Category: Religious Astrology

  • शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से राहत चाहिए? लोहे का छल्ला पहनते समय भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां

    शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से राहत चाहिए? लोहे का छल्ला पहनते समय भूलकर भी न करें ये 3 गलतियां


    नई दिल्ली ।ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को कर्मफलदाता और न्याय का देवता माना गया है। व्यक्ति के अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार शनि देव जीवन में सुख या कष्ट प्रदान करते हैं। जब किसी जातक की कुंडली में शनि की साढ़ेसातीढैय्या या अशुभ दृष्टि होती हैतो जीवन में संघर्षदेरीआर्थिक तंगी और मानसिक तनाव बढ़ने लगता है। ऐसे में शनि के प्रकोप को शांत करने के लिए कई ज्योतिषीय उपाय बताए गए हैंजिनमें लोहे का छल्ला धारण करना एक प्रमुख और प्रभावी उपाय माना जाता है।

    हालांकिलोहे का छल्ला कोई सामान्य आभूषण नहीं है। इसे शनि देव से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील उपाय माना गया है। यदि इसे गलत तरीकेगलत दिन या गलत उंगली में धारण किया जाएतो यह लाभ देने की बजाय नुकसान भी पहुंचा सकता है। इसलिए छल्ला पहनने से पहले इसके नियमों और सावधानियों को जानना बेहद जरूरी है।ज्योतिष और हस्तरेखा शास्त्र के अनुसारहाथ की मध्यमा उंगली का सीधा संबंध शनि ग्रह से होता है। यही कारण है कि लोहे का छल्ला मध्यमा उंगली में ही धारण करने की सलाह दी जाती है। पुरुषों के लिए दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली में छल्ला पहनना शुभ माना जाता हैजबकि कुछ विशेष परिस्थितियों में इसे बाएं हाथ में भी पहना जा सकता है। महिलाओं के लिए आमतौर पर बाएं हाथ की मध्यमा उंगली को उपयुक्त माना जाता है।

    लोहे का छल्ला पहनते समय पहली बड़ी गलती गलत दिन इसे धारण करना है। शनि से संबंधित कोई भी उपाय शनिवार के दिन ही करना श्रेष्ठ माना गया है। बिना शनिवार के या बिना शनि देव की पूजा-अर्चना के छल्ला पहनना अशुभ परिणाम दे सकता है। छल्ला धारण करने से पहले शनि मंत्र का जाप और सरसों के तेल से दीपक जलाना शुभ फल देता है।दूसरी बड़ी गलती गलत धातु या बाजारू लोहे का उपयोग करना है। ज्योतिष में शुद्ध लोहे या घोड़े की नाल से बने छल्ले को अधिक प्रभावी माना गया है। दिखावे या फैशन के लिए बनाए गए लोहे के छल्ले शनि दोष को शांत करने में सक्षम नहीं होते।

    तीसरी और सबसे गंभीर गलती है बिना सलाह के छल्ला पहन लेना। हर व्यक्ति की कुंडली में शनि की स्थिति अलग होती है। कुछ मामलों में शनि शुभ फल भी देता है। ऐसे में बिना ज्योतिषीय परामर्श के लोहे का छल्ला पहनना शनि के शुभ प्रभाव को भी कमजोर कर सकता है।इसलिए यदि आप शनि की साढ़ेसाती ढैय्या या शनि दोष से परेशान हैं और लोहे का छल्ला धारण करना चाहते हैंतो नियमविधि और सही समय का विशेष ध्यान रखें। सही श्रद्धा और विधि से किया गया उपाय ही शनिदेव की कृपा दिला सकता है और जीवन की बाधाओं को कम कर सकता है।

  • लक्ष्मी के साथ सरस्वती और गणेश की पूजा क्यों है जरूरी धन बुद्धि और ज्ञान का संतुलन ही बनाता है जीवन सफल

    लक्ष्मी के साथ सरस्वती और गणेश की पूजा क्यों है जरूरी धन बुद्धि और ज्ञान का संतुलन ही बनाता है जीवन सफल


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा केवल आस्था का विषय नहींबल्कि जीवन में संतुलन और सही दिशा पाने का माध्यम मानी जाती है। विशेष रूप से मां लक्ष्मीमां सरस्वती और भगवान गणेश की संयुक्त पूजा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि केवल धन की देवी मां लक्ष्मी की उपासना की जाए और ज्ञान व बुद्धि की अधिष्ठात्री शक्तियों को असंतुलित हो सकता है।
    मां लक्ष्मी को धनवैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य की कामना करता हैजिसके लिए धन आवश्यक है। लेकिन धर्मशास्त्रों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि धन अपने आप में न तो शुभ है और न ही अशुभबल्कि उसका उपयोग ही उसे शुभ या अशुभ बनाता है। धन का सही उपयोग तभी संभव है जब व्यक्ति के पास ज्ञान और विवेक हो। यहीं पर मां सरस्वती और भगवान गणेश का महत्व सामने आता है। मां सरस्वती ज्ञानविद्या और विवेक की देवी हैं। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति सही-गलत में भेद करना सीखता है और अपने निर्णयों को समझदारी से ले पाता है। वहीं भगवान गणेश को बुद्धिविवेक और विघ्नहर्ता माना जाता है। वे व्यक्ति को सोचने-समझने की शक्ति देते हैंजिससे वह जीवन में आने वाली बाधाओं को पार कर सके।
    मान्यता है कि यदि किसी घर में केवल मां लक्ष्मी की पूजा की जाए और ज्ञान व बुद्धि की उपेक्षा की जाएतो धन आने के बावजूद उसका सदुपयोग नहीं हो पाता। ऐसा धन व्यक्ति को अहंकारलालच और मोह की ओर ले जा सकता है। परिणामस्वरूप न केवल बुद्धि भ्रष्ट होती हैबल्कि व्यक्ति की नीयत और व्यवहार में भी नकारात्मक बदलाव आने लगते हैं। धन की ऊर्जा अत्यंत शक्तिशाली मानी जाती हैऔर यदि इसे संतुलित ढंग से न संभाला जाए तो यह जीवन में अशांति और पतन का कारण भी बन सकती है।
    इसी कारण धार्मिक परंपराओं में मां लक्ष्मी के साथ मां सरस्वती और भगवान गणेश की पूजा का विधान बताया गया है। इन तीनों की संयुक्त आराधना से व्यक्ति को धन के साथ-साथ ज्ञान और बुद्धि का भी आशीर्वाद मिलता है। इससे न केवल आर्थिक समृद्धि आती हैबल्कि जीवन में संतुलनविवेक और सद्बुद्धि भी बनी रहती है। कलियुग में धन की आवश्यकता से कोई इनकार नहीं कर सकतालेकिन केवल धन के पीछे भागना जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। जब धनज्ञान और बुद्धि का संतुलन बनता हैतभी व्यक्ति सच्चे अर्थों में सुखी और सफल बन पाता है। यही कारण है कि धार्मिक दृष्टि से मां लक्ष्मीमां सरस्वती और भगवान गणेश की एक साथ पूजा को जीवन को सही दिशा देने वाला मार्ग माना गया है।

  • बसंत पंचमी पर इन 5 स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक

    बसंत पंचमी पर इन 5 स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक


    नई दिल्ली ।माँ सरस्वती के सम्मुख पूजा स्थानसबसे पहला दीपक अपने घर के मंदिर में माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के सामने जलाएं। यह दीपक घी का होना चाहिए। दीपक जलाते समय अपनी करियर संबंधी बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक स्पष्टता आती है।

    अध्ययन कक्ष या स्टडी टेबल विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। अपनी स्टडी टेबल या जिस स्थान पर आप बैठकर काम करते हैं, वहाँ एक छोटा दीपक जलाएं। वास्तु के अनुसार, इससे उस स्थान की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और पढ़ाई या काम में एकाग्रताबढ़ती है। घर की उत्तर-पूर्व दिशा ईशान कोणवास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा को देवताओं का स्थान माना गया है। बसंत पंचमी की शाम को इस कोने में एक शुद्ध घी का दीपक जलाने से करियर में नए अवसर प्राप्त होते हैं और अटके हुए काम बनने लगते हैं।

    तुलसी के पौधे के पास तुलसी को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है और माँ सरस्वती के पूजन वाले दिन तुलसी के पास दीपक जलाने से सुख-समृद्धि और ज्ञान का संगम होता है। शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाने से पारिवारिक शांति बनी रहती है और करियर में आने वाले उतार-चढ़ाव कम होते हैं मुख्य द्वार के दोनों ओर घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना ‘देहरी पूजन’ का हिस्सा है। मान्यता है कि बसंत पंचमी की शाम मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी का घर में आगमन होता है। यह आपके जीवन से अंधकार और असफलता को दूर कर सफलता के मार्ग प्रशस्त करता है।

    सफलता के लिए विशेष टिप
    दीपक जलाते समय उसमें थोड़ी सी हल्दी या केसर डालना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि पीला रंग माँ सरस्वती को अत्यंत प्रिय है और यह गुरु ग्रह बृहस्पति को मजबूत करता है, जो करियर और पद-प्रतिष्ठा का कारक है।

  • Basant Panchami 2026: जानिए क्यों पहनते हैं पीला रंग और मां सरस्वती को समर्पित है यह त्योहार

    Basant Panchami 2026: जानिए क्यों पहनते हैं पीला रंग और मां सरस्वती को समर्पित है यह त्योहार


    नई दिल्ली। भारत को त्योहारों का देश कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हर मौसम और महीने में कोई न कोई पर्व आता है। बसंत पंचमी जिसे श्री पंचमी या ज्ञान पंचमी भी कहते हैं बसंत ऋतु के स्वागत का पर्व है। यह दिन विद्या बुद्धि कला और वाणी की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है। इस साल यह त्योहार 23 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा।बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के कपड़े पहनने की परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

    धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
    मां सरस्वती का प्रिय रंग पीला माना जाता है। यह रंग ज्ञान विवेक और सात्त्विकता का प्रतीक है। इसलिए इस दिन पीले वस्त्र धारण कर देवी को प्रसन्न किया जाता है। इसके अलावा पीला रंग समृद्धि और शुभता का संकेत भी माना जाता है। यह हल्दी सोना और सरसों के फूलों से जुड़ा है जो भारतीय संस्कृति में शुभ और पवित्र माने जाते हैं। मान्यता है कि पीले वस्त्र पहनने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का वास होता है।बसंत पंचमी बसंत ऋतु का स्वागत भी है। इस ऋतु में प्रकृति पीले फूलों जैसे सरसों और अमलतास से सजी होती है। पीले कपड़े पहनकर मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करता है और इस ऋतु की रौनक में शामिल होता है।

    सांस्कृतिक महत्व
    भारत में रंगों का गहरा सांस्कृतिक महत्व है। बसंत पंचमी पर पीले पकवान जैसे केसरिया खीर बूंदी और हलवा बनाए जाते हैं। पीला रंग उत्साह नवीनता और रचनात्मकता का प्रतीक माना जाता है। यह रंग शिक्षा और कला से सीधे जुड़ा होने के कारण विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

    वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक महत्व
    रंग विज्ञान या कलर साइकोलॉजी के अनुसार पीला रंग मस्तिष्क को सक्रिय करता है। यह एकाग्रता स्मरण शक्ति और सीखने की क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। इसलिए छात्र और ज्ञानार्थी इस दिन पीले कपड़े पहनकर पढ़ाई और पूजा दोनों में लाभ महसूस कर सकते हैं।पीला रंग सूर्य से जुड़ा है और इसे देखने मात्र से खुशी आशावाद और उत्साह का संचार होता है। यह तनाव को कम करता है और मानसिक ऊर्जा को बढ़ाता है। साथ ही बसंत ऋतु में मौसम बदलने के कारण अक्सर आलस्य या सुस्ती महसूस होती है पीला रंग शरीर और मन को ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करता है।इस प्रकार बसंत पंचमी न केवल मां सरस्वती की पूजा का पर्व है बल्कि यह प्राकृतिक सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी हमारे जीवन में ऊर्जा सकारात्मकता और सौभाग्य लाने का अवसर है।

  • बसंत पंचमी 2026: 23 जनवरी को ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का होगा पूजन; जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पीले रंग का महत्व

    बसंत पंचमी 2026: 23 जनवरी को ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का होगा पूजन; जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पीले रंग का महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और पावन पर्वों में से एक ‘बसंत पंचमी’ इस वर्ष 23 जनवरी 2026 को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। ज्योतिषियों के अनुसार, इसी दिन से ऋतुराज वसंत का आगमन होता है, जो प्रकृति में नवजीवन और उल्लास का संचार करता है।

    पूजा का शुभ मुहूर्त और तिथि श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन, अजमेर की निदेशिका एवं ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 23 जनवरी 2026 को अर्धरात्रि 02:28 बजे से प्रारंभ होगी और इसका समापन 24 जनवरी को अर्धरात्रि 01:46 बजे होगा। उदया तिथि की गणना के अनुसार, बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को ही मनाया जाएगा। माँ सरस्वती की पूजा के लिए प्रातः 06:43 बजे से दोपहर 12:15 बजे तक का समय सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है।

    धार्मिक मान्यता: जब सृष्टि को मिली वाणी पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की, तो उन्हें चारों ओर मौन और नीरसता महसूस हुई। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे श्वेत वस्त्रधारिणी माँ सरस्वती प्रकट हुईं। माँ ने अपनी वीणा का मधुर स्वर छेड़ा, जिससे समस्त संसार को वाणी, ध्वनि और चेतना प्राप्त हुई। इसी कारण बसंत पंचमी को ज्ञान और संगीत के उदय का पर्व माना जाता है।

    शुभ कार्यों के लिए ‘अबूझ मुहूर्त ज्योतिषाचार्या नीतिका शर्मा के अनुसार, यह दिन विद्या आरंभ, विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्यंत शुभ (अबूझ मुहूर्त) माना जाता है। इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का लग्न भी लिखा गया था। छोटे बच्चों के ‘अक्षरारंभ’ और ‘अन्नप्राशन’ संस्कार के लिए भी यह तिथि सर्वश्रेष्ठ है। पीले रंग का विशेष महत्व बसंत पंचमी पर चारों ओर पीला रंग छाया रहता है। पीला रंग सकारात्मक ऊर्जा, उल्लास और नवजीवन का प्रतीक है। इस दिन श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण करते हैं और माँ सरस्वती को पीले पुष्प (विशेषकर गेंदा और सरसों के फूल), पीला चंदन, हल्दी और केसरिया मीठे चावल अर्पित करते हैं।

    पूजा विधि और मंत्र

    स्थापना: माँ सरस्वती की प्रतिमा को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। र्पण: रोली, हल्दी, केसर और श्वेत या पीले पुष्प चढ़ाएं। पूजा स्थल पर अपनी पुस्तकें और वाद्य यंत्र अवश्य रखें। वंदना: ‘कुंदेंदुतुषारहारधवला. वंदना का पाठ करें। मंत्र जाप: ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ मंत्र का जाप करने से बुद्धि और एकाग्रता में वृद्धि होती है। सकारात्मक ऊर्जा के उपाय घर में रचनात्मक माहौल के लिए वीणा रखना शुभ होता है। ज्योतिषाचार्या बताती हैं कि मंदिर में मोर पंख रखने से नकारात्मकता समाप्त होती है और हंस की तस्वीर मानसिक शांति और एकाग्रता को बढ़ाती है। बसंत पंचमी से शुरू होने वाला यह वसंतोत्सव होलिका दहन तक जारी रहता है।

  • 19 January 2026 Panchang: गुप्त नवरात्रि की शुरुआत, सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग

    19 January 2026 Panchang: गुप्त नवरात्रि की शुरुआत, सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग


    नई दिल्ली। अगर आप अपने दिन की शुरुआत शुभ और सकारात्मक ऊर्जा के साथ करना चाहते हैं तो 19 जनवरी 2026 का पंचांग आपके लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकता है। यह दिन धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से खास माना जा रहा है। सोमवार के दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि है और इसी दिन से गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो 27 जनवरी तक चलेगी।

    गुप्त नवरात्रि विशेष रूप से साधना, तंत्र-मंत्र और देवी उपासना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन मां दुर्गा की गुप्त रूप से आराधना की जाती है। साथ ही आज सोमवार व्रत रखा जाएगा जो भगवान शिव को समर्पित होता है। शिव भक्तों के लिए यह दिन विशेष फलदायी माना गया है।

    शुभ योग और ग्रह स्थिति
    19 जनवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। यह योग नए कार्यों की शुरुआत, पूजा-पाठ, व्रत, जप-तप और निवेश के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
    इस दिन चंद्रमा मकर राशि में संचार करेगा और सूर्य भी मकर राशि में स्थित रहेगा, जिससे कार्यों में स्थिरता और अनुशासन का प्रभाव देखने को मिलेगा।

    शुभ काल Auspicious Timings
    ब्रह्म मुहूर्त: 05:10 AM – 05:58 AM

    अमृत काल: 02:09 AM – 03:50 AM

    अभिजीत मुहूर्त: 11:52 AM – 12:35 PM

    इन समयों में पूजा, ध्यान, मंत्र जाप और महत्वपूर्ण निर्णय लेना शुभ माना जाता है।

    अशुभ काल Inauspicious Timings
    राहु काल: 08:09 AM – 09:30 AM

    यम गण्ड: 10:52 AM – 12:14 PM

    कुलिक काल: 01:35 PM – 02:57 PM

    दुर्मुहूर्त:

    12:35 PM – 01:19 PM

    02:46 PM – 03:29 PM

    वर्ज्यम्: 04:04 PM – 05:45 PM

    इन समयों में शुभ कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है।

    सूर्य और चंद्रमा का समय
    सूर्योदय: 06:47 AM

    सूर्यास्त: 05:40 PM

    चन्द्रोदय: 07:06 AM

    चन्द्रास्त: 06:16 PM

    क्या करें इस दिन
    मां दुर्गा और भगवान शिव की पूजा करें

    गुप्त नवरात्रि के संकल्प लें

    मंत्र जाप, ध्यान और साधना के लिए दिन उत्तम

    नए कार्यों की योजना बनाना शुभ  इस प्रकार 19 जनवरी 2026 का दिन धार्मिक, आध्यात्मिक और ज्योतिषीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मुहूर्त और पंचांग के अनुसार कार्य करने से दिन सफल और फलदायी बन सकता है।

  • फाल्गुन 2026: फाल्गुन मास कब से कब तक, जानें शुभ-अशुभ नियम और पूजा का महत्व

    फाल्गुन 2026: फाल्गुन मास कब से कब तक, जानें शुभ-अशुभ नियम और पूजा का महत्व


    नई दिल्ली । सनातन परंपरा में फाल्गुन मास को अत्यंत पावन माना गया है। यह महीना भगवान श्रीकृष्ण को विशेष प्रिय है और ब्रज क्षेत्र में इस दौरान होली का उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। फाल्गुन मास के साथ ही महाशिवरात्रि का पर्व भी आता है, जब श्रद्धालु विधि-विधान से भगवान शिव की उपासना करते हैं। यही नहीं, इस माह को चंद्र देव से भी जोड़कर देखा गया है, इसलिए उनकी आराधना से मानसिक शांति और सुख की प्राप्ति होती है। वैदिक पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास 02 फरवरी 2026 से प्रारंभ होकर 03 मार्च 2026 तक रहेगा। इसके अगले दिन 04 मार्च से चैत्र मास का आरंभ होगा। इस महीने में किए जाने वाले धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान विशेष फलदायी माने जाते हैं।

    फाल्गुन मास में भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव की पूजा-अर्चना अत्यंत शुभ मानी जाती है। प्रतिदिन शिवलिंग का जल, दूध और बेलपत्र से अभिषेक करने से कष्टों में कमी आती है और जीवन में सुख-शांति बढ़ती है। साथ ही अन्न, धन और वस्त्रों का दान करने से आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ती है। पितरों की कृपा पाने के लिए तर्पण और दान करना भी लाभकारी माना गया है, जिससे परिवार में सुख-शांति और सौहार्द्र का वातावरण बनता है। हालांकि, फाल्गुन मास में कुछ वर्जित कर्म भी बताए गए हैं। होलाष्टक के दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य टालने चाहिए। इसके अलावा मांस-मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन न करना, बुजुर्गों और महिलाओं का अपमान न करना और कटु भाषा से दूर रहना अनिवार्य है। धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें और पौधों में जल अर्पित करने से बचें।

    इस माह की विशेषता यह है कि यह न केवल भगवान श्रीकृष्ण और शिव की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, बल्कि पितृ तर्पण, दान और सामाजिक सदाचार के लिए भी महत्वपूर्ण है। फाल्गुन मास का पालन नियमपूर्वक करने से जीवन में शांति, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होती है। कुल मिलाकर फाल्गुन 2026 का यह पावन माह धार्मिक क्रियाओं, पूजा-अर्चना और सामाजिक दायित्वों का समन्वय है। इस मास में किए गए शुभ कार्यों से व्यक्ति और परिवार दोनों का कल्याण होता है, जबकि वर्जित कर्मों से बचकर जीवन में नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति मिलती है।

  • गुप्त नवरात्र 2026: घटस्थापना पर विशेष मंत्र जप से दूर होंगे दुख, घर में आएगी सुख-समृद्धि

    गुप्त नवरात्र 2026: घटस्थापना पर विशेष मंत्र जप से दूर होंगे दुख, घर में आएगी सुख-समृद्धि


    नई दिल्ली । गुप्त नवरात्र 2026 का पावन पर्व इस वर्ष 19 जनवरी से आरंभ होकर 27 जनवरी तक श्रद्धा और साधना के साथ मनाया जाएगा। माघ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक चलने वाले गुप्त नवरात्र को शक्ति उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण काल माना गया है। इस दौरान दस महाविद्याओं और मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की गुप्त साधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कालखंड में की गई उपासना साधक को शीघ्र फल प्रदान करती है और जीवन से नकारात्मक शक्तियों का नाश करती है। गुप्त नवरात्र की शुरुआत घटस्थापना से होती है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि घटस्थापना के समय यदि विशेष मंत्रों का जप किया जाए तो घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। घटस्थापना के दौरान मां दुर्गा का आवाहन कर उनके बीज मंत्रों का जप करने से मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस समय श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई साधना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

    गुप्त नवरात्र को अन्य नवरात्रों से अलग इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें साधना को गोपनीय रखा जाता है। विशेष रूप से तांत्रिक साधक, सिद्धि प्राप्त करने वाले उपासक और शक्ति आराधक इस समय मंत्र, तंत्र और यंत्र साधना करते हैं। माना जाता है कि इन नौ दिनों में दस महाविद्याएंकाली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला अपने साधकों पर विशेष कृपा करती हैं। धार्मिक विश्वास है कि गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना करने से न केवल मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि जीवन में आ रही बाधाएं भी दूर होती हैं। जो भक्त श्रद्धा से व्रत रखते हैं और नियमपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें आत्मिक शांति के साथ-साथ भौतिक सुखों की भी प्राप्ति होती है। विशेषकर जिन लोगों के जीवन में लंबे समय से कष्ट, रोग या आर्थिक समस्याएं बनी हुई हैं, उनके लिए यह साधना काल अत्यंत फलदायी माना गया है।

    माघ माह में सूर्य उत्तरायण रहता है, जिसे शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ समय माना गया है। इसी कारण माघी गुप्त नवरात्र का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दौरान देवी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, हवन और मंत्र जप किए जाते हैं। कई श्रद्धालु इन नौ दिनों तक संयम, सात्विक आहार और नियमित पूजा के माध्यम से मां शक्ति की आराधना करते हैं। कुल मिलाकर गुप्त नवरात्र 2026 साधना, तप और श्रद्धा का ऐसा पावन अवसर है, जिसमें घटस्थापना से लेकर नवमी तक मां दुर्गा और दस महाविद्याओं की उपासना कर भक्त अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर सकते हैं।

  • सर्वार्थसिद्धि योग में माघी गुप्त नवरात्र आरंभ, नौ दिनों में बनेंगे छह शुभ योग

    सर्वार्थसिद्धि योग में माघी गुप्त नवरात्र आरंभ, नौ दिनों में बनेंगे छह शुभ योग


    उज्जैन । साधना, तंत्र और मंत्र आराधना के लिए विशेष माने जाने वाले माघी गुप्त नवरात्र का शुभारंभ इस वर्ष सर्वार्थसिद्धि योग में हुआ है। सोमवार से प्रारंभ हुए इन गुप्त नवरात्रों में पूरे नौ दिनों तक देवी उपासना का विशेष संयोग बन रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से इस बार ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति अत्यंत शुभ मानी जा रही है, जिसके कारण साधकों को मनवांछित फल मिलने की प्रबल संभावना है।

    माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तक चलने वाले इन गुप्त नवरात्रों का उल्लेख श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में भी मिलता है। शास्त्रों के अनुसार वर्षभर में चार नवरात्र होते हैं, जिनमें चैत्र और अश्विन मास के नवरात्र प्राकट्य नवरात्र कहलाते हैं, जबकि माघ और आषाढ़ मास के नवरात्र गुप्त नवरात्र माने गए हैं। गुप्त नवरात्र विशेष रूप से तांत्रिक साधना, मंत्र-सिद्धि और यंत्र आराधना के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जिन्हें साधक सामान्य जन से गुप्त रूप से करते हैं।

    इस बार पंचांग की गणना के अनुसार 19 जनवरी, सोमवार को प्रतिपदा तिथि पर उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, वज्र योग और मकर राशि में चंद्रमा की साक्षी में माघी गुप्त नवरात्र का शुभारंभ हुआ। नवरात्र के दौरान कुल छह शुभ योगों का संयोग बन रहा है, जो साधना को और अधिक प्रभावशाली बना रहा है। साथ ही सूर्य का उत्तरायण काल भी इसी समय चल रहा है, जिसे शास्त्रों में शुभ और मांगलिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

    शहर के प्रमुख देवी मंदिरों में नवरात्र को लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं। शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर सहित उज्जैन के अन्य देवी मंदिरों में प्रतिदिन माता का नित्य नए स्वरूप में श्रृंगार किया जाएगा। हरसिद्धि मंदिर में संध्या आरती के समय दीपमालिका प्रज्वलन का विशेष आयोजन होगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। मंदिर परिसर में पूरे नौ दिनों तक भक्तिमय वातावरण बना रहेगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्र के दौरान की गई साधना अत्यंत शीघ्र फल देने वाली होती है। साधक इस अवधि में शक्ति उपासना के साथ-साथ अपने आत्मिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी विशेष अनुष्ठान करते हैं। माना जाता है कि इन दिनों मां दुर्गा अपने साधकों की गुप्त तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें सिद्धि, सफलता और बाधाओं से मुक्ति का वरदान देती हैं। इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि योग और अनेक शुभ ग्रह संयोगों के बीच प्रारंभ हुए माघी गुप्त नवरात्र श्रद्धालुओं और साधकों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ अवसर लेकर आए हैं।

  • कुंभ राशिफल: खत्म होने वाला है संघर्ष का दौर; शनि के राशि परिवर्तन से मिलेगी साढ़ेसाती से मुक्ति, चमक उठेगा भाग्य

    कुंभ राशिफल: खत्म होने वाला है संघर्ष का दौर; शनि के राशि परिवर्तन से मिलेगी साढ़ेसाती से मुक्ति, चमक उठेगा भाग्य


    नई दिल्ली । उज्जैन/वाराणसी: ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को कर्मफल दाता और ‘न्याय का देवता’ माना जाता है। वे व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करते हैं। कुंभ राशि के जातकों के लिए पिछले कुछ वर्ष काफी चुनौतीपूर्ण रहे हैं, लेकिन अब उनके अच्छे दिन आने के संकेत मिल रहे हैं। शनि देव, जो कुंभ राशि के स्वामी भी हैं, जल्द ही अपना गोचर पूरा कर कुंभ राशि वालों को साढ़ेसाती के कष्टों से पूरी तरह मुक्त करने वाले हैं।

    कुंभ राशि और शनि का गहरा संबंध

    कुंभ राशि के अधिपति स्वयं शनि देव हैं और इस राशि के आराध्य देव भगवान शिव (महादेव) माने जाते हैं। इस राशि के जातकों का शुभ रंग आसमानी और भाग्यशाली अंक 10 व 11 होता है। वर्तमान में शनि देव मीन राशि में गोचर कर रहे हैं। चूंकि शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं, इसलिए उनके संचरण का प्रभाव बहुत गहरा और लंबे समय तक रहने वाला होता है।

    साढ़ेसाती का अंतिम चरण: अब मिलेगी राहत

    कुंभ राशि के जातक फिलहाल शनि की साढ़ेसाती के अंतिम चरण तीसरे चरण से गुजर रहे हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, साढ़ेसाती का अंतिम चरण जाते-जाते व्यक्ति को उसके संघर्षों का फल देकर जाता है। वर्तमान स्थिति: कुंभ राशि वालों को पिछले कुछ समय से करियर में अनिश्चितता, पारिवारिक कलह और स्वास्थ्य संबंधी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ रहा था। बदलाव का संकेत: शनि के अगले राशि परिवर्तन के साथ ही कुंभ राशि साढ़ेसाती के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो जाएगी। इसके बाद जातकों के जीवन में मानसिक शांति, वित्तीय स्थिरता और रुके हुए कार्यों में गति आएगी।

    भाग्य परिवर्तन और नए अवसर

    शनि के साढ़ेसाती से मुक्त होते ही कुंभ राशि के जातकों के लिए ‘स्वर्ण युग’ की शुरुआत हो सकती है। करियर में उन्नति: नौकरीपेशा लोगों को प्रमोशन और व्यापारियों को नए निवेश से भारी लाभ मिलने की संभावना है। आर्थिक लाभ: लंबे समय से अटका हुआ धन वापस मिल सकता है और पैतृक संपत्ति से जुड़े विवाद सुलझ सकते हैं। स्वास्थ्य में सुधार: साढ़ेसाती के कारण चल रही पुरानी बीमारियों और मानसिक तनाव से राहत मिलेगी।

    महादेव और शनि की कृपा पाने के उपाय

    कुंभ राशि के जातकों को साढ़ेसाती के इस अंतिम दौर को सुखद बनाने के लिए कुछ विशेष उपाय करने चाहिए शिव उपासना: चूंकि कुंभ के आराध्य महादेव हैं, इसलिए प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाना और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करना अत्यंत लाभकारी है। शनिवार का दान: शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और काले तिल व काली उड़द का दान करें। अनुशासन और सेवा: शनि देव अनुशासन प्रिय हैं, इसलिए असहाय लोगों की मदद करें और अपने आचरण को शुद्ध रखें। कुंभ राशि वालों के लिए यह समय धैर्य रखने का है। जैसे ही शनि का गोचर पूर्ण होगा, आपके जीवन की बाधाएं स्वतः दूर होने लगेंगी और भाग्य का भरपूर साथ मिलेगा।