Category: Religious Astrology

  • भगवान भोले शंकर की भक्ति में डूबा मुरैना, शिवालयों पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

    भगवान भोले शंकर की भक्ति में डूबा मुरैना, शिवालयों पर उमड़ा श्रद्धालुओं का जनसैलाब

    मुरैना। महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिये भगवान शिव की आराधना हेतु जिले के एतिहासिक, पुरातात्विक एवं बड़े धार्मिक शिवालयों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाव आज सुबह से ही उमड़ रहा है। जिले के ईश्वरा महादेव, अलोपी शंकर, महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, कोल्हुआ मंदिर, जयेश्वर महादेव मंदिर सहित सभी मंदिरों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना आरंभ हो गया। मुरैना के मुक्तिधाम में स्थित महाकाल मंदिर पर भक्तगण विभिन्न प्रकार से अभिषेक कर रहे है।  भगवान शिव का अभिषेक करने के साथ ही श्रद्धालु पूजा अर्चना कर रहे हैं। युवा श्रद्धालु जहां बेहतर जीवन साथी की मनोकामना को पूर्ण करने के लिये पूजा अर्चना करते दिखाई दे रहे हैं वहीं आम श्रद्धालु सुखी जीवन तथा अपने संतान के शांती सुरक्षा के जीवन की कामना कर रहे हैं। शहर के महाकाल मंदिर, बनखण्डेश्वर मंदिर, रामजानकी मंदिर, मारकण्डेश्वर मंदिर, बिहारी जी मंदिर, गुफा मंदिर, पशुपतिनाथ मंदिर, ककनमठ, बटेश्वरा, कुतवार, घिरोना मंदिर सहित सभी शिव मंदिरों पर दोपहर बाद तक श्रद्धालुओं का सैलाव देखा जा रहा है। मंदिरों पर व्यवस्थापकों ने पूजा अर्चना के साथ-साथ श्रद्धालुओं को भगवान शिव का सहज दर्शन व पूजा हो सके इसकी पूर्ण व्यवस्थायें कीं गईं हैं। भगवान शिव की पूजा में लीन महिला व पुरुष श्रद्धालुओं का कहना है कि आज के दिन भगवान शिव की पूजा अर्चना कर अपने जीवन मेंं सुख, शांती, समृद्धि की कामना किये जाने पर पूर्ण हो जाती है।


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    पहाडग़ढ़ के जंगल में ईश्वरा महादेव के साथ-साथ आमझिर व बरई कोट पर पहुंचे श्रद्धालु
    पहाडग़ढ़ के घनघोर जंगल में स्थित ईश्वरा महादेव सहित आमझिर व बरई कोट पर श्रद्धालुओं का सैलाव आज सुबह के प्रथम प्रहर से ही आरंभ हो गया। शिवलिंग पर निरंतर चल रही जलधारा से निर्मित कुण्ड में श्रद्धालुओं द्वारा स्नान कर भगवान शिव का अभिषेक व पूजा अर्चना की जा रही है। ईश्वरा महादेव के विषय में किवदंती है कि रावण के भाई विभीषण ने की थी यहां पर तपस्या उनके ही द्वारा स्थापित किया गया था। यह स्थान जिले के आदिवासी विकासखण्ड पहाडग़ढ़ मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर घनघोर जंगल में पहाड़ी के नीचे स्थापित है। इस शिवलिंग का महात्म इस वजह से भी प्रमुख माना जाता है कि जंगल में तीन पत्ती से लेकर 21 पत्ती तक के बेलपत्र पाये जाते हैं। यहां रोरी का भी पेड़ पाया जाता है। ईश्वरा महादेव से कुछ ही दूरी पर आमझिर नामक स्थान पर महादेव पार्वती के पास से जल प्रवाह होकर जल अभिषेक होता रहता है। इसी तरह बरई कोट शिवलिंग पर भी निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। घनघोंर जंगल में होने के बावजूद भी इन स्थानों पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिये पहुंचकर पूजा अर्चना कर रहे हैं।


  • शिव-शक्ति का पर्व है महाशिवरात्रि… मां पार्वती को भी मनपसंद भोग लगाने मिलता है दोगुना फल

    शिव-शक्ति का पर्व है महाशिवरात्रि… मां पार्वती को भी मनपसंद भोग लगाने मिलता है दोगुना फल


    नई दिल्ली।
    आज महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) का उत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है. इस पावन अवसर पर भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ महादेव की पूजा करते हैं. लेकिन महाशिवरात्रि केवल शिव की साधना (Shiva’s Meditation) का ही नहीं बल्कि शिव और शक्ति (Shiva and Shakti) दोनों से जुड़ा महापर्व है. इस पावन दिन पर भक्त अक्सर महादेव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और धतूरा चढ़ाते हैं लेकिन मान्यता है कि अगर भोग में माता पार्वती की पसंद का भी ध्यान रखा जाए तो पूजा का फल दोगुना हो जाता है।

    जब हम शिव और शक्ति दोनों को उनकी प्रिय वस्तुओं का भोग लगाते हैं तो घर में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं कि इस बार महाशिवरात्रि की अपनी भोग की थाली को कैसे खास बनाएं कि हमारे ऊपर महादेव और मां गौरी दोनों की असीम कृपा बरसे।


    महाशिवरात्रि पर लगाएं ये भोग

    भगवान शिव को भोलेनाथ इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि वो बहुत ही सरल चीजों से प्रसन्न हो जाते हैं. इसलिए शिवरात्रि पर भांग, धतूरा और बेर जैसी चीजें चढ़ाई जाती हैं जो हर किसी को आसानी से मिल जाती हैं. लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसे पकवान हैं जिन्हें शिव और पार्वती को चढ़ाने की मान्यता है.

    1. पंचामृत: भगवान शिव को पंचामृत का भोग और अभिषेक अत्यंत प्रिय है. यह दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के मिश्रण से बनता है. इसे आत्मा की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है.
    इसे घर पर कैसे बनाएं
    पंचामृत बनाने के लिए एक बर्तन में ताजा दही, दूध, थोड़ा सा शहद, थोड़ी चीनी और थोड़े से गंगाजल को मिलाकर अच्छी तरह फेंट लें. इसमें स्वाद और शुद्धता के लिए बारीक कटे मखाने, सूखे मेवे और तुलसी के पत्ते डालें. सभी सामग्रियों को एक साथ मिलाने के बाद आपका पवित्र पंचामृत भोग के लिए तैयार है.

    2. मावा की बर्फी: शिव पूजा में भांग और धतूरे का विशेष महत्व है. भांग को दूध में मिलाकर या इसके लड्डू बनाकर भोग लगाया जाता है. यह भगवान शिव की वैराग्य प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है.
    इसे घर पर कैसे बनाएं
    मावे यानी खोया की बर्फी बनाने के लिए कड़ाही में खोया और चीनी डालकर धीमी आंच पर तब तक पकाएं जब तक वो गाढ़ा होकर कड़ाही न छोड़ने लगे. इसमें इलायची पाउडर और थोड़े कटे हुए ड्राई फ्रूट्स मिलाएं. फिर मिश्रण को घी लगी प्लेट में एक समान फैला दें. हल्का ठंडा होने पर मनचाहे आकार में काट लें.

    3. बेलपत्र और मौसमी फल: माता पार्वती और शिव जी को बेर और केले जैसे कई फलों का भोग लगाया जाता है. लेकिन बेर को शिवरात्रि का मुख्य फल माना जाता है. बेर के बिना शिव पूजा अधूरी मानी जाती है.

    4. ठंडाई: शिवरात्रि पर महादेव को केसर, बादाम और पिस्ता मिश्रित ठंडाई का भोग लगाना शुभ होता है. यह मन को शांति प्रदान करने वाला सात्विक भोग है.
    इसे घर पर कैसे बनाएं
    सबसे पहले बादाम, काजू, पिस्ता, सौंफ, खसखस और काली मिर्च को कुछ घंटों के लिए भिगोकर उनका बारीक पेस्ट तैयार कर लें. अब इस पेस्ट को ठंडे दूध में अच्छी तरह मिलाएं और इसमें स्वादानुसार चीनी, केसर के धागे और गुलाब की पंखुड़ियां डाल दें. अंत में मिश्रण को छान लें या बिना छाने ही बर्फ के टुकड़े डालकर इसे ठंडा ही शिव जी को भोग लगाएं.

    5. मखाना खीर: माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए सूखे मेवों से भरपूर मखाने की खीर का भोग लगाया जाता है. यह भोग शक्ति और भक्ति का संगम माना जाता है. मखाने की खीर व्रत में खाई जाती है और इसका भोग शिव को भी लगाया जाता है.
    इसे घर पर कैसे बनाएं
    सबसे पहले मखानों को घी में हल्का कुरकुरा होने तक भून लें और फिर उन्हें दरदरा पीस लें या छोटे टुकड़ों में काट लें. अब दूध को आधा होने तक उबालें और फिर उसमें मखाने, चीनी और इलायची पाउडर डालकर गाढ़ा होने तक धीमी आंच पर पकाएं. आखिर में अपनी पसंद के बारीक कटे हुए मेवे और केसर डाल दें.

  • कुंभ राशि में सूर्य गोचर 2026 से बदलेगा भाग्यचक्र: 15 मार्च तक मेष, मिथुन, सिंह और तुला के लिए करियर, निवेश और रिश्तों में प्रगति के संकेत

    कुंभ राशि में सूर्य गोचर 2026 से बदलेगा भाग्यचक्र: 15 मार्च तक मेष, मिथुन, सिंह और तुला के लिए करियर, निवेश और रिश्तों में प्रगति के संकेत


    नई दिल्ली। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 13 फरवरी 2026 को सूर्य ने कुंभ राशि में प्रवेश किया है और इसका प्रभाव 15 मार्च 2026 तक रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार यह परिवर्तन प्रातः लगभग 4 बजकर 14 मिनट पर हुआ। इससे पहले सूर्य मकर राशि में स्थित था। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, प्रतिष्ठा, प्रशासनिक शक्ति और पारिवारिक संतुलन का कारक ग्रह माना जाता है। इसी कारण सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश विशेष महत्व रखता है।

    पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताओं के आधार पर यह गोचर मेष, मिथुन, सिंह और तुला राशि के जातकों के लिए अनुकूल परिणाम देने वाला माना जा रहा है। मेष राशि के लिए सूर्य का यह परिवर्तन लाभ भाव में सक्रियता ला सकता है। नौकरीपेशा लोगों को पदोन्नति या वेतन वृद्धि के संकेत मिल सकते हैं जबकि व्यवसाय से जुड़े जातकों को नए संपर्कों और नेटवर्किंग से आर्थिक अवसर प्राप्त होने की संभावना जताई जा रही है। सामाजिक प्रतिष्ठा में भी वृद्धि के संकेत बताए जा रहे हैं।

    मिथुन राशि के लिए यह अवधि लंबित कार्यों को गति देने वाली मानी जा रही है। पारिवारिक और सामाजिक संबंधों में सुधार के संकेत हैं। जो योजनाएं लंबे समय से रुकी हुई थीं उन्हें आगे बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। उच्च शिक्षा या विदेश से जुड़े कार्यों में भी सकारात्मक परिणाम मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

    सिंह राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर साझेदारी और वैवाहिक जीवन के क्षेत्र में संतुलन ला सकता है। व्यवसायिक सहयोग मजबूत हो सकता है और सामूहिक निर्णयों में स्पष्टता बढ़ने की संभावना है। कार्यक्षेत्र में नेतृत्व क्षमता उभर सकती है जिससे सम्मान और प्रभाव में वृद्धि हो सकती है।

    तुला राशि के लिए यह समय निवेश और व्यक्तिगत संतुलन से जुड़ा माना गया है। वित्तीय निर्णय सोच समझकर लेने पर लाभ के संकेत मिल सकते हैं। भावनात्मक मामलों में स्पष्टता आने और संबंधों में सामंजस्य बढ़ने की संभावना है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी यह उपयुक्त समय माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रहों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत कुंडली, दशा और अंतर्दशा पर निर्भर करता है। इसलिए किसी भी महत्वपूर्ण आर्थिक या पेशेवर निर्णय से पहले व्यक्तिगत ज्योतिषीय परामर्श को उपयोगी माना जाता है। सूर्य का यह गोचर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मबल को जागृत करने वाला समय माना जा रहा है जो प्रयास और संतुलन के साथ बेहतर परिणाम दे सकता है।

  • महाशिवरात्रि पर बना दुर्लभ संयोग: 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में करें रुद्राभिषेक, पूरी होगी हर मनोकामना!

    महाशिवरात्रि पर बना दुर्लभ संयोग: 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में करें रुद्राभिषेक, पूरी होगी हर मनोकामना!


    नई दिल्ली। देवों के देव महादेव की आराधना का सबसे बड़ा पर्व ‘महाशिवरात्रि’ इस वर्ष 15 फरवरी 2026 को बेहद खास संयोगों के बीच मनाया जाएगा। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर आने वाला यह पर्व इस बार ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘श्रवण नक्षत्र’ के दुर्लभ मेल के साथ आ रहा है, जो आध्यात्मिक साधना और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जा रहा है।

    तिथि और निशीथ काल का महत्व

    पंचांग गणना के अनुसार, चतुर्दशी तिथि का आरंभ 15 फरवरी की शाम 5 बजकर 5 मिनट पर होगा और इसका समापन 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 35 मिनट पर होगा। शास्त्रों के अनुसार, महाशिवरात्रि का व्रत उस दिन किया जाता है जिस दिन रात्रि के ‘निशीथ काल’ (मध्यरात्रि) में चतुर्दशी तिथि व्याप्त हो। इस आधार पर 15 फरवरी को ही मुख्य पर्व और उपवास रखा जाएगा।

    ज्योतिषीय संयोग: सर्वार्थ सिद्धि और श्रवण नक्षत्र

    इस वर्ष महाशिवरात्रि पर ज्योतिषीय गणनाएं विशेष फलदायी हैं। 15 फरवरी की रात 7 बजकर 48 मिनट तक उत्तराषाढ़ा नक्षत्र रहेगा, जिसके उपरांत ‘श्रवण नक्षत्र’ प्रारंभ होगा। श्रवण नक्षत्र को शिव उपासना के लिए शास्त्रों में ‘सिद्ध नक्षत्र’ माना गया है। इसके साथ ही सर्वार्थ सिद्धि योग का होना इस दिन किए गए दान, तप और अभिषेक के फल को अनंत गुना बढ़ा देता है।

    पूजन विधि और अभिषेक का विधान
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का उत्सव है। इस दिन श्रद्धालु प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजन की मुख्य विधि में शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करना अनिवार्य माना गया है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और आक के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। विवाहित महिलाएं माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

    चार प्रहर की पूजा और रात्रि जागरण
    महाशिवरात्रि पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। बहुत से श्रद्धालु रात भर जागकर चार प्रहर की पूजा संपन्न करते हैं। माना जाता है कि इस रात शिव तत्व पृथ्वी के अत्यंत निकट होता है, इसलिए की गई साधना सीधे महादेव तक पहुँचती है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और शिवालयों में सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के लिए अभी से तैयारियां तेज कर दी गई हैं। प्रशासन को उम्मीद है कि इस विशेष योग के कारण मंदिरों में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हो सकती है।

  • शुक्र का नक्षत्र परिवर्तन, 22 फरवरी को पूर्वभाद्रपद में करेंगे प्रवेश, इन राशियों को मिलेगा खास लाभ

    शुक्र का नक्षत्र परिवर्तन, 22 फरवरी को पूर्वभाद्रपद में करेंगे प्रवेश, इन राशियों को मिलेगा खास लाभ


    नई दिल्ली। फरवरी के अंतिम सप्ताह में एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय बदलाव होने जा रहा है। द्रिक पंचांग के अनुसार, 22 फरवरी को शुक्र ग्रह राहु के नक्षत्र शतभिषा से निकलकर पूर्वभाद्रपद नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को सुख, प्रेम, सुंदरता, कला, वैभव और भौतिक सुख-सुविधाओं का कारक माना गया है। जब भी शुक्र नक्षत्र परिवर्तन करता है, इसका असर हमारे संबंधों, आर्थिक स्थिति और जीवन की समग्र स्थिति पर महसूस किया जाता है।

    पूर्वभाद्रपद नक्षत्र को ज्योतिष में विचारशीलता और आध्यात्मिक झुकाव से जोड़ा जाता है। शुक्र का इस नक्षत्र में प्रवेश कई लोगों के लिए सोच में बदलाव, नए अवसर और संबंधों में सुधार लेकर आ सकता है।

    किन राशियों को मिलेगा विशेष लाभ
    मेष राशि
    मेष राशि वालों के लिए यह नक्षत्र परिवर्तन सामाजिक दायरे को बढ़ाने वाला है। नए लोगों से संपर्क और नेटवर्किंग से लाभ मिलेगा। आर्थिक मामलों में धीरे-धीरे सुधार होगा और प्रेम संबंधों में सकारात्मक संवाद से रिश्ते मजबूत होंगे।

    मिथुन राशि
    मिथुन राशि के जातकों के लिए यह समय करियर और प्रतिष्ठा में उन्नति का संकेत देता है। काम की सराहना होगी और वरिष्ठों का सहयोग मिलेगा। खासकर जो लोग क्रिएटिव क्षेत्रों से जुड़े हैं, उन्हें विशेष लाभ मिलेगा।

    सिंह राशि
    सिंह राशि वालों के लिए साझेदारी और दांपत्य जीवन में मधुरता आएगी। अटके हुए कार्य आगे बढ़ सकते हैं और आर्थिक योजनाओं में समझदारी से किया गया निवेश भविष्य में लाभकारी साबित होगा।

    तुला राशि
    तुला राशि के स्वामी शुक्र का यह परिवर्तन राहत और नए अवसर दोनों लाएगा। कार्यक्षेत्र में नए प्रोजेक्ट मिल सकते हैं। स्वास्थ्य में सुधार और मानसिक संतुलन बना रहेगा।

    मकर राशि
    मकर राशि के जातकों के लिए धन और संसाधनों से जुड़े मामलों में लाभ के संकेत हैं। परिवार में सुखद माहौल रहेगा और नई योजनाओं पर काम शुरू करने के लिए समय अनुकूल रहेगा।

  • Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर राहुकाल और भद्रा का साया! जानें जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त

    Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर राहुकाल और भद्रा का साया! जानें जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त

    नई दिल्ली। Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि हर साल फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है. भगवान शिव को समर्पित यह त्योहार इस बार 15 फरवरी को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए लोग शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. उसकी विधिवत पूजा करते हैं. हालांकि इस बार महाशिवरात्रि के दिन भद्रा का साया भी रहेगा. भद्रा शाम के समय रहेगी. और इसी वक्त राहु काल भी लगेगा. इस अशुभ काल में पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान वर्जित माने गए हैं.

    महाशिवरात्रि पर भद्रा काल का समय
    हिंदू पंचांग के अनुसार, 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन भद्रा काल शाम 05 बजकर 04 मिनट से लेकर 16 फरवरी की सुबह 05 बजकर 23 मिनट तक रहेगा. यानी भद्रा की अवधि करीब 12 घंटे 19 मिनट रहेगी. हालांकि भद्रा का वास पाताल लोक में होगा, इसलिए इसका पृथ्वी पर कोई प्रभाव नहीं होगा. शास्त्रों के अनुसार, जब भद्रा पाताल लोक में रहती है तो पृथ्वी पर धार्मिक कार्यो में कोई रोक-टोक नहीं होती है.

    महाशिवरात्रि पर राहु काल का समय
    महाशिवारात्रि पर राहु काल भी रहने वाला है. इस दिन शाम 04 बजकर 47 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 11 मिनट तक राहु काल रहेगा, जिसमें पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान से बचना चाहिए.

    महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का मुहूर्त
    इस साल महाशिवरात्रि पर शिवलिंग के जलाभिषेक के लिए कई शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं. पहला शुभ मुहूर्त सुबह 08:24 बजे से लेकर सुबह 09:48 बजे तक रहेगा. इसके बाद दूसरा शुभ समय 09:48 बजे से लेकर सुबह 11:11 बजे तक रहेगा. फिर करीब सवा 11 बजे से लेकर दोपहर 12:35 बजे तक जलाभिषेक का सबसे उत्तम मुहूर्त रहने वाला है. शाम को 06:11 बजे से लेकर शाम 07:47 बजे के बीच भी आप शिवलिंग का जलाभिषेक कर सकते हैं.

    कैसे करें शिवलिंग का जलाभिषेक?
    शिवलिंग का जलाभिषेक स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जाता है. इसमें शिवलिंग पर पहले जल या गंगाजल चढ़ाया जाता है, फिर दूध, दही, घी और शहद अर्पित किए जाते हैं. इसके बाद बेलपत्र, भांग और फूल चढ़ाकर मंत्र जाप किया जाता है. मान्यता है कि विधिपूर्वक जलाभिषेक करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.

  • महाशिवरात्रि 2026: निशीथ काल में करें भगवान भोलेनाथ की आराधना, बन रहे हैं कई दुर्लभ संयोग

    महाशिवरात्रि 2026: निशीथ काल में करें भगवान भोलेनाथ की आराधना, बन रहे हैं कई दुर्लभ संयोग


    नई दिल्ली । फाल्गुन मास में आने वाली महाशिवरात्रि 2026 का हिंदू धर्मावलंबियों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के आशीर्वाद के लिए श्रद्धालु तीर्थों घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना शिवलिंग अभिषेक और मंत्र जाप की तैयारियों में व्यस्त रहते हैं। इस वर्ष महाशिवरात्रि को लेकर धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कई दुर्लभ शुभ संयोग बन रहे हैं जिनके कारण यह पर्व और भी अधिक कल्याणकारी माना जा रहा है।

    धार्मिक परंपरा में शिव साधना के श्रेष्ठतम समय के रूप में निशीथ काल को विशेष स्थान दिया गया है। माना जाता है कि यह आधी रात का वह समय है जब भगवान शिव अपने भक्तों की शरण में विशेष रूप से उपलब्ध रहते हैं। इसलिए इस काल में शिवलिंग पर अभिषेक धूप-दीप फल-फूल अर्पित करना और मंत्रों का जाप विशिष्ट फलदायक माना जाता है।

    निशीथ काल का समय 15 फरवरी 2026

    इस महाशिवरात्रि पर रात लगभग 12:09 बजे से 01:01 बजे तक का निशीथ काल उत्पन्न होगा। इस अवधि को पूजा-अर्चना मंत्रोच्चारण और ध्यान के लिए अत्यंत शुभ समय माना गया है। धार्मिक परंपरा में कहा गया है कि इस समय किया गया शिवलिंग पूजन विशेष लाभ और आशीर्वाद प्रदान करता है।

    दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि पर कई शुभ राजयोग एक साथ बन रहे हैं जो अत्यंत दुर्लभ और सकारात्मक प्रभाव वाले हैं लक्ष्मी-नारायण राजयोग: बुध और शुक्र के संयोग से बन रहा है जो समृद्धि और वैभव का संकेत देता है। बुधादित्य राजयोग: बुध और सूर्य के मेल से यह योग बन रहा है जो बुद्धि सम्मान और सेल्फ-एक्सप्रेशन को सुदृढ़ करता है।

    शुक्रादित्य योग: शुक्र और सूर्य के मिलन से यह योग बन रहा है जो सौंदर्य कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है। शनि-शश महापुरुष राजयोग कुंभ राशि में शनि की स्थिति से यह विशेष योग बन रहा है जो अनुशासन ज्ञान और स्थिरता का सूचक है। पंचग्रह राजयोग: सूर्य बुध शुक्र शनि और राहु के एक साथ होने से यह योग बन रहा है जो अत्यंत दुर्लभ तथा शक्तिशाली माना जाता है।

    इन सभी योगों का एक साथ बनना साधारण नहीं है इसलिए ज्योतिषियों के अनुसार यह समय आध्यात्मिक उन्नति सकारात्मक परिवर्तन और जीवन में संतुलन लाने के लिए बेहद अनुकूल है। कहा जाता है कि इस अवधि में किए गए उपाय और पूजा-अर्चना का प्रभाव तीन-गुणा बढ़ जाता है और कई राशियों के लिए यह समय विशेष रूप से फलदायी माना जा रहा है।

    विशेष सुझाव:

    इस निशीथ काल में शिवलिंग पर जल दूध गंगाजल तथा बेलपत्र अर्पित करें।  ॐ नमः शिवाय का जाप श्रवण मनन के साथ करें। ध्यान और भक्ति भाव से शिवस्तुति करें ताकि आध्यात्मिक उन्नति का अधिकतम लाभ प्राप्त हो। इस महाशिवरात्रि पर सही मुहूर्त और संयोग का लाभ उठाकर शिव भक्तों को भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद अत्यंत शुभ फलदायी सिद्ध होगा।

  • विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय

    विजया एकादशी कब है 2026 : फाल्गुन में पहली एकादशी, शत्रुओं पर विजय और सफलता का उपाय


    नई दिल्ली । विजया एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह एकादशी फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और विशेष रूप से सफलता विजय बाधाओं पर जीत और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए मनाई जाती है। 2026 में विजया एकादशी का धार्मिक महत्व और तारीख सभी भक्तों के लिए निश्चित हो चुकी है जिसे जानकर आप सही विधि और मुहूर्त के अनुसार व्रत रख सकते हैं।

    विजया एकादशी व्रत की सही तारीख और समय

    इस वर्ष विजया एकादशी शुक्रवार 13 फरवरी 2026 को है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 फरवरी दोपहर 12:22 बजे से शुरू होकर 13 फरवरी दोपहर 02:25 बजे तक रहेगी। व्रत का पारण द्वादशी को व्रत खोलना 14 फरवरी 2026 शनिवार की सुबह लगभग 07:00 से 09:14 बजे तक किया जाएगा।

    क्यों है यह एकादशी महत्वपूर्ण?
    विजया एकादशी का अर्थ ही विजय होता है। पुराणों के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु की विशेष कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाला माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति जीवन में कठिनाइयों शत्रुओं बाधाओं या नकारात्मक परिस्थितियों का सामना कर रहा है तो इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने से सफलता और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि यह एकादशी वैदिक परंपरा में विशेष महत्व रखती है।
    व्रत कैसे रखें
    विजया एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर व्यक्ति स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि स्वास्थ्य अनुकूल हो तो केवल जल का सेवन कर व्रत रखा जाए; लेकिन अगर स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार भी किया जा सकता है। व्रत के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप और भजन-कीर्तन करने से व्रत की सिद्धि और अधिक होती है।
    ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय यह सबसे सरल और प्रभावशाली मंत्र है जिसका जाप श्रद्धा से करने पर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

    धार्मिक मान्यता:विजया एकादशी व्रत को श्रीराम ने लंका विजय से पहले किया था इसलिए इसे विजय-दायक व्रत के रूप में अत्यंत फलदायी माना जाता है। भक्तजन इस दिन भगवान विष्णु की पूजा फलाहार व भजन-कीर्तन के साथ व्रत रखते हैं और निरंतर मन में सकारात्मक ऊर्जा और विजय की भावना बनाए रखते हैं।

  • गुरुवार की शाम में करें ये खास उपाय, मां लक्ष्मी की बरसात होगी आपके घर पर

    गुरुवार की शाम में करें ये खास उपाय, मां लक्ष्मी की बरसात होगी आपके घर पर


    नई दिल्ली । गुरुवार का दिन धार्मिक दृष्टि से विशेष माना जाता है और इस दिन किए गए उपायों का प्रभाव भी जल्दी दिखता है। अगर आप चाहते हैं कि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे और धन की कमी दूर हो, तो गुरुवार की शाम को प्रदोष काल में कुछ खास उपाय जरूर करें। मान्यता है कि शाम के समय घर में मां लक्ष्मी के आगमन का समय होता है और इस समय दीपक जलाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसलिए घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इस उपाय से घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

    वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के ईशान कोण उत्तर-पूर्व दिशा को सबसे शुभ माना जाता है। इसलिए गुरुवार की शाम को ईशान कोण में दीपक जलाने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है और धन लाभ के योग बनते हैं। खासकर जब यह दीपक प्रदोष काल में जलाया जाए तो इसके प्रभाव और भी बढ़ जाते हैं।

    इसके अलावा, शाम के समय घर के आंगन में दीपक जलाना भी शुभ होता है। पुराने समय में लोग आंगन में दीपक जलाकर अंधेरे को दूर करते थे। आज भी अगर आप अपने आंगन में दीपक जलाते हैं, तो इससे घर में सकारात्मकता बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी के पौधे में मां लक्ष्मी का वास माना जाता है। इसलिए प्रदोष काल में तुलसी के पास दीपक जलाने से धन संबंधी परेशानियां कम होती हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। इसके साथ ही, घर के मंदिर में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाना भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। ऐसा करने से विष्णु-लक्ष्मी की कृपा से घर में धन लाभ होता है और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है।

    गुरुवार की शाम को इन उपायों को नियमित रूप से करने से न केवल घर में शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है, बल्कि धन-लाभ के अवसर भी बढ़ते हैं। अगर आप सच्‍चे मन से और श्रद्धा के साथ दीपक जलाएंगे तो माना जाता है कि मां लक्ष्मी आपके घर पर अपनी कृपा बरसाएंगी और घर-परिवार में खुशहाली बनी रहेगी।

  • Ekadashi 2026 Daan: विजया एकादशी के दिन दान करना क्यों माना जाता है शुभ? जानें किन-किन चीजों का दान करना होता है फलदायी

    Ekadashi 2026 Daan: विजया एकादशी के दिन दान करना क्यों माना जाता है शुभ? जानें किन-किन चीजों का दान करना होता है फलदायी

    Ekadashi 2026 Daan:विजया एकादशी का दिन भगवान विष्णु की आराधना और पुण्य कर्मों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि पर व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। खासतौर पर विजया एकादशी पर किया गया दान कई गुना फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस दिन किन-किन वस्तुओं का दान करना शुभ माना गया है और इसका क्या आध्यात्मिक महत्व है।

     किन-किन वस्तुओं का दान करना माना जाता है शुभ

    अन्न और चावल का दान
    इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खासकर चावल का दान शुभ फलदायी माना गया है। मान्यता है कि अन्न का दान करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
    धार्मिक पुस्तकों का दान
    विजया एकादशी के अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम या हनुमान चालीसा जैसी पवित्र पुस्तकों का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। इससे ज्ञान की वृद्धि होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दान व्यक्ति को मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है।
    पीले वस्त्र का दान
    भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है। इसलिए इस दिन पीले वस्त्र दान करने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की परेशानियां धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं। विशेषकर आर्थिक या पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए यह दान लाभकारी माना गया है।

    देसी घी का दान
    विजया एकादशी पर शुद्ध देसी घी का दान भी शुभ माना गया है। धार्मिक दृष्टि से घी पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि घी का दान करने से मान-सम्मान में वृद्धि होती है और कुंडली में गुरु या शुक्र से संबंधित दोषों में भी राहत मिल सकती है।

    तिल और गुड़ का दान
    तिल और गुड़ का दान स्वास्थ्य और मानसिक शांति से जुड़ा माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इससे जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है। यह दान विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है, जिन्हें कार्यों में बार-बार रुकावटों का सामना करना पड़ता है।