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  • वाराणसी के नमो घाट पर पीएम मोदी ने देखा वायुसेना का शौर्य, राफेल-सुखोई समेत 100 विमानों के प्रदर्शन ने खींचा ध्यान

    वाराणसी के नमो घाट पर पीएम मोदी ने देखा वायुसेना का शौर्य, राफेल-सुखोई समेत 100 विमानों के प्रदर्शन ने खींचा ध्यान

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित नमो घाट पर रविवार को भारतीय वायुसेना के ‘विंग्स ओवर गंगा’ एयर शो का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में शामिल होकर आसमान में लड़ाकू विमानों की कलाबाजी और वायुसेना की हवाई क्षमताओं का प्रदर्शन देखा। इस दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे। भारतीय वायुसेना की 94वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम को देखने के लिए गंगा घाटों पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।

    एयर शो के दौरान विमानों की उड़ान, उनके बीच समन्वय और हवाई करतब दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहे। कार्यक्रम में राफेल और सुखोई जैसे लड़ाकू विमानों सहित कुल 100 विमानों के शामिल होने की जानकारी दी गई। इनमें 52 लड़ाकू विमान बताए गए। गंगा के ऊपर विमानों की गतिविधियों को देखने के लिए सुबह से ही नमो घाट और आसपास के घाटों पर लोगों की भीड़ जुटने लगी थी।

    प्रधानमंत्री मोदी कार्यक्रम के दौरान सफेद टोपी और चश्मा पहने नजर आए। उनके साथ मंच पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उपस्थित थे। वायुसेना प्रमुख ने प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए उन्हें एक पेंटिंग भेंट की। आयोजन के जरिए भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता और हवाई प्रदर्शन से जुड़ी दक्षता को प्रदर्शित किया गया।

    एयर शो से पहले प्रधानमंत्री ने वाराणसी के रूपापुर में अरविंद टेक्सटाइल मिल की नई इकाई का उद्घाटन किया। इस परियोजना की लागत करीब 100 करोड़ रुपये बताई गई है। उद्घाटन के दौरान उन्होंने वहां काम करने वाली महिला कर्मचारियों से भी बातचीत की। इस इकाई को क्षेत्र में विनिर्माण गतिविधियों और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देने से जोड़कर देखा जा रहा है।

    टेक्सटाइल इकाई के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री पुलिस लाइन से नमो घाट तक रोड शो करते हुए पहुंचे। इस मार्ग की दूरी करीब सात किलोमीटर बताई गई। रास्ते में प्रधानमंत्री की एक झलक पाने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। उनके स्वागत में ढोल-नगाड़े बजाए गए और भजन गाए गए। इस दौरान समर्थकों ने प्रधानमंत्री के काफिले पर फूल भी बरसाए।

    ‘विंग्स ओवर गंगा’ का आयोजन भारतीय वायुसेना की 94वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया गया। कार्यक्रम में लड़ाकू विमानों के प्रदर्शन के साथ वायुसेना की हवाई संचालन क्षमता को आम लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया। राफेल और सुखोई जैसे विमानों की भागीदारी ने आयोजन को विशेष आकर्षण दिया। गंगा के किनारे से आसमान में विमानों की गतिविधियां देखने के लिए स्थानीय निवासियों के अलावा अन्य दर्शक भी पहुंचे।

    वाराणसी में आयोजित इस एयर शो में प्रधानमंत्री की मौजूदगी के साथ औद्योगिक परियोजना का उद्घाटन भी दौरे का हिस्सा रहा। एक ओर टेक्सटाइल इकाई के माध्यम से विनिर्माण और रोजगार से जुड़ी पहल सामने आई, वहीं दूसरी ओर एयर शो ने भारतीय वायुसेना की क्षमताओं को प्रदर्शित किया। नमो घाट पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने इसे वाराणसी के प्रमुख आयोजनों में शामिल कर दिया।

  • वाराणसी में विंग्स ओवर गंगा एयर शो, राफेल-सुखोई समेत 100 विमानों ने दिखाई ताकत..

    वाराणसी में विंग्स ओवर गंगा एयर शो, राफेल-सुखोई समेत 100 विमानों ने दिखाई ताकत..

    नई दिल्ली । वाराणसी में भारतीय वायुसेना के 94वें स्थापना वर्ष के अवसर पर आयोजित विंग्स ओवर गंगा एयर शो में लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और परिवहन विमानों ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। 22 अक्टूबर 2026 से शुरू हुए इस कार्यक्रम में देश के 12 एयरबेस से आए कुल 100 विमान शामिल हुए। रविवार, 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वाराणसी पहुंचे और रोड शो किया। इस दौरान शहर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए।

    काशी में आयोजित इस एयर शो को बड़े स्तर पर आयोजित किया गया। इसमें भारतीय वायुसेना के कई प्रमुख लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरकर अपनी क्षमता दिखाई। राफेल, सुखोई, मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर जैसे विमानों ने हवाई प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इनके अलावा अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टरों ने भी अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया। सी-295, सी-17 और सी-130 जैसे परिवहन विमानों की मौजूदगी भी कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण रही।

    इस आयोजन में देश के 12 एयरबेस से विमान वाराणसी पहुंचे। इनमें चेन्नई और ग्वालियर के एयरबेस भी शामिल थे। काशी में पहली बार इतने बड़े स्तर पर एयर शो आयोजित किया गया। विभिन्न विमानों की उड़ानों और सामूहिक फॉर्मेशन के जरिए वायुसेना की परिचालन क्षमता और हवाई प्रदर्शन का परिचय दिया गया।

    एयर शो में विमानों की उड़ान के साथ वाराणसी की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रदर्शित किया गया। आसमान में विमानों ने अलग-अलग समूह बनाकर कई आकृतियां तैयार कीं। इन फॉर्मेशन को महादेव, नटराज, कैलाश, विश्वनाथ, त्रिदेव, वरुणा, हनुमान, ओंकार, भागीरथी, काशी और रुद्र जैसे नाम दिए गए। इन नामों के माध्यम से काशी की परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को हवाई प्रदर्शन से जोड़ने का प्रयास किया गया।

    कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की। पूरे जिले को 30 जोन और 50 से अधिक सेक्टर में बांटा गया। सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए 11,500 से ज्यादा जवान तैनात किए गए। इसके साथ ही निगरानी के लिए 200 सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल किया गया।

    प्रशासन ने करीब 50 लाख लोगों की भीड़ को संभालने के मद्देनजर इंतजाम किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी पहुंचने और रोड शो के कार्यक्रम को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया। शहर में विभिन्न स्थानों पर पुलिस बल की तैनाती और निगरानी के जरिए आयोजन के दौरान व्यवस्था बनाए रखने की तैयारी की गई।

    विंग्स ओवर गंगा एयर शो में लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और परिवहन विमानों की भागीदारी के साथ काशी की सांस्कृतिक पहचान को भी प्रमुखता दी गई। 12 एयरबेस से आए 100 विमानों की मौजूदगी ने इस आयोजन को बड़े स्तर का हवाई प्रदर्शन बनाया।

  • अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ईरान ने भारत से व्यापार बढ़ाने की अपील की, चाबहार बंदरगाह पर भी दिया अहम संकेत

    अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच ईरान ने भारत से व्यापार बढ़ाने की अपील की, चाबहार बंदरगाह पर भी दिया अहम संकेत

    नई दिल्ली ।अमेरिकी प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी परेशानियों के बीच ईरान ने भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार जारी रखने और उसे विस्तार देने की अपील की है। भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतहली ने भारतीय कारोबारियों से दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रतिबंधों के कारण व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं, लेकिन ऊर्जा, कृषि और जरूरी वस्तुओं के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं अब भी मौजूद हैं।

    ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार से जुड़े भारतीय कारोबारियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दबाव बढ़ा है। इसके साथ ही भुगतान संबंधी समस्याओं ने दोनों देशों के व्यापार को प्रभावित किया है। इन चुनौतियों के बावजूद ईरान भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए व्यावहारिक विकल्प तलाशने पर जोर दे रहा है। फतहली के मुताबिक, दोनों देशों के बीच संपर्क जारी है और व्यापार को सुचारु बनाए रखने के उपायों पर चर्चा की जा रही है।

    बासमती चावल की आपूर्ति पर भी ईरान ने भरोसा दिलाया है। ईरान भारत से बासमती चावल और चाय खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। ऐसे में प्रतिबंधों और भुगतान में आ रही दिक्कतों के बीच इन उत्पादों की उपलब्धता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। फतहली ने भारतीय बासमती चावल समेत जरूरी वस्तुओं की किल्लत होने की आशंका को खारिज किया।

    ईरानी राजदूत के अनुसार, उनका देश संभावित आपूर्ति बाधाओं से निपटने की तैयारी कर चुका है और आयात के लिए उसके पास कई विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान में कुछ वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है, लेकिन इसके पीछे केवल आपूर्ति में कमी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। व्यापक आर्थिक दबाव भी कीमतों में बढ़ोतरी का एक कारण है।

    फतहली ने कहा कि ईरान लगभग 47 वर्षों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और इस दौरान उसने उनके प्रभाव को कम करने के तरीके विकसित किए हैं। उन्होंने नैनो टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में ईरान की प्रगति का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसके 15 पड़ोसी देश व्यापार तथा आर्थिक साझेदारी के लिए नए अवसर उपलब्ध कराते हैं। ईरान दूसरे देशों के साथ पारस्परिक लाभ वाले संबंध बनाए रखने के लिए व्यावहारिक समाधान तलाशता रहेगा।

    भारत और ईरान के कारोबार को अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाने के लिए किसी विशेष व्यवस्था की संभावना पर भी चर्चा हुई है। फतहली ने बताया कि भारतीय भागीदारों के साथ संपर्क जारी है। हालांकि, उन्होंने किसी अंतिम समझौते या नई व्यवस्था की घोषणा नहीं की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे उपायों को तय करने और लागू करने के लिए विशेषज्ञ स्तर पर बातचीत तथा संबंधित पक्षों के बीच समन्वय जरूरी होगा।

    चाबहार बंदरगाह को लेकर भी ईरान ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। यह बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने में मदद मिलती है। भारत के संचालन से संबंधित अमेरिकी प्रतिबंधों की छूट 26 अप्रैल को समाप्त होने के बाद परियोजना के भविष्य को लेकर सवाल उठे हैं।

    फतहली ने कहा कि ईरान चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके विकास में योगदान देने के इच्छुक किसी भी देश के निवेश और भागीदारी का स्वागत किया जाएगा। हालांकि, बंदरगाह से संबंधित आगे की व्यवस्था और भारत-ईरान व्यापार को प्रभावित करने वाली बाधाओं के समाधान के लिए बातचीत तथा समन्वय महत्वपूर्ण बने रहेंगे।

  • बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत

    बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत


    नई दिल्ली ।
    भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने के साथ बुजुर्गों के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां भी गंभीर होती जा रही हैं। कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों पर व्यापक चर्चा होती है, लेकिन डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश के बढ़ते खतरे और उससे प्रभावित लोगों की देखभाल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। यह बीमारी केवल याददाश्त को प्रभावित नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की पहचान, निर्णय लेने की क्षमता, स्वतंत्रता और रोजमर्रा के जीवन को भी मुश्किल बना सकती है। ऐसे में भारत में एक समर्पित राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना की जरूरत महसूस की जा रही है।

    डिमेंशिया ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। अल्जाइमर रोग इसके प्रमुख कारणों में से एक है, लेकिन डिमेंशिया केवल अल्जाइमर तक सीमित नहीं है। गंभीर अवस्था में मरीज परिचित लोगों को पहचानने, दैनिक गतिविधियां करने और अपने आसपास हो रही घटनाओं को समझने में कठिनाई महसूस कर सकता है। इससे उसकी सुरक्षा के साथ गरिमा और स्वायत्तता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

    भारत में इस समस्या का वास्तविक आकार समझने के लिए उपलब्ध आंकड़े महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। वर्ष 2017 से 2020 के बीच जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित एक राष्ट्रीय अध्ययन में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में डिमेंशिया की व्यापकता 7.4 प्रतिशत आंकी गई थी। इस दर को जनसंख्या अनुमानों पर लागू करते हुए शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 में देश में लगभग 88 लाख मामले होने का अनुमान लगाया था। यदि यह दर अपरिवर्तित रहती है, तो वर्ष 2036 तक मरीजों की संख्या बढ़कर 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है।

    दुनिया के अन्य देशों में भी डिमेंशिया गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इंग्लैंड और वेल्स में वर्ष 2025 के दौरान यह सभी मौतों के 12.7 प्रतिशत मामलों से जुड़ा था। महिलाओं की मौतों में इसका हिस्सा 16.5 प्रतिशत बताया गया। अमेरिका में वर्ष 2024 के दौरान लगभग 10 प्रतिशत मौतों के लिए डिमेंशिया जिम्मेदार था। भारत में मृत्यु संबंधी आंकड़ों की विश्वसनीयता सीमित होने के कारण इस बीमारी के प्रभाव का सटीक आकलन करना कठिन है।

    चिकित्सा विज्ञान में प्रगति ने लोगों की उम्र बढ़ाने में मदद की है, लेकिन लंबा जीवन हमेशा बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी नहीं देता। अल्जाइमर की कुछ नई दवाएं शुरुआती चरण में पहचाने गए चुनिंदा मरीजों में संज्ञानात्मक गिरावट की गति को कुछ हद तक धीमा कर सकती हैं। हालांकि, ये दवाएं डिमेंशिया का पूर्ण इलाज नहीं हैं और न ही गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त मस्तिष्क को पहले जैसी स्थिति में ला सकती हैं। इसलिए शुरुआती पहचान, नियमित देखभाल और परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

    डिमेंशिया का प्रभाव मरीज तक सीमित नहीं रहता। गंभीर अवस्था में व्यक्ति को भोजन करने, नहाने, शौचालय जाने और सुरक्षित रहने के लिए लगातार मदद की जरूरत पड़ सकती है। भारत में यह जिम्मेदारी अक्सर पत्नी, बेटी या बहू पर आती है। लंबे समय तक देखभाल करने के कारण परिवार के सदस्यों के रोजगार, आर्थिक स्थिति और अपने स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

    शहरीकरण, रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में पलायन और छोटे होते परिवारों ने पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था की देखभाल संबंधी क्षमता को भी प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार पेशेवर देखभाल और आवासीय सुविधाएं ले सकते हैं, लेकिन वहां भी मरीज की स्वतंत्रता और सम्मान बनाए रखना जरूरी है। सुरक्षा के नाम पर उसकी गतिविधियों पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाना नई समस्याएं पैदा कर सकता है।

    भारत सरकार ने वर्ष 2010 में बुजुर्गों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया था, लेकिन इसमें डिमेंशिया के लिए अलग समर्पित व्यवस्था नहीं है। केरल में डिमेंशिया से संबंधित विशेष सेवाएं शुरू की गई हैं, जबकि कर्नाटक में जिला स्तर पर 32 मस्तिष्क स्वास्थ्य क्लीनिक स्थापित किए गए हैं। इसके बावजूद वर्ष 2025 की एक समीक्षा में राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना, समर्पित वित्तपोषण और मापने योग्य लक्ष्यों की कमी सामने आई।

    बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच डिमेंशिया की चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं, परिवारों और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है। समय पर पहचान, प्रशिक्षित देखभालकर्मियों की उपलब्धता, परिवारों को आर्थिक और मानसिक सहयोग तथा मरीजों की गरिमा की रक्षा पर केंद्रित राष्ट्रीय योजना इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • वोट बचाओ रैली पर राहुल गांधी का बीजेपी पर तंज, बोले- अगले सात दिन भी इसी जोश से प्रचार करते रहिए

    वोट बचाओ रैली पर राहुल गांधी का बीजेपी पर तंज, बोले- अगले सात दिन भी इसी जोश से प्रचार करते रहिए


    नई दिल्ली ।लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर को प्रस्तावित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बीजेपी और उसके सहयोगी दल खुद ही इस रैली का प्रचार कर रहे हैं। राहुल गांधी ने कटाक्ष किया कि सत्तारूढ़ दल अगले सात दिनों तक भी इसी उत्साह और लगन के साथ प्रचार जारी रखे।

    राहुल गांधी ने रविवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए लोगों से इस रैली और मार्च में शामिल होने की अपील की। विपक्षी दलों की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों के खिलाफ आवाज उठाना है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर उठा रहे हैं।

    राहुल गांधी ने अपनी पोस्ट में आरोप लगाया कि मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने दावा किया कि सवाल उठाने वालों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया है। राहुल गांधी ने कहा कि अब देश इस मुद्दे पर चुप नहीं रहेगा। उन्होंने मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए लोगों से एकजुट होने का आह्वान किया।

    उन्होंने छात्रों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, युवाओं और व्यापारियों सहित लोकतंत्र को लेकर चिंतित नागरिकों से रैली में पहुंचने की अपील की। राहुल गांधी के मुताबिक, वोट नागरिकों का अधिकार है और इसकी सुरक्षा के लिए लोगों को आगे आना चाहिए। विपक्ष इस अभियान के जरिए मतदाता सूची की प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता का सवाल उठा रहा है।

    रैली को लेकर राजनीतिक बयानबाजी के बीच इसकी तारीख पर भी विवाद सामने आया है। कार्यक्रम 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित होना प्रस्तावित है। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस से इस तारीख पर पुनर्विचार करने की मांग की है। बीजेपी का कहना है कि 1 नवंबर 1984 के सिख विरोधी दंगों की बरसी है और इस दिन राजनीतिक रैली आयोजित करने से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं।

    बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस पर इस तारीख के चयन को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने सिख समुदाय और व्यापारियों की भावनाओं का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा। इस तरह रैली का मुद्दा मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के साथ-साथ तारीख को लेकर राजनीतिक विवाद का विषय भी बन गया है।

    राहुल गांधी ने बीजेपी की आपत्ति के बीच अपने बयान में सत्तारूढ़ दल और उसके सहयोगियों को धन्यवाद देते हुए कहा कि वे रैली का प्रचार जोर-शोर से कर रहे हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि बीजेपी अगले सात दिनों तक भी इसी तरह प्रचार करती रहे, ताकि कार्यक्रम की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।

    ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के जरिए विपक्ष मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाने की तैयारी कर रहा है। दूसरी ओर, बीजेपी ने आयोजन की तारीख को लेकर आपत्ति जताई है। ऐसे में 1 नवंबर को होने वाला यह कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन गया है। रैली में भागीदारी और दोनों पक्षों की आगे की प्रतिक्रियाओं पर राजनीतिक हलकों की नजर रहेगी।

  • ऑपरेशन सिंदूर से भारत की हवाई ताकत का प्रदर्शन, वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कैसे दुश्मन तक पहुंच सकते हैं सटीक हमले

    ऑपरेशन सिंदूर से भारत की हवाई ताकत का प्रदर्शन, वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने बताया कैसे दुश्मन तक पहुंच सकते हैं सटीक हमले

    नई दिल्ली ।भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस सैन्य अभियान ने साबित किया कि भारतीय वायुसेना की पहुंच से कोई भी लक्ष्य बाहर नहीं है। उनके मुताबिक, पश्चिमी मोर्चे पर लगभग 1,200 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में और दुश्मन के इलाके के भीतर 200 किलोमीटर तक सटीक हमले करने की क्षमता ने वायुसेना की परिचालन ताकत को प्रदर्शित किया। उनके इस बयान को पाकिस्तान के संदर्भ में भारत की सैन्य क्षमता के स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    एपी सिंह ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने भारतीय वायुसेना के क्षमता-केंद्रित दृष्टिकोण की पुष्टि की। इस रणनीति में किसी एक विमान या हथियार प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न विमानों, सेंसर, हथियारों और संचार नेटवर्क को एकीकृत करके इस्तेमाल किया जाता है। इससे परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग संसाधनों का उपयोग करते हुए प्रभावी सैन्य कार्रवाई करना संभव होता है।

    वायुसेना प्रमुख के अनुसार, इस अभियान ने संकट के समय तेजी से कार्रवाई करने वाली शक्ति के रूप में वायुसेना की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सैन्य अभियानों में कई विकल्प उपलब्ध रखना और दुश्मन की रणनीति में बदलाव के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया देना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, क्षमता-केंद्रित व्यवस्था ने भारतीय वायुसेना को परिस्थितियों के अनुरूप जवाबी कार्रवाई करने और संघर्ष को बढ़ने से रोकने में मदद की।

    पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में भारत ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया था। इस अभियान के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मौजूद आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाया गया। एपी सिंह ने कहा कि अभियान के दौरान भारतीय वायुसेना ने लंबी दूरी तक सटीक हमले करने की अपनी क्षमता का इस्तेमाल किया। उन्होंने स्वदेश में विकसित हथियार प्रणालियों के प्रदर्शन को भी प्रभावी बताया।

    वायुसेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि अभियान की सफलता किसी एक हथियार या विमान के कारण नहीं थी। इसके पीछे सटीक खुफिया जानकारी, नेटवर्क आधारित अभियान, दूर से हमला करने वाले हथियार, सटीक निशाना लगाने वाली प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं का संयुक्त योगदान था। इसके साथ ही बहुस्तरीय वायु रक्षा व्यवस्था और मानवरहित हवाई प्रणालियों का मुकाबला करने की क्षमता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना की स्वदेशी नेटवर्क आधारित वायु रक्षा प्रणाली ने पाकिस्तानी सेना की ओर से दागे गए ड्रोन और दूर से हमला करने वाले हथियारों का मुकाबला करने में भूमिका निभाई। उनके अनुसार, इस तरह की क्षमताओं ने भारतीय पक्ष को प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने में मदद की। उन्होंने यह भी कहा कि अभियान के दौरान नागरिकों और असैन्य संपत्ति को नुकसान से बचाने की प्रतिबद्धता का पालन किया गया।

    एपी सिंह ने आगाह किया कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बावजूद वायुसेना को अपनी क्षमताओं का लगातार विस्तार करना होगा। इसके लिए खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन रोधी तकनीक, मजबूत नेटवर्क तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निर्णय सहायता प्रणाली को बेहतर बनाने की जरूरत है। उन्होंने रसद, रखरखाव और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय तक उच्च तीव्रता वाले सैन्य अभियानों को जारी रखने के लिए स्वदेशी उत्पादन क्षमता का विस्तार जरूरी है। यह लक्ष्य विकसित भारत 2047 की व्यापक राष्ट्रीय परिकल्पना से भी जुड़ा है। एपी सिंह के मुताबिक, भारतीय वायुसेना का उद्देश्य ऐसी बहु-क्षेत्रीय सैन्य शक्ति बनना है, जो भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक हितों की रक्षा कर सके। वर्ष 2047 तक दुनिया की सक्षम, नवोन्मेषी और तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर वायु सेनाओं में शामिल होना इस दिशा में उसका प्रमुख लक्ष्य है।

  • मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 139वें एपिसोड में देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की ओर से किए जा रहे सामाजिक, पर्यावरणीय और तकनीकी प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 12 साल पहले विजयदशमी के अवसर पर शुरू हुआ यह कार्यक्रम लगातार आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में देशवासियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके लिए मन की बात किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है। यह आम लोगों के परिश्रम, साहस, समर्पण और सेवा भावना को समझने के साथ उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है।

    प्रधानमंत्री ने पंजाब में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि खेती विरासत मिशन नाम की संस्था पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाने के लिए नव-त्रिन्जन पहल शुरू की गई है। इसके तहत बिना रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के जैविक कपास उगाई जाती है। प्राकृतिक रंगों वाली कपास से धागे और कपड़े तैयार करने में भी मदद मिलती है, जिससे उन्हें रंगने के लिए अलग से रसायनों की जरूरत कम होती है।

    उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में हेवल नदी को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय लोगों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों का भी जिक्र किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार, नदी में पानी कम होने लगा था और आसपास के प्राकृतिक जलस्रोत भी सूख रहे थे। इसके बाद नदी को बचाने के लिए अभियान चलाया गया। वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी के पुनर्भरण और बड़े पैमाने पर पौधारोपण जैसे उपाय अपनाए गए। इन प्रयासों से हेवल नदी को फिर से जीवन देने में मदद मिली और कई प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन का रास्ता भी खुला।

    प्रधानमंत्री ने स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में हो रहे कामों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि बिहार के पूर्णिया का मखाना ग्रीस तक पहुंच रहा है, जबकि कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर दाल मालदीव भेजी जा रही है। महाराष्ट्र में आदिवासी समुदायों ने अपने उत्पादों की पैकेजिंग को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया है। शबरी नेचुरल्स के माध्यम से शहद, महुआ, चिरौंजी और बांस से बने उत्पाद बाजार में लाए जा रहे हैं। इनकी पैकेजिंग पर आदिवासी कला की झलक दिखाई देती है, जिसे जापान के प्रतिष्ठित गुड डिजाइन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

    डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और लक्षद्वीप के उदाहरण दिए। बाराटांग द्वीप में जारवा जनजाति के सात वर्षीय बच्चे ओहो-ताहाने को तेज बुखार और सांस लेने में परेशानी हुई थी। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों ने ई-संजीवनी के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क किया। बच्चे को निमोनिया होने का पता चला और विशेषज्ञों की निगरानी में उसकी स्थिति में सुधार हुआ।

    इसी तरह, लक्षद्वीप के कल्पेनी में करीब 60 वर्षीय कुन्ही कोया की तबीयत अचानक बिगड़ने पर ई-संजीवनी के जरिए कवरत्ती में मौजूद अनुभवी डॉक्टरों से सलाह ली गई। डॉक्टरों ने स्थानीय चिकित्सा दल को मार्गदर्शन दिया, जिससे मरीज को राहत पहुंचाने में मदद मिली। इन उदाहरणों के जरिए दूरदराज के इलाकों में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं की उपयोगिता सामने आई।

    प्रधानमंत्री ने आईआईटी मद्रास में स्थापित सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर का भी उल्लेख किया। इस केंद्र ने मस्तिष्क की उच्च रिजॉल्यूशन वाली डिजिटल त्रिआयामी तस्वीरें तैयार करने के लिए एक तकनीकी मंच विकसित किया है। इसका उद्देश्य आने वाले समय में 100 मानव मस्तिष्कों की 3D मैपिंग करना और उनका विस्तृत अध्ययन करना है। इस पहल को मस्तिष्क अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया।

  • ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर, 125 किमी रूट का 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा

    ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से बदलेगी उत्तराखंड की तस्वीर, 125 किमी रूट का 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा


    नई दिल्ली ।
    उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में रेल कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना पर काम किया जा रहा है। लगभग 125 किलोमीटर लंबी यह रेल लाइन गढ़वाल हिमालय के भीतर तक रेल नेटवर्क पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। परियोजना पूरी होने पर ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक यात्रा करना आसान हो सकेगा। इससे क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों तक पहुंचने वाले यात्रियों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थस्थलों की यात्रा के लिए भी यह रेल मार्ग उपयोगी साबित हो सकता है।

    इस परियोजना के तहत रेल लाइन 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी और ऋषिकेश को कर्णप्रयाग से जोड़ेगी। पहाड़ी इलाकों में रेल परिवहन का विस्तार होने से यात्रियों को सड़क मार्ग के अलावा एक अन्य विकल्प उपलब्ध होगा। इसके साथ ही धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने की संभावना है। बेहतर परिवहन सुविधाएं स्थानीय लोगों के साथ-साथ यहां आने वाले पर्यटकों के लिए भी आवागमन को सुविधाजनक बना सकती हैं।

    परियोजना का प्रस्तावित अंतिम स्टेशन कर्णप्रयाग है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह स्थान भारत-चीन सीमा से लगभग 123 किलोमीटर दूर है। हालांकि, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन सीधे अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नहीं जाती। इसका प्रमुख उद्देश्य गढ़वाल क्षेत्र के अंदरूनी हिस्सों को रेल नेटवर्क से जोड़ना और हिमालयी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं को बेहतर बनाना है। इसके बावजूद सीमा के करीब स्थित क्षेत्रों तक पहुंच मजबूत करने के लिहाज से इस परियोजना का रणनीतिक महत्व भी है।

    इस रेल लाइन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसका बड़ा सुरंग नेटवर्क है। पहाड़ी भूभाग और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण परियोजना का करीब 83 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों के भीतर से गुजरने की योजना है। इसमें 28 मुख्य और एस्केप सुरंगें बनाई जा रही हैं। इसके अलावा रेल मार्ग पर 57 बड़े और छोटे पुल भी शामिल हैं। सुरंगों और पुलों का निर्माण पहाड़ों के बीच रेल लाइन को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है, क्योंकि इस क्षेत्र में ऊंचाई, चट्टानों और जमीन की बनावट से जुड़ी कई चुनौतियां मौजूद हैं।

    हिमालय में सुरंग निर्माण के दौरान इंजीनियरों को कमजोर चट्टानों, भूजल और जमीन की स्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ स्थानों पर पानी से भरी भूगर्भीय परतें खुदाई के काम को कठिन बना सकती हैं। कमजोर जमीन में खुदाई के दौरान बदलाव होने से सुरंग की दीवारों पर दबाव पड़ने का जोखिम भी रहता है। इसलिए निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियों का आकलन करना और जरूरत के मुताबिक सुरंग को मजबूती देना महत्वपूर्ण होता है।

    इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए सुरंग निर्माण से पहले भूगर्भीय जांच की गई। टनल बोरिंग मशीन यानी टीबीएम के इस्तेमाल से जुड़े फैसलों में भी जमीन और चट्टानों की स्थिति महत्वपूर्ण होती है। अलग-अलग स्थानों पर मौजूद भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुसार निर्माण तकनीक चुनना जरूरी है, ताकि काम को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

    भारत और चीन के बीच हिमालयी क्षेत्र में संवेदनशील सीमा होने के कारण बेहतर परिवहन नेटवर्क का महत्व बढ़ जाता है। ऊंचे पहाड़, प्रतिकूल मौसम और सीमित परिवहन सुविधाएं कई इलाकों तक पहुंच को कठिन बनाती हैं। ऐसे में सड़क, पुल और रेल संपर्क को मजबूत करना क्षेत्रीय आवागमन के लिए उपयोगी हो सकता है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन से यात्रियों, श्रमिकों और सामान की आवाजाही को सहारा मिलने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर, यह परियोजना धार्मिक पर्यटन और स्थानीय विकास के साथ हिमालयी क्षेत्र में परिवहन संपर्क बेहतर बनाने की दिशा में अहम कदम है। रेल नेटवर्क के विस्तार से गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों तक पहुंच आसान हो सकती है, जबकि सुरंगों और पुलों का व्यापक निर्माण इस परियोजना की तकनीकी जटिलता और महत्व को दर्शाता है।

  • अनंत सिंह की बगावत से बिहार की सियासत में भूचाल बोले केकड़ा बिच्छू बन गए पार्टी के मालिक कुत्ता भी नहीं पूछेगा

    अनंत सिंह की बगावत से बिहार की सियासत में भूचाल बोले केकड़ा बिच्छू बन गए पार्टी के मालिक कुत्ता भी नहीं पूछेगा


    बिहार । बिहार की राजनीति में जनता दल यूनाइटेड और मोकामा विधायक अनंत सिंह के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है। पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित किए जाने के बाद अनंत सिंह ने तीखे तेवर दिखाते हुए जदयू नेतृत्व पर निशाना साधा है। उन्होंने दावा किया कि आने वाले चुनाव में पार्टी को अपनी राजनीतिक ताकत का अंदाजा लग जाएगा और उसे 12 सीटें हासिल करना भी मुश्किल होगा। अनंत सिंह ने कहा कि जनता ही असली मालिक है और चुनाव के समय सबको अपनी औकात पता चल जाएगी। उनके इस बयान के बाद बिहार की सियासत में नई बहस छिड़ गई है।

    जदयू ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में मोकामा विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी पूर्व विधायक नीलम देवी की प्राथमिक सदस्यता समाप्त कर दी है। निष्कासन के बाद एक इंटरव्यू में अनंत सिंह ने कहा कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें बाहर कर दिया है तो उन्हें इससे कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी जिसके हाथ में है वह अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। वह किसी के पास दोबारा पार्टी में शामिल रखने की गुहार लगाने नहीं जाएंगे। अनंत सिंह ने अपने रुख का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने जो किया वह उचित था और उन्हें अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है।

    अनंत सिंह ने पार्टी के मौजूदा नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि आज ऐसे लोग पार्टी के मालिक बनकर बैठे हैं जिनका संगठन को खड़ा करने में कोई खास योगदान नहीं रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में मंत्री और दूसरे पदों पर बैठे कई लोगों ने संगठन के लिए कोई बड़ी भूमिका नहीं निभाई है। उनके मुताबिक चुनाव आने पर ऐसे नेताओं को अपनी वास्तविक राजनीतिक हैसियत का पता चल जाएगा। अनंत सिंह ने इसी दौरान केकड़ा और बिच्छू जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए नेतृत्व पर कटाक्ष किया। उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    नीतीश कुमार को लेकर पूछे गए सवाल पर अनंत सिंह ने कहा कि उनके मन में नीतीश कुमार के प्रति सम्मान पहले की तरह बना रहेगा। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के रहते शायद उन्हें पार्टी से निकालने की हिम्मत कोई नहीं करता। अनंत सिंह ने मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज पार्टी में ऐसे लोगों का प्रभाव बढ़ गया है जो पहले इस स्थिति में नहीं थे। हालांकि उन्होंने निशांत कुमार को लेकर कोई तीखी टिप्पणी करने से परहेज किया। अनंत सिंह ने कहा कि निशांत के बारे में वह कुछ नहीं कहना चाहते और पार्टी जो भी फैसला करेगी उसके लिए वह तैयार हैं।

    भविष्य की राजनीतिक रणनीति को लेकर अनंत सिंह ने फिलहाल कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि वह आगे किस राजनीतिक दल के साथ जाएंगे इसका फैसला अभी नहीं किया गया है। साथ ही उन्होंने अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के प्रति आभार जताने की बात कही। अनंत सिंह ने दोहराया कि जनता ही उनके लिए सबसे बड़ी ताकत है और चुनाव के समय जनता का फैसला सामने आ जाएगा। उन्होंने अपनी विधानसभा सदस्यता को लेकर संभावित कार्रवाई पर भी कहा कि पार्टी जो करना चाहती है कर सकती है और उन्हें इसकी चिंता नहीं है।

    दरअसल जदयू ने अनंत सिंह के खिलाफ पार्टी के निर्देशों की अवहेलना करने शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने और हालिया विधान परिषद चुनाव में प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करने के आरोप लगाए हैं। पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा की ओर से जारी बयान में उनकी प्राथमिक सदस्यता तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की जानकारी दी गई। अनंत सिंह पर आरोप है कि उन्होंने जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन किया और जदयू उम्मीदवार नीरज कुमार को हराने की बात कही। पार्टी ने बिहार विधानसभा अध्यक्ष से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की सिफारिश भी की है। अब देखना होगा कि इस राजनीतिक टकराव का बिहार की आगामी चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

  • वोट चोरी के आरोपों पर आर-पार की लड़ाई के मूड में INDIA गठबंधन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन महाभियोग चलाएगा विपक्ष

    वोट चोरी के आरोपों पर आर-पार की लड़ाई के मूड में INDIA गठबंधन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन महाभियोग चलाएगा विपक्ष


    नई दिल्ली । देश में मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया को लेकर सियासी घमासान तेज होने जा रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी गठबंधन इंडिया ने जन महाभियोग चलाने का ऐलान किया है। इसके तहत 30 अक्टूबर को दिल्ली में मॉक पार्लियामेंट आयोजित की जाएगी जिसमें विपक्षी दलों के नेता एकजुट होकर मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाएंगे और उनके इस्तीफे की मांग को लेकर जनता के सामने अपना पक्ष रखेंगे। इसके बाद 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली और जनसभा आयोजित करने की तैयारी है। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने इसे वोट चोरी के खिलाफ लड़ाई बताते हुए अधिक से अधिक लोगों से आंदोलन में शामिल होने की अपील की है।

    कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि इंडिया गठबंधन के नेता 30 अक्टूबर को एक साथ आकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जनता का फैसला सामने रखेंगे। विपक्ष ने इस आयोजन को पब्लिक इम्पीचमेंट यानी जन महाभियोग का नाम दिया है। हालांकि यह संसदीय प्रक्रिया के तहत होने वाला औपचारिक महाभियोग नहीं बल्कि राजनीतिक विरोध का एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम होगा। इसका उद्देश्य चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को व्यापक जनसमर्थन दिलाना है।

    विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के कारण बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि इससे मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इसी मुद्दे पर निर्वाचन आयोग को घेरने की रणनीति बनाई है। हालांकि निर्वाचन आयोग विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज करता रहा है। ऐसे में मतदाता सूची से जुड़े विवाद को लेकर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है।

    30 अक्टूबर को होने वाली मॉक पार्लियामेंट के आयोजन स्थल को लेकर दिल्ली के अशोक होटल का नाम सामने आया है। हालांकि आयोजन की तैयारियों और स्थान के संबंध में अंतिम जानकारी की पुष्टि होना बाकी है। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी इस कार्यक्रम को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि संविधान की रक्षा और वोट चोरी के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करने के उद्देश्य से विपक्षी दल एकजुट होकर जनता के सामने अपना पक्ष रखेंगे। विपक्ष इस आयोजन के जरिए चुनाव आयोग की जवाबदेही और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता का मुद्दा प्रमुखता से उठाना चाहता है।

    मॉक पार्लियामेंट के बाद 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी गठबंधन की बड़ी रैली प्रस्तावित है। कांग्रेस ने इसे दिल्ली चलो मार्च और वोट चोरी के खिलाफ जनआंदोलन से जोड़कर पेश किया है। केसी वेणुगोपाल के मुताबिक इस कार्यक्रम में कम से कम 10 लाख जागरूक नागरिकों की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों से संपर्क कर नेताओं और कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या में दिल्ली में मौजूदगी सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है।

    विपक्ष की इस रणनीति को चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के मुद्दे पर सरकार तथा निर्वाचन आयोग के खिलाफ राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि मॉक पार्लियामेंट और रामलीला मैदान की रैली को कितना जनसमर्थन मिलता है। फिलहाल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तीफे की मांग और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में नए टकराव का केंद्र बनता नजर आ रहा है।