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  • सायोनी घोष की संभावित नई भूमिका, नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा के लिए प्रचार की चर्चा

    सायोनी घोष की संभावित नई भूमिका, नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा के लिए प्रचार की चर्चा

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI ने दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करने का फैसला किया है। हालांकि, पार्टी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि प्रचार अभियान में कौन-कौन से नेता शामिल होंगे। इसी वजह से सांसद सायोनी घोष की संभावित भूमिका को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

    सायोनी घोष उन सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होने के बाद NCPI में विलय किया था। इससे पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में वह भाजपा की मुखर विरोधी रही हैं। अब NCPI के भाजपा समर्थित प्रचार अभियान के फैसले के बाद उनकी संभावित भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, अभी तक पार्टी की ओर से सायोनी घोष के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    NCPI ने दोनों विधानसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। पार्टी का कहना है कि इसी वजह से उसने भाजपा के समर्थन में प्रचार करने का निर्णय लिया है। पार्टी ने खुद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भाजपा के बाद सबसे बड़ा साझेदार भी बताया है। NCPI के अनुसार, उसके साथ कुल 20 सांसद हैं।

    पार्टी नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक टकराव को कम करने और मिलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया है। NCPI की ओर से आने वाले समय में गठबंधन नेतृत्व के साथ एक बड़ी बैठक किए जाने की बात भी कही गई है। इसमें राज्य से जुड़े राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

    हालांकि, भाजपा ने NCPI के इस समर्थन को औपचारिक चुनावी गठबंधन नहीं माना है। भाजपा की ओर से स्पष्ट किया गया है कि दोनों सीटों पर समर्थन में प्रचार करने का अर्थ भविष्य में सीटों के बंटवारे या किसी औपचारिक चुनावी समझौते से नहीं है। यानी फिलहाल NCPI का समर्थन प्रचार तक सीमित बताया गया है।

    उधर, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए नेताओं का एक गुट भी उपचुनाव को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रहा है। इस गुट ने नंदीग्राम सीट से मोहम्मद एतेशामुल हक को उम्मीदवार बनाया है। गुट की ओर से चुनाव को तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे राजनीतिक मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होना है, जबकि 9 अक्टूबर को मतगणना की जाएगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के विधानसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हुई है। रेजीनगर सीट भी रिक्त होने के बाद उपचुनाव के लिए निर्धारित की गई है।

    उपचुनाव से पहले दोनों सीटों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। NCPI के भाजपा समर्थन वाले फैसले ने इन चुनावों में एक नया राजनीतिक समीकरण जरूर सामने रखा है। वहीं, सायोनी घोष की भूमिका अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यदि पार्टी उन्हें प्रचार अभियान में शामिल करती है, तो उनकी सार्वजनिक भूमिका में बदलाव को लेकर चर्चा और बढ़ सकती है।

    फिलहाल आधिकारिक तौर पर इतना ही स्पष्ट है कि NCPI नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करेगी। सायोनी घोष समेत किन नेताओं को प्रचार अभियान में उतारा जाएगा, इसकी तस्वीर पार्टी की अंतिम घोषणा के बाद ही साफ होगी।

  • आजमगढ़ में पत्नी, दो पुजारियों और बेटे की हत्या, आठ घंटे बाद पुलिस मुठभेड़ में आरोपी ढेर

    आजमगढ़ में पत्नी, दो पुजारियों और बेटे की हत्या, आठ घंटे बाद पुलिस मुठभेड़ में आरोपी ढेर

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में मंगलवार शाम एक गंभीर घटना के बाद करीब आठ घंटे तक बंधक संकट की स्थिति बनी रही। शंभूपुर गांव में अरविंद सिंह ने कथित तौर पर अपनी पत्नी और दो पुजारियों को गोली मार दी। इसके बाद वह अपने बच्चों को लेकर एक कमरे में बंद हो गया। पुलिस ने काफी देर तक बातचीत के जरिए उसे आत्मसमर्पण के लिए तैयार करने का प्रयास किया, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं आई।

    बताया गया कि अरविंद शाम के समय अपने घर पहुंचा था। उस समय घर में पूजा-पाठ चल रहा था। वहां उसकी पत्नी बबीता सिंह के अलावा पुजारी महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्रा मौजूद थे। पूजा को लेकर जानकारी लेने के दौरान अरविंद ने पुजारियों से आधार कार्ड दिखाने के लिए कहा। इसी बात को लेकर पत्नी के साथ उसकी बहस हो गई।

    विवाद बढ़ने के बाद अरविंद ने कथित तौर पर लाइसेंसी हथियार से फायरिंग कर दी। गोली लगने से उसकी पत्नी बबीता और दोनों पुजारियों की मौत हो गई। घटना के बाद अरविंद अपने बच्चों को लेकर घर के एक कमरे में चला गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।

    तीन लोगों की हत्या की सूचना मिलने के बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंची। अधिकारियों ने आरोपी से लगातार बातचीत करने की कोशिश की। उसके परिवार के लोगों के माध्यम से भी उसे समझाने का प्रयास किया गया। पुलिस का मुख्य उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालना था।

    करीब सात घंटे तक बातचीत और समझाने का सिलसिला चलता रहा। आरोपी आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं हुआ। पुलिस के अनुसार, वह बच्चों को नुकसान पहुंचाने की धमकी दे रहा था। इसी बीच कमरे के भीतर से अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी।

    पुलिस के मुताबिक, आरोपी ने अपने 10 वर्षीय बेटे को गोली मार दी। बच्चे को गोली लगने के बाद पुलिस ने तत्काल कार्रवाई का फैसला किया। कमरे में प्रवेश के दौरान स्टन ग्रेनेड और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया।

    पुलिस के अनुसार, टीम के कमरे में पहुंचने पर आरोपी ने फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद बच्चों की सुरक्षा और आत्मरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस ने जवाबी फायरिंग की। इस कार्रवाई में अरविंद सिंह घायल हो गया।

    घायल आरोपी और उसके बेटे को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया। उपचार के दौरान दोनों की मौत हो गई। वहीं, कमरे में मौजूद दो अन्य बच्चों को पुलिस ने सुरक्षित बाहर निकाल लिया। घटना के बाद मौके पर पुलिस बल, विशेष जांच टीम और फॉरेंसिक टीम को तैनात किया गया।

    पुलिस अब पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है। घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं और गोलीबारी से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। शुरुआती जानकारी में पूजा के दौरान हुए विवाद को घटना की शुरुआत से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, घटना के पीछे की पूरी वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

    करीब आठ घंटे तक चले इस घटनाक्रम में आरोपी की पत्नी, दो पुजारियों और उसके बेटे की जान चली गई। पुलिस कार्रवाई के बाद बाकी बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया और बंधक संकट समाप्त हुआ

  • राष्ट्रपति मुर्मु ने फिल्म सितारों से कहा, लोकप्रियता का इस्तेमाल समाज के हित में करें..

    राष्ट्रपति मुर्मु ने फिल्म सितारों से कहा, लोकप्रियता का इस्तेमाल समाज के हित में करें..

    नई दिल्ली ।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गुजरात के एकता नगर में आयोजित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के दौरान फिल्म जगत से जुड़े कलाकारों को महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने लोकप्रिय फिल्म सितारों से अपनी प्रसिद्धि और प्रभाव का इस्तेमाल सकारात्मक उद्देश्यों के लिए करने की अपील की। राष्ट्रपति ने कहा कि लोकप्रिय कलाकारों में खास तौर पर बच्चों और युवाओं को प्रभावित करने की बड़ी क्षमता होती है।

    अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि जब सफल कलाकार अनुशासित जीवनशैली और स्वस्थ आदतों के फायदे बताते हैं तो बड़ी संख्या में बच्चे और युवा उनसे प्रभावित होते हैं। इसी प्रभाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने फिल्म कलाकारों से स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों का प्रचार नहीं करने का अनुरोध किया।

    राष्ट्रपति ने कहा कि लोकप्रिय कलाकारों को ऐसे उत्पादों के विज्ञापन से बचना चाहिए, जो लोगों के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं। उन्होंने अपने संदेश को एक प्रभावशाली वाक्य में रखते हुए कहा कि स्टार वही है जो रोशनी फैलाए, अंधेरा नहीं।

    राष्ट्रपति की यह अपील ऐसे समय में सामने आई जब फिल्म जगत के कई चर्चित कलाकार अलग-अलग मौकों पर पान मसाला और अन्य उत्पादों के विज्ञापनों से जुड़े रहे हैं। कुछ कलाकारों ने ऐसे विज्ञापनों में काम किया है, जबकि कुछ ने बाद में सार्वजनिक प्रतिक्रिया के बीच संबंधित ब्रांड से दूरी बना ली।

    अभिनेता अक्षय कुमार भी पहले एक पान मसाला विज्ञापन का हिस्सा बने थे। हालांकि, लोगों की प्रतिक्रिया के बाद उन्होंने संबंधित कंपनी से अपना जुड़ाव खत्म कर लिया था। दूसरी ओर, कुछ दक्षिण भारतीय कलाकारों ने ऐसे उत्पादों के विज्ञापन के प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए। इनमें अल्लू अर्जुन, यश और आर. माधवन के नाम शामिल हैं।

    राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में केवल फिल्म सितारों की जिम्मेदारी की बात नहीं की, बल्कि सिनेमा निर्माण से जुड़े उन लोगों को भी याद किया, जिनका योगदान अक्सर पर्दे के पीछे रह जाता है। उन्होंने कहा कि किसी फिल्म को बनाने में बड़ी संख्या में लोगों की मेहनत शामिल होती है।

    उन्होंने सभी पुरस्कार विजेताओं से अनुरोध किया कि अपनी फिल्मों को मिली सराहना और सम्मान को टीम के प्रत्येक सदस्य तक पहुंचाएं। इनमें मजदूर, छोटे कलाकार, सहायक और संघर्षरत लोग भी शामिल हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि रचनात्मक अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले इन लोगों को सम्मान और सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।

    72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में विभिन्न श्रेणियों के विजेताओं को सम्मानित किया गया। यह पहली बार था जब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का आयोजन दिल्ली से बाहर किया गया। गुजरात के एकता नगर में हुए इस समारोह में राष्ट्रपति ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए।

    समारोह में कन्नड़ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में पांच दशकों से अधिक के योगदान के लिए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    फिल्म ‘आर्टिकल 370’ को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म चुना गया और इसकी मुख्य अभिनेत्री यामी गौतम को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। वहीं ‘भ्रमयुगम’ के लिए मैमूटी और ‘चंदू चैंपियन’ के लिए कार्तिक आर्यन को संयुक्त रूप से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान दिया गया।

    राष्ट्रपति ने सिनेमा को समाज का दर्पण बताते हुए कहा कि यह भारतीय संस्कृति, संवेदनाओं और जीवन मूल्यों को दुनिया तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में बनने वाली फिल्मों की सराहना करते हुए कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा देश की जड़ों और विविध कहानियों को जीवंत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

  • भारत पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, जेलेंस्की ने अमेरिका के फैसले का किया खुलकर समर्थन

    भारत पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, जेलेंस्की ने अमेरिका के फैसले का किया खुलकर समर्थन


    नई दिल्ली । अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का रास्ता साफ होने के बाद भारत से जुड़ी इस खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज कर दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने Lindsey O Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया है। इस कानून के तहत रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को दिया गया है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी तेल खरीदार इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि अभी यह कहना सही नहीं होगा कि भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लागू हो चुका है। कानून अमेरिकी प्रशासन को ऐसा कदम उठाने का अधिकार देता है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी कदम का समर्थन किया है। न्यूयॉर्क में अमेरिकी सांसदों से मुलाकात के दौरान जेलेंस्की ने रूस पर दबाव बढ़ाने वाले इस कानून को लेकर आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम युद्ध को खत्म करने और शांति तथा सुरक्षा की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं। जेलेंस्की की प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब अमेरिका रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए अलग अलग आर्थिक उपायों पर जोर दे रहा है।

    इस कानून का मुख्य निशाना रूस है। इसमें रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को मजबूत करने के साथ उसके ऊर्जा क्षेत्र और उससे जुड़े कारोबार पर दबाव बढ़ाने का प्रावधान है। कानून के तहत रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर भी टैरिफ लगाया जा सकता है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 सितंबर को इस पर हस्ताक्षर किए। व्हाइट हाउस के अनुसार कानून रूस के खिलाफ वैधानिक प्रतिबंधों और टैरिफ संबंधी अधिकारों का विस्तार करता है।

    भारत के लिए इस कानून का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कई देशों से कच्चा तेल खरीदता है और रूस भी इसमें महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में भारत का रूस से तेल आयात करीब 16.5 फीसदी घटकर लगभग 21 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। इसके बावजूद रूस भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।

    अमेरिका का तर्क है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाकर मॉस्को पर यूक्रेन युद्ध को लेकर दबाव बनाया जा सकता है। वहीं भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है। भारतीय पक्ष पहले ही संकेत दे चुका है कि ऐसे अमेरिकी कदमों का असर भारत अमेरिका संबंधों और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि देश की ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जाएंगे।

    इस घटनाक्रम में अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अमेरिकी प्रशासन कानून में मिले अधिकारों का इस्तेमाल किस तरह करता है। फिलहाल कानून लागू हो चुका है लेकिन भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाए जाने की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन के फैसले और भारत की प्रतिक्रिया पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। साथ ही इसका असर कच्चे तेल की कीमतों वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और भारत अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी पड़ सकता है।

  • मरीज इलाज के लिए घर गहने बेचते हैं फिर दवा पर इतनी बड़ी कीमत क्यों सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों से पूछा सवाल

    मरीज इलाज के लिए घर गहने बेचते हैं फिर दवा पर इतनी बड़ी कीमत क्यों सुप्रीम कोर्ट ने अफसरों से पूछा सवाल


    नई दिल्ली । कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों को महंगी दवाओं से राहत दिलाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने एक ऐसी दवा का उदाहरण सामने आने पर हैरानी जताई जिसकी रिटेल कीमत और एमआरपी में करीब दस गुना का अंतर बताया गया। कोर्ट के सामने कहा गया कि जिस दवा की कीमत रिटेलर्स को करीब 2700 रुपये में मिल रही है उसकी एमआरपी 27000 रुपये तक रखी गई है। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि मरीजों से इस तरह की कीमत कैसे वसूली जा सकती है।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ जरूरी कैंसर दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की मांग से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि कैंसर के मरीज पहले ही बीमारी और इलाज के खर्च का सामना कर रहे हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमतों में इस तरह का अंतर बेहद गंभीर विषय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कई परिवार इलाज का खर्च जुटाने के लिए अपनी संपत्ति और गहने तक बेच देते हैं। ऐसे हालात में दवाओं की कीमत में अत्यधिक बढ़ोतरी मरीजों और उनके परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में उन अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाया जिनकी जिम्मेदारी दवाओं की कीमतों पर नजर रखने और अनुचित मूल्य वृद्धि के खिलाफ कार्रवाई करने की है। अदालत ने पूछा कि जब संबंधित अधिकारियों के पास दवाओं की कीमतों को लेकर निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी है तो फिर इस तरह का अंतर कैसे बना हुआ है। पीठ ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जाहिर की।

    याचिका में केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से जरूरी दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दवा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं की ओर से आवश्यक दवाओं के लिए अत्यधिक कीमत वसूले जाने पर रोक लगनी चाहिए। उनका उद्देश्य यह है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को जरूरी दवाएं ऐसी कीमत पर उपलब्ध हों जिसे वे वहन कर सकें।

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि सरकार इस मामले को केवल दो पक्षों के बीच सामान्य मुकदमेबाजी के तौर पर नहीं देख रही है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र भी मामले से जुड़े व्यापक पहलुओं पर विचार कर रहा है। अदालत ने दवाओं की कीमत तय करने और मरीजों को उचित कीमत पर दवा उपलब्ध कराने के मुद्दे को महत्वपूर्ण माना है।

    मामले में जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी सामने आया। एक याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों द्वारा जेनेरिक दवाएं नहीं लिखे जाने की समस्या के कारण भी गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को परेशानी होती है। अगर समान चिकित्सकीय उपयोग वाली कम कीमत की दवाएं उपलब्ध हैं तो उनके इस्तेमाल को लेकर भी व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जरूरी दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और उचित मूल्य निर्धारण महत्वपूर्ण मुद्दा है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि केंद्र सरकार और संबंधित नियामक एजेंसियां दवाओं की कीमतों को लेकर क्या कदम उठाती हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है। उस सुनवाई में दवाओं की कीमतों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

  • BSP का सियासी आधार लगातार घटा अब संसद में भी नहीं रहेगा कोई सांसद राष्ट्रीय दर्जे पर भी सवाल BSP के सामने संसद से लेकर राष्ट्रीय दर्जे तक की चुनौती

    BSP का सियासी आधार लगातार घटा अब संसद में भी नहीं रहेगा कोई सांसद राष्ट्रीय दर्जे पर भी सवाल BSP के सामने संसद से लेकर राष्ट्रीय दर्जे तक की चुनौती


    नई दिल्ली । बहुजन समाज पार्टी यानी BSP के सामने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक के बाद एक बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं। पार्टी का लोकसभा में पहले से कोई सांसद नहीं है और उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी अब उसका कोई विधायक नहीं बचा है। अगस्त 2026 में रसड़ा सीट से BSP के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद 403 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व खत्म हो गया।

    अब राज्यसभा में भी BSP का प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति बन रही है। पार्टी के मौजूदा इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर में पूरा होना है। इसके बाद BSP के पास संसद के दोनों सदनों में कोई निर्वाचित सांसद नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास राज्यसभा चुनाव के लिए पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण तत्काल वापसी की संभावना भी सीमित है।

    यह स्थिति BSP के राजनीतिक सफर में महत्वपूर्ण बदलाव को दिखाती है। पार्टी की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी और बाद में मायावती ने इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया। 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। इसके बाद पार्टी का विधानसभा में प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया। 2012 में उसकी सीटें घटकर 80 रह गईं। 2017 में BSP 19 सीटों पर सिमट गई और 2022 में केवल एक सीट जीत सकी। वह एकमात्र सीट रसड़ा थी जहां से उमाशंकर सिंह निर्वाचित हुए थे। उनके निधन के बाद विधानसभा में BSP का खाता खाली हो गया।

    लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को लगातार चुनौती मिली है। 2009 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीती थीं। लेकिन 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन में BSP ने 10 सीटें जीतीं। 2024 में पार्टी फिर कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर BSP का संसदीय प्रतिनिधित्व लगातार कमजोर हुआ है।

    अब चर्चा पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे को लेकर भी हो रही है। चुनाव आयोग के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार BSP अभी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त दलों में शामिल है। आयोग की मौजूदा सूची में BSP को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दर्ज किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसका राष्ट्रीय दर्जा अभी खत्म हो गया है। हालांकि भविष्य में चुनावी प्रदर्शन के आधार पर मान्यता की समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।

    चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए अलग अलग रास्ते तय हैं। इनमें किसी पार्टी का कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में छह प्रतिशत वैध वोट हासिल करना और कम से कम चार लोकसभा सदस्य चुनकर लाना शामिल है। दूसरा रास्ता लोकसभा की कुल सीटों के कम से कम दो प्रतिशत पर जीत हासिल करना है और ये सांसद कम से कम तीन राज्यों से होने चाहिए। इसके अलावा किसी दल का कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त होना भी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता का एक आधार है।

    BSP के लिए आने वाला समय इसलिए अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। पार्टी को जहां अपने संगठन और चुनावी आधार को मजबूत करने की चुनौती है वहीं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखना भी उसके लिए महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल राष्ट्रीय दर्जा खत्म होना कोई घोषित फैसला नहीं है लेकिन संसद और विधानसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति ने BSP की राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा जरूर बढ़ा दी है।

  • UP में एक और बड़ा चुनाव: 5 स्नातक और 6 शिक्षक सीटों पर होगा मतदान, 27 अक्टूबर को आएगा MLC चुनाव का रिजल्ट

    UP में एक और बड़ा चुनाव: 5 स्नातक और 6 शिक्षक सीटों पर होगा मतदान, 27 अक्टूबर को आएगा MLC चुनाव का रिजल्ट


    उत्तर प्रदेश  । उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक और महत्वपूर्ण चुनावी प्रक्रिया शुरू हो गई है। राज्य की 11 विधान परिषद सीटों के लिए अक्टूबर में चुनाव होना है। इन सीटों पर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी की तैयारियां तेज हो गई हैं। भाजपा पांच सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम पहले ही घोषित कर चुकी है जबकि छह सीटों पर उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया जारी है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी सभी 11 सीटों के लिए अपने प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। विधान परिषद की इन सीटों पर 23 अक्टूबर को मतदान होगा जबकि 27 अक्टूबर को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किया जाएगा।

    मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के अनुसार विधान परिषद की पांच खंड स्नातक और छह खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चुनाव कराया जाएगा। इन निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 6 दिसंबर को पूरा हो रहा है। चुनाव की अधिसूचना 29 सितंबर को जारी होगी और उम्मीदवार 6 अक्टूबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी जबकि नाम वापस लेने की अंतिम तारीख 9 अक्टूबर निर्धारित की गई है। इसके बाद 23 अक्टूबर को मतदान और 27 अक्टूबर को मतगणना होगी।

    जिन 11 सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है उनमें लखनऊ खंड स्नातक से अवनीश कुमार सिंह वाराणसी से आशुतोष सिन्हा आगरा से डॉक्टर मानवेंद्र प्रताप सिंह मेरठ से दिनेश कुमार गोयल और इलाहाबाद झांसी से डॉक्टर मान सिंह यादव शामिल हैं। इनके अलावा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से उमेश द्विवेदी लाल बिहारी यादव डॉक्टर आकाश अग्रवाल श्रीचंद शर्मा हरि सिंह ढिल्लों और ध्रुव कुमार त्रिपाठी का कार्यकाल भी समाप्त होने जा रहा है।

    भाजपा ने फिलहाल पांच सीटों पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा की है। पार्टी ने लखनऊ सीतापुर स्नातक सीट से अवनीश कुमार सिंह लखनऊ सीतापुर शिक्षक सीट से उमेश द्विवेदी बरेली मुरादाबाद सीट से हरि सिंह ढिल्लों आगरा स्नातक सीट से डॉक्टर मानवेंद्र सिंह और मेरठ सहारनपुर सीट से श्रीचंद शर्मा को फिर मौका दिया है। बाकी छह सीटों पर उम्मीदवारों के नाम सामने आने बाकी हैं। पार्टी स्तर पर इन सीटों को लेकर कई दौर की चर्चा हो चुकी है और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मंथन जारी है।

    भाजपा को गोरखपुर शिक्षक सीट इलाहाबाद स्नातक सीट वाराणसी शिक्षक और स्नातक सीट आगरा शिक्षक सीट तथा मेरठ स्नातक सीट पर उम्मीदवार घोषित करने हैं। संभावित नामों को लेकर राजनीतिक और शिक्षक संगठनों से जुड़े कई चेहरे चर्चा में हैं। गोरखपुर शिक्षक सीट से ध्रुव कुमार त्रिपाठी और प्रयागराज स्नातक सीट से सुरेश त्रिपाठी के नाम की चर्चा है। वहीं आगरा स्नातक सीट पर पिछले चुनाव में निर्दलीय जीत हासिल करने वाले आकाश अग्रवाल और कर्मचारी नेता हरिकिशोर तिवारी भी दावेदारी से जुड़े बताए जा रहे हैं।

    दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने सभी 11 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। ऐसे में अब दोनों प्रमुख दलों की चुनावी तैयारियां तेज हो गई हैं। विधान परिषद की इन सीटों का चुनाव विधानसभा चुनाव से अलग निर्वाचन प्रक्रिया के तहत होगा और इसमें संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता मतदान करेंगे।

    चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के साथ ही प्रदेश के अधिकांश जिलों में आदर्श आचार संहिता के प्रावधान लागू हो गए हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार कानपुर कानपुर देहात और उन्नाव को छोड़कर उत्तर प्रदेश के बाकी जिलों में विधान परिषद निर्वाचन के संबंध में आचार संहिता के संबंधित प्रावधान प्रभावी हैं। अब 29 सितंबर को अधिसूचना जारी होने के बाद नामांकन प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू होगी और अक्टूबर के अंत तक सभी 11 सीटों पर नए सदस्यों की तस्वीर साफ हो जाएगी।

  • 5 साल में 23 IIT में 45 छात्रों ने की आत्महत्या, 28 SC-ST-OBC वर्ग से, IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा 7 मौतें

    5 साल में 23 IIT में 45 छात्रों ने की आत्महत्या, 28 SC-ST-OBC वर्ग से, IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा 7 मौतें


    नई दिल्ली। देश के 23 भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में 2020-21 से 2024-25 के बीच 45 छात्रों की आत्महत्या से मौत हुई। लोकसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इनमें 28 छात्र SC, ST और OBC वर्ग से थे। यानी कुल आत्महत्याओं में इन तीन सामाजिक वर्गों के छात्रों की हिस्सेदारी करीब 62% रही। ये आंकड़े देश के सभी 23 IIT से जुटाई गई जानकारी के आधार पर तैयार किए गए हैं।

    सालवार आंकड़ों में 2023-24 सबसे ज्यादा मौतों वाला वर्ष रहा। इस दौरान 16 छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2022-23 में यह संख्या छह थी। 2024-25 में भी 13 छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई।

    IIT हैदराबाद में सबसे ज्यादा मौतें

    संस्थानवार आंकड़ों में IIT हैदराबाद में पांच साल के दौरान सबसे ज्यादा सात छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई। इसके बाद IIT खड़गपुर, IIT दिल्ली और IIT कानपुर में छह-छह छात्रों ने जान गंवाई।

    वहीं IIT मद्रास में पांच और IIT (BHU) वाराणसी में चार छात्रों की आत्महत्या दर्ज की गई। बाकी IIT में दर्ज मामलों की संख्या इससे कम रही।

    OBC के 12, SC के 9 और ST के 7 छात्र

    सरकारी आंकड़ों में सामाजिक वर्ग के आधार पर भी मौतों का विवरण दिया गया है। पांच साल में आत्महत्या करने वाले 45 छात्रों में 12 OBC, 9 SC और 7 ST वर्ग से थे। इसके अलावा 16 छात्र सामान्य वर्ग से थे, जबकि एक छात्र EWS वर्ग से था।

    केवल 2024-25 के आंकड़ों को देखें तो उस वर्ष आत्महत्या करने वाले 13 छात्रों में चार OBC, तीन ST और दो SC वर्ग से थे। वहीं चार छात्र सामान्य वर्ग के थे।

    इस तरह 2024-25 में भी SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों की संख्या कुल आत्महत्या के मामलों में उल्लेखनीय रही।

    45 आत्महत्याओं के अलावा 8 अस्वाभाविक मौतें

    सरकारी आंकड़ों में पांच साल की अवधि में आत्महत्या के 45 मामलों के अलावा आठ अन्य मौतों का भी उल्लेख है। इन्हें अस्वाभाविक मौत की श्रेणी में रखा गया है और आत्महत्या के 45 मामलों में शामिल नहीं किया गया है।

    हालांकि, उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में इन छात्रों के कोर्स, अध्ययन के वर्ष या मौत के पीछे संभावित कारणों की जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए केवल संख्या और सामाजिक वर्ग के आंकड़ों के आधार पर आत्महत्या के कारणों के संबंध में कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    यह जानकारी 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उपलब्ध कराए गए सरकारी आंकड़ों पर आधारित है। आंकड़े 2020-21 से 2024-25 तक देश के सभी 23 IIT से संबंधित हैं।

  • अतीक के बेटे अली से पूछा 2027 में परिवार से कौन लड़ेगा चुनाव जवाब देने के बजाय साध ली चुप्पी

    अतीक के बेटे अली से पूछा 2027 में परिवार से कौन लड़ेगा चुनाव जवाब देने के बजाय साध ली चुप्पी

    झांसी। प्रयागराज की अदालत में बयान दर्ज कराने के बाद माफिया अतीक अहमद के बेटे अली अहमद को कड़ी सुरक्षा के बीच देर रात झांसी जेल वापस लाया गया। सुबह पुलिस सुरक्षा के बीच अली को झांसी से प्रयागराज ले जाया गया था जहां अदालत की कार्यवाही पूरी होने के बाद पुलिस टीम उसे लेकर वापस झांसी पहुंची। जेल लौटने के दौरान सुरक्षा के खास इंतजाम किए गए थे और जेल परिसर के आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती रही।

    अली अहमद के झांसी पहुंचने की सूचना मिलते ही जेल के आसपास सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई। पुलिस वाहन के जेल परिसर के पास पहुंचते ही सुरक्षाकर्मियों ने अली को अपने घेरे में ले लिया। इसके बाद उसे बिना किसी रुकावट के सीधे जेल के भीतर ले जाया गया। सुरक्षा को देखते हुए पुलिसकर्मी लगातार उसके आसपास मौजूद रहे और मीडिया की पहुंच को भी सीमित रखा गया।

    जेल के बाहर मौजूद पत्रकारों ने अली अहमद से बातचीत करने की कोशिश की। इसी दौरान उससे पूछा गया कि क्या वह सरकार से कुछ कहना चाहता है। इस सवाल के जवाब में अली ने बेहद संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी। उसने कहा कि सफर लंबा था और वह कुछ नहीं कहना चाहता। इसके बाद वह सुरक्षाकर्मियों के घेरे में जेल के अंदर चला गया।

    पत्रकारों ने अली से आगामी 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भी सवाल किया। उससे पूछा गया कि चुनाव में परिवार की ओर से कौन मैदान में उतर सकता है। इस सवाल पर अली ने कोई जवाब नहीं दिया और चुप्पी साधे रखी। उसने चुनाव या परिवार की राजनीतिक भूमिका को लेकर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी।

    इसके बाद सुरक्षाकर्मियों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए वाहन को अंदर की ओर ले जाने की प्रक्रिया पूरी की। पुलिस घेरे में अली को जेल परिसर के भीतर ले जाया गया और मीडिया से उसकी संक्षिप्त बातचीत भी वहीं समाप्त हो गई।

    प्रयागराज से झांसी तक अली की आवाजाही के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और जेल प्रशासन सतर्क नजर आया। अदालत में बयान दर्ज कराने के बाद उसे वापस झांसी जेल लाया गया है। जेल के बाहर मौजूद मीडिया की ओर से पूछे गए सवालों में उसकी यात्रा और आगामी विधानसभा चुनाव से जुड़े सवाल प्रमुख रहे लेकिन अली ने चुनाव को लेकर कोई जानकारी साझा नहीं की।

    अली अहमद के इस संक्षिप्त बयान के बाद जेल के बाहर मौजूद पत्रकारों के बीच भी चर्चा रही। हालांकि उसने अपने परिवार की ओर से चुनाव लड़ने वाले संभावित व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कहा। फिलहाल वह झांसी जेल में वापस पहुंच चुका है और अदालत की कार्यवाही के बाद उसकी वापसी पुलिस सुरक्षा में पूरी हुई।

  • लखनऊ में QR कोड वाला पोस्टर अभियान चर्चा में, स्कैन करते ही खुलता है अपराध का डेटा

    लखनऊ। राजधानी लखनऊ में इन दिनों QR कोड वाले पोस्टरों का एक अनोखा अभियान लोगों का ध्यान खींच रहा है। हजरतगंज से लेकर ऐशबाग, लालबाग, हुसैनगंज, चौक और हुसैनाबाद तक प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर लगाए गए इन पोस्टरों के जरिए महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े आंकड़े सीधे लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

    मोबाइल से स्कैन करते ही सामने आएगी जानकारी

    अभियान की खासियत पोस्टरों पर दिया गया इंटरैक्टिव QR कोड है। मोबाइल से कोड स्कैन करने पर लखनऊ और गोरखपुर में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों से संबंधित डेटा और उससे जुड़ी अन्य जानकारी सामने आती है। पोस्टरों में इसके लिए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।

    इस तरह पोस्टर को केवल सूचना प्रदर्शित करने के बजाय लोगों को डिजिटल माध्यम से विस्तृत जानकारी तक पहुंचने का जरिया बनाया गया है। राहगीर अपने मोबाइल से QR कोड स्कैन कर संबंधित आंकड़ों को देख सकते हैं।

    चौराहों और बाजारों में लगाए गए पोस्टर

    अभियान के तहत शहर के व्यस्त इलाकों, चौराहों और बाजारों में पोस्टर लगाए गए हैं। सार्वजनिक स्थानों पर लगे इन पोस्टरों ने राहगीरों और खासकर युवाओं का ध्यान आकर्षित किया है। सामान्य पोस्टर की तरह केवल आंकड़े पढ़ने के बजाय QR कोड के जरिए लोगों को विस्तृत डिजिटल जानकारी देखने का विकल्प दिया गया है।

    अपराध के आंकड़ों से जागरूकता बढ़ाने की कोशिश

    अभियान के पीछे महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों और अपराध के उपलब्ध आंकड़ों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश बताई जा रही है। इसके साथ ही QR कोड के जरिए नागरिकों को आंकड़ों के मूल स्रोत तक पहुंचने का माध्यम देने का प्रयास किया गया है।

    डिजिटल तकनीक और सार्वजनिक सूचना को जोड़ने वाला यह प्रयोग ऐसे समय में सामने आया है, जब महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों को आम लोगों तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर दिया जाता रहा है।