Category: National

  • प्रयागराज मेट्रो को मिलेगी रफ्तार, 12 हजार करोड़ की परियोजना का दिसंबर तक शिलान्यास संभव

    प्रयागराज मेट्रो को मिलेगी रफ्तार, 12 हजार करोड़ की परियोजना का दिसंबर तक शिलान्यास संभव


    प्रयागराज। प्रयागराज में मेट्रो रेल परियोजना को जल्द धरातल पर उतारने की तैयारी तेज हो गई है। करीब 12 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने का काम अंतिम चरण में है। प्रयागराज विकास प्राधिकरण (पीडीए) ने राइट्स (RITES) को 14 अगस्त तक डीपीआर सौंपने के निर्देश दिए हैं। यदि सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी हो गईं, तो वर्ष के अंत तक परियोजना का शिलान्यास किया जा सकता है।

    पीडीए के अधिकारियों के अनुसार, डीपीआर मिलने के बाद अगस्त में ही प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा जाएगा। प्रदेश कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे केंद्र सरकार के पास अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा। चुनावी वर्ष को देखते हुए इस परियोजना को तय समय पर शुरू कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

    दो कॉरिडोर और 40 स्टेशन होंगे
    प्रस्तावित योजना के तहत प्रयागराज में दो प्रमुख मेट्रो कॉरिडोर विकसित किए जाएंगे। पहला ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर प्रयागराज एयरपोर्ट से झूंसी स्थित सिटी लेक फॉरेस्ट तक जाएगा, जबकि दूसरा नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर फाफामऊ के शांतिपुरम कॉलोनी से नैनी तक संचालित होगा। दोनों कॉरिडोर पर कुल 40 मेट्रो स्टेशन बनाए जाने का प्रस्ताव है। परेड मैदान को इंटरचेंज जंक्शन बनाया जाएगा, जहां से यात्रियों को चारों दिशाओं में मेट्रो की सुविधा मिलेगी। परियोजना के तहत झूंसी और नैनी में 20-20 हेक्टेयर भूमि पर मेट्रो डिपो भी विकसित किए जाएंगे।

    महाकुंभ और शहर की यातायात व्यवस्था को मिलेगा लाभ
    मेट्रो सेवा शुरू होने के बाद महाकुंभ और माघ मेले में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को संगम और शहर के प्रमुख इलाकों तक तेज और सुगम आवागमन की सुविधा मिलेगी। परेड इंटरचेंज से झूंसी, फाफामऊ, बमरौली और नैनी की ओर सीधी मेट्रो सेवा उपलब्ध होगी। संगम क्षेत्र में भी मेट्रो स्टेशन प्रस्तावित है।

    तीन से आठ कोच वाली मेट्रो का प्रस्ताव
    पीडीए के उपाध्यक्ष ऋषि राज ने बताया कि प्रयागराज के लिए तीन से आठ कोच वाली फुल मेट्रो ट्रेन की योजना पर डीपीआर तैयार की जा रही है। राइट्स को 14 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपने का लक्ष्य दिया गया है। उन्होंने कहा कि सभी प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रियाएं जल्द पूरी करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि परियोजना निर्धारित समय पर शुरू हो सके।

  • मेरठ दक्षिण सीट पर सपा में टिकट की जंग तेज, कई दावेदारों के बीच किस पर लगेगी मुहर?

    मेरठ दक्षिण सीट पर सपा में टिकट की जंग तेज, कई दावेदारों के बीच किस पर लगेगी मुहर?


    मेरठ। मेरठ दक्षिण विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के लिए इस बार सबसे चुनौतीपूर्ण सीटों में शामिल हो गई है। जिले की सात विधानसभा सीटों में सबसे अधिक टिकट दावेदार इसी सीट से सामने आए हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसा उम्मीदवार चुनने की है, जो संगठन और चुनावी समीकरण-दोनों पर खरा उतर सके। टिकट की दौड़ में शामिल नेता लगातार लखनऊ का रुख कर रहे हैं और अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। इससे पार्टी के भीतर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।

    इन नेताओं के नाम सबसे आगे
    मेरठ दक्षिण से टिकट के प्रमुख दावेदारों में सपा महानगर अध्यक्ष आदिल चौधरी का नाम सबसे प्रमुख माना जा रहा है। वह इस सीट से दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी सोमेंद्र तोमर को कड़ी टक्कर दी थी। उस चुनाव में आदिल को 1,21,725 वोट मिले थे और वे केवल 7,942 मतों से चुनाव हारे थे।

    इसके अलावा जिलाध्यक्ष कर्मवीर सिंह गुमी, डॉ. किशन पाल गुर्जर, मुखिया गुर्जर और जितेंद्र गुर्जर भी टिकट के लिए प्रयासरत बताए जा रहे हैं। वहीं, यदि पूर्व विधायक योगेश वर्मा को हस्तिनापुर सीट से टिकट नहीं मिलता है, तो मेरठ दक्षिण से उनकी दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है।

    गठबंधन की स्थिति भी बनेगी अहम
    राजनीतिक चर्चाओं के बीच कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के संभावित गठबंधन की भी चर्चा है। यदि गठबंधन होता है तो कांग्रेस भी इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश कर सकती है। हाल ही में पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना की मौजूदगी को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

    गुटबाजी का खतरा भी बरकरार
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टिकट के लिए बड़ी संख्या में दावेदार होना संगठन की मजबूती का संकेत जरूर है, लेकिन इससे अंदरूनी खींचतान और गुटबाजी का खतरा भी बढ़ सकता है। यदि टिकट वितरण के बाद असंतोष उभरता है तो चुनावी मुकाबले में इसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।

    किसके पक्ष में जा सकते हैं समीकरण?
    जानकारों के मुताबिक, टिकट उसी उम्मीदवार को मिलने की संभावना अधिक है, जो जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ संगठन में भी मजबूत पकड़ रखता हो। मेरठ दक्षिण में मुस्लिम, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के मतदाता चुनाव परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    इसी वजह से ऐसे चेहरे को प्राथमिकता मिल सकती है, जो विभिन्न वर्गों में स्वीकार्यता रखता हो, संगठन के भीतर मजबूत समर्थन हो और विवादों से दूर रहा हो। मौजूदा चर्चाओं में आदिल चौधरी और योगेश वर्मा को मजबूत दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है, हालांकि अंतिम फैसला पार्टी हाईकमान के हाथ में है।

  • अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    अखिलेश के CM बनने की कामना, 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल निकले बॉबी यादव

    गाजियाबाद। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने की मनोकामना को लेकर रेसलिंग खिलाड़ी बॉबी यादव हरिद्वार से 201 लीटर गंगाजल की कांवड़ लेकर पैदल यात्रा पर निकले हैं। शुक्रवार को वह अपने साथियों के साथ मुरादनगर पहुंचे, जहां कांवड़ियों ने स्थानीय थाने में विश्राम किया और उनका स्वागत किया गया।

    नोएडा के सर्फाबाद निवासी बॉबी यादव ने बताया कि उन्होंने एक जुलाई को अखिलेश यादव के जन्मदिन के अवसर पर हरिद्वार से गंगाजल उठाया था। उन्होंने विशेष संकल्प के साथ यह कांवड़ यात्रा शुरू की है और पैदल चलते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं।

    साथियों के साथ जारी है यात्रा
    बॉबी यादव के साथ इस यात्रा में रिंकू, मोनू, हर्ष, राज, लविश समेत कई साथी भी शामिल हैं। यात्रा के दौरान यह दल विभिन्न स्थानों पर पड़ाव डालते हुए आगे बढ़ रहा है। रास्ते में स्थानीय लोगों और समर्थकों की ओर से उनका स्वागत और सत्कार भी किया जा रहा है।

    आस्था और संकल्प का प्रतीक
    बॉबी यादव का कहना है कि यह कांवड़ यात्रा उनकी धार्मिक आस्था और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। उनका विश्वास है कि भगवान शिव की कृपा से उनकी मनोकामना पूरी होगी और वे इसी भावना के साथ गंगाजल अर्पित करने की यात्रा पूरी कर रहे हैं।
  • हॉलीवुड फिल्मों में नया बेंचमार्क बना 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे', दूसरे दिन भी भारत में शानदार कमाई का सिलसिला जारी

    हॉलीवुड फिल्मों में नया बेंचमार्क बना 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे', दूसरे दिन भी भारत में शानदार कमाई का सिलसिला जारी

    नई दिल्ली । मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ भारत में रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाका कर रही है। फिल्म ने पहले दिन शानदार कमाई के साथ हॉलीवुड फिल्मों के लिए नया रिकॉर्ड बनाया और दूसरे दिन भी इसकी रफ्तार कम होती नजर नहीं आ रही है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक फिल्म ने रिलीज के दूसरे दिन दोपहर तक ही 70 करोड़ रुपये से अधिक का कुल कलेक्शन दर्ज कर लिया है।

    टॉम हॉलैंड स्टारर इस फिल्म को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। पहले दिन बड़ी संख्या में दर्शकों के सिनेमाघरों तक पहुंचने के बाद दूसरे दिन भी कई शहरों में फिल्म के शो हाउसफुल नजर आए। फिल्म की एडवांस बुकिंग और दर्शकों की प्रतिक्रिया ने इसकी मजबूत शुरुआत में अहम भूमिका निभाई है।

    ‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ ने अपने पहले दिन भारत में करीब 60.60 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन किया। इसके साथ ही फिल्म ने भारत में सबसे बड़ी हॉलीवुड ओपनिंग का नया रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। फिल्म का शुरुआती ग्रॉस कलेक्शन भी 70 करोड़ रुपये से अधिक रहा, जिसने इसे भारतीय बाजार में हॉलीवुड फिल्मों की सूची में सबसे ऊपर पहुंचा दिया।

    फिल्म की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने पहले दिन करीब 72 प्रतिशत से ज्यादा ऑक्यूपेंसी दर्ज की। अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्म को दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला। हिंदी वर्जन ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी संख्या में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा है।

    दूसरे दिन भी फिल्म की कमाई का सिलसिला जारी रहा। शुरुआती रुझानों के अनुसार दोपहर तक फिल्म ने करीब 10 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली थी। इसके साथ ही फिल्म का दो दिनों का कुल कलेक्शन 70 करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया। माना जा रहा है कि दिन खत्म होने तक फिल्म की कमाई में और बढ़ोतरी हो सकती है।

    इस फिल्म ने हॉलीवुड की सबसे सफल फिल्मों में शामिल ‘एवेंजर्स: एंडगेम’ के शुरुआती रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। इससे पहले भारत में सबसे बड़ी हॉलीवुड ओपनिंग का रिकॉर्ड ‘एवेंजर्स: एंडगेम’ के नाम था। लेकिन ‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ ने अपनी दमदार शुरुआत के साथ नया इतिहास बना दिया है।

    फिल्म की सफलता के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। मार्वल फ्रेंचाइजी की लोकप्रियता, स्पाइडर-मैन किरदार के प्रति दर्शकों का लगाव और बड़े पैमाने पर किए गए प्रचार ने फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़ाई है। युवा दर्शकों के साथ-साथ परिवारों में भी इस फिल्म को लेकर काफी क्रेज देखा जा रहा है।

    भारतीय बॉक्स ऑफिस पर हॉलीवुड फिल्मों की बढ़ती पकड़ के बीच ‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ की सफलता एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। फिल्म की मौजूदा रफ्तार को देखते हुए आने वाले दिनों में इसके कई और रिकॉर्ड बनाने की संभावना जताई जा रही है। अगर फिल्म इसी तरह दर्शकों को आकर्षित करती रही तो यह भारत में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हॉलीवुड फिल्मों की सूची में एक नया स्थान बना सकती है।

  • चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    नई दिल्ली । मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच महत्वपूर्ण बहस हुई। केंद्र सरकार ने चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार के प्रतिनिधियों पर विश्वास किया जाना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर भरोसे या अविश्वास का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया में न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का है।

    केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी को लेकर संदेह करना उचित नहीं है। सरकार ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य किसी गलत उद्देश्य से काम करेंगे। केंद्र का तर्क था कि चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना संसद की समझ और उसके बनाए कानून पर भी सवाल खड़ा करता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर सवाल उठाना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे जनता के बीच निष्पक्षता और स्वतंत्रता का भरोसा कायम रहे। कोर्ट ने कहा कि चर्चा किसी व्यक्ति विशेष के विश्वास की नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था में निष्पक्षता दिखाई देने की है।

    केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किए जाने के तर्क पर भी सवाल उठाया। सरकार ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर अन्य संवैधानिक नियुक्तियों में भी बाहरी व्यक्तियों या पूर्व न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग उठ सकती है।

    वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2023 में बनाए गए कानून ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पुराने फैसले के प्रभाव को बदल दिया है। संविधान पीठ ने अपने एक फैसले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था सुझाई थी।

    इसके बाद संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया। याचिकाओं में इसी बदलाव को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।

    चुनाव आयोग देश में चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसके प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर होने वाली बहस का संबंध केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता के विश्वास से भी जुड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। अब आगे की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया संवैधानिक सिद्धांतों और निष्पक्ष व्यवस्था के अनुरूप है या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर संसद परिसर में विपक्षी दलों ने अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी सांसदों ने नाटक के माध्यम से कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। इस दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव साधु के वेश में दिखाई दिए, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसद प्रदर्शन में शामिल हुए।

    प्रदर्शन के दौरान संसद परिसर में एक प्रतीकात्मक दान पेटी रखी गई थी। विपक्षी नेताओं ने नाटक के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की। इस दौरान राहुल गांधी सहित अन्य सांसद दान पेटी में चढ़ावा डालते हुए नजर आए। वहीं, प्रदर्शन के एक हिस्से में पप्पू यादव साधु के रूप में दान पेटी लेकर जाते हुए दिखाई दिए, जिसके बाद अन्य सांसदों ने उन्हें रोकने और विरोध जताने का अभिनय किया।

    विपक्षी सांसदों ने इस प्रदर्शन के जरिए सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की। नेताओं का कहना था कि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं और संसद के भीतर तथा बाहर जनता से जुड़े मामलों को उठाते रहेंगे। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी भी की।

    प्रदर्शन में राम मंदिर चढ़ावा विवाद के साथ-साथ अन्य मुद्दों को भी जोड़ा गया। विपक्षी सांसदों ने पेपर लीक जैसे मामलों का भी जिक्र करते हुए सरकार से जवाब मांगने की बात कही। प्रदर्शन के दौरान लगाए गए नारों में चढ़ावा चोरी और पेपर चोरी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि संसद और उसके परिसर की गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने सदस्यों को सलाह दी कि संसद परिसर में ऐसे तरीके अपनाने से बचना चाहिए, जिससे सदन की मर्यादा प्रभावित हो।

    लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों से संसदीय परंपराओं और नियमों का पालन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतांत्रिक बहस और चर्चा का स्थान है, इसलिए विरोध दर्ज कराने के दौरान भी गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

    घटना के बाद संसद की कार्यवाही कुछ समय के लिए स्थगित भी हुई। हालांकि विपक्षी नेताओं ने अपने प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए कहा कि वह जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते रहेंगे।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार, संसद सत्र के दौरान विपक्ष अक्सर अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता है। इस बार राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर किए गए प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।

    वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से संसदीय गरिमा और विरोध के तरीकों को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की बहस और राजनीतिक बयानबाजी में चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    नई दिल्ली । देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई है। राज्यसभा में लंबी चर्चा के बाद विधेयक पारित किया गया। अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून के रूप में लागू हो जाएगा।

    नए कानून में परीक्षा से जुड़े पेपर लीक और अन्य गंभीर अनियमितताओं पर सख्ती बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दोषी पाए जाने वाले लोगों को 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करना और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।

    विधेयक पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश जारी कर इसे परीक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने और परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक जैसी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का संदेश दिया।

    हालांकि, प्रधानमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार और प्रधानमंत्री पर टिप्पणी करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने परीक्षा व्यवस्था और कानून की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठाए।

    राज्यसभा में इस विधेयक पर करीब सात घंटे तक चर्चा हुई। चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठाए। कुछ दलों ने संशोधन प्रस्ताव भी पेश किए, जिन्हें सदन में मंजूरी नहीं मिली।

    केंद्रीय कार्मिक मामलों के मंत्री जितेंद्र सिंह ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि सरकार पेपर लीक जैसी घटनाओं को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि यह कानून परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

    राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) को लेकर उठाए गए सवालों पर सरकार ने कहा कि देश में पेपर लीक के ज्यादातर मामले राज्य स्तरीय भर्ती और परीक्षा एजेंसियों से जुड़े रहे हैं। सरकार के अनुसार, परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए तकनीक के इस्तेमाल, सुरक्षा मानकों और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा रहा है।

    इस संशोधन विधेयक के जरिए वर्ष 2024 में बनाए गए कानून को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है। इसमें पेपर लीक, परीक्षा में धोखाधड़ी और संगठित तरीके से गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान शामिल है। साथ ही मामलों की तेजी से जांच और सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया गया है।

    पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से छात्रों और अभ्यर्थियों के बीच चिंता का कारण रही हैं। कई बार परीक्षाओं के रद्द होने और परिणामों में देरी से लाखों छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सरकार का दावा है कि नया कानून परीक्षा प्रणाली में भरोसा बढ़ाने और भविष्य में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने में मदद करेगा।

    अब सभी की नजर राष्ट्रपति की मंजूरी पर है। इसके बाद यह कानून लागू होने के साथ ही परीक्षा संबंधी अपराधों पर कार्रवाई के लिए नया कानूनी ढांचा प्रभावी हो जाएगा।

  • नागरिकता को लेकर बहस के बीच सरकार का बड़ा स्पष्टीकरण, भारतीय पासपोर्ट जारी करने के नियमों पर संसद में दी जानकारी

    नागरिकता को लेकर बहस के बीच सरकार का बड़ा स्पष्टीकरण, भारतीय पासपोर्ट जारी करने के नियमों पर संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली । भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है और इसके लिए निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाती है। हालांकि सरकार ने यह भी साफ किया कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया है, बल्कि यह मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला आधिकारिक दस्तावेज है।

    राज्यसभा में भारतीय पासपोर्ट की स्थिति और नागरिकता से जुड़े सवाल उठाए गए थे। इस दौरान सरकार से पूछा गया था कि क्या भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जा सकता है और विदेश की नागरिकता लेने के बाद भारतीय नागरिकता की स्थिति क्या होती है। इसके अलावा नागरिकता कानून से जुड़े कई अन्य विषयों पर भी जानकारी मांगी गई थी।

    सरकार ने जवाब में बताया कि भारतीय पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत जारी किया जाता है। पासपोर्ट जारी करने से पहले आवेदक की पात्रता, दस्तावेजों और अन्य जरूरी जानकारियों का सत्यापन किया जाता है। सरकार के अनुसार, यह प्रक्रिया इसलिए अपनाई जाती है ताकि केवल योग्य भारतीय नागरिकों को ही पासपोर्ट जारी किया जा सके।

    केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट भारत के नागरिकों को विदेश यात्रा की सुविधा देने वाला आधिकारिक दस्तावेज है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को नियंत्रित और व्यवस्थित करना है। हालांकि पासपोर्ट नागरिकता से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है, लेकिन इसे नागरिकता का एकमात्र और अंतिम प्रमाण नहीं बताया गया है।

    सरकार ने यह भी दोहराया कि भारत में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त करता है, तो भारतीय कानूनों के अनुसार उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसका भारतीय पासपोर्ट भी वैध नहीं रहता और उसे संबंधित प्रक्रिया के तहत इसे वापस करना पड़ता है।

    नागरिकता कानून के प्रावधानों के अनुसार विदेशी नागरिकता लेने के बाद किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक दर्जा समाप्त हो सकता है। इसी वजह से पासपोर्ट जारी करने और उसकी वैधता बनाए रखने के लिए नागरिकता की स्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। सरकार ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है।

    पासपोर्ट जारी करने से इनकार करने के मामलों का भी कानून में प्रावधान है। यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि आवेदक भारतीय नागरिक नहीं है या वह निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं करता, तो उसका आवेदन रोका जा सकता है। इसके अलावा सुरक्षा और कानूनी कारणों के आधार पर भी पासपोर्ट जारी करने से इनकार किया जा सकता है।

    सरकार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में नागरिकता, पहचान और दस्तावेजों को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। केंद्र ने अपने जवाब के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि भारतीय पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया नियमों और सत्यापन व्यवस्था के आधार पर होती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पासपोर्ट किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन नागरिकता का निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत होता है। ऐसे में पासपोर्ट और नागरिकता को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद नागरिकता और पासपोर्ट से जुड़े नियमों को लेकर स्थिति और स्पष्ट हुई है।

  • यूएनएससी के शुरुआती पोल में रेबेका ग्रिनस्पैन आगे, महिला महासचिव की मांग के बीच तेज हुई चुनावी प्रक्रिया

    यूएनएससी के शुरुआती पोल में रेबेका ग्रिनस्पैन आगे, महिला महासचिव की मांग के बीच तेज हुई चुनावी प्रक्रिया

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के चुनाव की शुरुआती प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) की महासचिव रेबेका ग्रिनस्पैन ने बढ़त हासिल कर ली है। सुरक्षा परिषद के पहले अनौपचारिक स्ट्रॉ पोल में ग्रिनस्पैन सबसे आगे रहीं, जबकि गुयाना की पूर्व विदेश मंत्री कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट दूसरे स्थान पर रहीं। यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में पहली बार किसी महिला को महासचिव बनाने की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी पकड़ रही है।

    राजनयिक सूत्रों के अनुसार, 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हुए अनौपचारिक मतदान में रेबेका ग्रिनस्पैन को 10 सकारात्मक वोट, एक नकारात्मक वोट और चार तटस्थ वोट मिले। ग्रिनस्पैन कोस्टा रिका की पूर्व उपराष्ट्रपति रह चुकी हैं और वर्तमान में यूएनसीटीएडी की महासचिव के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने अपने अनुभव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों के आधार पर शुरुआती चरण में मजबूत स्थिति बनाई है।

    गुयाना की पूर्व विदेश मंत्री कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट सात उम्मीदवारों में दूसरे स्थान पर रहीं। उन्हें नौ सकारात्मक वोट, दो नकारात्मक वोट और चार तटस्थ वोट मिले। हालांकि सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष जेनॉन मुकोंगो ने आधिकारिक तौर पर मतदान के परिणाम सार्वजनिक नहीं किए, लेकिन राजनयिक सूत्रों के जरिए वोटों की जानकारी सामने आई।

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चुनाव की प्रक्रिया में सुरक्षा परिषद पहले एक उम्मीदवार का चयन करती है, जिसे बाद में महासभा के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। परंपरा के अनुसार महासभा आमतौर पर सुरक्षा परिषद की सिफारिश को स्वीकार कर लेती है। उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और स्थायी सदस्यों की सहमति जांचने के लिए सुरक्षा परिषद में कई दौर के अनौपचारिक स्ट्रॉ पोल आयोजित किए जाते हैं।

    इस प्रक्रिया में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पांच स्थायी सदस्यों की भूमिका बेहद अहम होती है। किसी उम्मीदवार को अंतिम समर्थन हासिल करने के लिए यह जरूरी होता है कि स्थायी सदस्य उसके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल करने की स्थिति में न हों। अंतिम दौर के मतदान में स्थायी सदस्यों के रुख को अलग-अलग रंगों वाले बैलेट के जरिए समझा जाता है।

    इस दौड़ में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी तीसरे स्थान पर रहे। अर्जेंटीना से आने वाले ग्रॉसी को दो नकारात्मक वोट मिले। उन्होंने यूक्रेन के जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र को लेकर रूस की आलोचना की थी और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका से अलग रुख भी अपनाया था। इसके अलावा चिली की पूर्व राष्ट्रपति और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट भी प्रमुख उम्मीदवारों में शामिल हैं। उन्हें पांच नकारात्मक वोट मिले।

    सेनेगल के पूर्व राष्ट्रपति मैकी सैल और संयुक्त राष्ट्र महासभा की पूर्व अध्यक्ष मारिया फर्नांडा एस्पिनोसा भी इस दौड़ में शामिल हैं। एस्पिनोसा को केवल दो नकारात्मक वोट मिले, जबकि कई देशों ने उनके पक्ष में कोई स्पष्ट राय नहीं दी, जिससे उनके पास आगे समर्थन जुटाने का अवसर बना हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रेबेका ग्रिनस्पैन, कैरोलिन रोड्रिग्स-बिर्केट और एस्पिनोसा को महिला महासचिव की मांग और लैटिन अमेरिकी क्षेत्र के प्रतिनिधित्व के मुद्दे से फायदा मिल सकता है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के करीब 80 वर्षों के इतिहास में अब तक कोई महिला महासचिव नहीं बनी है। इसके अलावा 1991 में जेवियर पेरेज दे कुएलार के कार्यकाल के बाद से लैटिन अमेरिका को इस शीर्ष पद का प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

    यूएन के पूर्व अवर महासचिव और युगांडा के पूर्व विदेश मंत्री ओलारा ओतुनु भी उम्मीदवारों में शामिल हैं, लेकिन शुरुआती पोल में उन्हें सबसे कम समर्थन मिला। आने वाले दौर के मतदान यह तय करेंगे कि कौन सा उम्मीदवार स्थायी सदस्यों की सहमति हासिल कर अंतिम दौड़ में आगे बढ़ता है।

  • मकोका आरोपों पर सुकेश की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को अपना पक्ष रखने का निर्देश

    मकोका आरोपों पर सुकेश की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, दिल्ली पुलिस को अपना पक्ष रखने का निर्देश

    नई दिल्ली । 200 करोड़ रुपए की वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में आरोपी सुकेश चंद्रशेखर ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून (मकोका) के तहत लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। सुकेश ने निचली अदालत के उस फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की है, जिसमें उसके खिलाफ मकोका के तहत आरोप तय किए गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई के लिए 23 सितंबर की तारीख तय की है।

    सुकेश चंद्रशेखर की याचिका में कहा गया है कि उसके खिलाफ लगाए गए मकोका के आरोपों पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का पक्ष है कि इस कानून के तहत कार्रवाई को लेकर नए सिरे से समीक्षा की आवश्यकता है। अब इस मामले में दिल्ली पुलिस के जवाब के बाद हाईकोर्ट आगे की सुनवाई करेगा और तय करेगा कि मकोका आरोपों को लेकर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

    यह पूरा मामला करीब 200 करोड़ रुपए की कथित वसूली और धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है। जांच एजेंसियों के अनुसार, सुकेश चंद्रशेखर पर आरोप है कि उसने खुद को सरकारी अधिकारी बताकर एक कारोबारी परिवार से बड़ी रकम हासिल की। आरोप है कि उसने प्रभावशाली लोगों से संपर्क होने और कानूनी मामलों को सुलझाने का भरोसा दिलाकर पैसे की मांग की थी।

    मामला उस समय सामने आया जब फोर्टिस के पूर्व प्रमोटर शिविंदर सिंह की पत्नी अदिति सिंह ने शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के अनुसार, एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क किया और खुद को केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पेश किया। उसने उनके पति से जुड़े कानूनी मामलों में मदद दिलाने का दावा किया और इसके बदले बड़ी रकम की मांग की गई। इसके बाद पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की।

    जांच में एजेंसियों ने आरोप लगाया कि इस कथित साजिश में कई लोग शामिल थे और सरकारी अधिकारियों की पहचान का गलत इस्तेमाल किया गया। जांच के दौरान करीब 217 करोड़ रुपए तक की रकम अलग-अलग माध्यमों से हासिल किए जाने का दावा किया गया। इसी आधार पर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की।

    जांच आगे बढ़ने के बाद सुकेश चंद्रशेखर की भूमिका सामने आने पर उसे गिरफ्तार किया गया था। पुलिस का आरोप था कि वह जेल के अंदर रहते हुए भी अपनी गतिविधियों को संचालित कर रहा था। जांच एजेंसियों ने उसके पास से मोबाइल फोन मिलने का भी दावा किया था। इसके बाद पुलिस ने उसके खिलाफ मकोका के तहत कार्रवाई की।

    महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून यानी मकोका का इस्तेमाल संगठित अपराध से जुड़े मामलों में किया जाता है। इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए पुलिस को यह दिखाना होता है कि अपराध किसी संगठित गिरोह या लगातार आपराधिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। दिल्ली पुलिस का आरोप रहा है कि सुकेश ने अकेले नहीं बल्कि एक समूह के साथ मिलकर कथित अपराध को अंजाम दिया।

    अब हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई इस बात पर केंद्रित होगी कि सुकेश के खिलाफ मकोका के तहत लगाए गए आरोप कानूनी रूप से सही हैं या नहीं। दिल्ली पुलिस के जवाब के बाद मामले में आगे की दिशा तय होगी। इस मामले में लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया के बीच हाईकोर्ट की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।