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  • मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित

    मानसून सत्र से पहले रामदास अठावले का बड़ा दावा, बोले- एनडीए के पास दो-तिहाई बहुमत, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक होंगे पारित


    नई दिल्ली ।
    संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने महत्वपूर्ण विधेयकों को लेकर अपना आत्मविश्वास जाहिर किया है। केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रमुख रामदास अठावले ने दावा किया है कि अब एनडीए के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत है, जिसके आधार पर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने का रास्ता पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो गया है।

    अठावले ने कहा कि पिछले संसदीय सत्र में इन विधेयकों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका था, जिसके कारण वे पारित नहीं हो पाए। उनके अनुसार उस समय विपक्षी दलों ने एकजुट होकर संविधान संशोधन प्रस्तावों का विरोध किया था। अब राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव आया है और सरकार को पहले की तुलना में अधिक समर्थन मिलने की संभावना है।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े विधेयकों को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया जा सकता है। उनका कहना है कि सरकार इन महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है और गठबंधन के सहयोगी दल भी इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभाएंगे।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि संसद में मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि कुछ दलों और सांसदों के समर्थन से गठबंधन का आंकड़ा दो-तिहाई बहुमत तक पहुंच गया है। इसी आधार पर उन्होंने उम्मीद जताई कि संविधान संशोधन से जुड़े लंबित विधेयकों को इस बार आवश्यक समर्थन प्राप्त होगा।

    अठावले ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण लागू होने से वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। उनके अनुसार यह कदम लोकतांत्रिक व्यवस्था को और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

    परिसीमन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि समय-समय पर जनसंख्या और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया जाना आवश्यक होता है। उनका कहना था कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नियमित हिस्सा है और लंबे अंतराल के बाद इसे लागू करना आवश्यक माना जाता है ताकि प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित और प्रभावी बन सके।

    उन्होंने विपक्षी दलों से भी अपील की कि राष्ट्रीय महत्व के इन विधेयकों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर देखा जाए। उनके अनुसार महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और निर्वाचन व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने जैसे विषय व्यापक जनहित से जुड़े हैं, इसलिए इन पर सकारात्मक सहयोग मिलना चाहिए।

    उल्लेखनीय है कि पिछले संसदीय सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन प्रस्ताव अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सके थे। इसके बाद से इन विधेयकों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं लगातार जारी हैं। अब मानसून सत्र से पहले केंद्रीय मंत्री के इस दावे ने राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    आगामी संसद सत्र में सरकार की रणनीति, विपक्ष का रुख और सदन में संख्या बल की वास्तविक स्थिति पर सभी की नजरें रहेंगी। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में निर्णायक प्रगति देखने को मिल सकती है।

  • दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    नई दिल्ली । भारतीय वास्तुकला और प्राचीन इतिहास हमेशा से ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। समकालीन दुनिया में जब भी समय यात्रा या ‘टाइम ट्रेवल’ का उल्लेख होता है, तो सामान्यतः हॉलीवुड की फिल्मों या विज्ञान कथाओं का ध्यान आता है। लेकिन दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों ने आधुनिक विज्ञान और अनुसंधानकर्ताओं को एक नए विमर्श पर मजबूर कर दिया है। इन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इस सीमा तक विस्मयकारी है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उस दौर के शिल्पकारों को भविष्य की तकनीकों का आभास था या उनके पास कोई अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक समझ मौजूद थी।

    तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित पंचवर्णस्वामी मंदिर इस अनूठे रहस्य का एक अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर की एक दीवार पर एक ऐसी नक्काशी देखने को मिलती है जो आधुनिक इतिहासकारों को चकित कर देती है। इस नक्काशी में एक मानव आकृति को स्पष्ट रूप से दो पहियों वाली साइकिल जैसी सवारी चलाते हुए प्रदर्शित किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, आधुनिक दुनिया में साइकिल का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सदियों पहले के मूर्तिकारों ने एक ऐसी सवारी की परिकल्पना कैसे की, जिसे पैडल मारकर चलाया जाता है। इसे लेकर विभिन्न विशेषज्ञ प्राचीन विज्ञान के उन्नत होने के कयास लगा रहे हैं।

    इसी प्रकार का तकनीकी कौतूहल कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है। इस मंदिर की दीवारों पर स्थापित कुछ मूर्तियों के हाथों में ऐसे उपकरण और आकृतियां दिखाई देती हैं, जो वर्तमान समय के आधुनिक गैजेट्स, गियर अथवा यांत्रिक पुर्जों से अत्यधिक मेल खाती हैं। कुछ विशिष्ट आकृतियों में इतनी सूक्ष्मता से काम किया गया है कि वे किसी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी यंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। ग्रेनाइट जैसे अत्यंत कठोर पत्थरों पर इतनी फिनिशिंग और सटीकता के साथ आकृतियों को उकेरना आज की अत्याधुनिक मशीनों के बिना अत्यंत कठिन माना जाता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन काल में निर्माण तकनीक हमारी वर्तमान सोच से कहीं अधिक विकसित थी।

    इन सबमें सबसे अधिक चौंकाने वाला रहस्य कुछ मंदिरों के स्तंभों पर मिली वह नक्काशी है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट की वेशभूषा से मिलती-जुलती है। इस विशिष्ट आकृति के सिर पर एक गोल हेलमेट जैसी संरचना है और पीठ पर एक ऐसा उपकरण बंधा हुआ दिखाई देता है जो आधुनिक स्पेससूट के ऑक्सीजन टैंक जैसा प्रतीत होता है। उस प्राचीन काल में, जब विमानन तकनीक का विकास नहीं हुआ था, पत्थरों पर ऐसी आकृति का पाया जाना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है। यही कारण है कि जिज्ञासु और विश्लेषक इन प्राचीन धरोहरों को समय यात्रा के विजुअल साक्ष्यों से जोड़कर देखने लगे हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और इतिहासकार इन प्राचीन कलाकृतियों के पीछे छिपे वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं। जहां कुछ विश्लेषक इसे केवल एक संयोग या कलात्मक कल्पना का परिणाम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और विमानन शास्त्र का स्तर अत्यंत उच्च था। प्राचीन ग्रंथों और संहिताओं में भी ऐसी उन्नत तकनीकों के सांकेतिक संदर्भ मिलते हैं। कारण चाहे जो भी हो, दक्षिण भारत के ये ऐतिहासिक मंदिर इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करते हैं कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत में ऐसे अनेक रहस्य छिपे हैं, जिनकी पूर्ण व्याख्या करने में आधुनिक विज्ञान को अभी लंबा समय लगेगा।

  • न्यायिक गरिमा और आचार संहिता पर उठे गंभीर सवाल: कार्यकाल के दौरान गैस एजेंसी चलाने के विवाद में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश

    न्यायिक गरिमा और आचार संहिता पर उठे गंभीर सवाल: कार्यकाल के दौरान गैस एजेंसी चलाने के विवाद में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश

    नई दिल्ली । देश की उच्च न्यायपालिका में संवैधानिक पदों पर आसीन न्यायाधीशों के लिए निर्धारित नैतिक आचार संहिता और नियमों की अनदेखी का एक अत्यंत संवेदनशील और चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और बाद में मणिपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दे चुके एक सेवानिवृत्त जस्टिस अपने लगभग 16 वर्षों के लंबे न्यायिक कार्यकाल के दौरान समानांतर रूप से एक एलपीजी गैस वितरण एजेंसी का संचालन भी करते रहे। इस पूरे मामले का आधिकारिक भंडाफोड़ सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड से जुड़े एक डीलरशिप विवाद और एजेंसी के पूर्व प्रबंधक की विधवा द्वारा उच्च न्यायालय में दायर की गई एक रिट याचिका के माध्यम से हुआ है, जिसने न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

    प्राप्त विवरणों और दस्तावेजों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनी ने वर्ष 1984 में संबंधित व्यक्ति को किचन फ्लेम के नाम से एक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप आवंटित की थी। स्थापित नियमों और अलिखित न्यायिक आचार संहिता के अनुसार, संवैधानिक अदालतों के न्यायाधीशों के लिए यह अनिवार्य माना जाता है कि उनका सरकार, निजी पक्षों अथवा सार्वजनिक उपक्रमों के साथ किसी भी प्रकार का आर्थिक, व्यावसायिक या संविदात्मक संबंध नहीं होना चाहिए ताकि हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो। इसके बावजूद, संबंधित न्यायाधीश नवंबर 2024 में मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने तक इस व्यावसायिक गैस एजेंसी के वैधानिक मालिक बने रहे, जिसे प्रथम दृष्टया स्थापित सेवा नियमों और नैतिक मापदंडों का सीधा उल्लंघन माना जा रहा है।

    अत्यंत महत्वपूर्ण न्यायिक पदों पर आसीन रहने के बावजूद इस व्यावसायिक समझौते को समय-समय पर नवीनीकृत भी कराया जाता रहा। संबंधित न्यायाधीश ने अस्सी के दशक के मध्य में एक अधिवक्ता के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू की थी, जिसके बाद वर्ष 2008 में वे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए और वर्ष 2023 में पदोन्नत होकर मुख्य न्यायाधीश बने। इस पूरे सफर के दौरान गैस एजेंसी के अनुबंध को कई बार रिन्यू कराया गया, जिसकी वैधता वर्ष 2030 तक के लिए बढ़ा दी गई थी। तेल कंपनी के साथ हुए सबसे हालिया समझौते के आधिकारिक स्टाम्प पेपर पर संबंधित न्यायाधीश के हस्ताक्षर और तस्वीरें भी मौजूद पाई गईं, जो इस व्यावसायिक गतिविधि में उनकी प्रत्यक्ष संलिप्तता को प्रमाणित करती हैं।

    इस पूरे गुत्थी का खुलासा तब हुआ जब उक्त गैस एजेंसी का कामकाज संभालने वाले पूर्व प्रबंधक की विधवा ने मालिकाना हक को अपने नाम पर स्थानांतरित करने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण ली। इसी विधिक प्रक्रिया के दौरान दिसंबर 2025 में प्रशासन के पास एक आधिकारिक जनशिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि गैस एजेंसी के वास्तविक मालिक एक पूर्णकालिक न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहे हैं। इस गंभीर शिकायत के आधार पर तेल कंपनी ने संबंधित पूर्व न्यायाधीश को लगातार कई कारण बताओ नोटिस जारी किए। कंपनी का स्पष्ट रुख था कि बिना पूर्व लिखित अनुमति के किसी भी संवैधानिक पद पर रहते हुए व्यावसायिक एजेंसी चलाना नियमों का उल्लंघन है, इसलिए क्यों न इस आवंटन को रद्द कर दिया जाए।

    न्यायिक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी संबंधित व्यक्ति की ओर से तेल कंपनी द्वारा जारी किए गए किसी भी कारण बताओ नोटिस का कोई विधिक जवाब दाखिल नहीं किया गया। अंततः प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए जुलाई के प्रथम सप्ताह में किचन फ्लेम नामक इस एलपीजी डीलरशिप के लाइसेंस को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। लाइसेंस सस्पेंड होने के बाद पीड़ित परिवार ने दोबारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिनका तर्क है कि मूल आवंटनकर्ता की गलतियों और प्रशासनिक निष्क्रियता के कारण उन्हें बेवजह आर्थिक और मानसिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह पूरा मामला एक ऐसे समय में सामने आया है जब न्यायपालिका पहले से ही कुछ अन्य आंतरिक विवादों के कारण असहज स्थिति का सामना कर रही है, और इस नए घटनाक्रम ने न्यायिक शुचिता पर बहस को और तेज कर दिया है।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर टली सुनवाई, शीर्ष अदालत ने कहा- बातचीत चल रही है तो दे रहे हैं समय

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रतिनिधि संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर टली सुनवाई, शीर्ष अदालत ने कहा- बातचीत चल रही है तो दे रहे हैं समय

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने मथुरा स्थित ऐतिहासिक श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद विवाद से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर होने वाली सुनवाई को आगामी 12 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की कार्यवाही जैसे ही शुरू हुई, पीठ को यह अवगत कराया गया कि इस विवाद से जुड़े विभिन्न हिंदू पक्षों के बीच आपस में कुछ अनौपचारिक बातचीत का दौर चल रहा है। यह आंतरिक विचार-विमर्श इस मुख्य बिंदु पर केंद्रित है कि अदालत के समक्ष चल रहे विभिन्न मुकदमों में से किसे मुख्य मुकदमा माना जाए और किसका दावा प्राथमिक होगा। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने वादियों के बीच चल रही इसी ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा को ध्यान में रखते हुए मामले को आगे बढ़ाने का निर्देश जारी किया।

    अदालत की कार्यवाही की शुरुआत में ही पीठ ने विभिन्न हिंदू पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं से उनके बीच चल रही इस आंतरिक बातचीत की प्रगति के संबंध में सीधे सवाल पूछे। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यदि वादियों के बीच मामले को सुलझाने अथवा मुकदमों के एकीकरण को लेकर कोई गंभीर विमर्श चल रहा है, तो अदालत उन्हें उचित समय देने के लिए तैयार है। इस दौरान एक हिंदू पक्ष के वकील ने पीठ से यह भी आग्रह किया कि इस आंतरिक बातचीत को पूरी तरह अनौपचारिक रखा जाए और न्यायालय अपने लिखित आदेश में इस चर्चा का उल्लेख दर्ज न करे। हालांकि, पीठ ने तार्किक रुख अपनाते हुए कहा कि यदि पक्षकारों के बीच कोई सकारात्मक विमर्श चल रहा है, तो उसे आदेश में दर्ज करने में कोई विधिक बाधा नहीं होनी चाहिए।

    सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले को बार-बार स्थगित किए जाने की प्रवृत्ति पर भी ध्यान दिलाया। पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस संवेदनशील मामले को पूर्व में भी कई बार टाला जा चुका है, इसलिए इस बार स्थगन का आदेश केवल इसी ठोस आधार पर दिया जा रहा है कि पक्षकार आपसी सहमति और मुकदमों के स्वरूप को लेकर किसी निर्णय पर पहुंच सकें। अदालत ने वकीलों को आश्वस्त किया कि वे किसी भी पक्ष को बातचीत के लिए विवश नहीं कर रहे हैं, बल्कि वादियों के बीच के समन्वय को देखते हुए ही प्रक्रिया को समय दे रहे हैं।

    यह पूरा विधिक विवाद दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट के वर्ष 2025 के एक आदेश के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में एक विशिष्ट मुकदमे से जुड़े हिंदू पक्ष को भगवान श्रीकृष्ण के सभी भक्तों का आधिकारिक प्रतिनिधि स्वीकार कर लिया था, जिसे दूसरे हिंदू पक्ष ने चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस प्रकार का एकपक्षीय प्रतिनिधित्व अन्य वादियों के दावों को प्रभावित कर सकता है। अब सभी पक्षों की नजरें 12 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि हिंदू पक्षों की आपसी बातचीत से मुकदमों की रूपरेखा में क्या बदलाव आता है।

  • शहीद दिवस रैली से ठीक पहले कामरहाटी के कद्दावर विधायक ने छोड़ी पार्टी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगा कर दी खुली चुनौती

    शहीद दिवस रैली से ठीक पहले कामरहाटी के कद्दावर विधायक ने छोड़ी पार्टी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगा कर दी खुली चुनौती

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस में आगामी 21 जुलाई की शहीद दिवस रैली से ठीक पहले एक बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा सपरिवार समन जारी किए जाने के बाद कामरहाटी विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ और कद्दावर विधायक मदन मित्रा ने मंगलवार रात को ही पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व से दूरी बना ली और सुबह होते ही ममता बनर्जी के आधिकारिक कालीघाट गुट को औपचारिक रूप से अलविदा कह दिया। तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देने के तुरंत बाद मदन मित्रा ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, विशेष रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कई सनसनीखेज और गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे राज्य का सियासी पारा पूरी तरह से गरमा गया है।

    एक प्रमुख बांग्ला समाचार चैनल को दिए गए अपने विस्तृत साक्षात्कार में पूर्व तृणमूल नेता ने पार्टी के भीतर व्याप्त सांगठनिक ढांचे और नेतृत्व की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में खुले मंच से यह दावा किया कि वह इस तथ्य को पूरी तरह साबित कर सकते हैं कि वर्तमान सत्ता पक्ष की टीम में शामिल प्रत्येक दस में से आठ लोग भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से पाक-साफ बताते हुए नेतृत्व को खुली चुनौती दी कि यदि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमाणित कर देता है, तो वह राजनीति छोड़ने के साथ-साथ अत्यंत कठोर कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने विपक्ष के खेमे में जाने और वहां मौजूद अन्य नेताओं के संदर्भ में पूछे गए सवालों पर स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य राजनीति के तहत बड़े सांगठनिक बदलाव अब अवश्यंभावी हो चुके हैं।

    अभिषेक बनर्जी के पार्टी में तेजी से बढ़ते प्रभाव और उनके काम करने के तौर-तरीकों को मुख्य निशाना बनाते हुए मदन मित्रा ने भूतकाल की राजनीतिक घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब अभिषेक बनर्जी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था, तब उनके सामने संगठन में पार्थ चटर्जी, मुकुल रॉय और सुब्रत बख्शी जैसे अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ चेहरे मौजूद थे। आरोप के अनुसार, इन वरिष्ठ चेहरों को आगे रखकर पृष्ठभूमि से पूरी तरह से समानांतर सत्ता चलाने का प्रयास किया गया। मित्रा ने वर्तमान सांगठनिक गतिविधियों को बेहद नकारात्मक बताते हुए आरोप लगाया कि समकालीन राजनीति में इतनी जटिल और रणनीतिक प्रवृत्तियां किसी अन्य नेता में नहीं हैं और उनके सामने विरोधी राजनीतिक दल जैसे माकपा और भाजपा के नेता भी काफी पीछे नजर आते हैं।

    राजनीतिक हलकों में इस प्रकार के तीखे बयानों के बाद संभावित सुरक्षा खतरों और पार्टी की ओर से होने वाली किसी भी जवाबी कार्रवाई के डर के संबंध में पूछे गए प्रश्नों का मदन मित्रा ने बेहद बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उनके मन से किसी भी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक भय पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वह मानसिक रूप से पूरी तरह शांत हैं। उन्होंने आगे पलटवार करते हुए कहा कि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने या संगठनात्मक हमला करने का साहस विरोधियों में नहीं है। अभिषेक बनर्जी के क्षेत्रीय जनाधार पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके स्थानीय क्षेत्र के नागरिक भी उनके साथ खड़े नहीं हैं, जिसके संबंध में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसका आज तक संगठन की ओर से कोई आधिकारिक खंडन जारी नहीं किया जा सका है।

  • मंदिर समिति के अध्यक्ष के पूर्व निजी सहायक प्रमोद नौटियाल पर कसा शिकंजा, चोरी की रकम की बरामदगी के लिए रिमांड की तैयारी में जुटी पुलिस

    मंदिर समिति के अध्यक्ष के पूर्व निजी सहायक प्रमोद नौटियाल पर कसा शिकंजा, चोरी की रकम की बरामदगी के लिए रिमांड की तैयारी में जुटी पुलिस

    नई दिल्ली । उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध और पवित्र बद्रीनाथ धाम में चढ़ावे की राशि की चोरी के मामले में चमोली पुलिस की विशेष जांच टीम ने एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। पुलिस की ओर से आधिकारिक तौर पर दावा किया गया है कि गिरफ्तार किया गया मुख्य आरोपी प्रमोद नौटियाल मंदिर परिसर में दान की गई धनराशि की गिनती के दौरान एक या दो बार नहीं, बल्कि कम से कम चार अलग-अलग अवसरों पर नकदी की हेराफेरी करते हुए सीसीटीवी कैमरों में कैद हुआ है। इस हाई-प्रोफाइल मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस की विंग लगातार तकनीकी साक्ष्यों को जुटाने में लगी हुई है। पुलिस अब अदालत के माध्यम से आरोपी की हिरासत प्राप्त करने की कानूनी प्रक्रिया में जुट गई है ताकि चोरी की गई वास्तविक धनराशि और अन्य कीमती सामान को बरामद किया जा सके।

    चमोली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, जांच दल ने अब तक मंदिर परिसर में हुई दान की गिनती से संबंधित कई महत्वपूर्ण तिथियों की सीसीटीवी फुटेज का बारीकी से विश्लेषण किया है। इनमें मुख्य रूप से जून और जुलाई महीने के शुरुआती हफ्तों की रिकॉर्डिंग शामिल हैं, जहां आरोपी प्रमोद नौटियाल कथित तौर पर बड़ी ही चालाकी से नकदी को छिपाकर अपने पास रखते हुए दिखाई दे रहा है। हालांकि, तकनीकी सीमाओं के कारण जांच टीम के सामने एक बड़ी चुनौती भी खड़ी हो गई है। वर्तमान यात्रा सीजन के दौरान अब तक दर्जनों बार दान की गिनती की जा चुकी है, परंतु सीसीटीवी कैमरों का डिजिटल स्टोरेज फुल हो जाने की वजह से पुरानी फुटेज स्वतः ही डिलीट हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में पुलिस को अंदेशा है कि आरोपी पूर्व में भी इस तरह की वारदातों को अंजाम देता आ रहा होगा, जिसके साक्ष्य मिट चुके हैं।

    गौरतलब है कि इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी प्रमोद नौटियाल श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के शीर्ष नेतृत्व का बेहद करीबी और पूर्व निजी सहायक रह चुका है। वह लंबे समय से इस प्रतिष्ठित धार्मिक संस्थान से जुड़ा हुआ था और उसके पास वीआईपी प्रोटोकॉल के साथ-साथ मंदिर में आने वाले चढ़ावे की गिनती की प्रत्यक्ष निगरानी करने की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी थी। इस ऊंचे और जिम्मेदार पद पर रहने के कारण ही उसे नकदी की गिनती वाले संवेदनशील क्षेत्र में निर्बाध प्रवेश की अनुमति मिली हुई थी, जिसका उसने कथित तौर पर दुरुपयोग किया। आरोपी को पुलिस ने उसके देहरादून स्थित आवास से गिरफ्तार किया था, जिसके बाद अदालत ने उसे चौदह दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।

    पुलिस और विशेष जांच दल की अब तक की पूछताछ में आरोपी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार नहीं किया है और वह लगातार जांच अधिकारियों को गुमराह करने का प्रयास कर रहा है। वर्तमान में पुलिस के हाथ केवल एक शालिग्राम शिला लगी है, जबकि चोरी की गई नकद राशि अथवा सोने-चांदी के सिक्कों की बरामदगी अभी भी शेष है। इसी वजह से पुलिस अब उच्च न्यायालय अथवा सत्र अदालत के समक्ष दोबारा रिमांड का आवेदन प्रस्तुत करने की रणनीति बना रही है। इस प्रशासनिक विफलता और सुरक्षा में चूक के बाद मंदिर समिति ने भी कड़ा रुख अख्तियार करते हुए आंतरिक व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं, जिसके तहत दान प्रबंधन से जुड़े कुछ अन्य अधिकारियों को भी उनके पदों से हटा दिया गया है। वर्तमान में इस पूरे प्रकरण की समानांतर जांच पुलिस की एसआईटी, मंदिर समिति की आंतरिक जांच कमेटी और राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति द्वारा अत्यंत गंभीरता से की जा रही है।

  • छत्रपति शिवाजी महाराज के ऐतिहासिक स्थल पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास, वन विभाग ने त्वरित कार्रवाई कर हटाया बोर्ड

    छत्रपति शिवाजी महाराज के ऐतिहासिक स्थल पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास, वन विभाग ने त्वरित कार्रवाई कर हटाया बोर्ड

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र के पुणे में स्थित ऐतिहासिक और प्रमुख पर्यटन स्थल सिंहगढ़ किले में सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित करने की एक गंभीर कोशिश का मामला सामने आया है। कुछ अज्ञात शरारती तत्वों द्वारा किले के मुख्य प्रवेश मार्ग के समीप एक बेहद संवेदनशील और विवादित पोस्टर लगा दिया गया, जिसमें एक विशेष समुदाय के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी। जैसे ही यह मामला स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों के संज्ञान में आया, तुरंत त्वरित कार्रवाई की गई। राज्य के वन विभाग ने मुस्तैदी दिखाते हुए उस विवादित पोस्टर को तत्काल प्रभाव से वहां से हटा दिया। हालांकि इस घटना के संबंध में पुलिस को अभी तक कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है, लेकिन मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने स्वतः ही इस पूरे प्रकरण की जांच शुरू कर दी है।

    वन विभाग के प्रशासनिक अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, यह घटना मंगलवार सुबह की है जब पार्किंग क्षेत्र के बिल्कुल समीप किले के प्रवेश द्वार पर लगे एक पुराने लोहे के बोर्ड पर यह छपा हुआ पोस्टर चिपका हुआ देखा गया। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सुबह के समय गश्त के दौरान जैसे ही यह आपत्तिजनक पोस्टर दिखाई दिया, उसे तुरंत हटाकर जब्त कर लिया गया। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, किसी अज्ञात असामाजिक तत्व ने तड़के अंधेरे का फायदा उठाकर इस कृत्य को अंजाम दिया और प्रिंटेड पोस्टर को वहां चिपकाकर मौके से फरार हो गया। मराठी भाषा में लिखे गए इस पोस्टर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी तेजी से प्रसारित हो गईं, जिससे क्षेत्र में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह रही कि पोस्टर के निचले हिस्से में आधिकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए आदेशानुसार शब्द लिखा गया था। वन विभाग के अधिकारियों ने अंदेशा व्यक्त किया है कि शरारती तत्वों ने जानबूझकर इस शब्द का इस्तेमाल किया ताकि आम जनता और वहां आने वाले पर्यटकों के बीच यह गलत संदेश और भ्रम फैलाया जा सके कि यह प्रतिबंध सरकार या किसी अधिकृत सरकारी विभाग द्वारा लागू किया गया है। वर्तमान में सिंहगढ़ किला और उसके आसपास का पूरा विस्तृत वन क्षेत्र राज्य के वन विभाग के प्रशासनिक और कानूनी अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है और यहां किसी भी प्रकार का प्रतिबंध पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

    ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सिंहगढ़ का किला मध्यकालीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली पहाड़ी किला माना जाता है। यह स्थल छत्रपति शिवाजी महाराज के समृद्ध इतिहास और प्रसिद्ध सिंहगढ़ की ऐतिहासिक लड़ाई का गवाह रहा है, जिसके कारण महाराष्ट्र के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में इसकी गिनती होती है। पुणे ग्रामीण पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भले ही किसी संगठन ने इस मामले में शिकायत दर्ज नहीं कराई है, लेकिन सामाजिक शांति और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली इस हरकत को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है। किले की तरफ जाने वाले सभी पहाड़ी रास्तों, चेकपोस्ट और मुख्य प्रवेश मार्गों पर स्थापित सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की गहनता से जांच की जा रही है ताकि संदिग्धों को चिन्हित कर उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।

  • केन्द्र सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर विन्डफॉल टैक्स घटाया…. डीजल और ATF पर बढ़ाया

    केन्द्र सरकार ने पेट्रोल के निर्यात पर विन्डफॉल टैक्स घटाया…. डीजल और ATF पर बढ़ाया


    नई दिल्ली।
    मोदी सरकार (Modi Government) ने बुधवार को डीजल (Diesel) और विमान में इस्तेमाल होने वाले ईंधन (Aviation fuel) ATF के निर्यात पर लगने वाले विन्डफॉल टैक्स (Windfall tax) को बढ़ा दिया है, जबकि पेट्रोल के निर्यात पर यह टैक्स घटा दिया। यह फैसला 16 जुलाई यानी आज से लागू हो गया है। यह हर 15 दिन पर होने वाली समीक्षा का हिस्सा है।

    वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, पेट्रोल पर विन्डफॉल टैक्स घटाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। यह पहले 4 रुपये था। वहीं, डीजल पर यह शुल्क 8.5 रुपये से बढ़ाकर 15.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। जबकि, विन्डफॉल टैक्स एटीएफ पर 7.5 रुपये से बढ़ाकर 14.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। बता दें इससे आम जनता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।


    क्यों किया टैक्स में बदलाव

    यह टैक्स में बदलाव ऐसे समय आया है, जब वैश्विक तेल बाजार काफी अस्थिर है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत करीब 2% बढ़कर 84.73 डॉलर प्रति बैरल के एक महीने के हाई पर पहुंच गई। इसकी वजह थी कि अमेरिका ने ईरान पर अपनी नौसैनिक नाकाबंदी फिर से लागू कर दी, जिससे होर्मुज स्ट्रेट से तेल सप्लाई पर खतरा पैदा हो गया। इस रास्ते दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई होती थी।

    इसके अलावा, नए भू-राजनीतिक तनाव और तेल टैंकरों पर हमलों ने भी कीमतों को सहारा दिया, हालांकि महंगाई की चिंताओं और वैश्विक मांग में सुस्ती ने बढ़त को सीमित रखा। रूस के कम निर्यात जैसी सप्लाई की दिक्कतों से डीजल की रिफाइनिंग मार्जिन बढ़ा है, जिससे ऑयल मार्केट पर दबाव बना हुआ है।


    थोक खरीद पर रोक और बाद में राहत

    केंद्र सरकार ने 11 जून को औद्योगिक, कमर्शियल और संस्थागत उपभोक्ताओं को खुदरा ईंधन पंपों से पेट्रोल-डीजल खरीदने से रोक दिया था और उन्हें थोक सप्लाई चैनलों से खरीदारी करने का निर्देश दिया था। यह अस्थायी आदेश ईंधन की उचित उपलब्धता सुनिश्चित करने, जमाखोरी और अवैध हेर-फेर रोकने तथा आम उपभोक्ताओं के लिए निर्बाध सप्लाई बनाए रखने के लिए जारी किया गया था।

    सरकार ने कहा था कि ग्लोबल सप्लाई चेन और शिपिंग पर भू-राजनीतिक स्थिति का बुरा असर पड़ रहा है, जिससे आपूर्ति असंतुलन का खतरा बढ़ गया है। दरअसल, थोक खरीदारों और खुदरा दरों के बीच बड़े अंतर के कारण बड़े उपभोक्ता अपनी खरीदारी नियमित थोक चैनलों से हटाकर खुदरा पंपों पर कर रहे थे, जिससे खुदरा बिक्री असामान्य रूप से बढ़ गई थी। उस समय दिल्ली में रिटेल डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर था, जबकि थोक खरीदारों को 134.50 रुपये प्रति लीटर चुकाना पड़ रहा था।

    यह अंतर इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि सरकारी तेल कंपनियों ने पश्चिम एशिया संघर्ष की वजह से आम उपभोक्ताओं को ईंधन की महंगाई से बचाने के लिए रिटले रेट को नियंत्रित रखा। जबकि, थोक खरीदार बाजार-आधारित दरों का भुगतान करते रहे। इस आदेश के तहत, खुदरा पंपों से डीजल बिक्री केवल वाहन ईंधन टैंक या पीईएसओ अप्रूब्ड कंटेनरों तक सीमित कर दी गई।

    वहीं डीजल पर 200 लीटर की खरीद सीमा तय कर दी गई। यह प्रतिबंध 90 दिनों तक प्रभावी रह सकता था और नए आदेश से बढ़ाया भी जा सकता था। उल्लंघन पर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत सजा का प्रावधान था। बाद में, 29 जून को ये पाबंदियां हटा ली गईं और 1 जुलाई से वापस सामान्य व्यवस्था लागू हो गई।

  • IDBI Bank को 53,000 करोड़ में खरीदेगी कनाडा के उद्योगपति प्रेम वत्स की कंपनी

    IDBI Bank को 53,000 करोड़ में खरीदेगी कनाडा के उद्योगपति प्रेम वत्स की कंपनी


    नई दिल्ली।
    आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) को बेचने की सरकार की वर्षों पुरानी जद्दोजहद अपने मुकाम पर पहुंचती दिख रही है। वित्त मंत्रालय (Ministry of Finance) में मंगलवार को हुई उच्च स्तरीय बैठकों के बाद सरकार और कनाडा के उद्योगपति प्रेम वत्स (Canadian Industrialist Prem Watsa) की कंपनी फेयरफैक्स होल्डिंग्स (Fairfax Holdings) के बीच इस बहुप्रतीक्षित सौदे पर सहमति बन गई है। इसके तहत, कंपनी 53,000 करोड़ रुपये में बैंक में बहुलांश हिस्सा खरीदेगी। यह सौदा न सिर्फ विनिवेश के मोर्चे पर सरकार की मदद करेगा, बल्कि भारतीय बैंकिंग के इतिहास में एक नया अध्याय भी लिखेगा।

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) की अगुवाई वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह को इस संशोधित बोली से अवगत करा दिया गया है। जल्द ही इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना और अभिरुचि पत्र जारी किया जाएगा, जिसके बाद शेयर-परचेज एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होंगे। चूंकि, फेयरफैक्स एक प्रवर्तक के रूप में हिस्सेदारी ले रही है, इसलिए कंपनी को आम शेयरधारकों के लिए एक ओपन ऑफर भी लाना होगा।

    नई कीमत पर, सरकार बैंक में अपनी 45.48 फीसदी में से 30.48 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर करीब 26,620 करोड़ रुपये जुटा सकती है। इसके अलावा, बैंक में 50 फीसदी से थोड़ी कम हिस्सेदारी रखने वाला भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) भी अपना 30.24 फीसदी हिस्सा बेचने की योजना बना रहा है।


    टूटेगा पिछला रिकॉर्ड

    भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश साल 2025 में देखा गया था, जब एमिरेट्स एनबीडी ने 2.75 अरब डॉलर में आरबीएल बैंक की 60 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी। आईडीबीआई बैंक का यह सौदा उस रिकॉर्ड को लगभग दोगुना कर देगा।

    फेयरफैक्स के लिए आगे कुछ बैंकिंग नियमों का पालन करना होगा। फेयरफैक्स की भारतीय इकाई के पास पहले से ही सीएसबी बैंक में 40 फीसदी हिस्सेदारी है। बैंकिंग नियमों के मुताबिक, प्रवर्तक को सीएसबी और आईडीबीआई बैंक का आपस में विलय करना होगा, जिसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक कुछ अतिरिक्त समय दे सकता है। इसके अलावा, इस सौदे को अंतिम रूप देने से पहले आरबीआई की फिट एंड प्रॉपर जांच और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की मंजूरी भी जरूरी होगी।


    बजटीय लक्ष्य को मिलेगी रफ्तार

    सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 में परिसंपत्ति मुद्रीकरण के जरिये 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। इसमें से अब तक वह सिर्फ 20,272 करोड़ रुपये ही जुटा सकी है। आईडीबीआई बैंक से मिलने वाले 26,620 करोड़ रुपये के बाद सरकार इस लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच जाएगी। इसके बाद सरकार कोल इंडिया और एलआईसी जैसी कंपनियों में भी अपनी कुछ हिस्सेदारी बेच सकती है।


    ये होगी सबसे लंबी विनिवेश प्रक्रिया

    आईडीबीआई बैंक की निजीकरण प्रक्रिया भारतीय बैंकिंग इतिहास के सबसे लंबे समय तक खिंचने वाले विनिवेश मामलों में एक है। इसकी शुरुआत 21 जनवरी, 2019 में हुई थी।

  • तेलंगाना में बेटियों की घट रही संख्या, 1000 बेटों पर सिर्फ 787 बेटियां, 14 जिलों में हालात गंभीर

    तेलंगाना में बेटियों की घट रही संख्या, 1000 बेटों पर सिर्फ 787 बेटियां, 14 जिलों में हालात गंभीर


    नई दिल्ली। तेलंगाना में जन्म के समय लिंगानुपात को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में बेटियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। साल 2024 के सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) के आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना के 33 जिलों में से 14 जिलों में प्रति 1,000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या 900 से भी नीचे पहुंच गई है।

    इन आंकड़ों में सबसे खराब स्थिति नलगोंडा जिले की सामने आई है, जहां साल 2024 में प्रति 1,000 लड़कों पर सिर्फ 787 लड़कियों का जन्म दर्ज किया गया। यह तेलंगाना में सबसे कम और देश के चिंताजनक आंकड़ों में शामिल है।

    नलगोंडा में लंबे समय से बनी हुई है समस्या
    नलगोंडा जिले में जन्म के समय लिंगानुपात की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई प्रयासों के बावजूद यहां बेटियों की संख्या में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। नए आंकड़ों ने एक बार फिर प्रशासन और सामाजिक संगठनों की चिंता बढ़ा दी है।

    कामारेड्डी ने पेश की सकारात्मक मिसाल
    जहां एक ओर कई जिलों में बेटियों की संख्या कम हो रही है, वहीं कामारेड्डी जिला उम्मीद की किरण बनकर सामने आया है। यह तेलंगाना का एकमात्र जिला है जहां लड़कियों का जन्म लड़कों से अधिक दर्ज किया गया।

    कामारेड्डी में प्रति 1,000 लड़कों पर 1,060 लड़कियों का जन्म हुआ। इसके बाद मुलुगु (991) और सिद्दीपेट (951) जिलों का स्थान रहा। इन दोनों जिलों ने राज्य के औसत 910 से बेहतर प्रदर्शन किया है।

    कई अन्य जिलों में भी स्थिति चिंताजनक
    नलगोंडा के अलावा कई अन्य जिलों में भी जन्म के समय लिंगानुपात काफी कम दर्ज किया गया है।

    महबूबाबाद: 805 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के
    नागरकुरनूल: 842
    वनपर्थी: 848

    इसके अलावा वारंगल, रंगारेड्डी और खम्मम जैसे बड़े जिलों में भी लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में कम दर्ज की गई है।

    साल 2024 में तेलंगाना में कुल 7.7 लाख बच्चों का जन्म दर्ज हुआ। देरी से होने वाले पंजीकरण की संख्या कम होने के कारण इन आंकड़ों को काफी सटीक माना जा रहा है।

    पुराने मामलों ने फिर बढ़ाई चिंता
    नलगोंडा के ताजा आंकड़ों ने साल 2017 की घटनाओं की याद भी ताजा कर दी है। उस समय लड़कियों की सुरक्षा के लिए गठित ‘रक्षिता’ कमेटी ने जिले में कन्या भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के 14 मामले सामने लाए थे।

    जांच में सामने आया था कि कुछ मामलों में बेटियों के जन्म को छिपाया गया और उनके शवों को गुपचुप तरीके से ठिकाने लगाया गया। साल 2011 की जनगणना में भी कम उम्र के बच्चों में लड़कियों की घटती संख्या के संकेत मिले थे।

    बेटियों की संख्या घटने की वजह क्या है?
    विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे सामाजिक सोच और परंपरागत मान्यताएं बड़ी वजह हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बेटे को परिवार का वंश आगे बढ़ाने वाला और बुढ़ापे का सहारा माना जाता है।

    वहीं दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारण कुछ लोग बेटियों को आर्थिक बोझ के रूप में देखते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कम लिंगानुपात वाले जिलों में सरकार को निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।

    विशेषज्ञों ने अल्ट्रासाउंड केंद्रों की नियमित जांच और पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) कानून को सख्ती से लागू करने की मांग की है, ताकि भ्रूण लिंग जांच और कन्या भ्रूण हत्या जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।