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  • विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन

    विपक्षी एकता दिखाने की फिर से तैयारी…. दिल्ली में महाबैठक करेगा INDIA' गठबंधन


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) को घेरने और विपक्षी एकता (Opposition unity) दिखाने के लिए ‘INDI’ गठबंधन दिल्ली में महाबैठक (General Meeting) करने जा रहा है। जानकारी के मुताबिक 8 जून को यह बैठक हो सकती है। इसमें केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए संयुक्त रणनीति पर चर्चा होनी है। बैठक में करीब 15 विपक्षी दलों के प्रतिनिधि भाग ले सकते हैं।


    ममता बनर्जी भी हो सकती हैं शामिल

    जानकारी के मुताबिक हाल के चुनाव में बंगाल में टीएमसी और तमिलनाडु में डीएमके की हार की समीक्षा और आगे की रणनीति पर चर्चा करने के लिए यह बैठक बुलाई गई है। सूत्रों ने बताया कि बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, शिवसेना (UBT) नेता उद्धव ठाकरे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव आदि के भाग लेने की उम्मीद है।

    बता दें कि पश्चिम बंगाल की हार के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी भी बड़े संकट का सामना कर रही है। सूत्रों का कहना है कि टीएमसी के अंदर विरोध काफी तेज हो गया है और टीएमसी के कई बड़े नेता बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। उधर पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी पर हमला हो गया जिसको लेकर ममता बनर्जी केंद्र पर आक्रामक हैं। वहीं खबरें यहां तक आ रही हैं कि पार्टी में ममता बनर्जी के कद पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।


    राहुल गांधी बोले- रीति और नीति को प्रसारित करें

    राहुल गांधी ने एक दिन पहले ही पार्टी संगठन को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि कार्यकर्ताओं को पार्टी की रीति और नीति को जन-जन तक पहुंचाना है। गांधी सोमवार को कांग्रेस की ओर से अजमेर के पुष्कर स्थित तिलोरा में आयोजित 10 दिवसीय सृजन संगठन चिंतन शिविर के समापन पर कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने शिविर में जिला अध्यक्षों को संगठन के प्रति निष्ठा और एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने जिला अध्यक्षों को स्पष्ट कहा कि संगठन से सर्वोपरि कुछ भी नहीं है। पार्टी की रीति-नीति आम जनता के बीच प्रसारित कर कांग्रेस को और मजबूत किया जाए।

    शिविर को सफल बताते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि संगठन सृजन अभियान के साथ चिंतन शिविर से कांग्रेस के कार्यकर्ता में एक नया जोश पैदा होगा और नयी जिम्मेदारी के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता जब पार्टी की रीति के साथ जब सड़कों पर उतरकर जनता के बीच जाएगा तो जनता का मत और समर्थन कांग्रेस को प्राप्त होगा। यही इस शिविर का मूल उद्देश्य भी है।

  • हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर

    हर समारोह में वंदे मातरम् के सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं : शशि थरूर


    नई दिल्ली।
    कांग्रेस सांसद शशि थरूर (Congress MP Shashi Tharoor) ने वंदे मातरम् (VANDAM MATARAM) के गायन को लेकर चल रही बहस के बीच बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रीय गीत के सभी पांच पदों का गायन करवाना उचित नहीं लगता। संवाददाताओं से बात करते हुए थरूर ने कहा कि वंदे मातरम का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन हर समारोह में इसके सभी अंतरे बजाने को अनिवार्य करना तर्कसंगत नहीं है।

    कांग्रेस सांसद ने कहा, “वंदे मातरम राष्ट्रगीत है और जब इसे गाया जाता है तो हम सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते हैं। इसका पहला अंतरा या शुरुआती दो अंतरे, ज्यादातर लोगों को मुंह जुबानी याद होते हैं।” थरूर ने बताया कि परंपरागत रूप से यह गीत किसी कार्यक्रम की शुरुआत में एक बार गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगान अलग से, अक्सर अंत में बजाया जाता है।

    उन्होंने कहा, “अब वे चाहते हैं कि हर कार्यक्रम की शुरुआत में और अंत में पांचों अंतरे गाए जाएं। मुझे लगता है कि यह एक अनावश्यक थोपा हुआ नियम है।” थारूर ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा, “हम सभी वंदे मातरम का सम्मान करते हैं। मैं खुशी-खुशी इसे आपके लिए गा सकता हूं।”

    राज्य सरकार और राज्यपाल के रुख में अंतर का संकेत
    कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य थरूर ने कहा कि केरल सरकार का रुख यह रहा है कि वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाना वैकल्पिक है। वहीं, उन्होंने संकेत दिया कि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की राय इससे अलग दिखाई देती है। थरूर के मुताबिक, इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय की आवश्यकता पड़ सकती है क्योंकि संसद द्वारा ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया गया है जो हर कार्यक्रम में पूरे गीत के गायन को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने इसे मुख्य रूप से परंपरा और प्रचलन से जुड़ा विषय बताया।

    ‘राष्ट्रीय गीत से कोई आपत्ति नहीं’
    थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें वंदे मातरम् से कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय इस राष्ट्रीय गीत का सम्मान करते हैं और वह स्वयं भी इसे खुशी से गा सकते हैं। उन्होंने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए बताया कि नई दिल्ली में आयोजित उस कार्यक्रम में, जिसमें उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन मौजूद थे, वंदे मातरम् का पूरा संस्करण कार्यक्रम की शुरुआत और अंत दोनों समय बजाया गया था।

    ‘दर्शकों के लिए यह व्यावहारिक चुनौती बन जाती है’
    थरूर का कहना था कि अपेक्षाकृत लंबा और कम परिचित गीत जब एक ही कार्यक्रम में दो बार सुनाया जाता है तो दर्शकों के लिए लंबे समय तक खड़े रहना एक मुद्दा बन सकता है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में परंपरागत रूप से वंदे मातरम् का वही हिस्सा गाया जाता रहा है जिसकी अवधि लगभग राष्ट्रीय गान के बराबर होती है। यह स्वरूप लंबे समय से व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता रहा है और लोगों द्वारा सम्मानित भी है।

    विवाद का सौहार्दपूर्ण समाधान निकलने की उम्मीद
    इस पूरे विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए थरूर ने उम्मीद जताई कि इसका समाधान आपसी समझ और सौहार्द के साथ निकलेगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों की मौजूदगी वाले विशेष औपचारिक कार्यक्रमों में एक बार पूरा गीत गाए जाने को समझा जा सकता है। हालांकि, किसी छोटे कार्यक्रम में पूरे वंदे मातरम् का दो बार गायन करवाने के पीछे उन्हें कोई स्पष्ट तर्क नजर नहीं आता। उनके अनुसार यह व्यवस्था न तो विशेष रूप से व्यावहारिक है और न ही बहुत प्रभावी।

  • नीट विवाद: PM मोदी के जवाबदेही मॉडल की दिग्विजय सिंह ने की सराहना….

    नीट विवाद: PM मोदी के जवाबदेही मॉडल की दिग्विजय सिंह ने की सराहना….


    नई दिल्ली।
    नीट विवाद (NEET Controversy) को लेकर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) जहां प्रधानमंत्री (Prime Minister) के साथ आर-पार के मूड में है, वहीं पार्टी के सबसे मुखर चेहरों में से एक दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) ने प्रधानमंत्री की नीयत और देश की संस्थागत व्यवस्था पर खुलकर भरोसा जताया है। शिक्षा संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह सोमवार को हुए बैठक में साफ कहा कि जब देश का शीर्ष नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के समक्ष परीक्षा प्रणाली को सुधारने की जवाबदेही ले रहा है, तो इस सकारात्मक रुख की सराहना की जानी चाहिए।

    सूत्रों ने बताया, बैठक में परीक्षा सुधार, एनटीए की कार्यप्रणाली और नीट से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान दिग्विजय ने कहा कि जब सरकार जवाबदेही स्वीकार रही है तो इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए। हालांकि, उनकी टिप्पणी का आधिकारिक ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से मोदी की किसी विशेषता का उल्लेख किया हो। पिछले वर्ष उन्होंने भाजपा-आरएसएस की संगठनात्मक क्षमता की सराहना करते हुए कहा था कि एक साधारण कार्यकर्ता का प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना संगठन की ताकत को दर्शाता है।


    पीएम छात्रों के नाम खुला पत्र लिखें

    अध्यक्ष ने कहा, 21 जून की दोबारा परीक्षा के लिए छात्रों और अभिभावकों में विश्वास जगाना बेहद जरूरी है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान छात्रों के नाम खुला पत्र या फिर संदेश लिखें जिसमें छात्रों को लगे कि वो अकेले नहीं हैं।


    राजनीतिकरण पर सवाल तो सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं दी

    सूत्रों के मुताबिक, भाजपा से जुड़े सदस्यों ने समिति में शामिल विपक्ष के सदस्यों से पूछा कि नीट यूजी की दोबारा परीक्षा पर राजनीति क्यों हो रही है। परीक्षा के बीच जांच के नाम पर ऐसी बैठकें क्योंकि की जा रही हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा, राजनीति का तो कोई सवाल ही नहीं है। अध्यक्ष ने मंत्रालय और अधिकारियों को 21 जून को होने वाली दोबारा नीट के सफल आयोजन के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।


    पुनर्मूल्यांकन फीस पर राहुल बोले- सीबीएसई के जेबकतरों से सावधान

    कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोमवार को सीबीएसई की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और उसकी फीस को लेकर मोदी सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि जब शिक्षा को एक सेवा के बजाय एक व्यापार के तौर पर देखा जाता है, तो गलतियां सुधारी नहीं जातीं, बल्कि और बढ़ जाती हैं और इसकी सबसे बड़ी कीमत हमारे बच्चे अपने वक्त,अपने आत्मविश्वास खोने और अपने भविष्य के रूप में चुका रहे हैं। इसके साथ उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली की वजह से दिक्कतों का सामना कर रहे सीबीएसई छात्रों संग अपनी बातचीत का वीडियो क्लिप भी साझा किया।

    इसके साथ उन्होंने लिखा, जेबकतरों से सावधान रहें। आज वे सीधे सीबीएसई के अंदर ही बैठे हैं। सीबीएसई की वजह से गलत नंबर आने पर आपको डिजिटल स्कैन कॉपी पाने के लिए 100 रुपये प्रति विषय, नंबरों की दोबारा गिनती के लिए 100 रुपये प्रति पेपर और पुनर्मूल्यांकन के लिए 25 प्रति सवाल शुल्क देना पड़ता है। अपनी ही आंसर सीट की सही जांच के लिए एक छात्र को 2000 रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, जरा सोचिए कि जब करीब 4 लाख चार लाख छात्रों ने ऐसे आवेदन दिए हैं, तो सीबीएसई कितनी कमाई कर रहा होगा।

  • UP: आतंकी शहबाज सिद्धीकी से पूछताछ में बड़ा खुलासा, देश को दहलाने की थी साजिश, बस आदेश का था इंतजार

    UP: आतंकी शहबाज सिद्धीकी से पूछताछ में बड़ा खुलासा, देश को दहलाने की थी साजिश, बस आदेश का था इंतजार

    लखनऊ । जैश आतंकी से कनेक्शन में गिरफ्तार आतंकी शहबाज सिद्धीकी पूछताछ में बड़े खुलासे कर रहा है। उसने दावा किया है कि वह खुद देश में फिदायीन हमला करने को तैयार था। बस उसको पाकिस्तानी जैश (Pakistani Jaish) के आतंकी के इशारे का इंतजार था। इससे संबंधित एटीएस को आरोपी के मोबाइल से भी अहम सुबूत मिले हैं।

    सोशल मीडिया से मिले इनपुट के आधार पर एटीएस ने 18 मई को कासगंज से शहबाज सिद्धीकी को गिरफ्तार किया था। वह पुलवामा हमले से जुड़े जैश के आतंकियों के संपर्क में था। दो दिन पहले ही उसको एटीएस ने कस्टडी रिमांड पर लिया है। सूत्रों के मुताबिक आरोपी के पास से मिले मोबाइल फोन में जैश के आतंकियों से बातचीत की रिकॉर्डिंग व चैट मिली है। इसमें वह पुलवामा हमले को सही बता रहा है और सर्जिकल स्ट्राइक को गलत ठहरा रहा है। भारत में हुई आतंकी घटनाओं को लेकर भी खुशी जाहिर की। पूछताछ में उसने इन सभी बातों को स्वीकारा है।

    शहबाज के नेटवर्क से भारत के कई और लोगों के भी जुड़ने की आशंका
    उसने बताया कि वह भारत में फिदायीन हमला करने के लिए तैयार था। इसको लेकर उसने आतंकियों से बातचीत भी की थी। पाकिस्तानी आतंकी ने उसे भड़काऊ वीडियो भी भेजे थे। ये भी कहा था कि समय आने पर बताया जाएगा कि हमला कहां करना था। जांच एजेंसी को आशंका है कि शहबाज के नेटवर्क से भारत के कई और लोग भी जुड़े हैं, इसलिए उनके बारे में पता करने की जद्दोजहद जारी है। अब जब उसको मुंबई ले जाया जाएगा तो कई सुराग लगने की आशंका है।

  • टीएमसी पर हमले को लेकर सियासत गरम, भाजपा-विपक्ष में तकरार

    टीएमसी पर हमले को लेकर सियासत गरम, भाजपा-विपक्ष में तकरार


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी नेताओं पर हुए कथित हमलों को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। इस घटना के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विपक्षी दलों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।

    टीएमसी की ओर से दावा किया जा रहा है कि उसके नेताओं पर हमले लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला हैं, जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि यह घटनाएं जनता में बढ़ते आक्रोश का परिणाम हैं। इसी बीच विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

    कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में हालात चिंताजनक हैं और वहां तक कि सांसद भी सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में भय का माहौल बनाया गया है और आम जनता भी असुरक्षित महसूस कर रही है।

    वहीं जेडीयू नेता हरि नारायण सिंह ने पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य में लंबे समय से तनावपूर्ण माहौल रहा है। उन्होंने कहा कि हालिया घटनाएं अचानक नहीं हैं, बल्कि यह जनता की नाराजगी का परिणाम हैं। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी के भीतर भी असंतोष और टूट की स्थिति बन रही है।

    दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने इन घटनाओं को जनता की प्रतिक्रिया बताते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा नेता टी.आर. श्रीनिवास ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि जब पहले हिंसा की घटनाएं हुईं, तब वही नेता चुप थे, और अब स्थिति बदलने पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने इसे राजनीतिक अवसरवाद करार दिया।

    इसी मुद्दे पर जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि टीएमसी के भीतर असंतोष और इस्तीफों की खबरें यह संकेत देती हैं कि पार्टी आंतरिक चुनौतियों से जूझ रही है।

    पूरा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे राज्य में कानून-व्यवस्था और लोकतांत्रिक माहौल से जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

  • NEET UG परीक्षा को ऑनलाइन कराने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार, 21 जून की री-एग्जाम पर बढ़ी नजर

    NEET UG परीक्षा को ऑनलाइन कराने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार, 21 जून की री-एग्जाम पर बढ़ी नजर

    नई दिल्ली । देश की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET UG 2026 को लेकर चल रहे विवाद में आज एक अहम मोड़ आया, जब Supreme Court of India ने परीक्षा को ऑनलाइन या कंप्यूटर आधारित मोड में कराने की मांग वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। यह याचिका जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच के समक्ष प्रस्तुत की गई थी, जिसमें परीक्षार्थियों की ओर से परीक्षा प्रणाली में बदलाव की मांग उठाई गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस समय National Testing Agency पहले से ही कई प्रशासनिक और तकनीकी दबावों का सामना कर रही है, इसलिए इस मामले पर विस्तृत सुनवाई छुट्टियों के बाद की जाएगी।

    सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से यह भी टिप्पणी की गई कि मौजूदा परिस्थितियों में परीक्षा प्रणाली को अचानक बदलना आसान नहीं है और इसके लिए व्यापक तैयारी और मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। अदालत ने संकेत दिया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे फिलहाल टालना उचित होगा। इस फैसले के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, क्योंकि लंबे समय से परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की मांग उठती रही है।

    वर्तमान में NEET UG 2026 परीक्षा 21 जून को पुनः आयोजित की जा रही है। यह वही परीक्षा है जिसे पहले 3 मई को आयोजित किया गया था, लेकिन पेपर लीक के आरोपों और अनियमितताओं की जांच के बाद इसे रद्द करना पड़ा था। मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही है, जिससे परीक्षा की विश्वसनीयता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। पुनर्परीक्षा को लेकर National Testing Agency ने स्पष्ट किया है कि सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और एडमिट कार्ड 14 जून तक जारी कर दिए जाएंगे। वहीं, परीक्षा के बाद 24 जून तक आंसर की जारी होने की संभावना भी जताई गई है।

    इसी बीच शिक्षा नीति से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता अब पहले से अधिक महसूस की जा रही है। सरकार और परीक्षा एजेंसियों ने संकेत दिया है कि आने वाले वर्ष से NEET UG परीक्षा को कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) मोड में स्थानांतरित करने की दिशा में गंभीर तैयारी चल रही है। इस संबंध में केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने भी पहले यह भरोसा जताया है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया जाएगा, ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।

    हाल ही में परीक्षा व्यवस्था की समीक्षा के लिए उच्च स्तरीय बैठक भी आयोजित की गई थी, जिसमें शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, परीक्षा एजेंसी के प्रतिनिधियों और अन्य संबंधित संस्थानों ने भाग लिया था। बैठक में परीक्षा को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए कई तकनीकी और प्रशासनिक सुधारों पर चर्चा की गई। इसके बावजूद ऑनलाइन परीक्षा को लेकर उठ रही मांगों पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट का ताजा रुख यह संकेत देता है कि इस मुद्दे पर अंतिम फैसला विस्तृत सुनवाई और सभी पक्षों की दलीलों के बाद ही लिया जाएगा। फिलहाल छात्रों की नजर 21 जून को होने वाली पुनर्परीक्षा और उसके बाद आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है।

  • अभिषेक बनर्जी केस पर कपिल सिब्बल की टिप्पणी से सियासी बवाल, बीजेपी का तीखा हमला, देश विरोधी सोच का आरोप

    अभिषेक बनर्जी केस पर कपिल सिब्बल की टिप्पणी से सियासी बवाल, बीजेपी का तीखा हमला, देश विरोधी सोच का आरोप

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी से जुड़ी घटना और उस पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कपिल सिब्बल पर गंभीर आरोप लगाए हैं और उनके बयान को देश और लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ बताया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि यह देश की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली मानसिकता को दर्शाती हैं।

    दरअसल, पश्चिम बंगाल में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान अभिषेक बनर्जी पर कथित रूप से भीड़ द्वारा अंडे फेंके जाने और विरोध की घटना सामने आई थी। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कपिल सिब्बल ने इसे लोकतंत्र के लिए शर्मनाक बताया था और कहा था कि उन्हें इस बात पर खेद है कि देश में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर किया जा रहा है। उनके इसी बयान के बाद राजनीतिक विवाद शुरू हो गया।

    बीजेपी ने कपिल सिब्बल के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि यह वही लोग हैं जो चुनिंदा घटनाओं पर ही प्रतिक्रिया देते हैं और अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर चुप्पी साध लेते हैं। पार्टी के प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं का रवैया अक्सर राजनीतिक लाभ के अनुसार बदलता है और वे संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करते समय संतुलन नहीं रखते।

    बीजेपी ने यह भी दावा किया कि पश्चिम बंगाल में हुई घटना के पीछे स्थानीय राजनीतिक कारण हो सकते हैं और इसे केवल एक पक्षीय दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। पार्टी का कहना है कि राज्य में राजनीतिक तनाव लंबे समय से जारी है और कई बार आंतरिक विवाद भी सार्वजनिक घटनाओं के रूप में सामने आते हैं।

    इस पूरे विवाद के बीच कपिल सिब्बल के पुराने बयानों को भी लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया है कि जब देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हुई थीं, तब कई विपक्षी नेता और समर्थक उस समय चुप रहे थे। अब एक विशेष घटना पर प्रतिक्रिया देना राजनीतिक अवसरवाद जैसा प्रतीत होता है।

    वहीं, इस मामले ने एक बार फिर देश की राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक विमर्श की दिशा पर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक वातावरण को और अधिक तनावपूर्ण बनाते हैं। राजनीतिक दलों के बीच संवाद की कमी और तीखी बयानबाजी लोकतांत्रिक बहस की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।

    फिलहाल, इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

  • भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा साझेदारी को नई गति: इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती के बड़े संकेत

    भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा साझेदारी को नई गति: इंडो-पैसिफिक में रणनीतिक मजबूती के बड़े संकेत

    नई दिल्ली ।  में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के उद्देश्य से उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति, स्थिरता और रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने पर व्यापक सहमति जताई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ऑस्ट्रेलिया के उपप्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के बीच हुई इस वार्ता को बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में दोनों देशों के बढ़ते भरोसे और साझा हितों का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। बैठक में समुद्री सुरक्षा, संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा उद्योग में सहयोग, तकनीकी आदान-प्रदान और सह-विकास जैसे अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई, जिससे भविष्य की रणनीतिक दिशा स्पष्ट होती दिखाई दी।

    बैठक के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऑस्ट्रेलिया की नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति का स्वागत करते हुए कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदार देशों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र वैश्विक व्यापार और सुरक्षा का केंद्र बन चुका है, ऐसे में इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि रक्षा उद्योग में सहयोग, तकनीकी नवाचार और संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं दोनों देशों के संबंधों को एक नई ऊंचाई तक ले जा सकती हैं। राजनाथ सिंह ने विश्वास जताया कि आने वाले समय में यह साझेदारी केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यापक रणनीतिक और आर्थिक सहयोग में भी परिवर्तित होगी।

    दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया पहले से कहीं अधिक रणनीतिक रूप से एकजुट हैं और समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता विश्वास और नियमित संवाद इस साझेदारी को और अधिक स्थिर और प्रभावी बना रहा है। मार्ल्स ने यह भी स्पष्ट किया कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नियम आधारित व्यवस्था और मुक्त नौवहन सुनिश्चित करना दोनों देशों की साझा प्राथमिकता है, जिसके लिए सहयोगात्मक प्रयासों को और गति दी जाएगी।

    बैठक में इस बात पर भी सहमति बनी कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने, संयुक्त अभ्यासों को विस्तार देने और रक्षा उपकरणों के सह-विकास को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक सहयोग के नए अवसरों पर भी विचार किया गया, जिससे आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता दोनों को मजबूती मिल सके।

    यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह बढ़ता सहयोग न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आने वाले समय में दोनों देशों की यह साझेदारी वैश्विक सुरक्षा ढांचे में एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में उभरने की संभावना रखती है।

  • संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    संसद में नए सिरे से रणनीति तैयार, परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव बिल को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ा

    नई दिल्ली । देश की चुनावी और संसदीय व्यवस्था से जुड़े बड़े सुधारों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर सक्रिय हो गई है। परिसीमन विधेयक को संसद में पहले मिले झटके के बाद सरकार इसे नए रूप में दोबारा पेश करने की तैयारी कर रही है। इसके साथ ही 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी तेजी से काम किया जा रहा है। इन दोनों प्रस्तावों को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और विपक्षी दलों ने सरकार से व्यापक परामर्श और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है।

    सरकारी स्तर पर गृह मंत्रालय द्वारा परिसीमन से संबंधित नए विधेयक का मसौदा तैयार किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इस पहल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़े नियमों को अद्यतन करना बताया जा रहा है, ताकि जनसंख्या बदलाव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक प्रभावी बनाया जा सके। इससे पहले संसद में इस विधेयक को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी, जिसके बाद सरकार ने रणनीति में बदलाव करते हुए इसे फिर से पेश करने का निर्णय लिया है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के विधानसभा चुनावों में कुछ राज्यों में मिले परिणामों के बाद सत्ता पक्ष अपने संसदीय समीकरणों को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बीच प्रमुख विपक्षी दल Indian National Congress ने सरकार पर आरोप लगाया है कि बिना व्यापक सहमति और सभी दलों से विचार-विमर्श के किसी भी बड़े चुनावी सुधार को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

    वहीं सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party इस पूरे मुद्दे पर राजनीतिक और संसदीय रणनीति को और मजबूत करने में जुटा है। पार्टी नेतृत्व, जिसमें Narendra Modi और Amit Shah जैसे शीर्ष नेता शामिल हैं, चुनावी सुधारों को दीर्घकालिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बता रहे हैं। सरकार का मानना है कि एक साथ चुनाव कराने से न केवल खर्च कम होगा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बनेगी।

    इसके समानांतर ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर भी काम तेज कर दिया गया है। इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करने में जुटी है और इसके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया है। समिति द्वारा किए जा रहे अध्ययन में चुनावी प्रक्रियाओं के समन्वय, राज्यों और केंद्र के चुनावों को एक साथ कराने की व्यवहारिकता और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जा रहा है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन दोनों प्रस्तावों का असर केवल चुनावी प्रणाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की संघीय संरचना और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी दलों, जिनमें All India Trinamool Congress और Dravida Munnetra Kazhagam शामिल हैं, ने भी इन प्रस्तावों पर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और कहा है कि क्षेत्रीय संतुलन और राज्यों के अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    कुल मिलाकर, परिसीमन विधेयक और एक राष्ट्र-एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के चलते देश की राजनीतिक दिशा एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। आने वाले महीनों में संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर और अधिक बहस और निर्णय की संभावना है, जिससे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकता है।

  • राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    राज्यसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित, बीरेन सिंह, रवनीत बिट्टू और नरोत्तम मिश्रा समेत कई नेताओं पर सबकी नजर

    नई दिल्ली । देश में राज्यसभा की 24 रिक्त सीटों पर चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो गया है। चुनाव आयोग की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार यह मतदान 10 राज्यों में कराया जाएगा, जिससे संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन पर महत्वपूर्ण असर पड़ने की संभावना है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन तेज हो गया है। इस चुनाव को आगामी संसदीय समीकरणों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे राज्यसभा में दलों की स्थिति में बदलाव संभव है।

    सूत्रों और राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार कई राज्यों में वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के नाम संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल किए जा रहे हैं। इनमें पूर्वोत्तर के प्रमुख नेता बीरेन सिंह, पंजाब के नेता रवनीत बिट्टू और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। हालांकि अंतिम निर्णय संबंधित दलों के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यवार राजनीतिक परिस्थितियों और विधायकों की संख्या के आधार पर लिया जाएगा। उम्मीदवार चयन में क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक अनुभव जैसे कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

    चुनाव कार्यक्रम के अनुसार नामांकन प्रक्रिया से लेकर मतदान और मतगणना तक की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। कुछ राज्यों में जहां एक दल का स्पष्ट बहुमत है, वहां निर्विरोध निर्वाचन की संभावना जताई जा रही है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां विधानसभा में बहुदलीय संतुलन है, वहां क्रॉस वोटिंग और रणनीतिक मतदान के कारण परिणाम अनिश्चित रह सकते हैं।

    राजनीतिक दलों ने इस चुनाव को गंभीरता से लेते हुए अपने विधायकों के साथ लगातार बैठकें शुरू कर दी हैं। विधायकों की संख्या और वोटिंग गणित को ध्यान में रखते हुए हर पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। इस प्रक्रिया में पार्टी अनुशासन और व्हिप जारी करने जैसे कदम भी अहम साबित हो सकते हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव केवल रिक्त सीटों को भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे राज्यसभा में सत्ता संतुलन पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में विधेयकों की मंजूरी और संसदीय बहसों में दलों की भूमिका इसी परिणाम से प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस चुनाव को लेकर बेहद सतर्क और सक्रिय नजर आ रहे हैं।

    इसके अलावा कई राज्यों में स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी इस चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्रीय दलों की भूमिका उन राज्यों में खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी जहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं है। ऐसे में छोटे दल और निर्दलीय विधायक भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

    कुल मिलाकर राज्यसभा की 24 सीटों के लिए घोषित यह चुनाव देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। उम्मीदवारों की अंतिम सूची सामने आने के बाद राजनीतिक हलचल और भी तेज होने की संभावना है और सभी की नजर अब मतदान प्रक्रिया और उसके परिणामों पर टिकी हुई है।