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  • बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक

    बंगाल में अपने ही मंत्री पर भड़के BJP विधायक, बोले- हत्या के आरोपियों के साथ मंच साझा करना शर्मनाक


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भाजपा के भीतर 2020 में हुई पार्टी नेता मनीष शुक्ला की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। बैरकपुर से भाजपा विधायक कौस्तुव बागची ने अपनी ही पार्टी के श्रम एवं परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह पर सवाल उठाए हैं। बागची ने कुछ तस्वीरों और वीडियो का हवाला देते हुए पूछा कि मनीष शुक्ला हत्याकांड में जिन लोगों के नाम सामने आए थे, उनके साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता मंच कैसे साझा कर सकते हैं। उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्रवाई की तैयारी की बात भी कही है।

    2020 में हुई थी मनीष शुक्ला की हत्या
    भाजपा नेता मनीष शुक्ला की 4 अक्टूबर 2020 को टीटागढ़ में भाजपा कार्यालय के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच सीआईडी ने की थी और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। अब कौस्तुव बागची ने पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेताओं उत्तम दास और प्रशांत चौधरी के साथ अर्जुन सिंह की मौजूदगी पर आपत्ति जताई है।

    बागची का दावा है कि मनीष शुक्ला के पिता ने हत्या के मामले में इन दोनों के नाम आरोपियों के तौर पर लिए थे। उनके मुताबिक, ऐसे लोगों के साथ पार्टी नेताओं की तस्वीरें सामने आने से उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र में लोगों के सवालों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम मामले में आने और अदालत में दोष सिद्ध होने के बीच अंतर है।

    अर्जुन सिंह से निजी नाराजगी नहीं, लेकिन साथ मंच साझा करने पर आपत्ति
    कौस्तुव बागची ने कहा कि अर्जुन सिंह पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और उनसे उनकी कोई व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है। उनकी आपत्ति उन लोगों के साथ मंच साझा करने को लेकर है, जिनके नाम मनीष शुक्ला हत्याकांड में सामने आने का दावा किया जा रहा है।

    बागची ने कहा कि वह इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी कदम उठाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, मुख्य सचिव, सीआईडी के महानिदेशक और बैरकपुर पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखने की बात कही है।

    BJP में शामिल करने का भी कर रहे विरोध
    बागची ने उत्तम दास और प्रशांत चौधरी को भाजपा में शामिल किए जाने का भी विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ने पर वह भाजपा के प्रदेश मुख्यालय के सामने खुद को आग लगा लेंगे। इससे पहले भी उन्होंने इस मुद्दे पर सिर मुंडवाकर विरोध जताने की बात कही थी।

    उनके बयान से पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद खुलकर सामने आए हैं। हालांकि, दोनों व्यक्तियों की भाजपा में औपचारिक सदस्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट करने के लिए पार्टी की आधिकारिक प्रतिक्रिया जरूरी होगी।

    अर्जुन सिंह और उत्तम दास ने क्या कहा?
    अर्जुन सिंह ने बागची के आरोपों को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि राजनीति कैसे करनी है।” वहीं, उत्तम दास ने मंत्री के साथ अपनी मौजूदगी को निजी संबंधों से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि वह काफी समय पहले तृणमूल कांग्रेस से अलग हो चुके हैं और उन्होंने भाजपा में शामिल होने की इच्छा नहीं जताई है।

    TMC ने भी BJP पर साधा निशाना
    इस विवाद पर तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष ने भी भाजपा पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सार्वजनिक रूप से तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को पार्टी में शामिल नहीं करने की बात करती है, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं करती।

    इस तरह मनीष शुक्ला हत्याकांड को लेकर भाजपा के भीतर उठे सवालों ने बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। अब इस मामले में संबंधित नेताओं की आगे की प्रतिक्रिया और बागची की प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी।

  • निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी

    निशिकांत दुबे का कांग्रेस पर हमला, बोले- लगातार चुनावी हार के कारण अभद्र भाषा का सहारा ले रही पार्टी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि लगातार चुनावी हार के कारण कांग्रेस अब तक राजनीतिक झटकों से उबर नहीं पाई है। उन्होंने कहा कि पार्टी के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके दिवंगत माता-पिता को लेकर अभद्र टिप्पणियां कर रहे हैं, जो राजनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं हैं। दुबे ने राजनीतिक विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि देश के प्रधानमंत्री के पद का सम्मान किया जाना चाहिए।

    पत्रकारों से बातचीत में दुबे ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार चुनावी पराजयों के बावजूद पार्टी अपनी स्थिति सुधारने में सफल नहीं हो रही है। उनके मुताबिक, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे नेताओं की भूमिका के बावजूद कांग्रेस राजनीतिक चुनौतियों से बाहर नहीं निकल पा रही है। दुबे ने इसी संदर्भ में पार्टी पर अभद्र भाषा का सहारा लेने का आरोप लगाया।

    भाजपा सांसद ने अपने बयान में वर्ष 1971-72 के दौर का भी उल्लेख किया। उन्होंने बांग्लादेश युद्ध के बाद तत्कालीन अमेरिकी नेताओं हेनरी किसिंजर और रिचर्ड निक्सन की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बारे में की गई अपमानजनक टिप्पणियों का जिक्र किया। दुबे के अनुसार, उस समय भारतीय राजनीति में वैचारिक मतभेद होने के बावजूद विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के सम्मान से जुड़े मुद्दे पर उनका समर्थन किया था।

    उन्होंने कहा कि उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे विपक्षी नेताओं ने संसद में इंदिरा गांधी का बचाव किया था। दुबे ने इस उदाहरण के जरिए अपनी बात रखी कि राजनीतिक दलों के बीच मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के पद के प्रति सम्मान बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौरान राष्ट्रीय नेतृत्व और संवैधानिक पदों की गरिमा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

    दुबे ने मौजूदा राजनीतिक माहौल पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही भाषा पर आपत्ति जताई। उन्होंने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के दिवंगत माता-पिता को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों को अनुचित बताया। भाजपा सांसद ने कहा कि राजनीतिक बहस में किसी नेता के परिवार के सदस्यों को निशाना बनाना उचित नहीं है। उनके अनुसार, विरोधियों को नीतियों और राजनीतिक फैसलों पर सवाल उठाने चाहिए, न कि व्यक्तिगत या पारिवारिक टिप्पणियों के जरिए विवाद बढ़ाना चाहिए।

    भाजपा सांसद ने राहुल गांधी से जुड़े मानहानि मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने राहुल गांधी के बरी होने के संदर्भ में सवाल उठाते हुए कहा कि संबंधित मामला गृह मंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणी से जुड़ा था। दुबे ने यह भी पूछा कि क्या एक राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से दूसरे दल के नेता के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक आचरण माना जा सकता है। इस मुद्दे पर उन्होंने राजनीतिक संवाद की मर्यादा को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की।

    दुबे ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सरकार की आलोचना करने और अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। हालांकि, उनके अनुसार, विरोध दर्ज कराने के लिए भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब राजनीतिक विरोधी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने में असमर्थ होते हैं, तो वे अभद्र भाषा का सहारा लेते हैं। उनके बयान का मुख्य जोर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक संवाद में सम्मान और संयम बनाए रखने पर रहा।

  • यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    यूपी चुनाव 2027 से पहले ओवैसी का अखिलेश यादव पर हमला, आजमगढ़ से बदायूं तक परिवारवाद को लेकर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम बहुल सीटों और विपक्षी दलों के बीच गठबंधन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए परिवारवाद का आरोप लगाया है। कैराना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आजमगढ़, बदायूं और फिरोजाबाद का जिक्र किया और दावा किया कि इन क्षेत्रों में पहले मुस्लिम सांसद चुने जाते थे, लेकिन अब यादव परिवार के सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

    ओवैसी ने अपने भाषण में कहा कि एक समय आजमगढ़ से मुस्लिम सांसद जीतकर संसद पहुंचते थे, जबकि अब वहां से अखिलेश यादव के भाई सांसद हैं। उन्होंने बदायूं और फिरोजाबाद का उल्लेख करते हुए भी समाजवादी पार्टी पर परिवार के सदस्यों को राजनीतिक अवसर देने का आरोप लगाया। उनके बयान का मुख्य मुद्दा मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और समाजवादी पार्टी में परिवार की भूमिका रहा।

    AIMIM प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश यादव को अपनी पार्टी का नाम समाजवादी पार्टी के बजाय समाजवादी यादव परिवार रख लेना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यादव परिवार की राजनीति में परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता दी जा रही है और मुस्लिम समुदाय से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग पीछे रखे।

    उन्होंने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित की जा रही है। ओवैसी के अनुसार, समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विभिन्न समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के मामले में उसकी क्या नीति है। उन्होंने परिवारवाद के मुद्दे को उठाते हुए सपा पर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन का राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया।

    ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर भी अखिलेश यादव की आलोचना की। हालांकि, उनके इस बयान के संदर्भ में उपलब्ध जानकारी में सपा की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन समाजवादी पार्टी समेत कई दलों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में ओवैसी के बयान को आगामी चुनाव से पहले विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    विपक्षी गठबंधन को लेकर ओवैसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी जताई है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्षी दलों का उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो AIMIM भी उनके साथ आने के लिए तैयार है। ओवैसी ने यह भी कहा कि वह योगी आदित्यनाथ को तीसरी बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहते। उनके इस रुख से संकेत मिलता है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की संभावना पर उनकी पार्टी बातचीत के लिए तैयार है, हालांकि गठबंधन की कोई अंतिम रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    ओवैसी की राजनीतिक रणनीति को लेकर भी चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में AIMIM अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। खबर में उल्लेख किया गया है कि 15 अक्टूबर को मुस्लिम विद्वान और राजनीतिक विश्लेषक हाजी अब्दुल सलाम ने दावा किया था कि AIMIM राज्य की 200 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। उनके अनुसार, यदि पार्टी को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में जगह नहीं मिलती है, तो कुछ सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। यह फिलहाल एक रणनीतिक आकलन है, न कि घोषित उम्मीदवारों की अंतिम सूची।

    मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और संभल जैसे जिलों में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इन क्षेत्रों में विभिन्न दलों की चुनावी रणनीति और गठबंधन की स्थिति राजनीतिक मुकाबले को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि AIMIM कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और विपक्षी दलों के बीच सीटों के तालमेल को लेकर क्या सहमति बनेगी।

    2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी के बयानों ने समाजवादी पार्टी की राजनीति, परिवारवाद और मुस्लिम प्रतिनिधित्व को बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी दल गठबंधन को लेकर क्या फैसला करते हैं और मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाते हैं।

  • सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    सुल्तानपुर कोर्ट से राहुल गांधी को राहत, अमित शाह पर टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हुए बरी

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की विशेष अदालत ने कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को मानहानि के एक पुराने मामले में बरी कर दिया है। यह मामला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कथित टिप्पणी से जुड़ा था। अदालत के फैसले से राहुल गांधी को कानूनी राहत मिली है। फैसला सुनाए जाने के बाद अदालत परिसर के बाहर मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने खुशी जताई। कार्यकर्ताओं ने ढोल बजाकर और नाचकर फैसले का स्वागत किया।

    यह मामला वर्ष 2018 में बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी की ओर से दिए गए कथित बयान से संबंधित था। आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अमित शाह के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर निवासी विजय मिश्रा ने अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। उस समय विजय मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के जिला उपाध्यक्ष थे। शिकायतकर्ता का कहना था कि राहुल गांधी के बयान से उन्हें ठेस पहुंची थी। इसी आधार पर उन्होंने कांग्रेस नेता के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया था।

    मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी को अदालत में पेश होने के लिए भी कहा गया था। सुल्तानपुर की एमपी-एमएलए अदालत ने 16 दिसंबर 2023 को उन्हें पेश होने का निर्देश दिया था। इसके बाद राहुल गांधी अदालत पहुंचे। फरवरी 2024 में अदालत ने उन्हें जमानत दे दी थी। उस समय राहुल गांधी ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को गलत बताते हुए खुद को निर्दोष कहा था। इसके बाद मामले में कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ती रही।

    सुनवाई के दौरान शिकायत से जुड़े पक्षों की गवाही और अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की गईं। इसके बाद मामले में अंतिम बहस हुई। राहुल गांधी के वकील ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ता पक्ष उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में सफल नहीं रहा। बचाव पक्ष ने इसी आधार पर राहुल गांधी को राहत दिए जाने की मांग की।

    अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद राहुल गांधी को बरी कर दिया। इस फैसले के साथ अमित शाह पर कथित टिप्पणी को लेकर वर्ष 2018 में शुरू हुई मानहानि की कानूनी कार्यवाही में उन्हें राहत मिली। शिकायतकर्ता पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका, यह बात राहुल गांधी के वकील ने अदालत में अपनी दलील के रूप में रखी थी।

    फैसले की जानकारी सामने आने के बाद अदालत के बाहर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उत्साह जाहिर किया। उन्होंने ढोल बजाए और नाचकर अपनी खुशी व्यक्त की। राहुल गांधी को मिली राहत के बाद कार्यकर्ताओं के बीच जश्न का माहौल दिखाई दिया।

    यह मामला राजनीतिक बयानबाजी से जुड़ी शिकायतों और उनसे संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं के संदर्भ में भी चर्चा में रहा। वर्ष 2018 में दर्ज शिकायत के बाद मामले की सुनवाई कई चरणों से गुजरी। दिसंबर 2023 में अदालत में पेशी का निर्देश, फरवरी 2024 में जमानत और उसके बाद जारी सुनवाई इस प्रक्रिया के प्रमुख पड़ाव रहे।

    सुल्तानपुर की विशेष अदालत का ताजा फैसला राहुल गांधी के लिए इस मानहानि मामले में महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है। अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया है। फैसले के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहत और खुशी जताई, जबकि मामले में शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप अदालत में साबित नहीं हो सके।

  • सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के 20 पदों पर भर्ती, ग्रेजुएट उम्मीदवार 15 नवंबर तक कर सकते हैं आवेदन

    सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के 20 पदों पर भर्ती, ग्रेजुएट उम्मीदवार 15 नवंबर तक कर सकते हैं आवेदन

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में नौकरी पाने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए भर्ती का अवसर सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट मास्टर (शॉर्टहैंड) के 20 संभावित रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। इन पदों के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 25 अक्टूबर 2026 से शुरू हो चुकी है। इच्छुक और योग्य अभ्यर्थी 15 नवंबर 2026 को रात 11:55 बजे तक आवेदन कर सकते हैं। उम्मीदवारों को निर्धारित समयसीमा के भीतर आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से आवेदन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से स्नातक की डिग्री होना आवश्यक है। इसके साथ ही अंग्रेजी शॉर्टहैंड में 120 शब्द प्रति मिनट की गति और कंप्यूटर संचालन का ज्ञान होना चाहिए। उम्मीदवार की कंप्यूटर पर अंग्रेजी टाइपिंग स्पीड कम से कम 40 शब्द प्रति मिनट होनी जरूरी है।

    शैक्षणिक योग्यता और तकनीकी दक्षता के अलावा संबंधित पदों पर कार्य अनुभव भी अनिवार्य रखा गया है। अभ्यर्थियों के पास सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों या वैधानिक निकायों में प्राइवेट सेक्रेटरी, सीनियर पर्सनल असिस्टेंट, पर्सनल असिस्टेंट या सीनियर स्टेनोग्राफर के पद पर कम से कम पांच वर्ष की नियमित सेवा का अनुभव होना चाहिए। आवेदन करने से पहले उम्मीदवारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे निर्धारित शैक्षणिक, तकनीकी और अनुभव संबंधी शर्तों को पूरा करते हैं।

    भर्ती के लिए न्यूनतम आयु सीमा 30 वर्ष और अधिकतम आयु सीमा 45 वर्ष निर्धारित की गई है। आयु की गणना 1 अक्टूबर 2026 के आधार पर की जाएगी। आरक्षित श्रेणियों से संबंधित उम्मीदवारों को नियमानुसार अधिकतम आयु सीमा में छूट का लाभ मिलेगा। अभ्यर्थियों को आवेदन करने से पहले अपनी आयु और श्रेणी से संबंधित पात्रता की जांच कर लेनी चाहिए।

    उम्मीदवारों का चयन कई चरणों में किया जाएगा। सबसे पहले प्राप्त आवेदनों की स्क्रीनिंग होगी। इसके बाद वस्तुनिष्ठ प्रकार की परीक्षा, अंग्रेजी शॉर्टहैंड परीक्षा, कंप्यूटर पर अंग्रेजी टाइपिंग स्पीड टेस्ट और व्यक्तिगत साक्षात्कार आयोजित किया जाएगा। चयन प्रक्रिया के सभी निर्धारित चरणों को पूरा करने वाले उम्मीदवारों के आधार पर अंतिम चयन किया जाएगा।

    कोर्ट मास्टर पद पर चयनित उम्मीदवारों को 67,700 रुपये से लेकर 2,08,700 रुपये प्रतिमाह तक वेतन मिलेगा। इसके अतिरिक्त नियमानुसार अन्य लाभ और भत्ते भी दिए जाएंगे। वेतनमान को देखते हुए यह भर्ती उन योग्य अभ्यर्थियों के लिए अवसर है, जिनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता के साथ शॉर्टहैंड, टाइपिंग और संबंधित कार्य का अनुभव है।

    आवेदन के दौरान उम्मीदवारों को अपनी श्रेणी के अनुसार निर्धारित शुल्क ऑनलाइन जमा करना होगा। सामान्य और अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए आवेदन शुल्क 1,500 रुपये और बैंक शुल्क निर्धारित है। वहीं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग की नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी और पूर्व सैनिकों के लिए आवेदन शुल्क 750 रुपये तथा बैंक शुल्क देना होगा।

    सुप्रीम कोर्ट में कोर्ट मास्टर के इन पदों पर आवेदन करने के इच्छुक उम्मीदवारों को 15 नवंबर की अंतिम समयसीमा का ध्यान रखना होगा। आवेदन से पहले पात्रता,

  • खड़गे की टिप्पणी पर एनडीए नेताओं का विरोध, प्रधानमंत्री मोदी के दिवंगत पिता पर बयान को लेकर माफी की मांग तेज

    खड़गे की टिप्पणी पर एनडीए नेताओं का विरोध, प्रधानमंत्री मोदी के दिवंगत पिता पर बयान को लेकर माफी की मांग तेज


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई टिप्पणी को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले समेत एनडीए के कई नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। इन नेताओं ने टिप्पणी को अनुचित बताते हुए खड़गे से माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री और उनके परिवार से जुड़े विषयों पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

    केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने नागपुर में बातचीत के दौरान कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे एक ऐसी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष हैं, जो लगभग 60 से 70 वर्षों तक सत्ता में रही है। ऐसे में पार्टी के प्रमुख का प्रधानमंत्री का अपमान करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां करना गलत है और इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    आठवले ने कहा कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की भाषा का इस्तेमाल उनके पद के प्रति सम्मान से जुड़ा विषय है। उन्होंने खड़गे की टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह के बयान से प्रधानमंत्री का अपमान हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एनडीए नेता ऐसी टिप्पणियों को सहन नहीं करेंगे।

    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी इस मामले में कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि खड़गे और राहुल गांधी सहित कांग्रेस के नेताओं की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माता-पिता को लेकर समय-समय पर की गई टिप्पणियां भारतीय संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। पाठक ने कहा कि देश की जनता इस तरह के बयानों को स्वीकार नहीं करेगी और संबंधित नेताओं को माफी मांगनी चाहिए।

    पाठक ने आरोप लगाया कि विपक्षी दल सत्ता से बाहर रहने के कारण निराश हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेताओं के बयानों का असर चुनावों में भी दिखाई दे सकता है। उनके मुताबिक, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ आचरण करने वाले नेताओं को जनता चुनाव के दौरान जवाब देती है।

    मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री विश्वास सारंग ने भी खड़गे की टिप्पणी पर नाराजगी जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिवंगत माता-पिता को लेकर लगातार अनुचित टिप्पणियां कर रहे हैं और उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। सारंग ने कहा कि लोकतंत्र में इस तरह की भाषा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

    सारंग ने कहा कि भारतीय परंपराओं में दिवंगत व्यक्तियों के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करना उचित नहीं माना जाता। उन्होंने राहुल गांधी और सोनिया गांधी का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस के नेता पहले भी इस तरह के बयान देते रहे हैं। सारंग के अनुसार, यदि कोई बात अनजाने में एक बार कही जाती है, तो उसे अलग तरह से देखा जा सकता है, लेकिन उन्होंने दावा किया कि खड़गे ने तीन बार ऐसी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जनता इस मामले पर अपना जवाब देगी।

    महाराष्ट्र भाजपा विधायक राम कदम ने भी खड़गे से माफी की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी नेता के दिवंगत माता-पिता को राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। कदम ने कहा कि खड़गे को अपने बयान के लिए हाथ जोड़कर माफी मांगनी चाहिए।

    राम कदम ने यह भी पूछा कि यदि किसी नेता के अपने पिता के बारे में इसी तरह की अभद्र टिप्पणी की जाए, तो उसे कैसा महसूस होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के पास राजनीतिक मुद्दों की कमी है और इसी कारण इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि टिप्पणी से प्रधानमंत्री के साथ देश के लोगों की भावनाएं भी आहत हुई हैं।

    भाजपा विधायक पलटू राम ने भी खड़गे की टिप्पणी को निंदनीय बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेताओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी और एनडीए नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल को लेकर प्रतिस्पर्धा चल रही है। उन्होंने खड़गे और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सार्वजनिक संवाद में मर्यादा बनाए रखना जरूरी है।

  • जामिया विवाद पर इमरान मसूद का प्रशासन पर हमला, बोले- छात्रों की समस्याएं सुनने के बजाय दर्ज हो रही एफआईआर

    जामिया विवाद पर इमरान मसूद का प्रशासन पर हमला, बोले- छात्रों की समस्याएं सुनने के बजाय दर्ज हो रही एफआईआर

    नई दिल्ली ।जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रों के विरोध प्रदर्शन और अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की समस्याओं को सुनने और उनका समाधान करने के बजाय उनके खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। मसूद ने परिसर की सुरक्षा व्यवस्था, अधिकारियों की नियुक्ति और छात्रों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज होने से वह डरने वाले नहीं हैं और छात्रों के मुद्दों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

    अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर के संदर्भ में मसूद ने कहा कि विश्वविद्यालय में छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन उनकी मांगों और परेशानियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है। उनके मुताबिक, ऐसी स्थिति में प्रशासन की प्राथमिकता छात्रों से बातचीत कर समस्याओं का समाधान निकालना होनी चाहिए। उन्होंने प्रॉक्टर और रजिस्ट्रार की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए। मसूद ने आरोप लगाया कि संबंधित अधिकारी की नियुक्ति गैरकानूनी है और उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हैं। हालांकि, इन आरोपों के समर्थन में उन्होंने बातचीत के दौरान कोई विस्तृत दस्तावेजी जानकारी नहीं दी।

    विश्वविद्यालय परिसर में कश्मीर से संबंधित नारे लिखे जाने के मामले पर भी कांग्रेस सांसद ने प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि आईटीबीपी की फर्जी वर्दी पहनकर एक व्यक्ति को पकड़ा गया था और छात्रों ने उसे पकड़ा था। मसूद ने कहा कि परिसर में निगरानी की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए थी। उन्होंने सवाल किया कि जब विश्वविद्यालय में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, तो संबंधित घटना की फुटेज सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है। उनके बयान में सुरक्षा व्यवस्था और घटना की जानकारी सामने लाने की मांग प्रमुख रही।

    मसूद ने प्रॉक्टर मेहताब रिजवी की नियुक्ति का जिक्र करते हुए प्रशासन के रवैये की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जब छात्र भूख हड़ताल पर बैठे थे, तब उनकी समस्याओं को सुनना और उन पर ध्यान देना जरूरी था। उनके अनुसार, छात्रों की शिकायतों के बीच प्रशासन की ओर से की जा रही कार्रवाई से विवाद बढ़ रहा है।

    विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश के लिए दीवार फांदने के सवाल पर भी मसूद ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि रास्ते बंद कर दिए गए थे, जिसके कारण अंदर जाने के लिए दूसरा विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने सवाल किया कि परिसर के चारों ओर रास्ते बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी और लोगों को अपने बच्चों से मिलने से क्यों रोका गया। इस मुद्दे पर उन्होंने प्रशासन से व्यवस्था और निर्णयों को लेकर जवाब मांगा।

    जामिया विवाद के अलावा मसूद ने लखनऊ में गठबंधन को लेकर लगाए गए पोस्टरों और होर्डिंग पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि ऐसे पोस्टर भाजपा के डर को दर्शाते हैं। साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि पोस्टर किसने लगवाए और उनके लिए धन किसने उपलब्ध कराया। मसूद ने कहा कि गठबंधन मजबूत है और पोस्टरों के जरिए उसमें दरार पैदा नहीं की जा सकती। सीटों के बंटवारे पर भी उचित समय पर फैसला हो जाएगा।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की विवादित टिप्पणी पर मसूद ने खड़गे का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि खड़गे ने सही जवाब दिया है और आगे भी इसी तरह जवाब देते रहेंगे। मसूद ने सरकार पर गुंडागर्दी का आरोप लगाते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज होने से वह पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने दोहराया कि जामिया के छात्रों की समस्याओं को नजरअंदाज करने के बजाय प्रशासन को उनकी बात सुननी चाहिए।

  • चक्रवात अर्नब का बिहार के मौसम पर दिखेगा असर, 28 अक्टूबर से बारिश और तेज हवाओं का अनुमान, ऑरेंज अलर्ट जारी

    चक्रवात अर्नब का बिहार के मौसम पर दिखेगा असर, 28 अक्टूबर से बारिश और तेज हवाओं का अनुमान, ऑरेंज अलर्ट जारी


    नई दिल्ली । 
    बंगाल की खाड़ी के ऊपर विकसित हो रहा चक्रवाती तूफान अर्नब बिहार के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इसके असर से 28 अक्टूबर से 1 नवंबर के बीच राज्य के कई हिस्सों में बारिश होने का अनुमान है। इस दौरान तेज हवाएं चलने, आंधी-तूफान आने और कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश होने की आशंका जताई गई है। मौसम में बदलाव को देखते हुए 28 और 29 अक्टूबर के लिए अलग-अलग स्तर के अलर्ट जारी किए गए हैं।

    मौसम पूर्वानुमान के अनुसार, चक्रवात अर्नब के 28 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के तट तक पहुंचने की संभावना है। हालांकि, बिहार में इस तूफान के सीधे पहुंचने या लैंडफॉल होने का अनुमान नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी मौसमी गतिविधियां राज्य के कई जिलों में असर डाल सकती हैं। इसके कारण बारिश के साथ तेज हवाएं और गरज-चमक की स्थिति बन सकती है।

    बिहार में पूर्वी हवाओं की गति बढ़ने और वातावरण में नमी का स्तर ऊपर जाने के संकेत मिले हैं। इसी बदलाव के कारण आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां तेज होने की संभावना है। पूर्वानुमान के मुताबिक, 29 अक्टूबर को कुछ इलाकों में भारी बारिश हो सकती है। उत्तर बिहार के जिलों में मौसम का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक रहने का अनुमान है।

    मौसम विभाग ने 28 अक्टूबर को कुछ जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी किया है। इसके अगले दिन यानी 29 अक्टूबर को पूरे बिहार के लिए ऑरेंज अलर्ट घोषित किया गया है। इस दौरान हवा की रफ्तार 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। तेज हवाओं के साथ आंधी-तूफान और बिजली गिरने की आशंका भी है। ऐसे मौसम में लोगों को सतर्क रहने और स्थानीय स्तर पर जारी चेतावनियों पर ध्यान देने की जरूरत होगी।

    हालांकि, 26 और 27 अक्टूबर को राज्य के अधिकांश हिस्सों में मौसम सामान्य और शुष्क रहने की संभावना है। पटना, मुजफ्फरपुर सहित कई क्षेत्रों में धूप निकल सकती है। सुबह और शाम के समय हल्की ठंडक महसूस होने का अनुमान है। इन दो दिनों के दौरान फिलहाल बारिश की संभावना नहीं जताई गई है।

    तापमान की बात करें तो अधिकतम तापमान लगभग 30 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 21 डिग्री सेल्सियस के आसपास रह सकता है। वातावरण में नमी का स्तर 55 से 75 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। मौसम प्रणाली के आगे विकसित होने के साथ नमी में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे बारिश के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।

    संभावित बारिश और तेज हवाओं का असर खेती और आम जनजीवन पर भी पड़ सकता है। खेतों में खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। फलों के पेड़ों पर भी तेज हवाओं का असर हो सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे मौसम से जुड़ी सूचनाओं पर नजर रखें और अपनी फसलों के साथ कृषि उपकरणों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी कदम उठाएं।

    आंधी-तूफान के दौरान बिजली गिरने से लोगों, पशुओं और संपत्ति को खतरा हो सकता है। अस्थायी ढांचे, टीन की छत वाले घरों और कच्चे मकानों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है। लोगों को पेड़ों और बिजली के खंभों के नीचे खड़े होने से बचने तथा बिजली कड़कने पर किसी मजबूत इमारत के भीतर सुरक्षित स्थान पर जाने की सलाह दी गई है।

    बारिश और तेज हवाओं के कारण कुछ जिलों में सामान्य गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। लोगों और किसानों को मौसम संबंधी आधिकारिक दिशा-निर्देशों का पालन करने तथा खराब मौसम के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह दी गई है।

  • दिल्ली में बिल्डिंग ऑडिट के नाम पर वसूली का आरोप, सौरभ भारद्वाज ने रेखा गुप्ता सरकार की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

    दिल्ली में बिल्डिंग ऑडिट के नाम पर वसूली का आरोप, सौरभ भारद्वाज ने रेखा गुप्ता सरकार की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।दिल्ली में इमारतों की सुरक्षा जांच और सरकारी निरीक्षण व्यवस्था को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि राजधानी में इमारतों से जुड़े हादसों के बाद ऑडिट के आदेश तो जारी किए जाते हैं, लेकिन इसके बाद निरीक्षण के नाम पर कथित वसूली का सिलसिला शुरू हो जाता है। उन्होंने सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं।

    भारद्वाज के मुताबिक, दिल्ली में जब भी कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तब इमारतों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जांच और ऑडिट कराने के निर्देश दिए जाते हैं। उनका आरोप है कि इन निर्देशों के बाद कुछ विभागों के अधिकारी निरीक्षण प्रक्रिया का कथित तौर पर दुरुपयोग करते हैं। उन्होंने दावा किया कि जांच और ऑडिट के नाम पर कारोबारियों से अवैध रूप से पैसे वसूलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

    आप नेता ने कहा कि यह समस्या केवल एक विभाग तक सीमित नहीं है। उन्होंने नगर निगम दिल्ली और पुलिस पर पहले से लगते रहे भ्रष्टाचार तथा वसूली के आरोपों का उल्लेख करते हुए अग्निशमन विभाग और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि होटल, रेस्टोरेंट, जिम, नर्सिंग होम, कोचिंग सेंटर और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निरीक्षण के दौरान कथित वसूली का सामना करना पड़ रहा है।

    भारद्वाज ने इस मुद्दे को कारोबारियों के सामने आने वाली गंभीर समस्या के रूप में पेश किया। उनके अनुसार, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में भवन सुरक्षा और अग्नि सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन जरूरी है। नियमित निरीक्षण और ऑडिट लोगों की जान-माल की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि यदि इन्हीं प्रक्रियाओं का इस्तेमाल रिश्वत लेने के लिए किया जाता है, तो कारोबारियों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता है और सरकारी व्यवस्था के प्रति उनका भरोसा कमजोर होता है।

    उन्होंने व्यापारी समुदाय का उल्लेख करते हुए कहा कि यह वर्ग ऐतिहासिक रूप से जनसंघ और भाजपा का समर्थक रहा है। इसके बावजूद, उनके आरोप के अनुसार, मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कथित भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं को लेकर व्यापारियों की परेशानियां बढ़ रही हैं। भारद्वाज ने दिल्ली की भाजपा सरकार को घेरते हुए ट्रिपल इंजन सरकार की अवधारणा पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि सत्ता के विभिन्न स्तरों पर एक ही राजनीतिक दल के होने के बावजूद भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की जरूरत बनी हुई है।

    आप नेता ने यह सवाल भी उठाया कि जब हर बड़ी दुर्घटना के बाद इमारतों के ऑडिट और निरीक्षण के आदेश दिए जाते हैं, तो ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम क्यों पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देते। उन्होंने सरकारी विभागों की जवाबदेही और निरीक्षण व्यवस्था की पारदर्शिता को महत्वपूर्ण बताया।

    दिल्ली में भवन सुरक्षा का मुद्दा सार्वजनिक सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। होटल, अस्पताल, नर्सिंग होम, जिम और कोचिंग सेंटर जैसे स्थानों पर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए नियमित जांच के साथ नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई भी जरूरी है। वहीं, निरीक्षण प्रक्रिया में कथित भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करना भी प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।

    फिलहाल, सौरभ भारद्वाज के बयान में लगाए गए आरोप राजनीतिक आरोप हैं। इन आरोपों के समर्थन में किसी जांच के निष्कर्ष या संबंधित विभागों की आधिकारिक प्रतिक्रिया की जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मामले में तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया और जांच से जुड़ी जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • असम में दोषसिद्धि दर में बड़ा सुधार, 2021 के 6.1 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर 2026 में 30.88 प्रतिशत पहुंची

    असम में दोषसिद्धि दर में बड़ा सुधार, 2021 के 6.1 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर 2026 में 30.88 प्रतिशत पहुंची

    नई दिल्ली ।असम में आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि दर पिछले पांच वर्षों के दौरान लगातार बढ़ी है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, राज्य में यह दर 2021 में 6.1 प्रतिशत थी, जो सितंबर 2026 तक बढ़कर 30.88 प्रतिशत हो गई। राज्य सरकार ने इस प्रगति का श्रेय बेहतर पुलिस जांच, अभियोजन प्रक्रिया को प्रभावी बनाने और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने को दिया है। इस बदलाव को राज्य की आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने इस संबंध में साझा किए गए आंकड़ों के जरिए बताया कि असम में दोषसिद्धि दर में हर साल वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 6.1 प्रतिशत था। इसके बाद 2022 में बढ़कर 13.5 प्रतिशत और 2023 में 16.4 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2024 में यह दर 22.6 प्रतिशत तक पहुंची, जबकि 2025 में बढ़कर 25.80 प्रतिशत दर्ज की गई। सितंबर 2026 तक इसमें और वृद्धि हुई और यह 30.88 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई।

    इन आंकड़ों के मुताबिक, 2021 से सितंबर 2026 के बीच दोषसिद्धि दर में 24.78 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हुई है। यह अंतर राज्य में दर्ज की गई लगातार वृद्धि को दर्शाता है। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर न्याय व्यवस्था के समग्र प्रदर्शन का आकलन करते समय मामलों की प्रकृति और गणना की पद्धति जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

    मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि दोषसिद्धि दर में सुधार के पीछे जांच की गुणवत्ता, प्रभावी अभियोजन और अधिक जवाबदेही की भूमिका है। उन्होंने राज्य में आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत करने और अपराध से जुड़े मामलों में दोषियों को कानून के दायरे में लाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। सरकार का जोर कानून के प्रभावी पालन और न्याय दिलाने की प्रक्रिया को मजबूत बनाने पर है।

    दोषसिद्धि दर किसी आपराधिक मामले में आरोपी के दोषी ठहराए जाने से संबंधित आंकड़ा है। इसे अक्सर आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रदर्शन का आकलन करने वाले संकेतकों में शामिल किया जाता है। हालांकि, इस दर की व्याख्या करते समय यह समझना जरूरी है कि किन मामलों को आंकड़ों में शामिल किया गया है, मामलों की गिनती किस चरण पर की गई है और संबंधित आंकड़े किस पद्धति से तैयार हुए हैं। अलग-अलग राज्यों या अवधियों के आंकड़ों की तुलना में ये अंतर महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

    असम में दोषसिद्धि दर में हुई वृद्धि के संदर्भ में पुलिस जांच और अभियोजन की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसी आपराधिक मामले में साक्ष्य जुटाने, जांच पूरी करने और अदालत में प्रभावी ढंग से पक्ष रखने की प्रक्रिया न्यायिक परिणाम को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में जांच एजेंसियों और अभियोजन से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आपराधिक न्याय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    राज्य सरकार की ओर से जारी आंकड़े 2021 से सितंबर 2026 तक दोषसिद्धि दर में बढ़ोतरी का क्रम दिखाते हैं। मुख्यमंत्री ने इस प्रगति को कानून लागू करने और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से जोड़ा है। आने वाले समय में इन आंकड़ों का व्यापक आकलन करने के लिए मामलों की श्रेणियों, निपटारे की स्थिति और गणना के आधार जैसी जानकारियां भी उपयोगी होंगी।