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  • अमृतसर में गुरुद्वारे से बाहर निकलते ही ताबड़तोड़ फायरिंग, AAP सरपंच के बेटे तीरथ सिंह की मौत, चार आरोपियों की पहचान

    अमृतसर में गुरुद्वारे से बाहर निकलते ही ताबड़तोड़ फायरिंग, AAP सरपंच के बेटे तीरथ सिंह की मौत, चार आरोपियों की पहचान

    नई दिल्ली । पंजाब के अमृतसर में सोमवार रात गोलीबारी की एक घटना में आम आदमी पार्टी की सरपंच के बेटे तीरथ सिंह की मौत हो गई। घटना थाना चाटीविंड के अंतर्गत आने वाले चीते कलां गांव की है, जहां अज्ञात हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं। इस वारदात में तीरथ सिंह का दोस्त रंजीत सिंह भी घायल हो गया। घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल है।

    जानकारी के मुताबिक, तीरथ सिंह अपने दोस्त के साथ गुरुद्वारे में मत्था टेकने गए थे। दर्शन करने के बाद जब दोनों बाहर निकले, तभी कुछ अज्ञात युवकों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। गोली लगने से तीरथ सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस दौरान उनके साथ मौजूद रंजीत सिंह भी गोलीबारी की चपेट में आकर घायल हो गए।

    मृतक तीरथ सिंह का परिवार स्थानीय राजनीति से जुड़ा हुआ है। उनकी मां गांव की सरपंच हैं, जबकि उनका भाई ब्लॉक समिति का सदस्य है। घटना के बाद परिवार और गांव में शोक का माहौल है। गुरुद्वारे से बाहर निकलने के दौरान हुई इस वारदात ने इलाके के लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

    मामले की शिकायत सरपंच की ओर से दर्ज कराई गई है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। शुरुआती कार्रवाई के दौरान पुलिस ने चार आरोपियों की पहचान की है। इनमें गुरजंट, गोरा, हरकीरत उर्फ हॉकी और गुरदित्त सिंह के नाम शामिल हैं। पुलिस इन आरोपियों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया में जुटी है।

    आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की अलग-अलग टीमें गठित कर छापेमारी की जा रही है। जांच के तहत घटना से जुड़े तथ्यों और हमलावरों की भूमिका का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल, आरोपियों की गिरफ्तारी और गोलीबारी में इस्तेमाल किए गए हथियारों से संबंधित कोई अतिरिक्त जानकारी सामने नहीं आई है।

    अमृतसर देहात के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कवलप्रीत सिंह चहल ने शुरुआती जांच के आधार पर बताया कि मामला गैंगवार का नहीं, बल्कि आपसी रंजिश का प्रतीत होता है। पुलिस इसी पहलू को ध्यान में रखकर जांच आगे बढ़ा रही है। हालांकि, घटना के पीछे की वास्तविक वजह और गोलीबारी की पूरी परिस्थितियों का खुलासा जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।

    पंजाब के अलग-अलग इलाकों में हाल के दिनों में गोलीबारी की घटनाएं सामने आई हैं। 18 सितंबर से 26 अक्टूबर के बीच मोगा, अमृतसर, लुधियाना, तरनतारन और मानसा सहित विभिन्न क्षेत्रों में गोली चलने की 11 घटनाएं दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन घटनाओं में आम नागरिकों के अलावा पुलिसकर्मी और नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाले कार्यकर्ता भी निशाना बने हैं। कुछ मामलों में हमलावर बाइक या एसयूवी से पहुंचे, जबकि अन्य घटनाओं में विवाद के बाद गोलीबारी की बात सामने आई।

    चीते कलां गांव में हुई ताजा वारदात के बाद पुलिस के सामने आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने और घटना की वजह स्पष्ट करने की चुनौती है। फिलहाल, तीरथ सिंह की मौत और उनके दोस्त के घायल होने के मामले में जांच जारी है।

  • SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!

    SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए…. SC में चुनाव आयोग ने किया अपना बचाव!


    नई दिल्ली।
    चुनाव आयोग ( Election Commission) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपने कामकाज और फैसले लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची (Electoral Roll) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special In-depth Review- SIR) से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे। आयोग के तीनों सदस्यों ने हलफनामा दाखिल करने को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी।

    हालांकि, आयोग के इस जवाब से उसके कामकाज को लेकर उठे सभी सवालों का समाधान नहीं हुआ है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं। इनमें कई मामलों में उन्होंने फैसले लिए जाने के बाद इसकी जानकारी मिलने की बात कही थी। यही इस पूरे विवाद का अहम पहलू है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आयोग ने आखिरकार किसी फैसले को मंजूरी दी या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उसके दोनों अन्य सदस्यों को आयोग के नाम पर की जा रही कार्रवाई की जानकारी और उसमें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। आरोप ये लग रहे हैं कि सभी फैसले ज्ञानेश कुमार खुद ले रहे थे।


    फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर क्या विवाद है?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर भी आयोग के हलफनामे में सफाई दी गई है। मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म 6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी।

    इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलाव दिखाई दिया। संधू को इसकी जानकारी एक अखबार की रिपोर्ट से मिली। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताया था।

    अब आयोग ने हलफनामे में कहा है कि SIR के दौरान जोड़ी गई घोषणा फॉर्म 6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में घोषणा को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया है।

    आयोग ने माना कि अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदमों में सुधार की जरूरत थी। इसके बाद आयोग के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 और SIR से जुड़ी घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया।

    लेकिन हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी थी। यह भी नहीं बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से इस संबंध में लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने के बावजूद यह बदलाव कैसे लागू हुआ।


    ECINet के कामकाज पर भी उठे सवाल

    चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इस प्लेटफॉर्म के जरिये मतदाता सूची से जुड़े कई काम किए जाते हैं। हलफनामे में आयोग ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की वैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है। आयोग के मुताबिक, ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या संशोधित नहीं किया जाता। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने में मदद करना है।

    आयोग ने प्लेटफॉर्म की कानूनी अनुपालन प्रक्रिया की समीक्षा और नए आईटी मॉड्यूल की जांच के लिए भी नई व्यवस्था का उल्लेख किया। इसके तहत आईआईटी मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विशेषज्ञों वाली समिति का प्रावधान किया गया है।

    हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी ही व्यवस्था का सुझाव विवेक जोशी ने 29 मई को दिया था। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस में अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ की मदद से यह प्रमाणित कराया जाए कि डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।

    सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। लेकिन 14 अगस्त को दर्ज अपनी टिप्पणी में संधू ने कहा था कि उनके पहले के सुझावों पर क्या हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। आयोग के हलफनामे में समिति बनाने के फैसले का जिक्र है, लेकिन मई में दिए गए इस सुझाव का उल्लेख नहीं किया गया है।


    गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला

    गोवा में मतदाता सूची से जुड़े मामले का भी हलफनामे में उल्लेख है। आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म 6 के जरिए आवेदन किया। हालांकि, इससे पहले फरवरी में सामने आई समस्या का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था, ताकि हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के उनके फैसलों को लागू किया जा सके।

    आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी सिस्टम जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता। हलफनामे में बाद में 88 मतदाताओं के आवेदन करने की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फरवरी में अधिकारियों को अपने फैसले लागू करने में परेशानी क्यों हुई थी।


    पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर भी सवाल

    पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मामला भी हलफनामे में उठाया गया है। आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और इस मामले को आयोग के सामने नहीं लाया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील दाखिल करने का अधिकार था। हालांकि, इस मामले में भी कुछ सवाल बिना जवाब के ही रहे।

  • केन्द्रीय कर्मचारियों को जल्द मिल सकता है बड़ा तोहफा… 3% तक DA बढ़ा सकती है सरकार

    केन्द्रीय कर्मचारियों को जल्द मिल सकता है बड़ा तोहफा… 3% तक DA बढ़ा सकती है सरकार


    नई दिल्ली।
    डीए (DA) में बढ़ोतरी (Hike) को लेकर कर्मचारियों के मन में यह सवाल भी है कि क्या सरकार को इसके लिए कैबिनेट (Cabinet) की बैठक का इंतजार करना होगा? इस सवाल का जवाब आगे जानेंगे, लेकिन सबसे बड़ी उम्मीद यह है कि DA में 3 फीसदी बढ़ोतरी हो सकती है। अगर केंद्र सरकार (Central Government) इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) मौजूदा 60% से बढ़कर 63% हो जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय कर्मचारियों को जुलाई 2026 से लागू होने वाले महंगाई भत्ते (DA) में बढ़ोतरी का ऐलान कब होगा? आज 27 अक्टूबर तक केंद्र सरकार ने इसका ऐलान नहीं किया है।

    बता दें डीए में इजाफे से कर्मचारियों की हर महीने मिलने वाली सैलरी बढ़ेगी, जबकि पेंशनर्स को भी महंगाई राहत (DR) में बढ़ोतरी का फायदा मिल सकता है। हालांकि, सरकार ने अभी तक बढ़ोतरी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।


    DA Hike 2026: आखिर क्यों हो रही है देरी?

    केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का इंतजार लगातार लंबा होता जा रहा है। जुलाई 2026 के DA संशोधन के लिए जरूरी महंगाई के आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक नई दर घोषित नहीं की है।

    कर्मचारियों को उम्मीद थी कि अक्टूबर में सरकार की ओर से महंगाई भत्ते पर फैसला आ सकता है। खासकर 14 अक्टूबर को रेलवे कर्मचारियों के लिए बोनस और 16 अक्टूबर को केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बोनस की घोषणा के बाद DA बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ गई थीं। हालांकि, दोनों ही घोषणाओं में महंगाई भत्ते को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ।

    इसके बाद 21 अक्टूबर को भी कर्मचारियों को निराशा हाथ लगी। उस दिन केंद्रीय कैबिनेट की बैठक ही नहीं हुई। फिलहाल सरकार ने DA बढ़ाने में हो रही देरी की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई है।


    क्या DA बढ़ाने के लिए कैबिनेट की बैठक जरूरी है?

    महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को लेकर कर्मचारियों के मन में यह सवाल भी है कि क्या सरकार को इसके लिए कैबिनेट की बैठक का इंतजार करना होगा? रिपोर्ट के मुताबिक, DA में संशोधन की घोषणा के लिए हर बार नियमित कैबिनेट बैठक का इंतजार करना जरूरी नहीं है। वित्त मंत्रालय भी इस संबंध में घोषणा कर सकता है।

    इसलिए कर्मचारियों को अगली कैबिनेट बैठक के अलावा वित्त मंत्रालय की ओर से आने वाले आधिकारिक आदेश पर भी नजर रखनी चाहिए। हालांकि, घोषणा कब होगी और DA कितने प्रतिशत बढ़ेगा, इसका फैसला सरकार को ही करना है।


    3% बढ़ोतरी का अनुमान क्यों लगाया जा रहा है?

    केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते की गणना औद्योगिक श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI-IW के आधार पर की जाती है। जुलाई 2026 से लागू होने वाले DA संशोधन की गणना के लिए जुलाई 2025 से जून 2026 तक के 12 महीनों के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाता है।

    इन आंकड़ों के आधार पर DA की गणना लगभग 63.75% बैठने की रिपोर्ट है। मौजूदा गणना पद्धति के अनुसार, दशमलव के बाद के हिस्से को छोड़कर दर 63% रहने का अनुमान है। यही वजह है कि इस बार महंगाई भत्ते में 3 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही है। ध्यान रखें कि 63% DA अभी संभावित दर है। सरकार की मंजूरी और आधिकारिक आदेश के बाद ही नई दर की पुष्टि होगी।


    DA Arrears: जुलाई से मिल सकता है एरियर

    केंद्र सरकार अगर जुलाई 2026 से महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी को मंजूरी देती है, तो पात्र कर्मचारियों को नई दर के अनुसार एरियर भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए, ₹50,000 बेसिक सैलरी वाले कर्मचारी का DA 60% से बढ़कर 63% होने पर हर महीने ₹1,500 ज्यादा बनेगा।

    अगर नई दर 1 जुलाई 2026 से प्रभावी होती है, तो जुलाई से वास्तविक भुगतान शुरू होने तक की अवधि का एरियर भी देय हो सकता है। हालांकि, एरियर की वास्तविक रकम इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार संशोधित DA का भुगतान किस महीने से करती है। पेंशनर्स को भी इसी तरह महंगाई राहत (DR) में संशोधन का फायदा मिल सकता है।

  • E-20 के बाद सौ फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी…. जानें किन वाहनों में होगा इस्तेमाल?

    E-20 के बाद सौ फीसदी एथनॉल वाले ईंधन को मंजूरी…. जानें किन वाहनों में होगा इस्तेमाल?


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) ने सौ फीसदी एथनॉल (Ethanol) (E-100) वाले ईंधन को मंजूरी दे दी है। इस ईंधन को सिर्फ उन्हीं गाड़ियों में इस्तेमाल किया जा सकेगा, जिन्हें खासतौर पर ई-100 फ्यूल (E-100 fuel) से चलने के लिए बनाया हो। यह नियम अन्य वाहनों पर लागू नहीं होगा। ई-20 या सामान्य पेट्रोल से चलने वाले वाहन ई-85 या ई-100 ईंधन का इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसके साथ ही सरकार ने पेट्रोल और डीजल (Petrol and Diesel) से चलने वाले हल्के वाहनों के लिए वजन की सीमा तीन हजार से बढ़ाकर 3,500 किलोग्राम कर दी है। नए नियमों से ऐसी कारों की टेस्टिंग और उन्हें चलाने की मंजूरी मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

    केंद्र ने केंद्रीय मोटर वाहन नियम-1989 में संशोधन की अधिसूचना जारी की है। इसके अनुसार, केंद्र ने फ्लेक्स फ्यूल वाहनों के लिए निर्धारित उत्सर्जन मानकों में ई-85 के साथ ई-100 को शामिल किया है। सड़क परिवहन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ई-20 से अधिक और ई-100 तक के ईंधन का इस्तेमाल केवल उन्हीं वाहनों में किया जा सकेगा, जिन्हें इसके लिए डिजाइन और प्रमाणित किया गया है।


    कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की कवायद

    सरकार कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दे रही। ई-20 की शुरुआत पहले हो चुकी है। बता दें कि ऑटोमोबाइल कंपनी मारुति सुजुकी ने इस साल जून में देश का पहला फ्लेक्स-फ्यूल यात्री वाहन पेश किया था।


    क्या होते हैं फ्लेक्स-फ्यूल वाहन?

    फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को ई-85 (85 प्रतिशत एथनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल) जबकि ई-100 (लगभग 100 फीसदी एथनॉल) जैसे अधिक एथनॉल मिश्रण वाले ईंधनों पर चलने के लिए बनाया जाता है। इसके विपरीत, सामान्य पेट्रोल वाहनों को कम मात्रा में एथनॉल मिश्रण वाले ईंधन के इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी जाती है।


    ई-100 ईंधन के इस्तेमाल से क्या लाभ होगा?

    ई-100 के इसके इस्तेमाल से गाड़ियों से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन में भारी कमी आएगी। एथनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से कच्चे तेल पर निर्भरता घटेगी। एथनॉल के बढ़ते इस्तेमाल से देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।


    क्या होता है ई-100 ईंधन और कैसे बनता है?

    ई-100 100 फीसदी शुद्ध एथनॉल ईंधन है। एथनॉल मुख्य रूप से पौधों, गन्ना और मक्का से तैयार किया जाने वाला एक बायोफ्यूल है। इसमें पेट्रोल नहीं मिलाया जाता है। ईंधन इस तरह से तैयार किया जाता है कि वाहन के इंजन को कोई नुकसान नहीं होता है।


    नए नियम का मौजूदा कार मालिकों पर क्या असर होगा?

    ई-100 ईंधन की उपलब्धता से मौजूदा कार मालिकों को अपने वाहनों में बदलाव करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, सामान्य पेट्रोल कार में ई-100 डालने से पहले निर्माता की सलाह और इंजन की अनुकूलता जांचना जरूरी है।


    फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक क्या है और कैसे काम करती है?

    फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक वाली गाड़ियां पेट्रोल और एथेनॉल के अलग-अलग अनुपात वाले मिश्रण से चल सकती हैं। इनमें इंजन और इसे ऐसे डिजाइन किया जाता है कि वे ईंधन के अनुपात के अनुसार काम कर सकें। ई-100 के लिए विशेष अनुकूलता जरूरी है।


    दुनिया में और कहां फ्लेक्स-फ्यूल इस्तेमाल हो रहा?

    अमेरिका और ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का व्यापक इस्तेमाल होता है। ब्राजील में एथनॉल आधारित ईंधन खासा लोकप्रिय है।

    एथनॉल के लिए क्या इंजन में बदलाव होता है?
    ईंधन पंप, पाइप, सील और इंजेक्टर जैसे पुर्जों को एथेनॉल के अनुकूल बनाया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम भी ईंधन के अनुपात के अनुसार इंजन का संचालन करता है।


    एथनॉल की ऑक्टेन रेटिंग कैसी होती है?

    एथनॉल की ऑक्टेन रेटिंग अधिक होती है, जिससे इंजन में अनियंत्रित दहन की आशंका कम होती है। विशेष रूप से तैयार इंजन इसका बेहतर लाभ उठा सकता है।

    एथनॉल मिश्रित ईंधन की चुनौतियां क्या हैं?
    एथनॉल में पेट्रोल की तुलना में प्रति लीटर ऊर्जा कम होती है, जिससे माइलेज घट सकता है। यह कुछ धातुओं, प्लास्टिक और रबर के पुर्जों को भी प्रभावित कर सकता है।

  • सिग्नल सिस्टम के रूम में आग से थमी मुंबई लोकल…. 80 ट्रेनें रद्द, बढ़ी यात्रियों की परेशानी

    सिग्नल सिस्टम के रूम में आग से थमी मुंबई लोकल…. 80 ट्रेनें रद्द, बढ़ी यात्रियों की परेशानी


    मुंबई।
    मुंबई (Mumbai) में मध्य रेलवे (Central Railway) की लोकल ट्रेन सेवाएं (Local Train Services) मंगलवार को बुरी तरह प्रभावित हुईं। सिग्नलिंग सिस्टम (Signaling System) के एक कमरे में आग लगने और ओवरहेड बिजली के तारों में खराबी के कारण हजारों यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे हो गए कि 80 लोकल ट्रेन सेवाएं रद्द करनी पड़ीं, जबकि कई ट्रेनें 60 से 90 मिनट की देरी से चलीं। इस बीच, सोमवार को रेलवे ट्रैक पर तीन लोगों के शव मिलने से भी चिंता बढ़ गई।

    मुंबई में रेल सेवाओं में गड़बड़ी की शुरुआत सुबह करीब 9:30 बजे हुई। कांजुरमार्ग स्टेशन के सिग्नलिंग रिले रूम में शॉर्ट सर्किट की आशंका के बीच आग लग गई। इससे कम से कम 24 सिग्नल काम करना बंद कर गए। सिग्नलिंग सिस्टम प्रभावित होने के कारण ट्रेनों को विशेष सुरक्षा व्यवस्था के तहत चलाना पड़ा, जिससे उनकी रफ्तार धीमी हो गई।

    एक अन्य घटना में मुलुंड और ठाणे के बीच ओवरहेड बिजली के तारों पर कोई बाहरी वस्तु गिर गई। इसके कारण डाउन लाइन पर इंसुलेटर फट गया और ट्रेन सेवाएं और प्रभावित हो गईं। इस अव्यवस्था के कारण यात्रियों को घंटों इंतजार करना पड़ा। कुछ ट्रेनें करीब 30 मिनट तक एक ही जगह खड़ी रहीं, जबकि कई ट्रेनें 60 से 90 मिनट की देरी से चलीं।


    ट्रेनें रुकीं तो पटरियों पर पैदल चलने लगे यात्री

    स्टेशनों के प्लेटफॉर्म और ट्रेनों के भीतर यात्रियों की भीड़ बढ़ने लगी। लंबे इंतजार से परेशान कुछ यात्री ट्रेन से उतरकर पास के स्टेशनों तक पहुंचने के लिए रेलवे ट्रैक पर पैदल चलने लगे। फेडरेशन ऑफ सबअर्बन रेलवे पैसेंजर्स एसोसिएशन की सदस्य लता अरगड़े ने रेलवे की रखरखाव व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ट्रेनों और प्लेटफॉर्म पर यात्रियों को तुरंत घोषणाओं के जरिए जानकारी दी जानी चाहिए थी। उनके मुताबिक, जब तक यात्री पटरियों पर चलना शुरू नहीं कर चुके थे, तब तक घोषणाएं करने में काफी देर हो गई।


    भांडुप स्टेशन पर लोकल ट्रेन की चपेट में आया युवक

    रेलवे ट्रैक पर मृत मिले तीन लोगों में से एक की पहचान 21 वर्षीय साहिल थिते के रूप में हुई है। वह मुलुंड कॉलोनी का रहने वाला था। सोमवार शाम 5:39 बजे भांडुप स्टेशन पर ट्रैक पार करने के दौरान वह एसी लोकल ट्रेन की चपेट में आ गया।

    कुर्ला सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी) के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रवीण पडवी ने बताया कि साहिल प्लेटफॉर्म नंबर 4 से प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर जाने की जल्दी में ट्रैक पार कर रहा था। इसी दौरान प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई।

    पुलिस के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज की जांच की गई है। अधिकारी ने इस घटना को रेलवे ट्रैक पर अनधिकृत रूप से जाने से जुड़ी मौत बताया। पुलिस ने आकस्मिक मृत्यु रिपोर्ट दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। हालांकि, पुलिस ने यह पुष्टि नहीं की है कि साहिल ने ट्रैक पार करने का फैसला रेल सेवाओं में आई गड़बड़ी के कारण लिया था या नहीं।


    घाटकोपर और विक्रोली के बीच भी मिले दो शव

    सोमवार को ही दिन में बाद में सरकारी रेलवे पुलिस ने घाटकोपर और विक्रोली के बीच रेलवे ट्रैक पर दो और शव मिलने की पुष्टि की। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन के मोटरमैन ने इन शवों को देखा था। खबर लिखे जाने तक दोनों मृतकों की पहचान नहीं हो सकी थी।


    आग लगने के कारणों की जांच के लिए समिति गठित

    मध्य रेलवे के एक अधिकारी के मुताबिक, बिजली के वोल्टेज में अचानक बढ़ोतरी और गर्मी जमा होने के कारण सिग्नलिंग रिले रूम में आग लगने की आशंका है। आग से सिग्नलिंग सिस्टम से जुड़ी केबल जल गईं, जिससे कांजुरमार्ग, भांडुप और विक्रोली में सिग्नल प्रभावित हुए।

    मध्य रेलवे ने आग लगने के सटीक कारणों का पता लगाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक जांच समिति गठित की है। मध्य रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी डॉ. स्वप्निल नीला ने बताया कि शुरुआती जांच में स्पार्किंग के कारण आग लगने की आशंका सामने आई है। हालांकि, आग की असली वजह जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी।


    शाम तक धीरे-धीरे बहाल हुईं ट्रेन सेवाएं

    रेल सेवाओं को बहाल करने का काम मंगलवार दोपहर से शुरू हुआ। रेलवे के मुताबिक, शाम 4:10 बजे एक लाइन को परिचालन के लिए खोल दिया गया। इसके बाद शाम 4:46 बजे अप थ्रू लाइन बहाल हुई। डाउन स्लो लाइन को शाम करीब 5:30 बजे और सबसे आखिर में अप स्लो लाइन को शाम 6:18 बजे परिचालन के लिए मंजूरी मिली।

    हालांकि, इस दौरान ट्रेन सेवाओं में आई गड़बड़ी के कारण यात्रियों को घंटों परेशानी झेलनी पड़ी। 80 सेवाएं रद्द होने और कई ट्रेनों के काफी देर से चलने के बीच रेलवे ट्रैक पर तीन लोगों की मौत की घटनाएं भी सामने आईं।

  • कार खरीदने का सुनहरा मौका, Hyundai Creta से Tata Harrier EV तक पर लाखों की बचत, जानें किस गाड़ी पर कितना डिस्काउंट

    कार खरीदने का सुनहरा मौका, Hyundai Creta से Tata Harrier EV तक पर लाखों की बचत, जानें किस गाड़ी पर कितना डिस्काउंट


    नई दिल्ली । देश में अक्टूबर 2026 के त्योहारी सीजन के दौरान नई कार खरीदने की योजना बना रहे ग्राहकों के लिए शानदार मौका है। मारुति सुजुकी टाटा मोटर्स ह्यूंदै महिंद्रा किआ और रेनो जैसी प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियां अपनी चुनिंदा कारों और एसयूवी पर आकर्षक छूट दे रही हैं। इन ऑफर्स के तहत ग्राहकों को कैश डिस्काउंट एक्सचेंज बोनस स्क्रैपेज बोनस और कॉर्पोरेट डिस्काउंट जैसे फायदे मिल रहे हैं। कुछ इलेक्ट्रिक एसयूवी पर कुल बचत 2.75 लाख रुपये तक पहुंच रही है। हालांकि वास्तविक छूट कार के मॉडल वेरिएंट और डीलरशिप के साथ उपलब्ध स्टॉक पर निर्भर करेगी।

    मारुति सुजुकी की लोकप्रिय कारों पर भी ग्राहकों को बचत का मौका मिल रहा है। कंपनी की वैगन आर के पेट्रोल वेरिएंट पर 37 हजार रुपये तक की नकद छूट दी जा रही है जबकि सीएनजी मॉडल पर 27 हजार रुपये तक का फायदा मिल सकता है। इसके अलावा एक्सचेंज बोनस और पात्र ग्राहकों को कॉर्पोरेट डिस्काउंट भी दिया जा रहा है। मारुति स्विफ्ट के पेट्रोल वेरिएंट पर 20 हजार रुपये की नकद छूट के साथ एक्सचेंज और स्क्रैपेज बोनस का लाभ मिल सकता है। वहीं मारुति विक्टोरिस के स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड मॉडल पर कैश डिस्काउंट एक्सचेंज बोनस और स्क्रैपेज बेनिफिट मिलाकर अच्छी बचत की संभावना है।

    टाटा मोटर्स की कारों और इलेक्ट्रिक एसयूवी पर भी आकर्षक ऑफर्स उपलब्ध हैं। प्री फेसलिफ्ट टियागो ईवी पर 65 हजार रुपये से लेकर 1.45 लाख रुपये तक के फायदे मिल रहे हैं। पंच ईवी के पुराने स्टॉक पर भी 95 हजार रुपये से 1.45 लाख रुपये तक की बचत हो सकती है। कंपनी की हैरियर ईवी के चुनिंदा वेरिएंट पर मैन्युफैक्चरर सपोर्ट एक्सचेंज या स्क्रैपेज बोनस और लॉयल्टी डिस्काउंट मिलाकर 2.75 लाख रुपये तक का फायदा दिया जा रहा है। इसके अलावा अल्ट्रोज के सीएनजी मॉडल पर 55 हजार रुपये तक और पेट्रोल तथा डीजल मॉडल पर 35 हजार रुपये तक के लाभ मिल सकते हैं। हैरियर और सफारी के पेट्रोल या डीजल मॉडल पर भी चुनिंदा ऑफर्स उपलब्ध हैं।

    महिंद्रा की एसयूवी पसंद करने वाले ग्राहकों के लिए भी कई विकल्प हैं। एक्सयूवी 3एक्सओ के चुनिंदा पेट्रोल वेरिएंट पर नकद छूट और एक्सेसरीज मिलाकर 60 हजार रुपये तक का लाभ मिल सकता है। डीजल वेरिएंट पर यह फायदा 25 हजार रुपये तक बताया गया है। स्कॉर्पियो क्लासिक के चुनिंदा मॉडल पर 35 हजार से 45 हजार रुपये तक की छूट मिल सकती है। वहीं स्कॉर्पियो एन के कुछ ऑटोमैटिक वेरिएंट पर 1.5 लाख रुपये तक के कुल फायदे दिए जा रहे हैं।

    ह्यूंदै मोटर इंडिया भी अपनी कारों पर आकर्षक ऑफर्स दे रही है। कंपनी की ऑरा पर 30 हजार रुपये तक एक्सटर पर 50 हजार रुपये तक और क्रेटा पर एक लाख रुपये तक की बचत का मौका मिल सकता है। किआ की ओर से सोनेट पर 1.02 लाख रुपये तक साइरोस पर 1.60 लाख रुपये तक और सेल्टोस पर 1.47 लाख रुपये तक के फेस्टिव बेनिफिट्स बताए गए हैं। ये ऑफर्स नकद छूट और अन्य पात्र लाभों को मिलाकर हो सकते हैं।

    रेनो की कारों पर भी त्योहारी छूट मिल रही है। क्विड पर 15 हजार रुपये की नकद छूट और 25 हजार रुपये तक का स्क्रैपेज बोनस मिल सकता है। ट्राइबर और काइगर पर अलग-अलग लाभ मिलाकर 50 हजार रुपये तक की बचत संभव है। वहीं रेनो डस्टर के कुछ वेरिएंट पर 1.5 लाख रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक के ऑफर्स बताए गए हैं।

    ग्राहकों के लिए जरूरी है कि वे केवल विज्ञापित छूट देखकर खरीदारी का फैसला न करें। कार की ऑन रोड कीमत बीमा पंजीकरण एक्सचेंज की शर्तों और उपलब्ध स्टॉक की भी तुलना करें। बुकिंग से पहले अधिकृत डीलर से लिखित कोटेशन लेकर यह सुनिश्चित करें कि बताई गई छूट उनके चुने हुए वेरिएंट पर लागू है। सही तुलना और मोलभाव के जरिए इस त्योहारी सीजन में नई कार खरीदते समय अच्छी बचत की जा सकती है।

  • बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक

    बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भाजपा के भीतर 2020 में हुई पार्टी नेता मनीष शुक्ला की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बैरकपुर से भाजपा विधायक कौस्तुव बागची ने अपनी ही पार्टी के श्रम एवं परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह पर सवाल उठाए हैं। बागची ने कुछ तस्वीरों और वीडियो का हवाला देते हुए पूछा कि मनीष शुक्ला हत्याकांड में जिन लोगों के नाम सामने आए थे, उनके साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता मंच कैसे साझा कर सकते हैं। उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्रवाई की तैयारी की बात भी कही है।

    2020 में हुई थी मनीष शुक्ला की हत्या
    भाजपा नेता मनीष शुक्ला की 4 अक्टूबर 2020 को टीटागढ़ में भाजपा कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच सीआईडी ने की थी और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। अब कौस्तुव बागची ने पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेताओं उत्तम दास और प्रशांत चौधरी के साथ अर्जुन सिंह की मौजूदगी पर आपत्ति जताई है।

    बागची का दावा है कि मनीष शुक्ला के पिता ने हत्या के मामले में इन दोनों के नाम आरोपियों के तौर पर लिए थे। उनके मुताबिक, ऐसे लोगों के साथ पार्टी नेताओं की तस्वीरें सामने आने से उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में लोगों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम मामले में आने और अदालत में दोष सिद्ध होने के बीच अंतर है।

    अर्जुन सिंह से निजी नाराजगी नहीं, लेकिन साथ मंच साझा करने पर आपत्ति
    कौस्तुव बागची ने कहा कि अर्जुन सिंह पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनसे उनकी कोई व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। उनकी आपत्ति उन लोगों के साथ मंच साझा करने को लेकर है, जिनके नाम मनीष शुक्ला हत्याकांड में सामने आने का दावा किया जा रहा है।

    बागची ने कहा कि वह इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, मुख्य सचिव, सीआईडी के महानिदेशक और बैरकपुर पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखने की बात कही है।

    BJP में शामिल करने का भी कर रहे विरोध
    बागची ने उत्तम दास और प्रशांत चौधरी को भाजपा में शामिल किए जाने का भी विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर वह भाजपा के प्रदेश मुख्यालय के सामने खुद को आग लगा लेंगे। इससे पहले भी उन्होंने इस मुद्दे पर सिर मुंडवाकर विरोध जताने की बात कही थी।

    उनके बयान से पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। हालांकि, दोनों व्यक्तियों की भाजपा में औपचारिक सदस्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया जरूरी होगी।

    अर्जुन सिंह और उत्तम दास ने क्या कहा?
    अर्जुन सिंह ने बागची के आरोपों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि राजनीति कैसे करनी है।” वहीं, उत्तम दास ने मंत्री के साथ अपनी मौजूदगी को निजी संबंधों से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि वह काफी समय पहले तृणमूल कांग्रेस से अलग हो चुके हैं और उन्होंने भाजपा में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई है।

    TMC ने भी BJP पर साधा निशाना
    इस विवाद पर तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने भी भाजपा पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सार्वजनिक रूप से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को पार्टी में शामिल नहीं करने की बात करती है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं करती।

    इस तरह मनीष शुक्ला हत्याकांड को लेकर भाजपा के भीतर उठे सवालों ने बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। अब इस मामले में संबंधित नेताओं की आगे की प्रतिक्रिया और बागची की प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी।

  • निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी

    निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि लगातार चुनावी हार के कारण कांग्रेस अब तक राजनीतिक झटकों से उबर नहीं पाई है। उन्होंने कहा कि पार्टी के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दिवंगत माता-पिता को लेकर अभद्र टिप्पणियां कर रहे हैं, जो राजनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं हैं। दुबे ने राजनीतिक विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि देश के प्रधानमंत्री के पद का सम्मान किया जाना चाहिए।

    पत्रकारों से बातचीत में दुबे ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद पार्टी अपनी स्थिति सुधारने में सफल नहीं हो रही है। उनके मुताबिक, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे नेताओं की भूमिका के बावजूद कांग्रेस राजनीतिक चुनौतियों से बाहर नहीं निकल पा रही है। दुबे ने इसी संदर्भ में पार्टी पर अभद्र भाषा का सहारा लेने का आरोप लगाया।

    भाजपा सांसद ने अपने बयान में वर्ष 1971-72 के दौर का भी उल्लेख किया। उन्होंने बांग्लादेश युद्ध के बाद तत्कालीन अमेरिकी नेताओं हेनरी किसिंजर और रिचर्ड निक्सन की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणियों का जिक्र किया। दुबे के अनुसार, उस समय भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद होने के बावजूद विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के सम्मान से जुड़े मुद्दे पर उनका समर्थन किया था।

    उन्होंने कहा कि उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे विपक्षी नेताओं ने संसद में इंदिरा गांधी का बचाव किया था। दुबे ने इस उदाहरण के जरिए अपनी बात रखी कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के पद के प्रति सम्मान बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौरान राष्ट्रीय नेतृत्व और संवैधानिक पदों की गरिमा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    दुबे ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही भाषा पर आपत्ति जताई। उन्होंने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के दिवंगत माता-पिता को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों को अनुचित बताया। भाजपा सांसद ने कहा कि राजनीतिक बहस में किसी नेता के परिवार के सदस्यों को निशाना बनाना उचित नहीं है। उनके अनुसार, विरोधियों को नीतियों और राजनीतिक फैसलों पर सवाल उठाने चाहिए, न कि व्यक्तिगत या पारिवारिक टिप्पणियों के जरिए विवाद बढ़ाना चाहिए।

    भाजपा सांसद ने राहुल गांधी से जुड़े मानहानि मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने राहुल गांधी के बरी होने के संदर्भ में सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित मामला गृह मंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणी से जुड़ा था। दुबे ने यह भी पूछा कि क्या एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से दूसरे दल के नेता के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक आचरण माना जा सकता है। इस मुद्दे पर उन्होंने राजनीतिक संवाद की मर्यादा को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की।

    दुबे ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सरकार की आलोचना करने और अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। हालांकि, उनके अनुसार, विरोध दर्ज कराने के लिए भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब राजनीतिक विरोधी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने में असमर्थ होते हैं, तो वे अभद्र भाषा का सहारा लेते हैं। उनके बयान का मुख्य जोर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक संवाद में सम्मान और संयम बनाए रखने पर रहा।

  • यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम बहुल सीटों और विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए परिवारवाद का आरोप लगाया है। कैराना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आजमगढ़, बदायूं और फिरोजाबाद का जिक्र किया और दावा किया कि इन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम सांसद चुने जाते थे, लेकिन अब यादव परिवार के सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

    ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि एक समय आजमगढ़ से मुस्लिम सांसद जीतकर संसद पहुंचते थे, जबकि अब वहां से अखिलेश यादव के भाई सांसद हैं। उन्होंने बदायूं और फिरोजाबाद का उल्लेख करते हुए भी समाजवादी पार्टी पर परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर देने का आरोप लगाया। उनके बयान का मुख्य मुद्दा मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समाजवादी पार्टी में परिवार की भूमिका रहा।

    AIMIM प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी के बजाय समाजवादी यादव परिवार रख लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यादव परिवार की राजनीति में परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जा रही है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग पीछे रखे।

    उन्होंने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। ओवैसी के अनुसार, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में उसकी क्या नीति है। उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे को उठाते हुए सपा पर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।

    ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी अखिलेश यादव की आलोचना की। हालांकि, उनके इस बयान के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में सपा की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी समेत कई दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में ओवैसी के बयान को आगामी चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    विपक्षी गठबंधन को लेकर ओवैसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी दलों का उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो AIMIM भी उनके साथ आने के लिए तैयार है। ओवैसी ने यह भी कहा कि वह योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। उनके इस रुख से संकेत मिलता है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की संभावना पर उनकी पार्टी बातचीत के लिए तैयार है, हालांकि गठबंधन की कोई अंतिम रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    ओवैसी की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। खबर में उल्लेख किया गया है कि 15 अक्टूबर को मुस्लिम विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक हाजी अब्दुल सलाम ने दावा किया था कि AIMIM राज्य की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। उनके अनुसार, यदि पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में जगह नहीं मिलती है, तो कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह फिलहाल एक रणनीतिक आकलन है, न कि घोषित उम्मीदवारों की अंतिम सूची।

    मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और संभल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में विभिन्न दलों की चुनावी रणनीति और गठबंधन की स्थिति राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर क्या सहमति बनेगी।

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी के बयानों ने समाजवादी पार्टी की राजनीति, परिवारवाद और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल गठबंधन को लेकर क्या फैसला करते हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

  • सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की विशेष अदालत ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को मानहानि के एक पुराने मामले में बरी कर दिया है। यह मामला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कथित टिप्पणी से जुड़ा था। अदालत के फैसले से राहुल गांधी को कानूनी राहत मिली है। फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत परिसर के बाहर मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने खुशी जताई। कार्यकर्ताओं ने ढोल बजाकर और नाचकर फैसले का स्वागत किया।

    यह मामला वर्ष 2018 में बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी की ओर से दिए गए कथित बयान से संबंधित था। आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अमित शाह के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर निवासी विजय मिश्रा ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। उस समय विजय मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के जिला उपाध्यक्ष थे। शिकायतकर्ता का कहना था कि राहुल गांधी के बयान से उन्हें ठेस पहुंची थी। इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस नेता के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था।

    मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी को अदालत में पेश होने के लिए भी कहा गया था। सुल्तानपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने 16 दिसंबर 2023 को उन्हें पेश होने का निर्देश दिया था। इसके बाद राहुल गांधी अदालत पहुंचे। फरवरी 2024 में अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी। उस समय राहुल गांधी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए खुद को निर्दोष कहा था। इसके बाद मामले में कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ती रही।

    सुनवाई के दौरान शिकायत से जुड़े पक्षों की गवाही और अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गईं। इसके बाद मामले में अंतिम बहस हुई। राहुल गांधी के वकील ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ता पक्ष उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा। बचाव पक्ष ने इसी आधार पर राहुल गांधी को राहत दिए जाने की मांग की।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद राहुल गांधी को बरी कर दिया। इस फैसले के साथ अमित शाह पर कथित टिप्पणी को लेकर वर्ष 2018 में शुरू हुई मानहानि की कानूनी कार्यवाही में उन्हें राहत मिली। शिकायतकर्ता पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका, यह बात राहुल गांधी के वकील ने अदालत में अपनी दलील के रूप में रखी थी।

    फैसले की जानकारी सामने आने के बाद अदालत के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उत्साह जाहिर किया। उन्होंने ढोल बजाए और नाचकर अपनी खुशी व्यक्त की। राहुल गांधी को मिली राहत के बाद कार्यकर्ताओं के बीच जश्न का माहौल दिखाई दिया।

    यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से जुड़ी शिकायतों और उनसे संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी चर्चा में रहा। वर्ष 2018 में दर्ज शिकायत के बाद मामले की सुनवाई कई चरणों से गुजरी। दिसंबर 2023 में अदालत में पेशी का निर्देश, फरवरी 2024 में जमानत और उसके बाद जारी सुनवाई इस प्रक्रिया के प्रमुख पड़ाव रहे।

    सुल्तानपुर की विशेष अदालत का ताजा फैसला राहुल गांधी के लिए इस मानहानि मामले में महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है। अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया है। फैसले के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहत और खुशी जताई, जबकि मामले में शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप अदालत में साबित नहीं हो सके।