरचना को बचाने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब चुनाव आयोग के समक्ष संगठन की वैधता और बहुमत से जुड़े सभी तथ्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं तथा आगे का निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार होगा।

    राजनीतिक विवाद के बीच विधानसभा में विधायकों के समर्थन को लेकर भी अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। बागी गुट का कहना है कि उसके साथ बहुमत में विधायक मौजूद हैं और इसी आधार पर संगठन पर उसका दावा मजबूत है। दूसरी ओर, मूल नेतृत्व के समर्थक इन दावों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ऐसे में वास्तविक संख्या और समर्थन को लेकर राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर स्थिति महत्वपूर्ण बनी हुई है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता को लेकर भी विवाद सामने आया है। इसी संबंध में जांच की प्रक्रिया शुरू की गई है। जांच के बाद संबंधित नेताओं के खिलाफ संगठनात्मक कार्रवाई भी की गई, जिसके बाद पार्टी के भीतर मतभेद और खुलकर सामने आ गए। इसके बाद बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग प्रस्ताव पेश करते हुए स्वयं को बहुमत वाला समूह बताया।

    बाद के घटनाक्रम में विधानसभा स्तर पर भी नेतृत्व से जुड़े बदलाव देखने को मिले, जिससे राजनीतिक विवाद और गहरा गया। अब पूरे मामले पर सभी की नजर चुनाव आयोग की आगामी प्रक्रिया और संभावित निर्णय पर टिकी है। यदि बागी गुट अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज और संख्या प्रस्तुत करने में सफल रहता है तो राज्य की राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। वहीं यदि दावे सिद्ध नहीं होते हैं तो पार्टी का मौजूदा नेतृत्व अपनी स्थिति और मजबूत करने का प्रयास करेगा। आने वाले दिनों में यह मामला पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन सकता है।

  • राज्यों पर पड़ेगा वित्तीय बोझ: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 'विकसित भारत गारंटी' के नियमों को बदलने की मांग उठाई

    राज्यों पर पड़ेगा वित्तीय बोझ: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 'विकसित भारत गारंटी' के नियमों को बदलने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी और प्रस्तावित ‘विकसित भारत गारंटी’ योजना के वर्तमान स्वरूप पर गहरी असहमति जताते हुए इसका कड़ा विरोध किया है। मुख्यमंत्री ने इस संबंध में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र प्रेषित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि नई व्यवस्था के मौजूदा नियमों को यदि इसी तरह लागू किया गया तो राज्य सरकार के खजाने पर 5,000 करोड़ रुपये से अधिक का भारी और अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। उन्होंने केंद्र से इस योजना के वित्तीय और प्रशासनिक दिशा-निर्देशों में तत्काल सुधार करने का आग्रह किया है।

    मध्य प्रदेश

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने पत्र के माध्यम से नई योजना के तहत तय किए गए फंडिंग पैटर्न पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने उल्लेख किया कि ‘विकसित भारत गारंटी’ अधिनियम, 2025 के प्रावधानों के मुताबिक मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक खर्चों को वहन करने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 का अनुपात निर्धारित किया गया है। मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि देश में पिछले दो दशकों से ग्रामीण रोजगार योजना एक बिल्कुल अलग वित्तीय ढांचे के अंतर्गत सफलतापूर्वक संचालित हो रही थी, जहां राज्यों पर इस तरह का भार नहीं था। अचानक किए गए इस नीतिगत बदलाव से राज्यों की वित्तीय स्थिति पूरी तरह असंतुलित हो जाएगी।

    तमिलनाडु सरकार का मानना है कि इस नए वित्तीय फॉर्मूले के कारण राज्य को अपनी अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और जनहित से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं के बजट में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, अथवा ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को दिए जाने वाले रोजगार के दिनों की संख्या को कम करना पड़ेगा। इस संभावित संकट से बचने के लिए मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया है कि मजदूरी और प्रशासनिक व्यय की पूरी शत-प्रतिशत जिम्मेदारी केंद्र सरकार को खुद उठानी चाहिए, जबकि निर्माण सामग्री से जुड़े खर्चों को केंद्र और राज्यों के बीच 75:25 के तार्किक अनुपात में साझा किया जाना चाहिए।

    वित्तीय बोझ के अलावा तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने इस योजना के प्रशासनिक केंद्रीकरण और पंचायतों के वर्गीकरण की पद्धति पर भी कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा फंड वितरण के लिए अपनाई जा रही इस केंद्रीय व्यवस्था को एक प्रकार का ‘माइक्रोमैनेजमेंट’ करार दिया है। पत्र में कहा गया है कि पूरे विविधतापूर्ण देश के लिए एक समान फॉर्मूला लागू करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि हर राज्य और क्षेत्र की सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियां भिन्न होती हैं। इसलिए राज्यों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप फंड आवंटित करने की पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने कृषि क्षेत्र से जुड़े एक विशेष नियम को लेकर भी व्यावहारिक आपत्ति दर्ज कराई है, जिसके तहत खेती के पीक सीजन के दौरान ग्रामीण रोजगार के कार्यों को 60 दिनों के लिए बंद रखने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने वैश्विक जलवायु परिवर्तन और ‘अल नीनो’ के प्रभावों का हवाला देते हुए कहा कि अब खेती का समय और चक्र पहले की तरह निश्चित नहीं रह गया है। ऐसे में किसी एक निश्चित समयावधि के लिए काम को पूरी तरह रोक देना उचित नहीं है, क्योंकि ग्रामीण मजदूरों को विपरीत मौसम और संकट के समय किसी भी वक्त रोजगार की सख्त आवश्यकता पड़ सकती है।