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  • सोनिया गांधी की किताब पर पेंगुइन ने क्यों खींचे हाथ? इन हिस्सों में बदलाव चाहता था प्रकाशक

    सोनिया गांधी की किताब पर पेंगुइन ने क्यों खींचे हाथ? इन हिस्सों में बदलाव चाहता था प्रकाशक


    नई दिल्ली। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘बिलोंगिंग: ए जर्नी ऑफ लव’ के भारतीय संस्करण के प्रकाशन से पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने हाथ खींच लिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, प्रकाशक पांडुलिपि के एक खास हिस्से में संपादकीय बदलाव के साथ कुछ अंश हटाना चाहता था। सोनिया गांधी ने बदलाव या कटौती करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद प्रकाशन का समझौता आगे नहीं बढ़ सका।

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पेंगुइन के पीछे हटने के बाद कई बड़े प्रकाशक इस पुस्तक के भारतीय संस्करण के अधिकार हासिल करने की कोशिश में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि हार्पर कॉलिंस इंडिया किताब के प्रकाशन का समझौता अंतिम रूप देने के करीब है।

    भारत को छोड़कर दुनिया के अन्य देशों में यह किताब 10 नवंबर को जारी होगी। पुस्तक के प्रकाशन की घोषणा सबसे पहले अमेरिकी प्रकाशक अल्फ्रेड ए. नोपफ ने की थी, जो पेंगुइन रैंडम हाउस का ही एक डिवीजन है। नोपफ के मुताबिक, किताब की शुरुआती एक लाख प्रतियां प्रकाशित की जाएंगी।

    छह दशक की निजी कहानी

    सोनिया गांधी पहले भी किताबें लिख चुकी हैं, लेकिन उनके करीबियों के अनुसार ‘बिलोंगिंग’ उनके जीवन का सबसे निजी और प्रामाणिक विवरण है। इसमें 1965 में कैम्ब्रिज में राजीव गांधी से उनकी पहली मुलाकात से लेकर नेहरू-गांधी परिवार का हिस्सा बनने तक के सफर को शामिल किया गया है।

    किताब में संजय गांधी की मृत्यु और इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी की हत्या के दौरान झेले व्यक्तिगत दुखों का भी जिक्र है। इसके अलावा 2004 में कांग्रेस को जनादेश मिलने के बावजूद प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के फैसले के पीछे की परिस्थितियों और कारणों पर भी सोनिया गांधी ने अपनी बात रखी है।

    सोनिया गांधी ने पुस्तक के बारे में कहा कि उनके परिवार पर काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन बहुत कम लेखन ऐसा है जो उनके परिवार के सदस्यों की भावनाओं, फैसलों और मानवीय कमजोरियों को वास्तविक रूप में सामने रखता है। उनके मुताबिक, यह किताब पिछले छह दशकों के सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को भी एक अलग नजरिए से देखने का मौका देती है।

    पेंगुइन के फैसले पर फिर उठे सवाल

    पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया का किसी चर्चित पुस्तक से पीछे हटने का यह पहला मामला नहीं है। इसी साल प्रकाशक ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को प्रकाशित करने से इनकार किए जाने की बात कही थी। हालांकि, राहुल गांधी ने संसद में इस किताब की हार्ड कॉपी दिखाई थी।

    जून में पेंगुइन ने ग्राफिक उपन्यासकार जो सैको की मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित किताब ‘द वंस एंड फ्यूचर रायट’ का प्रकाशन भी रद्द कर दिया था। इसके पीछे कानूनी जांच और नक्शे में सीमाओं से जुड़े मुद्दों को वजह बताया गया था।

  • BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस

    BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस


    नई दिल्ली। भाजपा ने अपनी नई संगठनात्मक टीम के जरिए बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के अनुरूप पार्टी को पुराने ढांचे से नए स्वरूप में ढालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सबसे अहम बदलाव यह है कि नए नेतृत्व को फैसले लेने में अधिक स्वतंत्रता दी गई है। वरिष्ठ नेता अब मुख्य रूप से मार्गदर्शक की भूमिका में रहेंगे और संगठन को जरूरत पड़ने पर उनकी सलाह और सहयोग लिया जाएगा। राजनीतिक दलों में समय-समय पर होने वाले पीढ़ीगत बदलाव की इसी कड़ी का असर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में भी दिखाई दे सकता है। हालांकि, संघ प्रमुख के पद में बदलाव को लेकर फिलहाल कोई चर्चा नहीं है।

    आमतौर पर किसी राजनीतिक दल के विपक्ष में रहने के दौरान संगठनात्मक प्रयोगों के लिए ज्यादा गुंजाइश होती है। सत्ता में रहते हुए बड़े बदलावों से बचने की प्रवृत्ति रहती है। इसके बावजूद भाजपा ने केंद्र में एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद भी अपने संगठन में बदलाव की शुरुआत की है। पार्टी के युवा अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई टीम में युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी है, लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता अपने स्तर पर बनाए रखी है।

    हर दशक में बदलता रहा भाजपा का संगठन

    भाजपा के 1980 में गठन के बाद करीब-करीब हर दशक में पार्टी के संगठन में बदलाव देखने को मिले हैं। पिछली सदी के अंतिम दशक में तत्कालीन संगठन प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी ने 1992 से 1995 के बीच बड़ी संख्या में युवाओं को पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं। उस दौर में नरेंद्र मोदी भी प्रमुख युवा चेहरों में शामिल थे। 21वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में भी संगठन में इसी तरह बदलाव हुए। हालांकि, उस समय वरिष्ठ नेताओं की भूमिका अधिक प्रभावी थी और वे नई टीमों को नेतृत्व देने के साथ उनका मार्गदर्शन भी करते थे।

    इस बार तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। पार्टी का नेतृत्व युवा है और निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी उसी के हाथों में रखी गई है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन को मजबूत करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी अहम बनी रहेगी। वरिष्ठ नेता नई टीम को मजबूती देने और जरूरत के मुताबिक सलाह देने की भूमिका में रहेंगे।

    अगले साल संघ में भी बड़े बदलाव की संभावना

    भाजपा के संगठनात्मक बदलाव के बाद अब उसकी वैचारिक और संगठनात्मक ताकत के प्रमुख केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी अगले साल महत्वपूर्ण परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है। ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद संघ का फोकस Gen-Z पर बढ़ने की बात कही जा रही है। संघ की ओर से अपने शताब्दी वर्ष के बाद नई पीढ़ी को लेकर संकेत भी दिए गए हैं।

    इसका व्यापक असर भाजपा के संगठन पर भी दिखाई दे सकता है। जेन-Z और जेन-अल्फा को लेकर बदलते सामाजिक माहौल के बीच भाजपा और संघ अपने नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं में नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे सकते हैं।

    हालांकि, संघ प्रमुख को बदलने की कोई चर्चा नहीं है। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत 2009 से इस पद पर हैं। संघ में सरसंघचालक के चुनाव की व्यवस्था नहीं है। इस पद पर नियुक्ति आम सहमति से होती है। मौजूदा संघ प्रमुख किसी नाम का सुझाव देते हैं तो संगठन के भीतर उस नाम पर सहमति बनाई जा सकती है।

  • नेपाल ने भारत की रेस्क्यू टीम की पेशकश क्यों ठुकराई?

    नेपाल ने भारत की रेस्क्यू टीम की पेशकश क्यों ठुकराई?


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1500 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। इस बीच भारत समेत कई देशों ने नेपाल को राहत और बचाव के लिए विशेषज्ञ टीमें भेजने की पेशकश की, लेकिन नेपाल सरकार ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को बुलाने से इनकार कर दिया है। नेपाल का कहना है कि उसके सुरक्षा बल राहत और बचाव अभियान चलाने में सक्षम हैं और फिलहाल उसे जमीनी टीमों के बजाय वित्तीय सहायता की जरूरत है।

    काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने अपनी विशेषज्ञ आपदा प्रबंधन टीमों को नेपाल भेजने का प्रस्ताव दिया था। भारत ने भी राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की टीम भेजने की पेशकश की थी। हालांकि, नेपाली सेना और पुलिस की सलाह के बाद सरकार ने इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।

    2015 के भूकंप से लिया सबक

    नेपाल सरकार के इस फैसले के पीछे 2015 का विनाशकारी भूकंप भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी राहत और बचाव दल नेपाल पहुंचे थे। इससे राहत कार्यों के समन्वय और प्रबंधन में काफी दिक्कतें सामने आई थीं। इसी अनुभव को देखते हुए नेपाल इस बार विदेशी टीमों के बजाय अपने सुरक्षा बलों के जरिए अभियान चलाना चाहता है।

    नेपाल पुलिस और विभिन्न दूतावासों के आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ के बाद स्थिति अब भी गंभीर है। दूसरे देशों के नागरिकों को सहायता पहुंचाने और उनके परिवारों तक सही जानकारी पहुंचाने के लिए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम बनाई है।

    विदेश मंत्रालय के एक उप-सचिव स्तर के अधिकारी को रसुवा के तिमुरे में ग्राउंड ऑपरेशन्स टीम के साथ भेजा गया है। यह टीम सुरक्षा बलों के साथ समन्वय कर दूसरे देशों के दूतावासों और परिजनों को लापता लोगों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराएगी। विदेश मंत्री शिसिर खनल ने भी संबंधित विभागों को विदेशी सरकारों के लगातार संपर्क में रहने के निर्देश दिए हैं।

    भारत से 47.5 टन राहत सामग्री पहुंची

    नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को भले ही आने की अनुमति नहीं दी है, लेकिन मानवीय और आर्थिक सहायता लेने से इनकार नहीं किया है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, भारत अब तक नेपाल को 47.5 टन राहत सामग्री भेज चुका है।

    भारत ने नेपाल को बेली ब्रिज और प्रीफैब ट्रस ब्रिज उपलब्ध कराने की पेशकश भी की है, ताकि बाढ़ से क्षतिग्रस्त संपर्क व्यवस्था को बहाल करने में मदद मिल सके।

    कई देशों ने आर्थिक मदद का ऐलान किया

    भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और विश्व बैंक भी नेपाल के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा कर चुके हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के अध्यक्ष मासातो कांडा ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बातचीत की और पुनर्निर्माण के साथ-साथ पूर्व चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) को मजबूत करने में सहयोग का भरोसा दिया है।

    नेपाल सरकार ने अपने दूतावासों को भी निर्देश दिया है कि किसी भी तरह की वित्तीय सहायता केवल प्रधानमंत्री राहत कोष के माध्यम से ही स्वीकार की जाए।

  • मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर

    मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर


    नई दिल्ली।
    ‘डबल इंजन (‘Double Engine’)’ के जिस नारे को बीजेपी (BJP) अपनी सबसे बड़ी ढाल और जीत का पक्का फॉर्मूला मानती रही है, उसकी परतें अब उधड़ने लगी हैं. केंद्र की सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का चेहरा आज भी विरोधियों पर भारी पड़ता दिख रहा है, लेकिन राज्यों के धरातल पर पार्टी का दूसरा इंजन पूरी तरह हांफ रहा है. इंडिया टुडे और सी-वोटर का ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’ (MOTN) अगस्त 2026 सर्वे राजनीतिक विश्लेषकों की आंखें खोल देने वाले नतीजे लेकर आया है. आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि जिन राज्यों में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम फहराया था, वहां महज दो साल के भीतर पार्टी का जनाधार अप्रत्याशित रूप से खिसक चुका है।

    2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने वाली भाजपा ने अपने आपको संभाला और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जबर्दस्त जीत हांसिल की. विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का सहारा लेकर जिस ‘डबल इंजन’ को जनता ने समर्थन दिया, अब वही समर्थन कमजोर पड़ता दिख रहा है।

    आज देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो जाए, तो सर्वे के आंकड़े एनडीए को 326 सीटें और 45.1 प्रतिशत वोट शेयर देते हैं, जबकि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन को 185 सीटें और 39.1 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है. केवल बीजेपी के आंकड़े देखें तो पार्टी 261 सीटों और 39.0 प्रतिशत वोट शेयर के साथ संसद की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी और 2024 के 240 सीटों के मुकाबले 21 सीटें ज्यादा हासिल करेगी. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला और बीजेपी के सिपहसालारों की नींद उड़ाने वाला है. इसी साल जनवरी 2026 के सर्वे में बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त 2026 में घटकर 261 पर आ गई है. यानी बीते महज छह महीनों के भीतर बीजेपी की झोली से 26 सीटें खिसक चुकी हैं, जो यह साबित करता है कि राज्यों में जनता का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है और डबल इंजन का पहिया थमने लगा है।
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    सबसे ज्यादा आंखें खोल देने वाले आंकड़े उन राज्यों से आए हैं जिन्हें बीजेपी का अभेद्य गढ़ और जीत की गारंटी माना जाता था. मध्यप्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने 29 की 29 सीटें जीतकर इतिहास रचा था और विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया था. मगर अगस्त 2026 का सर्वे बताता है कि मध्यप्रदेश में बीजेपी की झोली से सीधे 8 सीटें गायब हो चुकी हैं और पार्टी महज 21 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है. जनवरी 2026 के सर्वे में भी जहां पार्टी 26 सीटों पर थी, वहां छह महीने में ही 5 सीटें और कम हो गईं. पार्टी का वोट शेयर 2024 के 59.27 प्रतिशत से सीधा गिरकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि बीते चुनाव में शून्य पर लटकी कांग्रेस अब 8 सीटें झटकती दिख रही है और उसका वोट शेयर 32.44 प्रतिशत से उछलकर 43.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा है.

    ओडिशा का सच तो और भी ज्यादा कड़वा है. जिस ओडिशा में 2024 के चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 20 सीटें जीतकर नवीन पटनायक के दशकों पुराने साम्राज्य को ढहा दिया था, वहीं अब बीजेपी की साख दांव पर लगी है. सर्वे के अनुसार ओडिशा में बीजेपी की सीटें घटकर सिर्फ 12 रह सकती हैं, यानी पार्टी को 8 सीटों का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है. जनवरी 2026 के 17 सीटों के अनुमान से तुलना करें तो भी छह महीने में पार्टी ने 5 सीटें गंवा दी हैं और उसका वोट शेयर 45.34 प्रतिशत से घटकर 43.0 प्रतिशत पर सिमट गया है.


    हिंदी पट्टी में सुलगता असंतोष और कमजोर पड़ते राज्य

    बीजेपी की राजनीति की रीढ़ मानी जाने वाली हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं. उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव में बीजेपी 33 सीटों पर अटक गई थी. अगस्त 2026 के सर्वे में पार्टी को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं, जो भले ही 2024 से 1 सीट ज्यादा हो, लेकिन छह महीने पहले की तस्वीर से तुलना करने पर पैरों तले जमीन खिसक जाती है. जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी 44 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त आते-आते सीधे 10 सीटें घटकर 34 पर आ चुकी हैं और एनडीए का वोट शेयर 43.69 प्रतिशत से गिरकर 41.7 प्रतिशत हो गया है.

    छत्तीसगढ़ की बात करें तो 2024 में 11 में से 10 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी अब सिर्फ 7 सीटों पर सिमटती दिख रही है, यानी 3 सीटों की सीधी चपत लग रही है, जबकि कांग्रेस 1 सीट से बढ़कर 4 सीटों पर कब्जा जमाती नजर आ रही है. उत्तराखंड में सभी 5 सीटों पर काबिज बीजेपी को 1 सीट का नुकसान होकर 4 सीटें मिलने का अनुमान है. वहीं राजस्थान में बीजेपी 16 सीटों पर दिखाई दे रही है, जो 2024 की 14 सीटों से 2 ज्यादा जरूर है, लेकिन जनवरी 2026 के 18 सीटों के आंकड़े से 2 सीटें कम हो चुकी है.


    पश्चिम बंगाल की लहर का छलावा

    देश भर में खिसकती जमीन के बीच पश्चिम बंगाल ही अकेला ऐसा राज्य बनकर उभरा है जहां बीजेपी के लिए चमत्कारिक आंकड़े सामने आए हैं. 2024 के चुनाव में जहां बीजेपी बंगाल की 42 सीटों में से सिर्फ 12 सीटें जीत पाई थी, वहीं अगस्त 2026 का सर्वे अनुमान लगा रहा है कि बीजेपी राज्य में 35 सीटें जीतकर तख्तापलट कर सकती है, यानी सीधे 23 सीटों का बंपर फायदा. बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर 38.73 प्रतिशत से बढ़कर 46.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन का आंकड़ा 30 सीटों से गिरकर महज 7 सीटों पर सिमट रहा है.

    लेकिन क्या बंगाल का यह उछाल बीजेपी को राहत दे सकता है? आंखें खोल देने वाली सचाई यह है कि केवल एक राज्य के दम पर पूरे देश की राजनीतिक गिरावट की भरपाई नहीं की जा सकती. अगर बंगाल में बीजेपी को 23 सीटों की बढ़त मिल भी जाता है, तो मध्यप्रदेश में 8 सीटें, ओडिशा में 8 सीटें, छत्तीसगढ़ में 3 सीटें और उत्तर प्रदेश में जनवरी के मुकाबले गंवाई गई 10 सीटें मिलकर उस पूरी बढ़त को डकार जाती हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक आधार हैं. बंगाल में स्थानीय विरोध या सत्ता-विरोधी लहर के कारण अस्थायी फायदा मिल सकता है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी के प्रति गहराता जनाक्रोश संगठन के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ा खतरा है।

    ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के ये आंकड़े साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि देश का मतदाता अब आंख मूंदकर ‘डबल इंजन’ के झांसे में आने को तैयार नहीं है. केंद्र में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत प्रभाव आज भी कायम है और लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर उन पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन राज्यों की बीजेपी सरकारों की नाकामी, स्थानीय बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक सुस्ती ने जनता का मोहभंग कर दिया है. एक ताकतवर इंजन पूरी ट्रेन को खींचने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन अगर राज्यों का दूसरा इंजन पूरी तरह खराब हो जाए, तो गाड़ी को पटरी से उतरने में वक्त नहीं लगता।

  • देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

    देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2026) का पावन पर्व मनाया जा रहा है और इसी के साथ आज साल का आखिरी चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी लग रहा है. राहत की बात तो यह है कि यह चंद्रग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसी कारण भारत में आज रक्षाबंधन का पर्व पूरी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।

    रक्षाबंधन के इस खास दिन पर बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं. वहीं, भाई भी अपनी बहनों की जीवनभर रक्षा करने और हर सुख-दुख में उनका साथ देने का वचन देते हैं. इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा, ऐसे में पूरे दिन राखी बांधना शुभ माना जा रहा है. बहनें सुबह से ही अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी. आइए जानते हैं कि आज राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) कब से कब तक है और इस दिन कौन-कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं।


    रक्षाबंधन 2026 की तिथि (Raksha Bandhan 2026 Date)

    पंचांग के मुताबिक, हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन पूर्णिमा की तिथि 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 28 अगस्त यानी आज सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर होगा।


    रक्षाबंधन 2026 भद्रा काल का समय (Raksha Bandhan 2026 Bhadra kaal Timing)

    शास्त्रों के मुताबिक, भद्रा के दौरान राखी बांधना बहुत ही अशुभ होता है. हालांकि, इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा. सावन पूर्णिमा पर भद्रा 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर कल रात 9 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो चुकी है. यानी रक्षाबंधन का मुहूर्त शुरू होने से पहले ही भद्रा काल समाप्त हो चुका है.


    रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Raksha Bandhan 2026 Shubh muhurat)

    रक्षाबंधन पर भाई को राखी बांधने का सबसे पहला शुभ मुहूर्त आज सुबह 05 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. यानी भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए बहनों को करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलने वाला है.

    इसके अलावा, अगर आप किसी कारणवश इस मुहूर्त में राखी बांध पाएं तो अभिजीत मुहूर्त भी रहेगा. जिसका समय आज सुबह 11 बजकर 56 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा।

    राखी बांधने के कुछ अन्य मुहूर्त भी हैं जैसे-
    शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:28 बजे से 2:03 बजे तक
    अपराह्न काल: दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:16 बजे तक
    चर चौघड़िया: शाम 5:13 बजे से 6:48 बजे तक

    रक्षाबंधन पर बन रहे कई शुभ योग (Raksha Bandhan 2026 Shubh Yog)
    रक्षाबंधन पर आज करीब 11 शुभ योगों का संयोग बन रहा है. शतभिषा नक्षत्र के साथ अतिगंड, शोभन, शिव और विजय जैसे योग बनने की बात कही जा रही है. इसके अलावा चंद्रादि, बुधादित्य, विमल, विपरीत राजयोग, धन, उभयचरी, शकट और सुनफा योग का भी संयोग बताया जा रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ऐसे शुभ योगों में पूजा-पाठ, दान और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने जैसे धार्मिक कार्यों को विशेष फलदायी माना जाता है. रक्षाबंधन के दिन ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है. सूर्य सिंह राशि में रहेंगे, जबकि गुरु कर्क राशि में स्थित होंगे. ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल, प्रतिष्ठा और ऊर्जा का कारक माना जाता है, वहीं गुरु को ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और समृद्धि से जोड़ा जाता है. चंद्रमा कुंभ राशि में रहेंगे. ऐसे में ग्रहों और नक्षत्रों का यह संयोग रक्षाबंधन को धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से खास बना रहा है।


    इस अशुभ मुहूर्त में ना बांधें राखी? (Raksha Bandhan 2026 Rahu kaal Timing)

    हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन पर जिस तरह भद्रा काल का ध्यान रखा जाता है उसी तरह राहु काल का ध्यान रखना चाहिए. राहु काल कल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा. वहीं, यमगंड दोपहर 3 बजकर 35 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगा. ऐसे में, ज्योतिषविदों की सलाह है कि रक्षाबंधन पर राहु काल लगने से पहले या बाद में भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधें।


    कैसे मनाएं रक्षाबंधन? (Raksha Bandhan 2026 Rituals)

    रक्षाबंधन के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने इष्टदेव का स्मरण करें. इसके बाद पूजा की थाली सजाएं, जिसमें रोली, चंदन, अक्षत, दही, राखी, मिठाई और घी का दीपक रखें. सबसे पहले भगवान की विधिवत पूजा करें. इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. राखी बांधते समय इस बात का ध्यान रखें कि भाई और बहन दोनों का सिर ढका होना चाहिए. बहन सिर पर चुनरी रखें और भाई साफ रुमाल या किसी स्वच्छ वस्त्र से अपना सिर ढकें।

    अब भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत रखें. भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें. इसके बाद भाई की कलाई पर राखी बांधें, आरती उतारें और मिठाई खिलाकर उसके मंगलमय जीवन की प्रार्थना करें. राखी बांधने के बाद माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद जरूर लें. वहीं, भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार बहन को उपहार या आशीर्वाद दें और जीवनभर उसकी रक्षा व सहयोग का संकल्प लें।


    आखिर कहां से शुरू हुई राखी की परंपरा

    एक समय की बात है कि राजपूत मुस्लिमों के खिलाफ लड़ रहे थे. अपने पति राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ की कमान रानी कर्णावती के हाथों में थी. उस समय गुजरात के बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया था. कर्णावती ने तब हुमायूं से मदद मांगने के लिए उसे राखी भेजी. हुमायूं उस समय एक युद्ध के बीच में था, मगर रानी के इस कदम ने उसे भीतर से छू लिया. हुमायूं ने अपनी फौज फौरन मेवाड़ के लिए भेज दी. दुर्भाग्‍यवश, उसके सैनिक समय पर नहीं पहुंच पाए और चित्‍तौड़ में राजपूत सेना की हार हुई. रानी ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर (खुद को आग लगा ली) कर लिया. लेकिन हुमायूं की सेना ने चित्‍तौड़ से शाह को खदेड़ कर रानी के पुत्र विक्रमजीत को गद्दी सौंप दी और अपनी राखी का मान रखा।


    देवराज इंद्र और इंद्राणी की राखी

    माना जाता है कि एक बार दैत्‍य वृत्रासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल करने के लिए स्‍वर्ग पर चढ़ाई कर दी. वृत्रासुर बहुत ताकतवर था और उसे हराना आसान नहीं था. युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए उनकी बहन इंद्राणी ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांध दिया. इस रक्षासूत्र ने इंद्र की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए. तभी से बहनें अपने भाइयों की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधने लगीं।

  • दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!

    दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!


    नई दिल्ली।
    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में पश्चिम एशिया संघर्ष (West Asia Conflict) को लेकर सदस्य देशों में टकराव की आशंका है लेकिन भारत (India) ने इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। भारत की कोशिश है कि सभी मुद्दों पर सहमति से संयुक्त बयान जारी हो।

    पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हो रहा। भारत की अध्यक्षता में चौथी बार आयोजित हो रहे सम्मेलन का विषय, ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ है।

    सम्मेलन के लिए भारत ने बाकी 10 सदस्य देशों के अलावा दस पार्टनर देशों को भी आमंत्रित किया है। इसमें में बेलारूस, बोलिविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उजबेकिस्तान एवं वियतनाम शामिल हैं।


    बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया

    इसके अलावा बिमस्टेक चेयर के नाते बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया है। सूत्रों के अनुसार ईरान की कोशिश रहेगी कि संयुक्त बयान में अमेरिका और इजरायल के हमले की निंदा की जाए क्योंकि यह एक ब्रिक्स सदस्य देश की संप्रभुता पर हमला है।

    दूसरे, उसका आरोप है कि एक दूसरे सदस्य यूएई ने हमलों में अमेरिका का साथ दिया तथा अपनी भूमि का इस्तेमाल होने दिया। इसी के चलते मई में विदेश मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर बयान जारी नहीं हो सका। यह स्थिति शिखर सम्मेलन में भी हो सकती है।


    ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का प्रस्ताव नहीं

    विदेश मंत्रालय के अनुसार यूरो की तर्ज पर ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, इस मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति आक्रामक हैं और वे बार-बार ब्रिक्स देशों को चेतावनी दे रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार के दौरान लेन-देन की कीमत को कम करने के लिए व्यवहारिक तरीके अपनाने पर बातचीत चल रही है। इनमें स्थानीय मुद्रा में कारोबार जैसे विकल्प शामिल हैं। सितंबर में ब्रिक्स वित्त मंत्रियों की बैठक की जाएगी।


    भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा

    सूत्रों ने कहा कि संयुक्त बयान में ईरान पर हमले की निंदा को शामिल करना संभव नहीं होगा। इसके पीछे वजह यह है कि एक तो ब्रिक्स सुरक्षा से जुड़ा मंच नहीं है। दूसरे, भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहेगा जिससे पश्चिम को नाराजगी हो। सूत्रों ने कहा कि भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा है। सभी सदस्य चाहते हैं कि संकट जल्द खत्म हो और जलमार्गों से निर्बाध नौवहन शुरू हो। इस विषय को शामिल किया जा सकता है।

  • नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट

    नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में बनी एक विशाल बैरियर लेक (प्राकृतिक झील) को लेकर वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने अगले 72 घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए इलाके में निगरानी और फ्लड सिमुलेशन शुरू कर दिया है। आशंका जताई जा रही है कि यदि झील को रोक रहा प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बह सकता है।

    यह झील छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो नदियों के संगम पर बनी है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार यह क्षेत्र भारतीय सीमा से लगभग 120 से 140 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग से इसकी दूरी करीब 18 किलोमीटर बताई जा रही है। भौगोलिक रूप से भारत से दूरी अधिक नहीं होने के बावजूद चिंता का कारण इसका नदी तंत्र से जुड़ाव है, क्योंकि यहां का पानी आगे चलकर नेपाल होते हुए गंडक नदी के जरिए भारत तक पहुंचता है।

    झील में करोड़ों लीटर पानी जमा
    चीन की ओर से जारी चेतावनी के मुताबिक बैरियर लेक का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के अनुमान के अनुसार झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी पहले ही जमा हो चुका है, जबकि लगभग 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी और जमा होने की संभावना जताई गई है। यानी कुल मिलाकर 50 लाख क्यूबिक मीटर तक पानी प्राकृतिक बांध के पीछे इकट्ठा हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पानी का दबाव बढ़ने से प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो यह ग्लेशियल या भूस्खलन से बनी झील के अचानक फटने (लेक आउटबर्स्ट फ्लड) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी घटनाओं में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है और अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ तथा भारी मात्रा में मलबा भी बहाकर ले जाता है।

    अगले 72 घंटे क्यों अहम
    खतरे को देखते हुए चीन ने रियल-टाइम मॉनिटरिंग और फ्लड मॉडलिंग शुरू की है। वैज्ञानिक यह आकलन कर रहे हैं कि यदि प्राकृतिक बांध में दरार बढ़ती है या वह टूटता है तो पानी की दिशा, मात्रा और गति क्या होगी। 27 अगस्त को जारी चेतावनी के बाद से पूरे क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि झील का पानी धीरे-धीरे बाहर निकलेगा या अचानक बांध टूटने जैसी स्थिति बनेगी। यदि जल निकासी नियंत्रित रहती है तो निचले इलाकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सकता है, लेकिन अचानक बांध टूटने की स्थिति में बाढ़ की लहर बेहद कम समय में नीचे पहुंच सकती है।

    बिहार और उत्तर प्रदेश पर क्यों नजर
    छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो का पानी आगे नेपाल की नदियों में मिलकर भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी तंत्र का हिस्सा बनता है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी नदी में समाहित होती है, जिसे भारत में गंडक नदी के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि ऊपरी क्षेत्र में किसी भी असामान्य जलप्रवाह का असर बिहार और उत्तर प्रदेश के गंडक बेसिन वाले इलाकों पर पड़ सकता है।

    हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल भारत में बड़ी बाढ़ की कोई निश्चित आशंका नहीं है, लेकिन नदी तंत्र के आपसी जुड़ाव को देखते हुए निगरानी और सतर्कता बेहद जरूरी है।

    नेपाल में पहले ही मची है तबाही
    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में हाल की बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में सड़कें, पुल और मकान प्रभावित हुए हैं। कई क्षेत्रों में नदी के साथ बहकर आए मलबे ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है और अनेक लोगों के लापता होने की भी खबरें हैं।

    ऐसे में अब प्रशासन की नजर केवल बैरियर लेक पर नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र पर है। आने वाले 72 घंटे यह तय करेंगे कि झील स्थिर रहती है या फिर उसके जलस्तर में बढ़ोतरी नई चुनौती खड़ी करती है।

  • हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    अल्मोड़ा। उत्तराखंड के चौखुटिया क्षेत्र की तड़ागताल झील से मिले प्राचीन जीवाश्मों ने इस इलाके के भूगर्भीय इतिहास को लेकर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के सर्वे के दौरान यहां स्ट्रोमैटोलाइट्स के अवशेष मिले हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, ये अवशेष करीब 100 से 150 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं।

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को शुरुआती सूक्ष्मजीवन के महत्वपूर्ण प्रमाणों में गिना जाता है। ऐसे में इनका तड़ागताल क्षेत्र में मिलना इस बात का संकेत देता है कि यहां आज से अरबों वर्ष पहले सूक्ष्मजीवों का अस्तित्व रहा होगा।

    झील के विकास के लिए हो रहा था सर्वे

    तड़ागताल झील को पर्यटन और जलस्रोत के रूप में विकसित करने की संभावनाओं को लेकर लगातार सर्वे किए जा रहे हैं। इसी भूगर्भीय अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को झील के आसपास स्ट्रोमैटोलाइट्स की चट्टानें मिलीं।

    वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलौत के मुताबिक, इन अवशेषों के अध्ययन से उनकी उम्र लगभग 100 से 150 करोड़ वर्ष आंकी गई है। उन्होंने बताया कि स्ट्रोमैटोलाइट्स सूक्ष्मजीवों से जुड़े जीवाश्म हैं और इनका मिलना इस क्षेत्र में प्राचीन सूक्ष्मजीवन की मौजूदगी का संकेत देता है।

    क्या होते हैं स्ट्रोमैटोलाइट्स?

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रमाणों में माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती दौर में समुद्रों में साइनोबैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये सूक्ष्मजीव चिपचिपी परतें बनाते थे। लंबे भूगर्भीय समय में इन परतों के जमा होने से परतदार चट्टानों जैसी संरचनाएं बन गईं, जिन्हें स्ट्रोमैटोलाइट्स कहा जाता है।

    तड़ागताल में इन संरचनाओं का मिलना इसलिए अहम है क्योंकि इनकी उम्र हिमालय के निर्माण से बहुत पहले की बताई जा रही है।

    हिमालय से पहले कैसा था यह इलाका?

    भूवैज्ञानिक इतिहास के मुताबिक हिमालय का निर्माण करीब 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर के बाद हुआ। इस टक्कर ने धरती की परतों में बड़े बदलाव किए और हिमालयी पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ।

    हिमालय के निर्माण से पहले इस क्षेत्र में टेथिस सागर मौजूद था। टेथिस सागर के बनने की प्रक्रिया लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई मानी जाती है। लेकिन तड़ागताल से मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स की अनुमानित उम्र इससे भी कहीं ज्यादा पुरानी है। यानी इन चट्टानों में दर्ज जीवन उस दौर का हो सकता है जब टेथिस सागर भी अस्तित्व में नहीं आया था।

    कुमाऊं की बड़ी झीलों में शामिल है तड़ागताल

    तड़ागताल कुमाऊं क्षेत्र की प्रमुख और बड़ी झीलों में गिनी जाती है। मानसून के दौरान यह पानी से भर जाती है, जबकि सर्दियों में इसका पानी प्राकृतिक रूप से बाहर निकल जाता है। झील के तल में बने पांच प्राकृतिक छिद्रों से पानी रिसकर बाहर निकलता है। पानी निकलने के बाद स्थानीय ग्रामीण झील के तल में गेहूं की खेती भी करते हैं।

    चारों ओर पहाड़ियों से घिरी तड़ागताल प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जानी जाती है। स्थानीय लोग और ताल झील समिति लंबे समय से इसे व्यवस्थित झील और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं।

    हिमालय के इतिहास के लिए क्यों अहम है खोज?

    तड़ागताल में मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स सिर्फ प्राचीन जीवन की कहानी नहीं बताते, बल्कि इस इलाके के भूगर्भीय अतीत की एक नई कड़ी भी सामने रखते हैं। अगर इन अवशेषों की उम्र और भूगर्भीय संदर्भ आगे के वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पुष्ट होते हैं, तो यह खोज हिमालयी क्षेत्र के निर्माण से पहले यहां मौजूद परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

  • गांवों और महिलाओं की बैंकिंग में बड़ी छलांग जन-धन योजना के खाते 59 करोड़ पार औसत जमा में भी जबरदस्त बढ़ोतरी

    गांवों और महिलाओं की बैंकिंग में बड़ी छलांग जन-धन योजना के खाते 59 करोड़ पार औसत जमा में भी जबरदस्त बढ़ोतरी


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री जन-धन योजना यानी पीएमजेडीवाई ने देश में बैंकिंग सुविधाओं की पहुंच को व्यापक बनाने की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वित्त मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक योजना के तहत खुले बैंक खातों की संख्या अब 59 करोड़ से अधिक हो गई है। इन खातों में जमा कुल राशि भी बढ़कर 3.17 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा बताता है कि जन-धन योजना केवल बैंक खाते खोलने तक सीमित नहीं रही बल्कि आम लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    पीएम जन-धन योजना की शुरुआत 28 अगस्त 2014 को हुई थी और अब इसे 12 वर्ष पूरे हो चुके हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य उन लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना था जिनके पास पहले कोई बैंक खाता नहीं था। खास बात यह है कि योजना के तहत खुले खातों में 78 प्रतिशत खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं। इससे पता चलता है कि बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार देश के छोटे शहरों और गांवों तक भी तेजी से हुआ है। वहीं कुल खातों में महिलाओं की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत है जो वित्तीय समावेशन के साथ महिला आर्थिक भागीदारी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    19 अगस्त 2026 तक जन-धन खातों में प्रति खाता औसत जमा राशि 5,356 रुपए दर्ज की गई। मंत्रालय के अनुसार पिछले 12 वर्षों में प्रति खाते औसत जमा राशि करीब 3.4 गुना बढ़ी है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि खाताधारक इन बैंक खातों का लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं और उनके भीतर नियमित बचत की आदत भी विकसित हो रही है। यानी जन-धन खाते अब केवल सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का माध्यम नहीं बल्कि परिवारों की रोजमर्रा की वित्तीय जरूरतों का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

    योजना की एक बड़ी खासियत इसमें मिलने वाली बैंकिंग और वित्तीय सुरक्षा सुविधाएं भी हैं। प्रत्येक पात्र खाते के साथ मुफ्त रुपे डेबिट कार्ड उपलब्ध कराया जाता है जिसमें 2 लाख रुपए तक का दुर्घटना बीमा कवर शामिल है। इसके अलावा पात्र खाताधारकों को 10 हजार रुपए तक की ओवरड्राफ्ट सुविधा भी मिल सकती है। यह सुविधा अचानक सामने आने वाली आर्थिक जरूरतों के समय परिवारों के लिए मददगार साबित हो सकती है।

    वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने कहा कि पीएमजेडीवाई का उद्देश्य प्रत्येक ऐसे वयस्क व्यक्ति को बेसिक बैंक अकाउंट उपलब्ध कराना है जिसका पहले बैंक खाता नहीं था। इस खाते के लिए न्यूनतम बैलेंस रखने की बाध्यता नहीं है और मेंटेनेंस चार्ज भी नहीं लिया जाता। सरकार के अनुसार इस व्यवस्था ने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को बैंकिंग और अन्य वित्तीय सेवाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    जन-धन खातों के विस्तार का असर बीमा और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच पर भी पड़ा है। बैंक खाता होने से आम लोगों के लिए बीमा और पेंशन योजनाओं से जुड़ना आसान हुआ है। सरकार का कहना है कि देशभर में लगातार चलाए गए अभियानों के जरिए बैंकिंग पहुंच को लगभग हर वर्ग तक ले जाने और जरूरतमंद लोगों के बीच बीमा तथा पेंशन कवरेज का दायरा बढ़ाने की कोशिश जारी है। 59 करोड़ से ज्यादा खातों और 3.17 लाख करोड़ रुपए की जमा राशि का आंकड़ा इस अभियान की व्यापक पहुंच को दर्शाता है।

  • गुजरात को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट हब बनाने की तैयारी सीएम बोले कई कंपनियां निवेश को लेकर उत्साहित

    गुजरात को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट हब बनाने की तैयारी सीएम बोले कई कंपनियां निवेश को लेकर उत्साहित


    नई दिल्ली। गुजरात में ग्लोबल निवेश को बढ़ावा देने की दिशा में राज्य सरकार की कोशिशों को अमेरिका और कनाडा के दौरे से बड़ी उम्मीद मिली है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की विदेश यात्रा पूरी होने के बाद अहमदाबाद एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया गया। उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी समेत कई नेताओं और अधिकारियों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री ने कहा कि इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दुनिया की बड़ी कंपनियों और निवेशकों को गुजरात में निवेश के लिए आकर्षित करना था। मुख्यमंत्री के मुताबिक अमेरिका और कनाडा में निवेशकों के साथ हुई बैठकों के दौरान गुजरात को लेकर सकारात्मक और उत्साहजनक प्रतिक्रिया देखने को मिली है।

    भूपेंद्र पटेल ने कहा कि गुजरात सरकार लगातार यह प्रयास कर रही है कि भारत में आने वाला अधिक से अधिक ग्लोबल निवेश राज्य तक पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक संबंधों और उनके प्रति दुनिया में मौजूद भरोसे को भी निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। मुख्यमंत्री के अनुसार विदेश यात्रा के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक साख मजबूत हुई है और इसका सकारात्मक प्रभाव निवेशकों के रुख पर भी नजर आ रहा है। यही वजह है कि कई निवेशक गुजरात के अलग अलग क्षेत्रों में बड़े स्तर पर निवेश करने को लेकर उत्सुक दिखाई दिए।

    इस दौरे में सेमीकंडक्टर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा सेंटर और मैन्युफैक्चरिंग जैसे तेजी से बढ़ते सेक्टरों पर विशेष जोर रहा। इन क्षेत्रों से जुड़ी बड़ी कंपनियों और निवेशकों के साथ प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। इसके अलावा गुजरात के महत्वाकांक्षी गिफ्ट सिटी को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र के तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रमुख फाइनेंशियल कंपनियों के साथ भी चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि बैठकों के दौरान मिली प्रतिक्रिया उत्साह बढ़ाने वाली रही और कई कंपनियां गुजरात में निवेश के लिए आगे बढ़ने को तैयार दिखाई दे रही हैं।

    विदेश यात्रा का एक बड़ा उद्देश्य आगामी वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2027 के लिए वैश्विक निवेशकों को आमंत्रित करना भी रहा। यह समिट 10 से 12 जनवरी 2027 तक आयोजित होने वाला है। सरकार की कोशिश है कि इस आयोजन के जरिए गुजरात को निवेश सहयोग और वैश्विक साझेदारी के लिए दुनिया के प्रमुख उद्योग समूहों के सामने एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया जाए। प्रतिनिधिमंडल ने सैन फ्रांसिस्को वॉशिंगटन डीसी और न्यूयॉर्क में निवेशकों टेक्नोलॉजी लीडर्स युवा उद्यमियों इनोवेटर्स और गुजराती समुदाय के सदस्यों से मुलाकात की।

    प्रतिनिधिमंडल में मुख्य सचिव एमके दास वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव टी नटराजन उद्योग और खान विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव ममता वर्मा तथा मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव संजीव कुमार समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहे। अधिकारियों ने निवेश से जुड़े अवसरों और गुजरात में उपलब्ध औद्योगिक तथा वित्तीय सुविधाओं को लेकर संभावित निवेशकों के साथ चर्चा की। मुख्यमंत्री ने दौरे के बाद भरोसा जताया कि आने वाले समय में गुजरात में बड़े स्तर पर निवेश देखने को मिलेगा और राज्य के औद्योगिक विकास को नई गति मिलेगी।