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  • विकसित भारत सिर्फ ऊंची इमारतों का नाम नहीं, हर घर पानी और युवाओं को अवसर मिलना जरूरी: राजनाथ सिंह

    विकसित भारत सिर्फ ऊंची इमारतों का नाम नहीं, हर घर पानी और युवाओं को अवसर मिलना जरूरी: राजनाथ सिंह


    नई दिल्ली। रक्षा मंत्री और लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह ने रविवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है और आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को पूरी दुनिया गंभीरता से सुनती है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत और मजबूत होते कद का स्पष्ट प्रमाण है। लखनऊ छावनी परिषद में करीब 101 करोड़ रुपये की लागत वाली 12 विकास परियोजनाओं के भूमिपूजन और शिलान्यास कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि इन परियोजनाओं को केवल निर्माण कार्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि ये लखनऊ छावनी के बेहतर भविष्य के लिए सरकार के 12 संकल्प हैं।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि विकसित भारत का सपना केवल बड़े प्रोजेक्ट बनाने और आधुनिक इमारतें खड़ी करने से पूरा नहीं होगा। वास्तविक विकास तब माना जाएगा जब प्रत्येक परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले युवाओं को आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर मिलें और समाज के प्रत्येक वर्ग को सम्मानजनक सुविधाएं हासिल हों। उन्होंने कहा कि विकास की रोशनी केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि हर मोहल्ले हर बस्ती और हर परिवार तक इसका लाभ पहुंचना चाहिए।

    भारत की वैश्विक स्थिति में आए बदलाव का उल्लेख करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि करीब 10 से 12 वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जब भारत अपनी बात रखता था तो उसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता था जितनी भारत की क्षमता और भूमिका को मिलनी चाहिए थी। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब जब भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखता है तो पूरी दुनिया ध्यान से सुनती है कि भारत क्या कह रहा है। उन्होंने इसे देश की बढ़ती ताकत और वैश्विक प्रभाव का परिणाम बताया।

    उन्होंने कहा कि विकसित भारत का मतलब यह भी है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर मिलें। खेलकूद के क्षेत्र में आगे बढ़ने की सुविधाएं हों और दिव्यांग बच्चों को भी समाज की मुख्यधारा में बराबरी का स्थान मिले। राजनाथ सिंह ने कहा कि समय के साथ शहरों की जरूरतें बदलती हैं इसलिए विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए नियमों में भी बदलाव आवश्यक है।

    इसी दिशा में लखनऊ छावनी क्षेत्र में नए बिल्डिंग बायलॉज लागू किए गए हैं। पहले यहां जी प्लस-2 तक निर्माण की अनुमति थी जिसे बढ़ाकर जी प्लस-3 किया गया है। पार्किंग को शामिल करने पर अब पांच मंजिल तक निर्माण की अनुमति दी गई है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य लखनऊ छावनी को उसकी ऐतिहासिक विरासत के साथ आधुनिक सुविधाओं से जोड़ना है ताकि क्षेत्र का विकास तेज गति से हो सके।

    रक्षा मंत्री ने छावनी क्षेत्र में कई बाजारों के नाम बदले जाने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नामों में बदलाव केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसके पीछे नई पीढ़ी को देश के इतिहास और महान विभूतियों से जोड़ने की भावना है। रॉयल आर्टिलरी बाजार का नाम एकता बाजार ब्रिटिश कैवलरी बाजार का नाम वीरांगना ऊदा देवी बाजार और ब्रिटिश इन्फैंट्री बाजार का नाम माता दीन वाल्मीकि बाजार किया गया है। एक अन्य बाजार का नाम मंगल पांडे बाजार जबकि कैनेडी मार्केट का नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मार्केट रखा गया है।

    राजनाथ सिंह ने कहा कि इन बदलावों के जरिए स्वतंत्रता संग्राम राष्ट्रसेवा और सामाजिक चेतना से जुड़े महान व्यक्तित्वों की स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने लखनऊ और उत्तर प्रदेश में हो रहे विकास कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि बेहतर जलापूर्ति शिक्षा खेलकूद बाढ़ नियंत्रण और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर लगातार काम किया जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की भी प्रशंसा की और कहा कि लखनऊ छावनी में सैन्यकर्मियों पूर्व सैनिकों और आम नागरिकों के लिए सुविधाओं का विस्तार करते हुए ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के साथ आधुनिक विकास को आगे बढ़ाया जा रहा है।

  • NEET-PG 2026 परीक्षा देशभर में संपन्न! 2.65 लाख अभ्यर्थियों ने दी परीक्षा, जयपुर के 2445 उम्मीदवारों को फिर मिलेगा मौका

    NEET-PG 2026 परीक्षा देशभर में संपन्न! 2.65 लाख अभ्यर्थियों ने दी परीक्षा, जयपुर के 2445 उम्मीदवारों को फिर मिलेगा मौका


    नई दिल्ली। देशभर में रविवार को नीट-पीजी 2026 की परीक्षा निर्धारित व्यवस्था के तहत संपन्न हो गई। मेडिकल पीजी पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए आयोजित इस महत्वपूर्ण परीक्षा में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया। परीक्षा के लिए कुल 2 लाख 73 हजार 096 अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया था जिनमें से 2 लाख 65 हजार 980 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए। इनमें करीब 2 लाख 63 हजार 535 अभ्यर्थियों की परीक्षा सफलतापूर्वक पूरी हो गई। परीक्षा का आयोजन देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 339 शहरों में बनाए गए 1111 परीक्षा केंद्रों पर किया गया। हालांकि जयपुर के दो परीक्षा केंद्रों पर तकनीकी समस्या के कारण 2445 अभ्यर्थियों की परीक्षा पूरी नहीं हो सकी। इन सभी प्रभावित उम्मीदवारों के लिए अब 5 सितंबर 2026 को दोबारा परीक्षा आयोजित की जाएगी।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक नीट-पीजी परीक्षा को निष्पक्ष सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से कराने के लिए व्यापक सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था लागू की गई थी। देशभर के परीक्षा केंद्रों की गतिविधियों पर लगातार रियल टाइम निगरानी रखी गई। परीक्षा संचालन की निगरानी और मूल्यांकन के लिए 2527 संकाय सदस्यों को स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता के रूप में तैनात किया गया था। इसके साथ ही डीन निदेशक चिकित्सा अधीक्षक और वरिष्ठ प्रोफेसरों सहित 700 से अधिक वरिष्ठ संकाय सदस्यों को फ्लाइंग स्क्वायड में शामिल किया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य परीक्षा के दौरान किसी भी तरह की गड़बड़ी को तत्काल पकड़ना और परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखना था।

    राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड के अनुसार जयपुर के आईऑन डिजिटल जोन आईडीजेड सीतापुरा स्थित परीक्षा केंद्र संख्या 41682 और 41683 पर आंतरिक बिजली आपूर्ति से जुड़ी तकनीकी समस्या सामने आई। बिजली व्यवस्था में आई इस परेशानी के चलते इन दोनों केंद्रों पर परीक्षा दे रहे 2445 अभ्यर्थियों की परीक्षा पूरी नहीं हो पाई। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यह समस्या परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी टीसीएस लिमिटेड की आंतरिक बिजली आपूर्ति व्यवस्था से संबंधित थी। प्रभावित उम्मीदवारों को किसी तरह का नुकसान न हो इसलिए बोर्ड ने उन्हें दोबारा परीक्षा देने का समान अवसर देने का फैसला किया है।

    जयपुर के दोनों प्रभावित केंद्रों के सभी 2445 अभ्यर्थियों के लिए पुनर्परीक्षा 5 सितंबर 2026 शनिवार को दोपहर 3 बजे जयपुर में आयोजित की जाएगी। पुनर्परीक्षा के केंद्र और अन्य आवश्यक दिशा निर्देश संबंधित अभ्यर्थियों को अलग से उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे प्रभावित उम्मीदवारों को अपनी परीक्षा पूरी करने का अवसर मिलेगा और तकनीकी समस्या के कारण उनके मेडिकल करियर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    परीक्षा के दौरान सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए देशभर में 16 क्षेत्रीय कमान केंद्र सक्रिय किए गए थे। सभी परीक्षा केंद्रों को लाइव सीसीटीवी निगरानी से जोड़ा गया था जिसकी निगरानी द्वारका स्थित राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड के मुख्यालय में बनाए गए कमान केंद्र से की गई। रियल टाइम मॉनिटरिंग के लिए बोर्ड और टीसीएस के 190 कर्मचारियों की विशेष टीम भी तैनात रही। मुख्यालय में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और टीसीएस समेत संबंधित संस्थाओं के अधिकारी पूरे दिन परीक्षा की स्थिति पर नजर रखते रहे।

    नकल और दूसरे उम्मीदवार की जगह परीक्षा देने जैसी संभावित गड़बड़ियों को रोकने के लिए अभ्यर्थियों का आधार आधारित प्रमाणीकरण भी किया गया। विभिन्न सरकारी एजेंसियों ने भी परीक्षा के सुरक्षित संचालन में सहयोग दिया। बोर्ड ने कहा कि देशभर के 1111 केंद्रों और 339 शहरों में परीक्षा का सफल आयोजन परीक्षा अधिकारियों चिकित्सा संस्थानों संकाय सदस्यों सुरक्षा एजेंसियों तकनीकी टीमों और अन्य संबंधित संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय का परिणाम रहा। कुल मिलाकर नीट-पीजी 2026 की परीक्षा व्यापक सुरक्षा निगरानी और तकनीकी व्यवस्था के बीच संपन्न हुई जबकि जयपुर के प्रभावित 2445 अभ्यर्थियों को अब 5 सितंबर को परीक्षा पूरी करने का अवसर मिलेगा।

  • महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग

    महुआ और तेंदू पत्ते बेचने से इको-टूरिज्म तक का सफर, मैथिली भुए की कहानी ने जीता पीएम मोदी का ध्यान; 50 महिलाओं को ट्रेनिंग


    नई दिल्ली। ओडिशा के संबलपुर जिले के देबरीगढ़ की रहने वाली मैथिली भुए की मेहनत और हौसले को अब देशभर में पहचान मिल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात के 137वें एपिसोड में मैथिली भुए के काम का जिक्र करते हुए उनकी सराहना की। इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने जंगलों के संरक्षण में योगदान देने और स्थानीय महिलाओं को रोजगार से जोड़ने वाली मैथिली के लिए यह पल बेहद खास रहा। प्रधानमंत्री की ओर से अपने काम की तारीफ किए जाने पर उन्होंने खुशी जाहिर की और इसे उनके जैसे ग्रामीण क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा बताया।

    मैथिली भुए की कहानी आसान नहीं रही है। वह आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आती हैं और लंबे समय तक जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर रही हैं। तेंदू के पत्ते बांस महुआ कराडी और जलाऊ लकड़ी जैसे वन उत्पादों को इकट्ठा कर उन्हें बेचकर वह अपने परिवार का गुजारा करती थीं। सीमित संसाधनों के बीच जीवन आगे बढ़ रहा था लेकिन 2023 में देबरीगढ़ इको-टूरिज्म से जुड़ने के बाद उनकी जिंदगी को एक नई दिशा मिली।

    इको-टूरिज्म ने न केवल मैथिली को रोजगार का नया जरिया दिया बल्कि उन्हें अपने आसपास की दूसरी महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा करने की प्रेरणा दी। धीरे धीरे क्षेत्र की महिलाएं इस पहल से जुड़ने लगीं और अब मैथिली करीब 40 से 50 महिलाओं को इको-टूरिज्म तथा हॉस्पिटैलिटी से जुड़े अलग अलग कामों की ट्रेनिंग दे रही हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ महिलाओं को नौकरी दिलाना नहीं बल्कि उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे अपने दम पर बेहतर आजीविका हासिल कर सकें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

    मैथिली के मार्गदर्शन में महिलाएं पर्यटकों के साथ व्यवहार करने उनकी जरूरतों को समझने और उन्हें बेहतर सेवाएं देने की ट्रेनिंग ले रही हैं। देबरीगढ़ में इको-टूरिज्म से जुड़े कई क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। इनमें स्मारिका की दुकानें चाय की दुकानें रेस्तरां नेचर कैंप और होमस्टे जैसे काम शामिल हैं। महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी और काम की प्रकृति के अनुसार अलग अलग प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे पर्यटकों को बेहतर अनुभव दे सकें।

    मैथिली का मानना है कि पर्यटन के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़ना क्षेत्र के विकास का मजबूत माध्यम बन सकता है। जब स्थानीय लोगों को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलता है तो उन्हें बेहतर आय का अवसर मिलता है और साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की भावना भी मजबूत होती है। खास तौर पर महिलाओं के लिए इको-टूरिज्म आत्मनिर्भर बनने का प्रभावी रास्ता साबित हो सकता है।

    मन की बात में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नाम लिए जाने के बाद मैथिली की कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके प्रयासों को पहचान मिलना बेहद खुशी की बात है। मैथिली चाहती हैं कि आने वाले समय में और अधिक महिलाएं इको-टूरिज्म से जुड़ें और अपनी आजीविका का मजबूत आधार तैयार करें।

    उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय अवसरों की पहचान मेहनत और दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ने की इच्छा किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदल सकती है। जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर रहने वाली मैथिली भुए आज उसी प्राकृतिक विरासत को बचाने और उसके जरिए महिलाओं को रोजगार देने की मुहिम का हिस्सा बन चुकी हैं। मन की बात में मिली पहचान उनके इस सफर को नई ऊर्जा देने के साथ देबरीगढ़ के इको-टूरिज्म मॉडल को भी देश के सामने एक प्रेरक उदाहरण के रूप में पेश करती है।

  • उज्बेकिस्तान ने पीएम मोदी को दिया सर्वोच्च सम्मान, भारत के साथ रिश्तों को मिला नया मुकाम; अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी

    उज्बेकिस्तान ने पीएम मोदी को दिया सर्वोच्च सम्मान, भारत के साथ रिश्तों को मिला नया मुकाम; अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी


    नई दिल्ली। भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्तों ने रविवार को एक नई ऊंचाई हासिल की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ताशकंद में ऐलान किया कि दोनों देशों के बीच संबंध अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक पहुंच गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी को उज्बेकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान ओली दराजली दोस्तलिक से सम्मानित किए जाने के बाद यह घोषणा की गई। इस मौके पर पीएम मोदी ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव के नेतृत्व और भारत के प्रति उनकी मित्रता की भावना की सराहना करते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं और अब यह साझेदारी नई ऊंचाइयों पर पहुंच रही है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और उज्बेकिस्तान के बीच संबंध केवल आधुनिक कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं हैं बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुरानी दोस्ती और साझा विरासत जुड़ी हुई है। उन्होंने उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान मिलने पर गर्व व्यक्त करते हुए इसे व्यक्तिगत सम्मान के बजाय भारत के 140 करोड़ लोगों का सम्मान बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि दोस्तलिक का अर्थ दोस्ती है और यही शब्द भारत तथा उज्बेकिस्तान के रिश्तों की वास्तविक भावना को सबसे बेहतर तरीके से व्यक्त करता है।

    पीएम मोदी ने सम्मान को स्वीकार करते हुए उज्बेकिस्तान की जनता सरकार और राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव का आभार जताया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान दोनों देशों की ऐतिहासिक दोस्ती और साझा विरासत को समर्पित है। उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री मोदी को दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में उनके योगदान के लिए देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।

    भारत और उज्बेकिस्तान के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी का नया स्तर दोनों देशों के लिए आर्थिक कूटनीतिक सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मध्य एशिया में उज्बेकिस्तान की अहम भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति है और भारत के लिए इस क्षेत्र के देशों के साथ मजबूत संबंध लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के संबंधों को नई श्रेणी मिलना भविष्य में सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इस मौके पर भारत की प्रतिबद्धता भी स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि भारत उज्बेकिस्तान के साथ अपनी मित्रता को हमेशा मजबूत बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारत अपनी जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटेगा और दोनों देशों की दोस्ती को मजबूती से आगे बढ़ाता रहेगा।

    पीएम मोदी ने भारत और उज्बेकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकी को ग्लोबल साउथ के व्यापक हितों से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि दोनों देश मिलकर ग्लोबल साउथ की एकजुट आवाज बनने की दिशा में काम करेंगे। दोनों देशों का प्रयास होगा कि ग्लोबल साउथ के लोगों के कल्याण और पूरी मानवता के बेहतर भविष्य के लिए मिलकर काम किया जाए।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि सम्मान अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आता है। उज्बेकिस्तान की ऐतिहासिक धरती से उन्होंने दोनों देशों की दोस्ती को और मजबूत करने का संकल्प दोहराया। भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्तों का व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलना इसी निरंतर सहयोग का परिणाम है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव को आधुनिक रणनीतिक जरूरतों से जोड़ते हुए यह साझेदारी आने वाले समय में द्विपक्षीय संबंधों को और व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

  • खड़गे की रैली से शुरू हुआ विवाद फिर भड़का! शुद्धिकरण यज्ञ पर धामी ने साफ की तस्वीर बोले जाति नहीं धार्मिक नारों का हुआ शुद्धिकरण

    खड़गे की रैली से शुरू हुआ विवाद फिर भड़का! शुद्धिकरण यज्ञ पर धामी ने साफ की तस्वीर बोले जाति नहीं धार्मिक नारों का हुआ शुद्धिकरण


    नई दिल्ली। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद शुरू हुआ शुद्धिकरण यज्ञ का विवाद एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के हमले के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पलटवार करते हुए इस पूरे मामले को अलग नजरिए से सामने रखा है। धामी ने कांग्रेस के उस आरोप को खारिज किया है जिसमें शुद्धिकरण यज्ञ को जातीय भेदभाव से जोड़कर सवाल उठाए गए थे। मुख्यमंत्री का कहना है कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में किसी व्यक्ति या जाति के शुद्धिकरण के लिए यज्ञ नहीं कराया गया बल्कि रैली के दौरान लगाए गए कथित धार्मिक नारों से आहत भावनाओं के बाद हिंदू सामाजिक संगठनों की ओर से यह आयोजन किया गया था।

    मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि खड़गे के नाम पर जातीय शुद्धिकरण की बात करना ही गलत है। उनका तर्क है कि उत्तराखंड में बहुत कम लोग मल्लिकार्जुन खड़गे की जाति के बारे में जानते हैं। ऐसे में इस आयोजन को जातीय नजरिए से देखना उचित नहीं है। धामी ने स्पष्ट किया कि शुद्धिकरण किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि उस स्थान का किया गया था जहां कांग्रेस की रैली आयोजित हुई थी। उनके मुताबिक रैली के दौरान एक धर्म विशेष से जुड़े कथित नारे लगाए गए थे जिनसे हिंदू समाज की भावनाएं आहत हुईं और इसी के बाद धार्मिक संगठनों ने यज्ञ का आयोजन किया।

    धामी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आयोजन में बीजेपी के पदाधिकारी या कार्यकर्ता शामिल नहीं थे। उनके अनुसार हिंदू सामाजिक संगठनों ने अपने स्तर पर रामलीला मैदान में यज्ञ कराया। मुख्यमंत्री की इस सफाई के बाद विवाद खत्म होने के बजाय राजनीतिक रूप से और तेज होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस इस घटना को सामाजिक समानता और जातीय भेदभाव के सवाल से जोड़ रही है जबकि बीजेपी इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बताते हुए कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है।

    राहुल गांधी के हमले के बाद मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस लगातार तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है और उनकी सरकार के सख्त फैसलों से पार्टी असहज है। धामी ने समान नागरिक संहिता धर्मांतरण विरोधी कानून दंगा विरोधी कानून और जिहाद के खिलाफ सख्त कानून जैसे फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार उत्तराखंड में कानून व्यवस्था और सामाजिक हितों को प्राथमिकता दे रही है।

    हल्द्वानी का यह विवाद अब केवल एक यज्ञ या राजनीतिक रैली तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि इसके जरिए कांग्रेस और बीजेपी अपने अपने राजनीतिक मुद्दों को धार दे रहे हैं। कांग्रेस जहां इसे सामाजिक भेदभाव का प्रतीक बता रही है वहीं बीजेपी कथित धार्मिक नारों और आहत भावनाओं का मुद्दा उठा रही है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही ऐसे विवादों का राजनीतिक असर बढ़ना तय माना जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों दल इस मुद्दे को लेकर एक दूसरे पर और तीखे हमले कर सकते हैं।

  • सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन

    सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन


    नई दिल्ली।
    पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम (Northeastern State Sikkim) और पड़ोसी देश भूटान (Bhutan) जल्द भारतीय रेल (Indian Railways) के आधिकारिक मानचित्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। भारत-चीन (India-China) और भारत-भूटान सीमा (India-Bhutan border) पर रणनीतिक पहुंच और कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए रेल और रक्षा मंत्रालय ने इन परियोजनाओं पर काम तेज कर दिया है। सरकार ने सिक्किम के लिए 2027 और भूटान के लिए 2029 तक ट्रेन सेवाएं शुरू करने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार का यह कदम चीन के लिए टेंशन बन सकता है। चिकन नेक पर नजर रखने वाले चीन के लिए यह बड़ा झटका होगा।


    भूटान के लिए 69 किमी की रेल लाइन

    रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत-भूटान को जोड़ने के लिए 69 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय रेललाइन पर केंद्र सरकार 3500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। सरकार ने कोकराझार-गेलेफू रेललाइन को आधिकारिक तौर पर विशेष रेल परियोजना का दर्जा दिया है। ऐसा प्रशासनिक अड़चनें दूर कर भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी के लिए किया गया है। यह रेल कनेक्टिवटी न केवल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार को नई मजबूती देगा, बल्कि भूटान के गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी मास्टर प्लान को भी सीधे भारतीय रेल नेटवर्क से जोड़ेगा।


    सीमा सुरक्षा मजबूत होगी, पर्यटन को भी उड़ान

    इन दोनों परियोजनाओं से न केवल पूर्वोत्तर के दुर्गम क्षेत्रों में आम लोगों, पर्यटकों और व्यापारियों की आवाजाही सुगम और सस्ती होगी, बल्कि सीमा पर भारत का सामरिक और भौगोलिक शक्ति-संतुलन भी पूरी तरह बदल जाएगा। सीमा सुरक्षा और सैन्य रसद (लॉजिस्टिक्स) में रणनीतिक मजबूती आएगी। चीन और भूटान की सीमाओं पर स्थित इन बेहद संवेदनशील मोर्चों पर वर्तमान में मौसम खराब या भूस्खलन के कारण सेना की आवाजाही बाधित हो जाती है। नई रेल लाइन शुरू होने से वहां सैन्य साजो-सामान, हथियार और टुकड़ियों को पहुंचाने में लगने वाला समय 50 फीसदी से अधिक घट जाएगा। विशेषकर तीस्ता के नीचे बन रहे भूमिगत स्टेशन और सुरंगों से गुजरने वाला यह मार्ग हर मौसम में सुरक्षित कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।

    सिक्किम को ब्रॉडगेज रेल सेवा से जोड़ने के लिए सेवक-रंगपो रेल परियोजना पर काम अंतिम चरण में पहुंच गया है। 44.96 किलोमीटर लंबी इस चुनौतीपूर्ण रेललाइन का लगभग 86-90 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरता है। परियोजना का सबसे मुख्य आकर्षण तीस्ता नदी के नीचे तैयार किया जा रहा तीस्ता बाजार रेलवे स्टेशन है। यह देश का पहला पूरी तरह अंडरग्राउंड रेलवे स्टेशन होगा। 12450 करोड़ की लागत से बनाई जा रही रेल लाइन पर सेफ्टी ट्रायल रन और ट्रेन परिचालन दिसंबर 2027 तक शुरू करने का लक्ष्य है।

  • उज्बेकिस्तान दौरे पर PM मोदी, व्यापार-निवेश से लेकर रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने पर जोर

    उज्बेकिस्तान दौरे पर PM मोदी, व्यापार-निवेश से लेकर रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने पर जोर


    ताशकंद।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) की उज्बेकिस्तान (Uzbekistan Visit) की दो दिवसीय यात्रा के दौरान दोनों देशों का जोर आपसी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के साथ व्यापार एवं निवेश, डिजिटल कनेक्टिविटी, रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर रहेगा। उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव (President Shavkat Mirziyoyev) के निमंत्रण पर हो रही इस यात्रा के दौरान दोनों नेताओं के वीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता होगी।

    इससे पहले शनिवार को ताशकंद (Tashkent ) पहुंचने पर पीएम मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। राष्ट्रपति मिर्जियोयेव के साथ वार्ता के बाद द्विपक्षीय समझौतों के पैकेज पर हस्ताक्षर किए जाने की संभावना भी है। प्रधानमंत्री ताशकंद पहुंचने के बाद यांगी उज्बेकिस्तान पार्क पहुंचकर आजादी स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की, जिसे देश की आजादी की 30वीं वर्षगांठ पर बनाया गया था। पीएम शास्त्री स्मारक और महात्मा गांधी केंद्र भी गए।


    किर्गिस्तान दौरे पर पीएम मोदी के कार्यक्रमों में खास क्या?

    प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त को 26वें एससीओ समिट में शामिल होने के लिए बिश्केक जाएंगे। यह एससीओ की 25वीं वर्षगांठ है। इस साल की थीम है ‘एससीओ के 25 साल: टिकाऊ शांति, विकास और समृद्धि की ओर साथ-साथ’। बिश्केक में होने वाले एससीओ लीडरशिप समिट के कार्यक्रमों में 31 अगस्त को वेलकम डिनर और अगले दिन समिट की मुख्य बैठक शामिल है। यहां प्रधानमंत्री मोदी भाषण भी देंगे। बिश्केक में समिट के दौरान कई द्विपक्षीय बैठकें भी प्रस्तावित हैं।


    उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति और पीएम मोदी की पिछली मुलाकात कब हुई थी?
    पीएम मोदी और मिर्जियोयेव की मुलाकात 2023 में दुबई में सीओपी28 सम्मेलन के दौरान हुई थी। इसके बाद 2024 में कजान में आयोजित ब्रिक्स समिट के दौरान भी दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई थी। पिछली मुलाकात 2025 में चीन के तियानजिन में एससीओ समिट के दौरान हुई थी।

    2026 की मुलाकात को लेकर विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत और उज्बेकिस्तान के बीच लंबे समय से सांस्कृतिक संबंध हैं। इस दौरे के बाद द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे। प्रधानमंत्री मोदी ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी में इंडोलॉजिस्ट (भारतीय संस्कृति के जानकार) और अन्य विद्वानों से भी बातचीत करेंगे।


    कनेक्टिविटी की बाधा दूर करेंगे भारत और उज्बेकिस्तान

    विदेश मंत्रालय के मुताबिक उज्बेकिस्तान संसाधनों से समृद्ध देश है और भारत को अहम खनिजों की जरूरत है। ऐसे में दोनों देशों के बीच लंबे समय तक सप्लाई की सुदृढ़ व्यवस्था की संभावना पर भी चर्चा हो सकती है। राजदूत स्मिता पंत के मुताबिक भारत और उज्बेकिस्तान एक-दूसरे के लिए स्वाभाविक बाजार हैं। हम निश्चित रूप से ज्यादा आयात कर सकते हैं। बहुत ज्यादा निर्यात भी कर सकते हैं। लेकिन कनेक्टिविटी (संपर्क) एक बड़ी बाधा रही है। इसलिए, व्यापारिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कनेक्टिविटी की इस बाधा को कैसे दूर किया जाए, इस मुद्दे पर भी दोनों पक्ष चर्चा करेंगे।


    फार्मा, कृषि और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाएंगे दोनों देश

    उज्बेकिस्तान में भारत की राजदूत स्मिता पंत के मुताबिक, प्रधानमंत्री के दौरे का एजेंडा बहुत व्यापक है। 2015 में उनके पिछले द्विपक्षीय दौरे के बाद दोनों देशों का व्यापार 300% बढ़ा है। उज्बेकिस्तान में निवेश 700% से अधिक बढ़ा है। संस्कृति, फार्मास्युटिकल क्षेत्र, स्वास्थ्य, पारंपरिक दवाओं, कृषि और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर भी बात होगी। कई एमओयू पर हस्ताक्षर भी किए जाएंगे।


    पीएम मोदी से मिलने का उत्साह, कलाकारों और प्रवासियों में दिखी खुशी

    उज्बेकिस्तान के ताशकंद पहुंचे पीएम मोदी के स्वागत में बच्चों, युवतियों और युवाओं की एक टीम ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किया। कार्यक्रम के दौरान एक छोटे बच्चे को पीएम मोदी से मिलने के लिए खास तौर पर उत्साहित देखा गया। प्रस्तुति के बाद स्थानीय लोगों को इस जेस्चर की सराहना करते देखा जा सकता है।


    ताशकंद में भारतीय समुदाय के स्नेह और आत्मीयता से अभिभूत: पीएम मोदी

    पीएम मोदी ने ताशकंद के अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा भी किया। उन्होंने लिखा कि वह ताशकंद में भारतीय समुदाय के स्नेह और आत्मीयता से अभिभूत हैं। उन्होंने कहा कि हमारा प्रवासी समुदाय भारत और उज्बेकिस्तान के बीच एक जीवंत सेतु की तरह है, जो दोनों देशों के बीच मित्रता के संबंधों को लगातार मजबूत बना रहा है। स्वागत कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने भारतीय समुदाय की ओर से प्रस्तुत कथक और अंदिजान पोल्का नृत्य देखा। उज्बेकिस्तान के छोटे बच्चों ने प्रसिद्ध भारतीय गीत उड़े जब जब जुल्फें तेरी पर शानदार नृत्य प्रस्तुत किया। पीएम ने तबले और पारंपरिक उज्बेक वाद्यों (दोइरा और चांग) की मनमोहक जुगलबंदी का भी आनंद लिया।


    राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक की योजना

    विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी ब्यौरे के मुताबिक ताशकंद दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए राष्ट्रपति मिर्जियोयेव के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता करेंगे। दोनों के बीच व्यापार और निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा, शिक्षा के क्षेत्रों में सहयोग पर चर्चा होगी। दोनों देश संबंधों की समीक्षा के अलावा भविष्य की कार्ययोजना भी तय करेंगे। जनता के बीच जुड़ाव को और प्रगाढ़ करने के मकसद से समुदाय के बीच संबंधों की गर्मजोशी बनाए रखने जैसे विषयों पर भी चर्चा होगी।

  • आरक्षण पर NDA में घमासान: चिराग ने मांगा मांझी का इस्तीफा, बोले- क्रीमी लेयर की बात है तो पहले पद छोड़ें

    आरक्षण पर NDA में घमासान: चिराग ने मांगा मांझी का इस्तीफा, बोले- क्रीमी लेयर की बात है तो पहले पद छोड़ें


    नई दिल्ली। आरक्षण के मुद्दे पर NDA के दो सहयोगी दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गया है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष कुमार सुमन के इस्तीफे की मांग कर दी है। विवाद की शुरुआत HAM की ओर से SC-ST आरक्षण में उप-कोटा और आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग के बाद हुई। मांझी ने भी पलटवार करते हुए कहा कि अगर चिराग को गरीबों की चिंता नहीं है तो उन्हें पहले खुद इस्तीफा दे देना चाहिए।

    उप-कोटा की मांग से बढ़ा विवाद

    मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) का कहना है कि SC और ST आरक्षण का लाभ समाज के सबसे कमजोर और लंबे समय से पिछड़े समुदायों तक भी पहुंचना चाहिए। बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण की समीक्षा की जरूरत बताते हुए कहा कि पार्टी आरक्षण खत्म करने के पक्ष में नहीं है, बल्कि इसे ज्यादा न्यायपूर्ण बनाने की मांग कर रही है।

    जीतन राम मांझी बिहार के मुशहर समाज से आते हैं, जिसे दलित समुदाय के सबसे पिछड़े समूहों में माना जाता है। HAM का तर्क है कि पासवान और रविदास जैसे कुछ समुदायों को आरक्षण का अपेक्षाकृत ज्यादा लाभ मिला है, जबकि कई अन्य दलित समुदाय अभी भी पिछड़े हुए हैं।

    संतोष कुमार सुमन का दावा है कि उनके मुशहर समुदाय से अब तक एक भी व्यक्ति IAS अधिकारी नहीं बन पाया है। इसी आधार पर पार्टी SC आरक्षण के भीतर ज्यादा पिछड़े समुदायों के लिए अलग व्यवस्था की मांग कर रही है।

    2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़ा है विवाद

    आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण का मौजूदा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 2024 के अहम फैसले से जुड़ा है। कोर्ट ने राज्यों को SC और ST वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी थी, ताकि आरक्षण का लाभ इन वर्गों में सबसे ज्यादा पिछड़े समुदायों तक पहुंचाया जा सके।

    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका में SC-ST वर्ग के सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ चुके लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर करने की मांग भी की गई है। याचिका में 2024 के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि संविधान पीठ के सात में से चार जजों ने SC-ST में भी क्रीमी लेयर के सिद्धांत पर विचार की बात कही थी।

    हालांकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि SC और ST वर्ग पर क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। फिलहाल क्रीमी लेयर की व्यवस्था OBC आरक्षण में लागू है।

    चिराग बोले- क्रीमी लेयर की बात है तो पहले इस्तीफा दें

    केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने HAM की मांग का विरोध करते हुए कहा कि जो लोग SC आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले खुद आरक्षण का लाभ छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर जीतन राम मांझी क्रीमी लेयर के पक्ष में हैं तो उन्हें केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए। चिराग ने मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन के इस्तीफे की भी मांग की।

    चिराग की पार्टी LJP (रामविलास) लंबे समय से SC आरक्षण में उप-कोटे का विरोध करती रही है। उनका कहना है कि SC समाज के सभी समुदायों को एकजुट रहना चाहिए और संविधान में SC आरक्षण को आर्थिक आधार पर बांटने का प्रावधान नहीं है।

    चिराग ने कहा कि उप-कोटा या क्रीमी लेयर लागू करने से सामाजिक न्याय का उद्देश्य कमजोर हो सकता है और दलित समाज के भीतर विभाजन बढ़ सकता है।

    मांझी का पलटवार- गरीबों को लाभ से वंचित करना चाहते हैं

    चिराग के बयान पर जीतन राम मांझी ने भी पलटवार किया। गया में उन्होंने कहा कि चिराग के रुख से गरीब और जरूरतमंद लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित किया जा सकता है।

    मांझी ने कहा कि व्यापक जनहित में आरक्षण के भीतर बंटवारा जरूरी है। उन्होंने चिराग पर गरीबों की चिंता नहीं करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर चिराग को गरीबों की चिंता नहीं है तो उन्हें पहले अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

    आरक्षण को लेकर यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे हैं। ऐसे में NDA के भीतर दो सहयोगी दलों के बीच खुली बयानबाजी ने गठबंधन के अंदर सामाजिक न्याय और आरक्षण को लेकर मतभेदों को फिर चर्चा में ला दिया है।

  • हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने के साथ ग्लेशियल झीलों का विस्तार और उनसे जुड़े संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ रही है। वर्ष 2026 में सामने आए उपग्रह आधारित अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में ग्लेशियर झीलों के कुल क्षेत्रफल में वर्ष 2016-17 के बाद से 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलें ऐसी पाई गई हैं, जिनके आकार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इनमें 130 झीलें भारत में स्थित हैं।

    अध्ययन के अनुसार भारत में विस्तार वाली इन झीलों में 65 सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियल झीलों का विस्तार इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि कुछ झीलें बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित होती हैं। ऐसे बांध टूटने की स्थिति में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आने से बाढ़ और तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।

    उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियर झीलें

    नए उपग्रह अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। वर्ष 2016-17 के मुकाबले इनके कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि सामने आई है।

    अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों के विस्तार को विशेष रूप से उल्लेखनीय पाया गया है। इस क्षेत्र में अकेले झीलों का क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।

    ग्लेशियल झीलें आम तौर पर ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने से बनती हैं। इनमें से कई झीलें प्राकृतिक रूप से बर्फ, चट्टान या मलबे से बने बांधों से घिरी होती हैं।

    इसरो के पुराने आंकड़े भी दे रहे चेतावनी

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित पुराने अध्ययन में भी भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार की तस्वीर सामने आ चुकी है।

    इसरो ने 1984 से अब तक के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया था। इनमें से 676 झीलों के आकार में 1984 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

    इन 676 झीलों में 130 भारत में स्थित थीं। अध्ययन के अनुसार इनमें से 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो चुका था। यह बदलाव हिमालयी क्षेत्र में जलवायु और ग्लेशियरों में हो रहे परिवर्तन से जुड़े संभावित जोखिम की ओर संकेत करता है।

    26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों पर नजर

    इसरो मानसून के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार निगरानी कर रहा है। इसके तहत एनएचपीसी की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियल झीलों की निगरानी की जा रही है।

    उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से झीलों के आकार, जलस्तर और आसपास के भूगर्भीय बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलती है। इससे संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

    ग्लेशियर झीलों के साथ भूस्खलन का खतरा भी

    हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार के साथ भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा हुआ है। भारी बारिश, चट्टानों का खिसकना और पहाड़ी ढलानों में होने वाले बदलाव कई बार ग्लेशियल झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

    इसरो के उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार हिमालयी पर्वत श्रृंखला में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

    ग्लेशियर झीलों का बढ़ता विस्तार, प्राकृतिक बांधों की अस्थिरता और भूस्खलन का मेल हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ-साथ जलविद्युत परियोजनाओं और निचले इलाकों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, समय पर चेतावनी और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी को और मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • भारत की 7 ऐसी जगहें जहां जहां आज भी आम पर्यटक नहीं कर सकते मनमानी

    भारत की 7 ऐसी जगहें जहां जहां आज भी आम पर्यटक नहीं कर सकते मनमानी


    नई दिल्ली।
    भारत में घूमने के लिए एक से बढ़कर एक पर्यटन स्थल हैं, लेकिन कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहां आम पर्यटक अपनी मर्जी से प्रवेश नहीं कर सकते। कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है तो कहीं दुर्लभ आदिवासी समुदायों और पर्यावरण की सुरक्षा के कारण आवाजाही सीमित है। कुछ स्थानों पर विशेष अनुमति के बाद ही पहुंच संभव है, जबकि कुछ इलाकों में आम लोगों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है।

    आइए जानते हैं देश की ऐसी ही सात जगहों के बारे में, जहां घूमने के लिए सामान्य पर्यटन स्थलों जैसी आजादी नहीं है।

    1. बैरन आइलैंड, अंडमान और निकोबार

    अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का बैरन आइलैंड भारत के एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी के लिए जाना जाता है। यहां पर्यटक नाव से ज्वालामुखी और द्वीप का नजारा देख सकते हैं, लेकिन आम तौर पर द्वीप पर उतरने की अनुमति नहीं है।

    गृह मंत्रालय ने भी बैरन आइलैंड को प्रतिबंधित पर्यटन स्थलों की सूची में रखा है। इसलिए यहां घूमने का अनुभव समुद्र से ज्वालामुखी को देखने तक सीमित रहता है।

    2. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई

    मुंबई के ट्रॉम्बे में स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) देश की प्रमुख परमाणु अनुसंधान संस्थाओं में शामिल है। यह सामान्य पर्यटन स्थल नहीं है और यहां सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी है।

    केंद्र के आधिकारिक दस्तावेजों में परिसर में प्रवेश के लिए अधिकृत कर्मियों और कर्मचारियों के लिए पास तथा अनुमति संबंधी प्रक्रियाओं का उल्लेख है। ऐसे में कोई आम पर्यटक बिना अनुमति परिसर में प्रवेश कर यहां घूम नहीं सकता।

    3. नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड, अंडमान और निकोबार

    नॉर्थ सेंटिनल आइलैंड दुनिया के सबसे अलग-थलग रहने वाले स्वदेशी समुदायों में से एक, सेंटिनलीज जनजाति, का घर है। इस समुदाय की सुरक्षा और बाहरी संपर्क से होने वाले संभावित नुकसान को देखते हुए द्वीप और उसके आसपास के क्षेत्र को जनजातीय आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।

    द्वीप के साथ उच्च ज्वार रेखा से पांच किलोमीटर तक का समुद्री क्षेत्र भी आरक्षित क्षेत्र में शामिल है। गैर-आदिवासियों का यहां प्रवेश प्रतिबंधित है। इसका एक बड़ा कारण बाहरी बीमारियों से समुदाय की रक्षा करना भी है, क्योंकि लंबे समय तक अलग-थलग रहने के कारण उनमें कई बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम हो सकती है।

    4. सियाचिन ग्लेशियर, लद्दाख

    सियाचिन को दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में गिना जाता है। सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील होने के कारण यहां आम लोगों की आवाजाही सामान्य पर्यटन स्थलों जैसी नहीं है।

    हालांकि पूरे सियाचिन ग्लेशियर को नागरिकों के लिए पूरी तरह बंद मानना सही नहीं होगा। 2021 में सियाचिन बेस कैंप को घरेलू पर्यटकों के लिए खोला गया था। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पर्यटक सैन्य क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कहीं भी जा सकते हैं। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रवेश और आवाजाही सुरक्षा नियमों तथा प्रशासनिक अनुमति के अधीन रहती है।

    5. निकोबार के जनजातीय आरक्षित क्षेत्र

    निकोबार द्वीप समूह के कई हिस्से स्वदेशी समुदायों और संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्रों के कारण विशेष सुरक्षा के दायरे में हैं। यहां सामान्य पर्यटक की तरह घूमना संभव नहीं है।

    निकोबार की यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए संबंधित सरकारी अनुमति या जनजातीय पास की आवश्यकता होती है। विदेशी नागरिकों के लिए भी निकोबार द्वीप समूह की यात्रा पर विशेष प्रतिबंध हैं। इन नियमों का उद्देश्य शोम्पेन समेत संवेदनशील आदिवासी समुदायों को बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना है।

    6. इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र, कलपक्कम

    तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक एवं अनुसंधान संस्थान है।

    परमाणु अनुसंधान से जुड़े इस परिसर में सुरक्षा और प्रवेश के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं लागू हैं। इसलिए यह आम जनता के लिए खुले पर्यटन स्थल की श्रेणी में नहीं आता। परिसर में प्रवेश के लिए अधिकृत अनुमति जरूरी होती है।

    7. नंदा देवी आंतरिक अभयारण्य, उत्तराखंड

    उत्तराखंड का नंदा देवी क्षेत्र अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है।

    नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान के कुछ हिस्सों में निर्धारित मार्गों से पहुंच संभव है, लेकिन आंतरिक अभयारण्य में आम पर्यटकों को स्वतंत्र रूप से घूमने की अनुमति नहीं है। संवेदनशील पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए यहां मानव गतिविधियों और पर्यटकों की आवाजाही पर कड़े नियम लागू हैं। कुछ क्षेत्रों में प्रवेश के लिए निर्धारित परमिट की आवश्यकता होती है।

    सुरक्षा से लेकर पर्यावरण तक, अलग-अलग हैं वजहें

    भारत की इन जगहों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे कारण अलग-अलग हैं। परमाणु अनुसंधान केंद्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख वजह है, जबकि नॉर्थ सेंटिनल और निकोबार के कुछ इलाकों में आदिवासी समुदायों की सुरक्षा प्राथमिकता है। वहीं नंदा देवी जैसे क्षेत्रों में नाजुक हिमालयी पर्यावरण की रक्षा महत्वपूर्ण है।

    इसलिए इन स्थानों को लेकर पर्यटकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्र में बिना अनुमति प्रवेश करने की कोशिश न करें और संबंधित प्रशासन के मौजूदा नियमों का पालन करें।