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  • कल से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा…. सोने की झाड़ू से होती है यात्रा मार्ग की सफाई, जानें इसकी वजह

    कल से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा…. सोने की झाड़ू से होती है यात्रा मार्ग की सफाई, जानें इसकी वजह


    पुरी।
    ‘जगन्नाथ रथ यात्रा 2026’ (Jagannath Rath Yatra 2026) का शुभारंभ 16 जुलाई से होने जा रहा है. हिंदू धर्म (Hinduism) में भगवान जगन्नाथ (Lord Jagannath) की रथ यात्रा सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है. इस रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं. इस रथ यात्रा में एक बड़ी ही अनोखी और विशेष परंपरा निभाई जाती है, जो वहां मौजूद हर एक शख्स का ध्यान खींचती है।

    रथ यात्रा के दौरान गजपति महाराज या उनके राजवंश के उत्तराधिकारी झाड़ू लेकर रथ के मार्ग की सफाई करते हैं. ये झाड़ू बहुत ही खास होती है, जिसमें सोने का हत्था लगा होता है. इसी से रथ मार्ग की सफाई की जाती है. इसके बाद वैदिक मंत्रों और जयघोष के बीच रथ यात्रा का शुभारंभ होता है. आइए जानते हैं कि रथ यात्रा के मार्ग को साफ करने के लिए सोने की झाड़ू का प्रयोग क्यों किया जाता है।

    1. जगन्नाथ रथ यात्रा में सोने की झाड़ू से मार्ग की सफाई केवल एक औपचारिक रस्म नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक भावना का प्रतीक मानी जाती है. हिंदू परंपरा में सोने को शुद्धता, पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माना गया है. इसलिए भगवान के रथ के मार्ग को सोने के हत्थे वाली झाड़ू से साफ करना उनके स्वागत और सम्मान का विशेष तरीका माना जाता है।

    3. यह परंपरा यह संदेश भी देती है कि ईश्वर की दृष्टि में हर व्यक्ति समान है. क्या राजा और क्या प्रजा. गजपति महाराज स्वयं झाड़ू लगाकर यह दर्शाते हैं कि ईश्वर के सामने राजा और सामान्य व्यक्ति में कोई भेद नहीं होता है. यह विनम्रता, सेवा और समर्पण की सर्वोच्च प्रतीक है।

    3. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोना सौभाग्य, समृद्धि और शुभता का भी प्रतीक है. इसलिए इस पवित्र अनुष्ठान को सकारात्मक ऊर्जा और मंगलमय वातावरण का माध्यम माना जाता है. श्रद्धालु ऐसा मानते हैं कि इस परंपरा के दर्शन और सहभागिता से भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है. यह परंपरा कई पीढ़ियों से निरंतर निभाई जा रही है और आज भी रथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

  • मानसून सत्र में परिसीमन बिल पास कराने की तैयारी… इंडिया गठबंधन से नाता तोड़ने वाले दलों से समर्थन पर बातचीत जारी

    मानसून सत्र में परिसीमन बिल पास कराने की तैयारी… इंडिया गठबंधन से नाता तोड़ने वाले दलों से समर्थन पर बातचीत जारी


    नई दिल्ली।
    मानसून सत्र (Monsoon-Session) में परिसीमन (Delimitation) व महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment-Bill) को पारित कराने के लिए मोदी सरकार (Modi Government) ने अपनी रणनीतियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इसके लिए जरूरी दो तिहाई संख्या बल हासिल करने के लिए सरकार ने विपक्षी दलों की तीन श्रेणियां बनाई हैं। हाल ही में इंडिया गठबंधन से नाता तोड़ने वाली द्रमुक के अलावा एनसीपी (एसपी), जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस से विधेयक को प्रत्यक्ष समर्थन करने पर, जबकि दूसरे कई अन्य गैर कांग्रेसी दलों से परोक्ष समर्थन पर बातचीत का दौर जारी है।

    सूत्रों के अनुसार, विपक्षी दलों की तीन श्रेणियों में पहली श्रेणी ऐसे दलों की है, जो विधेयक का समर्थन नहीं करेंगे। दूसरी श्रेणी समर्थन की संभावना वाले दलों की है। तीसरी श्रेणी मतदान से दूरी बनाने की संभावना वाले दलों की है। सूत्रों की माने तो प्रत्यक्ष समर्थन के लिए द्रमुक, वाईएसआर कांग्रेस की कुछ मांगों पर विचार किया जा रहा है। इसी श्रेणी में शरद पवार की एनसीपी भी शामिल है। सदन में अगर पुरानी स्थिति रही तो सरकार को दो तिहाई बहुमत के लिए अतिरिक्त 54 तो वर्तमान स्थिति के हिसाब से 60 मतों का जुगाड़ करना होगा।


    संसद में कैसे सधेगा नंबर गेम?

    इस बीच तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट के 20 सांसदों का एनसीपीआई में विलय और शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होने के बाद सरकार को पुरानी स्थिति में 28 मतों और वर्तमान स्थिति में 36 अतिरिक्त मतों का जुगाड़ करना होगा। अगर द्रमुक के 22, एनसीपी (एसपी) के 8 और वाईएसआर कांग्रेस के 4 सांसदों ने विधेयक का समर्थन किया तो सरकार की परेशानी दूर हो जाएगी। मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर के वॉयस ऑफ पीपुल्स, यूपीपीएल और जेडपीएम (4 सांसद) को पहले ही साध लिया है।


    दूसरी स्थिति के लिए भी रणनीति

    द्रमुक, एनसीपी (एसपी) और वाईएसआर कांग्रेस में से एक या दो दल अगर समर्थन के लिए राजी नहीं हुए तो इन्हें मतदान से दूर रहने के लिए मनाया जाएगा। सूत्रों का कहना है कि तृणमूल के कम से कम दो सांसद इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकते हैं। इसके अलावा शिरोमणि अकाली दल, निर्दलीय सांसदों को भी समर्थन न देने की स्थिति में मतदान से दूर रहने के लिए मनाया जाएगा। फिर सरकार की विपक्षी दलों के उन सांसदों पर भी नजर है जो नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं।


    सत्र के दौरान बनेगी अंतिम रणनीति

    सरकार की योजना विपक्षी दलों से लगातार बातचीत जारी रखते हुए सत्र के दौरान अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने की है। सरकार के सूत्रों ने बताया कि विधेयक को अगले महीने के पहले सप्ताह में पेश करने की है। ऐसे में सत्र के दौरान विपक्षी दलों से मंथन का नया दौर शुरू होगा।

  • महाराष्ट्र में नए सियासी उलटफेर के संकेत, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस संग एनसीपी के दोनों धड़ों की गोपनीय बैठक से गरमाया राजनीतिक माहौल

    महाराष्ट्र में नए सियासी उलटफेर के संकेत, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस संग एनसीपी के दोनों धड़ों की गोपनीय बैठक से गरमाया राजनीतिक माहौल

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बहुत बड़े सियासी फेरबदल के संकेत मिल रहे हैं, जिसने राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के आधिकारिक आवास पर मंगलवार देर रात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के वरिष्ठ नेताओं की ताबड़तोड़ बैठकें हुईं। इन गोपनीय मुलाकातों के बाद से ही कयासों का बाजार बेहद गर्म है और विपक्षी खेमे में भारी बेचैनी देखी जा रही है। सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी कांग्रेस और महाविकास अघाड़ी गठबंधन को बड़ा झटका देकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पाले में जाने की तैयारी कर रही है।

    प्राप्त विवरण के अनुसार, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने पहले दक्षिण मुंबई स्थित शरद पवार के आवास ‘सिल्वर ओक’ पर जाकर उनसे बेहद लंबी मंत्रणा की। इसके तुरंत बाद वे देर शाम सीधे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात करने पहुंचे। इस दौरान राजनीतिक तापमान तब और बढ़ गया जब सत्ताधारी एनसीपी (अजित पवार गुट) के वरिष्ठ नेता सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल भी अलग से मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। हालांकि बैठक में शामिल किसी भी नेता या मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस चर्चा के मुख्य एजेंडे पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन दोनों ही गुटों के सूत्रों ने इस बात को स्वीकार किया है कि पर्दे के पीछे किसी बड़े राजनीतिक समझौते की पटकथा लिखी जा रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जुलाई 2023 में पार्टी के विभाजन के बाद यह पहली बार है जब शरद पवार की पार्टी सबसे बड़े रणनीतिक संकट का सामना कर रही है। अंदरूनी सूत्रों की मानें तो शरद पवार गुट के कुल 10 विधायकों में से कम से कम आधे से अधिक विधायक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन में शामिल होने के प्रबल पक्ष में हैं। लंबे समय तक विपक्षी खेमे में रहने के कारण इन विधायकों को अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए आवश्यक विकास निधि जुटाने और प्रशासनिक मंजूरियां हासिल करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था, जिससे उनके जमीनी राजनीतिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे थे।

    पार्टी के प्रांतीय नेतृत्व ने हाल ही में अपने विधायकों की इस गंभीर भावना और चिंताओं से शीर्ष आलाकमान को विस्तार से अवगत कराया था। यद्यपि शरद पवार ने इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक अपनी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है और न ही पार्टी के अगले कदम को लेकर कोई सार्वजनिक घोषणा की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह माना जा रहा है कि वे अपने विधायकों के भारी दबाव के कारण इस नए विकल्प पर बेहद गंभीरता से विचार कर रहे हैं। इस साल की शुरुआत में मुंबई महानगरपालिका चुनावों के बाद से ही दोनों धड़ों के एक होने या शरद गुट के कांग्रेस में विलय की खबरें आती रही हैं, लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेताओं के कड़े विरोध के कारण अब बाजी पूरी तरह एनडीए की ओर मुड़ती हुई दिखाई दे रही है।

    संख्या बल के रणनीतिक गणित को देखें तो विधानसभा में शरद पवार गुट के पास वर्तमान में 10 विधायक और लोकसभा में 8 सांसद मौजूद हैं। हालांकि यह महाराष्ट्र के प्रमुख राजनीतिक दलों में संख्या के हिसाब से छोटा समूह प्रतीत हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा नीत एनडीए के लिए इसकी उपयोगिता बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। केंद्र सरकार आगामी संसद सत्रों में सीमांकन विधेयक जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनों को पारित कराने की योजना बना रही है, जिसके लिए उसे उच्च सदन और निम्न सदन दोनों में अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है। ऐसे समय में एनडीए के शीर्ष रणनीतिकार शरद पवार गुट से मिलने वाले किसी भी संभावित वैधानिक समर्थन का खुले दिल से स्वागत करने के लिए तैयार दिख रहे हैं।

    यह राजनीतिक उथल-पुथल सिर्फ शरद पवार खेमे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अजित पवार गुट के भीतर भी भारी अंतर्विरोध और मंथन का दौर जारी है। इस साल जनवरी के अंत में एक दुखद विमान हादसे में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार के असामयिक निधन के बाद से राज्य की राजनीति का पूरा परिदृश्य बदल चुका है। उनके निधन के बाद से दोनों गुटों के दोबारा एक होने की सुगबुगाहट तो तेज हुई थी, लेकिन नेतृत्व को लेकर बात नहीं बन सकी। अब सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर ही कानूनी आपत्तियां उठाई जा रही हैं, जिसने संगठन के आंतरिक असंतोष को उजागर कर दिया है। इन सभी बदलते हालातों के बीच दिल्ली से लेकर मुंबई तक की राजनीतिक नजरें अब शरद पवार के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।

  • भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

    भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया।

    यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी।


    अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

    मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है।


    टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नाम

    ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी।

    सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया।


    ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकार

    विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

    सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है।


    लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?

    सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।”

    सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

    कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।


    भारत पर क्यों गहराया संकट?

    भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

    यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इससे पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई से कहा कि ट्रंप प्रशासन इस रूस प्रतिबंध विधेयक का समर्थन करता है। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले आयात पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ कारोबार जारी रखते हैं।

  • क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    क्या अंग्रेजी को माना जा सकता है भारतीय भाषा? सीबीएसई की त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का साफ इनकार

    नई दिल्ली । देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र 2026-27 से लागू की जा रही तीन-भाषा नीति पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नई भाषा को सीखना कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि क्या अंग्रेजी को एक भारतीय भाषा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इस नीति के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नए नियमों के तहत अंग्रेजी को गैर-मूल भाषा की श्रेणी में रखा गया है, जिससे छात्रों के सामने भाषाई चयन का संकट खड़ा हो गया है।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में दायर नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए आगामी 22 जुलाई की तारीख तय की है। केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष रखने के लिए दस दिनों का समय मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह नीति हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के संवैधानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है, हालांकि स्थानीय भाषाओं की परिभाषा और उनके वर्गीकरण पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सीबीएसई का यह सर्कुलर बिना उचित कानूनी अधिकार के जारी किया गया है, जो छात्रों पर जबरन भाषा थोपने जैसा है। नई नीति के अनुसार, कक्षा नौ के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य किया गया है, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषाएं होनी चाहिए। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ेगा जो कक्षा पांच से निरंतर एक निश्चित भाषाई पैटर्न का पालन कर रहे हैं। वकीलों ने चिंता जताई कि यदि कोई छात्र संस्कृत के स्थान पर पंजाबी या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा चुनना चाहता है, तो स्कूलों के पास न तो पर्याप्त योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही आवश्यक पाठ्यपुस्तकें।

    अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि भले ही बोर्ड ने छात्रों को संविधान की 22 आधिकारिक भाषाओं में से चयन करने का विकल्प दिया है, लेकिन देश के सभी स्कूलों के लिए इतने बड़े पैमाने पर भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति करना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके अतिरिक्त, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की वेबसाइट पर निर्धारित समय सीमा के बाद भी केवल तीन भाषाओं की ही पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकी हैं, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

    राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत तैयार की गई इस त्रिभाषा नीति का मुख्य उद्देश्य स्कूली स्तर पर बच्चों को बहुभाषी बनाना और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है। ऐतिहासिक रूप से इस फॉर्मूले को पहली बार वर्ष 1964-66 में शिक्षा आयोग द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया। नई व्यवस्था के तहत भाषाई चुनाव की प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया है कि यदि कोई छात्र पहली दो भाषाओं के रूप में हिंदी और तमिल पढ़ रहा है, तो उसे तीसरी भाषा के रूप में एक और भारतीय भाषा या फिर अंग्रेजी अथवा किसी अन्य विदेशी भाषा का चयन करना होगा।

    प्रशासनिक स्पष्टीकरण के अनुसार, यह नई त्रिभाषा व्यवस्था शैक्षणिक सत्र 2026-27 में केवल नौवीं कक्षा के छात्रों पर ही पूरी तरह लागू होगी। वर्तमान में दसवीं कक्षा में पढ़ रहे छात्र पुरानी द्विभाषी व्यवस्था के तहत ही अपनी बोर्ड परीक्षाएं देंगे। नए नियमों के मुताबिक, यदि कोई छात्र अंग्रेजी विषय का चयन करता है, तो वह अन्य किसी विदेशी भाषा जैसे कोरियन, जापानी, फ्रेंच या जर्मन का चुनाव नहीं कर सकेगा। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्कूल असेसमेंट के दौरान तीसरी भाषा में उत्तीर्ण हुए बिना छात्रों को दसवीं कक्षा का उत्तीर्ण प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाएगा।

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि

    इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता तय नियम नहीं, मामले के आधार पर होगी राशि


    नई दिल्ली। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा पति की आय का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी को देना कोई अनिवार्य कानूनी नियम नहीं है। अदालत ने कहा कि यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अदालतें इससे कम या अधिक गुजारा भत्ता तय कर सकती हैं।

    जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कानपुर देहात के एक दंपति से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी को मिलने वाला मासिक गुजारा भत्ता 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये करने का आदेश दिया।

    यह मामला पिंकी उर्फ प्रीति और उनके पति श्री जय प्रकाश से संबंधित है। पति ने पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया था। तलाक के आदेश के आधार पर पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए गुजारा भत्ते को चुनौती दी, जबकि पत्नी ने भत्ते की राशि अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की। हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की।

    सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल तलाक हो जाने से पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है और उसने दोबारा विवाह नहीं किया है या किसी अन्य व्यक्ति के साथ नहीं रह रही है, तो वह गुजारा भत्ते की हकदार रहेगी।

    अदालत ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य केवल जीवन-निर्वाह भर की राशि उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिला को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना है।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि रिवीजन कोर्ट सामान्य परिस्थितियों में निचली अदालत द्वारा तय की गई भत्ते की राशि में बदलाव नहीं करती, क्योंकि उसका दायित्व केवल आदेश की वैधानिकता की समीक्षा करना होता है। हालांकि, यदि निचली अदालत का निर्णय गलत तथ्यों पर आधारित हो या महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई हो, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

    मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पति का मासिक वेतन 86,674 रुपये है, जबकि विभिन्न कटौतियों के बाद उसके खाते में 67,043 रुपये प्राप्त होते हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी आवश्यक दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना गुजारा भत्ता निर्धारित कर दिया था। साथ ही, पति ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप अपनी संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा भी प्रस्तुत नहीं किया था।

    इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को दिए अपने फैसले में पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मासिक गुजारा भत्ता 20 हजार रुपये निर्धारित किया, जो आवेदन की तारीख से प्रभावी होगा।

  • यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में

    यूपी चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा, मुरादाबाद की छह सीटों पर तीसरा सर्वे पूरा, 20 दावेदारों के नाम चर्चा में


    मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने मुरादाबाद जिले की छह विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन के लिए तीसरे चरण का सर्वे पूरा कर लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, अब तक हुए तीनों सर्वे में करीब 20 संभावित दावेदारों के नाम प्रमुखता से सामने आए हैं। इनमें मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख, नगर पालिका चेयरमैन और संगठन से जुड़े कई पदाधिकारी शामिल हैं।

    तीन चरण पूरे, अभी दो सर्वे बाकी
    भाजपा विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार सक्रिय है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य भी हाल के महीनों में मुरादाबाद का दौरा कर चुके हैं। इसके साथ ही पार्टी विभिन्न अभियानों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी है।

    उम्मीदवार चयन के लिए भाजपा अलग-अलग एजेंसियों से सर्वे करा रही है। पहला सर्वे जनवरी में, दूसरा मार्च के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर करीब एक महीने तक चला, जबकि तीसरा सर्वे जून में कराया गया, जिसकी प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है।

    इन सीटों पर ये नाम सबसे अधिक चर्चा में

    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तीनों सर्वे में निम्न विधानसभा क्षेत्रों से इन संभावित दावेदारों के नाम सबसे अधिक चर्चा में रहे—
    मुरादाबाद नगर: विधायक रितेश गुप्ता, पूर्व महानगर अध्यक्ष मनोज गुप्ता, महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला।
    मुरादाबाद देहात: डॉ. के.के. मिश्रा, श्याम बिहारी मिश्रा, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष (अनुसूचित मोर्चा) रजनीकांत जाटव।
    कांठ: पूर्व विधायक राजेश कुमार सिंह ‘चुन्नू’, डिलारी ब्लॉक प्रमुख पूनम चौधरी, जिला पंचायत सदस्य विनोद सैनी और राजपाल सिंह।
    ठाकुरद्वारा: पूर्व जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह चौहान, अजय प्रताप सिंह और पूर्व सांसद सर्वेश सिंह की पत्नी साधना सिंह।
    बिलारी: परमेश्वर लाल सैनी, पूर्व जिलाध्यक्ष सुरेश सैनी, नगर पालिका चेयरमैन रघुराज सिंह यादव और ऋषिपाल चौधरी।
    कुंदरकी: विधायक रामवीर सिंह, जिला पंचायत अध्यक्ष डॉ. शैफाली सिंह और किसान मोर्चा के क्षेत्रीय महामंत्री दिनेश ठाकुर।

    सर्वे में पूछे गए ये प्रमुख सवाल

    भाजपा की सर्वे एजेंसियों ने मतदाताओं और स्थानीय लोगों से कई बिंदुओं पर फीडबैक लिया। प्रमुख सवालों में शामिल रहे—
    – विधानसभा क्षेत्र में भाजपा की वर्तमान स्थिति कैसी है?
    – मौजूदा विधायक या संभावित दावेदार की लोकप्रियता कितनी है?
    – केंद्र सरकार की योजनाओं को जनता किस नजरिए से देख रही है?
    – योगी सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की क्या राय है?
    – विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चुनने का आधार क्या होना चाहिए?
    – यदि पहला विकल्प न हो तो दूसरे संभावित उम्मीदवार का नाम कौन हो सकता है?

    सितंबर या दिसंबर में होगा अंतिम सर्वे
    भाजपा सूत्रों के अनुसार, उम्मीदवारों के चयन से पहले कुल पांच चरणों में सर्वे कराए जाने हैं। फिलहाल दो सर्वे बाकी हैं। यदि विधानसभा चुनाव समय से पहले नवंबर या दिसंबर में होते हैं, तो सितंबर में होने वाला चौथा सर्वे अंतिम माना जाएगा। वहीं, यदि चुनाव तय समय पर हुए तो दिसंबर में पांचवां और अंतिम सर्वे कराया जाएगा।

    क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम तीसरे सर्वे में आया
    पार्टी सूत्रों के मुताबिक, एक क्षेत्रीय पदाधिकारी का नाम पहले दो सर्वे में चर्चा में नहीं था, लेकिन तीसरे सर्वे में वह सामने आया। हालांकि, एजेंसी को यह नाम मुख्य रूप से पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में मिला, जबकि आम जनता के बीच उनकी पहचान सीमित पाई गई।

    भाजपा महानगर अध्यक्ष गिरीश भंडूला ने कहा कि सर्वे की प्रक्रिया लगातार चल रही है और यह अंतिम सर्वे नहीं है। वहीं, भाजपा जिलाध्यक्ष आकाश पाल का कहना है कि पार्टी एजेंसियों के माध्यम से जमीनी स्तर पर फीडबैक लेकर संगठन और संभावित उम्मीदवारों की स्थिति का आकलन करती है।

  • भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की अहम पहल, मध्य प्रदेश सरकार को अंतरिम व्यवस्था बनाने का निर्देश, सभी पक्षों के अधिकारों के संतुलन पर जोर

    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है, जिससे अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष को असुविधा न हो और धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण ढंग से संचालित हो सकें। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल अंतरिम प्रकृति की होगी और इससे किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकारों या दावों पर कोई अंतिम प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवेदनशील मामलों में शांति, सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करे, जिससे सभी संबंधित पक्षों की आवश्यकताओं का संतुलित समाधान हो सके। अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम व्यवस्था को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    भोजशाला परिसर को लेकर लंबे समय से दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। एक पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में मान्यता देने की मांग करता है। इसी विवाद से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर न्यायिक प्रक्रिया जारी है और मामला अभी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है।

    सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से यह दलील दी गई कि पूर्व की व्यवस्था में बदलाव के कारण धार्मिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ा है। वहीं दूसरे पक्ष ने अपने ऐतिहासिक और धार्मिक दावों को दोहराते हुए संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखा। दोनों पक्षों ने विस्तृत कानूनी तर्क प्रस्तुत किए, जिन पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया।

    कार्यवाही के दौरान सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी संयम बरतने की सलाह दी। अदालत ने कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील विषय है और बहस के दौरान प्रयुक्त भाषा तथा शब्दों का चयन अत्यधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।

    अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले की अंतिम सुनवाई विस्तृत रूप से की जाएगी। इसके लिए दोनों पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तिथि निर्धारित की जाएगी। आवश्यकता पड़ने पर पूरे दिन सुनवाई कर सभी पक्षों के तर्कों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

    इस बीच मध्य प्रदेश सरकार पर अंतरिम व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी रहेगी। अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक परिसर में शांति, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द बना रहे तथा किसी भी समुदाय के अधिकारों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े।

    भोजशाला विवाद देश के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में शामिल रहा है। सर्वोच्च अदालत के ताजा निर्देशों के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार द्वारा बनाई जाने वाली अंतरिम व्यवस्था और आगामी विस्तृत सुनवाई पर टिकी हैं। अंतिम फैसला आने तक न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार सभी पक्षों के दावों और अधिकारों पर विधिक परीक्षण जारी रहेगा।

  • फर्जी पहचान, शादी और करोड़ों के सपनों का जाल! खुद को IAS बताने वाली महिला पर ठगी और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज

    फर्जी पहचान, शादी और करोड़ों के सपनों का जाल! खुद को IAS बताने वाली महिला पर ठगी और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से कथित फर्जी पहचान के जरिए शादी करने का एक मामला सामने आया है। आरोप है कि एक महिला ने स्वयं को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी बताकर युवक से विवाह किया। बाद में जब उसके दावों की सत्यता पर सवाल उठे तो पति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने महिला को गिरफ्तार कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

    पुलिस के अनुसार, युवक और महिला की पहचान सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी। बातचीत के दौरान महिला ने स्वयं को IAS अधिकारी बताया और दावा किया कि एक न्यायिक मामले के कारण उसकी नियुक्ति लंबित है। युवक का आरोप है कि महिला और उसके परिजनों ने भी इसी बात की पुष्टि करते हुए भरोसा दिलाया कि मामला समाप्त होते ही वह प्रशासनिक सेवा में कार्यभार संभाल लेगी। इन दावों पर विश्वास करने के बाद दोनों ने विवाह कर लिया।

    शिकायत में कहा गया है कि विवाह के शुरुआती दिनों के बाद महिला का व्यवहार बदलने लगा। पति का आरोप है कि उसने परिवार के बहुमूल्य आभूषण और अन्य कीमती सामान अपने कब्जे में ले लिया। आरोप यह भी है कि बाद में परिवार पर बड़ी धनराशि की मांग का दबाव बनाया गया और आर्थिक लाभ के लिए जमीन बेचने का सुझाव दिया गया। जब परिवार ने इसका विरोध किया तो कथित रूप से झूठे मुकदमों में फंसाने और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई।

    पति ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि एक रात महिला ने कथित रूप से उसका गला दबाकर हत्या करने का प्रयास किया। उसने तत्काल पुलिस सहायता ली, जिसके बाद स्थानीय स्तर पर मामले को सुलझाने का प्रयास भी किया गया। हालांकि विवाद समाप्त नहीं हुआ और बाद में पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

    मामले में दर्ज प्राथमिकी में महिला के साथ उसके पिता, भाई और एक अन्य रिश्तेदार को भी नामजद किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सभी ने मिलकर महिला की पहचान और नौकरी को लेकर गलत जानकारी देकर विवाह कराया। पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि क्या इस तरह की शिकायतें पहले भी सामने आई थीं और क्या अन्य लोगों के साथ भी इसी प्रकार की घटनाएं हुई हैं।

    पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जांच और दर्ज मुकदमे के आधार पर महिला को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य और अन्य प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। साथ ही नामजद अन्य व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    यह मामला एक बार फिर ऑनलाइन पहचान और वैवाहिक संबंधों में तथ्यों के सत्यापन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से बनने वाले संबंधों में व्यक्तिगत और पेशेवर दावों की पुष्टि करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार के विवादों और धोखाधड़ी की संभावनाओं को कम किया जा सके। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है और पुलिस सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही है।

  • राम मंदिर में चढ़ावे पर मचे विवाद के बीच बड़ा कदम: सुरक्षा और रसीद का सबूत मांगने वाले दानदाताओं का समर्पण लौटाने की तैयारी में ट्रस्ट

    राम मंदिर में चढ़ावे पर मचे विवाद के बीच बड़ा कदम: सुरक्षा और रसीद का सबूत मांगने वाले दानदाताओं का समर्पण लौटाने की तैयारी में ट्रस्ट

    नई दिल्ली । राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित किए गए चढ़ावे की सुरक्षा और उसकी रसीदों को लेकर उपजे विवाद के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने एक बेहद कड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। मंदिर प्रबंधन उन सभी दानदाताओं का समर्पण और भेंट की गई बहुमूल्य वस्तुएं वापस लौटाने की योजना पर विचार कर रहा है, जिन्होंने हाल के दिनों में चढ़ावे की सुरक्षा पर सार्वजनिक रूप से सवाल खड़े किए थे और मीडिया के समक्ष गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि ट्रस्ट ने स्पष्ट किया है कि इस अति-संवेदनशील विषय पर अभी कोई अंतिम और औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन इस पर आंतरिक रूप से गंभीर विमर्श का दौर जारी है।

    इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में श्रद्धालुओं द्वारा लगाए गए वे आरोप हैं जिनमें कहा गया था कि उनके द्वारा समर्पित की गई बहुमूल्य सामग्रियों की न तो उचित रसीद प्रदान की गई और न ही उन्हें मंदिर परिसर में उचित स्थान पर प्रदर्शित या सुरक्षित रखा गया। इन दावों के सामने आने के बाद ट्रस्ट की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि मंदिर के गर्भगृह में स्थान अत्यंत सीमित और निश्चित है, जिसके कारण हर श्रद्धालु की भेंट को वहां स्थायी रूप से सजाकर रखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। मंदिर प्रशासन के अनुसार, केवल समय-समय पर आवश्यक और उपयोगी वस्तुओं को ही पूजा-अर्चना के विधान में शामिल किया जाता है और उसके बाद उन्हें पुनः सुरक्षित तिजोरियों में रखवा दिया जाता है।

    इसके साथ ही धातु के रूप में मिलने वाले दान और उसकी रसीद की प्रक्रिया को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। ट्रस्ट का मानना है कि श्रद्धालुओं द्वारा सौंपी जाने वाली मूल्यवान धातुओं की शुद्धता का वैज्ञानिक परीक्षण किए बिना तत्काल रसीद जारी करना संभव नहीं है। शुद्धता की जांच होने के बाद ही धातु का वास्तविक मूल्य और मात्रा निर्धारित होती है, जिसके आधार पर रसीद में उल्लेख किया जाता है। दानदाताओं द्वारा दी जाने वाली वस्तुओं को धातु के मूल रूप में ही रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है, इसलिए तत्क्षण रसीद की मांग करना तार्किक रूप से सही नहीं है।

    उल्लेखनीय है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई प्रतिष्ठित दानदाताओं ने अपना बहुमूल्य चढ़ावा गायब होने या उसका उचित हिसाब न मिलने की शिकायतें की थीं। इन सामग्रियों में पूर्व गृह सचिव एस लक्ष्मीनारायण द्वारा भेंट की गई स्वर्ण मंडित श्रीरामचरितमानस, सिंधी समाज की ओर से दी गई दो सौ किलोग्राम चांदी की ईंटें, सराफा व्यवसायियों द्वारा समर्पित लगभग साठ किलोग्राम चांदी, चांदी की बनी कागभुसंडि आकृति, अत्यंत कीमती हार और चांदी की चरण पादुकाएं शामिल थीं। इस विवाद पर विराम लगाने के उद्देश्य से मंदिर न्यास ने छह जुलाई को बकायदा साक्ष्यों के साथ पूरे चढ़ावे का हिसाब सार्वजनिक रूप से पेश किया था, जिसमें कई मूल्यवान वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित किया गया था और चांदी को पिघलाकर सुरक्षित रखने के प्रमाण भी मीडिया के सामने रखे गए थे।

    इस पूरे प्रकरण ने अब कानूनी रूप भी अख्तियार कर लिया है और राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़े विवाद तथा वित्तीय प्रबंधन को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में तीन अलग-अलग याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं। पहली याचिका में चढ़ावा चोरी के आरोपों की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो से जांच कराने के साथ-साथ मंदिर ट्रस्ट के समस्त वित्तीय लेन-देन का भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से ऑडिट कराने की मांग की गई है। दूसरी याचिका में विभिन्न जांच एजेंसियों के विशेषज्ञों को मिलाकर एक संयुक्त विशेष जांच दल के गठन की गुहार लगाई गई है ताकि न्यास के प्रशासनिक कामकाज में सामने आ रही कथित वित्तीय अनियमिताओं की तह तक जाया जा सके।

    तीसरी याचिका के माध्यम से पूरे ट्रस्ट के वित्तीय संचालन का एक व्यापक फोरेंसिक ऑडिट कराने की मांग उठाई गई है। इस याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और मंदिर ट्रस्ट को एक ऐसी मजबूत विनियामक और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश देने की मांग की गई है जो भविष्य में इस तरह के विवादों को रोक सके। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि देश और दुनिया के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उनके द्वारा दिए जाने वाले दान की शुचिता को बनाए रखने के लिए एक अत्यंत पारदर्शी ऑडिट सिस्टम का होना अनिवार्य है, ताकि मंदिर प्रशासन की जवाबदेही हर स्तर पर सुनिश्चित की जा सके।