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  • बीजेपी ने राज्यों के नए प्रभारी घोषित किए, विनोद तावड़े को यूपी और बैजयंत पांडा को महाराष्ट्र की जिम्मेदारी

    बीजेपी ने राज्यों के नए प्रभारी घोषित किए, विनोद तावड़े को यूपी और बैजयंत पांडा को महाराष्ट्र की जिम्मेदारी

    नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी ने 23 सितंबर 2026 को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए प्रभारी और सह-प्रभारियों की नई नियुक्तियों का ऐलान किया है। संगठन में किए गए इस बदलाव के तहत कई वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कुछ नेताओं को एक से अधिक राज्यों का प्रभार भी दिया गया है।

    उत्तर प्रदेश का प्रभारी विनोद तावड़े को बनाया गया है। उनके साथ जगदीश पटेल, मेघा कुलकर्णी, डॉ. प्रदीप वर्मा और अनंत ओझा को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। महाराष्ट्र में बैजयंत जय पांडा को प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया है। उनके साथ अमित मालवीय, सदानंद शेट तनवाड़े और कमलजीत सहरावत सह-प्रभारी होंगे।

    राम माधव को तमिलनाडु और उत्तराखंड का प्रभारी बनाया गया है। तमिलनाडु में उनके साथ निर्मल कुमार सुराना और डीके अरुणा को सह-प्रभारी बनाया गया है। उत्तराखंड में अरविंद मेनन और बांसुरी स्वराज सह-प्रभारी होंगी।

    स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ और हरियाणा की जिम्मेदारी दी गई है। छत्तीसगढ़ में सिद्धार्थ शंभू और हरियाणा में डॉ. भोला सिंह सह-प्रभारी होंगे। गुजरात का प्रभार तरुण चुघ को मिला है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब की जिम्मेदारी सतीश पूनिया को दी गई है। पंजाब में वीरेंद्र सचदेवा और डॉ. अलका गुर्जर सह-प्रभारी होंगे।

    बिहार और कर्नाटक का प्रभार हरीश द्विवेदी को सौंपा गया है। बिहार में संगीता यादव और रोहन गुप्ता सह-प्रभारी होंगे, जबकि कर्नाटक में डॉ. कासम वेंकटेश्वरलू को सह-प्रभारी बनाया गया है। मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी बिप्लब कुमार देब को मिली है और रेखा वर्मा सह-प्रभारी होंगी। राजस्थान में संजय भाटिया प्रभारी तथा कविता पाटीदार और कुलजीत चहल सह-प्रभारी बनाए गए हैं।

    दिल्ली में डॉ. विनय सहस्रबुद्धे को प्रभारी नियुक्त किया गया है। जामयांग त्सेरिंग नामग्याल और दर्शनाबेन जरदोश सह-प्रभारी होंगी। झारखंड में गजेंद्र पटेल को प्रभारी बनाया गया है, जबकि सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह सह-प्रभारी होंगे।

    पश्चिम बंगाल और तेलंगाना का प्रभार सुनील बंसल को दिया गया है। पश्चिम बंगाल में लाल सिंह आर्य, राजेंद्र सिंह और पिंकी कुशवाहा सह-प्रभारी होंगे। तेलंगाना में अभय पाटिल और रेखा शर्मा को सह-प्रभारी बनाया गया है। असम में मंगल पांडे प्रभारी होंगे और फांगनोन कोन्याक सह-प्रभारी होंगी।

    मणिपुर की जिम्मेदारी डॉ. राजदीप रॉय को दी गई है। मेघालय में कनाद पुरकायस्थ प्रभारी और डॉ. नुमल मोमिन सह-प्रभारी होंगे। मिजोरम में डॉ. भगवत कराड़ और नगालैंड में अनिल एंटनी को प्रभारी बनाया गया है। गोवा में डॉ. भारती प्रवीण पवार प्रभारी और अनिल एंटनी सह-प्रभारी होंगे।

    इसके अलावा आंध्र प्रदेश, केरल, ओडिशा, पुडुचेरी, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और त्रिपुरा समेत अन्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में भी प्रभारी और सह-प्रभारियों की नई जिम्मेदारियां तय की गई हैं। सभी नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू की गई हैं।

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    नई दिल्ली । मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में 23 सितंबर को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। 2023 में बनाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही दो सदस्यीय पीठ के दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही। इसके बाद मामले को बड़ी पीठ के सामने भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग की गई है। याचिकाओं में 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नई चयन व्यवस्था निर्धारित की गई है।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की राय में अंतर सामने आया। दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण यह तय किया गया कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बड़ी पीठ विचार करेगी।

    कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक दलील दी गई, जिसमें इस व्यवस्था की तुलना जजों द्वारा जजों की नियुक्ति से की गई। इस तर्क पर न्यायमूर्ति दत्ता ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह की दलील को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना जरूरी है।

    न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि याचिकाओं पर पांच दिनों से अधिक समय तक सुनवाई हुई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों न्यायाधीश एकमत होकर फैसला देते तो संस्थागत एकता को मजबूती मिलती, लेकिन इस मामले में दोनों की राय अलग रही। उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार शासन कानून के अधीन होता है और कानून से ऊपर नहीं।

    वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की बातों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद है और इसका निर्णय बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए। दोनों न्यायाधीशों की अलग राय सामने आने के बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि 2023 में बनाए गए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून से जुड़ी है। इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सिफारिश पर की जाती थी। अगस्त 2023 में नई व्यवस्था से संबंधित विधेयक पेश किया गया। इसमें नियुक्ति से जुड़ी समिति की संरचना में बदलाव किया गया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया।

    दिसंबर 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और उसी महीने इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद जनवरी 2024 में जया ठाकुर ने नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस समय अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

    मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों की नई नियुक्तियों को रोकने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई थी, लेकिन उस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नए चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।

    अब दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद इस मामले का अगला चरण बड़ी पीठ के सामने होगा। बड़ी पीठ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून और उसके संवैधानिक पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

  • अखिलेश यादव का चुनाव आयोग पर हमला, बोले- यूपी चुनाव 2027 ज्ञानेश कुमार की देखरेख में न हों

    अखिलेश यादव का चुनाव आयोग पर हमला, बोले- यूपी चुनाव 2027 ज्ञानेश कुमार की देखरेख में न हों


    लखनऊ। चुनाव आयोग में कथित तौर पर सामने आई अंदरूनी असहमति की रिपोर्ट के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की देखरेख में नहीं कराए जाएं। अखिलेश ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग का मौजूदा रवैया लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    दरअसल, द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

    अखिलेश बोले- यूपी चुनाव की निगरानी पर उठ रहे सवाल
    अखिलेश यादव ने कहा कि जब आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं तो आगामी यूपी विधानसभा चुनाव की निगरानी को लेकर भी सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि 2027 का विधानसभा चुनाव ऐसे माहौल में नहीं होना चाहिए, जहां चुनाव आयोग की भूमिका पर ही राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हों।

    उन्होंने 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव का भी जिक्र किया। अखिलेश का आरोप है कि जिन इलाकों में समाजवादी पार्टी के समर्थक मतदाता थे, वहां वोटर लिस्ट से नाम हटाए गए। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस संबंध में एफिडेविट के साथ शिकायत भी की थी, लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।

    उपचुनावों को लेकर भी लगाए आरोप
    सपा अध्यक्ष ने यूपी में हुए उपचुनावों का जिक्र करते हुए भी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि इन चुनावों के दौरान भी उनकी पार्टी ने अनियमितताओं की शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

    अखिलेश ने दावा किया कि कुछ लोगों के हस्ताक्षर तक बनाए गए और उनके आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे गए। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी गंभीर शिकायतों के बावजूद किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

    ‘सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहा आयोग’
    अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर सत्ता के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं, ताकि सत्ता में बैठे लोगों का प्रभाव बना रहे। उनके मुताबिक, यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है और आने वाले समय में जनता भी इसका जवाब देगी। अखिलेश ने कहा कि यूपी के चुनाव और उपचुनाव में पार्टी ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।

    आयोग ने रिपोर्ट पर दिया अलग पक्ष
    इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग के सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आए मतभेद के दावे को खारिज किया है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

    वहीं, रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

  • ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    नई दिल्ली ।मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर कथित मतभेद सामने आने के बाद कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों को पर्याप्त जानकारी दिए बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।

    सिंघवी ने आरोप लगाया कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर देश को भ्रमित करने का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने दिल्ली और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग भी उठाई।

    कांग्रेस नेता ने Form 6 में किए गए बदलाव का मुद्दा भी उठाया। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामने आई जानकारी के अनुसार, इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

    इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों पर अपनी चिंताएं सामने रखीं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मामलों को लेकर 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील और चुनावी डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल थे।

    मतदाता सूची से संबंधित डिजिटल व्यवस्था और अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में यह चिंता सामने आई कि मतदाता डेटा और उससे जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विकेंद्रीकृत है।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों ने भी विवाद को और बढ़ाया है। वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने से संबंधित मामलों में अपील की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे मामलों की संख्या 38 लाख से अधिक बताई गई है।

    सिंघवी ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। उनके मुताबिक, महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका और सहमति का महत्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

    दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से एक व्यक्ति के नियंत्रण में संस्था के काम करने के आरोपों को खारिज किया गया है। आयोग के पक्ष के अनुसार, महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं और SIR से संबंधित निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार किए गए हैं।

    इस पूरे विवाद का केंद्र मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था बनी हुई है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि आयोग की ओर से निर्णय प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया गया है।

  • मायावती ने भतीजे ईशान आनंद को बनाया बसपा का राष्ट्रीय संयोजक, लखनऊ की बैठक में किया ऐलान

    मायावती ने भतीजे ईशान आनंद को बनाया बसपा का राष्ट्रीय संयोजक, लखनऊ की बैठक में किया ऐलान


    लखनऊ।
    बहुजन समाज पार्टी में संगठन स्तर पर एक और बड़ा बदलाव हुआ है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने बुधवार को लखनऊ में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपने छोटे भतीजे ईशान आनंद को राष्ट्रीय संयोजक बनाने का ऐलान किया। बैठक में ईशान आनंद ने मायावती के पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लिया।

    ईशान आनंद को यह जिम्मेदारी उनके बड़े भाई आकाश आनंद को पार्टी की सभी जिम्मेदारियों से हटाए जाने के बाद मिली है। मायावती ने कुछ दिन पहले ही ईशान आनंद को पार्टी में सम्मानजनक जिम्मेदारी देने की बात कही थी। इसके बाद से ही उनकी नई भूमिका को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं। बुधवार को बैठक में इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त करने की घोषणा कर दी।

    संगठन और चुनावी तैयारियों पर हुआ मंथन

    लखनऊ में आयोजित इस बैठक में बसपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ सभी राज्यों के पार्टी अध्यक्ष भी शामिल हुए। बैठक में संगठन को मजबूत करने के साथ आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा हुई। मायावती ने चुनाव की जमीनी तैयारियों और प्रत्याशियों के चयन को लेकर भी पार्टी नेताओं से जानकारी ली।

    इसके अलावा विभिन्न राज्यों में संगठन से जुड़े कामकाज की प्रगति रिपोर्ट भी ली गई। राज्यों से मिली रिपोर्ट के आधार पर संगठन को लेकर आगे की रणनीति और आवश्यक दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे। बैठक में मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर भी पार्टी पदाधिकारियों से चर्चा की गई और उन्हें संगठनात्मक स्तर पर काम करने के निर्देश दिए गए।

    ईशान को मिली अहम जिम्मेदारी

    ईशान आनंद, मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे हैं। उन्होंने एलएलएम और कानून की पढ़ाई की है। हाल के दिनों में बसपा के भीतर हुए संगठनात्मक बदलावों के बीच उनका नाम लगातार चर्चा में था। मायावती ने पहले ही संकेत दिया था कि वह ईशान को पार्टी में आगे बढ़ाएंगी। अब उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी देकर संगठन में उनकी भूमिका औपचारिक रूप से तय कर दी गई है।

    पार्टी की बैठक के दौरान ईशान आनंद के नई जिम्मेदारी संभालने को लेकर कार्यकर्ताओं और समर्थकों में उत्साह भी देखने को मिला। बसपा अब आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर तैयारियां तेज करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

  • IIT बॉम्बे ने प्रोफेसर डूला को छुट्टी पर भेजा, साहिल केस की जांच के लिए 10 सदस्यीय समिति गठित

    IIT बॉम्बे ने प्रोफेसर डूला को छुट्टी पर भेजा, साहिल केस की जांच के लिए 10 सदस्यीय समिति गठित

    नई दिल्ली ।आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वोकाडे की मौत का मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। मामले की निष्पक्ष जांच के लिए संस्थान ने 10 सदस्यों वाली एक समिति गठित की है। समिति को मामले से जुड़े सभी पहलुओं की जांच करने और एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।

    इसी के साथ संस्थान ने मामले में नामजद प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को जांच पूरी होने तक छुट्टी पर भेज दिया है। यह कदम जांच प्रक्रिया के दौरान निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    साहिल वोकाडे की मौत को लेकर उनके परिवार की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। साहिल के पिता रवींद्र वोकाडे और उनकी मां सोनाली वोकाडे मंगलवार को मुंबई क्राइम ब्रांच पहुंचे। परिवार ने मामले में नामजद फैकल्टी सदस्यों प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला और शिरीष केदारे की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की।

    साहिल के पिता का कहना है कि मामले में सिर्फ आंतरिक समिति बनाना पर्याप्त नहीं है। परिवार ने आरोपों में नामजद लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। परिवार की ओर से यह भी कहा गया है कि उन्हें निष्पक्ष जांच और अपने बेटे के मामले में न्याय चाहिए।

    परिवार ने आगे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की बात भी कही है। इससे मामले को लेकर संस्थान और परिवार के बीच विवाद का एक और पहलू सामने आया है।

    जानकारी के मुताबिक साहिल वोकाडे 18 सितंबर की शाम हॉस्टल के अपने कमरे में फंदे से लटके मिले थे। घटना के बाद मामले की जांच मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपी गई। पुलिस की जांच के साथ-साथ संस्थान ने भी अपने स्तर पर घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों की पड़ताल शुरू की है।

    इस मामले में संस्थान की ओर से 19 सितंबर को कहा गया था कि मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान साहिल को मोबाइल फोन के जरिए नकल करते हुए पकड़ा गया था। इसके बाद से ही साहिल की मौत से जुड़े घटनाक्रम और संस्थान में उसके साथ हुई घटनाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

    साहिल के पिता ने इससे पहले दोनों नामजद प्रोफेसरों के इस्तीफे की मांग भी की थी। अब परिवार की ओर से उनकी गिरफ्तारी की मांग किए जाने के बाद मामला और संवेदनशील हो गया है।

    दूसरी ओर, 10 सदस्यीय समिति को पूरे घटनाक्रम की आंतरिक जांच की जिम्मेदारी दी गई है। समिति मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करेगी और अपनी रिपोर्ट निर्धारित समय सीमा के भीतर संस्थान को सौंपेगी।

    प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को जांच पूरी होने तक छुट्टी पर भेजे जाने का फैसला भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। अब मामले में पुलिस जांच और संस्थान की आंतरिक जांच दोनों के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।

    फिलहाल साहिल वोकाडे की मौत के मामले में परिवार की ओर से गिरफ्तारी की मांग की जा रही है, जबकि संस्थान ने जांच के लिए समिति गठित कर दी है। मामले की जांच आगे बढ़ने के साथ ही आरोपों और घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • यूपी विधान परिषद में सपा का नेतृत्व बदला, मो. जासमीर अंसारी होंगे नेता प्रतिपक्ष, अखिलेश यादव ने दी मंजूरी

    यूपी विधान परिषद में सपा का नेतृत्व बदला, मो. जासमीर अंसारी होंगे नेता प्रतिपक्ष, अखिलेश यादव ने दी मंजूरी

    लखनऊ। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश विधान परिषद में अपने नेतृत्व में बदलाव किया गया है। पार्टी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मो. जासमीर अंसारी को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने को मंजूरी दे दी है। जासमीर अंसारी मौजूदा नेता प्रतिपक्ष लाल बिहारी यादव की जगह जिम्मेदारी संभालेंगे।

    जासमीर अंसारी मूल रूप से सीतापुर के रहने वाले हैं। वह वर्तमान में विधान परिषद में सपा के उपनेता की भूमिका में हैं। विधान परिषद की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उन्हें सपा के उपनेता के तौर पर दर्ज किया गया है।

    पार्टी के इस फैसले के बाद विधान परिषद में सपा के नेतृत्व की जिम्मेदारी जासमीर अंसारी के पास आने की बात कही जा रही है। उनके नाम पर अखिलेश यादव की मंजूरी के बाद अब औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है।

    जासमीर अंसारी को नई जिम्मेदारी दिए जाने की खबर से सपा कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है। पार्टी के भीतर इसे आगामी राजनीतिक परिस्थितियों और संगठनात्मक रणनीति में बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

  • मेघालय में अचानक बदला सियासी गणित, UDP के 8 विधायक बीजेपी में शामिल, विधानसभा में अब इतनी हुई ताकत

    मेघालय में अचानक बदला सियासी गणित, UDP के 8 विधायक बीजेपी में शामिल, विधानसभा में अब इतनी हुई ताकत

    नई दिल्ली ।मेघालय की राजनीति में बुधवार को बड़ा बदलाव हुआ है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी यानी UDP के 12 में से आठ विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान इन विधायकों ने औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। इस घटनाक्रम के बाद 60 सदस्यीय मेघालय विधानसभा में बीजेपी की संख्या दो से बढ़कर 10 हो गई है।

    बीजेपी में शामिल होने वाले आठ विधायकों का नेतृत्व खलीह्रियात से विधायक किर्मेन श्याला कर रहे थे। इन विधायकों के पार्टी बदलने की चर्चा पिछले कुछ दिनों से चल रही थी। इससे पहले UDP के पूर्व विधायक डॉ. जेमिनो मावथोह भी 12 सितंबर को बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।

    आठ विधायकों के बीजेपी में जाने के बाद विधानसभा के मौजूदा राजनीतिक समीकरण में बदलाव आया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, UDP के पास अब चार विधायक रह गए हैं, जबकि बीजेपी के सदस्यों की संख्या बढ़कर 10 हो गई है।

    बीजेपी में शामिल होने से पहले इन विधायकों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। बातचीत के दौरान मेघालय से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। इनमें कोयला खनन से संबंधित विषय और खासी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग प्रमुख रही।

    विधायकों की ओर से मेघालय के कुछ अन्य स्थानीय मुद्दे भी केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखे गए थे। खासी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने की मांग राज्य में लंबे समय से उठती रही है। विधायकों ने इन मुद्दों पर आगे कार्रवाई को लेकर आश्वासन मिलने की बात कही थी।

    नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा की मौजूदगी में आठों विधायकों के पार्टी में शामिल होने की औपचारिक घोषणा हुई। इस मौके पर रिजिजू ने सभी नए सदस्यों का स्वागत किया और इसे पूर्वोत्तर तथा देश की राजनीति से जुड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम बताया।

    रिजिजू ने कहा कि इन विधायकों ने पिछले 12 वर्षों के दौरान पूर्वोत्तर में हुए बदलाव और विकास कार्यों को देखा है। उनके अनुसार, केंद्र सरकार की नीतियों और पूर्वोत्तर के विकास को लेकर किए गए कामों से प्रभावित होकर इन विधायकों ने बीजेपी के साथ जुड़ने का फैसला किया है।

    उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर में हुए विकास कार्यों और क्षेत्र के लोगों के साथ संपर्क को भी इस बदलाव से जोड़कर बताया। बीजेपी का कहना है कि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे, विकास योजनाओं और केंद्र की नीतियों का असर राजनीतिक स्तर पर भी दिखाई दे रहा है।

    आठ विधायकों के बीजेपी में शामिल होने का घटनाक्रम 2028 में होने वाले मेघालय विधानसभा चुनाव से पहले सामने आया है। इस बदलाव से राज्य विधानसभा में दलों की संख्या और राजनीतिक ताकत का समीकरण बदला है।

    किर्मेन श्याला सहित इन विधायकों की बीजेपी में एंट्री के बाद पार्टी अब मेघालय विधानसभा में 10 सदस्यों के साथ पहले की तुलना में मजबूत स्थिति में है। वहीं UDP के 12 में से आठ विधायकों के अलग होने से क्षेत्रीय दल के सामने अपनी विधानसभा स्थिति को लेकर नई चुनौती खड़ी हुई है।

    यह घटनाक्रम मेघालय की आगामी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब राज्य में 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी से जुड़े राजनीतिक समीकरण धीरे-धीरे आकार ले रहे हैं।

  • SIR विवाद में 14 आपत्तियों का दावा सामने आने के बाद बढ़ी हलचल, मतदाता सूची और आयोग की प्रक्रिया पर सवाल

    SIR विवाद में 14 आपत्तियों का दावा सामने आने के बाद बढ़ी हलचल, मतदाता सूची और आयोग की प्रक्रिया पर सवाल


    नई दिल्ली ।
    स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी इस प्रक्रिया में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा शामिल करने के साथ चुनावी डेटा के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे हैं। इसी बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, चुनावी डेटा तक पहुंच तथा डिजिटल सिस्टम से जुड़े फैसले शामिल हैं। दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में फैसलों और आदेशों की जानकारी उन्हें नहीं होने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल भी उठाए।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 में किया गया बदलाव है। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में SIR से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी शामिल की गई। आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई कि उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं।

    विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि वैधानिक फॉर्म में इस तरह का परिवर्तन करने के लिए नियमों में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। दोनों आयुक्तों की ओर से कुछ बदलावों और प्रक्रियाओं पर असहमति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

    मतदाता डेटा के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में चुनावी रोल से जुड़े डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच और रिकॉर्ड में बदलाव करने की व्यवस्था पर चिंता जताई गई। अधिकारियों की वैधानिक भूमिका और तकनीकी सिस्टम के बीच अधिकारों को लेकर भी सवाल सामने आए।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में दाखिल अपीलों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई। सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया कि मतदाता सूची से संबंधित मामलों में अपील दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इस प्रक्रिया की जानकारी संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं थी।

    गोवा में तकनीकी समस्या से जुड़ा एक मामला भी सामने आया। सॉफ्टवेयर से संबंधित परेशानी के कारण 97 ऐसे मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए, जिन्हें संबंधित प्रक्रिया के तहत पात्र माना गया था। इस घटनाक्रम ने चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी चर्चा बढ़ाई।

    इसी बीच अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए SIR को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बड़े स्तर पर मतदाता सूची से नाम हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव कराने के बजाय चुनाव की स्क्रिप्ट तैयार की जा रही है। इन दावों को राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

    आशुतोष रांका ने भी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, आयोग की ओर से कहा गया है कि SIR समेत सभी प्रमुख फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और निर्णयों पर सहमति थी। आयोग ने अंदरूनी असहमति की उस तस्वीर को स्वीकार नहीं किया है जो आपत्तियों के आधार पर चर्चा में आई है।

    इस तरह SIR विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है। फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटा की व्यवस्था, अधिकारियों की पहुंच और निर्णय लेने की प्रक्रिया भी बहस के केंद्र में आ गई है। एक तरफ दो आयुक्तों की आपत्तियां चर्चा में हैं, जबकि दूसरी तरफ आयोग सभी प्रमुख फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।

  • SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    नई दिल्ली । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों ने राजनीतिक विवाद को तेज कर दिया है। सामने आई जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज की। इनमें Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR से जुड़े फैसलों सहित कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

    विपक्षी दलों ने इन जानकारियों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने SIR और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वोट चोरी भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला है। उन्होंने इस मामले में न्याय मिलने की बात भी कही।

    तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव लाने की मांग की। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के फैसले अकेले कैसे लिए जा सकते हैं। वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पर गंभीरता से विचार करने की मांग की।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा Form-6 में किया गया बदलाव है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें SIR से संबंधित एक अतिरिक्त सवाल शामिल किया गया था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

    मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और उसके सॉफ्टवेयर के नियंत्रण को लेकर भी चिंता सामने आई है। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी है, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पूरी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाया गया।

    SIR से जुड़ी अपील प्रक्रिया और कुछ राज्यों में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन घटनाक्रमों के बीच चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर सामने आए मतभेद के दावों को अलग तरीके से स्पष्ट किया है। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं।

    चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला किए जाने का प्रावधान है। ऐसे में SIR को लेकर सामने आई आपत्तियों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच विवाद का केंद्र चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता बन गया है।